Friday, November 9, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 33 - स्त्रीपक्ष के मुखर कवि डॉ. सतीश चंद्र पाण्डेय - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के युवा साहित्यकार सतीशचंद्र पाण्डेय पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

स्त्रीपक्ष के मुखर कवि डॉ. सतीश चंद्र पाण्डेय
                - डॉ. वर्षा सिंह
           
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परिचय : डॉ. सतीश चंद्र पाण्डेय
जन्म : 17 मार्च 1966
जन्म स्थान : मैनपुरी (उ.प्र.)
शिक्षाः अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर एवं बी.एड.
विधा : मुक्तक, नवगीत, ग़ज़ल एवं व्यंग
पुस्तकें : पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
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           यूं तो कवि सतीश चंद्र पाण्डेय का जन्म 17 मार्च 1966 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में हुआ था तथा उन्होंने उच्चशिक्षा भी आगरा विश्वविद्यालय से प्राप्त की किन्तु शिक्षा के बाद उनका अब तक का अधिकांश जीवन सागर में ही व्यतीत हुआ है। सागर के शासकीय गर्ल्स हाई स्कूल, मकरोनिया में प्राचार्य के पद कर कार्य करते हुए डॉ.पाण्डेय सतत् साहित्य सेवा में लगे हुए हैं। उनका कहना है कि विद्यालयीन दायित्वों से जब भी समय मिलता है, वे लेखन कार्य में जुट जाते हैं। अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति प्रेम उन्हें अपने पिता स्व. कृष्णचंद्र पाण्डेय से मिला जबकि अंग्रेजी साहित्य के प्रति रुझान ने उन्हें अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा दी। उनके पिता शासकीय अधिकारी थे जो कर्मठता और ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य निर्वाह करने में विश्वास रखते थे। अपने पिता के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर डॉ.पाण्डेय ने शिक्षा जगत को अपनी आजीविका के माध्यम के रूप में चुना। वे व्यक्ति के उत्थान के लिए शिक्षा को अनिवार्य तत्व मानते हैं। सागर के स्थाई निवासी और एक प्राचार्य के रूप में वे अपने विद्यालय और विद्यालय में पढ़ने वाली छात्राओं के बहुमुखी विकास के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहते हैं। उनकी कविताओं में बेटियों के प्रति चिन्ता को स्पष्ट रूप् से देखा जा सकता है। 
            डॉ.पाण्डेय मुक्तक, नवगीत के साथ ही छंदबद्ध कविताएं भी लिखते हैं। काव्य के अतिरिक्त व्यंग लेखन भी उन्हें पसंद है। उनकी रचनाएं देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाओं का आकाशवाणी से भी प्रसारण हुआ है।            डॉ.पाण्डेय की छंदबद्ध रचनाओं में जहां छायावादी प्रभाव देखने को मिलता है वहीं छंदमुक्त रचनाएं प्रगतिवाद का आह्वान करती प्रतीत होती हैं। वे स्त्री को सशक्त होते देखना चाहते हैं। डॉ.पाण्डेय का कहना है कि वे स्वयं एक बेटी के पिता हैं और इसीलिए वे बेटियों की पीड़ा, बेटियों के उन्नति की मार्ग की बाधाएं और परेशानियों को समझने का प्रयास करते रहते हैं। वे चाहते हैं कि प्रत्येक बेटी को समाज में सिर उठा कर जीने का अधिकार हो और प्रत्येक स्त्री सम्मान की दृष्टि से देखी जाए।
‘विडंबना’ शीर्षक कविता में सतीश चंद्र पाण्डेय ने बेटियों की समस्याओं और समाज का उनके प्रति दृष्टिकोण बखूबी सामने रखा है। इस लंबी कविता का एक अंश देखिए-
हां यह वही है
जिसे छूना चाहते हैं सब
अपनाना चाहते हैं सब
और लगाना चाहते हैं सब
और भी बहुत कुछ चाहते हैं सब
मगर फिर भी वह नहीं चाहते एक बेटी
हां, यह वही है
खड़ी हुई विद्यालय के पास
या किसी नुक्कड़ पर
घूरना चाहते हैं सब
और वह खड़ी मूक
नजरें झुकाए, किताबों को वक्ष से
और ताकत से चिपकाए
हट जाना चाहती है वहां से
असुरक्षित कल्पना से भयाक्रांत
थू करना चाहती है
मानो चारों तरफ सड़ांध हो।

अपने घर में ही स्त्री को मिलने वाली उपेक्षा के विरुद्ध आवाज़ उठाते हुए डॉ.पाण्डेय ने अपनी इस ग़ज़ल में तुलसी के पौधे के बिम्ब को चुनते हुए बड़े सुंदर ढंग से अपनी बात कही है-
घर में तुलसी है, हम इसे जल क्यों नहीं देते।
लोग  अच्छी  सोच  को  बल क्यों नहीं देते।
रोकती क्यों नहीं अब अमराईयां हमको
अब हमको आवाज पीपल क्यों नहीं देते
आग ही बरसा रहे हैं एक मुद्दत से
बारिशों को जन्म बादल क्यों नहीं देते
रोकने वाला है जब कोई नहीं तो हम
उनकी महफिल छोड़कर चल क्यों नहीं देते
रोज बढ़ती जा रही है जब समस्याएं
आप इनके सार्थक हल क्यों नहीं देते

स्त्री के प्रति सम्मान की भावना की नींव उसी समय पड़ जाती है जब हम अपनी मां के प्रति सम्मान भाव से झुकते हैं। जो व्यक्ति अपनी जन्मदात्री का सम्मान नहीं कर सकता है वह स्त्री के किसी भी रूप को सम्मान नहीं दे सकता है। इसीलिए कवि डॉ. पाण्डेय अपनी ‘मां’ पर लिखी गई कविता में आह्वान करते हैं कि -
झुको, नीचे झुको
जमीन तक झुको
और उसके पैर छू लो
वह मां है
बहुत संभव है ऐसा करने में
तुम्हारे पैंट की क्रीज़ खराब हो जाये
पर उसके चेहरे की झुर्रियां
और बिवाई फटे पैरों का
तुम्हारे पैंट की क्रीज़ से
बहुत गहरा संबंध है
बंधु, झुको !
नीचे झुको, ज़मीन तक झुको
और उसके पैर छू लो
वह मां है।

