Showing posts with label पुनर्पाठ. Show all posts
Showing posts with label पुनर्पाठ. Show all posts

Monday, January 25, 2021

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 17 | चिन्तन की गलियों से | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत सत्रहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के प्रतिष्ठित विचारक, चिन्तक, लेखक एवं उद्योगपति स्व. मोतीलाल जैन की पुस्तक " चिन्तन की गलियों से" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
   
सागर: साहित्य एवं चिंतन

     पुनर्पाठ: मोतीलाल जैन कृत ‘चिंतन की गलियों से’
                        -डॉ. वर्षा सिंह                                                                                    
         इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो जीवन में चिंतन के महत्व को स्थापित करती है। यह पुस्तक है चिंतक एवं विचारक मोतीलाल जैन की पुस्तक ‘चिंतन की गलियों से’।
         प्रत्येक व्यक्ति संवेदनशील होता है जिसके कारण उसे सुख और दुख की अनुभूति होती है। सुख प्राप्त होने पर व्यक्ति सुख के कारणों पर चिंतन नहीं करता है। लेकिन जब दुख प्राप्त होता है तो वह दुख के कारणों का न केवल पता लगाता है बल्कि उन कारणों से छुटकारा पाने के लिए उपाय सोचना शुरू कर देता है, और वहीं से शुरू हो जाती है चिंतन प्रक्रिया। जो व्यक्ति हर स्थिति में चिंतनशील होता है वह दुख और सुख का विभाजन किए बिना जीवन के प्रत्येक तत्व के प्रति चिंतन करता है। लेखक मोतीलाल जैन सर्वकालिक चिंतक थे। वे धर्म, राजनीति, समाज, अर्थ, परमार्थ, स्वार्थ आदि प्रत्येक तत्व के प्रति सजग रहते हुए सतत चिंतनशील बने रहते थे। उन्होंने अपने विचारों को सरल शब्दों में छोटे-छोटे लेखों में निबद्ध किया जो कि वर्ष 1997 में ‘‘चिंतन की गलियों से’’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए। इस पुस्तक के आरम्भ में अपना मंतव्य देते हुए डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के तत्कालीन कुलपति शिवकुमार श्रीवास्तव ने लिखा है - ‘‘चित्त है, चैतन्य है तो चिंता होगी - चिंतन होगा। चिंता से चिंतन तक की यात्रा प्रतिकूल वेदना से अनुकूल वेदना तक की यात्रा है। जब चिंतन का स्तर प्राप्त होता है तो चिंता पीछे छूट जाती है।’’ वे आगे लिखते हैं कि - ‘‘मोतीलाल जी हर प्रश्न से चिंतन के स्तर पर जूझते हैं और निष्कर्षों तक पहुंचते हैं। ये निष्कर्ष मानव मात्र की कल्याण कामना के मधुर फल हैं। मोतीलाल जी ने सोच की सुस्पष्ट प्रणाली विकसित की है।’’
        ‘‘चिंतन की गलियों से’’ नामक पुस्तक को पढ़ते हुए लेखक मोतीलाल जी की मौलिक चिंतन प्रणाली का स्पष्ट बोध होता है। मोतीलाल जी ने अपनी बात के अंतर्गत लिखा है की ‘‘कहने में लिखने में और स्वयं पालन करने में बहुत अंतर होता है। मन में एक विचार आया तो कह दिया और लिख भी दिया। इस कहने और लिखने में हमारी कषाय ही मूल कारण है। कषाय है प्रशंसा पाने की, मान पाने की, बुद्धिजीवी कहलाने की। सो अंतरंग में जब यह कषाय जोर मारती है सो मुझे लिखने बैठना पड़ता है और फिर लिखे हुए पढ़ाने में भी उसी कषाय और अधिक पोषण होता है। इसे सोच कहे विचारना कहें, विवेक कहें, वृत्ति कहें या आसक्ति कहें। कह कुछ भी लें, परंतु पोषण तो प्रशंसा पाने की कषाय का ही होगा।’’
         जैन दर्शन के सिद्धांत कोश में कषाय की सरल व्याख्या की गई है जिसके अनुसार आत्मा के भीतरी कलुष परिणाम को कषाय कहते हैं। यद्यपि क्रोध मान माया लोभ ये चार ही कषाय प्रसिद्ध हैं पर इनके अतिरिक्त भी अनेकों प्रकार की कषायों का निर्देश आगम में मिलता है। हास्य रति अरति शोक भय ग्लानि व मैथुन भाव ये नोकषाय कही जाती हैं, क्योंकि कषायवत् व्यक्त नहीं होती। इन सबको ही राग व द्वेष में गर्भित किया जा सकता है। आत्मा के स्वरूप का घात करने के कारण कषाय ही हिंसा है। मिथ्यात्व सबसे बड़ी कषाय है। एक दूसरी दृष्टि से भी कषायों को निर्देश मिलता है। वह चार प्रकार है-अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान व संज्जवलन-ये भेद विषयों के प्रति आसक्ति की अपेक्षा किये गये हैं और क्योंकि वह आसक्ति भी क्रोधादि द्वारा ही व्यक्त होती है इसलिए इन चारों के क्रोधादिक के भेद से चार-चार भेद करके कुल 16 भेद कर दिये हैं। तहाँ क्रोधादि की तीव्रता मंदता से इनका संबंध नहीं है बल्कि आसक्ति की तीव्रता मंदता से है। हो सकता है कि किसी व्यक्ति में क्रोधादि की तो मंदता हो और आसक्ति की तीव्रता। या क्रोधादि की तीव्रता हो और आसक्ति की मंदता। अतरू क्रोधादि की तीव्रता मंदता को लेश्या द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है और आसक्ति की तीव्रता मंदता को अनंतानुबंधी आदि द्वारा। कषायों की शक्ति अचिंत्य है। कभी-कभी तीव्र कषायवश आत्मा के प्रदेश शरीर से निकलकर अपने बैरी का घात तक कर आते हैं, इसे कषाय समुद्घात कहते हैं।
        कषाय के बारे में जिज्ञासा को जगाने वाले लेख लिखने वाले लेखक मोतीलाल जी अपने ‘‘मिथ्या’’ शीर्षक लेख में मिथ्या के बारे में लिखते हैं कि -’’ असत्य, झूठ, धोखा, फरेब, भ्रम आदि शब्दों से जो भाव प्रकट होता है, वह मिथ्या भाव है। मिथ्या का अर्थ है जो मिट जावे, यानी जो हमेशा रहता नहीं। साथ न देने वाला अभी है फिर ना रहे, चंचल चलाएमान। अभी हम सुखी होना मान रहे हैं, थोड़ी देर बाद हमारा यह भाव मिट जाए और हम दुखी होने लगें तो हमारा सुखी होने का भाव मिट गया, ऐसा माना जाएगा। फिर कुछ समय बाद हमारा वह दुख घट जाए या बढ़ जाए, तो यह घटना बढ़ना भी असत्य यानी मिथ्या  कहा जाएगा। इससे यही तात्पर्य निकलता है कि हमारे चित्त में मन के द्वारा जो भी परिणमन होता है वह मिटता रहता है। एक विकल्प होता है, कुछ देर टिकता है, फिर उसको अन्य दूसरा विकल्प मिटा देता है। दूसरा विकल्प भी तीसरे के द्वारा मिट जाता है और इस प्रकार विकल्प होते हैं और मिट जाते हैं। परंतु जिस चित्त में, चेतन में, आत्मा में यानी जीव में विकल्प होते हैं वह जीव नहीं मिटता है। जीव तो वेदना सहता रहता है इसीलिए जीव सत्य है और उसका वेदना सहना भी सत्य है। वेदना अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी हो सकती है। जो वेदन सुहावे, रुचिकर लगे, उसे पुण्य रूप यानी शुभ कहा गया है और जो वेदन अरुचिकर लगे उसे पाप रूप यानी अशुभ कहा गया है। परंतु जीवन की वेदना सहना यह सत्य है क्योंकि वेदना मिटती नहीं। वेदना का साता असाता रूप परिवर्तन ही होता रहता हैं।’’
वर्तमान जीवन परिवेश में मिथ्या का बोलबाला है। बाज़ार और विज्ञापन की दुनिया सच के चमकीले आवरण में झूठ का विक्रय करने पर उतारू रहती है। लेकिन मिथ्या केवल बाज़ार में ही नहीं है, वह हमारे जीवन का अभिन्न हिससा बनतर जा रही है। मोतीलाल जी के ‘‘मिथ्या’’ शीर्षक लेख को पढ़ते समय ही मेरे मन में जिज्ञासा ने जन्म लिया कि आखिर जैन दर्शन ‘‘मिथ्या’’ के बारे में क्या कहता है? और मैने पाया कि जैनदर्शन के अभिमत से जहां भी एकान्तिकता होती है, वहां वह विचार मिथ्या बन जाता है। अनादिकाल से यह जीव अज्ञान के वश में आकर विषयों और कषायों में प्रवृत्ति करता हुआ इस संसार में भटक रहा है। इस भ्रमण में इस जीव ने अनन्तों बार चैरासी लाख योनियों में जन्म लिया, कभी अच्छे कर्मों के उदय से देवों के दिव्य-सुखों को भोग खुश, तो कभी त्रियंच-नरक और मनुष्य गति के दुखों को भोग कर विचलित होता रहा। अपने सच्चे आत्म-स्वरुप का दर्शन न हो सकने के कारण अनादि-काल से इस जीव की दृष्टि विपरीत ही रही है ! जीव की इस विपरीत दृष्टि के कारण ही उसे ‘‘मिथ्यादृष्टि’’ कहा जाता है। मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्या को छोड़कर किस प्रकार से यथार्थ दृष्टि (सम्यग्दृष्टि) वाला बनता है, और किस प्रकार अपने गुणों का विकास करते हुए परमात्मा बनता है, उसके इस क्रमिक विकास में आत्मा के गुणों के जिन-जिन स्थानो पर वो रुकता है, उन्हें गुण-स्थान कहते हैं अर्थात् बहिरात्मा (मिथ्यादृष्टि) से अंतरात्मा (सम्यग्दृष्टि) और फिर परमात्मा बनने के लिए इस जीव को आत्मिक गुणों की आगे-आगे प्राप्ति करते हुए, जिन-जिन स्थानो से गुजरना पड़ता है, उन्हें गुण-स्थान कहते हैं।

