Thursday, October 22, 2020

रंग और विचार में सौंदर्य और संदेश दोनों होते हैं | तीन दिनी चित्रकला कार्यशाला का समापन | 15 कलाकार हुए शामिल | रिपोर्ट | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, ये है आज "दैनिक भास्कर" में प्रकाशित मेरी यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की  रिपोर्ट .... अवसर था... कल दि. 21.10.2020 को सागर मुख्यालय के सिविल लाइंस क्षेत्र में स्थित चंद्रा पार्क में नगरनिगम सागर एवं स्मार्ट सिटी सागर द्वारा आयोजित की गई तीन दिवसीय चित्रकला कार्यशाला के समापन का। सागर के प्रसिद्ध चित्रकार असरार अहमद के 'रंग के साथी' ग्रुप ने इस पेंटिंग वर्कशॉप में ऑन स्पॉट चित्र बनाए, जो दर्शकों द्वारा सराहे गए।
हार्दिक धन्यवाद दैनिक भास्कर 🙏

सुधी ब्लॉग पाठकों की पठन सुविधा हेतु मेरी यह रिपोर्ट जस की तस यहां प्रस्तुत है -

रंग और विचार में सौंदर्य और संदेश दोनों होते हैं |
तीन दिनी चित्रकला कार्यशाला का समापन | 15 कलाकार हुए शामिल |

- डाॅ. वर्षा सिंह 

कला समीक्षक एवं साहित्यकार 

       स्वच्छता से हो कर ही पर्यटन के विकास के रास्ते खुलते हैं। इसी मूल संदेश के साथ स्थानीय चंद्रा पार्क में तीन दिवसीय चित्रकला कार्यशाला का आयोजन किया गया। यूं तो 18 से 20 अक्टूबर तक तीन दिन का ही आयोजन तय किया गया था किन्तु कोरोना आपदा के कारण आठ माह बाद खुले, नगर के सिविल लाइंस् स्थित चंद्रा पार्क और चित्रकला कार्यशाला ने लोगों को इस तरह लुभाया कि यह कार्यशाला एक दिन के लिए और बढ़ा दी गई। जब रंग और विचार एकाकार हो कर कैनवास पर उतरते हैं तो उसकी छटा देखते ही बनती है, क्योंकि उसमें कला-सौंदर्य और संदेश दोनों निहित होते हैं। सागर में पुरासम्पदाओं एवं पर्यटन स्थलों की कमी नहीं है, यह शहर भी अपने आप में एक ऐतिहासिक शहर है। बस कमी महसूस की जा रही थी तो स्वच्छता के प्रति जागरूकता की। शहर के ख्यात चित्रकार असरार अहमद ने अपने ग्रुप 'रंग के साथी' के चित्रकारों के साथ स्वच्छता संदेश देने का बीड़ा उठाया और चित्रकारों ने कैनवास पर सागर के महत्वपूर्ण स्थलों को साकार कर दिया। 

दृश्य चित्रण का अर्थ है हमारी आँखें जो भी जीवित-अजीवित रूपों को देखती हैं उसका कलात्मक चित्रण, जो भूमि और असीमित आकाश के मध्य विद्यमान है। इसी बात को चरितार्थ करते हुए कार्यशाला में एक्रेलिक रंगों से 3×2 के कैनवास पर बनाए गए चित्र मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालने में सक्षम रहे। चित्रकार असरार अहमद ने तीन मढ़िया, अंशिता बजाज वर्मा ने गढ़पहरा का शीशमहल, शालू सोनी ने कटरा मस्जिद, सृष्टि जैन ने मकरोनिया के बड़े शंकरजी, अनुषा जैन ने वृंदावनबाग मंदिर, सेजल जैन ने चकराघाट, रश्मि पवार ने एरण, मोनिका जैन ने सर्किट हाउस, प्रिया साहू ने कैंट चौराहा, लक्ष्मी पटेल ने शनीचरी, रेशू जैन ने तीन मढ़िया, साधना रैकवार ने राहतगढ़ वाटरफॅाल, अंजू मिश्रा ने भट्टों घाट एवं चकराघाट तथा काजोल गुप्ता ने आई.जी. बंगला चौराहा को अपनी तूलिका से कैनवास पर जीवंत कर दिया। भवन, घाट एवं चौराहे के चित्रों में ज्यामितिक रेखाओं को बड़े ही संतुलित ढ़ंग से चित्रित किया गया। गहरे और धूसर रंगों के सुंदर संयोजन से निखरी आकृतियों की सुघड़ता इन चित्रों में सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती रही। भारतीय चित्रकला में देवता, मनुष्य एवं पशु के चित्रण में शारीरिक अनुपात एवं शेड्स का विशेष ध्यान रखा जाता है। एरण के वाराह तथा मकरोनिया के बड़े शंकरजी के चित्रों में आनुपातिक सौष्ठव बड़े सुंदर ढ़ंग से प्रदर्शित हुआ। कार्यशाला में असरार अहमद ने तीन मड़िया मंदिर, सागर झील का किनारा और उनके बीच से गुजरती सड़क को नीले, पीले, लाल, हरे एवं स्लेटी रंग से इस प्रकार चित्रित किया कि वह स्थल कैनवास पर जीवंत हो उठा। वहीं कैंट चौराहा की पेंटिंग में हरे, नीले, भूरे ओर स्लेटी रंगों से प्रकृति, कृत्रिम मानव आकृतियों और सड़क के संगम का नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करने में चित्रकार प्रिया सफल रहीं। पुरातन भवनों को उनकी दशा एवं गरिमा के अनुरूप चित्रित करना हमेशा चुनौती भरा होता है। चित्रकार अंशिता ने गढ़पहरा के शीशमहल और उसके सामने मौजूद अवशेषों के बीच भूरे रंगों के विभिन्न शेड्स से जिस प्रकार गहराई को उकेरा वह चाक्षुष आकर्षण के साथ देखने वालों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। कार्यशाला में बनाई गई सुंदर पेंटिंग्स बिक्री के लिए भी उपलब्ध थीं। कुछ पेंटिंग्स कला प्रेमियों द्वारा इस अवसर पर खरीदी भी गईं।