डॉ. पाण्डेय के कविमन को इस बात से पीड़ा का अनुभव होता है कि समाज में स्त्री को वह सम्मान नहीं मिल पाता है जो उसे मिलना चाहिए। वे अपनी एक रचना में स्त्री की तुलना पतंग से करते हुए लिखते हैं कि -
पतंग और नारी की पीड़ा एक सी है
क्योंकि वे एक दूसरे की र्प्याय
दोनों की जबरन छेदी गई है नाक
कान में बांधी गई डोरी
दिखाती है समाज का वीभत्स चेहरा
उसे उड़ाने, फंसाने, कहीं भी लटकाने
और अटकाने के लिए हर कोई स्वतंत्र है
फिर चाहे खजूर में लटकाए या कहीं और
तथाकथित ढील और स्वतंत्र होने की चाह में
संजो लेती है सुखद अहसास कल के भविष्य का
बढ़ती जाती है आगे
सब कुछ भूलकर
समुद्र की गहराई के साथ।
बायें से :- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, सतीशचंद्र पाण्डेय एवं अन्य

ऐसा नहीं है कवि स्त्री की सामाजिक अवहेलना को देख कर निराशावादी हो गया हो, उसके भीतर मौजूद विश्वास उसे आशा बंधाता है कि एक दिन युवा और स्त्रीशक्ति के बल पर देश इस दुनिया का सच्चा सिरमौर बनेगा। यह रचना देखिए -
लिखे होंगे देश के ही नाम सारे कीर्तिमान
जिस दिन देश की जवानी जाग जाएगी
आन-बान-शान जो दिखाई नहीं दे रही है
प्राण प्रिय भारत की गूंज दूर जाएगी
नैतिक मूल्य राष्ट्र भाव यदि चिरंजीवी हो
धर्म की ध्वजा पूरे विश्व पर आएगी
भारत के वेद और भारत की गीता पढ़
बुद्ध महावीर की कहानी याद आएगी
एक दिन विश्व गुरु भारत बनेगा पक्का
जिस दिन फरेब की राजनीति हार जाएगी
जिस दिन इबादत से बड़ी होगी आबरू
उस दिन नही ‘पांडे’ नारी देवी कहलायेगी

डॉ. सतीश चंद्र पाण्डेय जिस गंभीरता से स्त्री के पक्ष में चिन्तन करते हुए अपनी रचनाओं में उस चिन्तन को काव्यात्मक रूप देते हैं वह निश्चित रूप से प्रत्येक संवेदनशील मन को आलोड़ित करने में सक्षम है। जैसी कि उनकी कविता है ‘कवि एक जुलाहा है’ उसी तरह प्रत्येक साहित्यकार एक जुलाहे की भांति समाज की चादर को सुंदर बुनावट देना चाहता है। इसी क्रम में डॉ. पाण्डेय की काव्यात्मक ऊर्जास्विता उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता के प्रति आश्वस्त करती है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 09.11.2018)
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Wednesday, November 7, 2018

शुभ दीपावली Happy Diwali


Dr. Varsha Singh

दीप की यह सहचरी दीपावली
ज्योति की गोदावरी दीपावली

रश्मि का लेपन लगा कर दे हमें
बन गई सोनल परी दीपावली

सांवली मावस- विभा के वस्त्र में
टांकती गोटा- जरी दीपावली

कार्तिक के द्वार आई पाहुनी
ओढ़ चुनर सुनहरी दीपावली

हर तरफ सौंदर्य के चर्चे नये
रूप की है फुलझरी दीपावली

मोहती तन-मन भ्रमित करती हृदय
शरद की जादूगरी दीपावली

गीत में संगीत में श्रम गूंजता
श्रमिक की यह अनुचरी दीपावली

आइए मिलकर जलाएं दीप हम
एकता की अंजुरी दीपावली

खोलती संकल्प के नव द्वार फिर
प्रगति की है देहरी दीपावली

शांति-सुख की कामना फूले फले
जगमगाहट से भरी दीपावली

संस्कारों की परिधि के मूल में
पुण्य कर्मों की धुरी दीपावली

हो रही “वर्षा” सुखद शुभ लाभ की
रसवती विद्याधरी दीपावली
- डॉ. वर्षा सिंह
डॉ. वर्षा सिंह


Happy Diwali शुभ दीपावली

Dr. Varsha Singh

Dr. Varsha Singh

Thursday, November 1, 2018

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह मतदाता जागरूकता कार्यक्रम में - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

निकट भविष्य में देश के अनेक राज्यों में विधानसभा चुनाव सम्पन्न होने वाले हैं। इन राज्यों में मध्यप्रदेश राज्य भी शामिल है। मतदान की तिथि 28 नवम्बर 2018 निर्धारित कर घोषित की जा चुकी है। हमारा देश लोकतांत्रिक व्यवस्था को सर्वोपरि मानता है, अतः जनप्रतिनिधियों का निष्पक्ष चुनाव करने के लिए आवश्यक है कि मतदान जाति या धर्म के आधार पर नहीं किया जाये। सर्वप्रथम प्रत्येक पार्टी अथवा निर्दलीय प्रत्याशी का अजेंडा पढ़ना आवश्यक है, ताकि देश हित के लिए जो उपयोगी हो उसे ही अपना मत दें। मतदान हर भारतीय नागरिक का अधिकार है और साथ ही कर्तव्य भी। चुनाव में खड़े जन प्रतिनिधियों को भी चाहिए कि अपने पक्ष में मतदान करवाने के लिए ग़लत मार्ग न अपनायें। मतदान की प्रक्रिया को सुचारू रूप से सपन्न कराने की जिम्मेदारी जितनी चुनाव आयोग की है उतनी ही जनप्रतिनिधियों और प्रत्येक नागरिक मतदाता की भी है। युवा देश की नींव होते हैं अतः यदि जागरूकता से मतदान करें तो देश एवं प्रदेश के लिए एक अच्छा उम्मीदवार चुन सकते हैं।
मतदाता जागरूकता कार्यक्रम में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

