Friday, August 28, 2020

सागर : साहित्य एवं चिंतन 71| डॉ. राजेश दुबे : कविता और व्यंग्य के साहित्यकार | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार डॉ.राजेश दुबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

            डॉ. राजेश दुबे : कविता और व्यंग्य के साहित्यकार
                        - डॉ. वर्षा सिंह
                                         
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परिचय :- डॉ. राजेश दुबे
जन्म :-  01 जुलाई 1953
जन्म स्थान :- सागर
माता-पिता :- श्रीमती राजेश्वरी दुबे एवं श्री चन्द्र कुमार दुबे
शिक्षा :- एम.ए., पीएच.डी.
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन :-  तीन पुस्तकें प्रकाशित
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     सागर शहर का हिन्दी साहित्य न केवल समृद्ध है, बल्कि निरंतर ऊर्जावान है। कवियों और लेखकों की लेखनी से सागर की साहित्यिक भूमि किसी उपवन की तरह शब्दों के नैनाभिराम दृश्य और भावनाओं की सुगंध से सुसज्जित रहती है। अनेक नवोदित साहित्यकारों ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए यहां श्रमसाघ्य लेखन किया है। इसी संदर्भ में कवि एवं लेखक डॉ. राजेश दुबे का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने अपनी तीन पुस्तकों के प्रकाशित होते-होते सागर के साहित्य जगत में अपनी एक विशेष पहचान बना ली। श्री चन्द्र कुमार दुबे एवं श्रीमती राजेश्वरी दुबे के पुत्र के रूप में 01 जुलाई 1953 को सागर में जन्में राजेश दुबे का एक परम्परावादी एवं धार्मिक विचारों से परिपूर्ण परिवार में लालन-पालन हुआ। आगे चल कर उन्होंने हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। इसके बाद ‘प्रेमचंद परम्परा और वर्तमानकालीन हिन्दी उपन्यास-1960 के उपरांत’ विषय में सागर विश्वविद्यालय से पी. एचडी. की उपाधि प्राप्त की। आजीविका के क्षेत्र में उन्होंने राज्य प्रशासनिक सेवा करते हुए डिप्टी कलेक्टर पद से सेवानिवृत्त हुए।
       डॉ. राजेश दुबे को साहित्य, धर्म दर्शन एवं समाजविज्ञान में सदैव रुचि रही है। जिसकी झलक उनकी कविताओं और लेखों में देखी जा सकती है। व्यंग्य विधा में भी उन्होंने लेखन किया है। डॉ. दुबे की तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें हैं - अमृतराय के उपन्यासों पर समीक्षात्मक पुस्तक ‘हंसते-बोलते दस्तावेज’ व्यंग्य पुस्तक ‘नागफनी’ तथा कविता संग्रह ‘गांव से लौटते हुए’। ‘नागफनी’ में संग्रहीत व्यंग्यों के संबंध में डॉ. राजेश दुबे ने पुस्तक के आमुख में लिखा है कि ‘‘प्रशासनिक सेवा में रहते हुए मैंने आम आदमी के दुखों तकलीफों, उनकी चिन्ताओं को बहुत नज़दीक से देखा, जाना, परखा है। आज भी हमारा किसान और मजदूर वर्ग वैसा ही जीवन जी रहा है जैसे प्रेमचंद के पात्र भोग रहे थे। आज भी घीसू, माधव, होरी, धनिया, गोबर, झुनिया मिलते हैं, बोलते हें, बतियाते हैं। वे आज भी वैसे ही दुखी हैं। वे आज भी वैसे ही सुखी हैं। समयानुसार अंतर आया है तो सिर्फ़ इतना कि झोपड़ियों में कुछ थूनियां लगा दी गई हैं जो झोपड़ी को ज़मींदोज़ होने से बचा रही हैं। देहातों में इमारतों के जंगल उग आए हैं आज भी शोषण की परिस्थितियां और शोषण की कुटिल मनोवृत्तियां पूर्ववत क़ायम हैं।’’
  
     
       समाज में व्याप्त आर्थिक, सामाजिक, वर्गीय विद्रूपताओं को देख कर मन का द्रवित होना स्वाभाविक है। जब मन द्रवित होता है तो लेखनी से शब्द फूट पड़ते हैं और ये शब्द स्वतः अपनी शैली चुनते हुए कभी कविता, कभी कहानी, कभी निबंध तो कभी व्यंग्य लेखों में ढल जाते हैं। डॉ. राजेश दुबे ने भी जो विद्रूपताएं अपनी आंखों से देखी और महसूस कीं उन्हें वे व्यंग्य लेखों में ढलने से नहीं रोक सके। इसीलिए उनके‘‘नागफनी’’ व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य चुटीले और धारदार हैं। इसी संग्रह में एक व्यंग्य लेख है ‘‘चश्मा’’ शीर्षक से। चश्मे को एक क्षेपक की तरह प्रयोग करते हुए डॉ दुबे ने व्यंग्य किया है कि -‘‘आदमी के शरीर पर जो महत्व कपड़ों का है, वही महत्व आंखों पर चश्मे का है। बग़ैर चश्में के आदमी की आंखें सूनी लगती हैं। चश्मा पहने आदमी आदमी-सा दिखता है, बग़ैर ख्श्मा पहना आदमी चौपाए-सा दिखता है। जब आदमी कोरी आंखों से देखता है तब वह ज़्यादा बारीक़ी में नहीं जा पाता है और ज़्यादा नुक़्ताचीनी नहीं कर पाता है, और जो है उसी में प्रसन्न रहता है। यह प्रसन्नता उसके स्वस्थ और दीर्घ जीवन का राज़ है। ऐसे समय वह संतोषी और सुखी रहता है। यही नहीं, वह झगड़े-टंटे से अपनी टांग बचाए रखने का हिमायती होता है। पर जब से उसने चश्मा पहनना शुरू कर दिया है, उसका क़द बढ़ गया है। उसमें सोचने-समझने की क्षमता का विकास हुआ है। अब वह बुद्धू से बुद्धिमान हो गया है। उसकी दृष्टि विकसित हो गई है। परिणामतः उसकी चिन्ताएं बढ़ गई हैं।’’
जहां तक व्यंग्य विधा में पैनेपन और कटाक्ष की क्षमता का प्रश्न है तो यह दोनों अनुभवों की ग्राह्यता से आती है। इस संबंध में हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार डॉ सुरेश आचार्य ने अपने एक अन्य ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में लिखा है कि ‘‘ईमानदार व्यंग्य रचना सदैव सामाजिक यथार्थ से संबंधित होती है। यह कहीं भी अमूर्त नहीं होती बल्कि सदैव सत्य से साक्षात करती चलती है।  दैनंदिन जीवन के कष्ट आडंबर मिथ्याचार और अनीतियों का तिरस्कार, उद्घाटन और उपहास ही उसका लक्ष्य होता है।’’

