Monday, January 25, 2021
सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 17 | चिन्तन की गलियों से | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह
Friday, January 8, 2021
सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 16 | बात कैत दो टूक कका जू | बुंदेली ग़ज़ल संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह
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| बात कैत दो टूक कका जू (बुंदेली ग़ज़ल संग्रह) - महेश कटारे 'सुगम' |
Saturday, January 2, 2021
सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 15 | जगत मेला चलाचल का | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह
सागर: साहित्य एवं चिंतन
पुनर्पाठ: जगत मेला चलाचल का
- डॉ. वर्षा सिंह
इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को यूं तो जिसका प्रकाशन वर्ष 2020 में ही हुआ है किन्तु इसे मैं कई बार पढ़ चुकी हूं और मुझे लगता है कि जो भी पाठक इस पुस्तक को पढ़ेगा वह पुस्तक के मूल मर्म की गहराई में उतरने और चिन्तन करने के लिए इसे बार-बार पढ़ेगा। ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ सागर नगर के कवि निर्मलचंद ‘‘निर्मल’’ का काव्य संग्रह हैं जिसमें रोजमर्रा के जीवन से जुड़े तथ्यों के साथ ही जगत की संरचना एवं उपादेयता की काव्यात्मक व्याख्या की गई है। इस संग्रह में संग्रहीत कुल 64 काव्य रचनाएं जीवन दर्शन और आध्यात्मिकता का सम्वेत स्वर प्रवाहित करती हैं। जैसा कि पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट है कि कवि इस बात का स्मरण कराना चाहता हैं कि संसार नश्वर है। इस संदर्भ में मुझे याद आता है प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित कुमार गंधर्व का गाया यह भजन -
जइसे पात गिरे तरुवर के, मिलना बहुत दुहेला
ना जानूं किधर गिरेगा, लग्या पवन का रेला
उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला
अर्थात पेड़ से गिरे पत्ते को हवा कहां ले जाएगी किसी को पता नहीं होता। ठीक उसी तरह मृत्यु के बाद प्राण कहां जाएंगे यह भी कोई नहीं जानता। जन्म और मृत्यु के बीच जीवन के जो अनुभव मिलते हैं वे सुख-दख दोनों का अनुभव कराते हैं। ये अनुभव उस मेले के समान हैं जो जब तक लगा रहता है तब तक कोलाहल से भरपूर रहता है और मेला उठते ही गहन नीरवता छा जाती है। फिर भी प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवनपर्यन्त किसी न किसी कर्म से जुड़े रहना पड़ता है। कर्म से अनुभव उपजता है और अनुभव मनुष्य को जीवन की दशाएं समझाता है। कवि निर्मल के इस संग्रह के नाम वाली रचना ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ की ये पंक्तियां जगत के प्रति कवि के चिन्तन को सामने रखती हैं-
एक पल जो दूसरे से प्राप्त कर अनुभव बढ़ा है
एक पल अवरुद्ध हो कर ही अचेतन सा पड़ा है
एक पल जो सृष्टि का निर्माण करता आ रहा है
एक पल विध्वंस के ही गीत अब तक गा रहा है
एक पल हम, एक पल तुम, एक पल पूरा जगत है
एक पल की ही धरोहर सृष्टि का जीवन सतत है
इसी कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि ने कहा है-
कट गए वो था भरोसा अब भरोसा नहीं पल का
रोज लगता रोज उठता जगत मेला चलाचल का