दिनांक 31.10.2018 को सागर, मध्यप्रदेश में स्थानीय पं. दीनदयाल शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में आयोजित मतदाता जागरूकता कार्यक्रम में सागर शहर  की वरिष्ठ साहित्यकार, लेखिका एवं कवयित्री डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि मतदाता को चाहिए कि वह निडर होकर मतदान करे । मतदान के प्रति जागरूक करने और मतदान का महत्व बताने के लिए मतदान अभियान चलाया गया है। मतदान करना राष्ट्र के लिए आवश्यक और हितकारी है। प्रत्येक नागरिक को मतदान करना चाहिए ताकि देश के विकास हेतु सही उम्मीदवार चुना जा सके।

उन्होंने कहा कि विश्व में अनेक प्रकार की प्रचलित शासन व्यवस्थाओं में से लोकतंत्र या जनतंत्र एक ऐसी शासन व्यवस्था है, जिसमें जनता के हित के लिए, जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही सारी व्यवस्था का संचालन किया करते हैं। इसी कारण जिन देशों में इस प्रकार की शासन व्यवस्थायें हैं उन्हें राजनीतिक शब्दावली में लोक कल्याणकारी राज्य और सरकार कहा जाता है।  पांच वर्षों में एक बार चुनाव कराना लोकतंत्र की पहली और आवश्यक शर्त है।
Dr. (Miss) Sharad Singh
चुनाव में प्रत्येक वयस्क नागरिक अपनी इच्छानुसार अपने मत (वोट) का प्रयोग करके इच्छित व्यक्ति को जिता और अनिच्छित को पराजित करके सत्ता से हटा सकता है। इस प्रकार लोकतंत्र में मतदान और चुनाव का अधिकार होने के कारण प्रत्येक नागरिक परोक्ष रूप से सत्ता और शासन के संचालन में भागीदारी भी निभाया करता है। युवा एवं सद्यः वयस्क नागरिकों को  लोकतंत्र में चुनाव का महत्व समझाया जाना और मतदान करने के लिए जागरूक करना आवश्यक है।

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने यह भी कहा कि सजग सावधान और जागरुक मतदाता ही चुनावों को सार्थक बनाने की भूमिका निभा सकता है। अत: अपने मत का प्रयोग अवश्य, परंतु सोच-समझकर करना चाहिए। यही इसका सदुपयोग सार्थकता और हमारी जागरुकता का परिचायक भी है।
मतदान एकमात्र ऐसा साधन है जिससे देश की जनता स्वयं अपने देश का विकास निर्धारित कर सकती है।
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
मत देने की शक्ति से वह अपने देश की बागडोर संभालने के लिए उनकी दृष्टि में योग्य व्यक्ति को खुद चुन सकते हैं। भारत एक ऐसा देश है जो लोगों को अपने देश के लिए फैसले लेने की पूर्ण आजादी देता है। हर व्यक्ति को मतदान जरूर करना चाहिए क्योंकि हर एक मत कीमती है। एक मत भी देश के लिए गलत सरकार को चुनने से रोक सकता है। मतदान से ही सरकार को पता चलता है कि देश कि जनता उनसे संतुष्ट है या नहीं क्योंकि जनता संतुष्ट होगी तो हर बार वहीं सरकार आएगी।

डॉ. शरद ने यह भी कहा कि हम सब एक स्वतंत्र देश के नागरिक हैं ,मतदान के अधिकार और इसके सदुपयोग की जानकारी मतदाता जागरूकता अभियान के तहत दी जा रही है। इस बार ईवीएम  के साथ वीवीपैट मशीन भी जोड़ी गई है , जिसके तहत मतदाता वोट देने के बाद स्वयं देख सकेंगे कि किस प्रत्याशी को उसका वोट गया है। अनेक स्थानों पर सार्वजनिक तौर पर ईवीएम मशीन के साथ वीवीपैट सेट (वोटर वेरीफाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) के माध्यम से वहां मौजूद मतदाताओं को जागरूकता का संदेश दिया जा रहा है कि जब आप प्रत्याशी को ईवीएम मशीन का बटन दबाकर वोट देंगे तो पास रखे वीवीपैट सेट पर आपके द्वारा दिया गया वोट 7 सेंकेंड तक दिखाई देगा कि आपने किस प्रत्याशी को वोट दिया है। 7 सेकेंड के बाद वो पर्ची पेटी में गिर जाएगी। इसका उद्देश्य मात्र मतदान में पारदर्शिता लाना है जो चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई है। अब फर्जी मतदान वाली अफवाहों पर विराम लगेगा।

इस अवसर आयोजित कवि सम्मेलन में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने मतदाता जागरूकता संबंधी अपने  निम्नलिखित 07 उच्चकोटि के दोहे भी सुनाये :-

सब कामों को छोड़कर करना है मतदान।
रखना है हमको सदा लोकतंत्र का मान।।

जाति धर्म सब भूलकर निर्णय करे समाज।
होगा खूब विकास फिर होंगे सारे काज।।

विज्ञापन या व्हाट्सएप्प, ये क्या देंगे राय।
खुद को जो अच्छा लगे, वहीं चुना बस जाय।।

