Wednesday, September 19, 2018

कवि राजेश जोशी को सुनना.... डॉ. वर्षा सिंह

From left : Rajesh Joshi, Dr. (Miss) Sharad Singh & Dr. Varsha Singh

समकालीन कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर राजेश जोशी दिनांक 18.09.2018 को मेरे शहर सागर म.प्र. में मौज़ूद थे। अवसर था शहर की नामचीन संस्था बुनियाद सांस्कृतिक समिति, सागर द्वारा आयोजित विख्यात कवि राजेश जोशी का एकल काव्य-पाठ एवं डॉ. छबिल कुमार मेहेर द्वारा संपादित "कालजयी मुक्तिबोध" और "राजेश जोशी संचयिता" का विमोचन कार्यक्रम।

   राजेश जोशी की उपस्थिति के मायने हैं हवाओं में कविता के ध्वनित होने की हलचल को महसूस करना। एक दिन बोलेंगे पेड़, मिट्टी का चेहरा, नेपथ्य में हंसी, दो पंक्तियों के बीच, चांद की वर्तनी - इन पांच पुस्तकों में हिलोरें लेती कविता की मुखरिता से कितनी ही दफ़ा रू-ब-रू हो चुकी हूं मैं, लेकिन स्वयं कवि के मुख से निकली कविता के रसास्वादन की बात ही कुछ और होती है।
हां, इस एकल काव्यपाठ के दौरान राजेश जोशी ने अपनी उस कविता का पाठ भी किया जिसने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया है.....
सुबह सुबह
बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?
क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्‍या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आंगन
खत्‍म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल
पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजरते हुए
बच्‍चे, बहुत छोटे छोटे बच्‍चे
काम पर जा रहे हैं।


        राजेश जोशी को सुनना और उनसे मिल कर साहित्यिक विमर्श करना एक अविस्मरणीय अनुभव था।
इस अवसर पर  शहर के अन्य प्रबुद्धजनों सहित मेरे साथ थीं विदुषी साहित्यकार एवं बहुविधायुक्त सृजनात्मक लेखन की धनी डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, जो मेरी अनुजा हैं।
        -  डॉ. वर्षा सिंह

©Dr.Varsha Singh

Wednesday, September 12, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन -28 पुष्पदंत हितकर : सहज अभिव्यक्ति ही जिनकी खूबी है - डॉ. वर्षा सिंह

  
Dr Varsha Singh
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि पुष्पदंत हितकर पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन
पुष्पदंत हितकर : सहज अभिव्यक्ति ही जिनकी खूबी है
                       -
डॉ. वर्षा सिंह
                           
परिचय :- कवि पुष्पदंत हितकर
जन्म :- 25 मार्च 1954
जन्म स्थान :- सागर नगर
पिता एवं माताः- स्व. गुलाबचंद एवं स्व. शांतिबाई
शिक्षा :- बी.एस-सी. फाइनल (सागर विश्वविद्यालय)
लेखन विधा :- कविताएं
प्रकाशन :- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में
------------------------------

सागर नगर में 25 मार्च 1954 श्री गुलाबचंद जी के घर जन्में कवि पुष्पदंत हितकर की माता जी श्रीमती शांतिबाई अत्यंत सहृदय एवं धार्मिक विचारों की महिला थीं तथा पिताश्री नगर की एक प्रतिष्ठित फर्म में मैनेजर के पद पर कार्य करते रहे। कवि हितकर के जीवन पर अपने माता-पिता के धार्मिक विचारों एवं सहृदयता का गहरा प्रभाव पड़ा। सागर विश्वविद्यालय से बी.एस-सी. फाइनल तक शिक्षा ग्रहण करने वाले पुष्पदंत हितकर ने सन् 1975 से लेखन कार्य आरम्भ किया। साहित्य में रुचि रखने वाले कवि हितकर की कविताएं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। झांसी से प्रकाशित साप्ताहिक भारती, तीर्थंकर पत्रिका (इंदौर), अहिंसावाणी (अलीगढ़) त्रैमासिक पत्रिकाव्यंग्यम’ (जबलपुर) आग और अंगार (दमोह), सिंधुधारा तथा विंध्यकेसरी (सागर) आदि में कवि हितकर की रचनाएं प्रकाशित हुईं हैं।
साहित्य सेवा के साथ ही पुष्पदंत हितकर समाज सेवा से जुड़ गए। इसी तारतम्य में जैन छात्र समिति के द्वारा प्रकाशित वार्षिक पत्रिका रश्मिका संपादन किया। इसी दौरान उन्हें जैन संतो ंके समागम में काव्यपाठ का सुअवसर प्राप्त हुआ। सन् 1993 में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में आचार्य श्री विद्यासागर महराज का सानिध्य प्राप्त होने के साथ ही कवि हितकर को गजरथ स्मारिका का संपादन करने का अवसर भी प्राप्त हुआ। कवि हितकर का अभी तक कोई काव्य संकलन तो प्रकाशित नहीं हो सका है किन्तु नगर की साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी सक्रियता निरंतर बनी रहती है।
Sagar Sahitya Chintan - 28  - Dr Varsha Singh