संसार और जीवन को ले कर दार्शनिकों ने सदा विचार मंथन किया है। विशेष बात यह है कि बात जब धर्म-दर्शन की आती है तो संसार को ले कर सभी धर्मों में लगभग एक सा निष्कर्ष दिखाई देता है। जैन दर्शन में संसार जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के अनवरत क्रम को कहते हैं। इसमें संसार को दुखों से भरा हुआ और त्याज्य माना गया है। हिन्दू धर्म में भागवत पुराण के स्कंध 10 पूर्वाद्ध, अध्याय 2 में संसार की व्याख्या वृक्ष से तुलना करते हुए की गई है। इसमें कहा गया है कि संसार एक सनातन वृक्ष है। जिसके दो फल हैं - सुख और दुख। तीन जड़ें हैं - सत्व, रज और तम। चार रस हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसके छः स्वभाव हैं - पैदा होना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट होना। इस प्रकार भागवत पुराण में संसार की विस्तृत व्याख्या की गई है। किन्तु मनुष्य इस सत्य को अर्थात् संसार की नश्वरता को भूल कर स्वार्थ में डूबा रहता है। यह स्वार्थ कभी परिवारों में दरार डालता है तो कभी समाज को आहत करता है ओर जब यही स्वार्थ विकराल रूप धारण कर लेता है तो देशों के बीच शत्रुता के भाव जगा देता है। जबकि इस प्रकार की सारी शत्रुताओं का अस्तित्व उसके लिए उसी समय तक रहता है जब तक वह जीवित है। इस तथ्य को कवि निर्मल ने अपनी इन पंक्तियों में बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है -
संास की दीवार जिस दिन हट गई
दूरियां मुल्क-ए-अदम की पट गई
दिल समझने को नहीं राजी हुआ
जो इबारत मिट गई सो मिट गई
इसी रचना में कवि आगे लिखते हैं-
प्रश्न ‘‘निर्मल‘‘ आज तक सुलझा पहीं
मृत्यु अनगिन दर्शनों में बंट गई
वस्तुतः इस संसार और जीवन को समझना बहुत कठिन है। अनेक दार्शनिक और अनेक महापुरुष इसे समझने का प्रयास कर चुके हैं किन्तु आज भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। इसीलिए कवि निर्मल अपनी कविता ‘‘ऐसा गीत लिखा है तूने’’ में इस सृष्टि के रचेता को संबांधित करके लिखते हैं -
ऐसा गीत लिखा है तूने
बांचन बारे थके समझ भी हारी
भाषाएं हैं भिन्न, धरातल भिन्न
नए-नए आयाम, नई पहचान
आते-जाते छंद सभी मेहमान
वर्तमान के और विगत के
अर्थ अलग हैं
खुलती जितनी पर्तें
उनकी शर्त अलग है
कबिरा ने बांचा इसको
तुलसी ने बांचा
नव लय पर ले तम्बूरा
मीरा ने नाचा
महाप्रभु चैतन्य खो गए इसकी धुन में
बाल्मीकि ने बांचा इसको गुन-अवगुन में
कुछ ने अर्थ लगाए गहरे
कुछ ने समझी मायाचारी
ऐसा गीत लिखा है तूने
बांचन बारे थके समझ भी हारी
जब सांसारिकता उलझन भरी और भ्रमित करने वाली हो तो यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन सा मार्ग चलने लायक है। इस संग्रह की कविता ‘‘सीधा मार्ग’’ में कवि निर्मल लिखते हैं -
कौन से पथ पर चलूं कि मार्ग सीधा पा सकूं
भ्रमित हैं सारी दिशाएं वाकपटुता दिशाहीन
लालची शाखाओं को कैसे कहेंगे हम प्रवीण
शांति की दूकान में भी लोभ की पट्टी चढ़ी
क्या है पावन, क्या अपावन, समझ में दुविधा बढ़ी
शुद्धता के सूत्र कैसे किस तरह समझा सकूं
कौन से पथ पर चलें कि मार्ग सीधा पा सकूं
जब जीवन के उचित मार्ग का प्रश्न कवि ने उठाया तो उसका उत्तर भी उसने स्वयं ही दे दिया। ‘‘विश्व एक गांव’’ शीर्षक कविता में कवि निर्मल कहते हैं कि -
कल्याण करने विश्व का आया मनुष्य है
शक्ति है कोई जिसने पठाया मनुष्य है
इस विश्व को तो एकता के सूत्र में बांधो
यह मानवीय दृष्टि भी लाया मनुष्य है
सम्हलो, सम्हल के अपने कदम आप बढ़ायें
निःस्वार्थ बने, नाति का उद्यान लगायें