       डॉ. राजेश दुबे ने व्यंग्य के साथ ही कविताएं भी लिखी हैं। उनका काव्य संग्रह ‘‘गांव से लौटते हुए’’ अतुकांत शैली की कविताओं का संग्रह है। इस संग्रह की भूमिका में समीक्षक एवं साहित्यकार प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने लिखा है -‘‘इस संग्रह की कविताओं में अभिव्यक्ति का टटकापन, भाषा का बांकपन, देशज़ अंदाज़, जीवन की सच्ची अनुभूति, संप्रेषणीयता, कहन की सहजता, बिम्बों और प्रतीकों की नवता, जीवन और प्रकृति की बहुत गहरी जुगलबंदी, मानवता के कल्याण की भावना, विचारशीलता, जीवन का सौंदर्य आदि अनेक बातें डॉ. राजेश दुबे को समर्थ कवि कहे जाने का हक़ देती हैं। निःसंदेह ‘गांव से लौटते हुए’ संग्रह की कविताएं अपनी संरचना, कथन वैविध्य, वैचारिकता, भाषाशिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।’’
      जीवन के अनुभव और वैचारिक सामंजस्य से भरपूर कविताओं में डॉ. राजेश दुबे ने अनुभवजनित अनेक दृश्यों को अपने शब्दों में पिरोया है। संग्रह की पहली कविता ‘‘विश्वास की सोन चिरैया’’ की ये पंक्तियां देखें-
जब से मेरे हाथ
होम करते जले हैं
विश्वास की सोच चिरैया
घायल है
तब से मन में
एक चोर बसने लगा है
लगता है सब लोग
मुझे ठग लेना चाहते हैं।

     बेशक़ वर्तमान परिदृश्य में धोखा, छल, कपट इतना अधिक व्याप्त है कि अविश्वास का प्रतिशत बढ़ चला है। डॉ. राजेश दुबे की एक और कविता है ‘‘हर सुबह अख़बार’’। इस कविता में उन्होंने मानवीय मूल्यों के ह्रास का मार्मिक चित्रण किया है-
हर सुबह
अख़बार के पृष्ठ दर पृष्ठ पर
अंकित
दुष्कर्म, हत्या, ठगी, हिंसा
जाति-सम्प्रदायगत
षडयंत्रों की
कुत्सित उपलब्धियां
बटोर लेती हैं
सारी की सारी सुर्खियां।

       अपने सागर शहर की दशा को बिम्ब के रूप में लेते हुए उन तमाम शहरों पर कटाक्ष करती है उनकी कविता ‘‘आवारा मवेशियों की भीड़’’, जो ऐसी दुरावस्थाओं से गुज़र रहे हैं। कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं-
मेरे नगर में सड़कों पर
आवारा मवेशियों की भीड़ है
आड़े-तिरछे बैठे
मौज मनाते
जुगाली करते
यातायात व्यवस्था को
रौंदते हुए खड़े हैं
इस अव्यवस्था पर
जब कोई
झुंझलाता हुआ
सूचना देता है
तब मवेशियों के समर्थन में
कुछ संगठन आ कर
हमारे ज्ञान में
इज़ाफ़ा करते हैं
मवेशियों की
आज़ादी के प्रश्न पर हमें
नीचा दिखाते हैं।

        डॉ. राजेश दुबे शिद्दत के साथ अपने रचनाकर्म से जुड़े हैं। वे अपने अनुभवों को अपनी गद्य एवं पद्य रचनाओं में उतार देते हैं। यही उनकी लेखनी की विशेषता है। उनका शिल्प एवं भाषा आडम्बरविहीन सरल और सहज होती है। जो उनके लेखन को पठनीय बनाती है। 
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( दैनिक, आचरण  दि.28.08.2020)
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आगडं पर प्र

Friday, August 21, 2020

बुंदेलखंड में हरितालिका तीज | हरितालिका व्रत | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज हरितालिका तीज है और आप सभी को हरितालिका तीज की हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏💐

भाद्रपद अर्थात् भादों मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीज का पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह प्रचलित है कि हरितालिका तीज के दिन सावन में भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था। इसका वर्णन शिवपुराण में भी मिलता है, इसलिए इस दिन सुहागिन महिलाएं मां पार्वती और शिवजी की आराधना करती हैं, जिससे उनका दांपत्य जीवन खुशहाल बना रहे। उत्तर भारत के राज्यों में तीज का पर्व बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। अच्छे वर की प्राप्ति के लिए कुंवारी कन्याएं भी इस दिन व्रत कर सकती हैं।

भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने 107 जन्म लिए थे। धार्मिक मान्यता है कि मां पार्वती के कठोर तप और उनके 108वें जन्म में भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, तब से इस व्रत की शुरुआत हुई। इस दिन जो सुहागन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं, उनका सुहाग लंबे समय तक बना रहता है। यह व्रत धर्म पारायण पतिव्रता सुहागिन औैर कुंवारी कन्याओं का सौभाग्य दायिनी विशेष व्रत है। सुहागिन स्त्रियों अपने पति के लंबी आयु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य व सौभाग्य की कामना के लिए और कुंवारी कन्याएं मनपसंद वर की प्राप्ति की कामना के लिए यह व्रत रखती है। यह पर्व ऐसा है कि इसमें महिलाएं अपने घर जाकर पति के लिए व्रत रखती है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के में पाने के लिए किया था। जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शंकर की अर्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तब से महिलाएं यह व्रत रख रही है। भविष्य पुराण की कथा के अनुसार राजा हिमाचल व रानी मैनी की पुत्री पार्वती जन्मांतर भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कृत संकल्पित थीं। अपने पिता द्वारा भगवान विष्णु से अपने विवाह की बात सुनकर पार्वती ने दुखी मन से यह बात अपनी सखी को बताई। उनकी सखी उन्हें जंगल ले गई, जहां माता पार्वती ने घोर तपस्या शुरू की। उन्होंने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए अन्न-जल का त्याग कर दिया। उन्होंने वर्षाें तक पेड़ों के पत्ते खाकर, तपती धूप में पंचाग्नि साधना कर, ठंड में पानी के अंदर खड़े होकर, सावन में निराहार रहकर और भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को बालू की शिव मूर्ति बनाई। जिसे पत्तों और फूलों से सजाकर श्रद्धापूर्वक पूजन और रात्रि जागरण करती रहीं। इससे भगवान शिव प्रसन्न हो गए और माता पार्वती को पति रूप में प्राप्त हुए। माता पार्वती का व्रत-पूजन व जागरण सहित दुष्कर तपस्या भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को सफल हुई थी, इसलिए इसे तीजा कहते है।

हरितालिका तीज पूजा में इस मंत्र का जाप किया जाता है -
देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
पुत्रान देहि सौभाग्यम देहि सर्व।
कामांश्च देहि मे।।

हरितालिका तीज के दिन हरे वस्त्र, हरी चुनरी, हरा लहरिया, हरी चूड़ीयां, सोलह श्रृंगार , मेहंदी, झूला-झूलने की परंपरा भी है। इस दिन लड़कियों के मायके से श्रृंगार का सामान और मिठाइयां आती हैं। नवविवाहिताओं के लिए बहुत खास होता है। महिलाएं इस दिन गीत गाती है और झूला झूलती है।

बुंदेलखंड में भी हरितालिका तीज मनायी जाती है। इस दौरान पूजा स्थल पर भगवान के लिए छोटा झूला स्थापित करके उसे आम या अशोक के पल्लव और रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है. इसे फुलेरा कहते हैं। जिसके घर में फुलेरा बंधता है वहां मुहल्ले की महिलाएं एकत्रित हो कर पूजन, भजन गायन और रात्रि जागरण करती हैं। सभी महिलाएं शिव-पार्वती का स्एमरण करते हुए मधुर स्वर में लोकगीत गाती हैं। इस अवसर पर तृतीया देवी यानी तीजा माता से जुडे़ खास तरह के लोकगीत गाए जाते हैं, जिन्हें तीजा गीत भी कहा जाता है। एक बानगी देखिए -

दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

निरजल व्रत मैय्या मैंने राखो
मों में अन्न तनक नईं डारो
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