कवि हितकर को साहित्य सेवा में सक्रियता के लिए सागर की विभिन्न संस्थाओं जैसे रोटरी क्लब, नगर साहित्यकार समिति, श्रीराम सेवा समिति, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भारतीय स्टैट बैंक शहर शाखा एवं चमेली चौक शाखा, 0प्र0 हस्त शिल्प कला, भारतीय ग्रामोद्योग, शिवसेना, जैन मिलन शाखा मकरोनिया एवं नेहानगर, देववाणी संस्था, प्रियदर्शिनी कला संगम, हिन्दी-उर्दू मजलिस के द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया गया।
भारतीय जीवन बीमा निगम के एक सफल अभिकर्ता के रूप में कार्य करते हुए भी पुष्पदंत हितकर ने अपनी साहित्यिक लगन को बनाए रखा और वे लगभग विगत 24 वर्षों से काव्य गोष्ठियों में अपनी रचनाओं का पाठ करते आ रहे हैं। वे मानते हैं कि नगर के हिन्दी उर्दू साहित्यकार मंच, नगर साहित्यकार परिषद, आर्ष परिषद, श्यामलम संस्था, पाठक मंच सागर इकाई ने काव्यपाठ का अवसर दे कर उनकी लेखनी को सदा प्रोत्साहित किया है। कवि हितकर के अनुसार जबलपुर के सुरेश सरल तथा सागर नगर के कवि निर्मलचंद निर्मल एवं कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज ने साहित्यिक क्षेत्र में हमेशा मार्गदर्शन किया एवं सहयोग दिया। आकाशवाणी के सागर तथा छतरपुर केन्द्रों से भी उनकी कविताओं का प्रसारण हुआ है।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने बच्चों के कोमल कंधों पर भारी बस्तों का बोझ लाद रखा हैं इस व्यवस्था पर चोट करते हुए कवि हितकर ने जो गीत लिखा है उसका अंश देखें -
छोटे- छोटे कांधों पर हैं
भारी- भारी बस्ते
मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरें
सबको करें नमस्ते
सपनें हैं इनकी आंखों के
कैसे बने फरिश्ते
मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरें......
खुली हवा, छप्पर के नीचे
करना पड़े पढ़ाई
देश को ऊंचा यही उठायेंगे
पा कर तरुणाई
एक दिन फूलों से भर देंगे
कांटों वाले रस्ते
मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरें......
आज समस्या मात-पिता पर
ड्रेस कहां से लाएं
इन पर ही निर्भर रहती ये
कोमल सरल लताएं
फिर भी सब कुछ सहते हैं ये
देखो हंसते-हंसते
मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरें......

उपभोक्ता दौर के प्रभाव में आज व्यक्ति आत्मप्रदर्शन पर अधिक ध्यान देने लगा है। जो जीवन की सुख सुविधाओं से संपन्न हैं वे दूसरे की गरीबी या लाचारी पर ध्यान दिए बिना अपने सुखों का बेजा प्रदर्शन करने लगते हैं। इस प्रवृत्ति पर कवि हितकर की कटाक्ष करने वाली यह व्यंग्य कविता ध्यान देने योग्य है-
शो रूम से निकली कार में
काली पट्टी लगाते हैं
धन के प्रदर्शन से
गरीब आदमी की
नज़र न लगे
दुनिया को दिखाते हैं।

पुष्पदंत हितकर यह मानते हैं कि यदि प्रत्येक मनुष्य मनुष्यता का पाठ पढ़ ले और स्वयं को बुराईयों से बचा ले तो व्यक्तिगत कठिनाईयों के साथ ही समाज में व्याप्त बुराईयां भी दूर हो सकती हैं। ‘‘हमें ऐसे इंसान चाहिए’’ शीर्षक कविता में उन्होंने अपनी इसी आकांक्षा को व्यक्त किया है -
क्या ज़रूरी है कि हम
गीता कुरान पर हाथ रख कर
झूठी कसमें खाएं
गुनाहों को छिपाने के लिए
और गुनाह करते जाएं।
हमें तोड़ने वाले धर्म नहीं
जोड़ने वाले मन चाहिए।
प्रार्थना, इबादत तो हम कभी भी
बैठ कर कर लेंगे
जो दूसरों के दुख-दर्द को समझें
हमें ऐसे इंसान चाहिए

जिस सुख की तलाश में व्यक्ति दुनिया भर में भटकता रहता है, वह सुख तो उसके भीतर ही मौजूद होता है। वस्तुतः यह सुख है संतोष सुख। यदि व्यक्ति सीमित साधनों में संतोष कर ले तो वह सुखी रह सकता है, जबकि असंतुष्ट प्रवृत्ति होने पर आकूत धन सम्पदा होने पर भी किसी काम की नहीं रहती है। जैसा कि कवि कबीर ने कहा है-
‘‘
गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान।
 
जब आवे संतोषधन, सब धन धूरि समान।। ’’
कहने का आशय यह है कि कोई भी धन संतोषधन से बड़ा नहीं होता है और यह धन मनुष्य के भीतर रहता है तथा आत्मज्ञान का द्वार खोलता है। इसी भाव को कवि हितकर ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-
पलकों के अंदर ही सुख का वास है
खुली दृष्टि से मिलता मोह का द्वार है।
निर्मल भावों की बहती इस सरिता में
आत्मज्ञान से मिलता मोक्ष का द्वार है।
कवि हितकर ने बाल सहित्य की भी रचना की है, बानगी देखें-
फुदक- फुदक कर चिड़ि़या रानी
दानें भर कर मुंह में आती
चीं-चीं कर वह शोर मचाती
बच्चों को वह निकट बुलाती
सबको अपने दानें देती
बचा-खुचा वह खुद खा लेती
बच्चे फुर्र-फुर्र उड़ जाते
आसमान में शोर मचाते
चिड़िया का मन पुलकित होता
हंसी-खुशी में जीवन कटता

कवि पुष्पदंत हितकर सरल शब्दों में अपने भाव व्यक्त करने वाले लगनशील कवि हैं, जो सागर की साहित्यिकता में वृद्धि करते रहते हैं।
                  -------------
(
दैनिक, आचरण  दि. 12.09.2018)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन 
 #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #MyColumn 
#Varsha_Singh #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan 
#Sagar #Aacharan #Daily

Tuesday, September 11, 2018

‘न दैन्यं न पलायनम्’ : अनुभवों से उपजी कविताएं - डॉ. वर्षा सिंह ...समीक्षात्मक आलेख

Dr Varsha Singh
समीक्षात्मक आलेख
 
‘न दैन्यं न पलायनम्’ : अनुभवों से उपजी कविताएं 
        - डॉ. वर्षा सिंह

--------------------------------------------------------------------------------------
पुस्तक -न दैन्यं न पलायनम   लेखक - अटल बिहारी वाजपेयी
मूल्य  - 120 /-            प्रकाशक - किताबघर, दरियागंज, नई दिल्ली-2
--------------------------------------------------------------------------------------