शोर शराबे से कभी, मत होना कंफ्यूज़।
जो लालच या धौंस दे, करना उसे रिफ्यूज़।।

इक-इक मत है कीमती, यह मत जाना भूल ।
वोटिंग पावर आज है, सबसे बड़ा उसूल।।

शासन मन का चाहिए, तो लो कदम उठाए ।
चिड़िया जो चुग जाएगी, क्या होगा पछताए ।।

'शरद' करे विनती यही, करिएगा मतदान।
दुनिया भी देखे ज़रा, इस जनमत की शान।।
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Tuesday, October 30, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 32 - डॉ. घनश्याम भारती : एक ऊर्जावान साहित्यकार - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
     स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के युवा साहित्यकार डॉ. घनश्याम भारती पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

डॉ. घनश्याम भारती : एक ऊर्जावान साहित्यकार
                      - डॉ. वर्षा सिंह
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परिचय : डॉ. घनश्याम भारती
जन्म : 16.07.1976
जन्म स्थान : सागर
शिक्षाः हिंदी मैं स्नातकोत्तर एवं पीएचडी की उपाधि
विधा : लेख, निबंध, समीक्षा
पुस्तकें : नौ पुस्तकें प्रकाशित
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                      सागर नगर के स्थापित युवा साहित्यकारों में डॉ. घनश्याम भारती का नाम विश्वास पूर्वक लिया जा सकता है। सागर  नगर में जन्मे  डॉक्टर भारती के पिता श्री बाबूलाल एवं माता श्रीमती पूनम के सुरुचिपूर्ण लालनपालन ने उनके मन में बाल्यावस्था से ही साहित्य के प्रति अनुराग स्थापित कर दिया था। डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से बी.एड. एवं हिंदी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद प्रख्यात साहित्यकार  रंगेय राघव के कथा साहित्य में  लोकजीवन पर पीएचडी की उपाधि हासिल की।
             औपचारिक शिक्षा पूर्ण होने के बाद डॉ. भारती गढ़ाकोटा के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में पदस्थ हुए, जहां वे आज हिंदी विभाग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
डॉ. भारती की अब तक नौ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें ‘रांगेय राघव के कथा साहित्य में लोक जीवन’ जो 2007 में प्रकाशित हुआ। यह एक शोध ग्रंथ है। सन् 2015 में ‘शोध और समीक्षा के विविध आयाम’ नामक निबंध संग्रह प्रकाशित हुआ। सन् 2016 में ‘सत्य से साक्षात्कार के कवि निर्मल चंद निर्मल’ अभिनंदन ग्रंथ संपादित किया। सन् 2016 में ही ‘समय, समाज, साहित्य एक परिसीमन’ नामक पुस्तक प्रकाशित हुई। सन 2017 में ‘व्यक्तित्व, भाषा, मीडिया : एक अनुशीलन’ पुस्तक प्रकाशित हुई। सन 2018 में ‘हिंदी की प्रतिनिधि कहानियां’ का संपादन किया। शोधात्मक कार्यों के दिशा में डॉ. भारती ने कई महत्वपूर्ण सेमिनार आयोजित किए हैं तथा उन पर आधारित पुस्तकों का संपादन कार्य भी किया है। सन् 2018 में उनके संपादन में एक महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुआ जिसका नाम है ‘राम कथा का वैश्विक परिदृश्य’। इसी प्रकार 2018 में ही रामकथा पर केंद्रित एक और ग्रंथ प्रकाशित हुआ, जिसका नाम है ‘लोक जीवन में राम कथा’। ये दोनों ग्रंथ राम कथा को समझने में बहुत ही सहायक हैं। इस बात से भी इन ग्रंथों की उपादेयता बढ़ जाती है कि इनमें देश विदेश के विद्वानों के विचार आलेख के रूप में संग्रहित किए गए हैं।
                  डॉ. घनश्याम भारती वार्षिक पत्रिका ‘सृष्टि’ के 11 अंकों का संपादन कर चुके हैं, जिसमें कुछ विशेषांक प्रकाशित हुए हैं। जैसे - बेटी विशेषांक, शोध विशेषांक, पर्यावरण विशेषांक एवं स्वास्थ्य विशेषांक।
Dr. Ghanshyam Bharti
डॉ घनश्याम भारती के लेख एवं समीक्षाएं राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। अब तक लगभग 50 लेख, शोध आलेख तथा समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने त्रैमासिक समाचार पत्र ‘ई न्यूज लेटर’ का भी संपादन किया है। डॉ. घनश्याम भारती को अब तक लेखन संपादन तथा समाज सेवा हेतु अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। भारतीय परिषद प्रयाग इलाहाबाद में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पंडित केशरी नाथ त्रिपाठी द्वारा सन् 2014 में ‘सारस्वत सम्मान’ प्रदान किया गया था। सन् 2014 में ही जबलपुर की साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था कादंबरी द्वारा ‘स्व. सरस्वती सम्मान’ उन्हें प्रदान किया गया था। ग्राम विकास प्रस्फुटन समिति गढ़ाकोटा द्वारा ‘साहित्य विभूषण सम्मान’ भी उन्हें प्रदान किया जा चुका है। इसके अतिरिक्त गुना की साहित्यिक संस्था दृष्टि द्वारा ‘शब्द शिल्पी सम्मान’ (2016), उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ द्वारा ‘ज्ञान सागर अलंकार’ (2016), भोपाल द्वारा ‘अंबिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा सम्मान’ (2016), पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पंडित केसरीनाथ त्रिपाठी द्वारा ‘भारती शिखर सम्मान’ (2016), महामाया प्रकाशन रायबरेली द्वारा ‘प्रबुद्ध खालसा सम्मान’(2016)। इन सम्मानों के साथ ही ‘साहित्य मार्तंड शिखर सम्मान’(2016), ‘महामहोपाध्याय सम्मान उपाधि सम्मान’(2017), ‘साहित्य भारती शिखर सम्मान’(2017), भारतीय परिषद प्रयाग द्वारा ‘प्रज्ञा भारती सम्मान’(2017), सेंट जोन्स स्टेट यूनिवर्सिटी अमेरिका की विजिटिंग स्कॉलर नीलम जैन द्वारा ‘अहिंसा सम्मान’(2018) से डॉ. भारती को सम्मानित किया जा चुका है। ‘भाषा भार्गव सम्मान’ तथा ‘मुंशी प्रेमचंद सम्मान’ भी सन् 2018 में उन्हें प्राप्त हो चुका है।
           डॉ. घनश्याम भारती अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों का सफलतापूर्वक आयोजन करते रहते हैं। हिंदी विभाग शासकीय पीजी कॉलेज गढ़ाकोटा में ‘वैश्विक जीवन मूल्य और राम कथा’ विषय पर अप्रैल, 2018 में संयोजक के रूप में अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन कर चुके हैं। संगोष्ठी और तथा कार्यशाला का आयोजन करते हुए उन्होंने हमेशा विविध विषयों का चयन किया जैसे समाज सेवा लोकतंत्र राजभाषा एड्स जागरूकता व्यक्तित्व भाषा मीडिया आदि विषय।
          डॉ. घनश्याम भारती की वार्ताओं का प्रसारण आकाशवाणी के विभिन्न केंद्रों से होता रहता है। सन् 2012 को आकाशवाणी के सागर केंद्र से विशेष रेडियो वार्ता के अंतर्गत प्रसारित वार्ता ‘रांगेय राघव व्यक्तित्व और कृतित्व’ उनकी एक उल्लेखनीय वार्ता है।

