Wednesday, July 31, 2019

प्रेमचंद जयंती (31 जुलाई) पर विशेष - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       आज 31 जुलाई... यानी हिन्दी कथा साहित्य के पुरोधा प्रेमचंद का जन्म दिवस है... "पत्रिका" समाचारपत्र के सागर संस्करण में आज प्रकाशित मैं अपने और बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के विचारों को यहां आप सभी से साझा कर रही हूं. Please read & share.....

http//:patrika.com/c/41980335


*बुंदेली इतिहास एवं संस्कृति से प्रभावित थे प्रेमचंद*
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, वरिष्ठ लेखिका एवं उपन्यासकार
           प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना। बुंदेलखंड पर आधारित उनकी दो कहानियां हैं- -‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’।     
         ‘राजा हरदौल’ बुंदेलखंड की लोकप्रिय कथा है। इस बहुचर्चित कथा का बुंदेलखड के सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्व है। यह कथा ओरछा के राजा जुझार सिंह की अपने छोटे भाई हरदौल सिंह के प्रति प्रेम और संदेह की कथा है जिसने ओरछा के इतिहास को प्रभावित किया।
        बुंदेलखंड पर आधारित दूसरी कहानी ‘रानी सारन्धा’ बुंदेलखंड गौरव कहे जाने वाले महाराज छत्रसाल की मां रानी सारंधा की कथा है। रानी सारंधा ओरछा के राजा चम्पतराय की पत्नी थीं। चम्पतराय के संबंध में प्रेमचंद ने अपनी कहानी में लिखा है कि ‘राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुन्देला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे।’
           ‘रानी सारंधा कहानी के आरम्भ में वे बुंदेलखंड उस रियासत का वर्णन करते हैं जहां रानी सारंधा का जन्म हुआ था। वे लिखते हैं-‘शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आए और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’ यह कथा रानी सारंधा के जीवन के साथ ही बुंदेलखंड के परिवेश से परिचित कराती है। प्रेमचंद ने जहां अपनी कहानियों में दुखी, दलित, शोषित और दुर्बल चरित्रों को महत्व दिया, वहीं बुंदेलखंड के इतिहास के तथ्यों और चरित्रों को भी अपनी कहानियों में स्थान दिया। कथा सम्राट प्रेमचंद के कथा साहित्य में बुंदेलखंड के कथानकों का पाया जाना इस बात का द्योतक है कि वे बुंदेली संस्कृति, परम्पराओं एवं इसके गौरवशाली इतिहास से प्रभावित थे।
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कथा सम्राट प्रेमचंद # साहित्य वर्षा


हर युग में प्रासंगिक हैं प्रेमचंद

- डॉ. वर्षा सिंह, ब्लॉगर एव साहित्यकार
            कथाकार प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जिस तरह के पात्रों को प्रस्तुत किया है वह अद्वितीय है। प्रेमचंद की कहानियों का फलक व्यापक है। शैल्पिक विशेषताओं की दृष्टि से भी प्रेमचंद की कहानियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अपने समकालीन कथा साहित्य और परवर्ती पीढ़ी को उनकी कहानियों ने यथेष्ट रूप से प्रभावित किया है। जब तक मानवीय संवेदना रहेंगी तब तक प्रेमचंद प्रासंगिक रहेंगे। प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जनसाधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। वे अपने युग की चेतना के मुख्य संवाहक कथाकार के रुप में प्रतिष्ठित हुए । प्रेमचंद जी हिंदी भाषा और साहित्य के सच्चे प्रतिनिधि, उपासक और पोषक हैं। उनके साहित्य में भारतीय आत्मा बोलती है। वे भारतीय साहित्य में किसान-जीवन को अभिव्यक्ति देने वाले सर्वश्रेष्ठ कथाकार हैं।  उन्होंने अपनी लेखनी के महान बल से जनजीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रयास किया । ‘गबन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ जैसे उपन्यास और ‘पूस की रात’, ‘सवा सेर गेहूँ’, ‘ठाकुर का कुआँ’ और ‘कफ़न’ जैसी कहानियों ने प्रेमचंद को कालजयी कथाकार बना दिया। वे हर युग में प्रासंगिक हैं।         
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Tuesday, July 30, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 60 .... सहज अभिव्यक्ति के उल्लेखनीय कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार लोकनाथ मिश्र "मीत" पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

सहज अभिव्यक्ति के उल्लेखनीय कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’
                          - डॉ. वर्षा सिंह
                                                                   
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परिचय :- लोकनाथ मिश्र ‘मीत’
जन्म :-  03 दिसम्बर 1949
जन्म स्थान :- सागर, मध्यप्रदेश
माता-पिता :- श्रीमती भागवती मिश्र एवं स्व. बाबूलाल मिश्र
शिक्षा :- एम.ए. (गणित), बी.एड., संगीत प्रभाकर
लेखन विधा :- पद्य
प्रकाशन :- दो काव्य संग्रह प्रकाशित
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                बहुमुखी प्रतिभाएं अपने नगर का गौरव होती हैं। सागर नगर में भी बहुमुखी प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। एक ऐसे ही प्रतिभाशाली कवि जो नृत्य, संगीत, नाट्य जैसी साहित्यिक विधाओं के साथ ही जादू की कला में भी निपुण हैं, उनका नाम है लोकनाथ मिश्र। ये ‘मीत’ के उपनाम से कविताएं लिखते हैं। सागर नगर के मोहन नगर वार्ड में श्री बाबूलाल मिश्र एवं श्रीमती भागवती मिश्र की संतान के रूप में 03 दिसम्बर 1949 को लोकनाथ मिश्र का जन्म हुआ। माता-पिता की संगीत और साहित्य में गहन अभिरुचि थी। यह अभिरुचि लोकनाथ मिश्र में भी बाल्यावस्था से ही पुष्पित-पल्लवित होने लगी। पिताश्री धर्म-प्रवचन करते थे अतः धार्मिक ग्रंथों के प्रति लोकनाथ मिश्र की आरम्भ से ही जिज्ञासा रही। वे रुचि ले कर धार्मिक प्रसंगों को सुनते तथा उन पर चिंतन करते।
              लोकनाथ मिश्र अपनी प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में बताते हैं कि -‘‘जब प्राथमिक शाला चमेली चौक, सागर में प्रारम्भिक शिक्षा हेतु दाखिला हुआ तो कक्षा पहली में मेरे प्रथम गुरु पं. गौरी शंकर पंडा ने स्लेट पर ‘ग’ गणेश का लिखवा कर मेरी शिक्षा की नींव डाली।’’ वे अपने प्रथम गुरु की विशेषताओं के बारे में गर्व से चर्चा करते हुए कहते हैं कि -‘‘मेरे प्रथम गुरु पं. गौरी शंकर पंडा शहर के प्रसिद्ध कवि थे। जिन्होंने ‘‘शिव-शतक’’ नामक पुस्तक में शिव वंदना के सौ कवित्त बड़े ही अलंकारिक भाषा में लिखे। इस प्रकार मेरी प्राथमिक शिक्षा का सूत्रपात एक महान कवि गुरु के द्वारा हुआ। इसी परिणामस्वरूप आठवीं कक्षा में मैंने अपनी प्रथम कविता का सृजन किया।’’
                बचपन में मिले साहित्य संस्कार के प्रभाव से लोकनाथ मिश्र सोलह-सत्रह वर्ष की आयु में कविताएं लिखने लगे जो समाचारपत्रों में प्रकाशित होने लगीं। सन् 1970 में कवि सम्मेलनों में जाना आरम्भ किया और शीघ्र ही लोकप्रियता भी मिलने लगी। इसके बाद उनकी भेंट सागर नगर के विद्वान समीक्षक एवं साहित्यकार डॉ. संतोष कुमार तिवारी से हुई। डॉ. तिवारी ने लोकनाथ मिश्र को अपनी कविताएं संकलित कर संग्रह के रूप में प्रकाशित कराने की प्रेरणा दी। इस प्रेरणा के परिणामस्वरूप सन् 1999 में उनका प्रथम कविता संग्रह ‘‘सभ्यता का फ़र्क़’’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद साहित्यसृजन में उत्साहजनक गति आई और सन् 2005 में दूसरा संग्रह ‘अक्षर देवता’’ प्रकाशित हुआ। इस बीच धर्म मीमांसा की अपनी अभिरुचि के अनुरुप भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित शोधात्मक पुस्तक ‘‘मानस के सात भक्त’’ लिखी। इस पुस्तक के लेखन की प्रेरणा के संबंध में लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ बताते हैं कि जब वे वृंदावन के प्रवास पर थे, तब उन दिनों अचानक उन्हें इस विषय पर शोधात्मक पुस्तक लिखने का विचार आया।
           लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ ने एकांकी लेखन भी किया है। वे अपनी एकांकियों के लेखन एवं मंचन के संबंध में बताते हैं कि -‘‘मेरे द्वारा रचित अनेक एकांकियों में ‘अनोखा चुनाव’ एकांकी बहुचर्चित रही। जिसका मंचन 07 दिसम्बर 1980 को सागर के एक छविगृह पारस टॉकीज़ में टिकट शो से हुआ। सन् 1990 के जनवरी माह में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के शासनकाल के दौरान यही एकांकी एक नुक्कड़ नाटक के रूप में सागर शहर के छः स्थानों पर अलग-अलग खेली गयी।’’
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha 


चूंकि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ के पिताश्री प्रवचनकार होने के साथ ही संगीत मर्मज्ञ थे अतः उनका सितारवादक रामजी हर्षे, तबला वादक करोड़ी लाल भट्ट, जलतरंग वादक जवाहर लाल भट्ट आदि संगीत क्षेत्र के स्वनामधन्य कलाकारों के साथ उठना-बैठना हुआ करता था। ये कलाकार उनके घर पर भी आया करते थे तथा आए दिन संगीतसभा का आयोजन होता रहता था। इनमें जवाहर लाल भट्ट लोकनाथ मिश्र के बचपन के मित्र थे। ऐसे संगीतमय पारिवारिक वातावरण ने लोकनाथ में संगीत के प्रति रुचि जगाई। वे अपने मित्र जवाहरलाल भट्ट की भांति संगीत में निपुण होना चाहते थे किन्तु संगीत उनके शौक तक सीमित हो कर रह गया और उन्होंने तबला एवं बांसुरी वादन तथा गायन का समुचित अभ्यास किया। तबले की शिक्षा उन्हें दिल्ली बाज घराने की परम्परा के तबलावादक करोड़ीलाल भट्ट से प्राप्त की। इसके बाद विधिवत् संगीत शिक्षा लेते हुए तबला वादन में प्रभाकर तथा संगीत में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। संगीत के मंचों पर सुविख्यात शास्त्रीय गायक गंगाप्रसाद पाठक, सितार वादक रामजी हर्षे एवं शरद गांगाधर सप्रे, जलतरंग वादक जवाहरलाल भट्ट के साथ संगत के रूप में तबला बजाने का अवसर मिला।
            संगीत और साहित्य में समान रुचि के फलस्वरूप लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ ने एक शोधात्मकग्रंथ लिखा जिसका नाम था-‘‘सम-संगीत एवं काव्य का मूल आधार’’। यह ग्रंथ सन् 2006 में प्रकाशित हुआ। संगीत शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से सन् 2009 में प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद (उ.प्र.) से मान्यता प्राप्त कर सागर नगर में श्री सरस्वती संगीत महाविद्यालय आरम्भ किया।
          एक विशेष गुण जो लोकनाथ मिश्र को सागर के अन्य साहित्यकारों से अलग पहचान दिलाता है, वह है उनकी जादू की कला। उन्होंने न केवल मंचों पर अपनी जादू की कला का प्रदर्शन किया है अपितु वे बिहार राज्य के गया में आयोजित जादूकला पर आधारित कांफ्रेस में देश भर से एकत्र हुए बासठ जादूगरों के समक्ष अपने जादू का प्रदर्शन कर के वाहवाही प्राप्त कर चुके हैं। उल्लेखनीय है कि उन्होंने सन् 2013 में दिल्ली पब्लिक स्कूल सागर में एक निश्चित पाठ्यक्रम बना कर छः माह तक विद्यार्थियों को जादू कला का प्रशिक्षण दिया जिससे 565 छात्रों ने जादू कला सीखी। लेकिन वे जादूकला को अंधश्रद्धा एवं छल-कपट से दूर रखने में विश्वास रखते हैं। इस तारतम्य में उन्होंने सन् 1996 में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सानिध्य में बैंगलुरु में ‘‘अंधश्रद्धा के विरुद्ध तथा वैज्ञानिक सोच जागृत करने के लिए’’ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में नेहरु युवक केन्द्र संगठन के लगभग सौ अधिकारियों को चमत्कारों की वैज्ञानिक व्याख्या संबंधी प्रशिक्षण दिया। कवि लोकनाथ मिश्र को चिकित्सा संबंधी ज्ञान भी है। वे एक्यूप्रेशर, चुंबक चिकित्सा, पिरामिड चिकित्सा, रंग चिकित्सा, न्यूरो थेरेपी, म्यूजिक थेरेपी एवं विद्युत चिकित्सा के द्वारा रोगियों का इलाज भी करते हैं।
             बहुआयामी प्रतिभा से युक्त लोकनाथ मिश्र का साहित्य सर्जक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओं में जहां एक ओर गंभीर चिंतन रहता है वहीं दूसरी ओर हास्य-व्यंग का पुट भी पाया जाता है।  समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं स्वार्थपरता की राजनीति पर कटाक्ष करते हुए वे लिखते हैं
प्रश्न अनसुलझे बहुत हैं, और तुमसे क्या कहें।
आप भी उलझे बहुत हैं, और तुमसे कया कहें।
भूख कब से  द्वार पर  बैठी  हुई है  गांव के
हाथ में  छाले बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
अब उजाले में मुखौटे, पहन कर निकला न कर
आईने  बाहर  बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
जब से तुम सत्ता में आए, दूर दिल्ली हो गई
काम भी काले बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
क्या करोगे एक रावण को जला कर, रामजी
देश में रावण बहुत हैं, और तुमसे क्या कहें।

