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Saturday, April 4, 2020

सालों बाद चिड़िया की चहचहाहट सुन रही हूं, देख रही हूं गिलहरियों का पेड़ पर चढ़ना - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      लॉकडाउन के इन दिनों के मेरे अनुभव को प्रकाशित किया है "नवदुनिया" ने... इस हेतु "नवदुनिया" को हृदय से आभार.🙏

सालों बाद चिड़िया की चहचहाहट सुन रही हूं, देख रही हूं गिलहरियों का पेड़ पर चढ़ना
            - डॉ. वर्षा सिंह  
   इन दिनों लॉकडाउन के कारण जाहिर है कि और सभी लोगों की तरह मैं भी अपने घर की हदों में कैद हूं। जी हां, दरवाज़े पर लगा ताला मुझे इस बात की याद दिलाता है कि बाहर कोरोना वायरस का खतरा है और मुझे अपने परिवार के साथ घर के भीतर ही रहना है। बाहर न निकल पाने से होने वाली छटपटाहट लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में मैंने महसूस की, लेकिन फिर मैंने महसूस किया कि कभी-कभी ऐसी स्थिति हमें स्वयं के करीब लाने और उन चीजों से जोड़ने का एक बेहतरीन अवसर देती है जिनको हम अपनी रोजमर्रा की व्यस्त जिंदगी में इग्नोर कर देते हैं। मसलन चिड़ियों का चहचहाना, घर के सामने वाली सड़क पर से गुजरती हुई गायों का निकलना और उन्हें रोटी देने पर ठिठक कर कृतज्ञता भरी नजरों से देखना, घर के सामने लगे हुए चांदनी के पेड़ पर गिलहरियों का चढ़ना उतरना इधर-उधर देखते हुए फिर हाथों में लिए हुए कुछ सामान को धीरे-धीरे कुतरना …. ऐसी कितनी सारी चीजें हैं जिन्हें हम अपनी जिंदगी में देख कर भी अनदेखा करते चलते हैं।
        तो मुझे बार-बार यह महसूस होता है कि यदि लॉकडाउन नहीं होता तो इन चीजों को महसूस करने का मौका भी नहीं मिलता। इन दिनों जबकि बाहर जाने का कोई भी काम नहीं है जैसे सब्जी लाना, किराना शॉपिंग, माताजी के लिए दवा का प्रबंध, सामाजिक कार्यों- साहित्यिक आयोजनों में भागीदारी … तो ऐसे समय में मेरी दिनचर्या में जुड़ गए हैं वह कार्य जिन्हें मैं पहले चाह कर भी नहीं कर पा रही थी। हां, मैंने कुछ अच्छी क़िताबें पढ़ीं हैं, कुछ कविताएं- कुछ लेख लिखे हैं,  कुछ स्केच बनाए हैं, घर की साफ सफाई की है।
      इन दिनों मैं अपनी माताजी की कही हुई छोटी-छोटी बातों को भी सुन पा रही हूं, उनसे बातचीत कर पा रही हूं और महसूस कर पा रही हूं कि वे अपनी इस वृद्धावस्था के दौर में किस तरह स्वयं को एकाकी महसूस करती रहती हैं। हम अपने कामों में उलझे रहते हैं तरह-तरह की व्यस्तताओं के चलते हम यह नहीं समझ पाते कि हमारे बुजुर्ग हमसे कितना कुछ कहना चाह रहे हैं, हमसे कौन-कौन सी अपेक्षाएं करना चाह रहे हैं जिस वक्त वे हमें आवाज़ देते हैं, उस वक्त हम अपनी व्यस्तता में उलझे रहने के कारण उन्हें सुन नहीं पाते हैं और बाद में जाकर जब उनसे पूछते हैं कि वे क्या कहना चाहते हैं तो तब तक हमारे बुजुर्ग भूल जाते हैं कि वे हमसे क्या कहना चाह रहे थे। संवादों में इस प्रकार का गैप हमारे बुजुर्गों को छटपटाहट से भर देता है और हमें हमारे बुजुर्गों से दूर कर देता है। इन दिनों लॉक डाउन के कारण जबकि मैं लगातार घर में ही हूं और अपनी माता जी द्वारा पुकारे जाने पर तत्काल ही उनकी बात सुनकर रिस्पांस देती हूं तो मैंने यह महसूस किया है कि मेरी माता जी की आंखों में चमक आ जाती है उनकी ममता-करुणा छलकने लगती है। वे आत्म सुख का अनुभव करती हैं और उनके उस आत्मसुख को महसूस कर मुझे भी आंतरिक खुशी प्राप्त होती है। यही तो है रिश्तों की तरलता जिसे कितने ही बरसों के बाद अब जाकर मैं महसूस कर पा रही हूं। ऐसा नहीं है कि मैं अपनी माता जी की सेवा नहीं करती या उनकी बातें नहीं सुनती लेकिन जिस वक्त वह कुछ कहती हैं ठीक उसी वक्त उसे सुनना महत्वपूर्ण होता है। आगे-पीछे की बातें बेमानी हो जाती है।
         मुझे लगता है कि लॉकडाउन के इन लंबे दिनों में लॉकडाउन के अनुभवों से सीख लेकर हम अपने भविष्य की जिंदगी में भी कुछ समय ऐसा निकालें कि मानो हम लॉकडाउन में ही जी रहे हों। सप्ताह में अथवा पक्ष या माह में कम से कम एक दिन बाहरी दुनिया से अपने आप को काट कर घर और घर-परिवार में रहने वालों की बातें सुनें। वह सब कुछ महसूस करें जो हम बाहर आते-जाते हुए लगातार इग्नोर करते रहते हैं और महसूस नहीं कर पाते हैं तो इससे हमें अपने जीवन में एक बहुत बड़ी तब्दीली महसूस होगी और यह सकारात्मक तब्दीली हमें जीवन जीने का एक नया रास्ता दिखाएगी, एक नया दिशा बोध कराएगी। लॉकडाउन को मजबूरी न समझते हुए जीवन में मिलने वाली एक उपलब्धि के रूप में स्वीकार करें, तो शेष बचे दिन भी बड़ी सहजता से गुजर जाएंगे और हम आईने के सामने खड़े होने पर स्वयं को देखते हुए यह अनुभव करेंगे कि हमने खोया कुछ भी नहीं है बल्कि बहुत कुछ पा लिया है और यह पाने का सुख हमें हमसे परिचित कराएगा। यह जीवन का नियम है कि हर बुरी घटना बहुत सी अच्छी सीख दे जाती है। आज ऐसी ही सीखों को महसूस करने और आत्मसात करने का समय है।
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Saturday, March 28, 2020

