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Sunday, February 21, 2021

सारस्वतम् व्याख्यानमाला | परंपरा एवं आधुनिकता का द्वन्द्व - संस्कृत के मंच पर | डॉ. वर्षा सिंह

Dr . Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज मैं आप सबसे साझा कर रही हूं एक और महत्वपूर्ण आयोजन का विवरण, जिसमें मैं सम्मिलित हुई। महत्त्वपूर्ण इसलिए भी कि कोरोना लॉकडाऊन के बाद विश्वविद्यालय के किसी भी संकाय में ऑनलाइन आयोजित यह पहला आयोजन था।



   18 फरवरी 2021 को कालिदास अकादमी, उज्जैन द्वारा " संस्कृत विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय (केन्द्रीय), सागर  में सारस्वतम् व्याख्यानमाला ( ऑफ लाइन ) के अंतर्गत आयोजित   "परंपरा एवं आधुनिकता का द्वन्द्व - संस्कृत के मंच पर " विषय पर  राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान,  नई दिल्ली के पूर्व कुलपति, हिन्दी एवं संस्कृत के वरिष्ठ विद्वान् प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी का व्याख्यान हुआ। अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति  प्रो जनकदुलारी आही ने की। विशिष्ट अतिथि के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी थे। अकादमी के संतोष  पंड्या की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही । आयोजन  स्थल था - विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग का सभागार। 



     संस्कृत वैदिक ग्रंथों के परिप्रेक्ष्य में प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि परम्परा और आधुनिकता के बीच चुनाव का द्वंद्व हमारे समय की पहचान है। परम्परा शब्द परम्पर से बना है, जिसका अर्थ है वह व्यवहार जिसमें वर्तमान पीढ़ी पुरानी पीढ़ी की देखा-देखी करते हुए उनके रीति-रिवाज़ों का अनुकरण करती है। प्राचीन समय से चली आ रही रीति या परिपाटी या ट्रैडिशन है। जिसमें हमेशा नये की गुंजाइश रहती है।



   उन्होंने कहा कि वर्तमान में हमारा समाज संक्रमण के जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें हम परम्परा और आधुनिकता के बीच चुनाव के द्वंद्व में फंसे हैं। एक ओर पश्चिमी जीवनशैली का सम्मोहन है तो दूसरी ओर सांस्कृतिक अस्मिता का आग्रह है। अनिश्चय और अनिर्णय कई बार हमसे ऐसे आधारहीन, अवसरवादी, हास्यास्पद और सिद्धांतहीन समझौते करवाते हैं कि लगता है जैसे हमारा विवेक खो गया है।  मूल्यांकन के अभाव में अगर कोई परंपरा जड़ हो जाए तो वह अपने किसी भी रूप में परंपरा नहीं रहती, प्रथा या रूढ़ि बन जाती है।



  परम्परा और आधुनिकता के द्वंद्व को व्याखायित करने के लिए वैदिक काल के महान विद्वान महर्षि याज्ञवल्क्य, सतीप्रथा के उन्मूलक समाजसुधारक राजाराम मोहन राय, कवयित्री, अध्येता और भारतीय महिलाओं के उत्थान की प्रबल समर्थक पण्डिता रमाबाई, वैदिक काल की विदुषी गार्गी, वाराणसी के महान संस्कृतविद् पण्डित रामानंद त्रिपाठी आदि के जीवन प्रसंगों के अनेक उद्धरण दे कर प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने व्याख्यान को स्मरणीय बना दिया।



   इस गरिमापूर्ण आयोजन में … मैंने यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह एवं बहन डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के अनेक शिक्षकों, अध्यापकों, प्राध्यापकों, आचार्यों सहित शोधरत एवं अध्ययनशील छात्रों से महत्वपूर्ण चर्चाएं कीं।



प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी की सहधर्मिणी श्रीमती सत्यवती त्रिपाठी भी इस आयोजन हेतु सागर आई थीं। त्रिपाठी जी के सागर विश्वविद्यालय के कार्यकाल में अनेक ऐसे अवसर आए थे जब सत्यवती जी से हम लोगों को चर्चा का अवसर मिला था। अनेक वर्षों बाद वे इस दफ़ा भी बहुत आत्मीयता से मिलीं।




     

       प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी का जन्म 15 फ़रवरी 1949 को राजगढ़, मध्य प्रदेश में हुआ था। मुख्यत: वे संस्कृत भाषा के प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। उनके द्वारा रचित कविता-संग्रह 'संधानम्' के लिये उन्हें सन 1994 में 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया था। प्रो. त्रिपाठी संस्कृत को आधुनिकता का संस्कार देने वाले विद्वान् और हिन्दी के प्रखर लेखक  हैं। वे लम्बे अरसे तक डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के संस्कृत विभागाध्यक्ष रह चुके हैं।