Sunday, April 4, 2021

पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ | बुंदेली वार्ता | डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ 

                       

              - डॉ. वर्षा सिंह


एक दिना बे हते जब हमई ओरें शान से कहत ते के -

बुंदेलन की सुनो कहानी, बुंदेलन की बानी में

पानीदार इते हैं सबरे,  आग इते के पानी में 


अब जे दिना आ गए हैं के पानीदार तो सबई हैं, पर पानी खों तरस रए। ताल, तलैया, कुआ, बावड़ी, बंधा-बंधान सबई सूखत जा रये। अपने बुंदेलखण्ड में पानी की कमी कभऊ ने रही। बो कहो जात है न, के -

इते ताल हैं,  उते तलैया,  इते कुआ, तो उते झिरैया।।

खेती कर लो, सपर खोंर लो, पानी कम न हुइये भैया।।


मगर पानी तो मानो रूठ गओ है। औ रूठहे काए न, हमने ऊकी कदर भुला दई। हमें नल औ बंधान से पानी मिलन लगो, सो हमने कुआ, बावड़ी में कचरा डालबो शुरू कर दओ। हम जेई भूल गए के जे बेई कुआ आएं जिनखों पूजन करे बगैर कोनऊ धरम को काम नई करो जात हतो। कुआ पूजबे के बादई यज्ञ-हवन होत ते। नई बहू को बिदा की बेरा में कुआ में तांबे को सिक्का डालो जात रहो और रस्ते में पड़बे वारी नदी की पूजा करी जात हती। जो सब जे लाने करो जात हतो के सबई जल के स्रोतन की इज्ज्त करें, उनको खयाल रखें।

पानी से नाता जोड़बे के लाने जचकी भई नई-नई मां याने प्रसूता को कुआ के पास ले जाओ जात है औ कहूं-कहूं मां के दूध की बूंदें कुआ के पानी में डरवाई जात हैं। काए से के जैसे मां अपने दूध से बच्चे को जिनगी देत है, ऊंसई कुआ अपने पानी से सबई को जिनगी देत है। सो, प्रसूता औ कुआ में बहनापो सो बन जात है। पर हमने तो मानो जे सब भुला दओ है। लेकिन वो कहो जात है न, सुबह को भूलो, संझा घरे आ जाए तो भुलो ने कहात आए। हमें पानी को मोल समझनई परहे। पानी नईं सो जिंदगानी नईं।

सो भैया, जे गनीमत आए के अब पानी बचाबे के लाने  सबई ने कमर कस लई है। कुआ, बावड़ी, ताल, तलैया, चौपड़ा सबई की सफाई होन लगी है। जो अब लों आगे नई आए उनखों सोई आगे बढ़ के पानी बचाबे में हाथ बंटाओ चाइए। वाटर हार्वेस्टिंग से बारिश में छत को पानी जमीन में पोंचाओ, नलों में टोटियां लगाओ, कुआंं, बावड़ी गंदी ने करो औ पानी फालतू ने बहाओ फेर मजे से जे गीत गाओ- 


पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ । 

कुंइया, तलैया खों फेर के जगाओ।।


मैके ने जइयो भौजी, भैया से रूठ के

भैया जू, भौजी खों अब ल्यौ मनाओ।।


पांच कोस दूर जाके, पानी हैं ल्याई

अब इतइ अंगना में कुंइया खुदवाओ।।


----------------------------------------

17 comments:

  1. बुन्देली बोली से अधिक परिचित नहीं हूं किन्तु आपकी यह सरल वार्ता शब्दशः समझ में आ गई । वार्ता और दोहों का समेकित संदेश हृदयंगम करने योग्य है । इसी में भलाई है - व्यष्टि की भी, समष्टि की भी ।

    ReplyDelete
  2. बहुत धन्यवाद आपको आदरणीय माथुर जी 🙏
    शहरी बुंदेली बोली हिन्दी के बहुत क़रीब है। ग्रामीण अंचलों में बोली जाने वाली बोली तनिक क्लिष्ट है। मुझे प्रसन्नता हुई यह जान कर कि आपको मेरी बुंदेली समझ में आ गई।
    हार्दिक शुभकामनाओं सहित,
    सादर,
    डॉ. वर्षा सिंह

    ReplyDelete
  3. आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी, हार्दिक आभार आपकी इस सदाशयता के प्रति 🙏

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर् और सशक्त रचना के साथ
    आलेख भी जानकारीपरक है।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद आदरणीय शास्त्री जी 🙏
      आपकी प्रशंसा ने मेरे लेख पर सार्थकता की मुहर लगा दी है।
      सादर,
      डॉ. वर्षा सिंह

      Delete
  5. बहुत ही सुंदर लिखा है आदरणीय वर्षा दी आपने।

    पांच कोस दूर जाके, पानी हैं ल्याई
    अब इतइ अंगना में कुंइया खुदवाओ।।..वाह!

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद प्रिय अनीता जी 🙏
      घर से मीलों दूर जा कर पानी भर कर लाने का काम औरतों के ही जिम्मे रहता है, चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात ... कहीं भी जाइए पानी की समस्या से महिलाओं को ही ज्यादा रूबरू होना पड़ता है।
      आपकी टिप्पणी के लिए पुनः बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏
      शुभकामनाओं सहित,
      सस्नेह
      डॉ. वर्षा सिंह

      Delete
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत धन्यवाद आदरणीय ओंंकार जी 🙏

      Delete
  7. आंचलिकता की महक लिए सरस सजन। वर्षा जी! बहुत खूब !!आपके लेख सदैव सीखप्रद होते हैं।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद प्रिय मीना भारद्वाज जी 🙏
      मेरा प्रयास यही रहता है कि अपनी मातृभाषा हिंदी के साथ ही इसमें इस क्षेत्र बुंदेलखंड की आंचलिक बोली बुंदेली को भी अपने साथ लेकर चलूं। आप सबकी शुभकामनाओं से मेरे परिश्रम को नई ऊर्जा, नई दिशा मिलती है। पुनः आप के प्रति बहुत धन्यवाद 🙏

      Delete
  8. खासी ठेठ अंदाज़ में कही गई पानी की कहानी..वाह डा. वर्षा जी...पानी तो मानो रूठ गओ है। औ रूठहे काए न, हमने ऊकी कदर भुला दई। #बुंदेली

    ReplyDelete
    Replies
    1. सांची कही बिन्ना... आप सोई नोनी बुंदेली समझ-बोल लेत हो।

      बहुत धन्यवाद अलकनंदा जी 🙏

      Delete
  9. वैसे तो बुंदेली कभी नहीं बांची पर आज आपकी सरल सहज वार्ता काफी समझ आ गई।
    पानी के साधनों को हमने स्वयं नष्ट किया है
    और आज पानी की किल्लत का हर और अलाप है
    अब भी संभल जाए तो अच्छा ।
    वार्ता के रूप में उपयोगी लेख उतनी ही सुंदर रचना।
    सस्नेह।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आदरणीया कुसुम कोठारी जी
      सादर अभिवादन 🙏
      मुझे प्रसन्नता हुई यह जान कर कि आपने मेरा बुंदेली लेख पढ़ा और उसे पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया दी । बहुत हार्दिक धन्यवाद आपको 🙏

      सादर,
      डॉ वर्षा सिंह

      Delete
  10. बहुत बहुत सुन्दर लेख

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपकी इस बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद 🙏

      Delete