साहित्यकार लोकनाथ मिश्र

              तंगहाल इंसानों और परेशान किसानों के प्रति संवेदना के भाव उमड़ना स्वाभाविक है। विपरीत परिस्थितियां और उनके कारणों को टटोलने पर परिस्थितियों की अनेक पर्त्तें खुलती दिखाई देती हैं। कुछ यही भाव लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ की इस काव्य रचना में परिलक्षित होते हैं-
रात को जुगनूं से चमके और दिन में खो गये।   
ऐसे  सूरज  इस  जहां  में  बेतहाशा हो गये।
फसल  सारी  बो रहे हैं  कल्पना के  खेत में
बागवां  ऐसे  जहां  में  ढेर  सारे  हो  गये।
पांव के छालों ने खींचा, अनुभवों का मानचित्र
रास्ते  अब  साफ़ सारे, मंज़िलों तक हो गये।
आज तक तो हाल न पूछा किसी ने मीत का
आखिरी जब  सांस  टूटी, यार सारे  रो गये।

             एक बहुत ही हृदयस्पर्शी एवं कोमल भावनाओं की कविता है -‘जन्म दिवस पर’, जिसमें कवि ‘मीत’ ने एक पुत्र की नींद के बहाने उस भावना को व्यक्त किया है जो अपनी संतान के सुख को ले कर माता-पिता के हृदय में मौजूद रहती है। यह कविता देखिए-
शी...ई... शोर मत करो/कुछ मत बोलो,
मेरे बेटे की पलकों पर
छाई गहरी नींद मत खोलो
क्योंकि! तमु नहीं जानते कि
आज मेरे बेटे का जन्मदिन है
उसके सुनहरे जीवन में /रस ही रस है
मैं नहीं चाहता कि कम से कम आज के दिन
उसकी आंखों से/एक भी आंसू बह जाए
या उसका कोई भी स्वप्न
अचानक नींद टूटने पर अधूरा रह जाए।

             कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ अपनी कविताओं में भावनाओं एवं विचारों को जिस सहज भाव से पिरोते हैं, उनकी यह शैली उन्हें सहज अभिव्यक्ति का उल्लेखनीय कवि बनाती है।                               
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( दैनिक, आचरण  दि. 30.07.2019)
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Monday, July 29, 2019

नामवर सिंह स्मृति समारोह... यानी एक दोपहर चर्चा नामवर पर - डॉ. वर्षा सिंह

   
Dr. Varsha Singh

मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग की साहित्य अकादमी भोपाल ने रविवार 28 जुलाई 2019 को सागर नगर स्थित आदर्श संगीत महाविद्यालय में नामवर सिंह स्मृति समारोह का आयोजन किया। समारोह में आलोचक नामवर सिंह की स्मृति समारोह में हिन्दी आलोचना और साहित्य पर चर्चा हुई। जिसमें नगर के प्रमुख साहित्यकारों सहित मैं यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह एवं प्रख्यात लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह भी शामिल हुईं।

हिंदी आलोचना के शलाका पुरुष नामवर सिंह हिन्दी आलोचना की वाचिक परम्परा के आचार्य कहे जाते हैं। कहा जाता है कि नामवर सिंह के जीवन में जो समय संघर्ष का समय था वह हिंदी साहित्य के लिए सबसे मूल्यवान समय रहा, क्योंकि इसी समय में नामवर सिंह ने गहन अध्ययन किया.

नामवर सिंह का जन्म 28 जुलाई, 1926 को बनारस जिले की चंदौली तहसील, जो अब जिला बन गया है, के जीयनपुर गांव में हुआ था. नामवर सिंह ने  प्राथमिक शिक्षा बगल के गांव आवाजापुर में हासिल की. बगल के कस्बे कमालपुर से मिडिल पास किया.  बनारस के हीवेट क्षत्रिय स्कूल से मैट्रिक किया और उदयप्रताप कालेज से इंटरमीडिएट. 1941 में कविता से लेखकीय जीवन की शुरुआत की.

नामवर सिंह की पहली कविता बनारस की 'क्षत्रियमित्र’ पत्रिका में छपी. नामवर सिंह ने वर्ष 1949 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से बी.ए. और 1951 में वहीं से हिंदी में एम.ए. किया. वर्ष 1953 में वह बीएचयू में ही टेंपरेरी लेक्चरर बन गए. 1956 में उन्होंने 'पृथ्वीराज रासो की भाषा' विषय पर पीएचडी की और 1959 में चकिया-चंदौली से लोकसभा का चुनाव लड़ा वह भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर.


नामवर सिंह यह चुनाव हार गए और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से कार्यमुक्त कर दिए गए. वर्ष 1959-60 में वे सागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सहायक अध्यापक हो गए. 1960 से 1965 तक बनारस में रहकर स्वतंत्र लेखन किया. फिर 1965 में 'जनयुग’ साप्ताहिक के संपादक के रूप में दिल्ली आ गए. इसी दौरान दो वर्षों तक राजकमल प्रकाशन के साहित्यिक सलाहकार भी रहे. 1967 से 'आलोचना’ त्रैमासिक का संपादन शुरू किया. 1970 में राजस्थान में जोधपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए और हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने.

1971 में 'कविता के नए प्रतिमान’ पुस्तक पर नामवर सिंह को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला. 1974 में थोड़े समय के लिए कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिंदी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ  आगरा के निदेशक बने. उसी साल दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी के प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए और 1992  तक वहीं बने रहे. वर्ष 1993 से 1996 तक राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष रहे.



दो बार महात्मा गांधी अन्तर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति रहे. आलोचना त्रैमासिक के प्रधान संपादक के रूप में उनकी सेवाएं लंबे समय तक याद रखी जाएंगी.

हिंदी के लोकप्रिय साहित्यकार और समालोचक नामवर सिंह का निधन 92 वर्ष की आयु में दिनांक 19 फरवरी 2019  को हो गया. उन्होंने  दिल्ली के एम्स अस्पताल में मंगलवार रात 11.50 बजे अंतिम सांस ली. वह  के थे.
जैसा कि किसी विद्वत जन ने कहा था नामवर सिंह आधुनिकता में पारंपरिक हैं और पारंपरिकता में आधुनिक. उन्होंने पत्रकारिता, अनुवाद और लोकशिक्षण का महत्त्वपूर्ण कार्य किया, जिसका मूल्यांकन होना अभी शेष है.


 'हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग'' और ''पृथ्वीराज रासो की भाषा'' नामवर सिंह की शोधपरक रचनाएं हैं। उन्‍होंने ''आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ'', ''छायावाद'', ''इतिहास और आलोचना'', ''कहानी : नयी कहानी'', ''कविता के नये प्रतिमान'', ‘‘दूसरी परम्परा की खोज'' और ''वाद विवाद संवाद'' शीर्षक से आलोचना पर आधारित रचनाएं लिखीं । 90 वर्ष की आयु पूर्ण करने के अवसर पर प्रकाशित दो पुस्तकें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जययात्रा तथा हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल वस्तुतः पूर्व प्रकाशित सामग्रियों का ही एकत्र प्रस्तुतिकरण हैं।



Friday, July 26, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 59 ... प्रतिभा सम्पन्न युवा लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

     प्रतिभा सम्पन्न युवा लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र
                     - डॉ. वर्षा सिंह               
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परिचय :
नाम  :- डॉ. सुजाता मिश्र
जन्म :- 30 जून 1985
जन्म स्थान :- दिल्ली
माता-पिता :- डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र एवं प्रो. रामेश्वर मिश्र “पंकज“
शिक्षा  :- बी.ए. (ऑनर्स), एम.ए., पी.एच. डी.
लेखन विधा :- लेख, समीक्षा एवं आलोचना।
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       सागर नगर की साहित्य-उर्वरा भूमि प्रत्येक उस व्यक्ति को विशेष लेखकीय परिवेश प्रदान करती है जो साहित्य सृजन से जुड़ा हुआ हो, फिर चाहे उसका जन्म सागर में हुआ हो अथवा न हुआ हो, साहित्यिक कर्मभूमि के रूप में सागर की साहित्यिकता उस व्यक्ति के जीवन में समाहित होने की क्षमता रखती है। यह तथ्य दिल्ली में जन्मीं डॉ. सुजाता मिश्र पर भी अक्षरशः खरा उतरता है। दिल्ली में निवासरत् प्रो. रामेश्वर मिश्र “पंकज“ एवं डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र की पुत्री के रूप में 30 जून 1985 को जन्मीं सुजाता मिश्र ने अपने परिवार में एक वैचारिक एवं दार्शनिक परिवेश पाया। उनके पिता रामेश्वर मिश्र “पंकज“ गांधीवादी ,राष्ट्रवादी चिंतक तथा दार्शनिक हैं जिनके विचारों का प्रभाव सुजाता के चिंतन पर पड़ा। वहीं उनकी मां डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र राजनीति एवे समाजसेवा में रुचि रखने वाली महिला हैं। वे वर्ष 2007 - 2014 तक सोनिया विहार दिल्ली की निगम पार्षद रही, साथ ही वर्ष 2012 में पूर्वी नगर निगम दिल्ली की प्रथम मेयर भी रही। सुजाता ने अपनी मां से राजनीतिक समझ एवं समाज की विडम्बनाओं को देखने, परखने की क्षमता प्राप्त की। शैक्षिक एवं राजनीति के मिश्रित वातावरण में पली-बढ़ीं सुजाता मिश्र  के भाई कपिल मिश्र दिल्ली से विधायक तथा लोकप्रिय नेता हैं। जबकि सुजाता के श्वसुर प्रोफ़. डॉ. नंदकिशोर प्रसाद सिंह, बिहार विश्वविद्यालय से वनस्पति शास्त्र के व्याख्याता पद से सेवानिवृत्त हुए। परिवार में साहित्यसृजन के प्रति रुचि भी रही जिसने सुजाता मिश्र की भावनाओं में साहित्यिकता के बीज बोए।
       सुजाता मिश्र ने विद्यालयीन शिक्षा के पश्चात् दिल्ली के ही हंसराज कॉलेज से बी.ए. हिंदी (आनर्स) में स्नातक किया और इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2008 में स्थान परिवर्तन हुआ और वे दिल्ली से भोपाल आ गईं। भोपाल में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय से प्रसिद्ध आलोचक आचार्य विनय मोहन शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध कार्य किया। जैसा कि डॉ. सुजाता मिश्र ने जानकारी दी कि  आचार्य विनय मोहन शर्मा के साहित्यिक और निजी जीवन पर आधारित अभी तक का एकमात्र शोध कार्य है।
         यायावरी जीवन एक रचनाकार को अनुभवों के संसार से जोड़ता है। डॉ. सुजाता मिश्र को भी विभिन्न स्थानों में रहने और जीवन के नित नए अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिला। उन्होंने वर्ष 2012-13 में ग्वालियर स्थित सिंधिया कन्या विद्यालय में बतौर हिंदी शिक्षिका कार्य किया। इसके बाद वे  दिल्ली लौट गईं। दिल्ली में रहते हुए कुछ समय तक वहां एक प्रकाशन संस्थान में बतौर एडिटर और कंटेट राईटर काम किया। इस दौरान उन्होंने स्कूली विद्यार्थियों के लिये एनसीआरटी पाठ्यक्रम पर आधारित हिंदी, इतिहास तथा विज्ञान विषय में हिंदी माध्यम की सहायक पुस्तकें तैयार की। वैसे इस दौरान सन् 2008 से लगातार विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में शामिल होते हुए मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में भ्रमण किया।
           सन् 2016 में डॉ. सुजाता का विवाह डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के ई.एम.एम.आर.सी विभाग जो सी.इ.सी-यू जी सी -मानव संसाधन विकास मंत्रालय-मल्टी मीडिया केंद्र है, में प्रोड्यूसर ग्रेड ए अधिकारी कार्यरत् माधव चंद्र चंदेल से हुआ। स्वयं डॉ. सुजाता मिश्र वर्तमान में डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से मान्यता प्राप्त बीटी इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस में हिन्दी विषय की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उनकी प्रतिभा को देखते हुए इंस्टीट्यूट ने उन्हें सेवा आरम्भ करते ही इंस्टीट्यूट की वार्षिक पत्रिका “स्पंदन“ के प्रथम अंक का सम्पादन कार्य सौंप दिया। पैन्थेर हाउस पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ के लिए संपादन कार्य करते हुए डॉ सुजाता मिश्र ने “दादा साहब फाल्के अकादमी“ पुरस्कार विजेता तथा ,  “नगीना “ तथा “निगाहें“ फिल्मों के लेखक - निर्माता श्री जगमोहन कपूर के उपन्यास “मलंगी“ का सम्पादन किया। लखनऊ से ही प्रकाशित मासिक पत्रिका “लीटो इंडिया“ में बतौर सम्पादक कार्य किया। मध्यप्रदेश से प्रकाशित देशबन्धु , आचरण आदि समाचार पत्रों सहित राजस्थान से प्रकाशित नव दुनिया, बिहार से प्रकाशित “बिहार टुडे तथा दिल्ली से प्रकाशित न्यूज़ ग्राउंड मासिक पत्रिका के साथ ही साहित्यिक वेबसाईट “शब्दांकन डॉट कॉम“ , “प्रवक्ता डॉट कॉम“ तथा “मेकिंग इंडिया डॉट कॉम“ के लिये शोधपरक लेखन करती हैं। डॉ सुजाता मिश्र का शोध प्रबंध उनकी प्रथम पुस्तक के रूप में “आचार्य विनय मोहन शर्मा एवं उनका साहित्यिक अवदान’’ प्रकाशित हो चुका है।           
           उल्लेखनीय है कि डॉ सुजाता को अध्ययन ,आध्यापन और लेखन के अतिरिक्त संगीत में विशेष रुचि है। वे सिंथेसाइज़र (की बोर्ड) बजा लेती हैं तथा खना बनाने और बागवानी करने में भी उनकी विशेष रुचि है।
वसंत काव्योत्सव में बाएं से : कवयित्री डॉ. वर्षा सिंह, शायर डॉ. गजाधर सागर एवं मंच संचालक डॉ. सुजाता मिश्र

