Sunday, January 13, 2019

हिन्दी- उर्दू मजलिस का कवि सम्मेलन- मुशायरा

   
        सागर नगर की अग्रणी साहित्यिक संस्था हिन्दी-उर्दू मजलिस द्वारा आज दिनांक 13.01.2019 को आयोजित कवि सम्मेलन - मुशायरे में मैंने यानी आपकी इस मित्र डॉ. वर्षा सिंह ने अपनी ग़ज़ल पढ़ी.... Please Listen & Share .








Wednesday, January 9, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 40 ... एम. शरीफ : जिनकी ग़ज़लगोई में सादगी है - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के शायर एम. शरीफ पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

एम. शरीफ : जिनकी ग़ज़लगोई में सादगी है
                    - डॉ. वर्षा सिंह
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परिचय :
नाम  : एम. शरीफ
जन्म : 30.08.1954
जन्म स्थान : गौरझामर (सागर)
शिक्षाः हायर सेंकेन्ड्री
विधा : शायरी
पुस्तकें : एक ग़ज़ल संग्रह
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सागर नगर में हिन्दी, उर्दू और बुंदेली की त्रिवेणी एक साथ बहती रही है। विशेषता यह कि इस त्रिवेणी में एक भी भाषाई नदी लुप्त नहीं हैं, अपितु तीनों समभाव से सतत प्रवाहित हैं। सागर नगर में कई ऐसे ग़ज़लकार हुए जिन्होंने दुनिया में सागर का नाम रोशन किया। कुछ ग़ज़लकार ऐसे भी हैं जो दुनियावी तड़क-भड़क से दूर स्वातःसुखाय ग़ज़लकार एम. शरीफ का जन्म 30 अगस्त 1954 को सागर जिले के गौरझामर (खैराना) में हुआ था। पिता स्वर्गीय श्री शेखवली मोहम्मद जो शिक्षा विभाग में प्रधान अध्यापक के पद पर पदस्थ रहे और 1958 में रिटायर होकर सागर आ गए। सागर नगर में उन्होंने शनिचरी टोरी पर अपना निवास स्थान बनाया। एम.शरीफ की स्कूली शिक्षा सागर में हुई।  हायर सेकेंडरी उत्तीर्ण करने के बाद ही लोक निर्माण विभाग में स्थल सहायक पद पर नियुक्ति हो गई। अपने सेवाकाल के दौरान शायर एम.शरीफ को बुंदेलखंड के कई स्थानों में रहने का अवसर मिला। वे सागर के अतिरिक्त पन्ना जिले के अजयगढ़ तथा छतरपुर के बड़ा मलहरा में भी कार्यरत रहे। सन् 2014 में वे सेवानिवृत्त हुए।
 एम. शरीफ को आरंभ से ही साहित्य में रुचि रही। वे शालाओं में होने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। कविता पाठ तथा गीत लेखन में उन्हें कई विद्यालयीन पुरस्कार मिले। इनकी सबसे पहली रचना “ओ मां इतना वरदान दे“ स्थानीय समाचारपत्र “गौर दर्शन“ में सन् 1974 में आगे चलकर उनकी यह अभिरुचि और विस्तृत हुई तथा कविताओं के अतिरिक्त उन्होंने गजलें और कहानियां भी लिखीं। एम. शरीफ अनेक मंचों से अपनी ग़ज़लों का पाठ कर चुके हैं तथा आकाशवाणी सागर से भी उनकी ग़ज़लों का प्रसारण हो चुका है। उनके गीत और ग़ज़लें समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है उनका एक ग़ज़ल संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है जिसका नाम है-“तस्कीन ए ग़ज़ल“ ।
सागर नगर के मशहूर शायर मास्टर मोहम्मद इस्हाक का एम. शरीफ के साहित्य सृजन के बारे में कहना है कि “एम. शरीफ ने अपने गीत ग़ज़ल के लेखन में कई विधाओं में शेर लिखे हैं। चाहे समाज में हो रही अरजकताएं हों, दहशतगर्दी हो या जो भी ज्वलंत समस्याएं हों, वहीं दूसरी ओर इंसानियत खुलूसो- मोहब्बत और गंगा जमुनी तहजीब पर भी अच्छे शेर लिखे हैं।“
इसी तरह सागर जिले की शाहगढ़ तहसील में निवासरत शायर मोहम्मद रईस अख़्तर “एम. शरीफ ने अपनी गजलों में बेहतरीन लहजे अल्फाजों से संवारा है चाहे वह मुल्क में हो रहे दंगे फसाद हो समाज में हो रहे अपराध की गतिविधियां हो तो वहीं दूसरी तरफ इश्क मोहब्बत और गंगा जमुनी तहजीब पर भी अच्छे शेर कहे हैं यह एम शरीफ की ग़ज़ल कोई की खूबी है की अन्य शायर भी उनकी शायरी को महत्व देते हैं एम. शरीफ की शायरी में राष्ट्र प्रेम और समाज से सरोकार रखने वाली गजलें उभर कर आती हैं । उदाहरण के लिए ये दो शेर देखें-
सदा अनाजों से भरा रहे, हर खेत खलिहान
इल्म मोहब्बत से बने एक अलग पहचान
सोने की चिड़िया को, अब या खुदा
बना कबूतर हीरे का, चमका दे हिंदुस्तान