अपनो साज सिंगार करो है
तुम्हरो साज सिंगार करो है
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

माहुर पांव लगा रई सखियां
कजरा कारो लगा लौ अंखियां
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

गौरा पूजन करबे चलत हैं
शंकर जू खों नाम जपत हैं    ‎
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

सागर में भी हरतालिका तीज या हरियाली तीज बहुत ही श्रद्धा के साथ परम्परागत तरीके से मनाई जाती है। फुलेरा के नीचे विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं  कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।
पूजन सामग्री में विशेष रूप से निम्नलिखित पदार्थ आवश्यक होते हैं -
1- फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।
2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।
3- केले का पत्ता।
4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।
5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।
6- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।
7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं।
इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।
8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।
9- पञ्चामृत - घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।
उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है।

इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है।

आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं, उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।
इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण महिलाएं किसी एक घर में एकत्रित हो कर फुलेरा बांधने की बजाय अपने-अपने घरों में अलग-अलग फुलेरा बांध कर पूजन एवं रात्रि जागरण करेंगी।

फुलेरा बांध कर पूजन की पूर्ण तैयारी कर महिलाएं रात्रि जागरण करती हैं। शिव-पार्वती के भजनों के साथ ही कजरी, झूला, चौमासा आदि गीत गाती हैं।

कजरी गीत

अरे रामा रिमझिम पड़त फुहार,
 श्याम नहीं आए रे हारी..., 
अरे रामा आज बिरज में श्याम बने मनिहारी रे हारी...। 

 झूला गीत

देखो-देखो सखि सावनवां 
सखि झूले डरें है आंगनवां 

दूर है अमरइया चले जइयो 
दूर है अमरइया 
अमरइया में झूला डरें हैं
झूले बहन और भैया
देखो-देखो सखि सावनवां
सखि झूले डरें है आंगनवां 

चौमासा गीत

मोहे राजा छतरिया लगाओ हो रस की बूंदे परी 
चार महीना बसकारे के लागे मोरे राजा बंगलिया छवाओ हो रस की बूंदें परी

हरितालिका तीज व्रत की कथा इस प्रकार है -

भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।

श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया।

वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।

तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।

नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।

नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं, तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं।

हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है, कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।
 
तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

Saturday, August 15, 2020

1943 में हमें मार सकता था सिपाही | डाॅ विद्यावती ‘‘मालविका’’ | आज़ादी के संघर्ष से जुड़ा संस्मरण | डॉ. वर्षा सिंह



🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं  🇮🇳

प्रिय मित्रों, आज "पत्रिका" समाचारपत्र में मेरी माताजी डॉ. विद्यावती "मालविका" जी का आज़ादी के संघर्ष से जुड़ा संस्मरण प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक धन्यवाद "पत्रिका" 🇮🇳🙏🇮🇳

1943 में हमें मार सकता था सिपाही 

             - डाॅ विद्यावती ‘‘मालविका’’, वरिष्ठ साहित्यकार, सागर
        वह सन् 1943 का समय था। उस समय मेरी उम्र लगभग 14-15 साल थी। उन दिनों हम लोग राजनांदगांव (जो अब छग में है) में रह रहे थे। वहां मेरे पिताजी ठाकुर श्यामचरण सिंह स्कूल में हेडमास्टर थे। पिताजी वहां महात्मा गांधी का मद्यनिषेध अभियान भी चला रहे थे। वे शराबबंदी के लिए घर-घर जाते और छोटी-छोटी सभाएं करते। एक दिन पिताजी के साथ मैं स्कूल से लौट रही थी। पिताजी को नशाबंदी की एक मीटिंग में जाना था। हमें पता नहीं था कि अचानक किसी झड़प के कारण कफर््यू लगा दिया गया था। जैसे ही हम लोग मुख्य सड़क पर आए वैसे ही एक सिपाही ने हमें ललकारा और वापस लौट जाने की चेतावनी दी। पिताजी उससे नहीं डरे और उन्होंने कहा-‘‘मैं तो स्कूल से वापस ही लौट रहा हूं। मैं हेडमास्टर हूं। ये मेरी बेटी है। मुझे इसे घर पहुंचाना है।’’ 
‘‘पहुंचाने से मतलब? क्या तुम घर से फिर बाहर निकलोगे? यदि ऐसा किया तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगा।’’ सिपाही बेअदबी से तू-तड़ाक के लहज़े में बोला। 
पिताजी ने भी उसे डपटते हुए जवाब दिया,‘‘हां, मैं निकलूंगा। चाहे तुम मुझे गोली मार दो। क्योंकि यदि मैं नहीं निकला तो जो पांच लोग आज नशाबंदी की शपथ लेने वाले हैं, उनका मन बदल जाएगा और फिर पांच घर बरबाद हो जाएंगे।’’
      पिताजी की बात सुन कर वह सिपाही चकित रह गया। वह अंग्रेजी शासन का भारतीय सिपाही था। उसे ऐसे उत्तर की उम्मींद नहीं थी। उसने कहा,‘‘आप तो गांधी जैसे बोल रहे हैं।’’ वह ‘तुम’ से ‘आप’ में आ गया। तब पिताजी ने उससे कहा,‘‘हम सब के भीतर एक महात्मा गांधी होते हंै, बस, उन्हें पहचानने की देर होती है। तुम्हारे भीतर भी हैं तभी तो तुमने मुझे पहले चेतावनी दी, देखते ही गोली नहीं मार दी। जबकि आजकल देखते ही गोली मार देने के आदेश रहते हैं।’’
      यह सुन कर सिपाही सोच में पड़ गया फिर बोला,‘‘ठीक है, आप जा सकते हैं लेकिन बेटी को पहले सुरक्षित घर पहुंचाइए।’’ उसकी यह बात सुन कर पिताजी मुस्कुराए और बोले,‘‘तुम सच्चे भारतीय हो।’’ और फिर मैं और पिताजी जब घर की ओर चल पड़े तो उन्होंने मुझसे कहा,‘‘देखो विद्या, अब हम भारतीय एक-दूसरे की बातें समझने लगे हैं। देखना हम जल्दी ही स्वतंत्रता प्राप्त कर लेंगे। यह गांधीजी के व्यक्तित्व का प्रभाव है। इसे हमेशा याद रखना।’’ और इस घटना के लगभग चार साल बाद 15 अगस्त को देश को गुलामी से आज़ादी मिल ही गई।