Sagar Sahitya avam Chintan- Dr. Varsha Singh
         साहित्य के संबंध में डॉ घनश्याम भारती का मानना है कि साहित्य अपने समकालीन समाज का दर्पण होता है। समाज में जो भी अच्छा-बुरा घटित होता है, उसकी साहित्य में छवि दिखाई देती है। साहित्य का समाज से घनिष्ठ संबंध है। इसलिए समाज में जो भी घटनाएं घटित होती है उन सभी का जीवंत चित्रण साहित्य में होता है। वे कहते हैं कि साहित्यकार समाज में जो दिखता है उसी को यथार्थ रूप में लेखनी पथ करता है अतः समाज में घटित हो रहे क्रियाकलापों को साहित्यकार अपने साहित्य के माध्यम से समाज के लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करता है।
       जहां तक शोध और समीक्षा का प्रश्न है तो डॉ. घनश्याम भारती का मानना है कि शोध और समीक्षा ने हिंदी साहित्य में आज अपना वृहद स्थान निर्मित कर लिया है। साहित्यकार की शोधात्मक दृष्टि जीवन और समाज के उन बिन्दुओं को चुनती है जो प्रायः अनदेखे रह जाते हैं। यही शोध का मूल चरित्र होता है, जो विभिन्न प्रविधियों से गुजरता हुआ समग्र विवेचन और विश्लेषण के साथ अप्रकट को प्रकट कर देता है। शोध साहित्य को समाज से और समाज को साहित्य से परस्पर जोड़ता है। शोध ही वह तत्व है जो साहित्य के कलेवर को विश्वसनीयता प्रदान करता है। वहीं समीक्षा साहित्य को दिशा प्रदान करती है। छूटे रह गये तत्वों, अनावश्यक प्रस्तुति को परिमार्जित करती हुई साहित्य को अधिक से अधिक सारगर्भित बनाने का कार्य समीक्षा द्वारा ही हो पाता है। प्रत्येक साहित्यकार से अपेखा की जाती है कि वह अपने सृजन का प्रथम समीक्षक स्वयं बने। इसके बाद अन्य समीक्षक उसके सृजन की समीक्षा करें। जिससे सृजित रचना उपादेयता की दृष्टि से अपने सर्वांगीण रूप को प्राप्त करे। उल्लेखनीय है कि जब डॉ भारती शोध और समीक्षा के विविध आयाम नामक अपने ग्रंथ पर कार्य कर रहे थे तब हिन्दी साहित्य जगत के प्रख्यात समीक्षक डॉ नामवर सिंह ने शुभकामनाएं देते हुए अपने यह विचार व्यक्त किए थे कि - ‘‘यह ग्रंथ शोध और समीक्षा के क्षेत्र में कार्य करने वाले छात्रों हेतु पठनीय एवं संग्रहणीय साबित हो मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।’’ हिंदी समीक्षा जगत में कठोर समीक्षक के रूप में प्रसिद्ध डॉ नामवर सिंह का इन शब्दों में शुभकामनाएं देना भी अपने आप में महत्वपूर्ण है।
        वर्तमान समय संचार माध्यमों का समय है यानी मीडिया का समय है। मीडिया आज व्यक्ति के व्यक्तित्व और भाषा को प्रभावित कर रही है। डॉ भारती यह मानते हैं कि भाषा और मीडिया व्यक्तित्व को विशेषता प्रदान करते हैं। अपनी पुस्तक ‘‘व्यक्तित्व, भाषा, मीडिया : एक अनुशीलन’’ के सम्पादकीय आमुख में उन्होंने लिखा है कि - ‘‘भाषा और मीडिया व्यक्तित्व निखारने के महत्वपूर्ण सोपान हैं। इसलिए व्यक्तित्व, भाषा और मीडिया के अंतर्सम्बन्ध भी हैं। भाषा विचार सम्प्रेषण का मूल हिस्सा है। साथ ही मीडिया भाषा के माध्यम से ही लिखित एवं मौखिक रूप में अपने विचार लोगों तक पहुंचाती है। मनुष्य का जन्म जब शिशु के रूप में होता है तभी उसे किसी न किसी भाषा में बोलने हेतु प्रेरित किया जाता है और कालांतर में उसके भाषाई कौशल के आधार पर उसका व्यक्तित्व संवर्घन होता है। बाद में जब वह मीडिया के क्षेत्र में जाता है तो उसे अपना भाषाई कौशल समाज के समक्ष रखना होता है। फिर जिस व्यक्ति का भाषाई कौशल जितना अच्छा होता है वह व्यक्ति उतना ही उस क्षेत्र में प्रभावी माना जाता है तथा उसका व्यक्तित्व उसके भाषाई कौशल से फलीभूत होता है। अतः व्यक्तित्व, भाषा, मीडिया का घनिष्ठ संबंध है। ’’
