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Monday, August 20, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन -24 सुनीला सराफ : एक संभावनाशील साहित्यकार - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. वर्षा सिंह
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की कवयित्री श्रीमती सुनीला सराफ पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....
सागर : साहित्य एवं चिंतन
सुनीला सराफ : एक संभावनाशील साहित्यकार
- डॉ. वर्षा सिंह
सामाजिक कार्यों से जुड़ना किसी भी व्यक्ति की दृष्टि और समझ को एक अलग ही धरातल पर विस्तार प्रदान करता है। समाज के जिन तथ्यों को तटस्थ रह कर जाना नहीं जा सकता है समाजसेवा द्वारा उन तथ्यों से भी स्वतः सरोकार जुड़ जाता है। मध्यप्रदेश के दमोह जिले के ग्राम पथरिया में 10 मई 1962 को जन्मीं सुनीला सराफ एक समाज सेवी होने के साथ ही साहित्यकार भी हैं। विवाह के उपरांत सागर नगर में निवास करते हुए बी.ए. तथा एल.एल.बी. उत्तीर्ण सुनीला सराफ ने अपने पारिवारिक दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन किया और समाज में व्याप्त समस्याओं को समझने का प्रयास किया। उनकी कहानियों एवं कविताओं में समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं अव्यवस्थाओं का विरोध स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वे लायनेस क्लब सागर गोल्ड की अध्यक्ष रह चुकी हैं तथा वैश्य महिला सभा सागर की सचिव हैं। मद्यनिषेध में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए लायंस क्लब विदिशा द्वारा तथा गरीबों की सहायता करने के तारतम्य में लायनेस क्लब सागर द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। वे नगर की विभिन्न सामाजिक गतिविधियों में अपनी सक्रियता बनाए रखती हैं।
कविता, कहानी एवं ललित निबंध के द्वारा अपने मनोभावों एवं अपने विचारों अभिव्यक्त करने वाली साहित्यकार सुनीला सराफ हिंदी लेखिका संघ मध्यप्रदेश भोपाल की सागर शाखा की अध्यक्ष भी हैं। उनका एक कहानी संग्रह ‘‘सौगात’’ प्रकाशित हो चुका है। सुनीला सराफ की कहानियों में पारिवारिक संबंधों में तेजी से आती गिरावट के प्रति चिंता दिखाई देती है। उनका कथन है कि -‘‘सामाजिक परिवेश ने मेरी कलम को आकर्षित किया है।’’ अपने कहानी संग्रह ‘सौगात’ की भूमिका स्वरूप लिखे गए ‘आत्मालाप’ में वे अपनी कहानियों के बारे में कहती हैं कि -‘‘मैंने अपनी कहानियों के माध्यम से समाज में फैली कुरीतियों, विषमताओं को दूर करने की कोशिश की है।सभी कहानियां जीवन को साक्षी मान कर लिखी हैं।’’
सुनीला सराफ की कहानियों की यह विशेषता है कि वे समाज एवं परिवार की समस्याओं को बड़ी बारीकी से उठाती हैं, व्याख्यायित करती हैं तदोपरांत कहानी का अंत सुखांत ही रखती हैं। यह उनकी उस प्रवृत्ति को दर्शाता है जो प्रत्येक विसंगति को दूर कर के सब कुछ ठीक-ठाक कर देने की भावना के रूप में उनके भीतर मौजूद है। वे परिवार के सदस्यों के बीच सौहार्द्यपूर्ण संबंधों को देखने की आकांक्षा रखती हैं। बच्चों का अपने माता-पिता के प्रति मात्र संपत्ति के लालच का रिश्ता उन्हें खटकता है। वे ऐसी संतान को सबक सिखाने की पैरवी करती हैं। उनकी एक कहानी है ‘रिश्तों का रिसाव’ जिसमें एक बेटा अपने सुख के लिए अपने पिता का घर बेच कर उन्हें वृद्धाश्रम में रखने की योजना बनाता है। किन्तु नौकर के सजग रहने के कारण बेटे की योजना विफल हो जाती है। इस कहानी में सुनीला बताती हैं कि खून के यदि लोभ-लालच में डूबे हुए हों तो कोई अर्थ नहीं रखते हैं जबकि निस्वार्थ भाव से बने हुए रिश्ते जीवन को न केवल अर्थ प्रदान करते हैं अपितु सुरक्षित और सुखमय भी बनाते हैं।