Sagar Sahitya avam chintan- Dr. Varsha Singh

ग़ज़लगोई को ले कर कई बार यह बात आती है कि ग़ज़ल कहना आसान काम नहीं है। ग़ज़ल के नियम-क़ायदों को निभाए बिना ग़ज़ल कही नहीं जा सकती है। लेकिन कई बार नियम-कायदों से परे भी कुछ अच्छी कहन मिल जाती है। तब उसे कहने वाले की भावना महत्वपूर्ण हो उठती है। शायर एम. शरीफ की यह ग़ज़ल देखें -
बढ़ता ही जा रहा है सेवन शराब का
मतलब नहीं समझते जीवन खराब का
हर कोई नशा करता है उम्र में कभी
दिल को जलाता है ये सेवन शराब का
करके बहाना ग़म का पीता है आदमी
बनती है उसकी मौत कारण शराब का
पीना तो आदमी का, है खुद अख्तियार
खुशहाल जिंदगी को बने, दुश्मन शराब का

मौजूदा वातावरण इंसान को हर तरह से प्रभावित करता है। यदि वातावरण अच्छा हो तो मन भी प्रफुल्ल्ति रहता है लेकिन यदि वातावरण त्रासद हो तो मन उद्वेलित रहता है। इस तथ्य को एम. शरीफ के इन शेरों में देखा जा सकता है-
इंसान को मत तलाशिए, अब आसपास में
शैतानियत के छुप गया वह तो लिबास में
सूरज मेरी गरीबी का ढल जाएगा जरूर
ये उम्र मेरी कट रही  इतनी ही आस में
सच बोलने के मुझको  इनामात मिल गए
पैबंद कितने  लग  गए  मेरे  लिबास में

शायर एम. शरीफ ने रूमानी ग़ज़लें भी लिखी हैं जो कि उनके ग़ज़ल संग्रह ‘तस्कीन ए ग़ज़ल’ में संग्रहीत हैं।  उनकी रूमानी ग़ज़लों में प्रेम का दुनियावी और दार्शनिक दोनों रंग देखे जा सकते हैं-
तेरे चेहरे को ख्वाबों में सजाया फिर भी
करार दिल को हमारे ना आया फिर भी
तेरे जमाल के यूं तो और भी दीवाने हुए
प्यार हमने भी इस तरह जताया फिर भी
ख़त की तहरीरें तो पहुंच गई उन तक
पास हमारे न कोई जवाब आया फिर भी

शम्मा और परवाने का बिम्ब शायरी में बहुधा मिलता है। इसे हर एक शायर अपने-अपने ढंग से बयां करता है। एम. शरीफ शम्मा और परवाने के पारस्परिक संबंध को जिस दृष्टि से देखते हैं, वह इन शेरों में उभर कर आया है-
परवाने बिना मकसद शम्मा से नहीं जलते
अफसाने मोहब्बत के,  बेवज़हा नहीं बनते
कुछ फर्क ही होता है अमीरी ओ गरीबी में
दीवानों पे दुनिया के,खंजर भी नहीं चलते
नादानियां थी उनकी कुछ मेरी ख़ताएं भी
वरना यह फासले भी, दरम्यां नहीं निकलते