डॉ सुजाता मिश्र के लेखों में उनकी एक मौलिक दृष्टि दिखाई पड़ती है। अपनी लेखनी में एक ओर जहां उन्हें समाज में पड़ रहे पाश्चात्य प्रभाव के दुष्परिणामों से चिंता होती है वहीं दूसरी ओर वे भारतीय संस्कृति की ऐतिहासिक महत्ता पर गर्व झलकता हैं। लेकिन अंधानुकरण नहीं, वे अतीत की त्रुटियों पर भी उंगली उठाने से नहीं हिचकती हैं। इस तारतम्य में अपने लेखों में अद्यतन स्थितियों का आकलन करने के लिए ऐतिहासित एवं पौराणिक आख्यानों का भी संदर्भ लेती हैं। डॉ. सुजाता का एक लेख है ‘हंगामा है क्यों बरपा?’ यह लेख 27 सितम्बर 2018 को धारा 497 को रद्द किए जाने के संदर्भ में है। इस लेख के आरम्भ में ही वे लिखती हैं कि -‘‘ गत 27 सितम्बर 2018 को धारा 497 को रद्द करने वाले अपने ऐतिहासिक फैसला सुनाते जस्टिस आर एफ नरीमन ने तीक्ष्ण टिप्प्णी करते हुए कहा कि - “पत्नी पति की सम्पत्ति नही ंहै”, तब मुझे एकाएक स्मरण हो आया “द्रौपदी” का ! जब  स्वयंवर में अपनी धनुष कला के प्रदर्शन से अर्जुन ने द्रौपदी के मन को जीता तब राजा द्रुपद को कहां मालूम रहा होगा कि पुत्री की मनोइच्छा अनुकूल वर तलाशने  के लिए किया गया यह आयोजन अतंतः उनकी बेटी को आजीवन ‘बहुपतित्व’ के धर्म निर्वाह की ओर धकेल देगा! माता कुंती के आदेश मात्र पर स्वयंवर की कठिन प्रक्रिया से चुनी गयी अपनी पत्नी द्रौपदी को जब पांचो पांडवो ने आपस में बांट लेने का फैसला लिया तो कैसा लगा होगा द्रौपदी को ? मनोनुकूल वर की चाहत में द्रौपदी को जमीन के एक टुकडे की तरह पांचो ंभाईयो ंके में बांट दिया गया!  क्या पित और सास के आदेश पर एक स्त्री का पति के अन्य भाईयो ंको अपना पति मान उनके साथ संबंध बनाना नैतिक, समाजिक और मानवीय दृष्टि से सही था? यदि हां तो  सिर्फ अर्जुन की पति होते हुए द्रौपदी अपनी मर्ज़ी से अर्जुन के अन्य भाईयो ंके साथ संबंध बनाती तो क्या इसे भी सही कहा जाता? यह पांडू पुत्रो ंकी “स्वयंवर में जीती द्रौपदी” को अपनी “सम्पत्ति” समझने का ही नतीजा था, जिसके चलते “धर्मराज” माने जाने वाले युधिष्ठिर ने भी  द्रौपदी का दांव जुंए में लगा दिया, जिसकी परिणति भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण के रूप में हुई! चीरहरण के इस पाप का दोषी माना गया कौरवों को , जबकि अपनी पत्नी को एक वस्तु समझकर जुएं में हार जाने वाले युधिष्ठिर तो आज भी “धर्मराज” ही कहे जाते हैं!’’
          विगत कुछ वर्षों में स्त्रियों ने स्वयं के साथ हुई यौन-प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस दिखाते हुउ ‘‘हैशटैग मी टू’’ कैम्पेन आरम्भ कियां देखते ही देखते इसने दुनिया की अनेक महिलाओं में नवऊर्जा का संचार किया और वे अपने यौनशोषण की घटनाओं के बारे में खुल कर सामने आ खड़ी हुईं। इसी कैम्पेन के संबंध में डॉ. सुजाता मिश्र का एक लेख है ‘‘ मी टू : क्योंकि सब नहीं चलता’’। इस लेख में डॉ सुजाता ने इस कैम्पेन का अपने ढंग से आकलन किया है। वे अपने इस लेख में लिखती हैं कि -‘‘ खुलापान और मर्यादा एक साथ नही ंचल सकते। स्त्री हो या पुरुष सबको ंअपने दायरे समझने होगें। आज के इस दौर में दोस्त, प्रेमी और सहकर्मियों के साथ अपने रिश्तों के मापदंड हमें खुद निर्धारित करने होगें। और फिर भी यदि कोई उन दायरो ंको तोडने की कोशिश करे तो उसी वक्त अपना विरोध दर्ज करवाना होगा, स्त्री-पुरुष दोनों ही को “सब चलता है” वाला नज़रिया छोडना होगा, क्योंकि सब नहीं चलता। याद रखिए परिस्थितयोंवश भी गलत इंसान की गलत मंशाओं आगे समझौता करने वाला व्यक्ति फिर चाहे वो स्त्री हो या पुरुष सबसे बडा दोषी है। क्योंकि उसकी यही “समझौता प्रवृत्ति” उसको ंभले ही काम और नाम दिला गई हो पर इसके चलते ऐसे तमाम लोग मारे जाते है जो समझौता नहीं करते और कहीं गुमनामी में खो जाते हैं, जबकि शोषक दिन पर दिन ताकतवर बनता जाता है, और शोषित बनकर ही सही ऐसे लोग अपना एक मुकाम बना लेते है। इन्हें तो शायद हिसाब ही नहीं होगा कि इनकी “समझौता प्रवृत्ति” ने कितने मेहनती, ईमानदार, आदर्श लोगो ंको अंधेरो में धकेल दिया।’’
 
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

     अपने इसी लेख में सुजाता मिश्र भारत में स्त्रियों के साथ होने वाले यौनअपराधों के कारणों की पड़ताल करते हुए निष्कर्ष पर भी विचार करती हैं। वे लिखती हैं कि -‘‘ज्यादातर भारतीय अपना पूरा वक्त दूसरे धर्म-पंथो ंकी कमियां गिनाने में निकाल देते हैं। लेकिन खुद अपने ही धर्म ग्रंथों में आचरण की शुचिता और मर्यादाओ ंपर क्या दिशा-निर्देश दिये गये हें, यह अधिकांश लोग नहीं जानते। कोई भी कानून या सोशल मीडिया मुहिम इन हालातों को तब तक नही ंबदल सकते जब तक बदलाव की बयार हमारे अंदर से न उठे। आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर तो गुज़र जायेगा रह जायेगा बाकी तो कुछ सबक केवल। यदि अभी भी न चेते तो कब चेतेंगे? आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित माहौल देना हमारी जिम्मेवारी है। हांलाकि आमतौर पर प्राचीन मर्यादाओ को सदा स्त्री की आज़ादी का विरोधी समझा जाता है, तो बेहतर है समाज के वर्तमान स्वरूप को ध्यान में रखते हुए, लैंगिक समानता के आधार पर नवीन समाजिक-नैतिक दिशा-निर्देश तय हो। जब तक आप संबंधों में उन्मुक्तता का समर्थन करते रहेंगे तब तक इस तरह के अपराध बढ़ते ही रहेंगे।’’
         ‘‘देश चलाने का टेंडर बनाम लोकतंत्र’’ यह एक अन्य लेख है डॉ सुजाता मिश्र का जिसमें वे भारत में लोकतंत्र के दूषित होते स्वरूप पर कटाक्ष करती हुईं उन खतरे से भी आगाह करती हैं जो सोशल मीडिया अथवा इंटरनेट की ओर से पैदा हो चुका है। अपने इस लेख में उन्होंने वर्तमान दशा-दिशा की बारीकी से व्याख्या की है। इस लेख कर एक अंश देखिए- ‘‘भारत “चुनावों” का देश है ,यहां साल भर ,कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में चुनाव होता ही रहता है। आज़ादी के बाद जो सबसे बडा परिवर्तन देश के राजनीतिक स्वरूप में आया वह था “लोकतंत्र”। लोकतंत्र यानि “जनता पर, जनता द्वारा चुना गया, जनता का शासन”! ऐसी ही अनेक क्रांतिकारी परिभाषाओं से सुसज्जित लोकतंत्र ने कहीं न कहीं आम आदमी को उसकी छुपी हुई ताकत का एहसास कराया, उस आम आदमी को जो बरसों की गुलामी से आज़ाद हुआ था। किंतु वैश्वीकरण के इस दौर में विश्व के अनेक देशों में जहां ‘’राजनीति’’ की परिभाषा बदली वही ं“लोकतंत्र” ने भी अपना स्वरूप बदल लिया, फिर भला हिंदुस्तान इस बदलाव से कैसे दूर रहता? ऐसे में सोचना पडता है कि आज विश्व भर में जिसे हम “लोकतंत्र” कहते हैं वह आखिर “सत्ता का टेंडर” हासिल करने से कुछ ज्यादा है क्या? “लोक” तो जैसे इस “तंत्र” को साधने का एक माध्यम मात्र है।’’
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि डॉ सुजाता मिश्र एक प्रतिभासम्पन्न युवा लेखिका हैं। उनके लेखन में अपार संभावनाएं निहित हैं। वे एक समालोचक की दृष्टि से तथ्यों को तौलते हुए अपने विचारों को बेलाग सामने रखती हैं। उनका यही लेखकीय गुण एक दिन उन्हें यशस्वी बनाएगा।   
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( दैनिक, आचरण  दि. 25.07.2019)
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मेरा यह आलेख तेज़समाचार पोर्टल पर भी उपलब्ध है।
डॉ. सुजाता मिश्र की मेरे आलेख पर Facebook पर प्रतिक्रिया का screenshot प्रस्तुत है....

