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Friday, December 21, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 37 ....कोमल भावनाओं की कवयित्री : डॉ. करुणा ठाकुर - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की कवयित्री डॉ. करुणा ठाकुर पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....
 
सागर : साहित्य एवं चिंतन

कोमल भावनाओं की कवयित्री : डॉ. करुणा ठाकुर
                         - डॉ. वर्षा सिंह
                       
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परिचय : डॉ. करुणा ठाकुर
जन्म   : 13 मार्च 1960
जन्म स्थान : कासगंज जिला एटा (उ.प्र.)
शिक्षा  : हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर एवं पीएच.डी.
विधा  : कविताएं एवं लेख
पुस्तकें : पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
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 सागर नगर में साहित्य की दृष्टि से एक सकारात्मक वातावरण पाया जाता है। यहां के परिवेश ने उन कवयित्रियों को भी अपनी रुचि बनाए रखने का अवसर दिया जो खुले मंचों पर जा कर काव्यपाठ नहीं कर सकती थीं। डॉ. करुणा ठाकुर सागर नगर की एक ऐसी ही कवयित्री हैं जो कविगोष्ठियों एवं कविसम्मेलनों में अधिक सक्रिय न होते हुए भी अपनी गीतात्मक साहित्यकता बनाए हुए हैं। कासगंज जिला एटा, उत्तर प्रदेश में 13 नवंबर 1960 को ओंकारनाथ नागर एवं उर्मिला नागर  की दूसरी संतान के रूप में जन्मीं करुणा ठाकुर के पिता पेशे से वकील थे और कविता में भी रुचि रखते थे। उनके चाचा सुप्रसिद्ध कवि सोम ठाकुर के पास कवियों एवं साहित्यकारों का आना-जाना निरंतर लगा रहता था जिससे करुणा ठाकुर को भी एक साहित्यिक परिवेश मिला। यद्यपि 6-7 वर्ष की छोटी-सी उम्र में ही उन्हें अपने पिता का साया खो देना पड़ा। पारिवारिक व्यवधानों के कारण उनका अध्ययनकार्य सुचारु रूप से नहीं चल पाया। फिर सन् 1977 में सागर निवासी नरेंद्र सिंह ठाकुर से उनका विवाह हो गया और इसके बाद वे पूर्ण रूप से सागर निवासी हो गईं। विवाह के उपरांत ही उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करते हुए हिंदी साहित्य में एम. ए. किया तथा पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। वे बताती हैं कि स्थानीय समाजसेवी मधुसूदन सिलाकारी के साथ मिलकर समाज सेवा का कार्य आरंभ किया और सन 2000 में बीएमबी कन्या महाविद्यालय की नींव डाली। इस महाविद्यालय का उद्देश्य है, की साधनहीन बालिकाओं को उच्च शिक्षा प्राप्त हो सके। डॉ. करुणा ठाकुर के पति नरेंद्र सिंह पेशे से व्यवसायी हैं, जिनका साहित्य से प्रत्यक्ष तक कोई सरोकार नहीं है किंतु उन्होंने करुणा ठाकुर को ना केवल अपनी पढ़ाई पूरी करने दी अपितु साहित्य सेवा से भी जुड़ाव बनाए रहने दिया। डॉ. करुणा ठाकुर के अनुसार उनके परिवार में यह वातावरण नहीं रहा कि वह खुले मंच पर कविता पाठ करने जा सके। वैसे वे आकाशवाणी दूरदर्शन के साथ ही कुछ सम्मानित मंच पर काव्य पाठ कर चुकी है।
वर्तमान में डॉ. करुणा ठाकुर मां बगलामुखी बहुउद्देशीय कन्या महाविद्यालय सागर में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं। एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करुणा ठाकुर की रुचि आरंभ से ही काव्य लेखन में रही यद्यपि उन्होंने निबंध आदि गद्य रचनाएं भी लिखी किंतु काव्य के क्षेत्र में उन्हें विशेष रुचि रही है। दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से उनकी कविताओं और लेखों का प्रसारण होता रहा है। विज्ञान लोक आंदोलन के लिए समर्पित मध्य प्रदेश साइंस सेंटर (स्वयं सेवी संस्था) में डॉ करुणा लगभग 20 वर्ष तक सहभागी रही हैं। जिले के प्रतिष्ठित पद्माकर साहित्य सेवा समिति की प्रबंध कार्यकारिणी की सदस्य डॉ. करुणा ठाकुर की प्रकाशित रचनाएं हैं - ’भारतीय जीवन आदर्श’ और नवजागरण’, ’ मैथिलीशरण गुप्त और भारत भारती’। इनके गीत संग्रहों के नाम हैं ’बांसुरी’ एवं ’आद्या’ तथा गजल संग्रह हैं ’गुफ्तगू’ एवं ’झंकार’।
Sagar Sahitya Avam Chintan: Dr. Varsha Singh