चिन्तन की गलियों से - मोतीलाल जैन

         सभी धर्मों में लगभग एक सी बातें कही गईं हैं। फिर सभी धर्म अलग-अलग क्यों हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि धार्मिक भिन्नताओं के पीछे असली कारण उनसे जुड़ी मान्यताओं की विविधता तो नहीं हैं? इस गूढ़ विषय पर चिंतन करते हुए लेखक मोतीलाल जी ने ‘‘भिन्न-भिन्न मान्यताएं क्यों?’’ शीर्षक लेख में लिखा है कि -‘‘संसार में मनुष्य विचारशील एवं चिन्तन -मनन की विशेष योग्यता रखने वाला जीव हैं। मनुष्य के सिवाय अन्य किसी और प्राणी में इतनी और योग्यता इस पृथ्वी पर किसी अन्य को नहीं है। मनुष्य अपने अनुभव की बात अन्य दूसरों को जताने की इच्छा करता है। यह इच्छाशक्ति भी मनुष्य की विशेष योग्यता है। ...... अनुभूति हो जाने पर ही वस्तु पदार्थ आदि के गुण-अवगुण पर श्रद्धा व विश्वास होता है। जो अनुभूति हो पाती है उतनी बात पर ही उसे विश्वास होता है और विश्वास होजाने का ही दूसरा नाम मान्यता है। इसी मान्यता के आधार पर सिद्धांत बना दिए जाते हैं। जितना जो जानता है उतना ही उसका सिद्धांत रहता है क्योंकि उतना ही उसे सिद्ध है, ज्ञात है।’’ लेखक के कहने का आशय यही है कि अनुभवजनित ज्ञान ही मान्यता निर्धारित करता है और मान्यताओं की विविधता विविध धार्मिक स्वरूप गढ़ती है।
        मनुष्य जीवन में जब पारस्परिक संबंधो की बात हो तो मोह एक बड़े घटक के रूप में सामने आता है। कई बार मोह के साथ राग शब्द भी प्रयुक्त होता है। तो प्रश्न उठता है कि मोह और राग में क्या संबंध अथवा क्या अंतर है? इस बारे में मोतीलाल जी ने अपने लेख ‘‘मोह और राग’’ में लिखा है कि - ‘‘मोह जहां है वहीं राग-द्वेष होता है। मोह की आराधना राग से होती है। मोह के अभाव में राग-द्वेष नहीं होता है। राग की विराधना द्वेष से होती है। जितनी तीव्र मोह दशा होती है उतना ही तीव्र राग उत्पन्न होता है। जिस पदार्थ एवं वस्तु अथवा जीव से जीव को जितना गहरा प्रेम व राग होता है, उतना ही गहरा उससे द्वेष उत्पन्न हो जाता है।’’
मोतीलाल जैन जी की पुस्तक ‘‘चिंतन की गलियों से ’’ उनके विविध विषयों पर लिखे गए लेखों का रोचक संग्रह है। जैसा कि पुस्तक के आरंभ में डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के तत्कालीन प्रोफेसर तथा अध्यक्ष हिन्दी विभाग एवं बुंदेलीपीठ डाॅ. सुरेश आचार्य, डी.लिट. ने लिखा है कि -‘‘संस्कृति, धर्म, साहित्य और समाज पर केन्द्रित उनके विषय संबंधी ये लेख अपने गम्भीर चिंतन से हमें सोचने को प्रेरित करते हैं। वे ज्ञान भक्ति के दरवाजे सभी को खोलने के पक्षधर हैं।’’ वस्तुतः मोतीलाल जैन जी की यह पुस्तक उन सभी पाठकों के लिए महत्वपूर्ण है जो जीवन से जुड़े धर्म और दर्शन के पक्षों को समझना चाहते हैं। यह पुस्तक ऐसी पठनीय सामग्री को समेटे हुए है जो इसके पुनर्पाठ को प्रेरित करती है।
 
         ----------------------------------   

साहित्य वर्षा

( दैनिक, आचरण  दि.25.01.2021)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #पुस्तक #पुनर्पाठ #Recitation
#MyColumn #Dr_Varsha_Singh  #मोतीलाल_जैन #चिन्तन_की_गलियों_से #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily
#drvarshasingh1

Friday, January 8, 2021

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 16 | बात कैत दो टूक कका जू | बुंदेली ग़ज़ल संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरे कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " में पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत सोलहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर  ज़िले के कवि महेश कटारे 'सुगम' के बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "बात कैत दो टूक कका जू" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
     
सागर : साहित्य एवं चिंतन

 पुनर्पाठ : बात कैत दो टूक कका जू
                           -डॉ. वर्षा सिंह
                            
            इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर जिले के बीना तहसील मुख्यालय में निवासरत बुंदेलखंड के चर्चित कवि महेश कटारे ‘सुगम’ के बुंदेली गजल संग्रह - ‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ को। बुंदेली एक लोकभाषा है। यह लोकभाषा बोली से भाषा तक के सफर में संघर्षरत है लेकिन इसकी साहित्य संपदा पर्याप्त समृद्ध है। यूं भी जब किसी बोली में मौलिक साहित्य सृजन होने लगता है तो वह भाषा के समीप पहुंच जाती है। यदि हिन्दी भाषा की बोलियों और उपभाषा की चर्चा की जाए तो उत्तर भारत की बोलियों ने निरंतर विकास किया है। भाषाई परिभाषा के आधार पर उत्तर भारत की जो प्रमुख बोलियां मानी गई हैं, उनमें प्रमुख हैं- ब्रज, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, अवधी, भोजपुरी, मगधी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, राजस्थानी और रोहेलखण्ड में बोली जाने वाली खड़ी बोली। इन सभी बोलियों में उत्कृष्ट साहित्य सृजन किए जाने की उल्लेखनीय परम्परा चली आ रही है, जो इन बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने योग्य सिद्ध करती है। बुंदेली में एक से बढ़ कर एक काव्य सृजन किए गए हैं। चाहे वीर रस में जगनिक के ‘‘आल्ह खण्ड’’ की बात की जाए या फिर श्रृंगार रस में ईसुरी की फागों की। बुंदेली में गजब का लचीलापन है। इसने अपनी परम्परागत जातीय गरिमा को बनाए रखते हुए विभिन्न भाषाओं के शब्दों को इस तरह आत्मसात किया है कि मानों वे शब्द ठेठ बुंदेली के हों। बुंदेली में छंदबद्ध रचनाएं लिखी गईं तो छंदमुक्त रचनाएं भी लिखी गईं। दोहे, घनाक्षरी, अतुकांत कविताओं के साथ ही गजलें भी बुंदेली में लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। बुंदेली गजल के क्षेत्र में एक चिरपरिचित नाम है कवि महेश कटारे ‘सुगम’ का। 24 जनवरी 1954 को ललितपुर में जन्में कवि ‘सुगम’ मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में प्रयोगशाला तकनीशियन के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद बीना में निवासरत हैं। ‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ गजल संग्रह सन् 2018 में प्रकाशित हुआ, जिसकी गजलें कवि के बुंदेली के प्रति समर्पण और समसामयिक परिदृश्य पर पैनी निगाह की परिचायक हैं।
वर्तमान परिदृश्य व्यवस्थाओं की दृष्टि से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है। तरह-तरह के फर्जी बाड़े के समाचारों से अखबारों के पन्ने भरे रहते हैं। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द के प्रति असंवेदनशील हो चले हैं। यह सब एक संवेदनशील कवि के रूप में महेश कटारे ‘सुगम’ को रोष से भर देता है। उनका यह रोष उनकी इस गजल में देखा जा सकता है-
भैया तू भौतई फर्जी है
खूब चला रओ मनमर्जी है
दुनिया भर में घूमत फिर रओ
घरे रुके की एलरजी है
काट लेत सींवौ नई जानत
एसौ जो कैसो दर्जी है
को का कै रओ कभऊं नई सुनत
फेंक देत सबकी अर्जी है

महेश कटारे की गजलों में एक खास बात यह है कि वे बुंदेली के रोजमर्रा के शब्दों को अपने शेरों में पिरोते हैं। ’ढिंगा’, ‘फुइया’, ‘ओली’, ‘कुठरिया’ जैसे खांटी बुंदेली शब्दों के साथ खड़ी बोली के ‘शुद्ध’ जैसे शब्द को बड़ी सुंदरता के साथ प्रयोग में लाते हैं, जिससे बुंदेली की विशेषता भी बनी रहती है और कथ्य की वजनदारी भी। उदाहरण देखिए-
तनक छांयरे में सुस्ता लो
भूख लगी तौ रोटी खा लो
काम लगो रेनें जीवन भर
बैठो आओ ढिंगा बतया लो
फुइया से मौड़ा मौड़ी हैं
ओली ले के इने खिला लो
सड़ रहे काय कुठरिया भीतर
बाहर आ कें शुद्ध हवा लो

गांव के विकास की बातें हर जगह की जाती हैं। अकसर आंकड़ों में गांवों कें विकास के दम भरे जाते हैं लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ अलग ही तस्वीर दिखाती है। इसी बात पर कवि कटारे प्रश्न उठाते हैं कि -
गांव अबै तक जां के तां हैं
सड़कें बिजली पानी कां हैं
काय जांय हम तीरथ करवे
घर में जब दद्दा अम्मा हैं
अपनौ ईशुर बस मेनत है
तुमखों सब विष्णु बिरमा हैं
जात धरम उर बोली बानी
झगड़े झांसे खामोखां हैं

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ व्यवस्था और राजनीति में ही दोहरापन आया हो, मानवीय आचरण में भी दोहरापन समा गया है। आज अकसर व्यक्ति अपने अधिकार की लड़ाई में अकेला ही खड़ा दिखाई पड़ता है। इस तथ्य पर महेश कटारे ने बड़ी बेबाकी से शेर कहे हैं-
अब आपस में प्यार कितै है
मनचीनौ व्यवहार कितै है
दुख में सैकर परौ आदमी
लड़वे खौं तैयार कितै है
सबरे गुड़ीमुड़ी हो जाते
जनता में हुंकार कितै है

बुंदेलखंड 2004 से ही सूखे की चपेट में रहा। जब बहुत शोर मचा तो पहली बार इलाके को 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। जब किसान तंगहाल होता है तो शेष व्यवसाय भी लड़खड़ाने लगते हैं। बुंदेलखंड की भुखमरी भी सुर्खियों में रही है। इस समाचार ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था कि ‘‘बुंदेलखंड में लोग घास की रोटियां बनाकर खा रहे हैं’’। बुंदेलखंड में खेती खत्म होने, उद्योग न होने और बेरोजगारी-भुखमरी के कारण पलायन की विवशता जागी। किसान दूसरे प्रांतों में मजदूरी करने को विवश हो गए। इस कटु यथार्थ को बड़े ही मार्मिक ढंग से अपनी ग़ज़ल में व्यक्त किया है महेश कटारे ने-
हो हो कें हैरान मरौ है
फांसी लगा किसान मरौ है
मरतौ नईं तौ फिर का करतौ
फसलन कौ मीजान मरौ है
अन्न उगा कें पेट भरततौ
भूखन कौ वरदान मरौ है
गांव गांव में जाकें देखौ
खेत और खरियान मरौ है


बात कैत दो टूक कका जू (बुंदेली ग़ज़ल संग्रह) - महेश कटारे 'सुगम' 


       जीवन में दिखावे की प्रवृत्ति इस कदर प्रभावी हो जा रही है कि लोग ममत्व, अपनत्व और मानवीयता को दरकिनार करने लगे हैं। ऐसे लोगों को विलासिता पर व्यय करते समय उन भूखे-प्यासे इंसानों की याद नहीं आती है। देश में न जाने कितने बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, पुरुष भिखारियों का जीवन बिता रहे हैं। उन्हें कभी एक समय की रोटी मिल जाती है तो कभी दो-दो, तीन-तीन दिन फांके करने पड़ते हैं। आत्मकेंद्रित जीवन के चलन में वृद्ध माता-पिता के दुख-पीड़ा भी भुला दी जाती है। यह परिदृश्य किसी भी कवि की आंखों में आंसू ला सकता है। कवि महेश कटारे भी इस परिदृश्य से द्रवित हो उठते हैं। लेकिन वे आंसू बहा कर चुप नहीं रह जाते हैं वरन् ऐसे आत्मकेन्द्रित लोगों को ललकारते हैं तथा उनकी चेतना जगाने का प्रयास करते हैं-  
भूखन खौं दुत्कार भगा रये शरम करौ
पथरन खौं तुम खीर चढ़ा रये शरम करौ
अम्मा दद्दा भूखे बैठे हैं घर में
पुण्य कमाने तीरथ जा रये शरम करौ
धरम करम ईमान टांग दऔ खूंटा पै
पैसा खौं कैसे भैरा रये शरम करौ
बच्चा भूखे रो रये हैं फुटपातन पै
कुत्ता घर में बिस्कुट खा रये शरम करौ