लॉकडाउन में कलम और मुखर, क्या खूब लिख रहे हैं साहित्यकार - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     दैनिक भास्कर ने आज 28 मार्च 2020 के अंक में प्रकाशित किया है कि सागर शहर के साहित्यकारों द्वारा कोरोना संदर्भित कौन सी कविताएं लिखी जा रही हैं... भास्कर ने प्रश्न उठाया है कि.... "अपने शहर और देश के साथ कलम के सिपाही भी इन दिनों लॉकडाउन में हैं। लेकिन क्या उनकी कलम भी लॉक हो गई है? "

   भास्कर ने ही फिर उत्तर देते हुए लिखा है  .... "जी, नहीं।भास्कर ने जब अभिव्यक्ति के इन अधिष्ठाताओं से बात की तो पाया कि आयोजन थमे हैं, कलम तो और भी ज्यादा मुखर हो उठी है। हां , विषय जरूर बदले हुए हैं। साहित्यकार अपने समय को जीता है और उसे ही अभिव्यक्त भी करता है। यही इस समय देखने को मिल रहा है। कोरोना महामारी ने दुनिया को जिस तरह से हलाकान कर रखा है , कवि-साहित्यकारों ने उसे पूरी तीव्रता के साथ अनुभूत किया है और शब्द- शक्ति का लगातार प्रहार भी वे इसेक खिलाफ कर रहे हैं। अलग-अलग रचनाओं में कहीं साहस नजर आता है, कहीं समझाइश तो कहीं भरोसा कि इस संकट से हम जल्द ही उभर जाएंगे।
महिला लेखिकाओं और कवयित्रियों के तेवर भी भी तीखे हैं। चर्चित लेखिका शरद सिंह लिखती हैं-

हो वक़्त बुरा कितना, आख़िर तो बदलता है।
दीवार कोरोना की, जल्दी है इसे ढहना।


वरिष्ठ गजलकार डॉ. वर्षा सिंह इसे एकता के रंग से जोड़तीं हैं और उसी में इसका हल देखतीं हैं-

कोरोना समझे नहीं, रंग, धरम ना जात।
मिल कर लें संकल्प हम, देनी होगी मात।।"