# साहित्य वर्षा

Tuesday, July 23, 2019

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का उपन्यास " पिछले पन्ने की औरतें" डॉ. विजय शिंदे की दृष्टि में - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh

     बेड़िया समुदाय जो कि कभी एक घुमंतू और आपराधिक प्रवृत्ति वाला समुदाय माना जाता रहा है लेकिन राज्य ने उसे अनुसूचित जाति की श्रेणी में श्रेणीबद्ध किया है और उनके विकास लिए तमाम तरह की योजनाएं भी चला रहा है ताकि उनका उत्थान हो सके लेकिन जैसा कि हमेशा होता है वैसा ही इन योजनाओं के साथ भी हुआ है। यह भी मात्र कागजों पर ही सीमित रह गयी हैं।

मध्य प्रदेश के सागर जिला में भी बेड़िया समुदाय के लोग निवास करते हैं। यहां के एक गाँव का नाम बेड़िनी पथरिया है। सागर में निवासरत देश की प्रख्यात उपन्यासकार एवं स्वतंत्र लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का  उपन्यास पिछले पन्ने की औरतें बेड़िया समुदाय की स्थिति को बयान करने वाला है।
Dr. (Miss) Sharad Singh, Author

       शरद सिंह ने बेड़िया समुदाय के बीच जाकर उनके जीवन यापन की दशाओं और उनके रहन-सहन सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति का शोधात्मक अध्ययन करते हुए इस उपन्यास की रचना की है ।  हिंदी विभाग, देवगिरी महाविद्यालय, औंरंगाबाद में सहायक प्राध्यापक एवं समालोचक डॉ विजय शिंदे द्वारा उपन्यास "पिछले पन्ने की औरतें" पर लिखी गई विस्तृत और महत्वपूर्ण समीक्षा मैं यहां "साहित्य वर्षा" में प्रस्तुत कर रही हूं ताकि "साहित्य वर्षा" ब्लॉग के सुधी पाठक इससे परिचित हो सकें। इस हेतु "रचनाकार" के प्रति आभार व्यक्त करते हुए मैं "रचनाकार" की लिंक भी यहां प्रस्तुत कर रही हूं।

https://www.rachanakar.org/2013/03/blog-post_2280.html?m=1

उपन्यास... "पिछले पन्ने की औरतें"- लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

समीक्षा ....
स्थायित्व हेतु सम्मान दांव पर लगाती‘पिछले पन्ने की औरतें’

- डॉ.विजय शिंदे

विविधताओं से संपन्न देश-भारत। विविध भाषा, धर्म, संस्कृति,आचार, विचार, परंपराएं....और बहुत कुछ। वैविधपूर्ण। वैसे ही विभिन्न आर्थिक स्थितियों के चलते असमानताएं और इन असमानताओं के चलते अपराध जगत् का वैविध्यपूर्ण होना। सीधे-सीधे अपराध, जो कानूनी तौर पर अपराध ठहराए जा सकते हैं और ऐसे कई निषिद्ध कार्य है जो सांस्कृतिक विविधता के साथ जुड़कर अपराध लगते नहीं परंतु मानवियता के नाते विचार करें तो घोरतम् अपराध लगेंगे। देश के भीतर कितनी जातियां हैं जिन्होंने आजादी का रस अभी तक चखा नहीं और भारतीय होने के नाते भारतीयत्व क्या है जाना नहीं। वह आज भी अपनी आदिम अवस्था में पौराणिक रीति-रिवाज एवं परंपराओं के साथ चिपके हैं; जहां से वे निकलना नहीं चाहते, सामाजिक स्थितियां उन्हें निकलने नहीं देती। जो परिवर्तन की धारा में कुदते हैं वे स्पर्धात्मक युग में पिछड़ जाते हैं और अपाहिज होकर परंपरागत निषिद्ध कार्य करने के लिए मजबूर होते हैं। ऐसे ही कानूनी तौर पर निषिद्ध कार्य करनेवाले परंतु जातिगत परंपरा के नाते सही परंपरा का निर्वाह करनेवाले‘बेडिया’जाति की स्थितियां है।
           मध्यप्रदेश में जन्मी शरद सिंह हिंदी के आधुनिक कथा साहित्य का सितारा हैं। उनके लेखन में जबरदस्त क्षमता है और अनछुए विषयों को उजागर करने की तड़प है।‘पिछले पन्ने की औरतें’ उपन्यास हिंदी साहित्य के भविष्य को नया आयाम देगा। ऐसा नहीं ऐसे उपन्यास पहले लिखे नहीं गए; लिखे गए परंतु उनमें एक कथात्मकता रहा करती थी जो कल्पना का आधार लेकर पाठकों को मनोरंजनात्मक तुष्टि दे सकती थी। शरद सिंह द्वारा लिखित‘पिछले पन्ने की औरतें’चिंतनात्मक-समीक्षात्मक-समाजशास्त्रीय-खोजपरख उपन्यास है जिसे पढ़कर पाठकों का मुंह खुला का खुला रह जाता है। आज भी भारत में ऐसी जनजातियां हैं जो अस्तित्व के लिए झगड़ रही है, जिनकी वास्तविकता प्रगति की ओर ताकतवर कदम उठा रहे भारत देश के चेहरे पर काला धब्बा लगा देती है।
         लगभग तीन दर्जन बेड़नियों का चित्रण एवं उल्लेख करते-करते शरद सिंह ने बेड़नियों के सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों पर प्रकाश डाला और अपने देश में औरतों की दशा (औकात!) को भी उजागर किया है। रामायण-महाभारत तथा ऐत्यासिक स्त्री पात्रों का समीक्षात्मक मूल्यांकन भी किया है और कहा उन्हें भी बेड़नियों जैसा इस्तमाल कर फेंक दिया गया। बेड़नियों के जीवन पर प्रकाश डालते-डालते लेखिका कहती है, औरत बरसात के पानी जैसी है, उसे न जमीन चुनने का अधिकार होता है न अपनी प्यास बुझाने का।(पृ.100) औरत बस पान की तरह है, जिसे जब चाहा मुंह में डालकर चबाया,स्वाद लिया और जब चाहा थूक दिया।(पृ.110) एक आम स्त्री की दशा बाडे में बांधकर रखी जानेवाली गाय के समान है होती जिसे यदि किसी दिन घूमने-फिरने के लिए बाडे से बाहर जाने दिया जाए तो कोई भी व्यक्ति सहजता से उसके गले में अपनी रस्सी डालकर घर ले जा सकता है। ....वह अपनी अनिच्छा के मामूली प्रदर्शन के बाद रस्सी की दिशा में खिंचती चली जाती है, क्योंकि उसे रस्सी का सबल एवं प्रबल प्रतिरोध सीखने का कभी अवसर ही नहीं दिया गया।(पृ.165) शरद जी की यह टिप्पणियां झकझोर देती हैं, सोचने को मजबूर कर देती हैं कि न केवल भारत संपूर्ण दुनिया औरत एवं पुरुष के होने से परिपूर्ण बनी है तो फिर औरतों को पिछले पन्नों में क्यों दबाया जाता है? उनकी अस्मिता-अधिकारों क्यों नकारा जाता है? और औरतें भी यह सबकुछ क्यों सहन करती है? वह मुक-बधिर-अंधी-अपाहिज है? उन्हें हाशिए पर छोडे जाने की स्थितियों का पता नहीं?

         महादेवी वर्मा ने औरतों के दुखों को बदरी मानकर वर्णित किया। खैर औरतों के दुःखों को मिटाने के लिए ईश्वर तो अवतरित होंगे नहीं? महाभारत में कृष्ण का द्रौपदी की लाज बचाने के लिए अवतरित होना चाहे काल्पनिक हो या वास्तविक, वर्तमान में कोई कृष्ण अवतरित नहीं होगा। हां कोई पुरुष अवतरित हो भी गया तो दलाली जरुर करेगा....! महादेवी ने लिखा तो था-

"मैं निरभरी दुःख की बदली !

× × × ×

विस्तृत नभ का कोई कोना,

मेरा न कभी अपना होना।

परिचय इतना इतिहास यहीं,

उमडी कल थी मिट आज चली !"

"ठीक है बदली,....बदली है और उसका विस्तृत नभ में कोई कायम कोना रहेगा भी नहीं। उसका मिटना स्वीकारा जाएगा परंतु बदली को औरत से जोडकर उसका अधिकार छिनना और उसे मिटने के लिए मजबूर करना अन्याकारक है। खुद औरत भी ध्यान रखें, अब अफ़सोस करने का वक्त गुजर चुका, अस्मिता-अस्तित्व और अधिकार की लडाई खुद लडनी पडेगी। अफ़सोस से निरंतर शोषण होता रहेगा। औरतें सामाजिक संस्थाओं में उपस्थित तो हैं परंतु उनको संवेदनात्मक अनुभूति नहीं। उन्हें समाज के पिछले पन्नों में फेंका जाता है। ऐसे ही पिछले पन्नों में दबी औरतों के वास्तविक पिडाओं का रेखांकन शरद सिंह ने किया है।

1.वर्तमान स्थिति -

‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास में शरद सिंह ने मध्यप्रदेश में स्थित पथरिया, लिधोरा, लुहारी हबला, फतेहपुर, बिजावर, देवेंद्रनगर.... जैसे कुछ गांवों का जिक्र किया है जहां बेडिया समाज रहता है। इन परिवारों के आय का मूल स्रोत उस परिवार की औरत होती है जिसे बाकायदा बेड़नी बनाया जाता है, उस एक बेड़नी पर दस-बीस जनों का परिवार निर्भर रहता है। हजार भर की आबादी वाले बेडिया गांव में लगभग पचास के आसपास बेड़नियां रहती है; जो नृत्य और शरीर विक्रय कर अपने सारे कुनबे-परिवार का पालनपोषण करती है। इनकी सामाजिक स्थिति का वर्णन करते लेखिका संपूर्ण नारी जाति की स्थिति पर सावधानी से प्रकाश डालती है। सावधानी से इसीलिए कि यह समाज औरत-पुरुष से बना है, वह एक दूसरे के दुश्मन नहीं, दोस्त है। एक नाजुक रिश्ता इन दोनों में है जो एक दूसरे के अस्तित्व के लिए पुरक है लेखिका लिखती है,"मैं पुरुषों की विरोधी नहीं हूं, किंतु उस विचारधारा की विरोधी हूं जिसके अंतर्गत स्त्री को मात्र उपभोग की वस्तु के रूप में देखा जाता है।"(पृ.7) पुरूष भीड़ में भी और सुनसान जगह पर भी स्त्री को दबोचकर अत्याचार करने की मानसिकता रखता है। कोई चिकोटी काटता है तो कोई पुरुषांगों के भद्दे स्पर्श से अपमानित करता है या कोई उसे प्रत्यक्ष भोगने की स्थिति में नहीं पाता तो शब्दों और आंखों से भोगना शुरू करता है। "क्या स्त्री-पुरुष के संबंधों का अंतिम सत्य संभोग ही होता है? लेकिन अधिकांश भारतीय स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को समान रूप से भोगते ही कहां है? पुरुष भोगता है और स्त्री भोग्या बनी रहती है।"( पृ.12) लेखिका द्वारा इसे लिखना भारतीय औरतों की वर्तमान स्थिति को बेपरदा करता है।