यूं तो जीवन में अनेक समस्याएं हैं लेकिन इनमें से कई समस्याएं जिस कारण से पैदा होती हैं वह है - मंहगाई। वर्तमान समय में मंहगाई की समस्या अत्यंत विकराल रूप धारण कर चुकी है। कालाधन, जमाखोरी, भ्रष्टाचार, मुद्रा का अवमूल्यन आदि कारण गिनाए जा सकते हैं इस बढ़ती हुई मंहगाई के लिए। किन्तु मात्र कारण गिनाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। समाज का निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग मंहगाई की सबसे अधिक मार झेलता है। वह अपनी आवश्यक जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेता है और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में या तो तिल-तिल कर मरता रहता है या फिर आत्महत्या का रास्ता ढूंढने लगता है। यह जीवन की कटुता भरी सच्चाई है। मंहगाई जीवन की सरसता को किस तरह सोख लेती है वह महेश कटारे के इन शेरों में महसूस किया जा सकता है -
सुख कौ पन्ना मोरौ भैया
रऔ कोरो को कोरौ भैया
हत्यारी ई मेंगाई नें
सब कौ गरौ मरोरौ भैया

‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ गजल संग्रह की गजलों में वह लोकभाषाई आत्मीयता है जो इन्हें बार-बार पढ़ने के लिए उकसाती है। इस संग्रह की गजलों में महेश कटारे ने ग्रामीण और कस्बाई जिन्दगी की समस्याओं को बिना किसी लागलपेट के सामने रखा है। वे भूख, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक तथा आर्थिक विषमता जैसी समस्याओं पर खुल कर कलम चलाते दिखाई देते हैं। ये सभी मुद्दे समसामयिक गजलकारों की गजलों में बखूबी देखी जा सकती है। लेकिन महेश कटारे की गजलें यदि उनमें अपनी अलग पहचान बना पाई हैं तो उसका मूल कारण है उन गजलों का बुंदेली में लिखा जाना और यही इसके पुनर्पाठ का सबसे बड़ा प्रेरक तत्व भी है। अपनी बोली का सोंधापन भला किसे नहीं भाता।

                     -----------------------

( दैनिक, आचरण  दि.08.01.2021)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #पुस्तक #पुनर्पाठ #Recitation
#MyColumn #Dr_Varsha_Singh  #महेश_कटारे_सुगम #बात_कैत_दो_टूक_कका_जू #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily
#drvarshasingh1

Saturday, January 2, 2021

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 15 | जगत मेला चलाचल का | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरे कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " में पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत पंद्रहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के वयोवृद्ध साहित्यकार निर्मलचंद "निर्मल" की पुस्तक "जगत मेला चलाचल का" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
     

सागर: साहित्य एवं चिंतन

       पुनर्पाठ: जगत मेला चलाचल का

                 - डॉ. वर्षा सिंह

                              

इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को यूं तो जिसका प्रकाशन वर्ष 2020 में ही हुआ है किन्तु इसे मैं कई बार पढ़ चुकी हूं और मुझे लगता है कि जो भी पाठक इस पुस्तक को पढ़ेगा वह पुस्तक के मूल मर्म की गहराई में उतरने और चिन्तन करने के लिए इसे बार-बार पढ़ेगा। ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ सागर नगर के कवि निर्मलचंद ‘‘निर्मल’’ का काव्य संग्रह हैं जिसमें रोजमर्रा के जीवन से जुड़े तथ्यों के साथ ही जगत की संरचना एवं उपादेयता की काव्यात्मक व्याख्या की गई है। इस संग्रह में संग्रहीत कुल 64 काव्य रचनाएं जीवन दर्शन और आध्यात्मिकता का सम्वेत स्वर प्रवाहित करती हैं। जैसा कि पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट है कि कवि इस बात का स्मरण कराना चाहता हैं कि संसार नश्वर है। इस संदर्भ में मुझे याद आता है प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित कुमार गंधर्व का गाया यह भजन -

जइसे पात गिरे तरुवर के, मिलना बहुत दुहेला

ना जानूं किधर गिरेगा, लग्या पवन का रेला

उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला

    अर्थात पेड़ से गिरे पत्ते को हवा कहां ले जाएगी किसी को पता नहीं होता। ठीक उसी तरह मृत्यु के बाद प्राण कहां जाएंगे यह भी कोई नहीं जानता। जन्म और मृत्यु के बीच जीवन के जो अनुभव मिलते हैं वे सुख-दख दोनों का अनुभव कराते हैं। ये अनुभव उस मेले के समान हैं जो जब तक लगा रहता है तब तक कोलाहल से भरपूर रहता है और मेला उठते ही गहन नीरवता छा जाती है। फिर भी प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवनपर्यन्त किसी न किसी कर्म से जुड़े रहना पड़ता है। कर्म से अनुभव उपजता है और अनुभव मनुष्य को जीवन की दशाएं समझाता है। कवि निर्मल के इस संग्रह के नाम वाली रचना ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ की ये पंक्तियां जगत के प्रति कवि के चिन्तन को सामने रखती हैं-

एक पल जो दूसरे से प्राप्त कर अनुभव बढ़ा है

एक पल अवरुद्ध हो कर ही अचेतन सा पड़ा है

एक पल जो सृष्टि का निर्माण करता आ रहा है

एक पल विध्वंस के ही गीत अब तक गा रहा है

एक पल हम, एक पल तुम, एक पल पूरा जगत है

एक पल की ही धरोहर सृष्टि का जीवन सतत है


इसी कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि ने कहा है-

कट गए वो था भरोसा अब भरोसा नहीं पल का

रोज लगता रोज उठता जगत मेला चलाचल का


संसार और जीवन को ले कर दार्शनिकों ने सदा विचार मंथन किया है। विशेष बात यह है कि बात जब धर्म-दर्शन की आती है तो संसार को ले कर सभी धर्मों में लगभग एक सा निष्कर्ष दिखाई देता है। जैन दर्शन में संसार जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के अनवरत क्रम को कहते हैं। इसमें संसार को दुखों से भरा हुआ और त्याज्य माना गया है। हिन्दू धर्म में भागवत पुराण के स्कंध 10 पूर्वाद्ध, अध्याय 2 में संसार की व्याख्या वृक्ष से तुलना करते हुए की गई है। इसमें कहा गया है कि संसार एक सनातन वृक्ष है। जिसके दो फल हैं - सुख और दुख। तीन जड़ें हैं - सत्व, रज और तम। चार रस हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसके छः स्वभाव हैं - पैदा होना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट होना। इस प्रकार भागवत पुराण में संसार की विस्तृत व्याख्या की गई है। किन्तु मनुष्य इस सत्य को अर्थात् संसार की नश्वरता को भूल कर स्वार्थ में डूबा रहता है। यह स्वार्थ कभी परिवारों में दरार डालता है तो कभी समाज को आहत करता है ओर जब यही स्वार्थ विकराल रूप धारण कर लेता है तो देशों के बीच शत्रुता के भाव जगा देता है। जबकि इस प्रकार की सारी शत्रुताओं का अस्तित्व उसके लिए उसी समय तक रहता है जब तक वह जीवित है। इस तथ्य को कवि निर्मल ने अपनी इन पंक्तियों में बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है -

संास की दीवार जिस दिन हट गई

दूरियां मुल्क-ए-अदम की पट गई

दिल समझने को नहीं राजी हुआ

जो इबारत मिट गई सो मिट गई


इसी रचना में कवि आगे लिखते हैं-

प्रश्न ‘‘निर्मल‘‘ आज तक सुलझा पहीं

मृत्यु अनगिन दर्शनों में बंट गई


वस्तुतः इस संसार और जीवन को समझना बहुत कठिन है। अनेक दार्शनिक और अनेक महापुरुष इसे समझने का प्रयास कर चुके हैं किन्तु आज भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। इसीलिए कवि निर्मल अपनी कविता ‘‘ऐसा गीत लिखा है तूने’’ में इस सृष्टि के रचेता को संबांधित करके लिखते हैं -

ऐसा गीत लिखा है तूने

बांचन बारे थके समझ भी हारी

भाषाएं हैं भिन्न, धरातल भिन्न

नए-नए आयाम, नई पहचान

आते-जाते छंद सभी मेहमान

वर्तमान के और विगत के

अर्थ अलग हैं

खुलती जितनी पर्तें

उनकी शर्त अलग है

कबिरा ने बांचा इसको

तुलसी ने बांचा

नव लय पर ले तम्बूरा

मीरा ने नाचा

महाप्रभु चैतन्य खो गए इसकी धुन में

बाल्मीकि ने बांचा इसको गुन-अवगुन में

कुछ ने अर्थ लगाए गहरे

कुछ ने समझी मायाचारी

ऐसा गीत लिखा है तूने

बांचन बारे थके समझ भी हारी


जब सांसारिकता उलझन भरी और भ्रमित करने वाली हो तो यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन सा मार्ग चलने लायक है। इस संग्रह की कविता ‘‘सीधा मार्ग’’ में कवि निर्मल लिखते हैं -

कौन से पथ पर चलूं कि मार्ग सीधा पा सकूं

भ्रमित हैं सारी दिशाएं वाकपटुता दिशाहीन

लालची शाखाओं को कैसे कहेंगे हम प्रवीण

शांति की दूकान में भी लोभ की पट्टी चढ़ी

क्या है पावन, क्या अपावन, समझ में दुविधा बढ़ी

शुद्धता के सूत्र कैसे किस तरह समझा सकूं

कौन से पथ पर चलें कि मार्ग सीधा पा सकूं



जब जीवन के उचित मार्ग का प्रश्न कवि ने उठाया तो उसका उत्तर भी उसने स्वयं ही दे दिया। ‘‘विश्व एक गांव’’ शीर्षक कविता में कवि निर्मल कहते हैं कि  -