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के मुख्य आतिथ्य में आयोजित एक कार्यक्रम में मंच संचालन करते हुए डॉ. घनश्याम भारती
        भारतीय संस्कृति में आदर्श चरित्रों को अत्यंत महत्व दिया गया है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित्र भारतय संस्कृति का सबसे लोकप्रिय चरित्र है। श्री राम के जीवन की कथा देश के सुदूर ग्रामीण अंचलों से ले कर सात समुंदर पार स्थित देशों तक लोक्रप्रिय है। धार्मिक कट्टरता से परे रामकथा सभी को प्रिय है। डॉ घनश्याम भारती ने प्रोफेसर श्याम मनोहर पचौरी के मार्गदर्श्ान में रामकथा की समग्रता पर केन्द्रित उल्लेखनीय कार्य किया है। उनका यह कार्य उनके द्वारा सम्पादित तीन पुस्तकों के रूप में देखा जा सकता है - ‘‘वैश्विक जीवन मूल्य और रामकथा’’, ‘‘लोक जीवन में रामकथा’’ एवं ‘‘रामकथा का वैश्विक परिदृश्य’’ । इनमें ‘‘वैश्विक जीवन मूल्य और रामकथा’’ में लेखिका इतिहासविद् डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने लिखा है - ‘‘रामकथा में जो राजनीतिक और सांस्कृतिक अवधारणायें हैं वे विश्व में व्याप्त आतंकवाद ओर राजनीतिक क्लेश समाप्त कर सकती हैं, यदि उन्हें आत्मसात किया जाये । सच तो यह है कि यह कालजयी कथा सच्चे अर्थों में विश्व को एक सुन्दर एवं संस्कारी ग्लोबल गांव बनाने की क्षमता रखती है। ’’ व्याख्यान के उपरांत रामकथा संदर्भित इस प्रकार के लेखों को संग्रहीत कर पुस्तक के रूप में संजोने का श्रमसाध्य कार्य डॉ भारती ने जिस कुशलता से किया है वह प्रशंसा के योग्य है, क्योंकि किसी एक विषय पर पुस्तक के रूप में सामग्री उपलब्ध होना न केवल पाठकों को जानकारी प्रदान करता है बल्कि नवीन शोधार्थियों के लिए आगे का मार्ग प्रशस्त करता है।
         ‘‘लोक जीवन में रामकथा’’ के ब्लर्ब पर प्रकाशित इलाहाबाद के भाषाविद् समीक्षक मीडिया अध्ययन विशेषज्ञ डॉ पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने लिखा है कि - ‘‘राम एक जीवनधारा है। जिसमें वही मनुष्य अवगाहन करने में समर्थ बन पाता है जो कालुष्य से दूर रहता है। सात्विकवृत्ति का बीजारोपण होने पर ही रामशक्तिपुंज से साक्षात्कार हो सकता हे, जिसे विरले ही कर पाते है। क्योंकि यह एक प्रकार की साधना है। इसी साधना का सारस्वत प्रसाद वितरित करने का कृतसंकल्प शासकीय स्नात्कोत्तर महाविद्यालय, गढ़ाकोटा, सागर, म.प्र. के प्राचार्य डॉ श्याम मनोहर पचौरी जी के संरक्षण में विश्रुत शिक्षाविद् समीक्षक डॉ घनश्याम भारती जी ने किया है, जो कि अनुकरणीय है।’’
          अपने विवेचनात्मक एवं शोध पूर्ण गंभीर लेखन से हिंदी साहित्य को निरंतर समृद्ध कर रहे युवा साहित्यकार डॉक्टर घनश्याम भारती अपनी सक्रियता से उस युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरक छवि स्थापित कर रहे हैं जो युवा पीढ़ी आज लेखन और पठन-पाठन से दूर होती जा रही है। डॉ घनश्याम भारती से प्रेरणा लेकर अनेक युवा गद्य विधा में प्रवृत्त हुए हैं। डॉ भारती एक ऐसे ऊर्जावान साहित्यकार हैं जो अपनी क्रियाशीलता एवं लेखकीय दायित्वों को बखूबी समझते हैं तथा उसी गंभीरता एवं तत्परता से साहित्य सेवा में जुटे हुए हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 30.10.2018)
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Friday, October 26, 2018