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Thursday, August 13, 2020

बुंदेली लोकगीतों में स्वाधीनता का स्वर | स्वतंत्रता दिवस | डॉ. वर्षा सिंह

 
क्षेत्र की संस्कृति और सभ्यता को पहचानने में लोकगीतों का अभूतपूर्व योगदान रहता है। बुंदेलखंड की पहचान भी यहां की लोक भाषा बुंदेली में गाए जाने वाले लोकगीत हैं। बुंदेली बोली बहुत मीठी, सरल, सहज, प्रेम और लालित्य से भरी बोली-भाषा है , जिसकी अपनी अलग पहचान है। 
     लोकगीतों में लोक अर्थात् जनजीवन का सच्चा दर्द, रस-उल्लास, आनंद-उत्सव, रीति-रिवाज, लोक परंपराएं, राग-विराग और सुख-दुख के आख्यान साथ ही आत्मसम्मान, आत्मगौरव और स्वाधीनता की अनकही बातें व्यक्त होती हैं। किसी जनपद या ग्रामांचल के लोकगीतों में ढलकर हवा में गूँज उठने वाले स्वर ही गाँव की सीधी-सादी अनपढ़ जनता के गीत हैं, पर वे इस भारत देश की महान संस्कृति और हजारों बरस पुरानी लोक परंपराओं के वाहक भी हैं, जिनसे इस देश की कोटि-कोटि जनता के मन और आत्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। अलग-अलग बोलियाँ और भाषा बोलने वाले जनपद और ग्रामांचलों के ये लोकगीत मिलकर एक ऐसा साझा पुल बनाते थे, जिसे समझे बिना इस महान देश की हजारों बरस पुरानी सभ्यता और संस्कृति को समझना असंभव है। ज्यादातर लोकगीत गांव की पृष्ठभूमि से उपजे हैं। लेकिन ‘लोक’ की परिव्याप्ति ज्यादा है तथा वह एक ऐसी चेतना की उपज है जो मनुष्य और मनुष्य में फर्क नहीं करती, ग्रामीण और शहरी जीवन में भी नहीं। लोक साहित्य पर सबसे पहला अधिकार जनता का है, ‘धरतीपुत्रों’ का है. पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी, तथाकथित संस्कृति चिंतक और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर इनकी बारीक-बारीकतर व्याख्याएँ भले ही कर लें, पर रहेंगी ये ग्राम्य जीवन की धरोहर ही।

चिर-परिचित शब्द, चिर-परिचित बातें, चिर-परिचित स्वर... यही लोकगीत की शक्ति है। कोई गीत पहाड़ी पगडंडी के समान ऊँचा-नीचा तो कोई समतल प्रदेश के दूर तक फैले हुए क्षितिज की छवि लिए हुए, नीरव, उदास दोपहरी के गीतों का प्रतिरूप होता है तो कोई गीत रात्रि के गीतों का प्रतिरूप। समय-चक्र के साथ लोकगीत के पहिए निरंतर चलते रहते हैं।

बुंदेलखंड क्षेत्र हमेशा से वीरता का प्रतीक रही है। महाराज छत्रसाल बुंदेला ने मुगलशासक औरंगजेब के समक्ष कभी घुटने नहीं टेके। 
हार ना मानी छत्ता तैंने
मुगलन को दई धूर चटाय।
कभऊं ना हिम्मत हारी तनकऊ
महाबली राजा कहलाय।

बुंदेलखंड में "आल्हा" गायन की परम्परा आज भी कायम है। प्रसिद्ध आल्ह- रुदल तेईस मैदान और बावन लड़ाइयों की सप्रसंग व्याख्या है, जिसको सुनकर ही लोग वीरता की भावना से ओत- प्रोत हो जाते हैं। आल्ह खंड में प्रेम और युद्ध के प्रसंग घटना- क्रम में सुनाये जाते हैं। पूरे काव्य में नैनागढ़ की लड़ाई सबसे रोचक व लोकप्रिय मानी जाती है।

अन्य कई लोक- गाथाओं की तरह आल्ह- रुदल भी समय के साथ अपने मूल रुप में नहीं रह गया है। इसने अपने आँचल में नौं सौ वर्ष समेटे हैं। विस्तार की दृष्टि से यह राजस्थान के सुदूर पूर्व से लेकर आसाम के गाँवों तक गाया जाता है। इसे गानेवाले "अल्हैत' कहलाते हैं। साहित्यिक दृष्टि से यह "आल्हा' छंद में गाया जाता है। हमीरपुर (बुंदेलखंड) में यह गाथा "सैरा' या "आल्हा' कहलाती है। इसके अंश "पँवाड़ा', "समय' या "मार' कहे जाते हैं। सागर, दमोह में भी आल्हा गायकों की कमी नहीं। वीरता के लोकमूल्य को उजागर करती ' आल्हा' की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-

मानसु देही जा दुरलभ हैस आहै समै न बारंबार ।
पात टूट कें ज्यों तरवर को कभऊँ लौट न लागै डार ।।
मरद बनाये मर जैबे कों खटिया पर कें मरै बलाय ।
जे मर जैहैं रनखेतन मा, साकौ चलो अँगारुँ जाय ।।

इन पंक्तियों में युद्ध के मैदान में वीरतापूर्वक जूझ जाने को परम मूल्य माना गया है और उसी में व्यक्ति और समाज के युगधर्मी कल्याण अंतर्निहित हैं । विदेशी आक्रमणकारियों से सुरक्षा में सभी का हित है और मनुष्य की देह को दुर्लभ मानने में मानव और मानवता की गरीमा सुरक्षित है । यूद्ध में मृत्यु का वरण करने से कीर्ति पाने का लोकविश्वास बहुत प्राचीन है और जब तक युद्ध रहेगा, तब तक बना रहेगा । इसी तरह शरीर को पेड़ के पत्ते की तरह नश्वर मानना भी शाश्वत लोकमूल्य है, जो आज भी लोकप्रचलित है।

बुंदेलखंड की प्रसिद्ध लोकगाथाएं
'मनोगूजरी' और 'मथुरावली' नारी के बलिदान की प्रामाणिक गवाह हैं । मथुरावली खड़ी-खड़ी जल जाती है, उसका भाई कहता है-
 राखी बहना पगड़ी की लाज, 
बिहँस कहें राजा बीर, 
ठाँड़ी जरै मथुरावली ।
     दरअसल पगड़ी पुरुष के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा की प्रतीक है। पगड़ी की लाज रखना उस समय का प्रमुख लोकमूल्य था, क्योंकि अनेक लोकगीतों में इसे प्रधानता मिलती है । 

    स्वाधीनता संग्राम की बुनियादी प्रेरणा लोकगीतों - लोकगाथाएं से मिलती रही है। 
 सन् 1857 के विप्लवियों की वीरता पर एक से एक अद्भुत लोकगीत गाए गए। कई गीतों में वीर कुँवरसिंह और रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का रोमांचकारी बखान है। ऐसे ही एक गीत में राजा बेनीमाधवबख्श सिंह की वीरता का अद्भुत का वर्णन है। अंग्रेज बार-बार चिट्ठी लिखकर उन्हें अपने साथ मिलने के लिए मना रहे हैं, उधर उनकी वीरता और पराक्रम ने अंग्रेजी सेना को दहला दिया है-

राजा बहादुर सिपाही अवध में,
धूम मचाई मोरे राम !
लिख-लिख चिठिया लाट ने भेजा,
आव मिलो राना भाई मोरे राम !
जंगी खिलत लंदन से मँगा दूँ,
अवध में सूबा बनाई मोरे राम !
जब तक प्राण रहें तन भीतर,
तुम कन खोद बहाई मोरे राम !

.... और 1940 के दशक में लोकप्रिय यह लोकगीत देखें, जिसमें तिरंगे झंडे के प्रति उच्च सम्मान की भावना झलकती है -

तीन रंग को प्यारो तिरंगा
ईको मान रखो भैय्या।
देस हमाओ जान से प्यारो
इतनो भान रखो भैय्या ।

इस लोकगीत में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति नफ़रत की भावना दिखाई देती है -

गोरी मेम बनो ना बिन्ना
चलो चलिए भरन खों पनिया
हमसे कभऊं ना करियो बिन्ना
लाट- गवरनर की बतिया

... और यह एक अन्य लोकगीत - 

विपदा सहत है धरती मइया, 
कोऊ बखर हांके तो कोेऊ हाकें गइंया
अंगरेजन की हुकुम हुकूमत
हमाई लेत कौनऊ खबर नइंया

डांडी मार्च के समय जनमन को प्रतिध्वनित करने वाला यह लोकगीत भी सर्वत्र गूंजा था- 
 
काहे पे आवें बीर जवाहर, काहे पे गांधी महराज? 
काहे पे आवें भारत माता, काहे पे आवे सुराज ?
  