कल्याण करने विश्व का आया मनुष्य है

शक्ति है कोई जिसने पठाया मनुष्य है

इस विश्व को तो एकता के सूत्र में बांधो

यह मानवीय दृष्टि भी लाया मनुष्य है

सम्हलो, सम्हल के अपने कदम आप बढ़ायें

निःस्वार्थ बने, नाति का उद्यान लगायें

कितने दिनों को आयें हैं रखना है इसका ध्यान

मानव समाज को यही संदेश पठायें


जब बात समाज और जीवन मार्ग की आती है तो साधना का मार्ग दो भागों में बंट जाता है - व्यष्टि साधना और समष्टि साधना। व्यष्टि साधना का तात्पर्य है व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति के लिए किए जाने वाले कर्म, जैसे- देवता का नाम जपना, आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ना आदि। व्यष्टि साधना निज उत्थान के लिए होती है जबकि समष्टि साधना सम्पूर्ण समाज के आध्यात्मिक उत्थान के लिए की जाती है। जिसका एक बहु प्रचलित उदाहरण है सत्संग का आयोजन। एक साधक को व्यष्टि साधना और समष्टि साधना के मध्य सामंजस्य बनाए रखना चाहिए। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जैसे यदि दीपक में रखा तेल व्यष्टि साधना है तो उसकी लौ समष्टि साधना है। यदि दीपक में तेल कम होगा तो प्रकाश भी कम समय के लिए मिलेगा। कहने का आशय यह है कि निज उत्थान से ही समाज उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है। निजता की बात करते हुए कवि निर्मल ने अपनी निजत्व शीर्षक कविता में लिखा है -

आप स्वयं स्वामी हैं खुद के

इतना ध्यान रहे

खोजो विश्व स्वयं में ही तुम

प्रज्ञा सबला होगी

निर्मोही स्वभाव के भीतर

मन बन जाता जोगी

विचलित न होना पथ में

इसका भान रहे

जो जाग्रत है नाम उसी का

रहता है जग में

भटकन वाले भटक रहे हैं

अनगिनती मग में

ज्ञानपुंज तलवार दुधारी

समता म्यान रहे


कवि निर्मल चंद निर्मल के इस काव्य संग्रह ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ में जीवन दर्शन से रची बसी काव्य रचनाएं हैं जिनमें संसार के अस्तित्व, मनुष्य के कर्म, निजता और कर्तव्य जैसे बिन्दुओं की व्याख्या की गई है। इन रचनाओं की विशेषता यह है कि ये उपदेशात्मक नहीं हैं वरन् परस्पर विचार विमर्श की भांति हैं। इसीलिए ये बोझिल नहीं हैं अपितु इन्हें बारम्बार पढ़ने और चिंतन करने की इच्छा जागृत होती है। इस दृष्टि से पुनर्पाठ योग्य यह काव्य संग्रह अपने महत्व को स्वयं स्थापित करता है। और, अंत में प्रस्तुत हैं कवि निर्मल की ये चार पंक्तियां जो चिंतन का आह्वान करती हैं -

तेरा नहीं होता कभी मेरा नहीं होता

संसार में स्थाई बसेरा नहीं होता

तेरी हवस की दौड़ तुझे क्या निभाएगी

उड़ने के बाद डाल पै डेरा नहीं होता


                ----------------------


( दैनिक, आचरण  दि.02.01.2021)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #पुस्तक #पुनर्पाठ #Recitation
#MyColumn #Dr_Varsha_Singh  #निर्मलचंद_निर्मल #जगत_मेला_चलाचल_का #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily
#drvarshasingh1

Saturday, December 19, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 14 | हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरे कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " में पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत चौदहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर की प्रतिष्ठित वरिष्ठ लेखिका, कवयित्री एवं कथाकार डॉ. विद्यावती "मालविका" की पुस्तक "हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव" का पुनर्पाठ।
यहां यह उल्लेखनीय है कि डॉ. विद्यावती "मालविका" मेरी माता जी हैं।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
     
सागर : साहित्य एवं चिंतन

     पुनर्पाठ : हिन्दी संत साहित्य पर बौद्धधर्म का प्रभाव

                                -डॉ. वर्षा सिंह
                                       
      इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो आज भी शोधार्थियों एवं पाठकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है। इस पुस्तक का नाम है - ‘‘हिन्दी संत साहित्य पर बौद्धधर्म का प्रभाव’’, जिसकी लेखिका हैं डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’। इस पुस्तक का प्रथम संस्करण हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय प्रकाशन, वाराणसी, उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित किया गया था। यह मूलतः शोध ग्रंथ है, जिस पर लेखिका विद्यावती ‘मालविका’ को आगरा विश्वविद्यालय द्वारा पी.एचडी. की उपाधि प्रदान की गई थी। 

डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ सागर नगर की एक ऐसी साहित्यकार हैं जिनका साहित्य-सृजन अनेक विधाओं में है। जैसे- कहानी, एकांकी, नाटक एवं विविध विषयों पर शोध प्रबंध से ले कर कविता और गीत तक विस्तृत है। लेखन के साथ ही चित्रकारी के द्वारा भी उन्होंने अपनी मनोभिव्यक्ति प्रस्तुत की है। सन् 1928 की 13 मार्च को उज्जैन में जन्मीं डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ ने अपने जीवन के लगभग 6 दशक बुन्देलखण्ड में व्यतीत किए हैं, जिसमें 32 वर्ष से अधिक समय से वे मकरोनिया, सागर में निवासरत हैं। डॉ. ‘मालविका’ को अपने पिता संत ठाकुर श्यामचरण सिंह एवं माता श्रीमती सुमित्रा देवी ‘अमोला’ से साहित्यिक संस्कार मिले। पिता संत श्यामचरण सिंह एक उत्कृष्ट साहित्यकार एवं गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। डॉ. ‘मालविका’ ने 12-13 वर्ष की आयु से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। स्वाध्याय से हिन्दी में एम.ए. करने के उपरांत आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने ‘‘हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। 

इस कालजयी पुस्तक की मूल्यवत्ता के संदर्भ में शांतिस्वरूप बौद्ध का यह कथन उद्धृत किया जा सकता है कि ‘‘जब सन् 1966 में यह मौलिक ग्रंथ प्रकाशित हुआ तो पुस्तक की शोधपरक और संदर्भ- सम्मत सामग्राी और प्रमाणिक उद्धरणों के कारण इस पुस्तक ने हिन्दी बौद्ध जगत को अपनी ओर न केवल आकृष्ट किया अपितु उन्हें विदुषी लेखिका के बौद्धिक सामथ्र्य के समक्ष नतमस्तक होना पड़ा।’’ 

संस्कृत एवं जैन धर्म के विद्वान डाॅ. भागचंद जैन ‘‘भागेन्दु’’ ने इस पुस्तक के महत्व पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि - ‘‘संत साहित्य और बौद्ध धर्म के पारस्परिक संबंधों को सूक्षमता से समझने के लिए इस पुस्तक को पढ़ना आवश्यक है।’’


हिन्दी साहित्य में संत साहित्य का बहुत महत्व है। इसके अंतर्गत कबीर, रैदास, दादू, नामदेव जैसे संत कवियों का साहित्य आता है। संत साहित्य की यह विशेषता रही कि उसमें भक्ति से कहीं अधिक जन कल्याण की भावना रही। कबीर और रैदास जैसे संतों ने पाखण्डमुक्त जीवन और सामाजिक न्याय के पक्ष में आवाज उठाई। बौद्ध धर्म भी पाखण्ड को त्याग कर अस्पृश्यता से दूर सामाजिक न्याय की बात करता है। अतः ‘‘हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ पुस्तक में संतों के विचारों और बौद्ध धर्म के चिन्तन - दर्शन के पारस्परिक संबंधों को समूचे विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। मूलतः यह पुस्तक एक शोधग्रंथ है जिसमें शोधार्थी लेखिका विद्यावती ‘मालविका’ की अपने शोध के प्रति स्पष्टता और तार्किकता अपने आप में अद्भुत है। इस प्रकार की दृढ़ता और स्पष्टता वर्तमान शोधार्थियों में विरले ही दिखाई देती है। डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ को अपने शोध कार्य में जिन परेशानियों का सामना करना पड़ा और जिस प्रकार उनके कार्य को विश्व के प्रख्यात विद्वानों का मार्गदर्शन मिला वह भी अपने आपमें रोचक है।        

   इस पुस्तक भूमिका की भूमिका में डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ ने लिखा है कि -‘‘प्रस्तुत प्रबंध का उद्देश्य मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म के प्रभाव का अध्ययन करना है। इस प्रकार के अध्ययन की आवश्यकता रही है। मुझे इस प्रकार के अध्ययन करने की सर्वप्रथम प्रेरणा ठाकुर रणमत सिंह डिग्री काॅलेज, रीवा के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष महावीर प्रसाद अग्रवाल जी से प्राप्त हुई थी। उन्हीं के परामर्श के अनुसार मैंने रूपरेखा बना कर जैन डिग्री काॅलेज, बड़ौत के हिन्दी तथा संस्कृत विभाग के अध्यक्ष एवं प्रसिद्ध विद्वान डाॅ. भरत सिंह उपाध्याय के पास भेजा। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक मेरा निर्देशक बनना स्वीकार कर लिया और रूपरेखा के संबंध में महतवपूर्ण सुझावों के साथ अध्ययन की दिशा का भी निर्देश किया, किन्तु कुछ ही दिनों के पश्चात् उनकी नियुक्ति दिल्ली के हिंदू काॅलेज में हो गई। इसी बीच आगरा विश्वविद्यालय से सूचना मिली कि मुझे किसी अन्य निर्देशक की देख-रेख में अपना कार्य करना होगा। मेरे सामने यह विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गई। मेरा विषय ऐसा था कि जिसका निर्देशक कोई बौद्ध विद्वान ही हो सकता था। पहले तो मैं विषय की गंभीरता देखते हुए हतोत्साहित हो गई, किन्तु अपने परमपूज्य पिता ठाकुर श्रद्धेय श्यामचरण सिंह जी के आदेशानुसार इस संबंध में अपनी कठिनाइयों को अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बौद्ध धर्म के प्रकाण्ड विद्वान पूज्य भिक्षु धर्मरक्षित जी के सामने रखा। उन्होंने मुझ पर दया कर के निर्देशक बनना स्वीकार कर लिया और आगरा विश्वविद्यालय से उनके निर्देशन में शोधकार्य करने की स्वीकृति भी मिल गई। जिसके लिए युवराजदत्त डिग्री काॅलेज, ओयल के पूर्व प्रिंसिपल ठाकुर जयदेव सिंह जी की महती अनुकंपा सहायक हुई।’

डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ को शोधकार्य में मूलगंध कुटी विहार पुस्तकालय, सारनाथ तथा महाबोधी सभा, सारनाथ के मंत्री भदंत संघरत्न नायक स्थविरजी के साथ ही राहुल सांस्कृत्यायन ने भी हरसंभव सहयोग किया था। डाॅ. ‘मालविका’ ने अपनी इस पुस्तक की भूमिका में लिखा है कि ‘‘प्रणामी धर्म के ग्रंथों का अध्ययन करने में अखिल भारतीय प्रणामी धर्म सेवा समाज, पद्मावतीपुरी, पन्ना के मंत्री महोदय से बड़ी सहायता प्राप्त हुई। उन्होंने अपने संप्रदाय के मुद्रित-अमुद्रित सभी ग्रंथों को मुझे पढ़ने की अनुमति दी, जबकि उन्हें केवल प्रणामी लोगों के लिए ही पढ़ने की अनुमति है।’’

"हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव" - लेखिका डॉ. विद्यावती "मालविका", पुस्तक के प्रथम संस्करण का मुखावरण पृष्ठ