कवयित्री करुणा ठाकुर की कविताओं में मानवता, प्रेम ओर आपसी भाईचारे का संदेश मुखर रूप से सामने आता है। प्रेम को परिभाषित करती हुई उनकी यह कविता देखिए -
प्यार पाषाण को भगवान बना सकता है
प्यार हैवान को इंसान बना सकता है
प्यार से मिल कर रहे हम जो यहां आपस में
प्यार जन्नत सा हिंदुस्तान बना सकता है
प्यार दो दिल के धड़कने का एक सलीका है
प्यार ईश्वर की इबादत का एक तरीका है
प्यार इंसान में इंसानियत का जज्बा है
प्यार अल्लाह के चरणों का एक जलवा है

धर्म, जाति और वर्ग के आधार पर आपसी वैमनस्यता को देख कर कवयित्री का मन खिन्न हो उठता है। यदि मानव मानवता को ही बिसारने लगे तो इससे बढ़ कर विडम्बना भला और क्या हो सकती है? इसीलिए करुणा ठाकुर अपनी कविताओं के माध्यम से समाज के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त करती हैं-
क्या हो गया है इस सदी के आदमी को
समझ पाता नहीं तो जिंदगी को
बुतों पर डालकर फूलों के गजरे
कोई क्या पा सका है बंदगी को
झगड़ना पागलों-सा रोज अक्सर
कहो क्या नाम दें इस आशिकी को
उम्र जिसकी कटी हो मयकदे में
कहो क्या जानता है मयकशी को
सभी रिश्तो की कीमत मांगते हैं
कोई समझे ना मेरी बेकसी को

स्मृतियां प्रत्येक व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालती हैं। फिर जब अपने किसी प्रिय की स्मृति हो तो भावुकता का घनत्व बढ़ना स्वाभाविक है। डॉ. करुणा की ये पंक्तियां देखें-
Dr. Karuna Thakur

जब तनहा दिल घबराएगा
तेरा चेहरा याद आएगा
तेरी फुरकत का गम अक्सर
आंखों में सावन लाएगा
मेरी उलझी उलझी जुल्फें
कौन भला अब सुलझाएगा
तेरी याद बहारों जैसी
गुंचा गुंचा खिल जाएगा
याद आएगी बीती बातें
लम्हा लम्हा तड़पाएगा

डॉ. करुणा की कविताओं में प्रेम है, वियोग है, मिलन की अभिलाषा है, टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का दर्द है।  इस सबके साथ ही उम्मीद की एक ऐसी किरण भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर दिखाई देती है। रौशनी की एक ऐसी उम्मींद है, जो हर तरफ़ उजाला बनकर बिखर जाना चाहती है। वे तितली के रंगों में चाहत के रंगों को तलाश करती हैं-
चाहत में होते हैं रंग ऐसे
कि उड़ती तितली के पंख जैसे
कभी जिंदगी तरंग जैसे
कभी हो टूटी पतंग जैसे
कभी उदासी है रंजो गम है
कभी झूठी मृदंग जैसे
कई मीठे हैं मिटेंगे लाखों
कभी छड़ी हो यह जंग जैसे
कभी फलक छूने की होड़ सी
कभी मर गई उमंग जैसे