Tuesday, March 10, 2020

होली की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह

होली ने छेड़ा यहां, फिर ख़ुशियों का राग।
रंगों का मेला लगा, खेल रहे सब फाग ।।
प्रेम-प्यार ऐसा बढ़े, बुझे द्वेष की आग ।
"वर्षा" की है ये दुआ, धुलें क्लेश के दाग़ ।।

होली की हार्दिक शुभकामनाएं
               -डॉ. वर्षा सिंह


Monday, October 14, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 66 ... एक संवेदनशील लेखिका देवकी भट्ट नायक दीपा - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की लेखिका देवकी नायक भट्ट दीपा पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

      एक संवेदनशील लेखिका  देवकी भट्ट नायक दीपा
                            - डाॅ. वर्षा सिंह

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       परिचय:- देवकी भट्ट नायक दीपा
       जन्म:-   27 दिसंबर 1964
       जन्म स्थान:- पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)
       माता-पिता:- स्व. कमला देवी भट्ट एवं स्व.रूद्र दत्त भट्ट
      शिक्षा:- हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य तथा अर्थशास्त्र में एम.ए. पत्रकारिता में डिप्लोमा
लेखन विधा:- गद्य, पद्य
प्रकाशन:- पत्र, पत्रिकाओं में
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        लेखन के क्षेत्र में महिलाओं की दस्तक पिछली सदी से ही पड़नी शुरू हो गई थी। वे साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने लगी थीं। सागर में भी लेखिकाओं ने अपनी लेखनी को साबित करने का हरसंभव प्रयास किया है। देवकी भट्ट नायक दीपा सागर नगर की एक ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने प्रचुरता से तो नहीं लिखा है किन्तु उनका लेखन अनदेखा नहीं किया जा सकता है। देवकी भट्ट नायक दीपा का जन्म 27 दिसंबर 1964 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ नामक जिले में हुआ था। वे अपने नाम के संबंध में बताती हैं कि विवाह पूर्व उनका नाम देवकी भट्ट था तथा विवाहोपरांत ‘नायक’ सरनेम जुड़ा। जब वे लेखन के क्षेत्र में प्रविष्ट हुईं तो उन्होंने ‘दीपा भट्ट’ के नाम से भी रचनाएं लिखीं। देवकी भट्ट नायक दीपा के पिता स्वर्गीय रूद्रदत्त भट्ट  भारतीय सेना में आनरेरी कैप्टन थे एवं माता स्वर्गीय कमला देवी गृहणी थीं। देवकी भट्ट ने और हिंदी साहित्य अंग्रेजी साहित्य तथा अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है उन्होंने पत्रकारिता मे डिप्लोमा कोर्स भी किया। उनकी रचनाओं का प्रकाशन दैनिक नवदुनिया, नारी संबल, आचरण, नाइस डे, अबला नहीं नारी, साहित्य सरस्वती आदि पत्र-पत्रिकाओं में हो चुका है। इनकी कविताओं और कहानियों का प्रसारण आकाशवाणी सागर तथा भोपाल दूरदर्शन से भी हुआ है। साहित्यिक गोष्ठियों में कहानी एवं कविता का पाठ कर चुकी हैं। महिला सशक्तिकरण में विश्वास रखने वाली देवकी भट्ट नायक ने रुद्र कमला महिला एवं बाल विकास समिति के माध्यम से गरीब और श्रमिक महिलाओं के बीच कई कार्य किए हैं। भारतीय महिला फेडरेशन की संयोजक होने के साथ ही महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सागर मध्य प्रदेश में शिक्षक हैं। उल्लेखनीय है कि जहां उत्कृष्ट सेवा कार्यों के लिए राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है।
         देवकी भट्ट नायक दीपा ने कहानियां भी लिखी हैं और कविताएं भी। उनकी कविता में स्त्री के रोजमर्रा के जीवन के अनेक दृश्य दिखाई देते हैं। जैसे उनकी एक कविता है-‘औरत जात’। इस कविता का एक अंश देखिए-
बात चलती है
तो कह देते हैं लोग मुझसे
कि अब सबसे ज्यादा धर्म
औरतों में बचा है
मैं घुसती हूं बातों के तालाब की
गहराई में
जहां मर्द से पहले उठकर
झाड़ू बुहारी करती
घर लिपती, बर्तन धोती, खाना बनाती
गर्म-गर्म औरों को खिलाकर
बचा-खुचा खुद खाती
बच्चे जनती
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