यूं भी किसी भी धर्म विशेष के बारे में समुचित जानकारी के बिना उससे संबंधित विषयों पर लिखा नहीं जा सकता है और लिखा भी नहीं जाना चाहिए। डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ की इस पुस्तक को पढ़ कर स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने जिन संतों के विचारों के बारे में लिखा, पहले उनके बारे में तथा उनसे संबंधित धर्मों के बारे में विस्तार से अध्ययन किया। इस पुस्तक को पढ़ कर समूची उत्तर भरतीय संत परम्परा को भली -भांति समझा जा सकता है। पुस्तक का सम्पूर्ण कलेवर छः भागों में विभक्त है। पहले अध्याय में ‘‘बौद्ध धर्म का भारत में विकास’’ में पांचवीं शताब्दी ई.पू. से तेरहवीं श्ताब्दी ई.पू. तक बौद्ध धर्म के विकास का विवरण दिया गया है। इस अध्याय के प्रथम खण्ड में ‘‘स्थविरवाद बौद्ध धर्म’’ के अंतर्गत प्राग्बौद्धकालीन भारतीय समाज, धर्म अैर दर्शन का परिचय देते हुए बुद्ध का आविर्भाव, बुद्ध की जीवनी, बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांत, संघ का महत्व, भिक्षु-भिक्षुणी संघ, जनता पर उनका प्रभाव, स्त्रियों का बौद्ध धर्म में स्थान के बारे में विस्तृत विवरण दिया गया है। इसी खण्ड में बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक दिग्दर्शन के रूप में स्थविरवाद को सामने रखा गया है। प्रथम अध्याय के दूसरे खण्ड ‘‘महायान का उदय और विकास’’ में प्रथम संगीति, बुद्ध वचनों का संकलन, त्रिपिटक पालि का आकार, द्वितीय संगीति, अशोक के समय में तृतीय संगीति, महायान और हीनयान का पारस्परिक तथा सैद्धांतिक संबंध आदि के साथ ही विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार की जानकारी दी गई है।

पुस्तक के दूसरे अध्याय ‘‘संत मत के स्रोत और बौद्ध धर्म’’ में महायान का विकास, बौद्ध धर्म में तांत्रिक प्रवृत्तियों का प्रवेश, वज्रयान का अभ्युदय, सहजयान, सिद्धों का युग, सिद्धों का जनमानस पर प्रभाव, नाथ सम्प्रदाय का जन्म, बौद्ध धर्म की भित्ति पर सिद्ध और नाथ सम्प्रदाय से संत मत के उदय की जानकारी दी गई है। तीसरे अध्याय ‘‘पूर्वकालीन संत तथा उन पर बौद्ध धर्म  का प्रभाव’’ में जो बिन्दु शोध करके रखे गए हैं, वे हैं - पूर्वकालीन संतों का परिचय जिनमें हैं संत जयदेव, संत सधना, संत लालदेद, संत वेणी, संत नामदेव, संत त्रिलोचन आदि। इसके साथ ही बौद्ध धर्म से उनका संबंध तथा बौद्ध धर्म के तत्वों का विवेचन किया गया है। 

इस पुस्तक का चौथा अध्याय भी दो खण्डों में विभक्त है। प्रथम खण्ड है- ‘‘प्रमुख संत कबीर तथा बौद्ध धर्म का समन्वय’’। इस खण्ड में कबीर के जीवन वृतांत, उनके मत तथा कबीर के समय में बौद्ध धर्म की भारत में स्थिति की चर्चा की गई है। साथ ही कबीर की वाणियों पर बौद्ध विचार पर प्रकाश डालते हुए जिन बिन्दुओं की व्याख्या की गई है, वे हैं- बौद्ध धर्म का शून्यवाद ही कबीर के निर्गुवाद का आधार, विचार स्वातंत्र्य तथा समता में कबीर पर बौद्ध धर्म की छाप, कबीर की उलटवासियां सिद्धों की देन, सत्तनाम पालि भाषा के सच्च नाम का रूपांतर, कबीर की गुरु भक्ति सिद्धों और नाथों की परम्परा, कबीर की सहजसमाधि सिद्धों के सहजयान से उद्भूत, कबीर का हठयोग बौद्धयोग से प्राप्त, अवधूत बौद्ध धर्म के धूतांगधारी योगियों की प्रवृत्ति, सुरति शब्द स्मृति और निरति शब्द विरति के ही रूप, कबीर की शैली सिद्धों की शैली का अनुकरण, बौद्ध धर्म के विभिन्न तत्वों का कबीर साहित्य में अनुशीलन। इन बिन्दुओं में दिए गए सभी तथ्य उदाहरण दे कर प्रमाणिकता से सिद्ध किए गए हैं। चौथे अध्याय के दूसरे खण्ड में ‘‘कबीर के समसामयिक संत और उन पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ शीर्षक के अंतर्गत कबीर के समकालीन संत सेन नाई, स्वामी रामानंद, राधवानंद, संत पीपा, संत रैदास, संत धन्ना, मीराबाई, झालीरानी तथा संत कमाल के साहित्य में बौद्ध विचारों के समन्वय को उदाहरण दे कर स्पष्ट किया गया है।

पांचवें अध्याय ‘‘सिख गुरुओं पर बौद्ध प्रभाव’’ में सिख धर्म के आदि गुरु नानकदेव का जीवन वृत्तंात, उनकी साधना तथा उनके बौद्ध देशों के भ्रमण का विवरण दिया गया है। डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ के अनुसार -‘‘गुरु नानक की वाणियों का अध्ययन करने से उन पर महायान बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। शून्य, शून्यसमाधि, अनाहत, दशमद्वार, शून्यमण्डल, सहजगुफा, निर्वाण, निरंजन, सत्यनाम, सहजावस्था, सुरति, कर्म-स्वकता, तीर्थव्रत आदि कर्मकाण्डों का निषेध, गुरु महात्म्य, ईश्वर की घट-घट व्यापकता, निर्वाणपद, ग्रंथप्रमाण का बहिष्कार, जातिवाद का त्याग.... इत्यादि बौद्ध धर्म के तत्व नानकवाणी में आए हुए हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं जो संतों से हो कर नानक तक पहुंचे थे और कुछ बौद्ध विद्वानों के सत्संग, सिद्धों, नाथों एवं वज्राचार्यों की धर्मचर्चा तथा बौद्ध देशों के भ्रमण से प्राप्त हुए थे। ’’ पांचवें अध्याय में ही सिख धर्म के अन्य गुरुओं तथा उनके विचारों का विवरण है। साथ ही श्री गुरुग्रंथ साहिब में बौद्ध मान्यताओं की जानकारी दी गई है।

पुस्तक के छठे एवं अंतिम अध्याय ‘‘संतों की परम्परा में बुद्ध वाणी और बौद्ध साधना का समन्वय’’  में दो खण्ड हैं। पहले खण्ड में संतों के सम्प्रदायों की जानकारी दी गई है जैसे - साध सम्प्रदाय, लालदार्स आर उनका सम्प्रदाय, दादूदयाल तथा उनकी शिष्य परम्परा, निरंजनी सम्प्रदाय, बावरी साहिबा और उनका पंथ, मलूकदास तथा उनका धर्म, बाबालाली सम्प्रदाय, प्रणामी सम्प्रदाय, सत्तनामी सम्प्रदाय, धरनीश्वरी सम्प्रदाय, दरियादासी सम्प्रदाय, शिवनारायणी सम्प्रदाय, चरणदासी सम्प्रदाय, गरीबदासी सम्प्रदाय, पानप सम्प्रदाय तथा रामसनेही सम्प्रदाय। इस खण्ड में जिन संतों का परिचय दिया गया है, उनमें प्रमुख हैं- रज्जबजी, सुन्दरदास, गरीबदास, हरिदास, प्रागदास, बीरूसाहब, यारीसाहब, केशवदास, बूलासाहब, गुलालसाहब, भीखासाहब, हरलालसाहब, गोविन्दसाहब, पल्टूसाहब, जगजीवनसाहब, घासीदास, बिहारी दरियादास, मारवाड़ी दरियादास आदि। दूसरे खण्ड में कुछ अन्य संतों और उनके विचारों का परिचय दिया गया है, जैसे - संत जम्भनाथ, संत शेख फरीद, संत सिंगाजी, संत भीखन, संत दीन दरवेश, संत बुल्लेशाह तथा संत बाबा किनाराम।

मेरे लिए यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि ‘‘हिन्दी संत साहित्य पर बौद्धधर्म का प्रभाव’’ पुस्तक की लेखिका डाॅ. विद्यावती ‘मालविका’ मेरी और मेरी बहन डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह की माता जी हैं और मेरे साथ ही शांतिविहार काॅलोनी, मकरोनिया, सागर में निवासरत हैं। उनके इस ग्रंथ को अनेक बार मैंने पढ़ा है और संत साहित्य को समझने का प्रयास किया है। हिन्दी साहित्य में संत परम्परा और बौद्ध धर्म के विचारों को जानने के लिए यह पुस्तक बारम्बार पढ़ने योग्य है। देश-विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों तथा अध्ययन केन्द्रों, शोधार्थियों, हिन्दी साहित्य एवं बौद्ध धर्म के अध्येताओं के बीच यह पुस्तक संदर्भ ग्रंथ के रूप में आज भी रुचिपूर्वक पढ़ी जाती है।     

                -----------------------

पुनर्पाठ : हिन्दी संत सहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव - डॉ. वर्षा सिंह


( दैनिक, आचरण  दि.19.12.2020)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #पुस्तक #पुनर्पाठ #Recitation
#MyColumn #Dr_Varsha_Singh  #डॉ_विद्यावती_मालविका #हिन्दी_संत_साहित्य_पर_बौद्ध_धर्म_का_प्रभाव #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily
#drvarshasingh1

Monday, November 2, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 13 | समग्र दृष्टिकोण | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत तेरहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के प्रतिष्ठित विचारक, चिन्तक, लेखक एवं उद्योगपति स्व. मोतीलाल जैन की पुस्तक "समग्र दृष्टिकोण" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
सागर : साहित्य एवं चिंतन

     पुनर्पाठ : मोतीलाल जैन कृत ‘समग्र दृष्टिकोण’ 
                           -डॉ. वर्षा सिंह
                                  
           इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो जीवन के विभिन्न पक्षों को गहन दृष्टिकोण के साथ व्याख्यायित करती है। यह पुस्तक है चिंतक एवं विचारक मोतीलाल जैन की पुस्तक ‘समग्र दृष्टिकोण’।

