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Friday, May 1, 2020

प्रलेस की ऑनलाइन कविगोष्ठी - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

     कोरोना लॉकडाउन के कारण इस दफ़ा प्रगतिशील लेखक संघ मकरोनिया इकाई, सागर की पाक्षिक गोष्ठी ऑनलाइन की गई। जिसमें मैंने बहन डॉ. शरद सिंह एवं अन्य सभी प्रतिभागियों ने कोरोना से बचाव संबंधी अपनी हिन्दी एवं बुंदेली कविताओं का वाचन किया। जिसका समाचार दैनिक भास्कर, सागर संस्करण  एवं वेब मैगजीन युवाप्रवर्तक में प्रकाशित हुआ है।

दैनिक भास्कर, सागर संस्करण
#Lockdown2 #लॉकडाउन2
#बुंदेलीग़ज़ल #युवाप्रवर्तक #कोरोना

   युवाप्रवर्तक में इस समाचार को पढ़ने के लिए कृपया इस link पर जाएं...
http://yuvapravartak.com/?p=30923
युवाप्रवर्तक को हार्दिक आभार 🙏









Saturday, March 28, 2020

लॉकडाउन में कलम और मुखर, क्या खूब लिख रहे हैं साहित्यकार - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     दैनिक भास्कर ने आज 28 मार्च 2020 के अंक में प्रकाशित किया है कि सागर शहर के साहित्यकारों द्वारा कोरोना संदर्भित कौन सी कविताएं लिखी जा रही हैं... भास्कर ने प्रश्न उठाया है कि.... "अपने शहर और देश के साथ कलम के सिपाही भी इन दिनों लॉकडाउन में हैं। लेकिन क्या उनकी कलम भी लॉक हो गई है? "

   भास्कर ने ही फिर उत्तर देते हुए लिखा है  .... "जी, नहीं।भास्कर ने जब अभिव्यक्ति के इन अधिष्ठाताओं से बात की तो पाया कि आयोजन थमे हैं, कलम तो और भी ज्यादा मुखर हो उठी है। हां , विषय जरूर बदले हुए हैं। साहित्यकार अपने समय को जीता है और उसे ही अभिव्यक्त भी करता है। यही इस समय देखने को मिल रहा है। कोरोना महामारी ने दुनिया को जिस तरह से हलाकान कर रखा है , कवि-साहित्यकारों ने उसे पूरी तीव्रता के साथ अनुभूत किया है और शब्द- शक्ति का लगातार प्रहार भी वे इसेक खिलाफ कर रहे हैं। अलग-अलग रचनाओं में कहीं साहस नजर आता है, कहीं समझाइश तो कहीं भरोसा कि इस संकट से हम जल्द ही उभर जाएंगे।
महिला लेखिकाओं और कवयित्रियों के तेवर भी भी तीखे हैं। चर्चित लेखिका शरद सिंह लिखती हैं-

हो वक़्त बुरा कितना, आख़िर तो बदलता है।
दीवार कोरोना की, जल्दी है इसे ढहना।


वरिष्ठ गजलकार डॉ. वर्षा सिंह इसे एकता के रंग से जोड़तीं हैं और उसी में इसका हल देखतीं हैं-

कोरोना समझे नहीं, रंग, धरम ना जात।
मिल कर लें संकल्प हम, देनी होगी मात।।"



Tuesday, March 3, 2020

6 रंगों से उकेरा इतिहास का ख़ूबसूरत दिग्दर्शन : कसाईखाना बंद होने पर जनता की ख़ुशी से लेकर गोशाला में विचरण करती गायें दिखाई - डॉ. वर्षा सिंह


      ये है कल दिनांक 02 मार्च 2020 को  "दैनिक भास्कर" में प्रकाशित मेरी रिपोर्ट .... अवसर था.... परसों 01 मार्च 2020 को सागर मुख्यालय स्थित रवींद्र भवन में रतौना आंदोलन के सौ वर्ष के अवसर पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के तत्वावधान में सागर के प्रसिद्ध चित्रकार असरार अहमद के 'रंग के साथी' ग्रुप ने पेंटिंग वर्कशॉप का आयोजन किया। जिसमें चित्रकारों द्वारा ऑन स्पॉट चित्र बनाए गए। रतौना आंदोलन पर बनाए गए चित्रों में पं. माखनलाल चतुर्वेदी, अब्दुल गनी तथा गांधी जी के चित्रांकन नयनाभिराम रहे। रतौना में वर्तमान में स्थित गौशाला को भी चित्रकारों ने अपने चित्र का विषय बनाया।