माता-पिता और संतान के बीच असंवेदनशील हो चले संबंधों पर ही आधारित सुनीला की बहुत एक छोटी-सी कहानी है ‘दिनचर्या’। इस छोटी-सी कहानी में बहुत बड़े सच को बड़ी ही संवेदना के साथ उन्होंने सामने रखा है। आज का खुरदरा सच यह है कि जिन बेटों पर माता-पिता अपनी जान छिड़कते हैं, वही बेटे अपने माता-पिता की वृद्धावस्था में उनसे नाता तोड़ने को उतावले हो उठते हैं। यहां तक कि वे अपने बूढ़े मां-बाप को अपने साथ रखना पसन्द नहीं करते हैं। यदि साथ रखना पड़े तो घर के सबसे उपेक्षित कोने में ही उन्हें जगह दी जाती है। इसी सच को अपनी कहानी में पिरोते हुए सुनीला सराफ ने वर्णित किया है कि जिन बच्चों को अपने बूढ़े माता-पिता का सहारा बनना चाहिए जब वही बच्चे माता-पिता को दो समय की रोटी के लिए भिखारियों की तरह भटकाने लगते हैं तब उन बूढ़े माता-पिता का जीवन अत्यंत कठिन हो जाता है। माता-पिता का ममत्व अपने बच्चों के बुरे व्यवहार की शिक़ायत करने से रोकता रहता है और वे अपने बच्चों के हाथों ही उपेक्षित एवं दलित जीवन जीने को विवश रहते हैं।
बायें से:- डॉ वर्षा सिंह, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, सुनीला सराफ एवं पिंकी
सुनीला सराफ ने अपनी कविता, गीत और दोहों में भी गरीबी, लाचारी से ले कर पारिवारिक संबंधों को स्थान दिया है। उनकी एक कविता है- ‘‘हौसला’’ जिसमें आजीविका के लिए एक ऐसे बेटे के संघर्ष को चित्रित किया गया है जिसके पिता की नौकरी छूट गई है और वह अपने पिता को भी उनकी नौकरी वापस दिलाने के लिए जूझ रहा है। कविता के कुछ अंश देखिए-
गरीबी बेबसी के झंझावात
उसे निगलने को आतुर
सतरंगी सपनों को पूरा
करने की खातिर
प्रतियोगी परीक्षाएं प्रश्न बन कर
खड़ीं गरीबी के वितान पर
जीवन की सुनामी पार करने के लिए
पिता की नौकरी वापिस
दिलाने के लिए
अदालत के चक्कर लगाता वो।
Sagar Sahitya Chintan -24 Sunila Saraf- Ek Sambhavnashil Sahityakar - Dr Varsha Singh

बेटी के प्रति समाज का नजरिया भले ही विपरीत रहा हो किन्तु एक मां के लिए उसकी बेटी हमेशा उसके कलेजे का टुकड़ा होती है। वह जितना ममत्व अपने बेटे पर उंडेलती है, उतनी ही ममता अपनी बेटी पर भी निछावर करती है। इस भाव को सुनीला सराफ ने अपनी कविता में इस प्रकार निबद्ध किया है-
तेरा पहला रोना सुन कर
मेरी ममता जाग उठी
छाती से जब तुझे लगाया
जीवन भर की प्यास बुझी
प्यारी सूरत भोली-भाली
लगती तू तो स्वर्ग परी
देख तुझे क्यों रोई दादी
आंखें मेरी भर आईं
तुझमें अपना बचपन देखा
तू तो मेरा सपना थी।
ऋतुएं काव्यात्मक हृदय को प्रभावित करती ही हैं और तब बनती हैं ऋतुओं पर आधारित कविताएं। सुनीला सराफ ने शीत ऋतु को अपने दोहों में कुछ इस प्रकार गूंथा है, बानगी देखिए -
सर्द हवाएं जो चलीं, हुआ हाल-बेहाल।
तपन कहीं पर सो गई, ओढ़ के जूड़ी शाल।।
शीतल तन और मन हुआ, कोहरा में चहुं ओर।
बन में ठिठुरन बढ़ गई, अब न नाचे मोर।।
शीत ऋतु के इसी भाव को सुनीला सराफ की इस कविता में भी देखिए-
अब के ठिठुरा बड़ा बसंत
शीत ऋतु ने रौब जमाया
मौसम को हैरान कर दिया
बारिश ने भी रंग जमाया
और बसंत को बड़ा रुलाया।
सुनीला सराफ सागर नगर की एक संभावनाशील साहित्यकार हैं। अपनी कहानियों एवं कविताओं के माध्यम से वे नगर की साहित्यिकता को समृद्ध करने की दिशा में निरंतर अग्रसर हैं।
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( दैनिक, आचरण दि. 14.08.2018)
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Sunday, August 19, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन -19 राष्ट्र एवं समाज के प्रति सजग कवयित्री डॉ. छाया चौकसे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की कवयित्री डॉ. छाया चौकसे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

राष्ट्र एवं समाज के प्रति सजग कवयित्री डॉ. छाया चौकसे
- डॉ. वर्षा सिंह