बेडिया समाज में कोई स्त्री जानबूझकर शरीर विक्रय नहीं करती, न ही रखैल बनना चाहती है और न ही नृत्य करना चाहती है। इनकी पिछडी स्थिति, अशिक्षा, आर्थिक विपन्नता एवं परंपराएं इन्हें इस ओर लेकर जाती है जो सहजता से होता है। परंपरा से ऐसे ही हो रहा है इसीलिए इसमें उन्हें कुछ गलत भी नहीं लगता। जिन ठाकुरों, जमिनदारों, पैसे वालों एवं ताकतवरों.... की वे रखैल होती हैं वह बेड़नियों को औरत का दर्जा तो देता है पर दूसरी पत्नी का नहीं, चाहे वह औरत कितनी भी ईमानदारी से उससे जुडी हो। उसे हमेशा अपमानित कर पिछले पन्नों में दबाने के लिए तत्पर होता है। अपनी जांघों की ओर इशार कर बडे बेशर्मी से, भद्देपन से कहेगा कि‘हम और हमारा ये तो तुम्हें ही ठकुराइन मानते हैं।(पृ.28) देश की आजादी को सालों गुजर चुके परंतु बेड़नियों की स्थिति में कोई अंतर नहीं आया उनका नृत्य और रखैल बनाए जाना धनिकों के लिए गौरव की बात होती है। गांव की कोठियां, मत्रियों के बंगलों पर नाच के लिए बेड़नियों को आमंत्रित किया जाता है। वहीं पर उनका चुनाव शरीर भोग के लिए होता है। वेश्या, गणिका, नगरवधु, बेड़नी, राजनर्तकी, देवदासी, मुरली, लोकनाट्य तमाशों में काम करती औरतें, लावनी अदाकार, बारियों में नृत्य करती औरतें, बार बालाएं, आयटम गर्ल्स....और रंगिन चष्में चढाकर लाईट,कट एवं ओके की चकाचौंध में फंसी औरतों को चटखारे के साथ चर्चाओं में लाया जाता है और मेजों पर, पलंगों पर सजाया जाता है। हाथी-घोडों के समान बेड़नियों को जानवर मानकर पाला जाना वर्तमान वास्तव है। समाज के भीतर मौजुद खूबसूरत स्त्री के के चेहरे की मुस्कराहट लपकने-लिलने के लिए पुरुषों का झूंड़ तैयार रहता है यह अच्छी स्थिति नहीं है। आज जो औरतें लीड कर रही है वह अपवाद स्वरूप है, उन्हें सलाम तो करना ही पडेगा। परंतु बहुसंख्य औरतों का मूलाधार पुरुष है जो उन्हें भीख स्वरूप नेतृत्व देता है जो अच्छा नहीं माना जाएगा। "समाज में स्त्री की स्थिति अब पहले से अधिक जटिल है। एक ओर स्त्री को अपेक्षित रखा जाता है तो दूसरी ओर उपेक्षित बनाकर रखा जाता है। सत्ता, समाज, संपत्ति पर उसका अधिकार है भी, और नहीं भी। न्याय की पोथियों में ये तीनों अधिकार स्त्री के नाम लिखे गए हैं, लेकिन यथार्थ पोथियों के बाहर पाया जाता है।.... न्याय दिलाने वाले से लेकर उसे एक ग्लास पानी पिलाने वाले भी दया और सहानुभूति के नाम पर लार टपकाने से नहीं चूकते है।"(पृ.261)

2.सरकारी भूमिका -

भारत एक आजाद देश है और यहां लोगों से चुनी सरकार काम करती है। अर्थात् सरकार द्वारा लोकहित में कार्य किया जाना अपेक्षित है परंतु ऐसा होता है या नहीं? पूछा जाए तो उत्तर स्वरूप कुछ आवाजें‘हां’में तो कुछ ‘ना’में उठेगी और कुछ ‘चुप्पी’साधे बैठेगी।‘हां’वाली सरकार समर्थक, ‘ना’वाली सरकार विरोधक और‘चुप्पी’वाली सरकार को न जानने वाली, आजादी से कोसों दूर वाली मानी जाएगी। बेडिया समाज‘चुप्पी’का हकदार है पर धीरे-धीरे उनमें भी सरकार के विरोध में नाराजगी का स्वर उठ रहा है। उसका कारण है उनके घरों में पहुंचा टी.वी. और टी.वी. के विभिन्न चैनल्स, खबरें। थोडे-बहुत चेतनाएं पा रहे हैं वे सालों-साल की अकर्मण्यता से उठने का नाम नहीं ले रहे हैं। उन्हें लगता है सरकार हमारे घरों में नोटों की गड्डियां फिकवाएं या अनाज की बोरियां डाले। खुद योजनाओं का लाभ लेकर हाथ-पैर चलाने की मानसिकता नहीं। इसमें जितना दोष बेडियों का उतना सरकार का भी है क्योंकि जितनी गंभीरता से इनकी स्थितियों पर सोचना चाहिए उतना सोचा नहीं जाता, कारण हजार-पांच सौ के मतदाताओं से उनके लिए कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता बेडिया समाज को पिछडी अनुसूची में समाविष्ट किया गया परंतु इससे भी उनकी सामाजिक स्थितियों में अंतर नहीं आया। लेखिका लिखती है,"शायद यह अंतर बहुत बारीक था, अंतर के पाए जाने का भ्रम था जो किसी छलावे की तरह कभी आभासित होता तो कभी ऐसे अदृश्य हो जाता जैसे हो ही नहीं, क्योंकि मैंने पाया कि बेड़नियां तो अभी भी नाच रही है – वर्तमान सांमतों के सामने ! वे अभी भी परोस रही है अपनी देह को किसी‘बुके की मेज’पर व्यंजन की तरह।(पृ.64)" सरकार उदासिन, सरकारी योजनाओं का लाभ इन तक नहीं पहुंचना, इनके नाम से अलॉट की गई राशियां एवं सहुलतें बीच में ही गुम हो जाती है, अतः आर्थिक तंगी और विपन्नता से परेशान बेड़नियां जो परंपरा से दायित्व निभा रही है आगे आती है और परिवार का पोषणकर्ता बनती है; कुलमिलाकर बेडिया समाज की औरतें स्थायित्व पाने के लिए अपने स्त्रीत्व के सम्मान एवं अधिकार को दांव पर लगाती है और परिवार एवं साथियों के आर्थिक सुरक्षा का जिम्मा उठाती है।
          खूबसूरत और राई नृत्य में निपुण कुछ बेड़नियां शासकीय सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिनिधित्व के नाते रूस, अमरिका, जापान आदि देशों की यात्रा भी कर चुकी है परंतु वापसी पर वहीं विपन्नता एवं संघर्ष जारी रहता है। इनके गांवों में स्कूलों की स्थिति दयनीय है, न इमारत, न अध्यापक। बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे, जाए तो पढाए कौन, बैठे कहां? हजारों सवाल। और अंतिम सवाल पढ़-लिखकर स्पर्धात्मक युग में दौडे कब तक? ऐसी स्थिति में बच्चों को स्कूलों में बिना भेजे पुश्तैनी धंधों से जोडा जाए तो किसे दोष दें?

सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाएं सरकार के साथ मिल कर कई योजनाओं को गावों में चलाती हैं जिसके चलते बेडियों की स्थिति बदले। परंतु बेडियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में संदेह-असंमजस है। दोनों पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहराते हैं। बीच में खाई है, जुडाव नहीं।"यह दरार इस बात की है कि न जाने कितने लोगों ने, समाजसेवी और उद्धारकर्ता के रूप में इन बेडियों से छल किया है.... न जाने कितने लोग इनकी लड़कियों को बहला-फुसलाकर दूसरे शहरों में ले जाकर बेच देते हैं।"(पृ.218) इसीलिए शासन की ओर से बेडियों के उद्धार के लिए चलाई जा रही‘जाबाली योजना’जैसी तमाम योजनाएं विफल हो गई। सामाजिक महिला कार्यकर्ताओं के लिए बेड़नियों के मुंह से‘वे अपना बदन बना रही है’जैसी अविस्वासभरी’टिप्पणी इन्हीं संदेहास्पद स्थिति के कारण निकलती है।

3.आत्मविश्वास की कमी, परंपरा एवं सामाजिक दबाव -

बाहरी समाज में जैसे स्त्री-पुरुष वैसे ही बेडियां समाज में स्त्री-पुरुष है परंतु दोनों की मानसिकता में बडा अंतर है। सामाजिक स्थितियां, दबाव ,परंपराएं और आत्मविश्वास की कमी, इन पुरुषों और औरतों को दयनिय स्थिति से उभरने नहीं देते। बेडियां जाति का पुरुष पूर्णतः अकर्मण्य है वह अपनी बीवी, बहन, मां, बेटी से कमाया खाना खाएगा, केवल खाएगा नहीं अपितु शराब एवं अन्य गतिविधियों में उसकी कमाई रकम को उडाएगा। उसका मन कभी भी मेहनत और स्वाभिमान की जिंदगी नहीं चाहता। उसके परोपजीवि अस्तित्व को ढोते-ढोते औरतें थक जाती है पर कभी भी दायित्व से पलायन नहीं करती।
          बेड़नियां ठाकुर, जमींदार एवं धनिकों से परिवार के पालन-पोषण के लिए धन तो पाती ही है साथ ही जमीनें भी पाती है। लेकिन बेडिया पुरुष और न औरत अपनी खेती में पसिना बहाकर ईमान की रोटी खाना चाहते हैं। केवल औरत का शरीर बेचकर आराम से पैसा कमाने की आदत उनको सुख भोगी बनाती है मेहनत-मशक्कत कर दस-बीस रुपए कमाने की अपेक्षा थोडे समय में हजारों रुपए कमाने का शॉर्टकट पुरुष व औरतें चुनती है जो उने आत्मविश्वास की कमी को दिखाता है।

बेडिया समाज में सालों से देह विक्रय ,चोरी एवं नृत्य से जीवनयापन की परंपरा है, उसे छोड़ कर नवीन जीवन शैली अपनाने की उसकी इच्छा नहीं है। यह जनजाति अपराधी प्रवृत्ति की है और अपराध पैसौं के लिए किया जाता है। जहां पर इन्हें पैसा उपलब्ध होता है वहां अपराध और जीवन की सुरक्षा भी मिलती है; अतः बेड़नियां ताकतवर-धनिकों की रखैल बन कर रहना पसंद करती है। वैसे उनके रीति-रिवाज में विधिवत‘सिर ढकने’की प्रक्रिया कर बाकायदा रखैल बनने की इजाजत भी दी जाती है। परंपरा, आर्थिक दबाव एवं सामाजिक दबाओं के चलते वह देह व्यापार करती है। बेड़नियों ने पाया कि "उनके अपने समुदाय के पुरुष न तो उनका सहारा बन पाते हैं और न उन्हें सुरक्षित जीवन दे पाते हैं तो उन्होंने पूंजिपतियों की संपत्ति के रूप में जीना स्वीकार किया। वे जानती थी कि एक धनवान अपने धन की रक्षा हर हाल में करता है। उन्हें यह सौदा महंगा नहीं लगा क्योंकि उन्हें बदले में रहने के लिए एक निश्चित स्थान, जीवनयापन के लिए आर्थिक स्रोत और सुरक्षा के लिए एक संरक्षक मिल रहा था।"(पृ.139.) इन सारी स्थितियों के बावजूद बेड़नियां संसार और धनिकों को लूटने की मंशा नहीं रखती। देह व्यापार उन पर थोपा गया है, जिससे बाहर निकलना उनके लिए बहुत मुश्किल है।

4.बाजारवाद -

आधुनिक युग में खरीद-फरोख जोर-शोर से शुरू है। लोग अपनी संस्कृति, देश, सभ्यता, आत्मा.... को बेचने पर उतारू है। पैसों की ताकत बढ़ती जा रही है और उसके लिए कोई कुछ भी करने के लिए तत्पर है। अर्थात् बाजारवादी प्रवृत्ति हर कहीं देखी जाएगी। बेडिया समाज को भी अपने पेट को पालने के लिए और कुछ भौतिक सुविधाओं को जुटाने के लिए पैसों की जरूरत होती है। उनके पास न जमीन-जायदाद, न नौकरी, न शिक्षा, न सत्ता.... पैसा पाए तो कैसै पाए? पैसा पाने के इनके जरिए अपराध की परिधि में आते हैं पर इन्होंने इसे परंपरा मान किया, कर रहे हैं।
           नृत्य, शरीर विक्रय, चोरी और कभी-कभार झूठी गवाहियां इनके आय का स्रोत हैं। इसमें भी प्रथम तीन ही इनकी पैसों की नैया को पार लगा सकते हैं। नृत्य के पश्चात् देह विक्रय और चोरी पकडी जाए तो देह परोसकर छुटकारा पाना इनकी तकनिक है। बात घुम-फिरकर शरीर विक्रय तक पहुंचती है। हर बेड़नी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष इस धंधे में लिप्त है और पैसा कमाना चाह रही है। धनिक पैसा फेंक इन पर यौनत्याचार करते हैं तथा अनैसर्गिक यौन संबंध रखते हैं। योनी मैथुन, गुदा मैथुन, मुख मैथुन करने की इजाज़त देती बेड़नियां नरम बिस्तर से लेकर चलती गाडियों में भी यौनत्याचार सहन करती है; केवल पैसों के लिए। इन संबंधों से जो बच्चे जन्मते हैं उनके बाप नहीं होते, जो असली बाप है वह इन्हें अपने बच्चे नहीं मानता। यहां तक असली बाप का बेड़नियों को पता भी नहीं होता। उनका कहना है, "का जाने.... पतो नईं! बाकी जब हमने अपने मोडा खों नांव सकूल में लिखाओ रहो सो उसे मोडा को बाप को नांव सोई लिखाने परो....सो हमने ऊ को नांव रुपैया लिखा दयो....।"(पृ.155) बच्चों के बाप का नाम रुपैया और पैसा कितनी बडी विड़बना है आजाद भारत देश के आजाद देसवासियों की।