यांत्रिकता के प्रभाव से संवेदनाहीन हो चले समाज में प्रेम जैसी कोमल भावनाओं का हताहत होना आम बात हो चली है। ऐसा माहौल शायर के दिल को कचोटता है और वह कह उठता है-
सच्चाई चाहतों की बेकार हो गई है
आजकल मोहब्बत व्यापार हो गई है
इंसानियत की खुशबू गुम है जहां से यारो
गुलशन की सब बहारें मक्कार हो गई हैं
मशहूर जो थी दिल्ली दिलदारी के लिए
अब आबरू भी उसकी जार-जार हो गई है

शायर एम.शरीफ की ग़ज़लगोई में उर्दू के छंदशास्त्र को ले कर उर्दू ग़ज़ल के जानकारों की अलग-अलग राय हसे सकती है किन्तु उनकी ग़ज़लों में निहित भावनाओं पर विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। वे एक सादगी भरी ग़ज़लगोई के शायर हैं और उन्हें उसी तरह स्वीकार किया जा सकता है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 09.01.2019)
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पाठकमंच गोष्ठी : और सोच में तुम - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

    कभी- कभी सामान्य सी चर्चा गोष्ठी कुछ अच्छे और सारगर्भित दमदार वक्तव्यों तथा सुधी श्रोताओं की उपस्थिति से एकदम ख़ास बन जाती है.... कुछ ऐसी समीक्षा बैठक रविवार दिनांक 06.01.2019 की जाड़ों की ठंडी दोपहरी को वैचारिक ऊष्मा से भरने वाली सिद्ध हुई। म.प्र.संस्कृति परिषद के अंतर्गत पाठकमंच की सागर ईकाई में वरिष्ठ कवि नरेन्द्र दीपक के गीतों के संग्रह - "और सोच में तुम" पर सम्पन्न हुई । इस समीक्षा गोष्ठी में मैं यानी आपकी यह मित्र डॉ. वर्षा सिंह मुख्य अतिथि के रूप शामिल हुई। विशिष्ट अतिथि डॉ. आशुतोष और अध्यक्ष कवि निर्मलचंद निर्मल थे। प्रश्नकाल में सागर नगर के प्रबुद्धजनों सहित डॉ. सुश्री शरद सिंह ने भी अपने विचार रखे। इस सफल आयोजन के संयोजक थे भाई उमाकांत मिश्र।






गीत वह विधा है जो मां की लोरी के रूप में हमारे जीवन से उस समय से जुड़ जाती है जब हमें शब्दों का भली-भांति बोध ही नहीं रहता है। लेकिन जीवन के अनुभवों के साथ संवेदनाएं घनीभूत होती हैं और भाव सघन हो जाते हैं, तब जो गीत शब्दों में ढलते हैं, वे सरस, भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी होते हैं।





   ऐसे ही सुंदर मर्मस्पर्शी गीतों का गुलदस्ता है  ‘सोच में हो तुम’। यह गीतों की एक बेहतरीन कृति है जो गीत परम्परा के सतत जारी रहने के प्रति आश्वस्त करती है। चूंकि नरेन्द्र दीपक कवि नीरज की परम्परा के गीतकार हैं इसलिए उनके इस गीत संग्रह में वही लयात्मकता है जो नीरज के गीतों में मिलती है।



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Sunday, January 6, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 39... डॉ. वंदना गुप्ता : एक उत्साही कवयित्री - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की कवयित्री डॉ. वंदना गुप्ता पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