दृष्टिकोण व्यक्ति की आंतरिक वैचारिक स्थिति का द्योतक होता है। दृष्टिकोण की अवधारणा को मनोविज्ञान के अंतर्गत परिभाषित किया गया है। मनोवैज्ञानिक गाॅर्डन आलपोर्ट के अनुसार दृष्टिकोण मनुष्य के मानसिक स्वभाव पर आधारित होता है जिस पर उसके परिवेश के दिन प्रति दिन के व्यवहार का सीधा असर पड़ता है। दृष्टिकोण हमेशा किसी विशेष को इंगित करता है। मनोवैज्ञानिक ईगली और चैकेन के अनुसार किसी भी चीज को विचार की वस्तु में परिवर्तित किया जा सकता है जो कि दृष्टिकोण की वस्तु बन सकती है। एक ही वातावरण, परिस्थिति और अनुशासन में रहते हुए भी हर व्यक्ति के विचार ओर चिंतन में अंतर होता है। यही अंतर प्रत्येक व्यक्ति का दृष्टिकोण प्रदर्शित करता है। वस्तुतः दृष्टिकोण का आधार व्यक्ति के संस्कार होते हैं। ये संस्कार भी दो प्रकार के होते हैं। पहला संस्कार व्यक्ति हैरीडिटी के रूप में जन्म से ही अपने साथ लाता है। दूसरा संस्कार उसे शिक्षा और वातावरण से मिलता है।  ये दोनों संस्कार जब सकारात्मक विचाारों को ग्रहण करते हैं तो व्यक्ति में स्वस्थ दृष्टिकोण का विकास होता है। यह स्वस्थ दृष्टिकोण व्यक्ति को राष्ट्र, राष्ट्र के निवासियों, प्रकृति, प्रकृति की उपादेयता के बारे में चिंतनशील बनाता है। जब दृष्टिकोण के साथ समग्रता का भाव हो तो जीवन के प्रत्येक पक्ष उसमें समाहित हो जाते हैं। ‘समग्र दृष्टिकोण’ वह पुस्तक है जो आमजन जीवन, धर्म, राजनीति और व्यक्ति की एक साथ चर्चा करती है। 

‘समग्र दृष्टिकोण’ में लेखक मोतीलाल जैन ने अपने लेखों को संग्रहीत किया है। यूं तो प्रत्येक पुस्तक में ‘समर्पण’ के शब्द लेखक के निहायत व्यक्तिगत भावनात्मक विचार होते हैं, जिनके द्वारा लेखक के समग्र विचारों को अथवा उसके लेखकीय संस्कार को पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता है। किन्तु कई बार ‘समर्पण’ के शब्दों से ही लेखक के लेखकीय व्यक्तित्व एवं लेखकीय संस्कार का सांगोपांग परिचय मिल जाता है। ‘समग्र दृष्टिकोण’ को पुनः पढ़ते समय भी ‘भावांजलि’ के रूप लिखी गई ‘समर्पण’ की पंक्तियां लेखक मोतीलाल जैन के लेखकीय संस्कार की बुनियाद से साक्षात्कार करा देती हैं- ‘‘ मेरे शब्द, मेरे विचार, मेरी क्रियाशीलता और रचनात्मक बोध, मेरे पितृ पुरुष की व्यक्ति चेतना का प्रतिबिम्बन और ध्वनि है। उनकी चेतना हमारा आत्मविश्वास बन कर जीवन के प्रत्येक सोपान पर हमें जागृत करता है और वह शक्ति देता है कि वे प्रतिपल हमारे साथ हैं। यही हमारा आत्मविश्वास है जो हमारी ऊर्जा बन कर हमें गति देता है। उनकी स्मृति को प्रणाम करता हुआ मैं अपना यह संकलन उन्हें समर्पित करता हूं।’’ समर्पण की इन पंक्तियों के साथ लेखक ने अपने पिता जो ‘कक्का जी’ कहलाते थे को समर्पित किया किन्तु इन पंक्तियों की मूल भावना अपने उन सभी पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने की रही जिनसे उन्हें जीवन की सूक्ष्मताओं को समझने, बूझने और जानने की क्षमता मिली। 

पुस्तक में पहला लेख है ‘पलायनवाद और वीतरागता’। 29 जून 1932 को सागर में जन्में मोतीलाल जैन को औद्योगिक सम्पदा विरासत में मिली। उन्होंने जहां इस सम्पदा का संरक्षण एवं विकास किया तथा देश के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों में स्थान पाया वहीं अपनी अंतःचेतना के बल पर धर्म, दर्शन, राजनीति और संस्कृति का समय-समय पर आकलन किया और निष्कर्षों को भी सामने रखा। पुस्तक का प्रथम लेख ‘पलायनवाद और वीतरागता’ उनकी अंतःचेतना का प्रतिफलन है। वे अपने इस लेख में पलायनवाद के कारणों की व्याख्या करते हैं वे लिखते हैं कि ‘‘मन विकारों से भरा होना और शरीर से श्रम करने से जी चुराना तथा भयभीत रहना ही निष्क्रीयता और पलायनवाद को प्रोत्साहन देता है इससे मनुष्य कर्तव्य से च्युत हो जाता है।’’ अपने इसी लेख में वे आगे वीतरागता पर प्रकाश डालते हैं। वे लिखते हैं कि - ‘‘सब सुखी हों, सब का कल्याण हो, ऐसा करुणा का स्रोत अंदर से मन को भिगोए रहता है और मन द्रवित रहता है, तो उदासीनता का सच्चा अभ्युदय होता है। यही उदासीन भाव दृढ़ता को पा कर जब अंतरेग को सराबोर रखने में सफल होता है तो मनुष्य का आत्मा से आत्म-परिणाम और आत्म-स्वभाव से सीधा नाता जुड़ जाता है और संसार के सभी अन्य द्रव्यों से, यहां तक कि अपने स्वयं के शरीर से भी मोह, राग व आसक्ति हट जाती है। ऐसा होने पर ही राग बीत गया ऐसा कहा जाता है। यह सच्चे वीतरागी की विलक्षण योग्यता है।’’
संसार में रहते हुए सांसारिकता से विमुक्त रहना दुश्कर कार्य है। जब व्यक्ति कर्म की बात करता है तो उस कर्म के सफत या असफल होने को वह भाग्य से जोड़ने लगता है। भाग्य और पुरुषार्थ के बारे में चिंतन करते हुए लेखक मोतीलाल जैन ने ‘भाग्य (कर्मफल) और पुरुषार्थ’ शीर्षक के अंतर्गत लिखा है कि भाग्य पुरुषार्थ से ही निर्धारित होता है। अपने एक अन्य लेख ‘बदलता सोच’ में आधुनिक जीवनचर्या और पारम्परिक जीवन शैली के अंतर को बहुत सुंदर ढंग से सामने रखा है। इसमें वे कटाक्ष के साथ यथाथ्र को सामने रखते हैं और पाठकों को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते हैं। उदााहरण देते हुए वे लिखते हैं -‘‘आज दूरदर्शन ने ‘योगी’ के माध्यम से खाना खाने से पहले हाथ धोने का महत्व समझाया। आज का पढ़ा-लिखा वर्ग किसको समझााइश देना चाहता है। खुद को या अंग्रेजी सभ्यता में रंगे छुरी-कांटे से खाने वालों को, या गरीब वर्ग को। शायद सभी को यह शिक्षा उपयोगी है। विडम्बना यह है कि कुछ सालों से हम भारत के शहरी लोगों ने अपने बुजुर्ग लोगों को गंवार, अनपढ़ और जाहिल समझना शुरू कर दिया है। हमें परम्परा से जो जीवन शैली मिला करती थी उसमें इस नई सभ्यता ने बहुत गड़बड़ कर दिया है और उसमें विकृति पैदा कर दी है।’’ लेखक ने सिर्फ नई सभ्यता से उत्पन्न विकृति की ही बात नहीं की है अपितु पारम्परिक जीवन शैली का भी स्मरण किया है। लेखक के अनुसार - ‘‘हमारी परम्परा रसोई की शुद्धता पर ही आधारित थी।रसोई में जूते-चप्पल तो दूर, अशुद्ध वस्त्र तक ले जाना वर्जित था। नहा-धो कर ही भोजन किया जाता था। बर्तनों एवं गंदे हाथों की शुद्धि जल एवं राख अथवा साफ मिट्टी से ही की जाती थी। यहां तक कि भोजन पालथी लगा कर, बैठ कर शांतिपूर्वक किया जाता था। आजकल की पाश्चात्य सभ्यता और पढ़े-लिखे होने के अहंकार ने हमारी तमाम विधियों को उलट दिया है। अब तो टाॅयलेट कम बेडरूम सभ्यता है। जूते पहन कर भोजन करना ओर चप्पलें पहन कर रसोई बनाने का फैशन है। कई दिनों का बासी और खराब भोजन खाने को रख कर फ्रिज रसोई में क्रांतिकारी कार्य कर रहे हैं।’’ यह सच है कि जीवन शैली बदलती है तो हमारी सोच बदलती है और सोच के साथ दृष्टिकोण बदल जाता है। वर्तमान में पाश्चात्य प्रभावित जीवन शैली ने लगभग हरेक व्यक्ति को उपभोक्ता बना दिया है। जब व्यक्ति का दृष्टिकोण बाजार केन्द्रित हो जाए तो वह आत्मिक शांति को भुला कर नफा-नुक्सान में डूबता चला जाता है। भले ही इस फेर में वह अपने स्वास्थ्य ओर प्रतिष्ठा को भी दांव में लगा बैठता है। 

‘समग्र दृष्टिकोण’ में धर्म और धार्मिक दृष्टिकोण की भी चर्चा की गई है। ‘धर्म का स्वरूप और धर्मान्धता’ शीर्षक लेख में लेखक मोतीलाल जैन ने लिखा है - 
‘‘ जिन की ध्वनि है ओंकार रूप ।
  निर-अक्षर मय, महिमा अनूप ।।
 लोक में ऐसा कहा जाता है कि भगवान आदिनाथ ने ऐसा कहा, ऐसा समझा और कि भगवान महावीर ने ऐसा उपदेश दिया है। पूर्वाचार्यों ने आगम में जो लिखा है उससे यह भासित होता है कि केवलज्ञान हो जाने के उपरांत तीर्थकर तो इच्छारहित मौन हो जाते हैं।’’ लेखक आगे लिखते हैं कि -‘‘ऐसी दशा में तो शब्दों का उच्चारण तो हो ही नहीं सकता है।’’ लेखक धर्मांधता के बारे में चर्चा करते हुए लिखते हैं कि - ‘‘ हम लोगों को तो अपने रीत-रिवाजों और क्रियाकाण्डों ने ऐसा जकड़ रखा है कि हम अन्य दूसरों की बात शांति से सुनना भी नहीं चाहते हैं। समानता, सहकारिता और सहयोग की तो मात्र बातें होतीं हैं, मन तो सदैव पक्षपात से ही पीड़ित रहता है। पक्षपात से पीड़ित मनुष्य यदि निरपेक्षता की बात करे और अपनी बात के प्रभाव से अन्य को अपने पक्ष में लाने को लालायित रहता हो और व्याकुल रहता हो तो उसे कैसे उमझाया जा सकता है।’’

अपने एक और लेख ‘असाता ही अधर्म’ में मोतीलाल जैन ने अधर्म को स्पष्ट करने के लिए सरल शब्दों में असाता की व्याख्या की है -‘‘असाता यानी साता नहीं। साता यानी सुकून-शांति-चैन आदि। यह साता इच्छाओं की आंशिक पूर्ति हो जाने से नहीं होती है। वस्तुओं, पदार्थाे एवं इष्टजनों के मिल जाने पर तो उनके बिछुड़ जाने का भय फौरन सताने लगता है और हम उनकी सुरक्षा के लिए बेचैन होने लग जाते हैं। बेचैनी बढ़ना ही चिन्ता का कारण बनता है और इससे असाता में वृद्धि होने लगती है।’’