बाजारवादी संस्कृति में हमेशा व्यवसायी व्यक्ति लाभ में रहता है परंतु यहां व्यावसायिक विरोधाभास दिखाई देगा। "अन्य व्यवसाय में विक्रेता प्रथम दर्जे में तथा ग्राहक दोयम दर्जे में होता है, किंतु इस व्यवसाय में ग्राहक रूपी पुरुष प्रथम दर्जे में तथा विक्रेता रूपी स्त्री दोयम दर्जे में होती है।"(पृ.226)

5.बेटी के जन्म का स्वागत -

जिस देश की तमाम जनता इधर स्त्री भ्रूण हत्या करने पर तुली है उसी देश की एक जनजाति बेडिया स्त्री जन्म का स्वागत बडी खुशी के साथ करती है। उसका कारण है इस जाति में लड़की ही परिवार का मुख्य आधार और पालनकर्ता होती है। इनमें पुरुष शराबी, जुआरी, अकर्मण्य रहा है; अतः उसे नकारा जाता है और लड़की का स्वागत किया जाता है। शरद सिंह को इनके वास्तव का जब पता चलता है तब वे चकित होती हैं। और इसे पढ़ पाठक के नाते हम भी दंग रह जाते हैं। भारतीय समाज में "सच तो यह है कि स्त्री का जन्म एक अवांछित घटना होती है। समाज की व्यापारिक बुद्धि स्त्री के जन्म को साहूकार के खाते में चढे हुए एक ऐसे कर्ज के रूप में देखती है जिस पर ब्याज-पर-ब्याज लगते जाना है।"(पृ.163) कहां आम भारतीय समाज और कहां बेडिया। वैसे बेडियां परिवार में मुख्य आर्थिक स्रोत लड़कियों की खूबसूरती-यौवन से जुड़ने के कारण यह दृष्टिकोण है। जो भी हो इससे खुशी होती है कि कहीं तो स्त्री जन्म का स्वागत हो रहा है। पर स्वागत के कारणों को खंगालने से पीडा और दुःख होता है। इससे यह सीख मिल सकती है कि बेटी को जिंदा रखना है, नारी जाति का अस्तित्व बनाए रखना है, स्त्री-पुरुष समानता लानी है तो औरत ही आगे आकर वह परिवार के आर्थिक स्रोतों का भार वहन करें, ईमानदारी से, और परिवार में इज्जत पाए। ऐसी स्थिति में नारी सम्मान का सूरज उग सकता है।           
            लेखिका ने बेडिया समाज में जन्मी लड़की के स्वागत के कारणों पर प्रकाश डाला है,"आज एक बेड़नी उस समय फूली नहीं समाती जब वह एक स्त्री शिशु को जन्म देती है। वह और उसके परिवार जन स्त्री-शिशु के जन्म पर खुशियां मनाते हैं। इसका सबसे बडा कारण यह है कि एक बेड़नी को अपने बेटी के भविष्य में ही अपना सुरक्षित भविष्य दिखाई देता है।"(पृ.167)

6.क्या किया जाए ?

‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास को पढ़ने के पश्चात् कोई भी नहीं चाहेगा कि भारत में ऐसी जनजातियां बची रहें। अपेक्षा की जाएगी बदलाव की। ऐसे जातिगत लोगों के जीवन में सूरज की किरणें उगे और यह भी राष्ट्रीय प्रवाह में शामिल होकर आजाद देश के निवासी होने के नाते आजादी-अधिकारों को चखें। इन परिवारों के बच्चे जब पढ़-लिख कर आगे बढेंगे तभी यह संभव होगा। पर इनके लिए पढाई का रास्ता आसान नहीं और स्पर्धात्मक युग में टिक पाना मुश्किल भी है। परंतु आज सरकारी नौकरियों की कमी तथा प्रायव्हेट नौकरियों की बढोत्तरी आशावादी चित्र दिखा रही है। इन बच्चों के लिए सरकारी तौर पर पढाई के लिए हर सुविधा मुहैया की जाए जिससे वे शिक्षा की चरम को छूकर अपने टैलेंट के बल पर विभिन्न क्षेत्रों में झंडे गाढ़ सके। प्रायव्हेट क्षेत्र में टैलेंट को तराशा जाए तो एक से दो, दो से चार, चार से आठ.... में परिवर्तन की लहर उठ सकती है।

शरद सिंह ने‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास में बेडिया समाज में औरतों द्वारा देह व्यापार करने के कुल पांच प्रेरक तत्वों का जिक्र किया है -

1. देह व्यापार की परंपरा,

2. वातावरण एवं सामाजिक दशाएं,

3. पुरुषों की अकर्मण्यता,

4. कमजोर आर्थिक स्थिति,

5. कमाई के आसान रास्ते के प्रति रुझान।

लेखिका द्वारा दिए गए इन पांच तत्वों को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यह उपन्यास सरकार एवं सामाजिक कार्य करने वाली संस्थाओं के लिए मार्गदर्शक तत्वों को बताता है। कुछ सरकार, कुछ समाज और कुछ बेडियां एक-दूसरे के प्रति विश्वास से हाथ बढाए तो परिस्थितियां बदल सकती है। पिछडी जनजातियां लगन विश्वास से शिक्षा प्राप्त करें बडी आसानी से अपने-आपको परिवर्तित कर सकते हैं। पिछले पन्नों में दबे सामाजिक हिस्से को जब तक मुखपृष्ठ पर लेकर नहीं आएंगे तब तक इन्हें मनुष्य माना नहीं जाएगा; अतः उठकर मुखपृष्ठ की ओर चलने का सफर शुरू करना अत्यंत आवश्यक है।

उपसंहार -

‘पिछले पन्ने की औरतें’शरद सिंह द्वारा लिखित उनका पहला खोजपरख उपन्यास है जिसमें सामाजिक स्तरों में दबी-कुचली और पिछले पन्नों में गई औरतों को मुखपृष्ठ पर लाने का सफल प्रयास किया है। तीन भागों और सत्ताईस उपभागों में लिखे गए उपन्यास में कोई नायिका नहीं, हर हिस्से में स्त्री पात्र बदलता है। किसी स्त्री की वेदना एवं पीडा को रिर्पोताज शैली में लेखन करना लेखिका की कुशलता का परिचायक है। विभिन्न औरतों से होकर संपूर्ण भारतीय औरतों के अस्तित्व, अधिकार पर लेखिका ने प्रकाश डाला है। औरतों को अपने अस्तित्व की तलाश करनी होगी। पुरुष उसे तलाशने में मदत करने का नाटक कर भटका सकता है, अतः उसकी मदत के बिना‘आधी दुनिया’होने के नाते वे अपनी‘आधी दुनिया’की हकदार है, उसे पाए। औरत का अस्तित्व पुरुष के समकक्ष है इसे कभी न भुले।

‘पिछले पन्ने की औरतें’उपन्यास में चित्रित संपूर्ण औरतों के मन में सादगी भरा जीवन जीने की मंशा है। उन्हें भी लगता है कि उनका भी एक पति और घर हो, उनके बच्चों को उनके पिता के नाम मिले, वे पढे-लिखे। बच्चों की प्रगति अपनी आंखों से देखें। लड़की और लड़कों की शादी अच्छे घरों में हो....। इन मंशाओ-इच्छाओं को पूरा करने के लिए बेड़नियां प्रयासरत रहती है परंतु उपन्यास से यह भी तथ्य बाहर निकलता है कि सारे प्रयासों के बावजूद उनके बच्चे उसी दलदल में दुबारा फंस जाते हैं। इतिहास और परंपरा उनका पीछा नहीं छोड़ती। उनकी स्थिति सूरदास के पंछी जैसे होती है-

"अब मेरा मन अनंत कहां सुख पावै।

जैसे उडि जहाज पै पंछी, फिर जहाज पर लौट आवै।"

शरद सिंह ने पात्रों का दुबारा दलदल में फंसने का वर्णन किया है परंतु कुछ पात्र सलामति से दबाओं और परंपराओं को तोड़कर आत्मविश्वास से उडान भरने में सफलता हासिल करने का भी चित्रांकन किया है। जीवन में पिछले पन्नों से मुखपृष्ठों पर स्थान पाना है तो जीवट, पेशन्स, आत्मविश्वास, ईमानदारी और ज्ञान की जरूरत है; अगर बेड़नियां यह सब कुछ पाए तो वे‘पिछले पन्नों की औरतें’नहीं कही जाएगी।

आधार ग्रंथ –

पिछले पन्ने की औरतें (उपन्यास) - शरद सिंह

सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, तृतीय संस्करण - 2010

पृष्ठ संख्या - 304, मूल्य-395 रुपए
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डॉ. विजय शिंंदे


डॉ.विजय शिंदे
देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद.
फोन 09423222808
ई-मेल drvtshinde@gmail.com

पुनः साभार रचनाकार

समीक्षा आलेख पर कुछ टिप्पणियां.......
Drbanavle Navle8:59 pm

sir, your said article is a catalyst of the emancipation and empowerment of women unto this last. it is both an antodite and panacia to the trauma of women.

VIJAY SHINDE11:32 am

डॉ. नवले जी आपकी टिप्पणी उचित है महिला जगत् की स्थितियां सच में सोचनिय है और इस पर उचित कदम उठाना भी जरूरी है। पुरुषों ने हमेशा उन्हें इस्तेमाल किया है इतना भी अगर वे जाने तो भी काफी है।

VIJAY SHINDE6:53 pm

प्रस्तुत समीक्षा शरद जी आप तक पहुंची और आपने इसे पढा धन्यवाद। वैसे आपने 'पिछले पन्ने की औरतें' में जो भी लिखा है वह वास्तववादी तो है ही पर इसमें वर्णित हर प्रसंग के साथ आपका जुडाव है यह विशेष माना जाएगा। दूसरी बात एक समाजशास्त्रिय समाज सेवी के नाते आपका मूल्यांकन उपन्यास को और अधिक ताकतवर बनाता है। आपसे हमारा आगे भी संपर्क बना रहेगा।

रजनी मल्होत्रा नैय्यर1:58 pm

शरद जी को उनकी लेखनी के वजह से ही जानती हूँ ,उनकी रचनाओं में मौलिकता व् आधुनिक समाज के दर्पण की झलक है | आगे भी पढूंगी उन्हें शुभकामनायें |

VIJAY SHINDE11:09 am

रजनी जी प्रणाम। आपका संदेश शरद जी के पास पहुंच जाएगा। आपने उचित फर्माया 'उनकी रचनाओं में मौलिकता व आधुनिक समाज के दर्पण की झलक है।' हमारा और अपका संपर्क बना रहेगा और शरद सिंह जी के अन्य रचनाओं पर भी चर्चा करेंगे। स्नेह बनाए रखें।

rekha chhari9:59 pm

मुझे शरद जी की इस पुष्तक को पढ़ने का गौरव प्राप्त हुआ और उसमें विजय जी की समीक्षा पड़कर कहा जा सकता है कि बड़ी ही गहराई और मेहनत से तैयार किया गया है ...दोनों को सदर साभार ....


अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद के जन्मदिवस (23 जुलाई ) पर पुण्य स्मरण - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

    यूं तो चन्द्रशेखर आजाद का जन्म उत्तर प्रदेश के अलीराजपुर जिला जो अब चन्द्रशेखर आजादनगर कहलाता है, के भाबरा गाँव में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था। किन्तु चंद्रशेखर आजाद ने एक निर्धारित समय के लिए बुंदेलखंड के झांसी, उत्तरप्रदेश को अपना गढ़ बना लिया। झांसी से पंद्रह किलोमीटर दूर ओरछा, मध्यप्रदेश के जंगलों में वह अपने साथियों के साथ निशानेबाजी किया करते थे।  चंद्रशेखर आजाद अचूक निशानेबाज होने के कारण दूसरे क्रांतिकारियों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ पंडित हरिशंकर ब्रह्मचारी के छ्द्म नाम से बच्चों के अध्यापन का कार्य भी करते थे। वह धिमारपुर गांव में अपने इसी छद्म नाम से स्थानीय लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हो गए थे। धिमारपुर को स्वतंत्र भारत में आजादपुर के नाम से जाना जाता है।

अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद

     बुंदेलखंड की शान,  भारत की आजादी के लिए शहीद होने वाले सपूत चन्द्रशेखर आजाद के जन्मदिवस (23 जुलाई ) पर .....