  मेरी यह रिपोर्ट जस की तस यहां प्रस्तुत है इस ब्लॉग के सुधी पाठकों की पठनीय सुविधा हेतु....
     6 रंगों से उकेरा इतिहास का ख़ूबसूरत दिग्दर्शन
कसाईखाना बंद होने पर जनता की ख़ुशी से
लेकर गोशाला में विचरण करती गायें दिखाई
- डॉ. वर्षा सिंह
        रतौना आंदोलन के सौ वर्ष के अवसर पर बुंदेलखंड में स्वाधीनता आंदोलन का स्मरण कर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा सागर मुख्यालय स्थित रवींद्र भवन में स्वाधीनता आंदोलन में गांधीजी के योगदान से संबंधित चित्रों की प्रदर्शनी लगाई गई जिसके साथ ही उसी परिसर में सागर के प्रसिद्ध चित्रकार असरार अहमद के 'रंग के साथी' ग्रुप ने पेंटिंग वर्कशॉप का आयोजन किया। जिसमें चित्रकारों द्वारा ऑन स्पॉट चित्र बनाए गए। रतौना आंदोलन पर बनाए गए चित्रों में पं. माखनलाल चतुर्वेदी, अब्दुल गनी तथा गांधी जी के चित्रांकन नयनाभिराम रहे। रतौना में वर्तमान में स्थित गौशाला को भी चित्रकारों ने अपने चित्र का विषय बनाया। रतौना आंदोलन को प्रमुखता से प्रदर्शित करने वाले इन चित्रों में विषय के अनुरूप नीले, धूसर, लाल, केसरिया, हरे और सफेद रंगों का प्रयोग किया गया। काग़ज़ पर बने इन चित्रों को जलरंगों के स्ट्रेट स्ट्रोक्स ने और अधिक भावप्रवण बना दिया। रतौना आंदोलन के घटनाक्रम को प्रदर्शित करने वाले चित्र असरार अहमद, अनुशा जैन, सीमा कटारे, शेफाली जैन एवं अंशिता बजाज वर्मा ने बनाए वहीं रश्मि पवार ने रतौना में कसाईखाने को बंद करने पर हर्षित जनता का चित्ताकर्षक चित्रांकन किया। जबकि चित्रकार डॉ. निधी मिश्रा, रेशू जैन, दीपिका रैकवार ने रतौना में मौजूद वर्तमान गौशाला को अपने रंगों में उतारा। इसी वर्कशॉप में वंदना नामदेव, मोनिका जैन, उमाकांत मालेवर, अंजनी चौबे, शालू सोनी आदि ने पं. माखनलाल चतुर्वेदी, महात्मा गांधी, अब्दुल गनी के पोट्रेट बनाए। वर्कशॉप में बनाए गए सभी चित्र रतौना आंदोलन की मूल आत्मा को प्रदर्शित करने में पूर्णतया सफल रहे। जैसाकि भारतीय चित्रकला के छः अंग - रूप भेद, प्रमाणम्, भाव, लावण्य योजनम्, सादृश्यम् और वर्णित भंगम् माना गया है, इन छहो अंगों की कसौटी पर रतौना आंदोलन संदर्भित सभी पेंटिंग्स खरी उतरती दिखाई दीं। रंग के साथी चित्रकारों के लिए जहां यह एक नया अनुभव था, वहीं दर्शकों के लिए यह एक नई अनुभूति थी।
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   कुछ तस्वीरें ... रतौना आंदोलन के सौ वर्ष के अवसर पर .... चित्रकला वर्कशॉप, चित्र प्रदर्शनी और व्याख्यान माला...