घोड़े पे आवें बीर जवाहर, पैदल गांधी महराज। 
हाथी पे आवें भारत माता डोली पे आवे सुराज।

     लोकगीत लोक के गीत हैं। जिन्हें कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा लोक समाज अपनाता है। बुंदेलखंड के ये लोकगीत भी बुंदेलखंड ही नहीं वरन् पूरे देश की धरोहर हैं।
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#मनोगूजरी #मथुरावली #छत्रसाल




Wednesday, August 12, 2020

बुंदेली लोकगीतों में कृष्ण जन्मोत्सव | शुभ जन्माष्टमी | डॉ. वर्षा सिंह

 

प्रिय ब्लॉग पाठकों, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं

   आज दिनांक 12 अगस्त 2020 को हम सभी कृष्ण जन्माष्टमी पर्व मना रहे हैं। जी हां, हमसभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव भादों यानी भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पूरे विश्व में उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। बुंदेलखंड इससे अछूता नहीं है। यहां के आयोजन मथुरा-वृंदावन की याद दिलाते हैं। मध्यप्रदेश के सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़, निवाड़ी सहित उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड वाले ज़िलों में परम्परागत ढ़ंग से जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है।

     संयोग देखिए कि इस वर्ष भी भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को दिन बुधवार ही है। बी.आर. चोपड़ा कृत दूरदर्शन पर  "महाभारत" टीवी सीरियल का यह दृश्य प्रासंगिक है ।यह महाभारत नामक एक भारतीय पौराणिक काव्य पर आधारित धारावाहिक था और विश्व के सर्वाधिक देखे जाने वाले धारावाहिकों में से एक था। 94-कड़ियों के इस धारावाहिक का प्रथम प्रसारण 1988 से 1990 तक दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर किया गया था।

     पन्ना मुख्यालय स्थित जुगल किशोर मंदिर, सागर स्थित देव बिहारी जी का मंदिर एवं वृंदावन बाग़ क्षेत्र श्रीकृष्ण भक्ति के प्राचीन स्थानों में प्रमुख हैं।

  बुंदेली लोकगीतों में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का सुंदर वर्णन देखने को मिलता है। 

यह लोकगीत देखें-


मथुरा में जन्मे नंद के कुमार...

खुल गई बेड़ी खुल गये किवाड़

जागत पहरुआ सो गयें द्वार। मथुरा...

गरजे ओ बरसे घटा घनघोर

ले के वासुदेव चले गोकुल के द्वार। मथुरा...

बाढ़ी वे जमुना आई चरणन लाग

छू के चरणाबिंद हो गई पार। मथुरा...

देवकी के मन में आनंद अपार

गोकुल में हो रहो मंगलचार। मथुरा...


इसी क्रम में यह बुंदेली लोकगीत भी बहुत गाया जाता है -


बधाये नन्द के घर आज, सुहाये नन्द के घर आज।

टैरो टैरो सुगर नहनिया, घर-घर बुलावा देय

बधाये...

अपने-अपने महलिन भीतर, सब सखि करती सिंगार

पटियां पारे, मांग संवारे, वेंदी दिपत लिलार।

बधाये...

आवत देखी सबरी सखियां, झपट के खोले किवाड़

बूढ़न-बड़ेन की पइयां पड़त हूं, छोटेन को परणाम।

बधाये...

बाबा नन्द बजारे जइयो, साड़ी सरहज खों ले आओ

पहिनो ओढो सबरी सखियां, जो जी के अंगे भाये।

बधाये...

पहिन ओढ़ ठांड़ी भई सखियां, मुख भर देतीं आशीष

जुग-जुग जिये माई तेरो कन्हैया, राखे सभी को मान।

बधाये...


बधाई के रूप में गाए जाने वाले इन गीतों में भक्ति के साथ ही वात्सल्य का सुंदर चित्रण है -

बधइयां बाजै माधौ जी के

गोकुल बाजें बृंदावन बाजें

और बाजे मथुरैया।

बारा जोड़ी नगाड़े बाजें

और बाजे शहनैया। बधइयां...

गोपी गावें ग्वाला बजावें

नाचें यशोदा मैया। बधइयां...

बहिन सुभद्रा बधाव ले आई

नित उठ अइये जेई अंगना।

बधइयां... नंद बाबा अंगनइयां।


यह बुंदेली लोकगीत अति लोकप्रिय है -


नंद घर बजत बधाए लाल हम सुनकें आए।

मथुरा हरि ने जनम लिया है,

गोकुल बजत बधाए। लाल हम...

कौना ने जाए जशोदा खिलाए,

बाबा नंद के लाल कहाए। लाल हम...

सोरा गऊ के गोबर मंगाए,

कंचन कलश धराये। लाल हम...

चंदन पटली धरायी जशोदा,

चौमुख दियल जलाये। लाल हम...

हीरालाल लुटाए यशोदा,

मनमोहन को कंठ लगाये। लाल हम...

नन्द घर बजत बधाए, लाल हम सुनकें आए।



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Monday, August 10, 2020

सागर : साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 6 | गीतगीता | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

 

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 

               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत छठवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के कवि डॉ. मनीष झा के काव्य संग्रह  "गीतगीता" का पुनर्पाठ।

सागर : साहित्य एवं चिंतन

       पुनर्पाठ : ‘गीतगीता’ काव्य संग्रह

                                 -डॉ. वर्षा सिंह

        इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर के कवि डॉ. मनीष चंद्र झा की पुस्तक ‘गीतगीता’ को। श्रीमद्भगवद्गीता वर्तमान में धर्म से ज्यादा जीवन के प्रति अपने दार्शनिक दृष्टिकोण को लेकर भारत में ही नहीं विदेशों में भी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ है ही ऐसी कृति जिसने जीवन के बदलते मूल्यों में भी अपनी उपादेयता बनाए रखी है। इस कृति का दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। गद्य अनुवाद भी और पद्यानुवाद भी। अनुवादकार्य एक कठिन और चुनौती भरा कार्य है। अनुवादक के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह मूल पुस्तक के मर्म को भली-भांति समझे और फिर उसे उस भाषालालित्य के साथ प्रस्तुत अनूदित करे कि मूल पुस्तक का मर्म जस का तस रहे। अनुवादक के लिए यह भी जरूरी हो जाता है कि वह चयनित पुस्तक के कलेवर के साथ आत्मसंबंध स्थापित करे ताकि उसे भली-भांति समझ सके। अनुवादक के लिए अनुवाद करते समय आत्मसंयम बनाए रखना भी जरूरी होता है। वह अनुवाद में अपनी ओर से कोई भी कथ्य नहीं मिला सकता है, अन्यथा मूलकृति की अनूदित सामग्री की मौलिकता पर असर पड़ता है। किसी भी पुस्तक का गद्यात्मक अनुवाद तो कठिन होता ही है, उस पर पद्यानुवाद का कार्य तो और अधिक धैर्य, ज्ञान, सतर्कता और समर्पण की मांग करता है। पद्यानुवाद करने वाले के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि अनुवादक को इतना प्रचुर शब्द ज्ञान हो कि वह मूल के मर्म को काव्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करने के लिए सही शब्द का चयन कर सके। जिससे मूल सामग्री अपने पूरे प्रभाव के साथ पद्यानुवाद में ढल सके। ‘गीतगीता’ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का पद्यानुवाद है। डॉ. मनीष चंद्र झा ने ‘गीता’ के श्लोकों को मुक्तछंद में नहीं बल्कि छंदबद्ध करते हुए दोहे और चैपाइयों में उतारा है। छंद अपने आप में विशेष श्रम मांगते हैं और यह श्रम डॉ. झा ने किया है। 