      पूरी तरह सफल रहे इस आयोजन में रंग के साथी ग्रुप के माध्यम से सागर नगर में चित्रकारी की अलख जगाए रखने वाले नगर के सुप्रसिद्ध चित्रकार असरार अहमद ने बताया कि ‘‘इस कार्यशाला के द्वारा हमने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि हमारे सागर के वृंदावनबाग मंदिर, जामा मस्जिद, चकराघाट, एरण, राहतगढ़ वाटरफाॅल आदि स्थल जैसे सुंदर कैनवास पर दिखाई दे रहे हैं, स्वच्छता बनाए रखने पर वास्तविक रूप में ऐसे ही सुंदर दिखाई देंगे। जिससे पर्यटन के नक्शे पर सागर भी चमकेगा। हमें जब भी इस प्रकार के वर्कशाप करने के अवसर मिलेंगे तो हम आगे बढ़ कर अपना कलात्मक योगदान देंगे।’’ नेचर वेलफेयर के आलोक चौबे ने बताया कि ‘‘प्रकृति और धरोहरों को बचाने की दिशा में स्वच्छता एक जरूरी मुद्दा है और चित्रकला के द्वारा इसे बेहतर ढ़ंग से सामने रखा जा सकता था।’’  

      उल्लेखनीय है कि इस कार्यशाला द्वारा स्वच्छता सर्वेक्षण 2021 के अंतर्गत ‘सागर के रंग स्वच्छता के संग’ के रूप में स्वच्छता के लिए नागरिक सहभागिता का आह्वान किया गया। इसके आयोजक नगरपालिक निगम सागर तथा सह आयोजक स्मार्ट सिटी सागर थे। सहयोगी संस्थाओं के रूप में रंग के साथी और नेचर वेलफेयर ने शहर एवं पर्यटन स्थलों को स्वच्छ एवं सुंदर बनाए रखने की नगर निगम आयुक्त आरपी अहिरवार, स्मार्ट सिटी सीईओ राहुल सिंह की इस बहुआयामी संकल्पना को साकार करने में अपना भरपूर योगदान दिया। 

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Saturday, October 17, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 12 | सुरेश आचार्य, शनीचरी का पण्डित | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत बारहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के सुपरिचित व्यंग्यकार प्रो. सुरेश आचार्य पर केन्द्रित पुस्तक "सुरेश आचार्य, शनीचरी का पंडित" का पुनर्पाठ।
   
सागर: साहित्य एवं चिंतन

पुनर्पाठ: ‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’
                               -डॉ. वर्षा सिंह
                             
         इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो एक व्यक्ति विशेष पर केंद्रित है अर्थात उस विशेष व्यक्ति के बारे में समग्र जानकारी प्रदान करने में सक्षम है, जो जनप्रिय है, लोकप्रिय है और साहित्य में ही नहीं वरन समाज में भी विशेष स्थान रखता है। जी हां, वे विशेष व्यक्ति हैं प्रो. सुरेश आचार्य। वे व्यंग विधा के पुरोधा हैं, वे सामाजिक सरोकार रखते हैं तथा वे जनप्रिय हैं। इसलिए इस किताब की अर्थवत्ता अपने आप द्विगुणित हो जाती है कि जो भी व्यक्ति डॉ सुरेश आचार्य के बारे में जानना चाहता है, उनके बचपन के बारे में, उनकी जीवनचर्या के बारे में, उनके लेखन के संबंध में, उनके राजनीतिक विचारों के बारे में, तो उसे यह सभी जानकारी इस पुस्तक में मिल सकती है। डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित यह पुस्तक कुल चारखंड में विभक्त है इसे अभिनंदन ग्रंथ भी कहा जा सकता है।

        सन् 1933 में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को काशी नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से एक अभिनंदन ग्रन्थ भेंट किया गया था जिसमें उनके अवदान पर देश-विदेश के साहित्यकारों, मनीषियों के लेख संकलित थे। उसकी भूमिका श्याम सुन्दर दास और कृष्ण दास के नाम से प्रकाशित थी। पर कहा जाता है कि यह वास्तव में नंददुलारे वाजपेयी ने लिखी थी। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित अभिनंदनग्रंथ में समालोचक मैनेजर पाण्डेय ने ‘‘आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका अभिनंदन’’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। अपने इस लेख में मैनेजर पांडेय ने अभिनंदनग्रंथ के बारे में लिखा कि ‘‘इस अभिनंदन ग्रन्थ में भूमिका और प्रस्तावना के बाद मुख्य भाग में निबंध, कविताएं, श्रद्धांजलियां, विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश के साथ एक चित्रावली भी है। निबंधों के विषयों और श्रद्धांजलियों  की विविधता चकित करने वाली है। इसमें अंग्रेजी में रेव. एडविन ग्रीब्स, पी. शेषाद्रि, प्रो. ए. बेरिन्निकोव और संत निहाल सिंह के लेख हैं। श्रद्धांजलि के अंतर्गत एक ओर महात्मा गांधी के साथ भाई परमानन्द हैं, तो दूसरी ओर अनेक विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश हैं। उस युग के अधिकांश कवियों की कविताएं इस अभिनंदन ग्रंथ में हैं। इस ग्रंथ में जो चित्रावली है उसका एक विशेष महत्व यह है कि अभिनंदन ग्रंथ के आज के पाठक आधुनिक हिंदी साहित्य के ऐसे लेखकों-कवियों का रूप-दर्शन कर सकेंगे, जिनका वे केवल नाम जानते हैं।’’
अपने लेख की अंतिम पंक्ति में मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि ‘‘इस ग्रंथ का केवल ऐतिहासिक महत्व नहीं है. इसके निबंध ‘ज्ञानराशि के संचित कोश’ होने के कारण आज भी पठनीय और मननीय हैं।’’ ठीक यही बात लागू होती है ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पर।
         ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पुस्तक के चार खंडों में प्रथम खंड है- ‘‘जल बिच कुंभ: न था मैं खुदा था’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य का आत्मकथ्य है। जिसमें उन्होंने सागर के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त किया है। इसी खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य से तीन लोगों ने बातचीत की है - लक्ष्मी पांडे, प्रो. अरुण कुमार मिश्रा और प्रो. रूपा गुप्ता ने।