कितने दिनों को आयें हैं रखना है इसका ध्यान
मानव समाज को यही संदेश पठायें
जब बात समाज और जीवन मार्ग की आती है तो साधना का मार्ग दो भागों में बंट जाता है - व्यष्टि साधना और समष्टि साधना। व्यष्टि साधना का तात्पर्य है व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति के लिए किए जाने वाले कर्म, जैसे- देवता का नाम जपना, आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ना आदि। व्यष्टि साधना निज उत्थान के लिए होती है जबकि समष्टि साधना सम्पूर्ण समाज के आध्यात्मिक उत्थान के लिए की जाती है। जिसका एक बहु प्रचलित उदाहरण है सत्संग का आयोजन। एक साधक को व्यष्टि साधना और समष्टि साधना के मध्य सामंजस्य बनाए रखना चाहिए। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जैसे यदि दीपक में रखा तेल व्यष्टि साधना है तो उसकी लौ समष्टि साधना है। यदि दीपक में तेल कम होगा तो प्रकाश भी कम समय के लिए मिलेगा। कहने का आशय यह है कि निज उत्थान से ही समाज उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है। निजता की बात करते हुए कवि निर्मल ने अपनी निजत्व शीर्षक कविता में लिखा है -
आप स्वयं स्वामी हैं खुद के
इतना ध्यान रहे
खोजो विश्व स्वयं में ही तुम
प्रज्ञा सबला होगी
निर्मोही स्वभाव के भीतर
मन बन जाता जोगी
विचलित न होना पथ में
इसका भान रहे
जो जाग्रत है नाम उसी का
रहता है जग में
भटकन वाले भटक रहे हैं
अनगिनती मग में
ज्ञानपुंज तलवार दुधारी
समता म्यान रहे
कवि निर्मल चंद निर्मल के इस काव्य संग्रह ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ में जीवन दर्शन से रची बसी काव्य रचनाएं हैं जिनमें संसार के अस्तित्व, मनुष्य के कर्म, निजता और कर्तव्य जैसे बिन्दुओं की व्याख्या की गई है। इन रचनाओं की विशेषता यह है कि ये उपदेशात्मक नहीं हैं वरन् परस्पर विचार विमर्श की भांति हैं। इसीलिए ये बोझिल नहीं हैं अपितु इन्हें बारम्बार पढ़ने और चिंतन करने की इच्छा जागृत होती है। इस दृष्टि से पुनर्पाठ योग्य यह काव्य संग्रह अपने महत्व को स्वयं स्थापित करता है। और, अंत में प्रस्तुत हैं कवि निर्मल की ये चार पंक्तियां जो चिंतन का आह्वान करती हैं -
तेरा नहीं होता कभी मेरा नहीं होता
संसार में स्थाई बसेरा नहीं होता
तेरी हवस की दौड़ तुझे क्या निभाएगी
उड़ने के बाद डाल पै डेरा नहीं होता
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Saturday, December 19, 2020
सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 14 | हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह
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| "हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव" - लेखिका डॉ. विद्यावती "मालविका", पुस्तक के प्रथम संस्करण का मुखावरण पृष्ठ |
Monday, November 2, 2020
सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 13 | समग्र दृष्टिकोण | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह
Saturday, October 17, 2020
सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 12 | सुरेश आचार्य, शनीचरी का पण्डित | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह
प्रिय ब्लॉग पाठकों,
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत बारहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के सुपरिचित व्यंग्यकार प्रो. सुरेश आचार्य पर केन्द्रित पुस्तक "सुरेश आचार्य, शनीचरी का पंडित" का पुनर्पाठ।