‘न दैन्यं न पलायनम्’ अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं का संग्रह है। इसका संपादन डॉ. चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा ने  किया है। इसके पूर्व अटल जी की ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ संग्रह प्रकाशित हुआ था। इस बहुचर्चित काव्य-संग्रह का लोकार्पण 13 अक्तूबर 1995 को नई दिल्ली में देश के पूर्व प्रधानमन्त्रा पी. वी. नरसिंहराव ने सुप्रसिद्ध कवि शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ की उपस्थिति में किया था। अटल जी की इक्यावन कविताओं का चयन व सम्पादन डॉ. चन्द्रिकाप्रसाद शर्मा ने ही किया था। पुस्तक के नाम के अनुसार इसमें अटलजी की इक्यावन कविताएं संकलित हैं जिनमें उनके बहुआयामी व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं।  ठीक इसी प्रकार ‘न दैन्यं न पलायनम्’ में संग्रहीत कविताएं अटल बिहारी वाजपेयी के विविध मनोभावों से परिचित कराती हैं। ‘न दैन्यं न पलायनम्’ की कविताओं के चयन के बारे में संग्रह के संपादक चन्द्रिका प्रसाद शर्मा ‘संपादक के शब्द’ के अंर्तगत लिखते हैं कि -‘उक्त कृति (अर्थात् ‘मेरी इक्यावन कविताएं’) के नाते मेरा उत्साह बढ़ना स्वाभाविक था। अस्तु मैंने उनकी अन्य कविताओं को इकट्ठा करना शुरू कर दिया। कविताओं को एकत्रित करके पांडुलिपि उन्हें दिखा कर प्रकाशन की अनुमति प्राप्त कर ली।’ 
Na Nainyam Na Palayanam - Atal Bihari Vajpeyee

चंद्रिका प्रसाद शर्मा जी का यह उत्साह स्वाभाविक था। यहां उल्लेखनीय है कि पाठकों के बीच ‘न दैन्यं न पलायनम्’ की लोकप्रियता का पता इसी बात से चल जाता है कि इसका पहला संस्करण सन् 1998 में प्रकाशित हुआ था और नवम्बर 2013 में इसका बारहवां संस्कारण प्रकाशित हुआ। अर्थात् जब इस संग्रह का पहला संस्करण प्रकाशित हुआ था उस समय अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री के पद पर आसीन थे। किन्तु नवम्बर 2013 में वे किसी पद पर आसीन नहीं थे फिर भी बारहवां संस्करण प्रकाशित किए जाने की आवश्यकता अनुभव की गई।  
सक्रिय राजनीति से जुड़े व्यक्ति के साथ यह विडम्बना रहती है कि पदयुक्त होने पर उसकी प्रशंसा की सरिता कल-कल करती हुई बहती रहती है, वहीं जब वह पदच्युत हो जाता है तो प्रशंसा की यही सरिता सूख कर बंजर धरती में बदल जाती है। अटल बिहारी वाजपेयी की साहित्य सर्जना इसकी अपवाद है। उनकी कविताएं उनके प्रधानमंत्रित्वकाल में जितनी लोकप्रिय थीं उतनी ही लोकप्रिय आज भी हैं जबकि वे अब प्रधानमंत्री नहीं हैं। यही ईमानदार साहित्य सृजन की पहचान है कि वह साहित्यकार के नाम से नहीं पहचानी जाती वरन् साहित्यकार उस सृजन की विशिष्टता से पहचाना जाता है। 
   ‘न दैन्यं न पलायनम्’ में संग्रहीत कविताओं को चार भागों में निबद्ध किया गया है- आस्था के स्वर, चिन्तन के स्वर, आपातकाल के स्वर एवं विविध स्वर। इनके बाद परिशिष्ट है जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी का जीवनपरिचय तथा एक साक्षात्कार शामिल गया है।
‘आस्था के स्वर’ में कुल 15 कविताएं हैं। इसमें पहली कविता है-
         मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांग करूंगा।
जाने कितनी बार जिया हूं
जाने कितनी बार मरा हूं
जन्म-मरण के फेरे से मैं
इतना पहले नहीं डरा हूं 
अन्तहीन अंधियार ज्योति की
कब तक और तलाश करूंगा।
Bharat Ratna Atal Bihari Vajpeyee

इस कविता के माध्यम से कवि मानो उद्घोष कर रहा है कि सब कुछ व्यवस्थित कर लेने की आकांक्षा मे जन्मजन्मान्तर नहीं भटकना है, जो करना है इसी जन्म में करना है और अव्यवस्था के अंधकार में सुव्यवस्था की ज्योति प्रज्ज्वलित करना है।
इसी खण्ड की दूसरी कविता है-‘न दैन्यं न पलायनम्’। इस कविता में कवि ने ‘महाभारत’ के प्रसंग को आधार बनाया है। महाभारत का युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले, कुरुक्षेत्रा के युद्धस्थल में अर्जुन ठिठक जाते हैं कि सामने जो कौरव खड़े हैं वे भी तो अपने ही सगे-संबंधी हैं। वे सारथी बने कृष्ण से कहते हैं कि मैं स्वजनों पर शस्त्रा नहीं चला सकता। तब श्रीकृष्ण अर्जुन को ‘गीता’ का उपदेश देते हैं जिससे अर्जुन को बोध होता है कि गलत कार्य करने वाला सदा दण्डनीय होता है, भले ही वह सगा-संबंधी ही क्यों न हो! इसके बाद अर्जुन हुंकार भरता है और कौरवों को ललकारता है। इसी प्रसंग का स्मरण कराते हुए कवि आह्वान करता है कि -
आग्नेय परीक्षा की / इस घड़ी में -
आइए, अर्जुन की तरह
उद्घोष करें : ‘न दैन्यं न पलायनम्’।