      खंड 2- ‘‘सर्वे सुखम् गृह माययौ: दिल के बहलाने को गालिब ये ख़्याल अच्छा है’’ के अंतर्गत प्रोफेसर आचार्य का जीवन परिचय, वंशावली तथा परिजनों की दृष्टि में आचार्य जी के व्यक्तित्व का विवरण है जिसमें शांभवी आचार्य, शुभ्रांशु आचार्य, कृति आचार्य, श्वेतांशु आचार्य, शारदवद आचार्य, प्रतिभा आचार्य, शांतनु आचार्य, डॉ संजय आचार्य, पदमा आचार्य, शाश्वत आचार्य, डॉ शैलेश आचार्य तथा आरती तिवारी के विचार शामिल किए गए हैं।

         खंड 3- ‘‘ते तुलसी तब राम बिन जे अब राम सहाय: कमी जो पाई तो अपने खुलूस में पाई’’ - इस खंड में प्रोफेसर आचार्य को लिखे गए पत्र, अभिनंदन पत्र एवं सम्मान पत्र शामिल हैं। इसी खंड में प्रोफेसर आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखी गई श्याम मनोहर सिरोठिया, मायूस सागरी, कालिका प्रसाद शुक्ल ‘विजयी’ एवं हरिहर प्रसाद खड्डर द्वारा लिखी गई कविताएं संकलित है। साथ ही संकलित है प्रोफेसर सुरेश आचार्य की विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के अवसर पर की गई टिप्पणियां।

         खंड 4- ‘‘हम चाकर रघुवीर के: हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित कुल 50 लेख हैं। इस महत्वपूर्ण खंड में हरिशंकर परसाई, कांति कुमार जैन, उदय जैन,  रामेश्वर नीखरा, सत्य मोहन वर्मा, सुरेंद्र सिंह नेगी, कृष्णचंद्र लाल, सुरेंद्र दुबे, सुधाकर सिंह, कालीचरण स्नेही, हरिशंकर मिश्र, निर्मल चंद निर्मल, लक्ष्मी नारायण चैरसिया, चंदा बैन, राजेंद्र यादव, जीवनलाल जैन, बैजनाथ प्रसाद, रूपा गुप्ता, मनोहर देवलिया, टीकाराम त्रिपाठी, आशुतोष राणा, सरोज गुप्ता, अशोक मिजाज, अरुण कुमार मिश्र, नरेंद्र सिंह, स्मृति शुक्ला, मणिकांत चैबे, वेद प्रकाश दुबे, भोलाराम भारतीय, राजेश दुबे, शरद सिंह, नरेंद्र दुबे, राजेंद्र नागर, महेश तिवारी, निरंजना जैन, गजाधर सागर, सुखदेव प्रसाद तिवारी, छाया चौकसे, उमाकांत मिश्र, स्वर्णा वाजपेई, चंचला दवे, निधि जैन, सुखदेव मिश्र, हेमचंद्र चैधरी, किशन पंत, आशीष ज्योतिषी, ममता यादव, नेमीचंद जैन विनम्र तथा लक्ष्मी पांडे के लेख शामिल हैं।

       इस पुस्तक में प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने अपने जीवन के कुछ ऐसे प्रसंग रखे हैं जिनसे तत्कालीन सामाजिक जीवन का भी पता चलता है जैसे अपने आत्मकथ्य में ‘‘क्या सुनाएं दास्तां’’ के अंतर्गत वे लिखते हैं- ‘‘मैं खुद छोटे पंडित की भूमिका में पूजा पाठ कथा वार्ता घर-घर कराने घूमने लगा। साल में दो हाफ कमीज़ो की संख्या घटकर एक रह गई। खाकी हाफ पेंट थिगड़े लगाकर पहने जाने लगे। मेरी उद्दंडता और सीनाजोरी में इज़ाफ़ा हुआ। सागर तालाब उन दिनों शहर का एकमात्र जल स्रोत था। गर्मियों में भी पानी से लबालब भरा रहता। कमल खिलते, सिंघाड़े लगते, चक्रतीर्थ यानी चकरा घाट से बस स्टैंड का ज्यादातर यातायात नावों के जरिए होता था। चार आने सवारी। सामान फ्री। तालाब के किनारों पर बने पत्थर की सीढ़ियों पर लोग कपड़े धोते, पानी में छलांग मार कर निकलते और सीढ़ियों पर बैठकर साबुन लगाते। आमतौर पर कपड़े धोने और नहाने का एक ही साबुन होता था। लोकल मेड। बड़े लोग लाइफबाय से नहाते और सनलाइट साबुन से कपड़े धोते।’’

 

  

      यह विवरण सहज सरल सामाजिक व्यवस्था एवं वातावरण का दृश्य आंखों के सामने चलचित्र के समान चला देता है। इस ग्रंथ में अनेक रोचक प्रसंग पढ़ने को मिलते हैं जैसी अपने वक्तव्य के अंतर्गत प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने हरिशंकर परसाई के साथ जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए यह घटना लिखी है जो बड़ी ही दिलचस्प है - ‘‘मैं उनके घर ठहरा और लघु शोध प्रबंध को प्रमाणिक बनाने रोज शाम 7 बजते-बजते परसाई जी के घर पहुंच जाता। उनसे चर्चा में एक-दो घंटे गुजार कर लौटता। फिर नोट्स लेता। मैजारिटी की भाषा में परसाई जी बड़े भक्त आदमी थे। शाम होते ही भक्ति-भजन में लग जाते थे। एक शाम उन्होंने मुझसे सीधे पूछ लिया- ‘यार आचार्य, तुम पीते हो या नहीं?’ अल्लाह! क्या कहूं!! मैंने उत्तर दिया- ‘जी, मैं परहेजगार तो नहीं हूं पर रोज पीने की मेरी हैसियत नहीं है।’ उन दिनों व्हाइट हार्स नामक अंग्रेजी शराब उनका प्रिय ब्रांड थी। उन्होंने कहा- ‘प्रियवर, तब तुम सुबह 9 बजे आया करो। शाम को अपनी बात ठीक से नहीं हो पाती। उस वक्त मैं सफेद घोड़े पर सवार होता हूं और तुम पैदल चलते हो।’ मैंने समय बदल लिया। यह लघु शोध प्रबंध परसाई जी पर पहला शोध कार्य था। एम. ए. उत्तरार्द्ध की परीक्षा का यह आठवां वैकल्पिक प्रश्न पत्र था। निर्धारित 100 अंकों में से मुझे 60 अंक मिले। विभाग में कार्यरत एक अध्यापक महोदय के भतीजे को छियान्वे। पूर्वाद्ध में वे बहुत पीछे थे। उत्तरार्ध में संबंधित गुरुजनों के इस जादू के बावजूद मेरी पोजीशन बची रही।’’