सागर नगर का साहित्यिक परिदृश्य बहुरंगी है। इस शहर के रचनाधर्मी राष्ट्र एवं समाज के प्रति अपने दायित्वों को भलीभांति समझते हैं तथा सामाजिक चेतना को स्फूर्त्त रखने में विश्वास रखते हैं। राष्ट्र एवं समाज से सरोकारित साहित्यकार डॉ. छाया चौकसे का जन्म 1 जून 1959 को जबलपुर (म.प्र.) में हुआ किन्तु आरम्भ से ही उनका कर्मक्षेत्र सागर नगर रहा है। यहीं उन्होंने महाविद्यालय में अध्यापन कार्य एवं पारिवारिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच तालमेल बिठाते हुए साहित्य से अपना सघन संबंध बनाए रखा। डॉ. चौकसे ने गजानन माधव मुक्तिबोध के गद्य साहित्य पर विशेष शोधकार्य किया है। जिस पर आधारित उनकी पुस्तक ‘मुक्तिबोध का गद्य साहित्य : एक अध्ययन’ सन् 1090 में प्रकाशित हुई। इसके बाद सन् 2015 में ‘हमारा बुंदेलखण्ड’ प्रकाशित हुई। देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में डॉ. छाया चौकसे के अब तक अनेक लेख एवं समीक्षाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘लोक साहित्य में सांस्कृतिक चेतना’ पुस्तक के संपादक मंडल में डॉ. सरोज गुप्ता, डॉ. रंजना मिश्र एवं डॉ. विनय शर्मा के साथ डॉ. छाया चौकसे ने भी सफलतापूर्वक संपादन कार्य किया। ‘समसामयिक शोध निबंध एवं समीक्षा’, ‘साम्प्रदायिक सद्भाव और भारतीय सांस्कृति एकता’, ‘वैश्विक भाषा साहित्य एवं रामकथा’, भारतीय वांगमय एवं रामकथा का भी संपादन कर चुकी हैं।
Sagar Sahitya Chintan -19 Rashtra Evam Samaj Ke Prati Sajag Kaviyatri Dr Chhaya Choukse  - Dr Varsha Singh

डॉ. छाया चौकसे एक मेधावी छात्रा रहीं। उन्होंने अपनी मेहनत से मेरिट छात्रवृत्ति प्राप्त की थी तथा स्नातक स्तर पर हिन्दी विषय में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने पर उन्हें रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर की ओर से तत्कालीन राज्यपाल महामहिम बी.एम.पुनाचा द्वारा उषादेवी मैत्रा स्वर्ण पदक प्रदान किया गया था। शोध के क्षेत्र में डॉ. छाया चौकसे को लघु शोध परियोजना के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संस्कृति विभाग शिक्षा प्रोत्साहन पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। साहित्य सेवा के लिए भी डॉ. छाया चौकसे को विभिन्न संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित किया जा चुका है। जिनमें प्रमुख हैं- मध्यप्रदेश राष्ट्र भाषा प्रचार समिति भोपाल द्वारा हिन्दी प्रसार सहयोग हेतु सम्मान, सन 2013 में सागर नगर विधायक शैलेन्द्र जैन द्वारा विशेष महिला सम्मान, जे.डी.एम. पब्लिकेशन दिल्ली द्वारा वर्ष 2014 का विशिष्ट हिन्दी सेवी सम्मान एवं वर्ष 2013,14,15 का शिक्षक सम्मान, सन् 2014 में सर्वोदय विद्यापीठ पिपरिया द्वारा काव्यश्री सम्मान, लायंस क्लब सागर झील द्वारा सहयोग सम्मान तथा म.प्र. कल्चुरी महासभा द्वारा सम्मान। राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में भी सहभागिता कर चुकीं डॉ. चौकसे विभिन्न सामाजिक एवं साहित्यिक संस्थाओं की आजीवन सदस्य भी हैं। जैसे- मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति भोपाल, विश्व हिन्दी परिषद् इलाहाबाद, अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य परिषद्, राष्ट्रीय कल्चुरी महासभा एवं मध्यप्रदेश कल्चुरी महिला समिति आदि। डॉ. चौकसे वर्तमान में पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं।
डॉ. छाया चौकसे

डॉ. छाया चौकसे की कविताओं में कोमल भावनाओं एवं संवेदनाओं को विशेष मुखरता मिली है। वे जहां बेटी के प्रति कविता लिखती हैं तो वहीं मां के प्रति भी अपनी काव्यमय भावनाएं प्रकट करती हैं। बेटी का गुनगुनाना सुन प्रसन्न तो होती है मां, किन्तु सहज नहीं रह पाती है। वह समझ जाती है कि अब बेटी अपने भावी जीवन के सलोने सपने सजाने लगी है और कुछ समय बाद वह घड़ी भी आ जाएगी जब बेटी घर से विदा हो जाएगी। यह विचार करना भी एक मां के लिए विचित्र अनुभव होता है क्योंकि उसमें सुख भी होता है और दुख भी। एक मां अपनी वयस्क होती बेटी के प्रति किस तरह भावुक हो उठती है इसका बड़ा सुंदर वर्णन उन्होंने अपनी कविता ‘प्यारी बिटिया’ में किया है। कविता का यह अंश देखें -
ऋतु प्रीत की, पिया मीत की
मेरी वयस्क होती बिटिया
प्रीत गीत गुनगुना रही है
पर यह क्या, इसे सुन मेरी छाती
किस कम्पन से घबरा रही है?