अटल जी का अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति अगाध प्रेम उनकी इन पांच कविताओं में खुल कर मुखर हुआ है। ये कविताएं हैं- ‘अपने घर की दासी’,‘विश्व-भाषा का सपना’,‘चले जब हिन्दी घर में’, ‘विश्व हिन्दी सम्मेलन’, ‘गूंजी हिन्दी विश्व में’। देश में हिन्दी की दुर्दशा पर कटाक्ष करते हुए कवि ने लिखा है-
बनने चली विश्व भाषा जो, अपने घर में दासी
सिंहासन पर अंग्रेजी है,   लखकर दुनिया हांसी
लखकर दुनिया हांसी,   हिन्दीदां बनते चपरासी
अफसर सारे अंग्रेजीमय,  अवधी हों या मदरासी
                     (अपने घर की दासी)
अटल जी ने कई विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भाग लिया। वहां उन्होंने देखा कि हिन्दी के प्रति हिन्दी भाषियों द्वारा जो चिन्ता जताई जा रही थी, वह हिन्दी में न हो कर अंग्रेजी में थी। और, यही अंग्रेजी प्रेम उन्हें हर दिन भारत में भी देखने को मिलता रहा। हिन्दी की इस उपेक्षा को देख कर अटल जी का कवि मन व्यथित हो उठा और तब उन्होंने ये पंक्तियां लिखीं -
कह कैदी कविराय
चले जब हिन्दी घर में
तब बेचारी पूछी जाए दुनिया भर में
                  (चले जब हिन्दी घर में)
भारत के विदेश मंत्रा के रूप में राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में 04 अक्टूबर 1977 को अटल जी ने हिन्दी में भाषण दे कर हिन्दी को विशेष मान दिलाया। ठीक इसके बाद उन्होंने यह छंद रचा-
गूंजी हिन्दी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार
राष्ट्रसंघ के मंच से,  हिन्दी का जयकार
हिन्दी का जयकार, हिन्द हिन्दी में बोला
देख स्वभाषा प्रेम, विश्व अचरज से डोला
                                   (गूंजी हिन्दी विश्व मेंं)
संग्रह के दूसरे खण्ड ‘चिन्तन के स्वर’ में युगबोध एवं राजनीतिक ह्रास के प्रति चिन्ता जताती कविताएं हैं। जैसे-‘फंदा कसता ही जाता है’, ‘युगबोध’, ‘प्रेरणा की बेला’, ‘वेदना’, ‘दो चतुष्पदी’, ‘सत्य से नाता तोड़ा’, ‘यह है नया स्वराज’, ‘वाटरगेट’, ‘हाथों को मलते’ और ‘पद ने जकड़ा’।
‘सत्य से नाता तोड़ा’ कविता राजनीति के अवसरवादी स्वरूप का बेझिझक वर्णन करती है। अवसरवादिता के कारण ही राजनीति के परिसर में चाटुकारों की भीड़ लगी रहती है। जिनमें चाटुकारिता में डूबे साहित्यकार भी पाए जाते हैं। ऐसे लोगों को ‘बिन हड्डी की रीढ़’ के सम्बोधन से कवि ने कटाक्ष किया है।
कवि मिलना मुश्क़िल हुआ, भांड़ों की है भीड़
ठकुरसुहाती कह रहे,     बिन हड्डी की रीढ़
बिन हड्डी की रीढ़,     सत्य से नाता तोड़ा
सत्ता की सुन्दरी,       नचाती ले कर कोड़ा

अटल जी ने ‘कैदी कविराय’ के रूप में कई कविताएं लिखीं। संग्रह के तीसरे खण्ड ‘आपातकाल के स्वर’ में वे कविताएं हैं जो अटल जी ने आपातकाल के अपने अनुभवों को सहेजते हुए रची थीं। इन कविताओं में जेल के अनुभव पर भी कविता है। इन्हीं में ‘कार्ड की महिमा’ शीर्षक कविता अपने आप में अनूठी और रोचक कविता है। इसमें कवि ने पोस्टकार्ड को संवाद-संचार का सर्वोत्तम साधन माना है। कवि के अनुसार राशन, शासन, शादी और व्याधि के साथ ही सेंसर किए जाने की दृष्टि से भी सरल, सहज माध्यम है।
पोस्टकार्ड में गुण बहुत, सदा डालिए कार्ड
कीमत कम सेंसर सरल, वक़्त बड़ा है हार्ड
वक़्त बड़ा है हार्ड, सम्हल कर चलना भैया
बड़े-बड़ों की  फूंक  सरकती  देख  सिपैया
कह कैदी कविराय,   कार्ड की महिमा पूरी
राशन, शासन, शादी,  व्याधी, कार्ड जरूरी।

संग्रह का चौथा खण्ड ‘विविध स्वर’ है। इसमें ‘चोर-सिपाही’, ‘मंत्रापद तभी सफल’, ‘दीवाली’, ‘पेंशन का बिल’, ‘लटका चमगादड़’ आदि विविध भाव की कविताएं हैं। जेल के अनुभव को रजनीगंधा के माध्यम से कुछ इस तरह व्यक्त किया है कवि ने -
कहु सजनी! रजनी कहां ?  अंधियारे में चूर
एक बरस में ढह गया,     चेहरे पर से नूर
चेहरे पर से नूर,      दूर दिल्ली दिखती है
नियति निगोड़ी कभी, कथा उलटी लिखती है
कह कैदी  कविराय  सूखती  रजनी  गंधा
राजनीति  का  पड़ता है  जब उल्टा फंदा।