        इस तरह के प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि आमतौर पर अभिनंदन ग्रंथों में संबंधित व्यक्ति को महिमामंडित ही किया जाता है। उसकी महिमाओं के बखान के अतिरिक्त अन्य जानकारियां नहीं होती हैं। किंतु इस ग्रंथ में अभिनंदन के साथ-साथ समय अनुसार परिस्थितियां, वातावरण, प्रशासनिक स्थितियां, शैक्षिक स्थितियां इन सभी के बारे में पता चलता है कि शिक्षा क्षेत्र में किस तरह से नंबरों के उतार-चढ़ाव का भ्रष्टाचार व्याप्त था। योग्यता को संबंधों के आधार पर तौला जाता था। इस प्रकार के तथ्य इस ग्रंथ को अन्य अभिनंदन ग्रंथों से इसको अलग ठहराते हैं। इस प्रकार की घटनाओं के उल्लेख से यह भी पता चलता है कि हरिशंकर परसाई जी जैसे ख्यातिनाम व्यंगकार झूठ और दिखावे में लिप्त नहीं थे बल्कि वे जैसे थे वैसे ही जीना पसंद करते थे। उन्होंने अपने शिष्य के सामने झूठा दिखावा न करते हुए इस बात को उजागर कर दिया कि वे मदिरापान करते हैं। यह तथ्य सुरेश आचार्य के बहाने परसाई जी के एक सरल, सहज व्यक्तित्व की झलक सामने रखता है।

           वहीं सुरेश आचार्य के बारे में हरिशंकर परसाई के विचार और भी महत्वपूर्ण हैं। वे लिखते हैं कि- ‘‘सुरेश आचार्य बुंदेलखंडी है। बुंदेली भाषा बहुत मीठी और लयात्मक होती है। जब बुंदेलखंडी लोग आपस में बात करते हैं तो ध्वनि की लचक बहुत मीठी होती है। मगर बुंदेली वीर भी इतिहास प्रसिद्ध हैं, तो इस मीठी भाषा में क्रोध कैसे व्यक्त किया जाता होगा? कठोर गाली कैसे दी जाती होगी? गुस्से में बुंदेलखंडी सामने वाले से बड़ी मीठी भाषा में कहेगा- ए तुम भौतई बढ़ रये हो इते। अब मौं चलाओ तो हम उठा के मैंक दैहें। कितनी मिठास है शब्दों में। लय है। मगर वह क्या कह रहा है? वह कह रहा है- तुम बहुत बढ़ रहे हो। अब मुंह चलाया तो उठा कर फेंक दूंगा। सुरेश आचार्य की बुंदेली में एकाध ही रचना है। बाकी खड़ी बोली हिंदी में है। मगर उनके व्यक्तित्व में और व्यंग में यह मूल बुंदेलीपन है। उनका वक्तव्य सहज, रोचक और निर्वैर लगता है। मगर उसमें भीतर वही मैंक देने का अर्थ होता है। उनकी भाषा में कठोरता नहीं है। व्यंग में ऊपर से घन मारने जैसा प्रहार नहीं दिखता। मगर वे सहज ही चलते-चलते ऐसे रिमार्क कर जाते हैं जिनसे हमारी समकालीन व्यवस्था की कलई खुल जाती है। झूठ, फरेब, पाखंड, भ्रष्टाचार, विसंगति आदि पर एकाध रिमार्क कर के वे आगे बढ़ जाते हैं।’’

        प्रो. सुरेश आचार्य के व्यंग्य ही नहीं अपितु व्यंग्य और समाज के परस्पर संबंधों पर किया गया शोधग्रंथ भी बहुत प्रसिद्ध है। प्रो. आचार्य पर एकाग्र इस ग्रंथ में उनकी पुस्तक ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर लेख लिखते हुए देश की प्रतिष्ठित लेखिका डाॅ शरद सिंह ने टिप्पणी की है कि -‘‘व्यंग्य समाज से ही क्यों उत्पन्न होता है? इस प्रश्न का उत्तर डाॅ. सुरेश आचार्य ने अपने शोधपूर्ण ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में विस्तारपूर्वक दिया है। डाॅ. सुरेश आचार्य हिन्दी साहित्य जगत के एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर ही डाॅ. आचार्य को डी. लिट. की उपाधि दी गई।’’

       प्रो. आचार्य की लेखकीय एवं व्यक्तित्व की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए पत्रकार एवं ‘आचरण’ समाचार पत्र की प्रबंध संपादक निधि जैन ने लिखा है कि- ‘‘शब्दों का, मुहावरों का, लोकोक्तियों का इतना भण्डार आचार्य जी के पास है जितना अन्यत्र ही किसी के पास होगा। आचार्य जी अच्छे शिक्षक होने के साथ-साथ प्रसिद्ध साहित्यकार, आलोचक, व्यंग्यकार, ज्योतिषी और कथावाचक भी हैं।’’ 

         साहित्यसेवी उमाकांत मिश्र ने प्रो. सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व पर बहुत ही सटीक लेख लिखा है जिसकी कुछ पंक्तियां देखिए- ‘‘आखिर उन्हें हम किस रूप में देखना ज्यादा पसंद करेंगे? एक विद्वान वक्ता, एक प्रोफेसर, एक अति गंभीरता के साथ साथ सादगी लिए हुए व्यक्तित्व, एक समीक्षक, साहित्यकार जिसकी कोई मिसाल ही नहीं, एक व्यंगकार जो आपको अवसाद से मुक्त कराता हो, गमगीन माहौल को अपनी वाकपटुता और ज्ञानपूर्ण उद्बोधनों के माध्यम से आपके हृदय में हलचल मचा देता हो, आपको ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता हो या फिर एक ऐसे यारबाज के रूप में जो बगैर आपकी उम्र की परवाह किए बुजुर्गों को बल्कि छोटे-छोटे बच्चों के बीच भी अपनी उपस्थिति एक यार, एक मित्र, एक दोस्त और महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में दर्ज़ करता हो।’’