 क्या था रतौना आंदोलन -
     ब्रिटिश सरकार के विरोध मे भारत मे जून 1920  में रतौना हुआ था। उस समय सर्कार ने डिब्बाबंद गौ -मांस के निर्यात के लिए सागर (मध्यप्रदेश) के पास रतौना ग्राम मे एक कसाईखाना बनाने का प्रयास किया। जिसमे प्रतिदिन 1400  गाय -बैल काटे जाने की सरकार की योजना थी। इसके विरोध में भाई अब्दुल गनी ने सागर में रटना आंदोलन चलाया तथा पंडित माखनलाल चतुर्वेदी ने जबलपुर से निकलने वाले कर्मवीर समाचार माद्यम से इस आंदोलन का प्रचार प्रसार किया। कर्मवीर में  इसके विरोध में 1000  से ज्यादा लेख लिखे गए।
लाला लाजपत राय ने भी उर्दू अख़बार वन्देमातरम के माद्यम से भी इसका विरोध किया और इस पर कई लेख प्रकाशित किये। अंग्रेज़ो ने हिन्दू मुस्लिम में फूट डालने के लिए बयान दिया की यहाँ केवल गाय और बैल ही कटे जायेगे सुअर नहीं काटे जायेगे।  लेकिन इस कसाईखाने का सर्वाधिक विरोध 19 वर्षीय मुस्लिम युवक भाई अब्दुल गनी ने किया। सागर में समाचार पत्रों का ये आंदोलन इतना तेज़ था की पूरी भारत में  इसकी गूंज सुनाई देने लगी। इस प्रकार तीव्र विरोध के कारण अंग्रेजी सरकार पस्त हो गयी और सितम्बर 1920  को उन्होंने अपनी ये योजना त्याग दी।





       सागर में 01 मार्च 2020 को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल ने सागर में रतौना आंदोलन के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया। जिसमें रतौना आंदोलन के नायक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अब्दुल गनी भाई के सुपुत्र श्री रफीक गनी ने रतौना आंदोलन और इसमें भाई अब्दुल गनी के संघर्ष की पूरी कहानी बयां की। उन्होंने कहा कि भाई अब्दुल गनी  इसलिए गोवंश की रक्षा के लिए अपना सर कटाने के लिए तैयार थे क्योंकि वह दूसरे धर्म की आस्था का सम्मान करते थे।
 दरअसल अंग्रेजों ने सागर ज़िले के एक ग्राम रतौना में 1920 ई. में कसाई खाना खोलने की योजना बनाई इसमें 1400 गाय बैल प्रतिदिन काटे जाने थे। 3 जुलाई के बाद समाचार पत्रों में इसका विज्ञापन पूरे 3 पृष्ठों में छापा गया जिसमें कसाई खाने के लाभ दिखाते हुए इसके अधिक से अधिक शेयर लेने की जनता से अपील की गई। इस प्रोस्पेक्टस में स्पष्ट कहा गया कि सिर्फ गाय बैल काटे जाएंगे सूअर कदापि नहीं काटे जाएंगे। यह इसलिए कहा गया ताकि मुस्लिम इसके विरोध से दूर रहें। परंतु अंग्रेजों का दांव उस समय गलत पड़ गया जब इस कसाई खाने का सबसे पहला विरोध ही एक 25 वर्षीय मुस्लिम युवक भाई अब्दुल गनी ने किया। समाचार पत्र के माध्यम से भी इसका विरोध जबलपुर के श्री ताजुद्दीन ताज ने अपने समाचार पत्र के माध्यम से किया। जिस पर सरकार ने उनके विरुद्ध मुकदमा चलाया और उन्हें जेल भेज दिया गया।अब्दुल गनी ने समस्त साथियों को इस आंदोलन में भाग लेने हेतु प्रेरित किया। पंडित माखनलाल चतुर्वेदी खंडवा से मुंबई जा रहे थे तब उन्होंने पायनियर समाचार पत्र में कसाई खाने का विज्ञापन देखकर अपनी आगामी यात्रा स्थगित कर दी और चालीसगांव स्टेशन पर उतर गए। नवीन टिकट लेकर  खंडवा होते हुए जबलपुर पहुंचे और  इसके पश्चात उन्होंने अपने समाचार पत्र कर्मवीर के माध्यम से कसाई खाने का विरोध किया। 17 जुलाई को पहला लेख लिखा जिसका शीर्षक था गोवध की सरकारी तैयारी। इसके बाद अखिल भारतीय स्तर पर कई नेताओं से मिले। रतौना कसाई खाने के विरोध में आंदोलन उनके प्रयास रंग लाए और लाला लाजपत राय ने अपने समाचार पत्र वंदे मातरम के माध्यम से एवं मदन मोहन मालवीय ने लीडर के माध्यम से इसका विरोध किया। यह विरोध इतना सशक्त था कि ब्रिटिश सरकार घबरा गई।मैसेज सेंड ए रिपोर्ट इन कंपनी जिसे कि इस कसाई खाने का ठेका मिला था उसके मैनेजिंग डायरेक्टर ने त्यागपत्र दे दिया।जब रतन कसाई खाने विरोधी आंदोलन का प्रस्ताव कोलकाता में होने वाले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में रखा जाना था तब सरकार इतनी घबरा गई कि उसने टेलीग्राम के माध्यम से पंडित विष्णु दत्त शुक्ला को सूचना दी कि कसाई खाने की योजना त्याग दी गई है। यह सागर की धरती पर अंग्रेजों की एक नैतिक एवं प्रशासनिक हार थी। इसके पश्चात सागर का नाम ना केवल भारत अपितु इंग्लैंड में भी गूंजने लगा। आगामी स्वाधीनता आंदोलन में सागर को विशेष स्थान मिला। जहां पर अंग्रेज कत्लखाना खोलकर खून की नदियां बनाना चाहते थे उस रतौना में अब गौशाला बन चुकी हैं एवं दूध की नदियां बह रही हैं। रतौना आंदोलन को हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में एक यूनिट के रूप में पढ़ाया जा रहा है। छात्र अत्यंत रुचि के साथ पढ़ रहे हैं। इस महत्वपूर्ण रतौना आंदोलन को स्कूली पाठ्यक्रमों में भी शामिल कराया जाना चाहिए ताकि बच्चों में राष्ट्रीय चेतना का भाव विकसित हो।












कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता श्री चतुर्भुज सिंह राजपूत ने भाई अब्दुल गनी के एक प्रसंग का  जिक्र करते हुए बताया कि भाई अब्दुल गनी के अब्बू ने ही उन्हें प्रेरणा दी थी कि दूसरे धर्म की आस्था और प्रतीकों का सम्मान ही सच्ची धार्मिकता है, इन्हीं आदर्श और संस्कार की वजह से अब्दुल गनी हिन्दुओं की आस्था के मुद्दे पर महा कतलखाने के विरोध के अगुआ बने और सामुदायिक सौहार्द कि मिशाल पेश की।
कार्यक्रम में डॉ सुरेश आचार्य ने भी भाई अब्दुल गनी के संघर्ष और उनके जीवन के अनजाने पहलुओं से अवगत कराया।

इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए दैनिक भास्कर के सेटेलाइट प्रमुख श्री शिव कुमार विवेक ने कहा कहा कि वर्तमान में सोशल मीडिया ताकतवर जरूर है, लेकिन इसके संपादकीय पक्ष को समाज हित में मजबूत करने की आवश्यकता है, जिससे समाज में जाने वाली सूचनाओं पर विचार और एजेंडे को नियंत्रित किया जा सके। कार्यक्रम के आयोजक संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल के कुलपति श्री दीपक तिवारी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि विश्वविद्यालय दादा माखनलाल जी की आदर्श  पत्रकारिता के स्तर और ध्येय को प्राप्त करने के लिए कार्यरत है। विश्वविद्यालय सोशल मीडिया में आई विसंगतियों और चुनौतियों को दूर करने के लिए भविष्य में वर्कशॉप जैसे कार्यक्रम आयोजित करेगा।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय द्वारा लगाई गई महात्मा गांधी के आदर्श और संघर्षमयी जीवन यात्रा को अभिव्यक्त करने वाले दुर्लभ चित्रों की एक पोस्टर प्रदर्शनी आकर्षण का केंद्र रही, इस प्रदर्शनी में विद्यार्थियों, युवाओं और गणमान्य नागरिको ने राष्ट्रपिता के अनजाने पहलुओं को जाना।
इसी प्रदर्शनी में  "रंग के साथी" संस्था के संचालक असरार खान के विद्यार्थियों ने इस आयोजन में रतौना आंदोलन से जुड़े चित्र बनाकर प्रदर्शित किए जिन्हें काफी सराहा गया।
   इस कार्यक्रम में मैं यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह, मेरी बहन एवं ख्यातिलब्ध लेखिका, साहित्यकार डॉ. (सुश्री) शरद सिंह सहित सागर नगर के गणमान्य नागरिक पत्रकार बंधु, विद्यार्थी एवम् विश्वविद्यालय के कुलसचिव दीपेंद्र बघेल परीक्षा नियंत्रक डॉ राजेश पाठक एवं सहायक कुलसचिव श्री विवेक सावरीकर  सागर , दमोह , टीकमगढ़ , पन्ना औऱ छतरपुर की सम्बद्ध संस्थाओं के संचालक गण भी मौजूद थे।कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार एवं रंगकर्मी विवेक सावरीकर ने किया एवं समापन के उपरांत आभार कुलसचिव दीपेंद्र बघेल ने व्यक्त किया।
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Sunday, March 1, 2020

चरित्र के दोहरेपन को उजागर करने वाले नाटक ‘‘कुत्ते’’ का सफल मंचन - डॉ. वर्षा सिंह, नाट्य समीक्षक


प्रिय मित्रों,    
      कल दिनांक 29.02.2020 यानी लीप ईयर की ख़ास तारीख़, इसलिए भी ख़ास थी मेरे लिए कि मुझे मेरे सागर शहर की अग्रणी संस्था अथग यानी अन्वेषण ग्रुप ऑफ थिएटर द्वारा स्थानीय रवींद्र भवन में मंचित विजय तेंदुलकर के लिखे चर्चित नाटक "कुत्ते" को देखने का अवसर मिला। मित्रों, ज़ाहिर है कि इस नाटक के मंचन पर मैंने अपनी राय प्रकट की और मैं शुक्रगुज़ार हूं उन प्रिंट और डिज़िटल मीडिया की जिन्होंने मेरी राय... समीक्षात्मक टिप्पणी को प्रकाशित किया।
हार्दिक धन्यवाद युवाप्रवर्तक 🙏 
जी हां, मेरे द्वारा लिखी नाट्य समीक्षा को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 29 फरवरी 2020 में स्थान मिला है। 
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...

चरित्र के दोहरेपन को उजागर करने वाले नाटक ‘‘कुत्ते’’ का सफल मंचन

- डॉ. वर्षा सिंह, नाट्य समीक्षक   

     सीमित संसाधनों में नाटर की मंचीय प्रस्तुति को किस प्रकार सफलता के शिखर पर पहुंचाया जा सकता है, यह ‘कुत्ते’ नामक नाटक के मंचन को देख कर अनुभव किया जा सकता है। अन्वेषण थिएटर ग्रुप सागर द्वारा विजय तेंदुलकर लिखित नाटक ‘कुत्ते’ को शनिवार को लगातार दो शो में स्थानीय रवींद्र भवन में मंचित किया गया। नाट्य विधा के लिए प्रतिबद्ध अन्वेषण थिएटर ग्रुप का नाटकों के मंचन का अपना एक गरिमापूर्ण रिकाॅर्ड है। वहीं जगदीश शर्मा एक कुशल निर्देशक के रूप में पहले ही अपनी धाक जमा चुके हैं। ‘‘कुत्ते’’ नाटक में मुख्य रूप से दुष्कर्म जैसे अपराध के पीछे का मनोविज्ञान का खुलासा किया गया है।  शहर से दूर पिछड़े क्षेत्र में नियुक्त एक सेल्समैन, उसका एक बेहद चतुर-दुनियादार सहायक घोडके, एक प्रौढ़वय स्त्री और उसके कुत्ते। इस नाटक की कथा इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। एक कमजोर मानसिक चरित्र का व्यक्ति किस प्रकार स्त्री की सहजता को उसकी स्वीकृति मान बैठता है तथा आत्मनियंत्रण खो देता है, इस नाटक को देख कर भली-भांति समझा जा सकता है। सड़क, बाजार, दफ्तर हर जगह आज स्त्री स्वंय को असुरक्षित पाती है। इस असुरक्षा के कारणों की पर्तें खोलता अन्य नाटकों की तरह विजय तेन्दुलकर के यह नाटक भी मानव-जीवन की विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को बड़े कौशल से खोलता है और दर्शक को सोच के एक नए धरातल पर ले जाता है। रंगशिल्प और मंचीय भाषा के लिहाज से भी यह नाटक विशिष्ट है। अपनी नाट्य-विधियों और गतिमयता के कारण यह दर्शकों के लिए जितना रोचक है उतना ही मंचन की दृष्टि से चुनौती भरा है। ‘‘कुत्ते’’ देश के सुविख्यात नाटककार स्व.विजय तेंदुलकर द्वारा लिखा गया नाटक है। इस नाटक का विभिन्न शहरों में अनेक बार मंचन किया जा चुका है। सागर शहर में इस नाटक का प्रथम बार सार्वजनिक मंचन किया गया।
            नाटक के निर्देशक जगदीश शर्मा के अनुसार मंचन के पूर्व सभी कलाकारों ने जी-तोड़ रिहर्सल किया था। कलाकारों की मेहनत मंच पर स्पष्ट दिखाई थी। संवादों में स्वरों का उतार-चढ़ाव और भाव-भंगिमाएं कलाकारों की कला निपुणता को प्रमाणित करती रहीं।  संतोष दांगी सरस, करिश्मा गुप्ता, दीपगंगा साहू, मनोज सोनी, प्रवीण कैम्या और अतुल श्रीवास्तव ने अपने बेजोड़ अभिनय से नाटक की कथावस्तु में जान डाल दी। मंच पर कलाकारों ने जितना कुशल अभिनय किया उतना ही सुंदर प्रभाव देखने को मिला मंच सज्जा, लाईट एण्ड साउण्ड का। जिसके लिए सतीश साहू, राजीव जाट, कपिल नाहर, आकाश विश्व कर्मा, रिषभ सैनी, असरार पिंकी, समता झुडेले, राहुल सेन आदि प्रशंसा के पात्र हैं क्योंकि किसी भी नाटक के थियेटर-मंचन के लिए मंच सज्जा, लाईट एण्ड साउण्ड भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि नाटक का कथानक, संवाद और अभिनय। एक अच्छी बात यह भी थीकि साउंड इफैक्ट में अनावश्यक शोरगुल वाली ध्वनियों के बदले अत्यावश्यक एवं माईल्ड ध्वनियों का प्रयोग किया गया। पात्रों के वस्त्रविन्यास और मेकअप कथानक के समय और काल को बखूबी रेखांकित किया। इन सारे बिन्दुओं पर खरा उतरते हुए ‘‘कुत्ते’’ नाटक ने जहां एक ओर दर्शकों का मन मोह लिया, वहीं उन्हें यह बताया कि समाज में बढ़ते बलात्कार जैसे घृणित अपराधों के पीछे कैसी विकृत मानसिकता काम करती है। कहना होगा कि निर्देशक जगदीश शर्मा नाटक के माध्यम से समाज को संदेश देने में पूर्ण सफल रहे। नाटक को जिस प्रकार निर्भयाकांड जैसी घटनाओं से को-रिलेट किया गया, उसने इस प्रस्तुति को और अधिक सामयिक बना दिया। इस तरह के नाटकों का मंचन जहां शहर में नाट्यकला के प्रति अभिरुचि बढ़ाने के लिए जरूरी है वहीं अपराधों के विरुद्ध जनजागरूकता लाने के लिए भी आवश्यक है। मानव के दोहरे-तिरहे चरित्र को बारीकी से देखकर और समझ कर उससे दूरी बनाए रखते हुए स्वयं को सुरक्षित रखने का संदेश भी इस नाटक के माध्यम से बखूबी दिया गया। 
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मेरी समीक्षात्मक रिपोर्ट प्रकाशित करने हेतु
हार्दिक आभार हरमुद्दा डॉट कॉम 🙏 
http://harmudda.com/?p=14791

हार्दिक आभार दैनिक "आचरण" , मेरी समीक्षात्मक रिपोर्ट प्रकाशित करने हेतु 🙏

हार्दिक धन्यवाद "पत्रिका" 🙏

हार्दिक धन्यवाद "दैनिक भास्कर" 🙏

Friday, January 17, 2020

12 दिन, 14 चित्रकार और रंगों में ढलते हुए कैनवास पर जीवंत होता बापू का जीवन चक्र - डॉ. वर्षा सिंह

       