डॉ. करुणा ठाकुर ने सामाजिक सरोकारों के कई लेख भी लिखे हैं। इन लेखों में समाज में व्याप्त विद्रूपताओं का विरोध और समाज में स्त्री की दशा के प्रति चिंतन मुख्य विषय के रूप में चिन्तन का आधार दिखाई देता है। यूं भी भारतीय समाज में  स्त्रियों की दशा  सदियों से  दलित शोषित समान रही है विशेष रूप से बुंदेलखंड अंचल जैसी  पिछड़े हुए क्षेत्रों में स्त्रियों की दशा  और अधिक  चिंतित कर देने वाली  दिखाई देती है  ऐसी स्थिति में  एक कवियत्री  एवं लेखिका  का हृदय  स्त्रियों की  दशा को देखकर द्रवित हो उठना स्वाभाविक है। एक सजग लेखिका  सिर्फ दशा नहीं देखती वरण  दशा के कारणों पर भी दृष्टिपात करती है। डॉ. करुणा सागर अपने लेख “हमारा समाज और नारी स्वतंत्र्य“  में समाज में स्त्रियों की दशा पर अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए लिखती हैं कि “पुरुष-सत्ता के समाज में नारी हमेशा ही एक विलक्षण व्यक्तित्व और अस्तित्व की धनी होते हुए भी क्यों शोषण दमन और हिंसा की शिकार होती रही है? क्यों वह पुरुषों के छल वह स्वयं की कमजोरी का शिकार होकर समाज में कुंठा उपेक्षा का जीवन जीने को मजबूर हुई? हमारे समाज की वर्तमान संरचना में धीरे-धीरे यह स्थिति निर्मित हो गई है या कर दी गई है कि स्त्रियां सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक दृष्टि से पूरी तरह पुरुषों पर निर्भर हैं। स्त्रियों को व्यक्तित्व के विकास के लिए, समाज में सम्मानजनक स्थिति के लिए एवं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के लिए यूं तो अनेक रास्ते बने हैं किंतु वे अभी भी पर्याप्त नहीं हैं। आज भी चाहे पढ़ी-लिखी नौकरी करने वाली महिला हो या राजनैतिक सत्ता में भागीदार हो या समाज सेवा के कामों में लगी हो, कहीं भी इन क्षेत्रों में स्त्रियां पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं है। अधिकांशतः वह पुरुषों पर निर्भर हैं।“
 भारतीय संस्कृति में जीवन आदर्शों का बहुत अधिक मूल्य रहा है। भारतीय समाज पूरी तरह जीवन आदर्शों पर आधारित समाज है। चाहे स्त्री हो या पुरुष, चाहे किसी भी कार्य से जुड़ा हुआ व्यक्ति हो, उससे आदर्श पूर्ण जीवन जीने की अपेक्षा की जाती है। किंतु प्रश्न उठता है कि जीवन आदर्श आखिर है क्या जिन पर भारतीय संस्कृति में इतना अधिक बल दिया जाता है? “भारतीय जीवन आदर्श और नवजागरण“ शीर्षक लिक लेख में डॉक्टर करुणा ठाकुर जीवन आदर्शों के प्रति अपने विचारों को प्रकट करते हुए लिखती हैं कि - “जीवनादर्शों का विशद विवेचन करते समय यह जानने का मौका मिला कि जीवनादर्श क्या हैं। जीवन आदर्शों ने कैसे विकास की क्रमिक यात्रा तय की, कैसे वह बदलते हुए परिवेश में भी अपनी अस्मिता बचाव रख सके। जब देश गुलामी में जकड़ा हुआ पुनर्जागरण की स्थिति से जूझ रहा था, सोए हुए अलसाई उन्मीलते नयन खोलता भारत अपनी जीवंत उदात्त संस्कृति से संजीवन ग्रहण करके अपने बचे हुए जीवन मूल्यों की पीठिका पर आधार ग्रहण कर रहा था। बदलते हुए मानदंडों के नाजुक दौर में भी कैसे सत्य, सत्य रह सका। कैसे मानव कल्याण की, परोपकार की, मानवता की भावना मानव में बची रह सकी। अध्ययन करते हुए मैंने पाया कि जीवन आदर्शों के अध्ययन की सुखद यात्रा कई अविस्मरणीय स्मृतियां लेकर कितने ही पड़ावों  से होकर गुजरती है।“
डॉ. करुणा ठाकुर जिम्मेदार गृहणी, कुशल प्रशासिका, सामाजिक चिंतनपूर्ण लेखों की लेखिका और कोमल भावनाओं की एक ऐसी समर्थ कवयित्री हैं, जिनसे सागर साहित्य जगत को अभी बहुत सी आशाएं हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 18.12.2018)
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