संग्रह के अंत में परिशिष्ट के अंतर्गत अटल जी का संक्षिप्त परिचय है जिसमें उनके बाल्यकाल, शिक्षा और राजनीतिक यात्रा के साथ-साथ साहित्य की यात्रा की भी जानकारी दी गई है। परिचय के उपरान्त अटल जी का एक साक्षात्कार दिया गया है जो उनके साहित्य प्रेम और साहित्य अध्ययन, सृजन की जानकारी की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस साक्षात्कार से पता चलता है कि उन्होंने ‘रामचरित मानस’ से ले कर कवि ‘नवीन’ और ‘दिनकर’ की कविताएं पढ़ीं। वृन्दावनलाल वर्मा का उपन्यास ‘झांसी की रानी’ ने उन्हें जितना प्रभावित किया, उतना ही अज्ञेय के उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ ने प्रभावित किया। उन्होंने तस्लीमा नसरीन के लेखन, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘लज्जा’ को भी पढ़ा और सराहा।
अटल जी के साक्षात्कार में दो प्रश्नों के उत्तर बड़ा ही समसामयिक महत्व रखते हैंः-
पहला प्रश्न है -‘साहित्यकार से आप क्या अपेक्षा करते हैं?’
अटल जी कहते हैं कि -‘वर्तमान में ऐसे साहित्य की आवश्यकता है जो लोगों में राष्ट्र के प्रति सच्चे कर्त्तव्यबोध को उत्पन्न करे। साहित्यकार को पहले अपने प्रति सच्चा होना चाहिए, बाद में उसे समाज के प्रतिअपने दायित्व का सही अर्थों में निर्वाह करना चाहिए। वह वर्तमान को ले कर चले, किन्तु आने वाले कल की चिन्ता जरूर करे।’
दूसरा प्रश्न है-‘साहित्यकार को राजनीति से कितना सरोकार रखना चाहिए?’
इसके उत्तर में अटल जी कहते हैं कि -‘साहित्य और राजनीति के कोई अलग-अलग खाने नहीं हैं। जो राजनीति में रुचि लेता है वह साहित्य के लिए समय नहीं निकाल पाता और साहित्यकार राजनीति के लिए समय नहीं दे पाता। किन्तु कुछ लोग ऐसे हैं जो दोनों के लिए समय देते हैं। वे वंदनीय हैं।’
अटल जी आगे कहते हैं कि -‘आज राजनीतिज्ञ साहित्य, संगीत और कला से दूर रहने लगे हैं। इसी से उनमें मानवीय संवेदना का स्रोत सूख-सा गया है।’
पुस्तक ‘न दैन्यं न पलायनम्’ में संग्रहीत अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं को पढ़ कर यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वे प्रखर संवेदना के कवि हैं। उनकी संवेदना उनके जीवन अनुभवों और बौद्धिकता से अनुशासित रहती है। जिससे उनकी कविताओं में एक विशिष्ट सौंदर्यबोध निहित है। अटल जी की काव्य-भाषा सरल, सहज एवं नैसर्गिक है। भाषाई क्लीष्टता से दूर आसानी से समझ में आ जाने वाली कविताएं हैं। इस संग्रह में संग्रहीत कविताएं उनके काव्य-भाव आत्मबोध, युगबोध, प्रखर राष्ट्रीयता एवं मानवता बोध से रची-बसी हैं। अटल जी के अपने जीवन अनुभवों से उपजी कविताओं के इस संग्रह की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहेगी।
              ---------------------------------

Wednesday, September 5, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन - 27 दर्शन और सामाजिक चिन्तन के कवि वीरेन्द्र प्रधान - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि वीरेन्द्र प्रधान पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

 सागर : साहित्य एवं चिंतन

दर्शन और सामाजिक चिन्तन के कवि वीरेन्द्र प्रधान
                     - डॉ. वर्षा सिंह
                     
जीवन में ठहराव नहीं अनिवार्य सदा ही चलो
ठहर - ठहर कर हर मुकाम पर खुद को ही मत छलो
बेशक मंजिल से पूर्व जरूरी हैं पड़ाव जीवन में
किन्तु उसे पा लेने तक रुक जाने का नाम  लो

ये पंक्तियां हैं कवि वीरेन्द्र प्रधान की। इन पंक्तियों की दार्शनिकता जिस प्रकार ‘‘चरैवेति-चरैवेति’’ का संदेश देती हैं, वह जीवन में लक्ष्य को प्राप्त करने का उत्साह बनाए रखने के लिए जरूरी है। लोग अपने जीवन को सुखद बनाने के लिए विभिन्न प्रकार का जोड़-घटाना करते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप जीवन शुष्क गणितीय समीकरण बन कर रह जाता है। किन्तु कवि वीरेन्द्र प्रधान ने जीवन के गणित में साहित्य को स्थान दे कर जीवन को देखने का एक दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाया है।
06 अगस्त 1956 को सागर में जन्में वीरेन्द्र प्रधान ने अपने माता-पिता से संघर्षशीलता की प्रेरणा प्राप्त की। एक लगनशील छात्र के रूप में सन् 1979 में सागर विश्वविद्यालय से गणित में एम.एससी. की उपाधि अर्जित की। उच्च शिक्षा पूर्ण करने के बाद सागर नगर के ही सेंट फ्रांसिस स्कूल में 03 वर्ष अध्यापन कार्य किया। इसके बाद सन् 1982 में भारतीय स्टेट बैंक में लिपिक के पद पर नियुक्ति हो गई। अपने 37 वर्षीय सेवाकाल में विभिन्न पदों पर रहते हुए सन् 2016 में उपप्रबंधक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। इस दौरान अपने पारिवारिक दायित्वों और नौकरी के बीच संतुलन बनाए रखते हुए साहित्य सेवा के मार्ग को भी अपना लिया। वीरेन्द्र प्रधान अपनी तुकांत एवं अतुकांत कविताओं के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त करते रहते हैं। उनकी कविताओं में दार्शनिक बोध स्पष्ट रूप से दिखई देता है। उनकी ये कविता देखें -
सफर में करीब किसी की सांझ है तो
किसी को देखना बाकी अभी भोर है।
जन्म और मृत्यु के बीच मेरे मीत
बस बांधती कुछ सांसों की डोर है।
कुछ नए हैं तो कुछ हैं पुराने साथी
जो भी है वह सफर की ओर है।
बिखरा हुआ सामान भी न समेट सका
और सफर भी अब समापन की ओर है।
Sagar Sahitya Chintan - 27 Darshan Aur Samajik Chintan ke kavi Virendra Pradhan - Dr Varsha Singh

आज के उपभोक्तावादी समय में आस्थाओं की टूटन रचनाकारों की पीड़ा का सबसे बड़ा कारण है। आस्था ही वह तत्व है, जो मनुष्य में मनुष्यत्व को बचाए रखती है। लेकिन जब संबंधों में नफा-नुक्सान को वरीयता दी जाने लगे तो वहां आस्थाओं का टूटना सुनिश्चित हो जाता है। वर्तमान में आस्थाएं किस तरह टूट रहीं हैं इसका बड़ा मार्मिक उपमान वीरेन्द्र प्रधान की इस कविता में देखा जा सकता है-
उम्रदराज हो जर्जर होते
शरीर के अंगों की तरह
टूट रही आस्थाएं
खण्डित प्रतिमाओं सी
खड़ी हैं/पड़ी हैं
अथवा उद्यत हैं
जमींदोज हो जाने को

वीरेन्द्र प्रधान की कुछ कविताओं में सूफियाना रंग भी दिखता है। उन कविताओं में वे आत्मा को एक समर्पित तत्व के रूप में देखते हैं। ‘मैं तो प्रेम में मस्त’ शीर्षक कविता में कवि के सूफियाना लहजे को देखा जा सकता है-
कान्हा के रंग में मैं रंगी
है शेष रंग बेकार
अपने अंतर में मैं बसी
मोहे व्यर्थ सभी घर-बार
प्रीत आत्मा में जगी
मुझे भावे न संसार
बनती मैं मीरा कभी
और कभी रसखान
मैं प्रेम के मद में मस्त हूं
मोहे लागे एक समान -
रस या विष का पान