        इसी कविता का एक और अंश स्त्रियों की पारिवारिक एवं सामाजिक दशा के परिप्रेक्ष्य में चिंतन करने योग्य हैः-
रक्ताल्पता की शिकार होती
हड़बड़ा कर, बच्चों को तैयार करती
नाश्ता कराती, स्कूल भेजती
पति की तमाम तैयारियों के बाद
स्वयं जल्दी-जल्दी तैयार होकर
दफ्तर जाती स्त्रियों का समूह है
तमगा लटकाए मंगलसूत्र का
भोगती अमंगल
एक पूरी की पूरी जमात है।

        दहेज भारतीय समाज में एक ऐसा कलंक है जो आज भी पूरी तरह नहीं मिट सका है।  दहेज की बलिवेदी पर प्रति वर्ष अनेक नववधू मृत्यु की भेंट चढ़ा दी जाती हैं। यह कलंक समाज के प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के मन को कचोटता है। ‘‘दहेज’’ शीर्षक रचना में देवकी भट्ट नायक दीपा लिखती हैं-
मैंने आत्मा को नहीं मारा
गला घोंटा नहीं जमीर का
इसीलिए आज बेचैन हूं
आज जब मेरी सहेली की
शादी की पक्यिात की बात हो रही है
उसमें हो रही है खुल कर सौदेबाजी
कितनी बरेक्षा, कितना फलदान
और कितना दहेज
किस-किस जिंस में दिया जाएगा
बता रहे हैं वरपक्ष की ओर से
आए हुए मध्यस्थ
एक-एक रेशा उधाड़ा जा रहा है
इज्जत की सीवन का
और मैं विवश खड़ी हूं

लेखिका देवकी भट्ट नायक दीपा

       दीपा रुद्र भट्ट के नाम से प्रकाशित देवकी भट्ट नायक दीपा की कहानी ‘‘उनसे पूछ लो’’ में उन बंधनों का विवरण है जिसमें एक आम स्त्री बंधी रहती है। ये बंधन पारिवारिक रिश्तों में संतुलन बनाए रखने में भी कभी-कभी कठिनाइयां पैदा करने लगते हैं और तब स्थितियां जटिल हो जाती हैं। मन संत्रास के झंझावात से गुजरने लगता है। इस कहानी का एक अंश यहां प्रस्तुत है -
‘‘इंतिजार की घड़ियां कितनी लम्बी होती हैं। एक-एक पल युगों सा प्रतीत होता है। जैसे घड़ी रुक गई हो। उस दिन कम्मू का बुरा हाल था। वह बेसब्री से पति के घर आने का इंतिजार कर रही थी। दोपहर का एक बजा था। उसने बिना चबाए ही खाना गटक लिया ताकि देर न हो जाए। फिर बाहर निकल कर देखा तो वहां कोई न था। वह वापस अंदर गई। घड़ी देखी तो एक बज कर पांच मिनट ही हुए थे। पांच मिनट में वह खाना खा कर तैयार हो गई थी। प्रतिदिन एक से दो बजे के बीच उसके पति परेश दुकान बंद करके घर खाना खाने आते थे। जो अभी तक प्रकट नहीं हुए थे। कम्मू को मां की याद बहुत सता रही थी। रह-रह कर उनका चेहरा जेहन में आ जाता था। सूचना मिली थी कि उनका स्वास्थ्य खराब है। मां इसी शहर में रहती थी।’’
     देवकी भट्ट नायक दीपा सागर शहर की एक ऐसी संवेदनशील लेखिका हैं जिनमें गम्भीर साहित्य सृजन की सम्भावनाएं हैं।

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( दैनिक, आचरण  दि. 14.10.2019)
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Sunday, October 13, 2019

शरद पूर्णिमा एक, मान्यताएं अनेक - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
          वर्ष भर में पड़ने वाली समस्त पूर्णिमा में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रि के समाप्त होने के बाद शरद पूर्णिमा आती है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन माह यानी क्वांर मास की पूर्णिमा तिथि पर शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। इस बार वर्ष 2019 में यह आज 13 अक्टूबर को है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर रात भर अपनी किरणों से अमृत की वर्षा करता है। माना जाता है कि इस दिन दूध और चावल से बनाई गई खीर को खुले आसमान के नीचेे रखने से ओस के कण के रूप में अमृत बूंदें खीर के पात्र में भी गिरती हैं जिसके फलस्वरूप यह खीर अमृत तुल्य हो जाती है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्य तथा कांति में श्रीवृद्धि होती है। मान्यता है कि चंद्रमा कि किरणें उस पर पड़ने से यह खीर औषधियुक्त हो जाती है।

शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की किरणों को अवशोषित करती खीर

          बुंदेलखंड के सागर दमोह आदि क्षेत्र में शरद पूर्णिमा पर महिलाएं व्रत रखकर भगवान विष्णु को मावा के लड्डूओं का भोग लगाती हैं। व्रत के दौरान कथा एवं चंद्रदेव, तुलसी और भगवान विष्णु का विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। विशेष तौर पर भगवान को मावा यानी खोबा एवं शक्कर से निर्मित 6 लड्डुओं का भोग लगाया जाता है, जिसमें से एक लड्डू भगवान विष्णु को, दूसरा पंडित को, तीसरा गर्भवती स्त्री को एवं चौथा अपनी सहेली को दिये जाने की परम्परा है।

शरद पूर्णिमा का पूजन

     शरद पूर्णिमा की रात को छत पर खुले आसमान के नीचेे खीर को रखने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य भी निहित है। खीर दूध और चावल के मिश्रण को पकाने से बनकर तैयार होती है। दरअसल दूध में लैक्टिक नाम का एक अम्ल होता है। यह एक ऐसा तत्व है जो चंद्रमा की किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति अवशोषित कर लेता है। वहीं चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया सरल हो जाती है। इस खीर का सेवन करना अत्यंत लाभप्रद होता है। शरद पूर्णिमा का दिन कई मायनों में महत्वपू्र्ण है। इस दिन जहां उत्तर भारत में इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और खीर का प्रसाद बनाकर रात को चंद्रमा के नीचे रखा जाता है।

भगवान विष्णु

अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के साथ कोजागर पूर्णिमा भी कहा जाता है।
पूरे साल में 12 पूर्णिमा तिथि आती है जिनमें, आषाढ़, कार्तिक और शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। शरद पूर्णिमा के बारे में कहा जाता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर आसमान से अमृत की वर्षा करता है। इस रात देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी भ्रमण के लिए आती हैं। इसलिए कहते हैं कि जो इस रात में जागरण करता है मां लक्ष्मी उसकी झोली सुख संपत्ति से भर देती हैं। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को कोजागरा और कोजागरी की रात कहते हैं। कोजागरा व्रत पर इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि और रवि नामक शुभ योग बन रहे हैं जो इस दिन को और भी शुभ बना रहे हैं। इस दिन को देवी लक्ष्मी के जन्मोत्सव के रूप में भी जाना जाता है। कथाओं के अनुसार सागर मंथन के समय देवी लक्ष्मी शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र से उत्पन्न हुई थीं।

शरद पूर्णिमा पर श्री कृष्ण का महारास

पेंटिंग... महारास में लीन राधा, कृष्ण और गोपिकाएं

    चूंकि महामति प्राणनाथ बुंदेलखंड केसरी  छत्रसाल के गुरु थे और कृष्ण के सखी भाव से उपासक थे अतः मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के पन्ना जिले के सुप्रसिद्ध मंदिर श्री प्राणनाथ जी मंदिर में शरदऋतु की शरदपूर्णिमा पर हजारों व लाखों देशी व विदेशी श्रद्धालुओं के साथ प्रतिवर्ष अक्टूबर के महिने में श्री 108 प्राणनाथ ट्रस्ट के एवं प्रशासन के सहयोग से बडे ही धूमधाम से आयोजित किया जाता है। महारास की यह link देखें....
      https://youtu.be/jmuO_RVlwS0
        अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा का मुख्य समारोह पूर्णिमा की रात्रि में होता है । रात्रि में करीब 12 बजे बंगला जी मंदिर में श्रीजी की सवारी ब्रम्हक चबूतरे में लाई जाती है । पूर्णमासी की महारास का उल्लास रात्रि भर चलता है । श्रीजी की सवारी ब्रम्ह‍ चबूतरे पर पांच दिन तक रूकी रहती है । इस दौरान पांच दिन तक गरबा सहित विविध धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन चलता रहता है ।
श्रद्धालुओं द्वारा महारास, गरबा आदि किया जाता है...
https://youtu.be/8VPjMBMIIwE