         अनेक रोचक प्रसंग और आत्मीयता की अनेक लहरों से भीगे हुए, प्रो. आचार्य की खूबियों की सीपियां समेटे हुए महासागर की समग्रता लिए हुए डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित इस ग्रंथ की सबसे बड़ी उपादेयता यह है कि यह अपने प्रिय व्यक्ति, अपने प्रिय साहित्यकार, अपने प्रिय समाजसेवी, अपने प्रिय राजनीतिज्ञ (राजनेता नहीं), अपने प्रिय मार्गदर्शक के बारे में जानने का भरपूर अवसर प्रदान करता है और बार-बार पढ़े जाने की ललक पैदा करता है।
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( दैनिक, आचरण  दि.17.10.2020)
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Saturday, October 10, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 11 | हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान | आलोचनाग्रंथ | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत ग्यारहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के साहित्यकार डॉ. महेश तिवारी द्वारा लिखित आलोचना ग्रंथ  "हिन्दी काव्य समीक्षा के प्रतिमान" का पुनर्पाठ।

 सागर : साहित्य एवं चिंतन

     पुनर्पाठ : ‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’ आलोचनाग्रंथ
                        -डॉ. वर्षा सिंह
                                                          
      इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर के कवि एवं साहित्यकार डाॅ. महेश तिवारी की पुस्तक ‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’। यह पुस्तक एक आलोचनाग्रंथ है। किसी भी आलोचनाग्रंथ के समूचे दृष्टिकोण को एकबार के पठन-पाठन में समझा नहीं जा सकता है। क्योंकि प्रत्येक आलोचनाग्रंथ प्रथम पाठ के बाद चिंतन, पुनर्चिंतन और फिर पुनर्पाठ का आग्रह करता है। डाॅ. महेश तिवारी की इस पुस्तक में भारतेंदु युग से लेकर छायावादोत्तर युग की कविता की आलोचना के विकास, उसके मूल्य- परिवर्तन, मूल्य-चिंतन आदि को समझते हुए कविता के मूल्यांकन के बदलते प्रतिमानों का आकलन किया गया है। इस आकलन प्रक्रिया में भारतीययुगीन एवं द्विवेदीयुगीन काव्य समीक्षा का विश्व अवलोकन एवं आकलन करते हुए मुख्य रूप से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कविता के मूल्यांकन के उन मापदंडों को रेखांकित किया गया है, जहां साहित्य के भावतत्व युग के नए आदर्शों, साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि, कवि के साथ समीक्षक के तादात्म्य में ही महत्व दिया गया है। यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठती है जब इसमें चर्चा की जाती है पाश्चात्य काव्य प्रवृत्तियों से हिंदी काव्य प्रविधि का तुलनात्मक अध्ययन की। छायावादी काव्य चिंतन को समझने के लिए इंग्लैंड के स्वच्छतावादी कवियों की काव्य चिंतन की प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास किया गया है। यदि बात की जाए पाश्चात्य काव्य प्रविधियों के हिन्दी काव्य पर प्रभाव की, तो प्रसाद की तुलना में निराला पश्चिमी साहित्य से अधिक स्पष्ट रूप से परिचित दिखाई देते हैं। निराला के काव्य में साहित्य की सार्वजनिकता स्पष्टरूप से देखी जा सकती है। मुक्तछंद को प्रभावी ढंग से हिन्दी काव्य में प्रस्तुत करने वाले ‘निराला’ की ‘‘कुकुरमुत्ता’’ कविता अद्वितीय है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए याद आ जाती हैं ‘‘कुकुरमुत्ता’’ कविता की ये पंक्तियां-

अबे, सुन बे, गुलाब,
भूल मत जो पायी ख़ुशबू, रंग-ओ-आब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!
कितनों को तूने बनाया है गुलाम।

‘‘कुकुरमुत्ता’’ कविता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ कोई अलग ही जमीन पर खड़ा करती है जहां वे पूंजीवाद को ललकारते हुए दिखाई देते हैं। ‘निराला’ ने पूंजीवादी सभ्यता पर कुकुरमुत्ता के बहाने करारा कटाक्ष किया है। कुकुरमुत्ता गुलाब को सीधा भदेश अंदाज में संबोधित करता हुआ उसके सभ्यता की कलई खोलता चला जाता है और सीधे, सपाट शब्दों में हुंकार भरता है कि  ‘‘अबे सुन बे गुलाब, डाल पर इतराता है कैपिटलिस्ट!’’
जहां सुमित्रानंदन पंत की काव्य चिंतन में स्वच्छतावादी चेतना से अनुप्राणित नए संकेत तथा प्रतिमान दिखाई देते हैं, वहीं महादेवी वर्मा की काव्यगत मान्यताएं छायावादी अथवा स्वच्छंदतावाद काव्य की पृष्ठभूमि के समीप मिलती हैं। इस पुस्तक में लेखक डॉ महेश तिवारी ने स्वच्छंदतावादी समीक्षा पद्धति द्वारा काव्य के मूल्यांकन के आधार पर उन बिंदुओं को देखा-परखा है, जिनसे प्रेरणा लेकर आचार्य नंददुलारे वाजपेई ने अपनी आलोचना दृष्टि का विकास किया। आचार्य नंददुलारे वाजपेई, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ नगेंद्र ने नई काव्य रचना की प्रवृत्ति और नए युग संदर्भों को दृष्टि में रखकर ही काव्य मूल्यांकन के नए प्रतिमान निश्चित किए किंतु पारंपरिक काव्य प्रतिमान भी उनके दृष्टि से बाहर नहीं हुए हैं। डॉ महेश तिवारी ने लिखा है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने उदार मानवतावादी चिंतन के परिपेक्ष में काव्य और अस्तित्व की व्याख्या की है और काव्य सत्ता को उसी के भीतर से पहचानने और परखने का प्रयास हिंदी काव्य चिंतन के क्षेत्र में पहली बार स्वच्छंदतावादी समीक्षा के अंतर्गत हुआ है।
 ‘‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’’ को पढ़ते हुए जब ‘‘छायावादी काव्य चिंतन’’ के अंतर्गत जयशंकर प्रसाद की काव्य प्रवृत्तियों पर चिंतन का संदर्भ आता है तो स्वतः याद आ जाती है उनकी यह कविता-
ले चल वहां भुलावा देकर
मेरे नाविक! धीरे-धीरे ...
जिस निर्जन में सागर लहरी
अम्बर के कानों में गहरी
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।