शरद पूर्णिमा पर साहित्यिक आयोजन - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

शरद पूर्णिमा दिनांक 24.10.2018 की संध्या को स्थानीय आदर्श संगीत महाविद्यालय, सागर के सभागार में नवोदित कथाकार श्री आर. के. तिवारी की पहली दीर्घ कथा पुस्तक "करमजली" का विमोचन समारोह नगर की अग्रणीय संस्था श्यामलम् द्वारा मेरी बहन ख्यातिलब्ध लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के मुख्य आतिथ्य एवं प्रख्यात व्यंग्यकार डॉ. सुरेश आचार्य की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। समारोह के शुभारंभ में मैंने यानी डॉ. वर्षा सिंह ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। समालोचिका डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय, श्रीमती निरंजना जैन, कार्यक्रम संयोजक श्यामलम् अध्यक्ष उमाकांत मिश्र एवं सद्यः विमोचित पुस्तक "करमजली" के सृजनकर्ता श्री आर.के.तिवारी ने पुस्तक के संबंध में अपने विचार रखे।








प्राचीन काल से शरद पूर्णिमा को बेहद महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। शरद पूर्णिमा से हेमंत ऋतु की शुरुआत होती है।

कहा जाता है कि इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है। रात्रि 12 बजे होने वाली इस अमृत वर्षा का लाभ मानव को मिले इसी उद्देश्य से चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है जिसका सेवन रात्रि 12 बजे बाद किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि माता लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। इसलिए देश के कई हिस्सों में शरद पूर्णिमा को लक्ष्मी पूजन किया जाता है।

आश्चिन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा शरद पूर्णिमा के रूप में मनाई जाती है। इस साल 2018 में शरद पूर्णिमा 24 अक्टूबर को मनाई गई। शरद पूर्णिमा को कोजागिरी पूर्णिमा व्रत और रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। कुछ क्षेत्रों में इस व्रत को कौमुदी व्रत भी कहा जाता है।

इस दिन चन्द्रमा व भगवान विष्णु का पूजन, व्रत कथा पढ़ी जाती है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इसी दिन चन्द्र अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होते हैं। इस पौराणिक एवं प्रचलित कथा के अनुसार एक साहूकार की दो बेटियां थी और दोनों पूर्णिमा का व्रत रखती थी| बड़ी बेटी ने विधिपूर्वक व्रत को पूर्ण किया और छोटी ने व्रत को अधूरा ही छोड़ दिया। फलस्वरूप छोटी लड़की के बच्चे जन्म लेते ही मर जाते थे। एक बार बड़ी लड़की के पुण्य स्पर्श से उसका बालक जीवित हो गया और उसी दिन से यह व्रत विधिपूर्वक पूर्ण रूप से मनाया जाने लगा। इस दिन माता महालक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

साहित्य जगत में विशेष तौर पर काव्य जगत में शरद पूर्णिमा कवियों के हृदय में परोक्ष रूप से हलचल जगाने का कार्य करती है। अपने सुप्रसिद्ध खण्ड काव्य “पंचवटी“ में कवि मैथिली शरण गुप्त ने शरद पूर्णिमा का बहुत सुंदर वर्णन किया है -
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।



Tuesday, October 23, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 31- विपुल संभावनाओं के युवा कवि अक्षय अनुग्रह - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के युवा कवि अक्षय अनुग्रह पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

विपुल संभावनाओं के युवा कवि अक्षय अनुग्रह
             - डॉ. वर्षा सिंह
                                 
परिचय :- अक्षय अनुग्रह
जन्म :- 27 अप्रैल 1990
जन्म स्थान :- सागर
शिक्षा :- एम.ए.(पॉलिटिकल साइंस)
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन :- पत्र-पत्रिकाओं में ।
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             हिन्दी साहित्य जगत में इस समय सबसे बड़ी चिन्ता जिस बात को ले कर है वह है युवाओं में साहित्य के पठन- पाठन और लेखन के प्रति रुझान में कमी। किन्तु सागर नगर के युवा कवि अक्षय अनुग्रह के साहित्यिक सरोकारों को देखते हुए यह चिन्ता धुंधली पड़ती दिखाई देती है। अपनी मां विमला जैन एवं पिता शीलचंद जैन से प्राप्त संस्कारों ने अक्षय अनुग्रह (जैन) को शिक्षा के प्रति समर्पण की भावना प्रदान की। हमेशा पढ़ाई में अव्वल रहने वाले अक्षय अनुग्रह ने बारहवीं कक्षा में प्रदेश की मेरिट लिस्ट में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अपनी शिक्षा के प्रति ध्यान केन्द्रित रखते हुए राजनीति विज्ञान में एम.ए. करने के बाद यूनीवर्सिटी ग्रांट कमीशन की जूनियर रिसर्च फोलोशिप प्राप्त की। अक्षय को राजनीतिक विषयों के साथ ही साहित्य और मनोवि़ज्ञान से भी लगाव है। उन्होंने सन् 2016 में योकोहामा, जापान में आयोजित 31वें इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ साइकालॉजी ऑन डायवर्सिटी इन हार्मानी- इनसाइट फ्रॉम साइकालॉजी में ‘‘ट्रांसजेंडर इन इंडिया : सीकिंग पॉलिटिकल इनक्लूजन एण्ड एट्टीट्यूड ऑफ प्यूपिल टूवर्डस् इट’’ विषय का अपना पेपर पढ़ा था। अक्षय राष्ट्रीय सेमीनारों में भी अपने पेपरस् प्रस्तुत कर चुके हैं। श्यामलम् संस्था, सागर द्वारा श्रेष्ठ युवा सम्मान तथा सर्वांगीण विकास संस्थान, सागर द्वारा स्व. सुमि अनामिका स्मृति बहुमुखी प्रतिभा सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
            अक्षय अनुग्रह की कविताओं में उत्तर आधुनिकता और वैयक्तिकता एक ऐसा समुच्चय दिखाई देता है जो जन और व्यक्ति को एक साथ सम्बोधित करता है। इन कविताओं में गहरी रूमानी भाव ऊर्जा जीवन के अनुभवों एवं अवस्थाओं के विभिन्न स्तरों को रेखांकित करती चलती हैं। अक्षय की कम शब्दों की छोटी कविताओं में भी विचारों और भावनाओं का विस्तार देखा जा सकता है, जैसे एक कविता है ‘अस्तित्व’ -
अपनी अंतिम बूंदों से
एक झिर ने पूछा
क्या तुम अब भी संजोये हो
मेरे नदी होने की स्मृति।
         परम्पराओं का बोध और सृजनशीलता परस्पर मिल कर साहित्य की नवीन अभिव्यक्तियां गढ़ते हैं। अक्षय अनुग्रह ने अपनी कविता ‘ऋणमुक्ति’ लिखते हुए ऐसी ही एक नई इकाई गढ़ने का सुन्दर प्रयास किया है-
फल तोड़ने के लिए फेंका गया पत्थर
जब बुद्ध को लगा था
तब बच्चों को उसके बदले
कुछ न दे पाने के अपराधबोध से
बुद्ध भर गए थे।
मेरे घर के बगीचे में
मिट्टी का एक पहाड़ है
जिस पर अमरूद का एक पेड़ लगा है
और उसके नीचे
ध्यानमग्न बुद्ध की मूर्ति बैठी है
मेरी बेटी अपने दोस्तों के साथ
बुद्ध के कंधों पर चढ़ कर अमरूद तोड़ती है।

