Tuesday, September 11, 2018

‘न दैन्यं न पलायनम्’ : अनुभवों से उपजी कविताएं - डॉ. वर्षा सिंह ...समीक्षात्मक आलेख

Dr Varsha Singh
समीक्षात्मक आलेख
 
‘न दैन्यं न पलायनम्’ : अनुभवों से उपजी कविताएं 
        - डॉ. वर्षा सिंह

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पुस्तक -न दैन्यं न पलायनम   लेखक - अटल बिहारी वाजपेयी
मूल्य  - 120 /-            प्रकाशक - किताबघर, दरियागंज, नई दिल्ली-2
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‘न दैन्यं न पलायनम्’ अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का संग्रह है। इसका संपादन डॉ. चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा ने  किया है। इसके पूर्व अटल जी की ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ संग्रह प्रकाशित हुआ था। इस बहुचर्चित काव्य-संग्रह का लोकार्पण 13 अक्तूबर 1995 को नई दिल्ली में देश के पूर्व प्रधानमन्त्रा पी. वी. नरसिंहराव ने सुप्रसिद्ध कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की उपस्थिति में किया था। अटल जी की इक्यावन कविताओं का चयन व सम्पादन डॉ. चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा ने ही किया था। पुस्तक के नाम के अनुसार इसमें अटलजी की इक्यावन कविताएं संकलित हैं जिनमें उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।  ठीक इसी प्रकार ‘न दैन्यं न पलायनम्’ में संग्रहीत कविताएं अटल बिहारी वाजपेयी के विविध मनोभावों से परिचित कराती हैं। ‘न दैन्यं न पलायनम्’ की कविताओं के चयन के बारे में संग्रह के संपादक चन्द्रिका प्रसाद शर्मा ‘संपादक के शब्द’ के अंर्तगत लिखते हैं कि -‘उक्त कृति (अर्थात् ‘मेरी इक्यावन कविताएं’) के नाते मेरा उत्साह बढ़ना स्वाभाविक था। अस्तु मैंने उनकी अन्य कविताओं को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। कविताओं को एकत्रित करके पांडुलिपि उन्हें दिखा कर प्रकाशन की अनुमति प्राप्त कर ली।’ 
Na Nainyam Na Palayanam - Atal Bihari Vajpeyee

चंद्रिका प्रसाद शर्मा जी का यह उत्साह स्वाभाविक था। यहां उल्लेखनीय है कि पाठकों के बीच ‘न दैन्यं न पलायनम्’ की लोकप्रियता का पता इसी बात से चल जाता है कि इसका पहला संस्करण सन् 1998 में प्रकाशित हुआ था और नवम्बर 2013 में इसका बारहवां संस्कारण प्रकाशित हुआ। अर्थात् जब इस संग्रह का पहला संस्करण प्रकाशित हुआ था उस समय अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन थे। किन्तु नवम्बर 2013 में वे किसी पद पर आसीन नहीं थे फिर भी बारहवां संस्करण प्रकाशित किए जाने की आवश्यकता अनुभव की गई।  
सक्रिय राजनीति से जुड़े व्यक्ति के साथ यह विडम्बना रहती है कि पदयुक्त होने पर उसकी प्रशंसा की सरिता कल-कल करती हुई बहती रहती है, वहीं जब वह पदच्युत हो जाता है तो प्रशंसा की यही सरिता सूख कर बंजर धरती में बदल जाती है। अटल बिहारी वाजपेयी की साहित्य सर्जना इसकी अपवाद है। उनकी कविताएं उनके प्रधानमंत्रित्वकाल में जितनी लोकप्रिय थीं उतनी ही लोकप्रिय आज भी हैं जबकि वे अब प्रधानमंत्री नहीं हैं। यही ईमानदार साहित्य सृजन की पहचान है कि वह साहित्यकार के नाम से नहीं पहचानी जाती वरन् साहित्यकार उस सृजन की विशिष्टता से पहचाना जाता है। 
   ‘न दैन्यं न पलायनम्’ में संग्रहीत कविताओं को चार भागों में निबद्ध किया गया है- आस्था के स्वर, चिन्तन के स्वर, आपातकाल के स्वर एवं विविध स्वर। इनके बाद परिशिष्ट है जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी का जीवनपरिचय तथा एक साक्षात्कार शामिल गया है।
‘आस्था के स्वर’ में कुल 15 कविताएं हैं। इसमें पहली कविता है-
         मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांग करूंगा।
जाने कितनी बार जिया हूं
जाने कितनी बार मरा हूं
जन्म-मरण के फेरे से मैं
इतना पहले नहीं डरा हूं 
अन्तहीन अंधियार ज्योति की
कब तक और तलाश करूंगा।
Bharat Ratna Atal Bihari Vajpeyee