डॉ. वंदना गुप्ता : एक उत्साही कवयित्री
                   - डॉ. वर्षा सिंह
                       
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परिचय :- डॉ. वंदना गुप्ता
जन्म :-   05 दिसम्बर 1966
जन्म स्थान :- इलाहाबाद (उ.प्र.)
शिक्षा :- विज्ञान स्नातक (इलाहाबाद वि.वि.), बी.ए.एम.एस.(स्टेट आयुर्वेदिक कॉलेज वाराणसी),
डी.वाई.एससी. (बनारस हिन्दू वि.वि.) तथा शास्त्रीय संगीत में विशारद
लेखन विधा :- पद्य
प्रकाशन :- गीत एवं कविता की पांच पुस्तकें
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         समाज, राजनीति, चिकित्सा और साहित्य चारों अलग-अलग आयाम होते हुए भी परस्पर एक दूसरे के पूरक के रूप में विद्यमान रहते हैं। इन चारों क्षेत्रों में एक साथ दखल रखने वाला अपने-आप में एक उल्लेखनीय व्यक्तित्व कहा जा सकता है। सागर नगर में स्त्रीरोग चिकित्सक एवं योग विशेषज्ञ के रूप में ख्याति प्राप्त डॉ. वंदना गुप्ता बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। उनकी जितनी रुचि चिकित्सासेवा में है, उतनी ही रुचि समाजसेवा, साहित्यसेवा और राजनीति में भी हैं। यद्यपि वे राजनीति को समाजसेवा के माध्यम के रूप में देखती हैं और इसी दृष्टिकोण से सन् 2018 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ चुकी हैं। डॉ. वंदना गुप्ता के पति डॉ. रामानुज गुप्ता शिशुरोग विशेषज्ञ हैं और वे स्वयं शिवराम जनकल्याण सेवासमिति के संरक्षक हैं तथा शिशुरोग विशेषज्ञ संघ मध्यप्रदेश एवं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं।
        05 दिसंबर 1066 को जन्मीं डॉ. वंदना गुप्ता को समाजसेवा की भावना अपने माता-पिता से विरासत में मिली है। उनके पिता ओमप्रकाश गुपता जो कि इलाहाबाद में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं, रोटेरियन हैं तथा मां विजयलक्ष्मी गुप्ता इनव्हीलर क्लब की सदस्य हैं। डॉ. वंदना की समाजसेवा की भावना को देखते हुए उन्हें सागर केन्टोन्मेंट बोर्ड के स्वच्छता मिशन का ब्रांड एम्बेस्डर बनाया गया। परिवार परामर्श केन्द्र महिला थाना, आंतरिक परिवाद समिति में वरिष्ठ परामर्शदाता के साथ ही भ्रूणलिंग परीक्षण निरोधक कानून बोर्ड की सदस्यता का निर्वहन भी कर रही हैं। समाजसेवा के लिए उन्हें प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न संस्थाओं सम्मानित किया जा चुका है। दर्जनों सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहते हुए समाज को निकट से जानने का जो उन्हें अवसर मिलता है, उन अनुभवों को वे अपनी कविताओं में पिरो कर साहित्य के रूप में ढालती रहती हैं।
सागर साहित्य एवं चिंतन - डॉ. वर्षा सिंह
         डॉ. वंदना की अब तक पांच काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- ‘कुछ नया करना है’,‘अपना बचपन बड़ा निराला’, जीवन दर्शन आनंद’, ‘विधवा अभिशाप नहीं’ तथा ‘गीत है जीवन गाते जाना’। उनकी कविताओं में समाज के प्रति चिंता और राष्ट्रप्रेम की भावना को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। ‘कुछ नया करना है’ संग्रह में संग्रहीत उनकी यह कविता देखिए-
परतंत्रता की बेड़ी में जकड़ी, जब भारत माता कराह रही थी
अत्याचारों की पराकाष्ठा से, मानवता थर्रा रही थी
निज राष्ट्रभक्त वीरों ने तब, तन, मन, धन न्योछावर कर
आजादी के लिए लड़े वे, निज प्राण हथेली पर ले कर
बहू, बेटियों, मां, बहनों ने भी खींची म्यानों से तलवारें
जंगे आजादी में कूद पड़ीं वे, देश को फिर स्वाभिमान दिलाने
हंसते हंसते वो वीर दीवाने, फांसी फंदों पर झूल गए
हाय प्रभु दुर्भाग्य ये कैसा, हम आज उन्हीं को भूल गए
कर्त्तव्य यज्ञ की ज्वाला में, निज प्राणों की आहुति दे दी
स्वरक्त से सिंचित मातृभूमि, नवपीढ़ी को अर्पित कर दी

          डॉ. वंदना के इसी संग्रह में उनकी एक और अनूठी कविता है जिसमें वे नेत्रदान का आह्वान करती हुई अपना भावनाओं को व्यक्त करती हैं-
दुनिया से जब जाएंगे, नेत्रदान कर जाएंगे
जीवन जिनका तिमिरयुक्त है, हम प्रकाश कर जाएंगे
यह दुनिया को दर्शाएंगे, दृष्टि महतव समझाएंगे
बन राहों का दीपक हम, रोशन जीवन कर जाएंगे
मर कर भी आशीष सुमन से, हम नित घर आंगन महकाएंगे
नवपीढ़ी के लिए दान की, कायम मिसाल कर जाएंगे