सागर: साहित्य एवं चिंतन
पुनर्पाठ: ‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’
-डॉ. वर्षा सिंह
इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो एक व्यक्ति विशेष पर केंद्रित है अर्थात उस विशेष व्यक्ति के बारे में समग्र जानकारी प्रदान करने में सक्षम है, जो जनप्रिय है, लोकप्रिय है और साहित्य में ही नहीं वरन समाज में भी विशेष स्थान रखता है। जी हां, वे विशेष व्यक्ति हैं प्रो. सुरेश आचार्य। वे व्यंग विधा के पुरोधा हैं, वे सामाजिक सरोकार रखते हैं तथा वे जनप्रिय हैं। इसलिए इस किताब की अर्थवत्ता अपने आप द्विगुणित हो जाती है कि जो भी व्यक्ति डॉ सुरेश आचार्य के बारे में जानना चाहता है, उनके बचपन के बारे में, उनकी जीवनचर्या के बारे में, उनके लेखन के संबंध में, उनके राजनीतिक विचारों के बारे में, तो उसे यह सभी जानकारी इस पुस्तक में मिल सकती है। डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित यह पुस्तक कुल चारखंड में विभक्त है इसे अभिनंदन ग्रंथ भी कहा जा सकता है।
सन् 1933 में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को काशी नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से एक अभिनंदन ग्रन्थ भेंट किया गया था जिसमें उनके अवदान पर देश-विदेश के साहित्यकारों, मनीषियों के लेख संकलित थे। उसकी भूमिका श्याम सुन्दर दास और कृष्ण दास के नाम से प्रकाशित थी। पर कहा जाता है कि यह वास्तव में नंददुलारे वाजपेयी ने लिखी थी। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित अभिनंदनग्रंथ में समालोचक मैनेजर पाण्डेय ने ‘‘आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका अभिनंदन’’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। अपने इस लेख में मैनेजर पांडेय ने अभिनंदनग्रंथ के बारे में लिखा कि ‘‘इस अभिनंदन ग्रन्थ में भूमिका और प्रस्तावना के बाद मुख्य भाग में निबंध, कविताएं, श्रद्धांजलियां, विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश के साथ एक चित्रावली भी है। निबंधों के विषयों और श्रद्धांजलियों की विविधता चकित करने वाली है। इसमें अंग्रेजी में रेव. एडविन ग्रीब्स, पी. शेषाद्रि, प्रो. ए. बेरिन्निकोव और संत निहाल सिंह के लेख हैं। श्रद्धांजलि के अंतर्गत एक ओर महात्मा गांधी के साथ भाई परमानन्द हैं, तो दूसरी ओर अनेक विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश हैं। उस युग के अधिकांश कवियों की कविताएं इस अभिनंदन ग्रंथ में हैं। इस ग्रंथ में जो चित्रावली है उसका एक विशेष महत्व यह है कि अभिनंदन ग्रंथ के आज के पाठक आधुनिक हिंदी साहित्य के ऐसे लेखकों-कवियों का रूप-दर्शन कर सकेंगे, जिनका वे केवल नाम जानते हैं।’’
अपने लेख की अंतिम पंक्ति में मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि ‘‘इस ग्रंथ का केवल ऐतिहासिक महत्व नहीं है. इसके निबंध ‘ज्ञानराशि के संचित कोश’ होने के कारण आज भी पठनीय और मननीय हैं।’’ ठीक यही बात लागू होती है ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पर।
‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पुस्तक के चार खंडों में प्रथम खंड है- ‘‘जल बिच कुंभ: न था मैं खुदा था’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य का आत्मकथ्य है। जिसमें उन्होंने सागर के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त किया है। इसी खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य से तीन लोगों ने बातचीत की है - लक्ष्मी पांडे, प्रो. अरुण कुमार मिश्रा और प्रो. रूपा गुप्ता ने।