इस कविता के माध्यम से कवि मानो उद्घोष कर रहा है कि सब कुछ व्यवस्थित कर लेने की आकांक्षा मे जन्मजन्मान्तर नहीं भटकना है, जो करना है इसी जन्म में करना है और अव्यवस्था के अंधकार में सुव्यवस्था की ज्योति प्रज्ज्वलित करना है।
इसी खण्ड की दूसरी कविता है-‘न दैन्यं न पलायनम्’। इस कविता में कवि ने ‘महाभारत’ के प्रसंग को आधार बनाया है। महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले, कुरुक्षेत्रा के युद्धस्थल में अर्जुन ठिठक जाते हैं कि सामने जो कौरव खड़े हैं वे भी तो अपने ही सगे-संबंधी हैं। वे सारथी बने कृष्ण से कहते हैं कि मैं स्वजनों पर शस्त्रा नहीं चला सकता। तब श्रीकृष्ण अर्जुन को ‘गीता’ का उपदेश देते हैं जिससे अर्जुन को बोध होता है कि गलत कार्य करने वाला सदा दण्डनीय होता है, भले ही वह सगा-संबंधी ही क्यों न हो! इसके बाद अर्जुन हुंकार भरता है और कौरवों को ललकारता है। इसी प्रसंग का स्मरण कराते हुए कवि आह्वान करता है कि -
आग्नेय परीक्षा की / इस घड़ी में -
आइए, अर्जुन की तरह
उद्घोष करें : ‘न दैन्यं न पलायनम्’।

अटल जी का अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति अगाध प्रेम उनकी इन पांच कविताओं में खुल कर मुखर हुआ है। ये कविताएं हैं- ‘अपने घर की दासी’,‘विश्व-भाषा का सपना’,‘चले जब हिन्दी घर में’, ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन’, ‘गूंजी हिन्दी विश्व में’। देश में हिन्दी की दुर्दशा पर कटाक्ष करते हुए कवि ने लिखा है-
बनने चली विश्व भाषा जो, अपने घर में दासी
सिंहासन पर अंग्रेजी है,   लखकर दुनिया हांसी
लखकर दुनिया हांसी,   हिन्दीदां बनते चपरासी
अफसर सारे अंग्रेजीमय,  अवधी हों या मदरासी
                     (अपने घर की दासी)
अटल जी ने कई विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भाग लिया। वहां उन्होंने देखा कि हिन्दी के प्रति हिन्दी भाषियों द्वारा जो चिन्ता जताई जा रही थी, वह हिन्दी में न हो कर अंग्रेजी में थी। और, यही अंग्रेजी प्रेम उन्हें हर दिन भारत में भी देखने को मिलता रहा। हिन्दी की इस उपेक्षा को देख कर अटल जी का कवि मन व्यथित हो उठा और तब उन्होंने ये पंक्तियां लिखीं -
कह कैदी कविराय
चले जब हिन्दी घर में
तब बेचारी पूछी जाए दुनिया भर में
                  (चले जब हिन्दी घर में)
भारत के विदेश मंत्रा के रूप में राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में 04 अक्टूबर 1977 को अटल जी ने हिन्दी में भाषण दे कर हिन्दी को विशेष मान दिलाया। ठीक इसके बाद उन्होंने यह छंद रचा-
गूंजी हिन्दी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार
राष्ट्रसंघ के मंच से,  हिन्दी का जयकार
हिन्दी का जयकार, हिन्द हिन्दी में बोला
देख स्वभाषा प्रेम, विश्व अचरज से डोला
                                   (गूंजी हिन्दी विश्व मेंं)
संग्रह के दूसरे खण्ड ‘चिन्तन के स्वर’ में युगबोध एवं राजनीतिक ह्रास के प्रति चिन्ता जताती कविताएं हैं। जैसे-‘फंदा कसता ही जाता है’, ‘युगबोध’, ‘प्रेरणा की बेला’, ‘वेदना’, ‘दो चतुष्पदी’, ‘सत्य से नाता तोड़ा’, ‘यह है नया स्वराज’, ‘वाटरगेट’, ‘हाथों को मलते’ और ‘पद ने जकड़ा’।
‘सत्य से नाता तोड़ा’ कविता राजनीति के अवसरवादी स्वरूप का बेझिझक वर्णन करती है। अवसरवादिता के कारण ही राजनीति के परिसर में चाटुकारों की भीड़ लगी रहती है। जिनमें चाटुकारिता में डूबे साहित्यकार भी पाए जाते हैं। ऐसे लोगों को ‘बिन हड्डी की रीढ़’ के सम्बोधन से कवि ने कटाक्ष किया है।
कवि मिलना मुश्क़िल हुआ, भांड़ों की है भीड़
ठकुरसुहाती कह रहे,     बिन हड्डी की रीढ़
बिन हड्डी की रीढ़,     सत्य से नाता तोड़ा
सत्ता की सुन्दरी,       नचाती ले कर कोड़ा