 

      महाभारत के 18 अध्यायों में से 1 भीष्म पर्व का हिस्सा है श्रीमद्भगवद्गीता । इसमें भी कुल 18 अध्याय हैं। 18 अध्यायों की कुल श्लोक संख्या 700 है। महाभारत का युद्ध आरम्भ होने के समय कुरुक्षेत्र में अर्जुन के नन्दिघोष नामक रथ पर सारथी के स्थान पर बैठ कर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ‘गीता’ का उपदेश किया था। इसी ‘गीता’ को संजय ने सुना और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया। गीता में श्रीकृष्ण ने 574, अर्जुन ने 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने 1 श्लोक कहा है। कुरुक्षेत्र में जब यह ज्ञान दिया गया तब तिथि एकादशी थी। श्रीमद्भगवद्गीता का पहला श्लोक है-  

 धृतराष्ट्र उवाच:-

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।। 

इसे डाॅ. मनीष चंद्र झा ने इन शब्दों में अनूदित किया है-

कहि राजा धृतराष्ट्र हे संजय कहो यथार्थ।

धर्म धरा कुरुक्षेत्र में, जिन ठाड़े समरार्थ।।

मेरे सुत औ पांडु के, सैन्य सहित सब वीर।

कौन जतन करि भांति के, देखि बताओ धीर।।

इस पर संजय अपनी दिव्यदृष्टि से कुरुक्षेत्र का विवरण देना आरम्भ करते हैं-

संजय कहि देखि भरि नैना, व्यूह खड़े पांडव की सेना।

द्रोण निकट दुर्योंधन जाई, राजा कहे वचन ऐहि नाई।।

         ऐसा सरल पद्यानुवाद किसी भी पाठक के मन-मस्तिष्क को प्रभावित कर के ही रहेगा। वस्तुतः कुरुक्षेत्र में जब कौरवों और पांडवों की सेना पहुंच गई तब महाराज धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा, संजय मुझे अपनी दिव्य दृष्टि से ये बताओ कि कुरुक्षेत्र में क्या हो रहा है? संजय को भगवान कृष्ण ने दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। यह दिव्य दृष्टि संजय को इसलिए दी थी कि वह धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र में हुई घटनाओ का पूरा वर्णन बता सके।

       ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का महत्व आज भी प्रसंगिक है। आज के उपभोक्तावादी युग में व्यक्ति कोई भी काम करने से पहले उसका अच्छा परिणाम पाने की कामना करने लगता है और इस चक्कर में वह अपना संयम गवां बैठता है। किन्तु जब अच्छा परिणाम नहीं मिलता है तब वह हताश हो कर गलत कदम उठाने लगता है। अतः आज के वातावरण में ‘गीता’ का यह सुप्रसिद्ध श्लोक मार्गदर्शक का काम करता है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

       इस श्लोक का सुंदर पद्यानुवाद डॉ. मनीष चंद्र झा ने इन शब्दों में किया है-

कहि प्रभु फल तजि कामना, कर्म करे निष्काम।

संयासी योगी वही, नहिं अक्रिय विश्राम।।

       इसी तरह वर्तमान जीवन में दिखावा इतना अधिक बढ़ गया है कि मन की शांति ही चली गई है। यह भी मिल जाए, वह भी मिल जाए की लालसा व्यक्ति को निरन्तर भटकाती रहती है। आज युवा पीढ़ी कर्मशील मनुष्य नहीं बल्कि ‘पैकेज’ में कैद दास बनती जा रही है। दुख की बात यह है कि उन्हें इस दासत्व के मार्ग में माता-पिता और अभिभावक ही धकेलते हैं। जबकि ऐसा करके वे अपने बुढ़ापे का सहारा भी खो बैठते हैं। इस संबंध में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में कहा गया है -

विहाय कामान्यः कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृहः।

निर्ममो निरहंकार स शांति मधि गच्छति।।

       अर्थात् मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी। डॉ. मनीष चंद्र झा के शब्दों में इसी भाव को देखिए -

विषयन इन्द्रिन के संयोगा, जे आरम्भ सुधा सम भोगा।

अंत परंतु गरल सम जेकी, वह सुख राजस कहहि विवेकी।।

         आज ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ के महत्व को सभी स्वीकार रहे हैं। जीवन को सही दिशा देने वाली ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का सरल भाषा में पद्यानुवाद कर डॉ. मनीष चंद्र झा ने अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने ‘गीता’ को सामान्य बोलचाल की भाषा में अनूदित कर सामान्य जन के लिए ‘गीता’ के मर्म को गेयता के साथ आसानी से समझने योग्य बना दिया है। इसीलिए ‘गीतगीता’ महत्वपूर्ण पुस्तक है और बार-बार पढ़े जाने योग्य है।

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( दैनिक, आचरण  दि.10.08.2020)

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Saturday, August 8, 2020

हलषष्ठी | बलदेव जन्मोत्सव | डॉ. वर्षा सिंह

 

नीलाचलनिवासाय नित्याय परमात्मने ।

बलभद्रसुभद्राभ्यां जगन्नाथाय ते नमः ।।

       भगवान जगन्नाथ अर्थात् श्रीकृष्ण के साथ उनके अग्रज बलभद्र एवं बहन सुभद्रा को भी स्मरण नमन किया जाता है।

    बलभद्र, बलराम, बलदेव अथवा बलदाऊ जी का जन्म भाद्र मास के कृष्णपक्ष की षष्ठी तिथि को हुआ था अतः  भाद्र मास के कृष्णपक्ष की षष्ठी तिथि को हरछठ मनाया जाता है। इस व्रत - त्यौहार को हलषष्ठी, हलछठ , हरछठ व्रत, चंदन छठ, तिनछठी, तिन्नी छठ, ललही छठ, कमर छठ, या खमर छठ भी कहा जाता है। इस दिन को बलराम जयंती भी कहा जाता है। कुछ लोग बलराम जी को भगवान विष्णु का आठवां अवतार मानते हैं। जबकि कुछ इसके विपरित यह मानते हैं कि बलराम जी भगवान विष्णु के शेषनाग के अवतार हैं। जो हमेशा भगवान विष्णु की सेवा में रहते हैं।