प्रश्न उठता है कि क्या जयशंकर प्रसाद पलायनवादी थे तो इसका उत्तर उनके अन्य काव्य में मौजूद है कि वे पलायनवादी नहीं थे बल्कि दृढ़तावादी थे। प्रसाद के काव्य को समझने में यह पुस्तक बहुत सहायक सिद्ध होती है जब महेश तिवारी लिखते हैं कि प्रसाद ने पश्चिमी विचारकों की भांति काव्य और कला को एक नहीं माना है। भारतीय मान्यता के अनुसार उन्होंने कला को उपविद्या माना है जो बुद्धिवाद की प्रधानता सूचित करती है और जिसका संबंध विज्ञान से अधिक घनिष्ठ होता है। डॉ. तिवारी उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि ‘‘स्कंदगुप्त’’ नाटक में मातृगुप्त कहता है- ‘‘कवित्व-वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, असत का सत से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत का अंतर्जगत से संबंध कौन कराती है, कविता ही न?’’ स्पष्ट है कि यहां प्रसाद जी ने कविता को सृष्टि के परस्पर विरोधी तत्वों में संबंध स्थापित कराने वाली सत्ता के रूप में मान्यता दी है। प्रसाद की यह परिभाषा साहित्यिक कम, आध्यात्मिक और दार्शनिक अधिक है। फिर भी इस परिभाषा में काव्य रचना के अंतर्गत अनुभूति की केंद्रीयता को तो स्वीकार किया ही गया है। काव्य की जो परिभाषा प्रसाद ने ‘‘काव्य कला तथा अन्य निबंध’’ नामक कृति में प्रस्तुत की है वह बहुचर्चित भी है और अधिक मान्य भी। इसके अंतर्गत प्रसाद जी ने कहा है कि ‘‘काव्य आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति है, जिसका संबंध विश्लेषण विकल्प या विज्ञान से नहीं है। वह एक श्रेयमयी प्रेय रचनात्मक ज्ञानधारा है। आत्मा की मनन शक्ति की असाधारण अवस्था, जो श्रेय सत्य को उसके मूल चारुत्व में सहसा ग्रहण कर लेती है, काव्य में संकल्पात्मक अनुभूति कही जा सकती है।’’ जयशंकर प्रसाद की इस परिभाषा पर टिप्पणी करते हुए आचार्य भगीरथ मिश्र ने कहा है कि प्रसाद जी की वह परिभाषा केवल व्यक्तिगत दृष्टिकोण ही स्पष्ट करती है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि ‘‘काव्य केवल अनुभूति मात्र ही नहीं होता, दूसरी बात अनुभूति केवल संकल्पात्मक ही होती है। अतः इस परिभाषा में संकल्पात्मक शब्द एक अतिरिक्त शब्द है।’’ 


 डॉ. महेश तिवारी कहते हैं कि काव्य की आत्मा का प्रश्न प्रसाद ने बहुत सीधे ढंग से विचार नहीं किया है किंतु काव्य रचना में उन्होंने आत्मानुभूति की केंद्रित ही स्वीकार की है। हिंदी में नई छायावादी काव्य रचना के उद्भव के समय पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा उसका जो विरोध हुआ उसके संदर्भ में महादेवी वर्मा ने भी छायावाद के पक्ष को स्पष्ट करते हुए अपनी मान्यताएं प्रस्तुत कीं। महादेवी वर्मा के अनुसार स्वच्छंदतावाद की भांति हिन्दी का छायावाद भी पूर्ववर्ती शास्त्रीयता विजड़ित विषय-प्रधान कविता के विरुद्ध वैयक्तिक अभिव्यक्ति को प्रमुखता देते हुए सामने आने वाला एक आंदोलन था। ‘‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’’ पुस्तक पढ़ते समय महादेवी वर्मा द्वारा हिंदी काव्य की परिभाषा के संदर्भ में याद आ जाती है उनकी ‘‘निश्चय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां -
कितनी रातों की मैंने
नहलाई है अंधियारी,
धो ड़ाली है संध्या के
पीले सेंदुर से लाली,
नभ के धुंधले कर ड़ाले
अपलक चमकीले तारे,
इन आहों पर तैरा कर
रजनीकर पार उतारे।

ऐसा निबंधात्मक गद्य जिसमें काव्य प्रवृत्तियों की समालोचना हो यदि उसे पढ़ते समय संदर्भित कवियों की काव्य पंक्तियां याद आने लगे तो वह लेखन अपनी उपादेयता स्वयं सिद्ध करने लगता है। शोधप्रबंध के रूप में तैयार की गई इस पुस्तक की सामग्री मूल रूप से सात अध्यायों में संजोई गई है - पहला अध्याय है भारतेंदुयुगीन एवं द्विवेदीयुगीन काव्य समीक्षा का विहंगावलोकन, दूसरा अध्याय आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समीक्षादर्श, तीसरा छायावादी काव्य-चिंतन, चौथा अध्याय प्रगतिवादी काव्य चिंतन: सामाजिक यथार्थ तथा साहित्य की सामाजिक संदर्भता, पांचवा अध्याय प्रयोगवादी काव्य-चिंतन: प्रयोगवादी समीक्षा, छठा अध्याय नया काव्य-चिंतन: प्रयोगवादोत्तर काव्य प्रतिमान और सातवां अध्याय छायावादोत्तर समीक्षा में कविता के नए प्रतिमान।