         मां प्रत्येक परिवार की धुरी होती है। परिवार के प्रत्येक सदस्य के प्रति वह जिस तरह अपने दायित्वों को निभाती है और अपनत्व प्रदान करती है, उससे परिवार एक संयुक्त इकाई के रूप में खड़ा रहता है। मां की आशीष ईश्वर की अनुकम्पा से भी बढ़ कर मानी गई है। इसी प्रकार प्रकृति से प्रदत्त तत्व ही जीवन का आधार बनते हैं। मां और प्रकृति में अद्भुत साम्य है। डॉ. वंदना गुप्ता भी ‘मां और प्रकृति’ शीर्षक अपनी कविता में मां के ममत्व की तुलना प्रकृति से करती हैं-
मां की आशीषों की वर्षा
हरियाली देती जीवन को
हरियाली है तो जीवन है
वर्षा का भी ये साधन है
मां और प्रकृति हैं मिलते
दोनों सृजन भाव को भरते
दोनों की छाया मिलने से
जीवन के हर घाव हैं भरते
दोनों हैं सम्मान हमारा
इन पर हम अभिमान करें
दोनों की सेवा तन-मन से
कर अपना कल्याण करें

        ‘‘गीत है जीवन गाते जाना’’ संग्रह की भूमिका लिखते हुए नगर के वरिष्ठ कवि निर्मलचंद ‘निर्मल’ ने टिप्पणी की है कि -‘‘(डॉ. वंदना गुप्ता की) ये रचनाएं कहीं युवाओं की प्रेरणास्रोत बनती हैं तो कहीं ममत्व की छाया प्रदान करती हैं तो कहीं नारी समाज के दर्द में डूब कर सामाजिक चेतना का केन्द्र बनती हैं।’’ इसी संग्रह की भूमिका लिखते हुए कवि डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया ने भी लिखा है कि -‘‘डॉ. वंदना गुप्ता जी अपनी बात बिना लाग लपेट के सीधी-सादी भाषा में कहने की सिद्धहस्त कवयित्री हैं। इसलिए व्यंजना, लक्षणा, वक्रोक्ति जैसी कविता की परम्परागत शैलियां उन्हें गूढ़ रचनाएं लिखने से बचाती हैं। डॉ. वंदना वह लिखती हैं जो सीधे-सीधे जन मानस को उद्वेलित कर सके।’’
           कवयित्री डॉ. वंदना के सृजन की इन विशेषताओं को दर्शाता उनके काव्य संग्रह ‘‘गीत है जीवन गाते जाना’’ का एक गीत उदाहरणार्थ यहां प्रस्तुत है-
चलो सृजन के दीप जलाएं
सकल विश्व को स्वर्ग बनाएं...
संस्कृति की पावन क्यारी में
जीवन आशा फुलवारी में
त्याग समर्पण के भावों संग
संस्कार के सुमन खिलाएं....
धूप-छांव के इस जीवन में
पीड़ित मानवता के हित में
स्वार्थयुक्त मानव जीवन में
फिर करुणा की जोत जलाए.....

          छंदबद्ध कविताएं अपने रचयिता से एक विशेष अनुशासन की मांग करती हैं। डॉ. वंदना ने दोहे लिखते हुए छांदासिक अनुशासन को समझा भी है और अपनाया भी है। उस पर जिस कवयित्री की संवेदनाएं जीवन के उतार-चढ़ावों से गहनता से जुड़ी हों और उनका समय-समय पर आकलन करती रहती हों, उसकी कलम से दार्शनिक दोहों का फूट पड़ना स्वाभाविक है। डॉ. वंदना गुप्ता जीवन दर्शन पर जो दोहे लिखे हैं वे एक संग्रह ‘जीवन दर्शन आनंद मनका’ के रूप में संग्रहीत हैं। ये दोहे जीवन के दार्शनिक पक्ष को बखूबी उभारते हैं-
जीवनदर्शन में भरा, है जीवन का सार।
जो इसमें डूबे रहे, वो हो भव से पार।।
सत्य नाम की बेल को जो जन सींचे धाय।
बन कर वो धर्मात्मा, उपकारी कहलाय।।
पराशक्ति आराधना, परमशक्ति अनुभूत।
तम हर सब को करे, आनन्दानुभूत ।।
अनासक्त रह भोग ही, पूर्ण योग कहलाय।
पूरण से हम आय हैं, पूर्ण ओर ही जाय।।
पंच तत्व की देह में अंश प्रकृति का जान।
चेतन आत्म स्वरूप जो, अंश ईश का मान।।