महामति प्राणनाथ मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश

       पन्ना में शरद पूर्णिमा महोत्स्व का पहला कार्यक्रम संवत 1740 में हुआ था । स्थानीय  प्रणामी धर्माविलंबियों के मतानुसार श्री प्राणनाथ जी बंगला जी मंदिर में अपने पांच हजार सुंदरसाथ के साथ ठहरे थे । पूर्णिमा की चांदनी रात में वे सुंदरसाथ के साथ श्रीकृष्ण द्वारा ग्वांलवालों व सखियों के साथ खेले जाने वाले महारास की चर्चा कर रहे थे । इसी दौरान उनके साथ आए सुंदरसाथ नें महामति प्राणनाथ जी से अखंड महारास का अनुभव कराने का निवेदन किया तब पूर्णिमा की अर्ध रात्रि शुरू होने वाली थी । इस पर महामति प्राणनाथ जी नें पांच हजार सुंदरसाथ के साथ महारास खेलना शुरू किया । यह महारास पांच दिन तक बिना रूके, बिना थके चलता रहा । तभी से यह हर साल मनाया जाता है ।

महामति प्राणनाथ मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश

        यूं तो अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं किन्तु बहुश्रवणीय, जनसामान्य में बहुप्रचलित एक लोककथा के अनुसार एक साहुकार को दो पुत्रियां थीं। दोनो पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। लेकिन बड़ी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी संतान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक करने से तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।  उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। बाद में उसे एक लड़का पैदा हुआ। जो कुछ दिनों बाद ही फिर से मर गया। उसने लड़के को एक पाटे (पीढ़ा) पर लेटा कर ऊपर से कपड़ा ढंक दिया। फिर बड़ी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पाटा दे दिया। बड़ी बहन जब उस पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छूते ही रोने लगा। तब बड़ी बहन ने कहा कि तुम मुझे कलंक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता। तब छोटी बहन बोली कि यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा का श्रवण एवं पूजन दृश्य

      चूंकि आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है इसलिए शरद पूर्णिमा को चंद्रमा पूरा नजर आने से इसे महापूर्णिमा भी कहते हैं। चंद्रमा इस दिन 16 कलाओं से युक्त रहता है। ये कलाएं मनुष्य के लिए सुख, सिद्धि दायक एवं उन्नति कारक मानी जाती है। सर्वार्थसिद्घ और अमृत सिद्ध का संयोग भी इस दिन बना रहता है। शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा की रात को ही भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास रचाया था। वैसे ताे हर माह में पूर्णिमा आती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। शरद पूर्णिमा से ही स्नान और व्रत प्रारंभ हो जाता है। साथ ही माताएं अपनी संतान की मंगल कामना से देवी,देवताओं का पूजन करती है। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत समीप आ जाता है। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारंभ होता है। शरद ऋतु में मौसम एकदम साफ़ रहता है। इस दिन आकाश में न तो बादल होते हैं और न ही धूल-गुबार। इस रात्रि में भ्रमण और चंद्र किरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना गया है। प्रति पूर्णिमा को व्रत करने वाले इस दिन भी चंद्रमा का पूजन करके भोजन करते हैं।

शिव-पार्वती

    शरद पूर्णिमा के दिन शिव-पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है। यही पूर्णिमा कार्तिक स्नान के साथ राधा-दामोदर पूजन व्रत धारण करने का भी दिन है। 
     
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की बहुचर्चित पेंटिंग "शरद पूर्णिमा"



Monday, September 2, 2019

सागर शहर में गणेशोत्सव - डॉ. वर्षा सिंह



        गणेशोत्सव लगभग पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह से मनाया जाता है। बुंदेलखंड के सागर शहर में भी इस अवसर पर लोग गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति लाकर अपने घरों में स्थापित करते हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी तक चलने वाले इस श्री गणेशोत्सव समारोह में श्रद्धालु लोग कम से कम तीन दिन या अधिकतम दस दिन तक गणेश जी की पूजन, सेवा, भोग, आरती, कीर्तन आदि से अनुष्ठान पूर्ण करके गणेश प्रतिमा को जल में सम्मानपूर्वक विसर्जित कर देते हैं। कहा जाता है कि गणेश जी के घर मे पधारने से धन-धान्य, ऋद्धि-सिद्धि आती है।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्र दर्शन करना निषेध है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन रात्रि को चांद देखने से एक वर्ष के अन्दर कोई न कोई कलंक अवश्य लगता है। पुराणों में वर्णित है कि भगवान श्रीकृष्ण को भी इस दिन चन्द्र दर्शन करने से कलंक का सामना करना पड़ा था। इसलिए इस चतुर्थी को कलंक चतुर्थी या पत्थर चतुर्थी भी कहते हैं। यदि जाने अनजाने में चंद्र दर्शन हो जाए तो वही खडे होकर एक पत्थर उठाकर चांद की ओर फेंक देना चाहिए। गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करना चाहिए।