‘‘प्रयोगवादी काव्य-चिंतन: प्रयोगवादी समीक्षा’’ - इस अध्याय में  डॉ. तिवारी  ने काव्य की आत्मा  की विवेचना की है। वे लिखते हैं कि जहां तक काव्य की समीक्षा का प्रश्न है काव्य की आत्मा जैसे मुद्दे को उसके अंतर्गत नए रूप में उठाया गया है। प्रयोगवादी समीक्षा के प्रतिनिधि चिंतक अज्ञेय ने चमत्कार को ही काव्य के आंतरिक गुण अथवा आत्मा के रूप में मान्यता दी है। यहीं इस पुस्तक के लेखक डॉ. तिवारी काव्य के तत्व की भी चर्चा करते हैं। उनके अनुसार प्रयोगवादी काव्य समीक्षा में अनुभूति को काव्य के प्राथमिक तथा अनिवार्य तत्व के रूप में मान्यता दी गई है। प्रयोगवादी काव्य समीक्षा में काव्यगत अनुभूति को व्यक्तिगत अनुभूति से भिन्न माना गया है। प्रयोगवादी काव्य समीक्षा के अंतर्गत कविता को अनुभूति की अभिव्यक्ति नहीं अनुभूति से मुक्ति माना गया है। प्रयोगवादी समीक्षा में अनुभूति के खरेपन तथा अनुभूति की दिव्यता को महत्व दिया गया है। अब प्रश्न उठता है कि काव्य के विषय क्या होने चाहिए? तो इस संबंध में लेखक ने अज्ञेय के विचार को  उद्धृत किया है कि विषय के संदर्भ में साहित्य की समीक्षा को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह भी कि किसी साहित्यकार में किसी वस्तु, घटना अथवा स्थिति के प्रति स्वभाव होता है। यदि प्रेरणा उत्पन्न नहीं होती तो उसे बलात् पैदा करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए किंतु काव्य के विषय में परिसीमन की छूट है।

‘‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’’ डाॅ महेश तिवारी का एक ऐसा आलोचनाग्रंथ है जिसके द्वारा काव्य-समीक्षा की बारीकियों को भली-भांति समझा जा सकता है। चूंकि यह ग्रंथ सैद्धांतिक मीमांसा पर आधारित है इसलिए इसे समझने और इसके द्वारा काव्य के समग्र को समझने के लिए इस ग्रंथ का साहित्यप्रेमियों, साहित्य मर्मज्ञों एवं शोधार्थियों द्वारा पुनर्पाठ जरूरी है।
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( दैनिक, आचरण  दि.10.10.2020)
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Saturday, October 3, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 10 | तिल के फूल- तिली के दाने | गीत संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत दसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के कवि स्व. रमेशदत्त दुबे के गीत संग्रह  "तिल के फूल - तिली के दाने" का पुनर्पाठ।

सागर : साहित्य एवं चिंतन

पुनर्पाठ : ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ गीत संग्रह
            - डॉ. वर्षा सिंह

इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर के कवि स्व. रमेशदत्त दुबे की पुस्तक ‘तिल के फूल-तिली के दाने’। यह एक ऐसा गीत संग्रह है जिसके गीत बच्चों के लिए हैं। 

कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने अपने बचपन में राजा-रानी, हाथी-घोड़े, शेर-भालू, राक्षस-परी आदि की कहानियां और कविताएं न सुनी हों। हमारी दादी, नानी और मां ने हमें बचपन में ढेर सारी कहानियां सुनाई हैं और बाल कविताएं याद करवाई हैं। अगर मैं अपनी व्यक्तिगत बात करूं तो मुझे मेरे नानाजी हमें संत ठाकुर श्यामचरण सिंह पंचतंत्र, हातिमताई, चहार दरवेश, चन्द्रकांता, रामायण, महाभारत से ले कर महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ी कहानियां सुनाया करते थे। यदि बात की जाए पंडित विष्णु शर्मा के पंचतंत्र की, तो उसमें निहित कथाएं उन राजकुमारों को रोचक ढंग से शिक्षा देने के लिए पशु-पक्षियों को आधार बना कर तैयार की गई थीं जो राजकुमार पढ़ने में घोर अरुचि रखते थे। पंडित विष्णु शर्मा का यह प्रयास सफल रहा। एक उदाहरण हम अपने जीवन से भी उठा सकते हैं। हम सभी ने अपने बचपन में वह कविता तो अवश्य पढ़ी होगी जो चार पंक्तियों में मछली के जीवन से अवगत करा देती है -
मछली जल की रानी है
जीवन जिसका पानी है
हाथ लगाओ डर जाएगी
बाहर निकालो मर जाएगी

कहने का आशय यह है कि बच्चों के लिए जो साहित्य रचा जाए उसमें सरल शब्द और रोचक शैली के माध्यम से जीवन से जुड़ा ज्ञान दिया जाए। ऐसा ज्ञान जो बच्चों की कल्पना शक्ति और व्यक्तित्व का एक साथ विकास करे। बच्चों के लिए मुद्रित साहित्य की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नेशनल बुक ट्रस्ट के अंतर्गत सन् 1957 में “चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट” की स्थापना में की गई, ताकि बच्चों के लिए ज्ञानवर्द्धक, रोचक एवं स्तरीय साहित्य प्रकाशित उपलब्ध कराया जा सके। अन्य प्रकाशकों ने भी बाल साहित्य की ओर ध्यान दिया। चम्पक, नंदन, चंदामामा, पराग आदि पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती रही हैं। फिर भी बाल साहित्य कहीं पीछे छूटता गया। लेकिन कुछ साहित्यकार जितनी गम्भीरता से बड़ों के लिए साहित्य रच रहे थे उतनी ही गम्भीरता से बच्चों के लिए भी गीत रच रहे थे। कवि रमेश दत्त दुबे ने बच्चों के लिए कई गीत लिखे। जिनमें से अट्ठाइस गीत ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ नामक गीत संग्रह के रूप में संग्रहीत हैं। इस गीत संग्रह को मैंने कई बार पढ़ा है। जब भी मैं इसके गीतों को पढ़ती हूं तो अपने बचपन के दिनों में जा पहुंचती हूं। सीधे-सरल शब्दों में लयात्मकता से भरे ये गीत मुझे उन दिनों की याद दिलाते हैं जब मैंने स्कूल की प्रतियोगिता के लिए एक गीत लिखा था। मुझे याद है कि जब मैं कक्षा 06 में पढ़ती थी तब विद्यालय में एक कविता लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इसमें प्रतियोगियों के लिए कक्षावार तीन वर्ग निर्धारित किए गए थे- प्रायमरी, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक। मैंने माध्यमिक वर्ग में अपना नाम लिखा दिया। अब समस्या थी कविता लिखने की। मैंने इस संबंध में नानाजी से मदद मांगी, तो उन्होंने कहा - तुम प्रतिभागी हो इसलिए स्वयं कविता लिखो। तब मैंने पूछा कि मैं कैसे लिखूं। नानाजी ने कहा अपनी छोटी बहन पर कविता लिख डालो। और फिर क्या था, मैंने फटाफट अपनी छोटी बहन शरद पर कविता लिख डाली। मुझे उस कविता पर प्रथम पुरस्कार भी मिला। मेरी वह कविता थी -
मेरी बहना, मेरी बहना
सदा मानती मेरा कहना
खेल कूद से अधिक सुहाता
हरदम उसको लिखना-पढ़ना