‘‘ यत्र नास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ’’ अर्थात् जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवता का वास होता है। क्योंकि नारी परिवार और समाज को धैर्य और कर्मठता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए प्रत्येक पीढ़ी को कर्तव्यनिष्ठ बनने का संदेश देती है। अपने अधिकारों के लिए उलाहना दिए बिना परिवार की सेवा में लगी रहती है। नारी को समर्पित अपनी इस कविता में वीरेन्द्र प्रधान ने नारी के प्रति अपनी श्रद्धा को व्यक्त किया है-
बेटी, बहन और बीबी के बाद
बा बन कर पूर्णता को प्राप्त
होती है नारी
जन्म के साथ से
सुबह से शाम तक
निपटाती ढेरों जवाबदारी
अधिकारों का भले ही
टोटा हो उसे
कर्तव्यों के भार से
रहती है सदा भारी
नमन तुझे बार-बार
हे नारी ! हे नारी !

मां सिर्फ जननी नहीं, परिवार और संस्कारों की रीढ़ होती है। मां को बच्चे की प्रथम शिक्षिका माना गया है। अपनी लोरियों के द्वारा भी मां जहां कल्पनाओं का सुन्दर संसार रचती है, वहीं यथर्थ की कठोरता से भी परिचित कराती रहती है। मां का ममत्व हर संतान पर एक ऐसा ऋण होता है जिससे वह कभी भी उऋण नहीं हो सकता। इस भावना को वीरेन्द्र प्रधान ने ‘मां’ शीर्षक अपनी कविता में बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है-
मां, तेरा मुझ पर है कर्ज बहुत
अनगिनत जन्म ले कर भी
उसे न चुका पाउंगा मैं
गर्भ से ले कर जन्म तक
और जन्म के बाद /अपार कष्ट सह
तूने जो परवरिश की
उसे न भूल पाउंगा मैं
बुझ रही पीढ़ी के प्रति /पूर्ण सम्मान के साथ
हो सकता है दे सकूं
अगली  पीढ़ी को
उसका अंश मात्र भी
जो तूने मुझे दिया /समय-समय पर
लोरियों की शक्ल में /घूंटियों के रूप में
या रहीम, रसखान ओर कबीर की
शिक्षाओं के माध्यम से
भावना यही है कि
गांठ में बांध लूं तेरी हर सीख

समाज में रहने वाला व्यक्ति सामाजिक सरोकारों से दूर नहीं रह सकता है। यदि समाज में बुराईयां आने लगती हैं तो रचनाकार अव्यवस्था देख कर घबराता नहीं है वरन् उसका इस बात पर विश्वास बना रहता है कि हर बुराई का एक न एक दिन अंत अवश्य होता है। ठीक यही भाव कवि प्रधान की इन पंक्तियों में मुखरित हैं-
दुर्योधन, दुश्शासन जितने भी हैं सब आहत होंगे
जीवित भी जो रहे शीघ्र ही वे विगत होंगे
सुधरेंगे या टूटेंगे या सत् कर्मों में रत होंगे
अतातायी अंततः सब सच्चों के सम्मुख नत होंगे

वीरेन्द्र प्रधान ने तुकांत रचनाओं को भी अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। उनकी तुकांत रचनाओं में कभी जीवन दर्शन तो कभी असंवेदनशीलता पर कटाक्ष दिखाई देता है। उनके शब्दों में दुरूहता नहीं है। वे अपनी तुकांत रचनाओं में सीधी और स्पष्ट बात करते हैं-
यार तुम सवाल करो मैं तुम्हें जवाब दूंगा
प्यास जिसमें तुम्हारी मिटे मैं तुम्हें वो आब दूंगा
जुगनुओं की चमक में रातें गुजारने वालो
कभी जो न डूबे मैं वो माहताब दूंगा
खाली पेट रह करवटें बदलने वालो
मैं तुम्हें धी लगी रोटी का ख्वाब दूंगा
सबकी सब मुफलिसी ओर सभी बदहाली
जिसमें ढंक जाएं वो नकाब दूंगा

वीरेन्द्र प्रधान सागर नगर के एक ऐसे कवि हैं जो साहित्यिक परिदृश्य में नेपथ्य में रह कर भी अपनी रचनात्मक उपस्थिति का बोध कराते रहते हैं।

                   --------------
   
( दैनिक, आचरण  दि. 05.09.2018)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #MyColumn #Varsha_Singh #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily

Saturday, September 1, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन - 26 काव्यात्मक अभिव्यक्ति की धनी डॉ कुसुम अवस्थी ‘सुरभि’ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवयित्री  डॉ. कुसुम अवस्थी "सुरभि" पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

काव्यात्मक अभिव्यक्ति की धनी डॉ कुसुम अवस्थी ‘सुरभि’
                 - डॉ. वर्षा सिंह
                     