पुस्तक ‘समग्र दृष्टिकोण’के सम्पूर्ण कलेवर को दो भागों में बांटा गया है। पहले भाग में धर्म, जीवन, जीवनशैली आदि पर चिंतनयुक्त लेख हैं तो दूसरे भाग में राजनीति, अपसंस्कृति और भ्रष्टाचार को लक्ष्यित किया गया है। दूसरे भाग के प्रथम लेख ‘‘देश का सौभाग्य और दुर्भाग्य’’ में देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के बीच बिगड़त अंतर्संबंधों को रेखांकित किया है। लेखक मोतीलाल जैन लिखते हैं कि -‘‘अभी दो दिन पूर्व अख़बार में एक लेख पढ़ा। उसमें मंत्री महोदय ने किसी व्यक्ति की उच्च न्यायालय से जमानत हो जाने को दुर्भाग्यपूर्ण कहा। जब न्यायाधीशों के फैसले व उनकी राय दुर्भाग्यपूर्ण हो सकती है तो इस देश को सौभाग्य कौन प्रदान करेगा? जब न्यायपालिका को ही शासन देश का दुर्भाग्य कहने लगे तो फिर उस देश का सौभाग्य कहां छिपा है, यह शासन, मंत्री या प्रशासन ही बता सकते हैं।’’ 

इस पुस्तक में एक और महत्वपूर्ण लेख है जो वर्तमान व्यवस्थाओं पर तीखा कटाक्ष करते हुए सभी से चिंतन-मनन करने का आग्रह करता है। यह लेख है-‘‘सरकार और भगवान’’। इसमें लेखक मेातीलाल जैन निर्भीकता से लिखते हैं कि -‘‘आज की बीसवीं सदी के अंत में दो ही चीज़ें सर्वव्यापक हो रही हैं- एक भगवान तो दूसरी सरकार। दोनों ही अदृश्य हैं। यानी इन चर्मचक्षुओं से दिखाई नहीं देती हैं। दोनों को देखने, समझने व जानने के लिए ज्ञान व बुद्धि के नेत्र चाहिए। सो या तो पढ़े-लिखे सम्पन्नवर्ग के पास बुद्धि और चालाकी रहती है या फिर परम्परा से सत्तासीन घरानों में ही इस ज्ञान का दीप सदैव प्रकाशवान रहता है। भगवान का दर्शन कराने के लिए तो वेद, पुराण और शास्त्र हैं या फिर तीर्थों और मंदिरों में कुंण्डली जमाए, फन फैलाए हुए मठाधीश, पुजारी, पंडे, प्रभारी, मंत्री, प्रचारक आदि हैं। इनके द्वारा जनता को अपनी औकात, उद्गम स्थान, कुल गोत्र आदि सहित भगवान के विभिन्न रूपों व शक्तियों का दर्शन कराया जाता है और ज्ञान कराया जाता है।’’

इसी लेख में लेखक ने सरकार के संबंध में लिखा है कि-‘‘इसी प्रकार सरकार का दर्शन कराने को हमारा संविधान है। जिसे मुख्यतया दिल्ली में सात पर्दो के भीतर तालों में सुरक्षित रखा गया है और शायद उसकी एक ताम्रपत्रलिपि को ज़मीन के अंदर सीमेंट, कांक्रीट के मजबूत बाॅक्स में गाड़ दिया गया है ताकि हज़ार वर्ष बाद की पीढ़ी उसे ज्यों की त्यों सुरक्षित देख सके। सरकार का दर्शन कराने के लिए दिल्ली एवं सभी प्रादेशिक तीर्थ रूपी राजधानियों में राष्ट्रपति एवं राज्यपाल हैं। इसके साथ-साथ सरकार की शक्तियों को बताने के लिए मंत्री, उपमंत्री, सांसद, विधायक हैं जो समय-समय पर हमें सरकार के विराट रूप का दर्शन कराते रहते हैं।’’

सन् 2007 में श्री खेमचंद जैन चेरीटेबल ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक समसामयिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी प्रासंगिकता प्रत्येक काल और दशाओं के साथ जुड़ी हुई है। इस पुस्तक में संग्रहीत लेखों पर शंकरदत्त चतुर्वेदी, डाॅ. जयकुमार जलज, डाॅ. सुरेश आचार्य, प्रो. कांतिकुमार जैन, डाॅ. आर डी मिश्र, डाॅ. शेखरचंद जैन की विशेष टिप्पणियां भी समाहित हैं जो पुस्तक के कलेवर तथा पुस्तक के लेखक मोतीलाल जैन के विचारों को समझने में सहायता प्रदान करती हैं। यह पुस्तक बार-बार पढ़े जाने योग्य है क्यों कि यह वर्तमान परिदृश्य के साथ ही हमें अपनी जड़ों से भी जोड़ती है तथा मनन-चिंतन कर निष्कर्षों तक पहुंचने को प्रेरित करती है।
         ----------------------------------    
     
( दैनिक, आचरण  दि.02.11.2020)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #पुस्तक #पुनर्पाठ #Recitation
#MyColumn #Dr_Varsha_Singh  #मोतीलाल_जैन #समग्र दृष्टिकोण #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily
#drvarshasingh1

Saturday, October 17, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 12 | सुरेश आचार्य, शनीचरी का पण्डित | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत बारहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के सुपरिचित व्यंग्यकार प्रो. सुरेश आचार्य पर केन्द्रित पुस्तक "सुरेश आचार्य, शनीचरी का पंडित" का पुनर्पाठ।
   
सागर: साहित्य एवं चिंतन

पुनर्पाठ: ‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’
                               -डॉ. वर्षा सिंह
                             
         इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो एक व्यक्ति विशेष पर केंद्रित है अर्थात उस विशेष व्यक्ति के बारे में समग्र जानकारी प्रदान करने में सक्षम है, जो जनप्रिय है, लोकप्रिय है और साहित्य में ही नहीं वरन समाज में भी विशेष स्थान रखता है। जी हां, वे विशेष व्यक्ति हैं प्रो. सुरेश आचार्य। वे व्यंग विधा के पुरोधा हैं, वे सामाजिक सरोकार रखते हैं तथा वे जनप्रिय हैं। इसलिए इस किताब की अर्थवत्ता अपने आप द्विगुणित हो जाती है कि जो भी व्यक्ति डॉ सुरेश आचार्य के बारे में जानना चाहता है, उनके बचपन के बारे में, उनकी जीवनचर्या के बारे में, उनके लेखन के संबंध में, उनके राजनीतिक विचारों के बारे में, तो उसे यह सभी जानकारी इस पुस्तक में मिल सकती है। डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित यह पुस्तक कुल चारखंड में विभक्त है इसे अभिनंदन ग्रंथ भी कहा जा सकता है।

        सन् 1933 में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को काशी नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से एक अभिनंदन ग्रन्थ भेंट किया गया था जिसमें उनके अवदान पर देश-विदेश के साहित्यकारों, मनीषियों के लेख संकलित थे। उसकी भूमिका श्याम सुन्दर दास और कृष्ण दास के नाम से प्रकाशित थी। पर कहा जाता है कि यह वास्तव में नंददुलारे वाजपेयी ने लिखी थी। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित अभिनंदनग्रंथ में समालोचक मैनेजर पाण्डेय ने ‘‘आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका अभिनंदन’’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। अपने इस लेख में मैनेजर पांडेय ने अभिनंदनग्रंथ के बारे में लिखा कि ‘‘इस अभिनंदन ग्रन्थ में भूमिका और प्रस्तावना के बाद मुख्य भाग में निबंध, कविताएं, श्रद्धांजलियां, विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश के साथ एक चित्रावली भी है। निबंधों के विषयों और श्रद्धांजलियों  की विविधता चकित करने वाली है। इसमें अंग्रेजी में रेव. एडविन ग्रीब्स, पी. शेषाद्रि, प्रो. ए. बेरिन्निकोव और संत निहाल सिंह के लेख हैं। श्रद्धांजलि के अंतर्गत एक ओर महात्मा गांधी के साथ भाई परमानन्द हैं, तो दूसरी ओर अनेक विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश हैं। उस युग के अधिकांश कवियों की कविताएं इस अभिनंदन ग्रंथ में हैं। इस ग्रंथ में जो चित्रावली है उसका एक विशेष महत्व यह है कि अभिनंदन ग्रंथ के आज के पाठक आधुनिक हिंदी साहित्य के ऐसे लेखकों-कवियों का रूप-दर्शन कर सकेंगे, जिनका वे केवल नाम जानते हैं।’’
अपने लेख की अंतिम पंक्ति में मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि ‘‘इस ग्रंथ का केवल ऐतिहासिक महत्व नहीं है. इसके निबंध ‘ज्ञानराशि के संचित कोश’ होने के कारण आज भी पठनीय और मननीय हैं।’’ ठीक यही बात लागू होती है ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पर।
         ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पुस्तक के चार खंडों में प्रथम खंड है- ‘‘जल बिच कुंभ: न था मैं खुदा था’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य का आत्मकथ्य है। जिसमें उन्होंने सागर के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त किया है। इसी खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य से तीन लोगों ने बातचीत की है - लक्ष्मी पांडे, प्रो. अरुण कुमार मिश्रा और प्रो. रूपा गुप्ता ने।

      खंड 2- ‘‘सर्वे सुखम् गृह माययौ: दिल के बहलाने को गालिब ये ख़्याल अच्छा है’’ के अंतर्गत प्रोफेसर आचार्य का जीवन परिचय, वंशावली तथा परिजनों की दृष्टि में आचार्य जी के व्यक्तित्व का विवरण है जिसमें शांभवी आचार्य, शुभ्रांशु आचार्य, कृति आचार्य, श्वेतांशु आचार्य, शारदवद आचार्य, प्रतिभा आचार्य, शांतनु आचार्य, डॉ संजय आचार्य, पदमा आचार्य, शाश्वत आचार्य, डॉ शैलेश आचार्य तथा आरती तिवारी के विचार शामिल किए गए हैं।

         खंड 3- ‘‘ते तुलसी तब राम बिन जे अब राम सहाय: कमी जो पाई तो अपने खुलूस में पाई’’ - इस खंड में प्रोफेसर आचार्य को लिखे गए पत्र, अभिनंदन पत्र एवं सम्मान पत्र शामिल हैं। इसी खंड में प्रोफेसर आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखी गई श्याम मनोहर सिरोठिया, मायूस सागरी, कालिका प्रसाद शुक्ल ‘विजयी’ एवं हरिहर प्रसाद खड्डर द्वारा लिखी गई कविताएं संकलित है। साथ ही संकलित है प्रोफेसर सुरेश आचार्य की विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के अवसर पर की गई टिप्पणियां।

         खंड 4- ‘‘हम चाकर रघुवीर के: हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित कुल 50 लेख हैं। इस महत्वपूर्ण खंड में हरिशंकर परसाई, कांति कुमार जैन, उदय जैन,  रामेश्वर नीखरा, सत्य मोहन वर्मा, सुरेंद्र सिंह नेगी, कृष्णचंद्र लाल, सुरेंद्र दुबे, सुधाकर सिंह, कालीचरण स्नेही, हरिशंकर मिश्र, निर्मल चंद निर्मल, लक्ष्मी नारायण चैरसिया, चंदा बैन, राजेंद्र यादव, जीवनलाल जैन, बैजनाथ प्रसाद, रूपा गुप्ता, मनोहर देवलिया, टीकाराम त्रिपाठी, आशुतोष राणा, सरोज गुप्ता, अशोक मिजाज, अरुण कुमार मिश्र, नरेंद्र सिंह, स्मृति शुक्ला, मणिकांत चैबे, वेद प्रकाश दुबे, भोलाराम भारतीय, राजेश दुबे, शरद सिंह, नरेंद्र दुबे, राजेंद्र नागर, महेश तिवारी, निरंजना जैन, गजाधर सागर, सुखदेव प्रसाद तिवारी, छाया चौकसे, उमाकांत मिश्र, स्वर्णा वाजपेई, चंचला दवे, निधि जैन, सुखदेव मिश्र, हेमचंद्र चैधरी, किशन पंत, आशीष ज्योतिषी, ममता यादव, नेमीचंद जैन विनम्र तथा लक्ष्मी पांडे के लेख शामिल हैं।