इस वर्ष गणेश उत्सव के दौरान एक अमृत सिद्धि, दो सर्वार्थ सिद्धि और छह रवि योग रहेंगे। श्रीगणेश की स्थापना शिव-पार्वती योग में होगी। सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन है और शुक्ल योग माता पार्वती को प्रिय है। इस दिन कन्या राशि का चंद्रमा भी है। ये सभी शुभ योग आज सोमवार को है। आज ही महिलाएं जहां शिवपार्वती कार्तिकेय, नंदी, शृंगी आदि गणों को पूजेंगी वहीं घरों में और नगर में जगह- जगह गणेश स्थापना होगी। गणेश चतुर्थी पर लंबे समय बाद कई शुभ संयोग बनेंगे। एक ओर जहां ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति से शुक्ल और रवियोग बनेगा, वहीं सिंह राशि में चतुग्रही योग भी बन रहा है। अर्थात सिंह राशि में सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र एक साथ विद्यमान रहेंगे।


सागर शहर में 100 से अधिक स्थानों पर गणेशजी की झांकी लगाई जाती है, जिसकी तैयारियां पूर्ण हो गई है। गजानन को विराजित करने के लिए स्वर्ण मंदिर बनाया गया है। झांकी लगाने के लिए पंडाल सजना शुरू हो गए है। गणेश भगवान की स्थापना करने के लिए शहर की विभिन्न कमेटियां जुटी हुई हैं। विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, प्रथम पूज्य गणपति बाप्पा बुद्धि एवं समृद्धि के आराध्य देव भगवान श्री गणेश की प्रतिमा को विराजित करने के लिए वाटरप्रूभ पंडाल बनाए जा रहे हैं। बारिश का मौसम रहने के कारण पंडाल को बनने में विशेष ध्यान कमेटियों ने दिया है। गणेश भगवान के प्रतिमाओं की बुकिंग पहले ही हो गई है। पर्यावरण का ध्यान रखते हुए कमेटियों ने मिट्टी की गणेश प्रतिमाओं को ही प्राथमिकता दी है।



Thursday, August 22, 2019

काव्य संग्रह "कुछ कदम का फ़ासला" का लोकार्पण समारोह- डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

           पिछले रविवार यानी 18.08.219 को  मुझे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह को कवि वीरेन्द्र प्रधान के प्रथम काव्य संग्रह "कुछ कदम का फ़ासला" के लोकार्पण समारोह में उपस्थित होने और पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख का वाचन कर अपने विचार रखने का अवसर मिला। इस समारोह में  बतौर मुख्य अतिथि एवं प्रमुख वक्ता प्रख्यात साहित्यकार डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह ने भी समारोह में उपस्थित प्रबुद्धजनों के समक्ष पुस्तक पर अपने विचार रखे।

तस्वीरें उसी अवसर की....























Wednesday, July 31, 2019

प्रेमचंद जयंती (31 जुलाई) पर विशेष - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       आज 31 जुलाई... यानी हिन्दी कथा साहित्य के पुरोधा प्रेमचंद का जन्म दिवस है... "पत्रिका" समाचारपत्र के सागर संस्करण में आज प्रकाशित मैं अपने और बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के विचारों को यहां आप सभी से साझा कर रही हूं. Please read & share.....