       हलषष्ठी की प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी। दरिद्रता के कारण घर-घर दूध बेचने को मजबूर थी। एक दिन उसकी संतान जन्म लेने वाली थी। लेकिन घर में दूध-दही बेचने के लिए रखा था। उसने सोचा अगर बच्चा हो गया तो वह दूध बेचने नहीं जा पाएगी। इसलिए वह घर से दूध बेचने के लिए निकल गई। वो गली-गली घूम कर दूध बेच रही थी। अचानक उसे प्रसव पीड़ा हुई तो वो झरबेरी के पेड़ के नीचे बैठ गई। वहीं उसने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। लेकिन उसके पास अभी बेचने के लिए दूध-दही बचा हुआ था। इसलिए वो अपने पुत्र को झरबेरी के पेड़ के नीचे छोड़ कर दूध बेचने के लिए चली गई। दूध नहीं बिक रहा था तो उसने सबको भैंस का दूध यह बोलकर बेच दिया कि यह गाय का दूध है। वह हलषष्ठी का दिन था। बलराम जी ग्वालिन के झूठ के कारण क्रोधित हो गए। झरबेरी के पेड़ के पास ही एक खेत था। वहां किसान अपने हल जोत रहा था। तभी अचानक हल ग्वालिन के बच्चे को जा लगा। हल लगने से उसके बच्चे के प्राण चले गए। ग्वालिन झूठ बोलकर दूध बेच कर खुश होते हुए आई। देखा तो बालक में प्राण नहीं थे। ग्वालिन को समझ आया कि उसने गांव वालों के साथ छल किया। उन्हें झूठ बोलकर भैंस का दूध गाय के दूध के दामों पर दिया है। इसलिए ही उसके पुत्र के साथ ऐसा हुआ। ग्वालिन रोती हुई वापस गांव गई। सभी गांव वालों को सच बताकर उनसे माफी मांगी। साथ ही भगवान बलराम से प्रार्थना की कि आज के दिन तो लोग पुत्र प्राप्ति के लिए व्रत रखते हैं। आप मेरे पुत्र को मुझसे न छींने। बलराम जी ने उसके प्रायश्चित को स्वीकारा। इसके फल से उसका बेटा जीवित हो गया। इसीलिए महिलाएं अपने पुत्रों के दीर्घायु होने की कामना सहित हलषष्ठी का व्रत - पूजन करती हैं।


      महिलाएं संतान की लंबी आयु के लिए हरछठ का व्रत रखती हैं। यह पूजन सभी पुत्रवती महिलाएं करती हैं। इस व्रत को विशेष रूप से पुत्रों की दीर्घ आयु और उनकी सम्पन्नता के लिए किया जाता है। इस व्रत में महिलाएं प्रति पुत्र के हिसाब से छह छोटे मिट्टी या चीनी के वर्तनों में पांच या सात भुने हुए अनाज या मेवा भरतीं हैं। जारी (छोटी कांटेदार झाड़ी) की एक शाखा ,पलाश की एक शाखा और नारी (एक प्रकार की लता ) की एक शाखा को भूमि या किसी मिटटी भरे गमले में गाड़ कर पूजन किया जाता है। महिलाएं पड़िया वाली भैंस के दूध से बने दही और महुवा (सूखे फूल) को पलाश के पत्ते पर खा कर व्रत का समापन करतीं हैं।

       भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का अस्त्र हल होने की वजह से महिलाएं हल का पूजन करती है। महिलाएं तालाब बनाकर उसके चारो ओर छरबेड़ी, पलास और कांसी लगाकर पूजन करती हैं। साथ ही लाई, महुआ, चना, गेहूं चुकिया में रखकर प्रसाद के रूप में अर्पित किया जाता है। हरछठ में बिना हल लगे अन्न और भैंस के दूध का उपयोग किया जाता है। इसके सेवन से ही व्रत का पारण किया जाता है।


       मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित पन्ना ज़िला मुख्यालय में श्रीकृष्ण भगवान के अग्रज बलदाऊ का जन्मदिन हलछठ का पर्व अनूठे अंदाज में मनाया जाता है। इस मौके पर यहां के भव्य श्री बल्देव जी मंदिर को विशेष तौर पर सजाया जाता है। पन्ना में इस विशाल मंदिर का निर्माण तत्कालीन पन्ना नरेश महाराजा रूद्रप्रताप सिंह ने 143 वर्ष पूर्व 1876 में करवाया था।

 

       बल्देव जी का मंदिर पूर्व और पश्चिम की स्थापत्य कला का अनूठा संगम है। बाहर से देखने पर यह मन्दिर लन्दन के सेन्टपॉल चर्च का प्रतिरूप नजर आता है। मन्दिर में प्रवेश हेतु 16 सोपान सीढ़ी, 16 झरोखे, 16 लघु गुम्बद व 16 स्तम्भ पर विशाल मंडप है।

 

   

 

 इस वर्ष कोरोना महामारी के चलते कल 9 अगस्त 2020 को सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए हलषष्ठी के दिन दोपहर 12.00 बजे श्री बल्देव जी मन्दिर, पन्ना सहित सागर आदि पूरे बुंदेलखंड में भगवान श्री हलधर का जन्म दिन हलछठ के रूप में मनाया जाएगा।

Thursday, August 6, 2020

शिखण्डी : स्त्री देह से परे | उपन्यास | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | चर्चा | डॉ. वर्षा सिंह

उसका अस्तित्व कैसा था ?
वह स्त्री था, पुरुष था अथवा तृतीय लिंगी ?
एक व्यक्ति से जुड़े अनेक प्रश्न  क्योंकि उसका अस्तित्व सामान्य नहीं था । वह शक्तिपुंज पात्र ‘महाभारत’ महाकाव्य का सबसे दृढ़ निश्चयी चरित्र है, जो अपने जीवन की प्रत्येक परत के साथ न केवल चैंकाता है वरन् अपनी ओर चुम्बकीय ढंग से आकर्षित भी करता है । वह पात्र है शिखण्डी, जिसका अस्तित्व भ्रान्तियों के संजाल में उलझा हुआ है । वहीं यह इतना प्रभावशाली पात्र है कि महर्षि वेदव्यास ने ‘महाभारत’ के सबसे इस्पाती पात्र भीष्म से ‘अम्बोपाख्यान’ कहलाया है, जो शिखण्डी की ही कथा है, जबकि भीष्म और शिखण्डी के मध्य वैमनस्यता का नाता रहा ।
इस अत्यन्त रोचक पात्र की जीवनगाथा अंतस को झकझोरने में सक्षम है । अत: शिखण्डी के सम्पूर्ण जीवन को नवीन दृष्टिकोण से जांचने, परखने और प्रस्तुत करने की आवश्यकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता । जब शिखण्डी के जीवन की परतें खुलती हैं तो हमारे प्राचीन भारत में सुविकसित ज्ञान के उस पक्ष की भी परतेंं खुलकर सामने आने लगती हैं जहां शल्य चिकित्सा द्वारा लिंग परिवर्तन किए जाने के तथ्य उजागर होते हैं । इन तथ्यों का ही प्रतिफलन है यह उपन्यास ‘शिखण्डी : स्त्री देह से परे’ ।
       सागर मध्यप्रदेश में निवासरत डॉ. (सुश्री) शरद सिंह राष्ट्रीय स्तर की एक प्रतिष्ठित उपन्यासकार होने के साथ ही भारतीय इतिहास एवं परम्पराओं की अध्येता भी हैं । उनका ताज़ा उपन्यास "शिखण्डी : स्त्री देह से परे" इन दिनों चर्चा में है। अपने इस उपन्यास में उन्होंने ‘महाभारत’ के इस विशिष्ट पात्र शिखण्डी को, उसके जीवन की व्यापकता को, चमत्कृत कर देने वाले तथ्यों के साथ जिस रोचक ढंग से उजागर किया है, वह इस उपन्यास को अति विशिष्ट बना देता है ।
        "खजुराहो की मूर्तिकला” विषय में पीएचडी, सागर की प्रतिष्ठित साहित्यकार, कथा लेखिका, उपन्यासकार, स्तम्भकार एवं कवियत्री डाॅ. शरदसिंह वर्तमान में  स्वतंत्र लेखन कर रही है। इसके अलावा नई दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘सामयिक सरस्वती’ में कार्यकारी सम्पादक का दायित्व भी निर्वाह कर रही है।सुुश्री शरद सिंह द्वारा लिखित विभिन्न विषयों पर करीब 50 से अधिक पुस्तकें छप चुकी है। इन्होंने शोषित, पीड़ित स्त्रियों के पक्ष में अपने लेखन के द्वारा आवाज उठाई है।