       इस पुस्तक में प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने अपने जीवन के कुछ ऐसे प्रसंग रखे हैं जिनसे तत्कालीन सामाजिक जीवन का भी पता चलता है जैसे अपने आत्मकथ्य में ‘‘क्या सुनाएं दास्तां’’ के अंतर्गत वे लिखते हैं- ‘‘मैं खुद छोटे पंडित की भूमिका में पूजा पाठ कथा वार्ता घर-घर कराने घूमने लगा। साल में दो हाफ कमीज़ो की संख्या घटकर एक रह गई। खाकी हाफ पेंट थिगड़े लगाकर पहने जाने लगे। मेरी उद्दंडता और सीनाजोरी में इज़ाफ़ा हुआ। सागर तालाब उन दिनों शहर का एकमात्र जल स्रोत था। गर्मियों में भी पानी से लबालब भरा रहता। कमल खिलते, सिंघाड़े लगते, चक्रतीर्थ यानी चकरा घाट से बस स्टैंड का ज्यादातर यातायात नावों के जरिए होता था। चार आने सवारी। सामान फ्री। तालाब के किनारों पर बने पत्थर की सीढ़ियों पर लोग कपड़े धोते, पानी में छलांग मार कर निकलते और सीढ़ियों पर बैठकर साबुन लगाते। आमतौर पर कपड़े धोने और नहाने का एक ही साबुन होता था। लोकल मेड। बड़े लोग लाइफबाय से नहाते और सनलाइट साबुन से कपड़े धोते।’’

 

  

      यह विवरण सहज सरल सामाजिक व्यवस्था एवं वातावरण का दृश्य आंखों के सामने चलचित्र के समान चला देता है। इस ग्रंथ में अनेक रोचक प्रसंग पढ़ने को मिलते हैं जैसी अपने वक्तव्य के अंतर्गत प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने हरिशंकर परसाई के साथ जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए यह घटना लिखी है जो बड़ी ही दिलचस्प है - ‘‘मैं उनके घर ठहरा और लघु शोध प्रबंध को प्रमाणिक बनाने रोज शाम 7 बजते-बजते परसाई जी के घर पहुंच जाता। उनसे चर्चा में एक-दो घंटे गुजार कर लौटता। फिर नोट्स लेता। मैजारिटी की भाषा में परसाई जी बड़े भक्त आदमी थे। शाम होते ही भक्ति-भजन में लग जाते थे। एक शाम उन्होंने मुझसे सीधे पूछ लिया- ‘यार आचार्य, तुम पीते हो या नहीं?’ अल्लाह! क्या कहूं!! मैंने उत्तर दिया- ‘जी, मैं परहेजगार तो नहीं हूं पर रोज पीने की मेरी हैसियत नहीं है।’ उन दिनों व्हाइट हार्स नामक अंग्रेजी शराब उनका प्रिय ब्रांड थी। उन्होंने कहा- ‘प्रियवर, तब तुम सुबह 9 बजे आया करो। शाम को अपनी बात ठीक से नहीं हो पाती। उस वक्त मैं सफेद घोड़े पर सवार होता हूं और तुम पैदल चलते हो।’ मैंने समय बदल लिया। यह लघु शोध प्रबंध परसाई जी पर पहला शोध कार्य था। एम. ए. उत्तरार्द्ध की परीक्षा का यह आठवां वैकल्पिक प्रश्न पत्र था। निर्धारित 100 अंकों में से मुझे 60 अंक मिले। विभाग में कार्यरत एक अध्यापक महोदय के भतीजे को छियान्वे। पूर्वाद्ध में वे बहुत पीछे थे। उत्तरार्ध में संबंधित गुरुजनों के इस जादू के बावजूद मेरी पोजीशन बची रही।’’

        इस तरह के प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि आमतौर पर अभिनंदन ग्रंथों में संबंधित व्यक्ति को महिमामंडित ही किया जाता है। उसकी महिमाओं के बखान के अतिरिक्त अन्य जानकारियां नहीं होती हैं। किंतु इस ग्रंथ में अभिनंदन के साथ-साथ समय अनुसार परिस्थितियां, वातावरण, प्रशासनिक स्थितियां, शैक्षिक स्थितियां इन सभी के बारे में पता चलता है कि शिक्षा क्षेत्र में किस तरह से नंबरों के उतार-चढ़ाव का भ्रष्टाचार व्याप्त था। योग्यता को संबंधों के आधार पर तौला जाता था। इस प्रकार के तथ्य इस ग्रंथ को अन्य अभिनंदन ग्रंथों से इसको अलग ठहराते हैं। इस प्रकार की घटनाओं के उल्लेख से यह भी पता चलता है कि हरिशंकर परसाई जी जैसे ख्यातिनाम व्यंगकार झूठ और दिखावे में लिप्त नहीं थे बल्कि वे जैसे थे वैसे ही जीना पसंद करते थे। उन्होंने अपने शिष्य के सामने झूठा दिखावा न करते हुए इस बात को उजागर कर दिया कि वे मदिरापान करते हैं। यह तथ्य सुरेश आचार्य के बहाने परसाई जी के एक सरल, सहज व्यक्तित्व की झलक सामने रखता है।

           वहीं सुरेश आचार्य के बारे में हरिशंकर परसाई के विचार और भी महत्वपूर्ण हैं। वे लिखते हैं कि- ‘‘सुरेश आचार्य बुंदेलखंडी है। बुंदेली भाषा बहुत मीठी और लयात्मक होती है। जब बुंदेलखंडी लोग आपस में बात करते हैं तो ध्वनि की लचक बहुत मीठी होती है। मगर बुंदेली वीर भी इतिहास प्रसिद्ध हैं, तो इस मीठी भाषा में क्रोध कैसे व्यक्त किया जाता होगा? कठोर गाली कैसे दी जाती होगी? गुस्से में बुंदेलखंडी सामने वाले से बड़ी मीठी भाषा में कहेगा- ए तुम भौतई बढ़ रये हो इते। अब मौं चलाओ तो हम उठा के मैंक दैहें। कितनी मिठास है शब्दों में। लय है। मगर वह क्या कह रहा है? वह कह रहा है- तुम बहुत बढ़ रहे हो। अब मुंह चलाया तो उठा कर फेंक दूंगा। सुरेश आचार्य की बुंदेली में एकाध ही रचना है। बाकी खड़ी बोली हिंदी में है। मगर उनके व्यक्तित्व में और व्यंग में यह मूल बुंदेलीपन है। उनका वक्तव्य सहज, रोचक और निर्वैर लगता है। मगर उसमें भीतर वही मैंक देने का अर्थ होता है। उनकी भाषा में कठोरता नहीं है। व्यंग में ऊपर से घन मारने जैसा प्रहार नहीं दिखता। मगर वे सहज ही चलते-चलते ऐसे रिमार्क कर जाते हैं जिनसे हमारी समकालीन व्यवस्था की कलई खुल जाती है। झूठ, फरेब, पाखंड, भ्रष्टाचार, विसंगति आदि पर एकाध रिमार्क कर के वे आगे बढ़ जाते हैं।’’

        प्रो. सुरेश आचार्य के व्यंग्य ही नहीं अपितु व्यंग्य और समाज के परस्पर संबंधों पर किया गया शोधग्रंथ भी बहुत प्रसिद्ध है। प्रो. आचार्य पर एकाग्र इस ग्रंथ में उनकी पुस्तक ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर लेख लिखते हुए देश की प्रतिष्ठित लेखिका डाॅ शरद सिंह ने टिप्पणी की है कि -‘‘व्यंग्य समाज से ही क्यों उत्पन्न होता है? इस प्रश्न का उत्तर डाॅ. सुरेश आचार्य ने अपने शोधपूर्ण ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में विस्तारपूर्वक दिया है। डाॅ. सुरेश आचार्य हिन्दी साहित्य जगत के एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर ही डाॅ. आचार्य को डी. लिट. की उपाधि दी गई।’’

       प्रो. आचार्य की लेखकीय एवं व्यक्तित्व की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए पत्रकार एवं ‘आचरण’ समाचार पत्र की प्रबंध संपादक निधि जैन ने लिखा है कि- ‘‘शब्दों का, मुहावरों का, लोकोक्तियों का इतना भण्डार आचार्य जी के पास है जितना अन्यत्र ही किसी के पास होगा। आचार्य जी अच्छे शिक्षक होने के साथ-साथ प्रसिद्ध साहित्यकार, आलोचक, व्यंग्यकार, ज्योतिषी और कथावाचक भी हैं।’’ 

         साहित्यसेवी उमाकांत मिश्र ने प्रो. सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व पर बहुत ही सटीक लेख लिखा है जिसकी कुछ पंक्तियां देखिए- ‘‘आखिर उन्हें हम किस रूप में देखना ज्यादा पसंद करेंगे? एक विद्वान वक्ता, एक प्रोफेसर, एक अति गंभीरता के साथ साथ सादगी लिए हुए व्यक्तित्व, एक समीक्षक, साहित्यकार जिसकी कोई मिसाल ही नहीं, एक व्यंगकार जो आपको अवसाद से मुक्त कराता हो, गमगीन माहौल को अपनी वाकपटुता और ज्ञानपूर्ण उद्बोधनों के माध्यम से आपके हृदय में हलचल मचा देता हो, आपको ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता हो या फिर एक ऐसे यारबाज के रूप में जो बगैर आपकी उम्र की परवाह किए बुजुर्गों को बल्कि छोटे-छोटे बच्चों के बीच भी अपनी उपस्थिति एक यार, एक मित्र, एक दोस्त और महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में दर्ज़ करता हो।’’

         अनेक रोचक प्रसंग और आत्मीयता की अनेक लहरों से भीगे हुए, प्रो. आचार्य की खूबियों की सीपियां समेटे हुए महासागर की समग्रता लिए हुए डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित इस ग्रंथ की सबसे बड़ी उपादेयता यह है कि यह अपने प्रिय व्यक्ति, अपने प्रिय साहित्यकार, अपने प्रिय समाजसेवी, अपने प्रिय राजनीतिज्ञ (राजनेता नहीं), अपने प्रिय मार्गदर्शक के बारे में जानने का भरपूर अवसर प्रदान करता है और बार-बार पढ़े जाने की ललक पैदा करता है।
                -----------------------


( दैनिक, आचरण  दि.17.10.2020)
#आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #पुस्तक #पुनर्पाठ #Recitation
#MyColumn #Dr_Varsha_Singh  #डॉ_सुरेश_आचार्य #सुरेश_आचार्य_शनीचरी_के_पंडित #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily
#drvarshasingh1