खंड 2- ‘‘सर्वे सुखम् गृह माययौ: दिल के बहलाने को गालिब ये ख़्याल अच्छा है’’ के अंतर्गत प्रोफेसर आचार्य का जीवन परिचय, वंशावली तथा परिजनों की दृष्टि में आचार्य जी के व्यक्तित्व का विवरण है जिसमें शांभवी आचार्य, शुभ्रांशु आचार्य, कृति आचार्य, श्वेतांशु आचार्य, शारदवद आचार्य, प्रतिभा आचार्य, शांतनु आचार्य, डॉ संजय आचार्य, पदमा आचार्य, शाश्वत आचार्य, डॉ शैलेश आचार्य तथा आरती तिवारी के विचार शामिल किए गए हैं।
खंड 3- ‘‘ते तुलसी तब राम बिन जे अब राम सहाय: कमी जो पाई तो अपने खुलूस में पाई’’ - इस खंड में प्रोफेसर आचार्य को लिखे गए पत्र, अभिनंदन पत्र एवं सम्मान पत्र शामिल हैं। इसी खंड में प्रोफेसर आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखी गई श्याम मनोहर सिरोठिया, मायूस सागरी, कालिका प्रसाद शुक्ल ‘विजयी’ एवं हरिहर प्रसाद खड्डर द्वारा लिखी गई कविताएं संकलित है। साथ ही संकलित है प्रोफेसर सुरेश आचार्य की विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के अवसर पर की गई टिप्पणियां।
खंड 4- ‘‘हम चाकर रघुवीर के: हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित कुल 50 लेख हैं। इस महत्वपूर्ण खंड में हरिशंकर परसाई, कांति कुमार जैन, उदय जैन, रामेश्वर नीखरा, सत्य मोहन वर्मा, सुरेंद्र सिंह नेगी, कृष्णचंद्र लाल, सुरेंद्र दुबे, सुधाकर सिंह, कालीचरण स्नेही, हरिशंकर मिश्र, निर्मल चंद निर्मल, लक्ष्मी नारायण चैरसिया, चंदा बैन, राजेंद्र यादव, जीवनलाल जैन, बैजनाथ प्रसाद, रूपा गुप्ता, मनोहर देवलिया, टीकाराम त्रिपाठी, आशुतोष राणा, सरोज गुप्ता, अशोक मिजाज, अरुण कुमार मिश्र, नरेंद्र सिंह, स्मृति शुक्ला, मणिकांत चैबे, वेद प्रकाश दुबे, भोलाराम भारतीय, राजेश दुबे, शरद सिंह, नरेंद्र दुबे, राजेंद्र नागर, महेश तिवारी, निरंजना जैन, गजाधर सागर, सुखदेव प्रसाद तिवारी, छाया चौकसे, उमाकांत मिश्र, स्वर्णा वाजपेई, चंचला दवे, निधि जैन, सुखदेव मिश्र, हेमचंद्र चैधरी, किशन पंत, आशीष ज्योतिषी, ममता यादव, नेमीचंद जैन विनम्र तथा लक्ष्मी पांडे के लेख शामिल हैं।
इस पुस्तक में प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने अपने जीवन के कुछ ऐसे प्रसंग रखे हैं जिनसे तत्कालीन सामाजिक जीवन का भी पता चलता है जैसे अपने आत्मकथ्य में ‘‘क्या सुनाएं दास्तां’’ के अंतर्गत वे लिखते हैं- ‘‘मैं खुद छोटे पंडित की भूमिका में पूजा पाठ कथा वार्ता घर-घर कराने घूमने लगा। साल में दो हाफ कमीज़ो की संख्या घटकर एक रह गई। खाकी हाफ पेंट थिगड़े लगाकर पहने जाने लगे। मेरी उद्दंडता और सीनाजोरी में इज़ाफ़ा हुआ। सागर तालाब उन दिनों शहर का एकमात्र जल स्रोत था। गर्मियों में भी पानी से लबालब भरा रहता। कमल खिलते, सिंघाड़े लगते, चक्रतीर्थ यानी चकरा घाट से बस स्टैंड का ज्यादातर यातायात नावों के जरिए होता था। चार आने सवारी। सामान फ्री। तालाब के किनारों पर बने पत्थर की सीढ़ियों पर लोग कपड़े धोते, पानी में छलांग मार कर निकलते और सीढ़ियों पर बैठकर साबुन लगाते। आमतौर पर कपड़े धोने और नहाने का एक ही साबुन होता था। लोकल मेड। बड़े लोग लाइफबाय से नहाते और सनलाइट साबुन से कपड़े धोते।’’