एक स्त्री परिवार और समाज के ताने-बाने को जितनी बारीकी से समझ सकती है उतना पुरुष नहीं समझ सकता है। क्योंकि स्त्री परिवार के दायित्वों एवं संबंधों से इतनी सघनता से जुड़ी होती है कि वह परिवारों से मिल कर बनने वाले समाज की स्थिति एवं परिस्थिति को भली-भांति समझ सकती है। जबकि पुरुष जीवकोपार्जन में ही अपने जीवन की अधिकांश समय खर्च कर देता है। यह बात इतर है कि स्त्री सब कुछ समझते हुए भी इस पुरुष प्रधान समाज में कई बार स्वयं को असहाय पाती है। ऐसी स्त्रियों की पीड़ा को महिला साहित्यकारों ने सदैव अभिव्यक्ति प्रदान किया है। फिर चाहे वह साहित्य की कोई भी विधा हो। सागर में निवासरत डॉ. कुसुम अवस्थी ‘सुरभि’ एक ऐसी ही संवेदनशील कवयित्री हैं जिन्होंने समाज की विसंगतियों तथा स्त्री की पीड़ा को मुखरता से व्यक्त किया है।
छतरपुर की घुवारा तहसील के ग्राम बंगराखेड़ा में 01 अप्रेल 1969 को जन्मी कुसुम ‘सुरभि’ का परिवार आर्थिक रूप से सम्पन्न लम्बरदार ब्राम्हण परिवार था। किन्तु पारिवारिक विवादों ने मानो परिस्थितियों में ग्रहण लगा दिया। कुसुम ‘सुरभि’ अल्पायु में विवाहबंधन में बंधना पड़ा। एक पुत्री और एक पुत्र को जन्म देने के बाद भी उनका वैवाहिक जीवन सुखद नहीं रहा। तब कुसुम ‘सुरभि’ ने स्वावलम्बी बनने का निश्चय किया। उन्होंने समाजशास्त्र और हिन्दी में एम.ए. किया और हिन्दी में ही बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से पी.एचडी. की उपाधि प्राप्त की। उनके शोध का विषय था ‘मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में नारी विमर्श’ और उनके गाइड थे प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ कमला प्रसाद। कुछ समय नौकरी करने के उपरांत वे राजनीति में सक्रिय हो गईं। इस दौरान उनका लेखन भी सतत चलता रहा।
Sagar Sahitya Chintan - 26 Kavyatmak Abhivyakti ki Dhani Dr Kusum Awasthi 'Surabhi' - Dr Varsha Singh
डॉ. कुसुम ‘सुरभि’ तुकांत एवं अतुकांत कविताओं के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करती रहती हैं। उनकी कविताओं में संवेदनाओं के पतन पर तीखे कटाक्ष के साथ ही सामाजिक एवं राजनीतिक अव्यवस्थाओं पर व्यंग्य भी रहता है। उनकी ‘विध्वंस’ शीर्षक यह कविता की ये पंक्तियां देखें -
तैर जाते हवाओं में सियासी दुपट्टे
उछालते मंचों से जब/ जहरीले शब्द
शब्द/दैत्याकार लेने लगते
बरसात हो जाती खूनी
और अधिक तेजाबी
मनुष्य तब्दील होता
लाशों के ढेर में
      देश में कई लोग ऐसे भी हैं जो अपने पद और शक्ति का दुरुपयोग करते हैं तथा उस धन राशि को हजम कर जाते हैं जो विभिन्न विकास कार्यो के लिए आवंटित की जाती है। ऐसे लोगों का उद्देश्य होता है अपनी तिजोरी भरना, चाहे देश का विकास हो या न हो। ऐसे ही भ्रष्टाचारियों पर तंज कसते हुए डॉ. कुसुम ‘सुरभि’ लिखती हैं -
जितना खाया जाता
उससे / छक कर खाता
पलैर शिकारी कुत्ता।
फेंक देता कुछ जूठे टुकड़े
दुम हिलाते चमचों को
बड़े चाव से खकोल रहे
वे हड्डियां।
एक राहगीर वहां से गुजरता है
गुर्रा-गुर्रा कर डराते
जताते वे स्वामी भक्ति
विकास की तिजोरी पूरी
चर गए, चर गए
भ्रष्टाचारी/ विकास की तिजोरी चर गए, चर गए।
पर्यावरण जीवन का पर्याय होता है। जल, जंगल, जमीन से ही पर्यावरण का संतुलन बना रहता है। एक स्वस्थ संतुलित पर्यावरण में ही स्वस्थ जीवन का सृजन और विकास संभव है। इस संदर्भ में पेड़ों की अर्थवत्ता को नकारा नहीं जा सकता है। ‘होता है पेड़ अर्थवान’ शीर्षक कविता में डॉ. कुसुम ‘सुरभि’ ने पेड़ों की महत्ता को इन शब्दों में व्यक्त किया है -
बनते हैं घोंसले
होता है सृजन
सघन छांव बन
थके श्रमित राही को
देना पल भर विश्राम
फलना, फूलना/ खुद में होना पूर्ण
पातों, शाखों से झूमना
देना वायु प्राण
प्राणों-प्राणों में संचरित हो कर
बन जाना प्राण
होता है पेड़ अपने में अर्थवान
सागर नगर का प्रत्येक जन दानवीर डॉ हरी सिंह गौर के प्रति असीम श्रद्धा भाव रखता है। डॉ गौर के द्वारा स्थापित विश्वविद्यालय शिक्षा का विश्वप्रसिद्ध केन्द्र होने के साथ ही युवाओं के लिए जीवन शिक्षा का केन्द्र भी है, जहां वे युवावस्था के उत्साह एवं उल्लास के साथ जीवन के विभिन्न अनुभवों से गुजरते है। यही अनुभव उनके भावी जीवन की नींव-शिला का काम करते हैं। कुछ इसी तरह का भाव डॉ. कुसुम ‘सुरभि’ ने अपने गीत ‘गौर को श्रद्धासुमन’ में लिपिबद्ध किए हैं -
गीत सृजन के गा-गा कर, वादियां गुंजित रहती हैं
गौर समाधि के आंगन में तरुणाई मचला करती है।
सब तरुण तेज, पुंजमय,स्वप्न नव-नव पाल रहे
हंसते बलखाते नव यौवन, गुरुकुल में खुद को ढाल रहे।
बंधन की दीवारों से परियां, मुक्त यहां विचरा करती हैं।
गौर समाधि के आंगन में तरुणाई मचला करती है।
डॉ. कुसुम ‘सुरभि’ अपनी काव्यात्मक प्रतिभा से सागर की साहित्यिक सम्पदा में श्रीवृद्धि करती हुई जिस प्रकार अपना योगदान दे रही हैं, वह प्रशंसनीय है।
                   --------------
( दैनिक, आचरण  दि. 31.08.2018)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #MyColumn #Varsha_Singh #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily

Thursday, August 23, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन - 25 गीत-ग़ज़ल के साधक कवि ऋषभ समैया ‘जलज’ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि ऋषभ समैया "जलज" पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