           ऐसा नहीं है कि डॉ. वंदना गुप्ता ने सामाजिक और दार्शनिक कविताएं ही लिखी हों। उन्होंने बाल कविताएं भी लिखी हैं। उनके बालगीत संग्रह ‘‘अपना बचपन बड़ा निराला’’ में बालमन पर आधारित बहुत सुंदर कविताएं हैं। एक कविता है-‘मां ने पालक साग खरीदी’। इस कविता में शब्दों की सादगी और बालअभिव्यक्ति का लालित्य देखते ही बनता है-
यब्जी का इेला है आया
ताजी-ताजी सब्जी लाया
आलू, गोभी, प्याज, टमाटर
भिंडी, ककड़ी वो है लाया
मां ने पालक साग खरीदी
साथ में धनिया, अदरक, अरवी
पालक साग रोज जो खाए
खून कमी न उसे सताए

       सहज व्यवहार, मुस्कुराहट सहेजे मृदुल स्वभाव और काव्य के प्रति सजग रहने वाली एक उत्साही कवयित्री के रूप में डॉ वंदना गुप्ता की वैयक्तिक ऊर्जा को उनकी विशिष्टता के रूप में रेखांकित किया जा सकता है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 04.01.2019)
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वार्षिक साहित्यकार सम्मेलन सागर में







          वर्ष 2018 के अंतिम रविवार यानी दिनांक 30.12.2018 को बुंदेलखंड हिंदी साहित्य- संस्कृति विकास मंच, सागर का वार्षिक साहित्यकार सम्मान समारोह बड़ा बाज़ार, सागर स्थित बी.एस. जैन धर्मशाला के सभागार में आयोजित किया गया। जिसमें सागर संभाग के अनेक परिचित साहित्यकारों से मिलने का सुखद अवसर मिला। सम्मान समारोह के इस गरिमामय आयोजन के लिए आयोजन के सफल संयोजक भाई मणिकांत चौबे 'बेलिहाज' को हार्दिक साधुवाद और बधाईयां !




नववर्ष की पूर्व संध्या पर कवि चौपाल

Dr. Varsha Singh


      आज मैं आप सब से साझा करना चाहती हूं नववर्ष की पूर्व संध्या पर दिनांक 31.12.2018 डॉ हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर के हिन्दी विभाग में आचार्य नंददुलारे बाजपेयी सभागार में विश्वविद्यालय के विद्वान कुलपति प्रोफेसर राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी महोदय की विशेष उपस्थिति में आयोजित 'कवि चौपाल' कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें। मित्रों, इस 'कवि चौपाल' कार्यक्रम में मैंने यानी आपकी इस मित्र डॉ. वर्षा सिंह ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कविता पाठ किया। नगर एवं विश्वविद्यालय के चुनिंदा कवियों के साथ बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने भी अपनी कविताओं का पाठ किया।

शायर अशोक मिज़ाज के संचालन और विभागाध्यक्ष डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी के सानिध्य में आयोजित इस  'कवि चौपाल' कार्यक्रम के सफल संकल्पनाकार एवं आयोजक प्रोफेसर डॉ. शशि कुमार सिंह थे।

Monday, December 31, 2018

⭐ Happy New Year ⭐ नववर्ष 2019 की शुभकामनाएं ⭐

Dr. Varsha Singh

       🌟⭐आप सभी को सपरिवार नववर्ष 2019 की हार्दिक शुभकामनाएं ⭐🌟

स्वागत है नववर्ष तुम्हारा
फिर इक नया सबेरा हो ।
ख़्वाब अधूरा रहे न कोई
तेरा हो या मेरा हो ।

फूल खिले तो बिखरे ख़ुशबू
बिना किसी भी बंधन के,
रहे न दिल में कभी निराशा
उम्मीदों का डेरा हो ।

जहां -जहां भी जाये मनवा
अपनी चाहत को पाये,
इर्दगिर्द चौतरफा हरदम
ख़ुशियों वाला घेरा हो ।

आंसू दूर रहें आंखों से
होंठों पर मुस्कान बसे,
दुख ना आये कभी किसी पर
सिर्फ़ सुखों का फेरा हो ।

कुण्ठा का तम घेर न पाये
मुक्त उजाला रहे सदा,
"वर्षा" रोशन रहे हर इक पल
कोसों दूर अंधेरा हो ।
      - डॉ. वर्षा सिंह

Happy New Year 2019