यह विवरण सहज सरल सामाजिक व्यवस्था एवं वातावरण का दृश्य आंखों के सामने चलचित्र के समान चला देता है। इस ग्रंथ में अनेक रोचक प्रसंग पढ़ने को मिलते हैं जैसी अपने वक्तव्य के अंतर्गत प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने हरिशंकर परसाई के साथ जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए यह घटना लिखी है जो बड़ी ही दिलचस्प है - ‘‘मैं उनके घर ठहरा और लघु शोध प्रबंध को प्रमाणिक बनाने रोज शाम 7 बजते-बजते परसाई जी के घर पहुंच जाता। उनसे चर्चा में एक-दो घंटे गुजार कर लौटता। फिर नोट्स लेता। मैजारिटी की भाषा में परसाई जी बड़े भक्त आदमी थे। शाम होते ही भक्ति-भजन में लग जाते थे। एक शाम उन्होंने मुझसे सीधे पूछ लिया- ‘यार आचार्य, तुम पीते हो या नहीं?’ अल्लाह! क्या कहूं!! मैंने उत्तर दिया- ‘जी, मैं परहेजगार तो नहीं हूं पर रोज पीने की मेरी हैसियत नहीं है।’ उन दिनों व्हाइट हार्स नामक अंग्रेजी शराब उनका प्रिय ब्रांड थी। उन्होंने कहा- ‘प्रियवर, तब तुम सुबह 9 बजे आया करो। शाम को अपनी बात ठीक से नहीं हो पाती। उस वक्त मैं सफेद घोड़े पर सवार होता हूं और तुम पैदल चलते हो।’ मैंने समय बदल लिया। यह लघु शोध प्रबंध परसाई जी पर पहला शोध कार्य था। एम. ए. उत्तरार्द्ध की परीक्षा का यह आठवां वैकल्पिक प्रश्न पत्र था। निर्धारित 100 अंकों में से मुझे 60 अंक मिले। विभाग में कार्यरत एक अध्यापक महोदय के भतीजे को छियान्वे। पूर्वाद्ध में वे बहुत पीछे थे। उत्तरार्ध में संबंधित गुरुजनों के इस जादू के बावजूद मेरी पोजीशन बची रही।’’
इस तरह के प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि आमतौर पर अभिनंदन ग्रंथों में संबंधित व्यक्ति को महिमामंडित ही किया जाता है। उसकी महिमाओं के बखान के अतिरिक्त अन्य जानकारियां नहीं होती हैं। किंतु इस ग्रंथ में अभिनंदन के साथ-साथ समय अनुसार परिस्थितियां, वातावरण, प्रशासनिक स्थितियां, शैक्षिक स्थितियां इन सभी के बारे में पता चलता है कि शिक्षा क्षेत्र में किस तरह से नंबरों के उतार-चढ़ाव का भ्रष्टाचार व्याप्त था। योग्यता को संबंधों के आधार पर तौला जाता था। इस प्रकार के तथ्य इस ग्रंथ को अन्य अभिनंदन ग्रंथों से इसको अलग ठहराते हैं। इस प्रकार की घटनाओं के उल्लेख से यह भी पता चलता है कि हरिशंकर परसाई जी जैसे ख्यातिनाम व्यंगकार झूठ और दिखावे में लिप्त नहीं थे बल्कि वे जैसे थे वैसे ही जीना पसंद करते थे। उन्होंने अपने शिष्य के सामने झूठा दिखावा न करते हुए इस बात को उजागर कर दिया कि वे मदिरापान करते हैं। यह तथ्य सुरेश आचार्य के बहाने परसाई जी के एक सरल, सहज व्यक्तित्व की झलक सामने रखता है।
वहीं सुरेश आचार्य के बारे में हरिशंकर परसाई के विचार और भी महत्वपूर्ण हैं। वे लिखते हैं कि- ‘‘सुरेश आचार्य बुंदेलखंडी है। बुंदेली भाषा बहुत मीठी और लयात्मक होती है। जब बुंदेलखंडी लोग आपस में बात करते हैं तो ध्वनि की लचक बहुत मीठी होती है। मगर बुंदेली वीर भी इतिहास प्रसिद्ध हैं, तो इस मीठी भाषा में क्रोध कैसे व्यक्त किया जाता होगा? कठोर गाली कैसे दी जाती होगी? गुस्से में बुंदेलखंडी सामने वाले से बड़ी मीठी भाषा में कहेगा- ए तुम भौतई बढ़ रये हो इते। अब मौं चलाओ तो हम उठा के मैंक दैहें। कितनी मिठास है शब्दों में। लय है। मगर वह क्या कह रहा है? वह कह रहा है- तुम बहुत बढ़ रहे हो। अब मुंह