गीत-ग़ज़ल के साधक कवि ऋषभ समैया ‘जलज’
                   - डॉ. वर्षा सिंह
                 
सागर नगर में गीत और हिन्दी ग़ज़ल की रसधार समान रूप से बहती रही है। काव्य-साधकों ने अपनी रुचि के अनुरूप साहित्य की विधाओं को अपना कर नगर की साहित्यिक संपदा को समृद्ध किया है। नगर के एक समृद्ध व्यवसायी परिवार में 07 सितम्बर 1947 जन्मे ऋषभ समैया ने अपनी पारिवारिक विरासत को पूरी लगन से परवान चढ़ाते हुए साहित्य के प्रति अपने रुझान को भी पर्याप्त अवसर दिया। ‘‘जलज’’ उपनाम अपनाते हुए गीत और ग़ज़ल विधा को अपनाया। हिन्दी और बुंदेली में काव्यसृजन करने वाले ऋषभ समैया ‘जलज’ डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से एम.काम. किया। इसके बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की। पारिवारिक जिम्मेदारियों एवं व्यावसायिक व्यस्तताओं के कारण एल.एल.बी. की पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी। सामाजिक कार्यों में भी अपना योगदान देने वाले ऋषभ समैया की काव्य रचनाएं आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। स्थानीय दैनिक समाचार पत्र ‘पदचाप’ के मानसेवी संपादक रहते हुए पत्रिकरता की बारीकियों को भी भली-भांति जाना और समझा। साहित्य सृजन एवं समाजसेवा के लिए उन्हें अनेक संस्थाओं से सम्मानित किया जा चुका है।

सागर : साहित्य एवं चिंतन -25 गीत-ग़ज़ल के साधक कवि ऋषभ समैया ‘जलज’ - डॉ. वर्षा सिंह
ऋषभ समैया ‘जलज’ की कविताओं में पारिवारिक दायित्वों एवं संबंधों का गहन चिंतन मिलता है। मां और पिता प्रत्येक परिवार की महत्वपूर्ण इकाई होते हैं। ये ही परिवार के वे दो स्तम्भ होते हैं जो प्रत्येक पीढ़ी को न केवल जन्म देते हैं वरन उनमें परम्पराओं एवं संस्कारों को संजोते हैं। इसीलिए मां की महत्ता के प्रति ध्यान आकर्षित करते हुए ऋषभ समैया लिखते हैं-
जीवन  देने  वाली  है मां।
पालन-पोषण वाली  है मां।
मन भर नेह  परोसा करती
प्रिय भोजन की थाली है मां।
जितनी ज़्यादा लदी फलों से
उतनी झुकती  डाली है मां।
बहुत  दूरदृष्टि  रखती, पर
पापा  को  घरवाली है मां।

ऋषभ समैया जहां मां को परिवार की धुरी के रूप में देखते हैं और उसके त्याग, उसकी ममता एवं परिवार के प्रति उसके समर्पण की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं वहीं उनकी कवि दृष्टि यह भी देख लेती है कि पिता के लिए मां का स्वरूप एक ‘घरवाली’ का ही है। पुरुषवादी समाज में पिता अपनी अर्द्धांगिनी के सम्पूर्ण गुणों को नहीं देख पाता है। लेकिन इसका कारण भी कवि ढूंढने में सक्षम है। कवि को अहसास है कि पिता इतने अधिक दायित्वों से घिरे रहते हैं कि कई बार उन्हें खुद पर भी ध्यान देने का अवसर नहीं मिलता है। पिता भी मां की भांति दायित्वों का निर्वहन करते हैं और सारी पीड़ाओं को अपने मन में ही दबाए रखते हैं। पिता पर केन्द्रित रचना की इन पंक्तियों को देखिए -
स्मृतियों से बंधे पिता जी।
दायित्वों से लदे पिता जी।
जीवन की पथरीली राहें
ठिठके, फिसले, सधे पिता जी।
घर भर की नींदें मीठी हों
रात-रात भर जगे पिता जी।

कवि ‘जलज’ ने अपने गीतों में सामाजिक सरोकारों का भी बखूबी बयान किया है। वे मानते हैं कि जीवन का सौंदर्य सद्भावना से ही निर्मित होता है। आपसी प्रेम-व्यवहार एवं सद्भाव ज़िन्दगी को फूल, नदी और झरने के समान सुनदर बना देता है। अपने इस भाव को कवि ने इन पंक्तियों में कुछ इस तरह पिरोया है-
सहेजें सद्भावना से
धरोहर सी ज़िन्दगी।
नदी-सी निश्छल रवानी
तदों से हिल-मिल बहे
फले-फूले कछारों में
गेह सागर की गहे।
कभी झरना, कभी निश्चल
सरोवर सी ज़िन्दगी।

जीवन में संतोष से बड़ा कोई धन नहीं होता - इस तथ्य को वर्तमान बाज़ारवादी युग मानो भूलता जा रहा है। और-और की चाहत ने लोगों का सुख-चैन छीन रखा है। उपभोक्ता संस्कृति ने इंसान को भौतिकवादी बना दिया है। कवि का मानना है कि यदि व्यक्ति के पास जो है, उसी में संतुष्ट रहे तो जीवन सुख-यांति से व्यतीत हो सकता है। ये पंक्तियां देखिए -
जो  प्राप्त  है,   पर्याप्त है।
सुख-शांति इसमें व्याप्त है।
ईर्ष्या,  अहम्,  तृष्णा, वहम
यश, चैन, चहक समाप्त है।
दुर्गन्ध है   या  सुगन्ध है 
यह ज़िन्दगी की शिनाख़्त है।
अपना भला,   सबका  बुरा
यह सोच कलुष, विषाक्त है।

शहरों की ज़िन्दगी जिस तरह प्रदूषित और भागमभाग वाली हो गई है उससे भी कवि का चिन्तित होना स्वाभाविक है। ये पंक्तियां देखिए -
हड़बड़ाते, हांफते से
अधमरे होते शहर।
सो रहे हैं सुध बिसर कर
बांसुरी की, भोर की
कान को आदत पड़ी है
चींख भरते शोर की
देर रातों तक लगाते
मदभरे गोते शहर।

ऋषभ समैया ‘जलज’ के गीतों एवं ग़ज़लों में समाज और समय के प्रति जिस प्रकार की प्रतिबद्धता का स्वर ध्वनित होता है, वह उन्हें एक सजग कवि के रूप में स्थापित करता है।
-----------------------
 
( दैनिक, आचरण  दि. 23.08.2018)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #MyColumn #Varsha_Singh #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily