Showing posts with label नाटक. Show all posts
Showing posts with label नाटक. Show all posts

Monday, February 22, 2021

तुम कितनी खूबसूरत हो | नाटक | अन्वेषण थिएटर ग्रुप की बेजोड़ प्रस्तुति | समीक्षात्मक रिपोर्ट | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों,   
      यूं तो दृश्य-श्रव्य के मनोरंजन देने वाले अनेक माध्यम हैं, लेकिन निःसंदेह टीवी, सिनेमा, ओटीटी प्लेटफार्म या यू-ट्यूब में किसी ड्रामा को देखने से कहीं सौ गुना ज़्यादा आनंद मिलता है थियेटर में जा कर प्रत्यक्ष किसी ड्रामा या नाटक को देखने पर। सागर शहर में कोरोना लॉकडाऊन के बाद से अभी तक स्थगित नाटकों के मंचन को पुनः मंच देने का कार्य किया कल दिनांक 21.02.2021 को मेरे सागर शहर की अग्रणी संस्था अथग यानी अन्वेषण ग्रुप ऑफ थिएटर ने स्थानीय रवींद्र भवन में यशपाल की कहानी  के अख़तर अली द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण की दो शो में सफल प्रस्तुति के माध्यम से।

   मित्रों, ज़ाहिर है कि मैंने भी इस नाटक को रुचिपूर्वक देखा और इसके मंचन पर मैंने अपनी राय प्रकट की। मैं शुक्रगुज़ार हूं स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" की जिन्होंने मेरी राय... मेरी समीक्षात्मक टिप्पणी को प्रमुखता से प्रकाशित किया।
हार्दिक धन्यवाद आचरण 🙏 
साधुवाद अथग 🙏

जी हां, मेरे द्वारा लिखी नाट्य समीक्षा को आचरण दिनांक 22 फरवरी 2021 में स्थान मिला है, जो जस की तस इस ब्लॉग के सुधी पाठकों के लिए मैं यहां प्रस्तुत कर रही हूं।

समीक्षात्मक रिपोर्ट 

अन्वेषण थिएटर ग्रुप की बेजोड़ प्रस्तुति: नाटक ‘‘तुम कितनी खूबसूरत हो’’ 


          -डॉ. वर्षा सिंह, नाट्य समीक्षक 


किसी भी नाटक की प्रस्तुति कई स्तरों पर समाज को आईना दिखाती है। सुन्दरता समाज में एक टैबू (जुनून) की तरह है। जब बात किसी स्त्री की हो तो उसके व्यक्तित्व की पहली शर्त होती है उसका सुन्दर होना। स्त्री की सुन्दरता के अजीबोगरीब मानक किसी भी स्त्री के लिए डिप्रेशन (अवसाद) का कारण बन जाते हैं। इस डिप्रेशन के चलते वह गम्भीर रूप से बीमार भी पड़ सकती है और उसकी जीने की इच्छा समाप्त भी हो सकती है। वहीं यह नाटक एक संदेश ले कर सामने आता है कि सुन्दरता को ले कर पैदा हुआ डिप्रेशन सुन्दर ढंग से खत्म भी किया जा सकता है। इस केन्द्रीय भावना को ले कर नाटक ‘‘तुम कितनी खूबसूरत हो’’ प्रस्तुत किया गया। रविवार, 21 फरवरी 2021 को दोपहर 3 बजे एवं पुनः शाम 7 बजे  स्थानीय रवीन्द्र भवन, सागर में अन्वेषण थियेटर ग्रुप यानी अथग द्वारा यह नाटक कोरोना संकटकाल के दौरान जनसेवा के लिए जी जान से लगे रहे कोरोना वॉरियर्स के लिये समर्पित किया गया। इस नाटक में डाक्टर, नर्स तथा चिकित्सकीय व्यवस्था का वह मानवीय रूप बखूबी रेखांकित किया गया जो इस कोरोनाकाल में लगभग सभी ने अनुभव किया है। 


दैनिक समाचार पत्र "आचरण", सागर दि. 22.02.2021 


यह नाटक सुप्रसिद्ध कथाकार यशपाल की कहानी का अख्तर अली द्वारा किया गया नाट्य रूपांतरण है जिसका निर्देशन अथग के वरिष्ठ नाट्य निर्देशक जगदीश शर्मा ने किया। सधे हुए कुशल निर्देशन के साथ ही कथानक, अभिनय, मंचसज्जा, संगीत, नाटक में किये गये अभिनव प्रयोग और दर्शकों से लगातार संवाद बनाये रखना ही किसी नाटक की संपूर्ण सफलता का कारण बनते हैं। इस प्रस्तुति में मानसिक हलचल और अंतद्वंद्व को मंच पर बड़ी खूबसूरती से अभिनीत किया गया। मंचसज्जा, लाइट एंड साउंड, बैकग्राउंड साउंड इफेक्ट के खूबसूरत उपयोग से यह नाटक जीवंत हो उठा। नाटक के आरंभ में विषय के अनुकूल प्रस्तुत नृत्य ने एक सम्मोहक शुरुआत की। जिसके बाद नाटक प्रवाहपूर्ण ढंग से अपनी ऊंचाईयों को छूता चला गया।


बुंदेली मिश्रित देशज लहजे में बोले गए चुटीले संवादों ने गंभीर विषय को अत्यंत रोचक बना दिया। लगभग हर दूसरे दृश्य पर तालियों की गडगड़ाहट या हंसी की फुहार ने कलाकारों की हौसला अफजाई जारी रखी। सभी कलाकारों ने शानदार अभिनय किया। मामा के किरदार में वरिष्ठ रंगकर्मी रविंद्र दुबे कक्का ने अपनी दमदार उपस्थिति साबित कर दी। वहीं उमंग के नायकत्व चरित्र में कपिल नाहर ने दर्शकों को प्रभावित किया। नायिका सुगन्धा के चुनौती भरे रोल में करिश्मा गुप्ता ने सब का मन मोह लिया। इनके अतिरिक्त मंच पर विविध भूमिकाओं में दीपक राय, आयुषी चौरसिया, चंचल आठिया, समर पांडेय, प्रवीण कैम्या ने भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। नाटक का सह निर्देशन रिषभ सैनी, मंच प्रबंधन अतुल श्रीवास्तव, गीत-कविता आशीष चौबे, संगीत पार्थो घोष और यशगोपाल श्रीवास्तव, कंपोजर स्व. के.जी. श्रीवास्तव, गायन साक्षी पाण्डेय, कोरस अखिलेश अहिरवार और पार्थो घोष, दृश्य परिकल्पना राजीव जाट, प्रकाश परिकल्पना संतोष दांगी ‘सरस’ का था।  वहीं वस्त्र विन्यास प्रवीण कैम्या,  प्रॉपर्टी नितिन दुबे और आनंद शर्मा, रूप सज्जा कपिल नाहर और नितिन दुबे, ध्वनि प्रभाव सतीश साहू और ऋषभ सैनी की थी। आकर्षक ब्रोशर डिजाइन शहर के मशहूर चित्रकार असरार अहमद ने की थी।


नाटक की मजबूत पटकथा, संवाद एवं कलाकारों के बेजोड़ अभिनय ने नाटक के दौरान दर्शकों को बांधे रखा। कोरोना आपदा के चलते स्थगित रहे नाट्य प्रदर्शन को पुनः मंच प्रदान करते हुए अथग ने एक सफल शुरुआत की है। बड़ी संख्या में दर्शकों ने कोरोना गाइड लाइन का पालन करते हुए इस बेजोड़ नाटक का भरपूर आनंद उठाया। 


नाटक के कुछ रोचक दृश्य जिन्हें नाटक के मंचन के दौरान डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने अपने कैमरे में क़ैद कर लिया।

डॉ (सुश्री) शरद सिंह
डॉ. वर्षा सिंह
डॉ. वर्षा सिंह
डॉ. वर्षा सिंह
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह




---------------------

#नाटक #अथग #रवीन्द्रभवन #मंचन

Sunday, March 1, 2020

चरित्र के दोहरेपन को उजागर करने वाले नाटक ‘‘कुत्ते’’ का सफल मंचन - डॉ. वर्षा सिंह, नाट्य समीक्षक


प्रिय मित्रों,    
      कल दिनांक 29.02.2020 यानी लीप ईयर की ख़ास तारीख़, इसलिए भी ख़ास थी मेरे लिए कि मुझे मेरे सागर शहर की अग्रणी संस्था अथग यानी अन्वेषण ग्रुप ऑफ थिएटर द्वारा स्थानीय रवींद्र भवन में मंचित विजय तेंदुलकर के लिखे चर्चित नाटक "कुत्ते" को देखने का अवसर मिला। मित्रों, ज़ाहिर है कि इस नाटक के मंचन पर मैंने अपनी राय प्रकट की और मैं शुक्रगुज़ार हूं उन प्रिंट और डिज़िटल मीडिया की जिन्होंने मेरी राय... समीक्षात्मक टिप्पणी को प्रकाशित किया।
हार्दिक धन्यवाद युवाप्रवर्तक 🙏 
जी हां, मेरे द्वारा लिखी नाट्य समीक्षा को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 29 फरवरी 2020 में स्थान मिला है। 
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...

चरित्र के दोहरेपन को उजागर करने वाले नाटक ‘‘कुत्ते’’ का सफल मंचन

- डॉ. वर्षा सिंह, नाट्य समीक्षक   

     सीमित संसाधनों में नाटर की मंचीय प्रस्तुति को किस प्रकार सफलता के शिखर पर पहुंचाया जा सकता है, यह ‘कुत्ते’ नामक नाटक के मंचन को देख कर अनुभव किया जा सकता है। अन्वेषण थिएटर ग्रुप सागर द्वारा विजय तेंदुलकर लिखित नाटक ‘कुत्ते’ को शनिवार को लगातार दो शो में स्थानीय रवींद्र भवन में मंचित किया गया। नाट्य विधा के लिए प्रतिबद्ध अन्वेषण थिएटर ग्रुप का नाटकों के मंचन का अपना एक गरिमापूर्ण रिकाॅर्ड है। वहीं जगदीश शर्मा एक कुशल निर्देशक के रूप में पहले ही अपनी धाक जमा चुके हैं। ‘‘कुत्ते’’ नाटक में मुख्य रूप से दुष्कर्म जैसे अपराध के पीछे का मनोविज्ञान का खुलासा किया गया है।  शहर से दूर पिछड़े क्षेत्र में नियुक्त एक सेल्समैन, उसका एक बेहद चतुर-दुनियादार सहायक घोडके, एक प्रौढ़वय स्त्री और उसके कुत्ते। इस नाटक की कथा इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। एक कमजोर मानसिक चरित्र का व्यक्ति किस प्रकार स्त्री की सहजता को उसकी स्वीकृति मान बैठता है तथा आत्मनियंत्रण खो देता है, इस नाटक को देख कर भली-भांति समझा जा सकता है। सड़क, बाजार, दफ्तर हर जगह आज स्त्री स्वंय को असुरक्षित पाती है। इस असुरक्षा के कारणों की पर्तें खोलता अन्य नाटकों की तरह विजय तेन्दुलकर के यह नाटक भी मानव-जीवन की विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को बड़े कौशल से खोलता है और दर्शक को सोच के एक नए धरातल पर ले जाता है। रंगशिल्प और मंचीय भाषा के लिहाज से भी यह नाटक विशिष्ट है। अपनी नाट्य-विधियों और गतिमयता के कारण यह दर्शकों के लिए जितना रोचक है उतना ही मंचन की दृष्टि से चुनौती भरा है। ‘‘कुत्ते’’ देश के सुविख्यात नाटककार स्व.विजय तेंदुलकर द्वारा लिखा गया नाटक है। इस नाटक का विभिन्न शहरों में अनेक बार मंचन किया जा चुका है। सागर शहर में इस नाटक का प्रथम बार सार्वजनिक मंचन किया गया।
            नाटक के निर्देशक जगदीश शर्मा के अनुसार मंचन के पूर्व सभी कलाकारों ने जी-तोड़ रिहर्सल किया था। कलाकारों की मेहनत मंच पर स्पष्ट दिखाई थी। संवादों में स्वरों का उतार-चढ़ाव और भाव-भंगिमाएं कलाकारों की कला निपुणता को प्रमाणित करती रहीं।  संतोष दांगी सरस, करिश्मा गुप्ता, दीपगंगा साहू, मनोज सोनी, प्रवीण कैम्या और अतुल श्रीवास्तव ने अपने बेजोड़ अभिनय से नाटक की कथावस्तु में जान डाल दी। मंच पर कलाकारों ने जितना कुशल अभिनय किया उतना ही सुंदर प्रभाव देखने को मिला मंच सज्जा, लाईट एण्ड साउण्ड का। जिसके लिए सतीश साहू, राजीव जाट, कपिल नाहर, आकाश विश्व कर्मा, रिषभ सैनी, असरार पिंकी, समता झुडेले, राहुल सेन आदि प्रशंसा के पात्र हैं क्योंकि किसी भी नाटक के थियेटर-मंचन के लिए मंच सज्जा, लाईट एण्ड साउण्ड भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि नाटक का कथानक, संवाद और अभिनय। एक अच्छी बात यह भी थीकि साउंड इफैक्ट में अनावश्यक शोरगुल वाली ध्वनियों के बदले अत्यावश्यक एवं माईल्ड ध्वनियों का प्रयोग किया गया। पात्रों के वस्त्रविन्यास और मेकअप कथानक के समय और काल को बखूबी रेखांकित किया। इन सारे बिन्दुओं पर खरा उतरते हुए ‘‘कुत्ते’’ नाटक ने जहां एक ओर दर्शकों का मन मोह लिया, वहीं उन्हें यह बताया कि समाज में बढ़ते बलात्कार जैसे घृणित अपराधों के पीछे कैसी विकृत मानसिकता काम करती है। कहना होगा कि निर्देशक जगदीश शर्मा नाटक के माध्यम से समाज को संदेश देने में पूर्ण सफल रहे। नाटक को जिस प्रकार निर्भयाकांड जैसी घटनाओं से को-रिलेट किया गया, उसने इस प्रस्तुति को और अधिक सामयिक बना दिया। इस तरह के नाटकों का मंचन जहां शहर में नाट्यकला के प्रति अभिरुचि बढ़ाने के लिए जरूरी है वहीं अपराधों के विरुद्ध जनजागरूकता लाने के लिए भी आवश्यक है। मानव के दोहरे-तिरहे चरित्र को बारीकी से देखकर और समझ कर उससे दूरी बनाए रखते हुए स्वयं को सुरक्षित रखने का संदेश भी इस नाटक के माध्यम से बखूबी दिया गया। 
                         ---------------------


मेरी समीक्षात्मक रिपोर्ट प्रकाशित करने हेतु
हार्दिक आभार हरमुद्दा डॉट कॉम 🙏 
http://harmudda.com/?p=14791

हार्दिक आभार दैनिक "आचरण" , मेरी समीक्षात्मक रिपोर्ट प्रकाशित करने हेतु 🙏

हार्दिक धन्यवाद "पत्रिका" 🙏

हार्दिक धन्यवाद "दैनिक भास्कर" 🙏