चलाया तो उठा कर फेंक दूंगा। सुरेश आचार्य की बुंदेली में एकाध ही रचना है। बाकी खड़ी बोली हिंदी में है। मगर उनके व्यक्तित्व में और व्यंग में यह मूल बुंदेलीपन है। उनका वक्तव्य सहज, रोचक और निर्वैर लगता है। मगर उसमें भीतर वही मैंक देने का अर्थ होता है। उनकी भाषा में कठोरता नहीं है। व्यंग में ऊपर से घन मारने जैसा प्रहार नहीं दिखता। मगर वे सहज ही चलते-चलते ऐसे रिमार्क कर जाते हैं जिनसे हमारी समकालीन व्यवस्था की कलई खुल जाती है। झूठ, फरेब, पाखंड, भ्रष्टाचार, विसंगति आदि पर एकाध रिमार्क कर के वे आगे बढ़ जाते हैं।’’
प्रो. सुरेश आचार्य के व्यंग्य ही नहीं अपितु व्यंग्य और समाज के परस्पर संबंधों पर किया गया शोधग्रंथ भी बहुत प्रसिद्ध है। प्रो. आचार्य पर एकाग्र इस ग्रंथ में उनकी पुस्तक ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर लेख लिखते हुए देश की प्रतिष्ठित लेखिका डाॅ शरद सिंह ने टिप्पणी की है कि -‘‘व्यंग्य समाज से ही क्यों उत्पन्न होता है? इस प्रश्न का उत्तर डाॅ. सुरेश आचार्य ने अपने शोधपूर्ण ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में विस्तारपूर्वक दिया है। डाॅ. सुरेश आचार्य हिन्दी साहित्य जगत के एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर ही डाॅ. आचार्य को डी. लिट. की उपाधि दी गई।’’
प्रो. आचार्य की लेखकीय एवं व्यक्तित्व की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए पत्रकार एवं ‘आचरण’ समाचार पत्र की प्रबंध संपादक निधि जैन ने लिखा है कि- ‘‘शब्दों का, मुहावरों का, लोकोक्तियों का इतना भण्डार आचार्य जी के पास है जितना अन्यत्र ही किसी के पास होगा। आचार्य जी अच्छे शिक्षक होने के साथ-साथ प्रसिद्ध साहित्यकार, आलोचक, व्यंग्यकार, ज्योतिषी और कथावाचक भी हैं।’’
साहित्यसेवी उमाकांत मिश्र ने प्रो. सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व पर बहुत ही सटीक लेख लिखा है जिसकी कुछ पंक्तियां देखिए- ‘‘आखिर उन्हें हम किस रूप में देखना ज्यादा पसंद करेंगे? एक विद्वान वक्ता, एक प्रोफेसर, एक अति गंभीरता के साथ साथ सादगी लिए हुए व्यक्तित्व, एक समीक्षक, साहित्यकार जिसकी कोई मिसाल ही नहीं, एक व्यंगकार जो आपको अवसाद से मुक्त कराता हो, गमगीन माहौल को अपनी वाकपटुता और ज्ञानपूर्ण उद्बोधनों के माध्यम से आपके हृदय में हलचल मचा देता हो, आपको ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता हो या फिर एक ऐसे यारबाज के रूप में जो बगैर आपकी उम्र की परवाह किए बुजुर्गों को बल्कि छोटे-छोटे बच्चों के बीच भी अपनी उपस्थिति एक यार, एक मित्र, एक दोस्त और महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में दर्ज़ करता हो।’’
अनेक रोचक प्रसंग और आत्मीयता की अनेक लहरों से भीगे हुए, प्रो. आचार्य की खूबियों की सीपियां समेटे हुए महासागर की समग्रता लिए हुए डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित इस ग्रंथ की सबसे बड़ी उपादेयता यह है कि यह अपने प्रिय व्यक्ति, अपने प्रिय साहित्यकार, अपने प्रिय समाजसेवी, अपने प्रिय राजनीतिज्ञ (राजनेता नहीं), अपने प्रिय मार्गदर्शक के बारे में जानने का भरपूर अवसर प्रदान करता है और बार-बार पढ़े जाने की ललक पैदा करता है।
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( दैनिक, आचरण दि.17.10.2020)
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