यह कविता मुझे आज तक याद है जबकि आयु की परिपक्वता के साथ बाल कविताएं पीछे छूटती चली गईं। प्रायः सभी के साथ यही होता है। सरल सी प्रतीत होने वाली बाल कविताएं पीछे छूट जाती हैं और छंद, अलंकार तथा जीवन के गूढ़ विषयों से रची-बसी कविताएं सृजित होने लगती हैं। जो बाल कविताएं पढ़ने, सुनने में सहज और सरल लगती हैं उनको लिखना बड़ों के लिए लिखे जाने वाले साहित्य से कहीं अधिक कठिन होता है। यह बड़ा ही चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए पहली शर्त है बाल मनोविज्ञान की समझ होना। जैसे रमेशदत्त दुबे ने लोक भावना और बच्चों के खेल गीतों का सम्मिश्रण करते हुए ऐसे रोचक गीत लिखे जो वर्तमान परिवेश से भी बच्चों को जोड़नो में सक्षम हैं और पहेलियां सी भी बुझाते हैं। उदाहरण के लिए ‘‘हाथी, घोड़ा, पालकी’’ शीर्षक उनका यह गीत देखें-
हाथी, घोड़ा, पालकी
बातें हैं उस काल की
मोटर, साइकिल, प्लेन की
बातें हैं इस काल की।
बातों-बातों से बनती हैं
बातें बिलकुल हाल की
सभी हाल की बातों से 
छपते हैं अखबार
नौ नकद के सौदे में
तेरह हुए उधार

  समीक्ष्य कृति -  तिल के फूल तिली के दाने 

इस संग्रह में एक गीत है - ‘‘नानाजी’’ जिसमें नानाजी का वर्णन बड़े ही रोचक ढंग से किया गया है, उसका यह अंश देखें - 
कैसे तो हैं नानाजी
कैसा इनका बानाजी
चश्मा उनका मोटा है
दांत लगाए हैं नकली
छड़ी सहारे चलते हैं
झुकी कमर उनकी पतली
कैसे तो हैं नानाजी
कुछ बोलो कुछ सुनते हैं
मन ही मन कुछ गुनते हैं
गुनी हुई हर बात को
धुनिया जैसा धुनते हैं
कैसे तो हैं नानाजी

‘‘पो संपा’’ शीर्षक गीत में कवि ने बुंदेलखंड के खेलगीत को बड़ी खूबसूरती से पिरोया है। इस गीत की पंक्तियां देखें -
पो संपा भई पो संपा
पो संपा ने क्या किया
पो संपा ने रेल बनाई
रेल बना कर खूब चलाई
अब तो रेल में जाना पड़ेगा
लटके-बैठे, खड़े-खड़े
साथ चलेंगे पेड़ खड़े
छुक-छुक करती चलती रेल
डिब्बों में है रेलम्पेल
कहीं बोगदा आ जाएगा
अंधकार तब छा जाएगा

इस गीत में ‘‘पो संपा’’ खेल गीत के बहाने कवि ने रेल यात्रा का परिचय दे दिया गया है। जो उन बच्चों के मन में भी रेल यात्रा के बारे में रुचि पैदा कर सकता है जिन्होंने कभी रेल देखी भी न हो। बच्चों को बंदर, भालू, बिल्ली आदि पशुओं से भी बड़ा लगाव रहता है। ‘‘एक से तीन’’ शीर्षक गीत में बड़े चुलबुले ढंग से बंदर, भालू, बिल्ली के बारे में लिखा गया है -
एक है बिल्ली, एक चिबिल्ली
एक है मुंबई, एक है दिल्ली
एक छमाछम नाच रही
एक उछलती, एक कूदती
बैठी-बैठी एक खांसती
एक फटाफट दौड़ रही
एक को ले गया भालू, बंदर
एक छुप गई घर के अंदर
एक सभी को ढ़ूंढ रही
एक मिल गया इस कोने में
एक मिल गया उस कोने में
एक एक से तीन हुई

इन गीतों को उन सभी के लिए पढ़ना जरूरी है जो अपने मन के भीतर मौजूद बचपन से दूर होते जा रहे हैं, और इसी बिन्दु पर बात आती है ऐसे गीतों को लिखे जाने की। आज हिन्दी में बड़ों के लिए लिखे जा रहे साहित्य की अपेक्षा बाल साहित्य कम लिखा जा रहा है। हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्वयं प्रकाश ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘‘हिन्दी में बच्चों के लिए लिखने को दूसरे दर्जे का काम समझा जाता है।  जबकि हर लेखक को बच्चों के लिए कुछ न कुछ जरूर लिखना चाहिए। समर्थ लोग हैं, लिख क्यों नहीं रहे हैं। साथ ही ऐसे लेखन को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। यह कोई दूसरे दर्जे का काम नहीं है।’’ आज जब बच्चे मोबाइल और कम्प्यूटर पर तरह-तरह के गेम्स में रमें रहते हैं तब उनके लिए बाल साहित्य और भी जरूरी हो जाता है। ऐसे समय में कवि स्व. रमेशदत्त दुबे की पुस्तक ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ का पाठ एवं पुनर्पाठ दोनों महत्व रखते हैं। 
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साहित्य वर्षा
 
( दैनिक, आचरण  दि.03.10.2020)
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