अटल जी ने ‘कैदी कविराय’ के रूप में कई कविताएं लिखीं। संग्रह के तीसरे खण्ड ‘आपातकाल के स्वर’ में वे कविताएं हैं जो अटल जी ने आपातकाल के अपने अनुभवों को सहेजते हुए रची थीं। इन कविताओं में जेल के अनुभव पर भी कविता है। इन्हीं में ‘कार्ड की महिमा’ शीर्षक कविता अपने आप में अनूठी और रोचक कविता है। इसमें कवि ने पोस्टकार्ड को संवाद-संचार का सर्वोत्तम साधन माना है। कवि के अनुसार राशन, शासन, शादी और व्याधि के साथ ही सेंसर किए जाने की दृष्टि से भी सरल, सहज माध्यम है।
पोस्टकार्ड में गुण बहुत, सदा डालिए कार्ड
कीमत कम सेंसर सरल, वक़्त बड़ा है हार्ड
वक़्त बड़ा है हार्ड, सम्हल कर चलना भैया
बड़े-बड़ों की  फूंक  सरकती  देख  सिपैया
कह कैदी कविराय,   कार्ड की महिमा पूरी
राशन, शासन, शादी,  व्याधी, कार्ड जरूरी।

संग्रह का चौथा खण्ड ‘विविध स्वर’ है। इसमें ‘चोर-सिपाही’, ‘मंत्रापद तभी सफल’, ‘दीवाली’, ‘पेंशन का बिल’, ‘लटका चमगादड़’ आदि विविध भाव की कविताएं हैं। जेल के अनुभव को रजनीगंधा के माध्यम से कुछ इस तरह व्यक्त किया है कवि ने -
कहु सजनी! रजनी कहां ?  अंधियारे में चूर
एक बरस में ढह गया,     चेहरे पर से नूर
चेहरे पर से नूर,      दूर दिल्ली दिखती है
नियति निगोड़ी कभी, कथा उलटी लिखती है
कह कैदी  कविराय  सूखती  रजनी  गंधा
राजनीति  का  पड़ता है  जब उल्टा फंदा।

संग्रह के अंत में परिशिष्ट के अंतर्गत अटल जी का संक्षिप्त परिचय है जिसमें उनके बाल्यकाल, शिक्षा और राजनीतिक यात्रा के साथ-साथ साहित्य की यात्रा की भी जानकारी दी गई है। परिचय के उपरान्त अटल जी का एक साक्षात्कार दिया गया है जो उनके साहित्य प्रेम और साहित्य अध्ययन, सृजन की जानकारी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस साक्षात्कार से पता चलता है कि उन्होंने ‘रामचरित मानस’ से ले कर कवि ‘नवीन’ और ‘दिनकर’ की कविताएं पढ़ीं। वृन्दावनलाल वर्मा का उपन्यास ‘झांसी की रानी’ ने उन्हें जितना प्रभावित किया, उतना ही अज्ञेय के उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ ने प्रभावित किया। उन्होंने तस्लीमा नसरीन के लेखन, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘लज्जा’ को भी पढ़ा और सराहा।
अटल जी के साक्षात्कार में दो प्रश्नों के उत्तर बड़ा ही समसामयिक महत्व रखते हैंः-
पहला प्रश्न है -‘साहित्यकार से आप क्या अपेक्षा करते हैं?’
अटल जी कहते हैं कि -‘वर्तमान में ऐसे साहित्य की आवश्यकता है जो लोगों में राष्ट्र के प्रति सच्चे कर्त्तव्यबोध को उत्पन्न करे। साहित्यकार को पहले अपने प्रति सच्चा होना चाहिए, बाद में उसे समाज के प्रतिअपने दायित्व का सही अर्थों में निर्वाह करना चाहिए। वह वर्तमान को ले कर चले, किन्तु आने वाले कल की चिन्ता जरूर करे।’
दूसरा प्रश्न है-‘साहित्यकार को राजनीति से कितना सरोकार रखना चाहिए?’
इसके उत्तर में अटल जी कहते हैं कि -‘साहित्य और राजनीति के कोई अलग-अलग खाने नहीं हैं। जो राजनीति में रुचि लेता है वह साहित्य के लिए समय नहीं निकाल पाता और साहित्यकार राजनीति के लिए समय नहीं दे पाता। किन्तु कुछ लोग ऐसे हैं जो दोनों के लिए समय देते हैं। वे वंदनीय हैं।’
अटल जी आगे कहते हैं कि -‘आज राजनीतिज्ञ साहित्य, संगीत और कला से दूर रहने लगे हैं। इसी से उनमें मानवीय संवेदना का स्रोत सूख-सा गया है।’
पुस्तक ‘न दैन्यं न पलायनम्’ में संग्रहीत अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं को पढ़ कर यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वे प्रखर संवेदना के कवि हैं। उनकी संवेदना उनके जीवन अनुभवों और बौद्धिकता से अनुशासित रहती है। जिससे उनकी कविताओं में एक विशिष्ट सौंदर्यबोध निहित है। अटल जी की काव्य-भाषा सरल, सहज एवं नैसर्गिक है। भाषाई क्लीष्टता से दूर आसानी से समझ में आ जाने वाली कविताएं हैं। इस संग्रह में संग्रहीत कविताएं उनके काव्य-भाव आत्मबोध, युगबोध, प्रखर राष्ट्रीयता एवं मानवता बोध से रची-बसी हैं। अटल जी के अपने जीवन अनुभवों से उपजी कविताओं के इस संग्रह की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी।
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