चन्द्रशेखर नाम, सूरज का प्रखर उत्ताप हूँ मैं,
फूटते ज्वालामुखी-सा, क्रांति का उद्घोष हूँ मैं।
कोश जख्मों का, लगे इतिहास के जो वक्ष पर है,
चीखते प्रतिरोध का जलता हुआ आक्रोश हूँ मैं।

विवश अधरों पर सुलगता गीत हूँ विद्रोह का मैं,
नाश के मन पर नशे जैसा चढ़ा उन्माद हूँ मैं।
मैं गुलामी का कफन, उजला सपन स्वाधीनता का,
नाम से आजाद, हर संकल्प से फौलाद हूँ मैं।

आँसुओं को, तेज मैं तेजाब का देने चला हूँ,
जो रही कल तक पराजय, आज उस पर जीत हूँ मैं।
मैं प्रभंजन हूँ, घुटन के बादलों को चीर देने,
बिजलियों की धड़कनों का कड़कता संगीत हूँ मैं।

सिसकियों पर, अब किसी अन्याय को पलने न दूँगा,
जुल्म के सिक्के किसी के, मैं यहाँ चलने न दूँगा।
खून के दीपक जलाकर अब दिवाली ही मनेगी,
इस धरा पर, अब दिलों की होलियाँ जलने न दूँगा।

राज सत्ता में हुए मदहोश दीवानो! लुटेरों,
मैं तुम्हारे जुल्म के आघात को ललकारता हूँ।
मैं तुम्हारे दंभ को-पाखंड को, देता चुनौती,
मैं तुम्हारी जात को-औकात को ललकारता हूँ।

मैं जमाने को जगाने, आज यह आवाज देता
इन्कलाबी आग में, अन्याय की होली जलाओ।
तुम नहीं कातर स्वरों में न्याय की अब भीख माँगो,
गर्जना के घोष में विद्रोह के अब गीत गाओ।

आग भूखे पेट की, अधिकार देती है सभी को,
चूसते जो खून, उनकी बोटियाँ हम नोच खाएँ।
जिन भुजाओं में कसक-कुछ कर दिखानेकी ठसक है,
वे न भूखे पेट, दिल की आग ही अपनी दिखाएँ।

और मरना ही हमें जब, तड़प कर घुटकर मरें क्यों
छातियों में गोलियाँ खाकर शहादत से मरें हम।
मेमनों की भाँति मिमिया कर नहीं गर्दन कटाएँ,
स्वाभिमानी शीष ऊँचा रख, बगावत से मरें हम।

इसलिए, मैं देश के हर आदमी से कह रहा हूँ,
आदमीयता का तकाजा है वतन के हों सिपाही।
हड्डियों में शक्ति वह पैदा करें, तलवार मुरझे,
तोप का मुँह बंद कर, हम जुल्म पर ढाएँ तबाही।

कलम के जादूगरों से कह रही युग-चेतना यह,
लेखनी की धार से, अंधेर का वे वक्ष फाड़ें।
रक्त, मज्जा, हड्डियों के मूल्य पर जो बन रहा हो,
तोड़ दें उसके कंगूरे, उस महल को वे उजाड़ें।

बिक गई यदि कलम, तो फिर देश कैसे बच सकेगा,
सर कलम हो, कालम का सर शर्म से झुकने व पाए।
चल रही तलवार या बन्दूक हो जब देश के हित,
यह चले-चलती रहे, क्षण भर कलम स्र्कने न पाए।

यह कलम ऐसे चले, श्रम-साधना की ज्यों कुदाली,
वर्ग-भेदों की शिलाएँ तोड़ चकनाचूर कर दे।
यह चले ऐसे कि चलते खेत में हल जिस तरह हैं,
उर्वरा अपनी धरा की, मोतियों से माँग भर दे।

यह चले ऐसे कि उजड़े देश का सौभाग्य लिख दे,
यह चले ऐसे कि पतझड़ में बहारें मुस्कराएँ।
यह चले ऐसे कि फसलें झूम कर गाएँ बघावे,
यह चले तो गर्व से खलिहान अपने सर उठाएँ।

यह कलम ऐसे चले, ज्यों पुण्य की है बेल चलती,
यह कलम बन कर कटारी पाप के फाड़े कलेजे।
यह कलम ऐसे चले, चलते प्रगति के पाँव जैसे,
यह कलम चल कर हमारे देश का गौरव सहेजे।

सृष्टि नवयुग की करें हम, पुण्य-पावन इस धरा पर,
हाथ श्रम के, आज नूतन सर्जना करके दिखाएँ।
हो कला की साधना का श्रेय जसन-कल्याणकारी,
हम सिपाही देश के दुर्भाग्य को जड़ से मिटाएँ।

 .....यह काव्यांश प्रख्यात कवि श्रीकृष्ण सरल रचित महाकाव्य " चन्द्रशेखर आजाद " से साभार ।

बुंदेलखंड के ओरछा, मध्यप्रदेश स्थित आज़ाद स्मारक # साहित्य वर्षा


Wednesday, July 17, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 58 .... एक विविध शिल्पी कवि सी.एल. कंवल - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि सी.एल.कंवल पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

एक विविध शिल्पी कवि सी.एल. कंवल

                   - डॉ. वर्षा सिंह

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परिचय :
नाम  :- सी. एल. कंवल
जन्म :-  01 फरवरी 1953
जन्म स्थान :- खुरई, जिला सागर, म.प्र,
माता-पिता :- श्रीमती सरजू एवं श्री कुंजीलाल
शिक्षा  :- बी.ए., बी.टी.
लेखन विधा :- काव्य।
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काव्य एक ऐसी विधा है जिसने संवेदनशील व्यक्तियों का हमेशा मनमोहा है। सागर नगर में कवियों की एक समृद्ध परम्परा चली आ रही है। उर्दू के साथ ही हिन्दी (खड़ी बोली) के कवियों ने सागर नगर की साहित्यधारा को सदैव ऊर्जावान बनाए रखा है। इसी क्रम में तेजी से उभरता हुआ नाम है कवि सी.एल. कंवल का । सागर जिले की खुरई तहसील में श्री कुंजीलाल एवं श्रीमती सरजू के घर 01 फरवरी 1953 को जन्मे सी.एल. कंवल को अपने माता-पिता से जो संस्कार मिले उन संस्कारों ने उनके भीतर साहित्य के प्रति रुझान को न केवल जन्म दिया अपितु सृजनधर्मिता में भी प्रवृत्त किया। अपनी औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने बी.टी. किया। भारतीय स्टेट बैंक से शाखा प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त सी.एल. कंवल ने औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त जैन धर्म एवं गांधी दर्शन का अध्ययन किया। उन्होंने अखिल भारतीय दिगम्बर जैन परिषद् परीक्षा बोर्ड दिल्ली से जैन धर्म परीक्षा उत्तीर्ण की।  सन् 1984 में डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर द्वारा दिल्ली में आयोजित दलित साहित्य अकादमी  द्वारा फैलोशिप प्राप्त की। सन् 1984 से सागर नगर में निवासरत सी.एल. कंवल बैंक की अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर काव्यसृजन करते रहे। सेवानिवृत्ति के उपरांत साहित्यक्षेत्र में उनकी सक्रियता बढ़ गई है।

कवि सी.एल. कंवल मानते हैं कि साहित्यसृजन विचार क्षमता बढ़ाता है तथा जीवन को समझने में और अधिक सहायता करता है। संभवतः इसीलिए उनकी ग़ज़लों में जीवन की सरसता और विडम्बनाओं के प्रति विचारों की समान भाव से  सहज अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी ग़ज़लों में श्रृंगार रस की मधुरता भी है, आस्था एवं विश्वास भी और अव्यवस्थाओं के विरुद्ध ललकार भी। वे उन लोगों से भी मुख़ातिब होते हैं जो जरा-जरा सी बात पर हिम्मत हारने लगते हैं और यह मान बैठते हैं कि बातचीत अथवा सहजता से कोई मसला हल नहीं हो सकता है। ऐसे लोगों को सम्बोधित करते हुए वे कहते हैं-

विश्वास को बुनियाद बना कर तो देखिए
उन दुश्मनों से हाथ मिला कर तो देखिए
टूटेंगी अपने-आप ही नफरत की दीवारें
इंसानियत को दिल में जगाकर तो देखिए
हम और तुम का फासला मिट जाएगा खुद ही
ये मज़हबों की होड़ मिटा कर तो देखिए
आनन्द स्वर्ग का यदि लेना है आपको
रोते हुए बच्चे को उठाकर तो देखिए
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

धर्म के नाम पर वैमनस्य फैलाने वाले न तो कभी समाज का भला कर सकते हैं और न कभी अपनों की भला कर सकते हैं। कवि कंवल मानते हैं कि यदि गंभीरता से प्रयास किया जाए तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है और तमाम वैमनस्य को मिटाया जा सकता है। यह बानगी देखिए जिसमें वे फिरकापरस्तों से प्रश्न कर रहे हैं-

तुमने उठाए हाथ में हथियार किस लिए
अपनों पे कर रहे हो भला वार किस लिए
मंदिर कहीं बना है तो मस्जिद कहीं बनी
इन दोनों के दरमियान ये दीवार किस लिए
खुद की ख़बर नहीं है न औरों की ख़बर है
पढ़ रहे हो फिर यहां अखबार किस लिए
हद से गज़र रहे हो सरहदों के वास्ते
गैर की जमीन पर है अधिकार किस लिए
मुद्दा बड़ा है देश का मिट जाएगा ‘कंवल’
हल करने को बैठे हैं हम चार किस लिए

किसी भी व्यक्ति को उसकी अच्छाईयां ही बड़ा बनाती हैं। आर्थिक सम्पन्नता नहीं अपितु मिलनसारिता, नेकनीयत और एकता की भावना व्यक्ति में बुनियादी गुण होने चाहिए, तभी वह दूसरों की सहायता करने में सक्षम हो सकता है। सी.एल. कंवल की यह रचना इसी भावना को सामने रखती है-

रुतबा, गुरुर, हैसियत, ये शान किस लिए
नेकियां न  हों  जहां,  ईमान  किस लिए
बांटा नहीं किसी को कमाने के बाद भी
घटता ही जा रहा है ये ज्ञान किस लिए
सोने की थालियों में हों चांदी की रोटियां
भूखे ने मांगा रब से वरदान किस लिए

कवि कंवल ने ग़ज़लों के साथ ही अतुकांत कविताएं, दोहे और मुक्तक भी लिखे हैं। उनकी छंदमुक्त कविताएं सामाजिक सरोकार के और अधिक निकट हैं। इन कविताओं में बिम्ब योजना भी अधिक प्रभावी दिखाई देती है। उदाहरण के लिए ‘रोज देखता हूं’ शीर्षक कविता देखिए -

रोज देखता हूं
एक असहाय दीपक को
अंधेरा निगल रहा है
हम चारपाई पर पड़े
हाथों का सहारा देने में असमर्थ
पलकें मूंद लेते हैं
अत्याचार के नाम पर
अज्ञात भय से सहमें हम
गलियारे में झाड़ू की आवाज ले-ले कर
सुबह होने का अंदाजा भांपते हैं
फिर रह-रह कर आता है ख्याल
दीपक की असहाय अवस्था का
अंधेरे से जूझते रहने की व्यवस्था का
सो रहा हूं
और जाग रहा हूं
उठ-उठकर, कर रहा हूं प्रतीक्षा
नए भोर की
कवि सी.एल. कंवल # साहित्य वर्षा

छंदमुक्त कविताओं में सी.एल. कंवल की एक और कविता है, जिसका शीर्षक है- गंध। इस कविता में गंध को आधार बना कर छूटे हुए गांव की स्म्तियों का गहन आत्मीयतापूर्ण वर्णन किया गया है-

गंध मिट्टी की
पानी के साथ मिल कर
सोंधी हो जाती है।
तब मुझे मेरे गांव की खेती याद आती है।
गंध फूलों की
सुबह-शाम बाग में टहलती है
हौले-होले मेरे मस्तिष्क में
घुल जाती है
एक शंखनाद मन को
झकझोरता है
तब मुझे मदिर की याद आती है।
गंध जली रोटी की
मुझे बहुत भाती है
मेरी भूख और बढ़़ाती है
तब चौके में बैठी
रोटियां बेलती हुई
मुझे मेरी मां की याद आती है।