अगले सावन, मनभावन के घर हो शायद
इसके परिणय के भावी स्वप्न क्यों
मेरी आंखें सजा रही हैं...
मां पारिवारिक रिश्तों की धुरी होती है। परिवार के प्रत्येक सदस्य का जीवन उसी के इर्दगिर्द घूमता है। क्योंकि प्रत्येक सदस्य जानता है कि परिवार में मां ही वह व्यक्ति है जो दुख-सुख, भले-बुरे सभी में दृढ़तापूर्वक साथ खड़ी रहती है। मां के अद्वितीय होने की अनुभूति डॉ. छाया की कविता ‘मां सा कोई नहीं’ में देखी जा सकती है-
धरती देखा, अम्बर देखा
जगती का श्रृंगार भी देखा
पर मां के दुलार के जैसा
कोई आभास नहीं।
भैया देखा, बहना देखी
रिश्तों का त्यौहार भी देखा
पर मां के ममत्व के रिश्ते सा
कोई सरोकार नहीं।
युवा शक्ति समय की धारा को मोड़ने की क्षमता रखती है। युवा ही भविष्य के निर्माता होते हैं। इसलिए राष्ट्र के प्रति युवाओं का दायित्व गुरुतम होता है। इसीलिए जरूरी हो जाता है कि युवा अपनी शक्ति को पहचाने और उसका दुरुपयोग न होने दें। डॉ. छाया चौकसे अपनी कविता ‘युवाओं से’ में युवाशक्ति को संबोधित करते हुए कहती हैं कि -
इस धरा का मान तुम, इस धरा की शान तुम
राष्ट्र की पहचान तुम, राष्ट्र स्वाभिमान तुम
देश, वेशभूषा, भाषा तुम्हीं से जीवंत है
देश गौरवगान, गरिमा ज्ञान फैला दिगदिगंत है
देश का स्पंदन तुम, तुम्हीं तो इसके प्राण हो
देश के जवान हाथ जागृति की मशाल लो।
युवाओं के संदर्भ में आज देश अनेक संकट झेल रहा है। विशेष रूप से युवतियों एवं बालिकाओं के साथ किए जा रहे दुर्व्यवहार ने सभी के मन को आहत कर रखा है। ‘निर्भया कांड’ की पीड़ा आज भी समूचे देश के हृदय को कचोटती रहती है। डॉ. चौकसे ‘निर्भया : एक चिन्तन’ के रूप् में अपने भावों को इन शब्दों में व्यक्त करती हैं -
संस्कारों की बयार बहने दो
आज लज्जित है देश दुनिया में
देश रोए तो उसे जार-जार रोने दो
आज कुछ इस तरह सिखाएं बच्चों को
उनमें रिश्तों की आन-बान रहने दो
आज विज्ञापन की नारी को देख हैरत है
मीडिया में भी नारी का सम्मान रहने दो
एक गुजारिश भी है फिल्मकारों से
नायिका को खलनायिका न बनने दो
वेश-परिवेश में देश कहां है देखो
एक निवेदन है कि देश को भारत देश रहने दो।
अपनी कविताओं में डॉ. छाया चौकसे जीवन के प्रति कभी-कभी दार्शनिक हो उठती हैं और तब वे मानव जीवन को एक सतत् संघर्ष के रूप में देखती हैं। अपनी कविता ‘जीवन एक संघर्ष’ में जीवन के संघर्षों का कुछ इस प्रकार वर्णन किया है -
जन्मना संघर्ष, बढ़ना संघर्ष
जीना संघर्ष, जीते जाना संघर्ष....
डॉ. छाया चौकसे के विचारों में राष्ट्र के प्रति चिन्तन एवं पारिवारिक संबंधों के प्रति सौहार्यपूएार् आस्था स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उनकी रचनात्मकता की यही विशेषता सागर नगर के साहित्य-संसार में उन्हें रेखांकित करती है।
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( दैनिक, आचरण दि. 01.08.2018)
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