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*बुंदेली इतिहास एवं संस्कृति से प्रभावित थे प्रेमचंद*
- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, वरिष्ठ लेखिका एवं उपन्यासकार
           प्रेमचंद ने भारतीय समाज की विशेषताओं और अन्तर्विरोधों को एक कुशल समाजशास्त्री की भांति गहराई से समझा। इसलिए उनके साहित्य में भारतीय समाज की वास्तविकता स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। स्त्रियों, दलितों सहित सभी शोषितों के प्रति प्रेमचंद ने अपनी लेखनी चलाई। प्रेमचंद मात्र एक कथाकार नहीं वरन् एक समाजशास्त्री भी थे। उनकी समाजशास्त्री दृष्टि सैद्धांतिक नहीं बल्कि व्यवहारिक थी। इसीलिए वे उस सच्चाई को भी देख लेते थे जो अकादमिक समाजशास्त्री देख नहीं पाते हैं। उन्होंने जहां एक ओर कर्ज में डूबे किसान की मनोदशा को परखा वहीं समाज के दोहरेपन की शिकार स्त्रियों की दशा का विश्लेषण किया। उन्होंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य की कहानियां भी लिखीं और उनके लिए प्रेमचंद ने बुंदेलखंड के कथानकों को चुना। बुंदेलखंड पर आधारित उनकी दो कहानियां हैं- -‘राजा हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’।     
         ‘राजा हरदौल’ बुंदेलखंड की लोकप्रिय कथा है। इस बहुचर्चित कथा का बुंदेलखड के सामाजिक जीवन में भी बहुत महत्व है। यह कथा ओरछा के राजा जुझार सिंह की अपने छोटे भाई हरदौल सिंह के प्रति प्रेम और संदेह की कथा है जिसने ओरछा के इतिहास को प्रभावित किया।
        बुंदेलखंड पर आधारित दूसरी कहानी ‘रानी सारन्धा’ बुंदेलखंड गौरव कहे जाने वाले महाराज छत्रसाल की मां रानी सारंधा की कथा है। रानी सारंधा ओरछा के राजा चम्पतराय की पत्नी थीं। चम्पतराय के संबंध में प्रेमचंद ने अपनी कहानी में लिखा है कि ‘राजा चम्पतराय बड़े प्रतिभाशाली पुरुष थे। सारी बुन्देला जाति उनके नाम पर जान देती थी और उनके प्रभुत्व को मानती थी। गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे।’
           ‘रानी सारंधा कहानी के आरम्भ में वे बुंदेलखंड उस रियासत का वर्णन करते हैं जहां रानी सारंधा का जन्म हुआ था। वे लिखते हैं-‘शताब्दियां व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आए और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गांव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गांव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ। यह उसका सौभाग्य था।’ यह कथा रानी सारंधा के जीवन के साथ ही बुंदेलखंड के परिवेश से परिचित कराती है। प्रेमचंद ने जहां अपनी कहानियों में दुखी, दलित, शोषित और दुर्बल चरित्रों को महत्व दिया, वहीं बुंदेलखंड के इतिहास के तथ्यों और चरित्रों को भी अपनी कहानियों में स्थान दिया। कथा सम्राट प्रेमचंद के कथा साहित्य में बुंदेलखंड के कथानकों का पाया जाना इस बात का द्योतक है कि वे बुंदेली संस्कृति, परम्पराओं एवं इसके गौरवशाली इतिहास से प्रभावित थे।
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कथा सम्राट प्रेमचंद # साहित्य वर्षा


हर युग में प्रासंगिक हैं प्रेमचंद

- डॉ. वर्षा सिंह, ब्लॉगर एव साहित्यकार
            कथाकार प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जिस तरह के पात्रों को प्रस्तुत किया है वह अद्वितीय है। प्रेमचंद की कहानियों का फलक व्यापक है। शैल्पिक विशेषताओं की दृष्टि से भी प्रेमचंद की कहानियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। अपने समकालीन कथा साहित्य और परवर्ती पीढ़ी को उनकी कहानियों ने यथेष्ट रूप से प्रभावित किया है। जब तक मानवीय संवेदना रहेंगी तब तक प्रेमचंद प्रासंगिक रहेंगे। प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि, विभिन्न साहित्य रूपों में, अभिव्यक्त हुई। वह बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उनकी रचनाओं में तत्कालीन इतिहास बोलता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में जनसाधारण की भावनाओं, परिस्थितियों और उनकी समस्याओं का मार्मिक चित्रण किया। उनकी कृतियाँ भारत के सर्वाधिक विशाल और विस्तृत वर्ग की कृतियाँ हैं। वे अपने युग की चेतना के मुख्य संवाहक कथाकार के रुप में प्रतिष्ठित हुए । प्रेमचंद जी हिंदी भाषा और साहित्य के सच्चे प्रतिनिधि, उपासक और पोषक हैं। उनके साहित्य में भारतीय आत्मा बोलती है। वे भारतीय साहित्य में किसान-जीवन को अभिव्यक्ति देने वाले सर्वश्रेष्ठ कथाकार हैं।  उन्होंने अपनी लेखनी के महान बल से जनजीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का प्रयास किया । ‘गबन’, ‘कर्मभूमि’ और ‘गोदान’ जैसे उपन्यास और ‘पूस की रात’, ‘सवा सेर गेहूँ’, ‘ठाकुर का कुआँ’ और ‘कफ़न’ जैसी कहानियों ने प्रेमचंद को कालजयी कथाकार बना दिया। वे हर युग में प्रासंगिक हैं।         
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