       डॉ. शरद की बुंदेलखंड की महिला बीड़ी श्रमिकों पर केंद्रित ‘पत्तों में कैद औरतें’, स्त्री विमर्श पुस्तक ‘औरत तीन तस्वीरें’, राष्ट्रवादी व्यक्तित्वों पर 6 महापुरुषों की जीवनियां एवं 'थर्ड जेंडर विमर्श' पुस्तकें मनोरमा ईयर बुक में शामिल की जा चुकी है। बेड़िया स्त्रियों पर केंद्रित ‘पिछले पन्ने की औरतें' तथा लिव इन रिलेशन पर ‘कस्बाई सिमोन’ नामक इनके उपन्यासों को अनेक सम्मान मिल चुके हैं। इनका एक और उपन्यास ‘पचकौड़ी’ राजनीतिक और पत्रकारिता जगत की परतों को बारिकी से विश्लेषित करता है।
 उपन्यास ‘शिखण्डी : स्त्री देह से परे’ पर प्रबुद्ध पाठकों की कुछ प्रतिक्रियाएं देखें -
सामयिक प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित यह उपन्यास "शिखण्डी..." अमेजन पर भी उपलब्ध है...


इसके साथ ही इस उपन्यास "शिखण्डी : स्त्री देह से परे" को निम्नलिखित लिंक्स पर जा कर उपलब्ध किया जा सकता है -

Monday, August 3, 2020

रक्षाबंधन | आल्हा | डॉ. वर्षा सिंह

🚩 रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🚩

आज श्रावण मास की पूर्णिमा है यानी रक्षाबंधन का पर्व है। साथ ही सुयोग यह कि आज श्रावण का अंतिम सोमवार भी है। रक्षाबंधन पर्व की कथा हमारे पुरातन ग्रंथों में मिलती है। महाभारत के अनुसार एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- 'हे अच्युत! मुझे रक्षा बंधन की वह कथा सुनाइए जिस से मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है।' 
        भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार दैत्यों तथा सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित करके उनके प्रतिनिधि इंद्र को भी पराजित कर दिया।
           ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएं तथा देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें। सभी लोग मेरी पूजा करें।
         दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख इंद्र अपने गुरु वृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- गुरुवर! ऐसी दशा में परिस्थितियां कहती हैं कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे। न तो मैं भाग ही सकता हूं और न ही युद्धभूमि में टिक सकता हूं। कोई उपाय बताइए।
वृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान रने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया।
'येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः।'
         इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बांधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया। 'रक्षा बंधन' के प्रभाव से दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्र की विजय हुई। राखी बांधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है।
           बुंदेलखंड में सैकड़ों साल पुरानी परंपरा का गांवों में निर्वहन होने से पता चलता है कि आल्हा-ऊदल की वीरता आज भी लोगों के दिलों में समाई है। जोश भरने वाली वीरता की गाथा सुनकर युवा, वृद्ध समेत सभी की भुजाएं फड़क उठती हैं। रक्षाबंधन के अगले दिन इन्हीं दोनों की वीरता से संबंध रखने वाला कजली मेला मनाए जाने की परंपरा कोरोना महामारी के कारण टूट सी गई है। अब सामाजिक दूरी के बीच ग्रामीण इलाकों में यह कार्यक्रम सिर्फ रस्म अदायगी तक सीमित होगा।
        सैकड़ों साल पहले रक्षाबंधन के दिन राजा पृथ्वीराज चौहान ने महोबा में हमला कर दिया था। उनकी सेना ने रानी मल्हना के डोले लूट लिए थे। तब वीर भूमि के लोगों ने इस त्यौहार को रद्द कर दिया था। इस ऐतिहासिक घटना के बाद आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान की सेना से मोर्चा लेकर लूटे गए डोले वापस लिए थे। इसलिए उस दिन रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया गया था। लूटे गए कजली से भरे डोले वापस मिलने के बाद महोबा के कीरत सागर में रानी मल्हना ने रक्षाबंधन के अगले दिन कजलियों का विसर्जन कर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया था। 
    यह कथा इस तरह भी प्रचलित है कि सन् 1182 में राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि 1400 सखियाें के साथ भुजरियों के विसर्जन के लिए कीरत सागर जा रही थीं। रास्ते में पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडा राय ने आक्रमण कर दिया था। पृथ्वीराज चौहान की योजना चंद्रावलि का अपहरण कर उसका विवाह अपने बेटे सूरज सिंह से कराने की थी। यह वह दौर था जब आल्हा ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया गया था और वह अपने मित्र मलखान के पास कन्नौज में रह रहे थे। रक्षाबंधन के दिन जब राजकुमारी चंद्रावल अपनी सहेलियों के साथ भुजरियां विसर्जित करने जा रही थी तभी पृथ्वीराज की सेना ने उन्हें घेर लिया। आल्हा ऊदल के न रहने से महारानी मल्हना तलवार ले स्वयं युद्ध में कूद पड़ी थी। दोनों सेनाओं के बीच हुए भीषण युद्ध में राजकुमार अभई मारा गया और पृथ्वीराज सेना राजकुमारी चंद्रावल को अपने साथ ले जाने लगी। अपने राज्य के अस्तित्व व अस्मिता के संकट की खबर सुन साधु वेश में आये वीर आल्हा ऊदल ने अपने मित्र मलखान के साथ उनका डटकर मुकाबला किया। चंदेल और चौहान सेनाओं की बीच हुये युद्ध में कीरतसागर की धरती खून से लाल हो गई। युद्ध में दोनों सेनाओं के हजारों योद्धा मारे गये। राजकुमारी चंद्रावल व उनकी सहेलियां अपने भाईयों को राखी बांधने की जगह राज्य की सुरक्षा के लिये युद्ध भूमि में अपना जौहर दिखा रही थी। इसी वजह से भुजरिया विसर्जन भी नहीं हो सका। तभी से यहां एक दिन बाद भुजरिया विसर्जित करने व रक्षाबंधन मनाने की परंपरा है। महोबा की अस्मिता से जुड़े इस युद्ध में विजय पाने के कारण ही कजली महोत्सव विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सावन माह में कजली मेला के समय गांव देहातों में लगने वाली चौपालों में आल्हा गायन सुन यहां के वीर बुंदेलों में आज भी 1100 साल पहले हुई लड़ाई का जोश व जुनून ताजा हो जाता है।
       सागर में भी रक्षाबंधन का पर्व परम्परागत तरीक़े से मनाया जाता है। इस दिन घर-घर जलेबी खाने की परंपरा भी है। बहनें भाइयों के हाथों में रक्षा सूत्र । हैं। कजली लेकर महिलाएं सावन गीत गाती हैं और तालाबों में विसर्जन करती हैं।जगह-जगह आल्हा-ऊदल की वीरगाथा आल्हा के माध्यम से गाए जाते हैं।  बुंदेलखंड में रक्षाबंधन व कजली महोत्सव के दौरान यदि आल्हा न सुनाई पड़े तो सावन मनभावन नहीं लगता है।

बारह बरिस ल कुक्कुर जीऐं, औ तेरह लौ जिये सियार।
बरिस अठारह छत्री जीयें,  आगे जीवन को धिक्कार।।
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#आल्हा  #रक्षाबंधन