सी.एल. कंवल के दोहों में प्रकृति के बिम्बों में समाज ओर पारिवारिक संबंधों को संतुलित ढंग से पिरोया गया है। वे अपने दोहों में महुआ, कचनार, कोयल के साथ ही बेटी के महत्व, मां की ममता और महाजन की बदनियती की सहजता से चर्चा करते हैं। गजलों की अपेक्षा दोहों में उनकी पकड़ अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई देती है। ये दोहे इस तथ्य का साक्ष्य हैं -

महुआ महके मेढ़ पर, अंगना में कचनार।
गोरी महके सेज पर , कर सोलह सिंगार।।
कोयल कुहुके बाग में, आम रहे गदराय।
दूर देश के सूअना, चख-चख कर उड़ जाए।।
बेटों से बेटी भली , रखे सभी का ख्याल।
बेटों के मन डोलते, भली लगे ससुराल।।
नजर महाजन की गड़ी, खड़ी फसल पर यार।
पहले सूद वसूल के, राखे असल संवार।।
मां की ममता है बड़ी, बड़ा बाप का प्यार।
जीवन की इस नाव के दोनों खेवनहार।।

एक विविध शिल्पी कवि के रूप में सी.एल. कंवल अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए सागर नगर की साहित्य सम्पदा में अपना उल्लेखनीय योगदान दे रहे है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 17.07.2019)
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Wednesday, July 10, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 57 ... बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, नाटककार एवं लेखक डॉ. आलोक चौबे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि डॉ. आलोक चौबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, नाटककार एवं लेखक डॉ. आलोक चौबे
                                                        -       
                   - डॉ. वर्षा सिंह
                               
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परिचय :- डॉ आलोक चौबे
जन्म :-  20 मई 1979
जन्म स्थान :- ललितपुर ,उत्तर प्रदेश
पिता एवं माताः- श्री प्रताप नारायण चौबे एवं श्रीमती अंजू चौबे
शिक्षा :- मनोविज्ञान तथा पत्रकारिता और जनसंचार में परास्नातक, संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विषय में पीएचडी, उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से स्क्रिप्ट लेखन शिक्षा, भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कोझिकोड से एग्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम अध्ययनरत।
लेखन विधा :- गीत, लेख, नाटक, कहानी, पुस्तक समीक्षा, शोधपत्र।
प्रकाशन :- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
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          सागर नगर की माटी में वह ममता है कि जो भी यहां आता है, वह यहीं का हो कर रह जाता है। अनेक साहित्यकार जो प्रदेश के दूसरे जिलों अथवा देश के दूसरे प्रदेशों से सागर आए, शीघ्र ही सागर उनकी कर्मभूमि अर्थात् सृजनभूमि बन गई। 20 मई 1979 को उत्तरप्रदेश के ललितपुर में जन्मे डॉ आलोक चौबे विगत सन् 2002 से सागर में निवासरत हैं। यह कहा जा सकता है कि सागर उनकी वास्तविक कर्मभूमि है। अपने पिता श्री प्रताप नारायण चौबे एवं माताश्री अंजू चौबे से मिले संस्कारों ने उन्हें अध्ययनशीलता का गुण प्रदान किया। उन्होंने मनोविज्ञान तथा पत्रकारिता और जनसंचार में डबल एम. ए. किया। इसके बाद मनोविज्ञान में ही विशेष अध्ययन एवं शोधकार्य करते हुए संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विषय में पीएचडी उपाधि प्राप्त की। लेखन की रुचि ने डॉ आलोक चौबे को उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से स्क्रिप्ट लेखन शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा दी। आज भी वे भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कोझिकोड से एग्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम अध्ययनरत हैं।
             बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ आलोक चौबे आकाशवाणी सागर से कैजुअल अनाउंसर के रूप में जुड़े। सागर नगर की चर्चित नाट्य संस्था अन्वेषण थिएटर ग्रुप के सचिव रहे। चाइल्ड राइट्स ऑब्जर्वेटरी मध्य प्रदेश, भोपाल के जनरल बॉडी मेंबर, पब्लिक रिलेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया के सदस्य तथा सोसाइटी फॉर आइडियल ग्लोबल नीड्स के अध्यक्ष हैं। यूनिसेफ, उत्तर प्रदेश में राज्य संचार सलाहकार के तौर पर भी काम कर चुके हैं। अपने लेखन एवं सृजन की विविधता के अंतर्गत डॉ आलोक चौबे ने कई राज्यों और संस्थाओं की योजनाओं की संचार सामग्री का निर्माण किया। उन्होंने बीबीसी मीडिया के उपक्रम बीबीसी मीडिया एक्शन के साथ भी स्वास्थ्य संचार परियोजना में कार्य किया। वे सागर के शहीदों पर केन्द्रित ‘‘हम भूल न जाएं उनको’’ स्मारिका का संपादन कर चुके हैं जिसके अब तक दो संस्करण सन् 2004, 2014 में  प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. आलोक चौबे लेख भी लिखते हैं। सन् 1999 से मनो-सामाजिक-राजनीतिक और संचार विषयों पर देश के 15 से अधिक राज्यों के अखबारों में सम्पादकीय पृष्ठों पर उनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं।
            भ्रमण मनुष्य की चिंतन क्षमता को नए आयाम प्रदान करता है। उसे नवीन अनुभवों से जोड़ता है। डॉ. चौबे के लेखन में अनुभवजन्य विविधता मिलती है। इसका कारण है कि वे अब तक बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हिमाचल, उत्तरांचल, महाराष्ट्र ,हरियाणा, दिल्ली, पंजाब आदि राज्यों के शासकीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ कार्य करते हुए सैकड़ों गांवों की सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक विविधताओं से साक्षात्कार कर चुके हैं। इसके साथ ही वे मंचों पर काव्यपाठ करते हैं। इसी तारतम्य में वे विभिन्न प्रदेशों के कवि सम्मेलनों, मुशायरों में काव्यपाठ कर चुके हैं। जहां तक प्रसारण की बात है तो डॉ. चौबे की रचनाओं का आकाशवाणी छतरपुर, सागर और झांसी से प्रसारण हो चुका है।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

              डॉ. आलोक चौबे की पत्नी प्रिया जैन भी लेखन में रुचि रखती हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ चौबे एवं उनकी पत्नी प्रिया जैन ने ‘‘टर्निंग पॉइंट’’ नाटक मिल कर लिखा था जिसका मंचन थर्ड बेल थिएटर ग्रुप द्वारा किया गया था। डॉ चौबे ने कई नुक्कड़ नाटक भी लिखे जिनका प्रदर्शन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर किया जाता रहा है। वे नाटकों में अभिनय भी कर चुके हैं। उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन, निर्माण एवं निर्देशन भी किया जिनमें प्रमुख हैं- लाइफ ऑन लाइन, संभावनाओं का सागर, हंगरमार्च आदि।
          कविता में जब यथार्थ एवं कल्पना का सुंदर समन्वय हो तो उसकी भाव संपदा द्विगुणित हो जाती है। ऋतुओं का अनुभव तो सभी करते हैं किन्तु एक कवि जब ऋतुओं का अनुभव करता है तो उसके ऋतुवर्णन में जीवन का दर्शन और सौंदर्य निखर आता है। जैसे डॉ आलोक चौबे जब वर्षा ऋतु को अपनी कविताओं में उतारते हैं तो उसमें बारिश की एक अलग ही छटा दिखाई देती है जो ऋतु की सरसता अनुभव कराते हुए एक पल ठहर कर सोचने को भी विवश करती है। उदाहरण के लिए उनकी यह कविता देखिए -
गीले बादल आसमान में नज़र आने लगे ..
अब बारिश होगी...मिट्टी में सोंधी-सोंधी खुशबू आएगी...
नयी कोंपलें निकलेंगी ....नए पत्ते निकलेंगे ...
चारों तरफ फैलेगी हरियाली चादर .....
और मन भावन होगा सब कुछ....
धरती की प्यास बुझेगी..../किसानांं की आस जगेगी.. ..
बच्चे कागज़ की नाव चलाएंगे...
नवयुगल भीगकर बारिश में.../प्रेममय हो जायेंगे...
घर के आंगन में पानी की बूंदे अठखेलियां करेंगी...
चलो इन खूबसूरत लम्हों को सहेज ले....
इन पानी की बूंदों को समेट ले....
ताकि प्यास बुझी रहे../आस जगी रहे .......

           अतुकांत कविताओं के साथ ही मुक्तक के रूप में तुकांत काव्य में भी मौसम की सुंदर व्याख्या करते हैं डॉ आलोक चौबे। यह मुक्तक उल्लेखनीय है-
वारिस सपनों का बनाता है कोई
वसीयत गमले में उगाता है कोई
सांसों से सींच दूं अगर नींदों को
बादलों से प्यास बुझाता है कोई
डॉ. आलोक चौबे

           कवि डॉ. आलोक चौबे की रेलवे स्टेशन पर एक लम्बी कविता है जिसमें उन्होंने स्टेशन की आपाधापी भरी गतिविधियों का सजीव चित्रण किया है। रेलवे स्टेशन यूं भी मनोभावों का एक ऐसा जमावड़ा अपने आप में समेटे होता है जिसमें मिलन का सुख तो विदाई का दुख, परिचितों की भीड़ तो अपरिचितों का हुजूम, मन के एकाकीपन से भीड़ के कोलाहल तक सभी कुछ निबद्ध रहता है। डॉ चौबे की कविता में रेलवे स्टेशन की ये सारी खूबियां दृश्य की तरह उभरती हैं। इस कविता को उनकी प्रतिनिधि कविताओं में गिना जा सकता है-
रंगमंच सा ये स्टेशन
1, 2 3 ए सी , स्लीपर और
जनरल में भी बंटा स्टेशन
करता है पर भेद भाव भी
आदमी आदमी में स्टेशन
पैसे की माया है सबकुछ
जान गया है अब स्टेशन
जाने कितने एकाकों का
घर परिवार है ये स्टेशन
जाने कितने घर परिवारों
को मिलवाता है स्टेशन
जाने कितने मजदूरों को
काम दिलाता है स्टेशन
मैं भी अक्सर रहता हूं साथी
इस स्टेशन , उस स्टेशन।

              समाज में घटित होने वाली जघन्य घटनाएं कवि के मन को खुरचती हैं और इससे उत्पन्न पीड़ा प्रश्न करती है कि अपराध का मूल कारण क्या है? समाज में बढ़ते जा रहे लैंगिक अपराधों का स्मरण कराते हुए कवि आलोक चौबे ने एक लम्बी कविता लिखी है ‘‘दुष्कर्मी कौन?’’। इस कविता का एक अंश देखिए-
दुष्कर्मी कौन?
वो जिसने बुरा कर्म किया
उनका क्या जो व्यवसाय करते हैं
मसालेदार ख़बरों का ...
और परोसते है नारी देह को
उपभोग की वस्तु की तरह .....
इस अपाहिज समाज में ...
नपुंसकता हावी है अब ....
तमाम विकृतियों के तंत्र साथ
राजनीति में, प्रशासन में, न्याय में
और आदमी में भी ...
कहीं नारीत्व लजा रहा है स्वयं को
और पुरुषत्व वो तो जैसे बचा ही नहीं
वीरो की इस धरा पर ..... दुष्कर्मी कौन?
सिर्फ वो जिसने बुरा कर्म किया
वो क्यूं नहीं जो इन कर्मो को
प्रेरित करता है ...
उकसाता है कुत्सित विचार
और नहीं रहता सजग ...
कि कहीं कोई विकृत मानसिकता का पुरुष
मासूम मुस्कान न छीन ले किसी गुडिया की .....
अब नहीं कोई निर्भया सब भय में है?
क्यूंकि हम कोई सुकर्म भी
नहीं करते ,मतलबपरस्ती हावी है
व्यक्ति पर, समाज पर और तंत्र पर
हम सब पर .......
तो दुष्कर्मी कौन? तो दुष्कर्मी कौन?? तो दुष्कर्मी कौन???

               डॉ. आलोक चौबे सागर नगर के वे साहित्यकार हैं जो अपनी विविधतापूर्ण लेखनी, संवेदनाओं की धनी कविताओं एवं कटाक्ष करते नाटकों से हिन्दी साहित्य संपदा में निरंतर श्रीवृद्धि कर रहे हैं। उनका लेखन उन्हें एक अलग पहचान देने में पूर्ण सक्षम है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 10.07.2019)
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