              सागर शहर में दिनांक 07 जनवरी 2020 से 18 जनवरी 2020 तक चित्रांकन कार्यशाला का आयोजन किया गया है। मैंने विगत 14 जनवरी को इस कार्यशाला का अवलोकन किया और एक रिपोर्ताज़ तैयार किया जिसे "दैनिक भास्कर" के सागर संस्करण में स्थान मिला है।
      हार्दिक आभार  "दैनिक भास्कर"  🙏
  ब्लॉग पाठकों के लिए मेरा यह लेख जस का तस निम्नलिखित है....
12 दिन, 14 चित्रकार और रंगों में ढलते हुए कैनवास पर जीवंत होता बापू का जीवन चक्र - डॉ. वर्षा सिंह
        एक वैश्विक नेता के रूप में भारतीय राजनीति को यदि सबसे अधिक किसी ने प्रभावित किया है तो वह हैं महात्मा गांधी। इस वर्ष महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती मनाई जा रही है। इसी तारतम्य में इन दिनों सागर नगर के रवींद्र भवन वाचनालय में मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग के स्वराज संस्थान संचालनालय द्वारा आयोजित एवं रंग के साथी ग्रुप के सहयोग से चल रही 12 दिवसीय चित्रांकन कार्यशाला में 14 कलाकार हिस्सा ले रहे हैं। ये चित्रकार महात्मा गांधी के बचपन से ले कर वैश्विक व्यक्तित्व बनने तक के प्रसंगों पर पेंटिंग्स बना रहे हैं। जहां देश के प्रख्यात चित्रकारों जैसे नंदलाल बसु, अवनींद्रनाथ ठाकुर, रवि बाबू, यामिनी राय आदि ने गांधीजी के जीवन पर आधारित चित्र बनाए हैं वहीं इन 14 युवा एवं लगनशील चित्रकारों द्वारा महात्मा गांधी को कैनवास पर उतारना अपने आप में चुनौती भरा है। किंतु इन चित्रकारों का उत्साह, आत्मविश्वास और चित्रकला पर उनकी पकड़ को देख कर लगता है मानो राष्ट्रीय स्तर के स्थापित चित्रकार अपने चित्रों में महात्मा गांधी के जीवन का चलचित्र प्रस्तुत कर रहे हों।

         महात्मा गांधी के जीवन को रंगों में ढलते और कैनवास पर जीवंत होते देखने के बीच इस तथ्य का उल्लेख करना जरूरी हो जाता है कि स्वयं महात्मा गांधी चित्रकला के प्रशंसक थे। इस 12 दिवसीय चित्रांकन कार्यशाला में भाग लेने सृष्टि जैन उज्जैन से आई हैं। वे उज्जैन में फाइन आर्ट में पोस्ट ग्रेजुएट कर रहीं हैं। उन्होंने कैनवास पर गांधी जी के दो रूप उकेरे हैं जिनमें से एक में वे पश्चिमी वेशभूषा में है तो दूसरे में भारतीय धोती-कुर्ता में। सृष्टि की चित्रकला की सबसे बड़ी खूबी है शेड्स पर नियंत्रण रखना। वे अत्यंत संतुलित ढंग से शेड्स का प्रयोग करती हैं जिससे उनके बनाए चित्र जीवंत हो उठते हैं। इसी तरह चित्रकार अंकित विश्वकर्मा ने धूसर रंगों का प्रयोग करते हुए महात्मा गांधी और उनके फॉलोवर्स को इस प्रकार चित्रित किया है मानो गांधी जी किसी यात्रा पर चलायमान हों। रंगों से गति को फलक पर उतारने के चाक्षुष प्रयोग में अंकित की महारत देखते ही बनती है।

         रंग के साथी ग्रुप के प्रमुख चित्रकार असरार अहमद इन सभी चित्रकारों के प्रेरणास्रोत हैं। असरार अहमद तो गोया कैनवास पर रंग और ब्रश से खेलते हैं। उनके ब्रश का हर स्ट्रोक उनकी पेंटिंग के विषय को मुखर कर देता है। इस वर्कशॉप में शामिल चित्रकार डाॅ. निधि मिश्रा, प्रिया साहू, लक्ष्मी पटेल, शालू सोनी, ज्योति पांडेय, रागिनी साहू, अंशिता बजाज वर्मा, भारती पटेल, रश्मि पंवार, मीनाक्षी सिंघई एवं रवीन्द्र नायक की चित्रकारी भी दर्शकों एवं कला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करने में पूर्ण सक्षम है। उल्लेखनीय है कि रंग के साथी ग्रुप के रूप में चित्रकार असरार अहमद सागर नगर में चित्रकला को निरंतर नया आयाम दे रहे हैं। अभी नगर के इन सभी चित्रकारों को अपनी कला को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आर्ट गैलरीज तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त शासकीय एवं संस्थागत सहयोग की भी आवश्यकता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि ये सभी चित्रकार कला-निपुणता के शिखर की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

नाेट : लेखक कला समीक्षक हैं। साथ ही चित्रकार भी रही हैं।
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   कुछ और तस्वीरें......