           
Akshay Anugrah
  परिवेश में होने वाले परिवर्तनों से साहित्यकारों का सीधा सरोकार रहता है। वे प्रत्येक परिवर्तन के प्रस्थानबिन्दु से ले कर उसके प्रतिफलन तक अपनी दृष्टि जमाए रहते हैं, क्योंकि वे जानना चाहते हैंसमाज पर पड़ने वाले उसके प्रभावों के बारे में। समय का बदलना परिवेश का बदलना ही तो है। बिम्ब बदलते हैं, मानक बदलते है, उपमा और रूपक भी बदल जाते हैं। इस परिवर्तन को अपनी कविता में पिरोते हुए अक्षय अनुग्रह ने लिखा है-
अब कभी नहीं लिखी जा सकेंगी वे कविताएं
जिनमें निर्मल नदी को छूते हुए
संदेश ले जाते मेघों की कल्पना हो
न ही बुना जाएगा नायिकाओं का सौंदर्य
झरनों से बनते इंद्रधनुष के रंगों से
अब नहीं महकेंगी कविताएं
बेला, रातरानी और रजनीगंधा सी
न ही बरसेंगे शब्द
बरसते हुए हरसिंगार से अब नहीं पैदा होंगे
कालिदास, टौगोर, निराला, पंत
अब प्रकृति को देख कलम
सौंदर्य की कविताएं नहीं लिखती
तनाव की रेखाएं गूद देती हैं,
हमने अपने बच्चों को
प्रकृति से ही वंचित नहीं किया
बल्कि कितनी ही सुन्दर कविताएं
जो वे लिख पाते
उनके गर्भ में ही मार दीं
उस खून से वे लिखते रहेंगे
अदालतों में याचिकाएं
सरकार, बाजार और विकास से
पर्यावरण की रक्षा की गुहार की।
Sagar Sahitya avam Chintan  - Dr. Varsha Singh
               अक्षय अनुग्रह की कविताओं में एक सकारात्मक विद्रोह झलकता है। यह विद्रोह वंचितों को उनके अधिकार दिलाने, सोए हुओं को जगाने तथा आंतरिक अग्नि को प्रज्वलित करने का आह्वान है। अनुग्रह का यह विद्रोह उस बिम्ब को रचता है जिसमें लड़कियां अपने प्रकृतिदत्त स्वरूप में आत्मविश्वास के साथ विकसित होती दिखाई देती हैं। कविता का यह अंश देखिए-
मुझे नहीं सुहाती
तुम्हारी अच्छी और सीधी-सादी लड़कियां
वो जो केवल उन्हीं रास्तों पर चलती रहीं
जिन्हें तुमने तय किया था,
मुझे तो पसन्द हैं वो लड़कियां
जिनके चलने से बनती चली जाती हैं
संकरी और घुमावदार पगडण्डियां
जैसे शास्त्रीय अनुशासनों को तोड़ कर
कोई कलाकार अपने कैनवास पर
एक नए ढंग का चित्र उकेरता है
वो जिनका बचपन मटमैले रंग का होता है
जिनकी फ्राक पर चारकोल के दाग लगे रहते हैं
लड़कियों पर केन्द्रित इस लम्बी कविता की अंतिम पंक्तियों में अनुग्रह स्पष्ट कहते हैं कि- ‘‘ऐसी अनगढ़ और खुद को खुद से/तराशने वाली लड़कियां पसन्द हैं मुझे’’।
             अक्षय अनुग्रह की एक और लम्बी कविता है- ‘रिफ्यूजी परिन्दे’। इस कविता का यह मार्मिक अंश देखिए जिसमें कवि ने वाल्मीकि का रूपक रचते हुए उन व्यक्तियों को धिक्कारा है जो पर्यावरण को चोट पहुंचा कर पक्षियों को भी बेघर कर रहे हैं-
कितना सन्नाटा था
आज इस आसमानी कोलाहल में
जो जमीन खो चुकी थी
मांएं चोंच से दाना झटक कर
चींख भी नहीं पायीं
उम्मीद थी चूंजों के मिलने पर
दाना खिलाने की,
अगर स्तन होते
तो बहने लगता दूध बिना चूसे ही
इनके दर्द पर तुम कहां थे वाल्मीकि!
अपना काव्यमय श्राप क्यों नहीं दिया तुमने
एक क्रोंच जब रोयी तो रामायण लिख दिए
इन बेघरों पर क्यों खामोश रहे तुम।
आज के रोबोटिक युग में सम्वेदनाओं पर यांत्रिकता इस तरह प्रभावी हो चली है कि प्रेम अपने दीर्घकालिक अनुभूति होने का स्थान खाने लगा है। प्रेम में कोमलता का स्तर घटता जा रहा है। ऐसे शुष्क समय में युवा कवि अक्षय अनुग्रह की यह छोटी सी कविता प्रेम के सरस भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति प्रदान करती है-
यदि तुम नदी होती तो
बारिश की हर बूंद को
चख कर बरसने देता तुम पर
आंसुओं से जब भी तुम्हें भिगाया
पहले उन्हें उबाला है।
             अक्षय अनुग्रह की साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वे सागर नगर के युवा साहित्यकारों में विपुल सम्भावनाओं के कवि हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 23.10.2018)
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