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Saturday, December 29, 2018

अखलाक सागरी को श्रद्धांजलि - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

मशहूर शायर और गीतकार अखलाक सागरी का विगत शनिवार 22.12.2018 को निधन हो गया था। अखलाक लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उन्होंने सागर में शुक्रवारी वार्ड स्थित अपने निजनिवास में अंतिम सांसें लीं थीं। वे 88 वर्ष के थे। 30 जनवरी 1930 में जन्मे स्वर्गीय सागरी का पिछले 70 सालों से हिंदी-उर्दू साहित्य में योगदान रहा है।
Dr. Varsha Singh

Dr. Sharad Singh

एजाज़ सागरी

अयाज़ सागरी

बायें से :- उमाकांत मिश्र एवं अशोक मिजाज़

 अखलाक शायरी व गीत लिखते थे। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर अक्सर उनकी ग़ज़ल आती रहती हैं। फ़िल्म बेवफा सनम के हिट गाने ‘इश्क में क्या क्या बताएं कि दोनों, किस कदर चोट खाये हुए हैं’ से उन्हें काफी चर्चा मिली थी। उन्होंने बेवफा सनम के अलावा ‘आजा मेरी जान, अफसाना और ये इश्क-इश्क है’ आदि में गाने लिखे हैं। स्वर्गीय अखलाक सागरी के दो पुत्र हैं , एजाज़ सागरी तथा अयाज़ सागरी।
दायीं ओर से :- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, डॉ. वर्षा सिंह

सागर नगर के साहित्यकार स्व. अखलाक सागरी को श्रद्धांजलि देते हुए

Dr. Sharad Singh

Dr. Varsha Singh

     विगत दिनों दिनांक 26.12.2018 को सागर नगर के ही नहीं वरन देश के मशहूर शायर मरहूम अखलाक सागरी को सिविल लाइंस स्थित जे.जे.इंस्टीट्यूट, सागर में विनम्र श्रद्धांजलि देने हेतु नगर की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था श्यामलम तथा जेजे फाउंडेशन की ओर से एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें सागर के साहित्यकारों ने मरहूम अखलाक सागरी जी के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।  मैंने यानी डॉ. वर्षा सिंह तथा बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने भी शायर अखलाक सागरी जी के प्रति अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए अपने विचार व्यक्त किए तथा उनसे जुड़े अपने संस्मरण साझा किए। इस अवसर पर अखलाक सागरी जी के बड़े सुपुत्र एजाज़ सागरी तथा छोटे पुत्र अयाज़ सागरी जी ने भी अपने पिता अखलाक जी के संस्मरण सुनाए एवं उनकी ग़ज़लों का पाठ किया।


नव दुनिया, सागर दि. 27.12.2018

आचरण, दि. 22.12.2018
 
           अखलाक सागरी की प्रसिद्ध ग़ज़ल मैं यहां प्रस्तुत कर रही हूं ...

इश्क़ में क्या बतायें कि दोनों किस क़दर चोट खाये हुए हैं
मौत ने उनको मारा है और हम ज़िंदगी के सताये हुए हैं

ऐ लहद अपनी मिट्टी से कह दे दाग लगने न पाये क़फ़न को
आज ही हमने बदले हैं कपड़े आज ही हम नहाये हुए हैं

उसने शादी का जोड़ा पहन कर सिर्फ़ चूमा था मेरे बदन को
बस उसी दिन से जन्नत में हूरें मुझको दूल्हा बनाये हुए हैं

अब हमें तो फ़कत एक ऐसी चलती फ़िरती हुई लाश कहिये
जिन की मैयत में हद है के हम ख़ुद अपना कंधा लगाये हुए हैं

देख साक़ी तेरे मयकदे का कितना पहुँचा हुआ रिन्द हूं मैं
जितने आये हैं मैयत में मेरी सब के सब ही लगाये हुए हैं


Dr. Sharad Singh


           अखलाक सागरी का यह कता भी बहुत मशहूर है....
फुटपाथ पर पड़ा था वो कौन था बेचारा।
भूखा था कई दिन का दुनिया से जब सिधारा।
कुर्ता उठा के देखा, तो पेट पर लिखा था
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।

डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

डॉ. वर्षा सि

एजाज़ सागरी
अयाज़ सागरी

Sunday, December 23, 2018

अलविदा शायर अख़लाक सागरी ! - डॉ. वर्षा सिंह

बायें से : डॉ. आचार्य, डॉ. मुस्तफा , डॉ. वर्षा सिंह, शायर अख़लाक़ सागरी और डॉ. विष्णु पाठक

       मेरे शहर सागर ने दुनिया भर में मशहूर अपने अजीज़ शायर अख़लाक़ सागरी को हमेशा के लिए चिरविदाई दे दी है। कल दि. 22.12.2018 को लम्बी बीमारी के बाद उनके शुक्रवारी, सागर स्थित निवास में उनका निधन हो गया। आज स्थानीय समाचारपत्र "आचरण" एवं "दैनिक भास्कर" के माध्यम से व्यक्त स्व.अख़लाक़ सागरी जी को मेरी अश्रुपूरित  श्रद्धांजलि !!




अलविदा शायर अख़लाक सागरी !
                           - डॉ. वर्षा सिंह
                     
         इश्क में चोट खाने की बात पर दिल छू लेने वाली शायरी करने वाले मशहूर शायर अख़लाक सागरी का शनिवार 22.12.2018 का उनके निवास स्थान शुक्रवारी वार्ड में निधन होने पर शायरी जगत ने अपना एक महत्वपूर्ण हीरा खो दिया। उनके निधन का समाचार पा कर दुख हुआ। वे लंबे समय से बीमार थे। वे 88 वर्ष के थे। उन्होंने उर्दू शायरी को एक अलग ही जमीन दी। उनकी शायरी की ख़ूबसूरती सीधे दिलों को छूने वाली है। अपने समय में मुशायरों में जान डालने वाले अख़लाक सागरी की ग़ज़लों के कई कैसेट जारी हुए। जैसे - बेवफा सनम, आजा मेरी जान, अफसाना, ये इश्क़-इश्क है, रात सुहानी, आ भी जा रात ढलने लगी, इश्क में क्या बताएं, लाइव इन फिजी आदि। अनेक फिल्मों में भी अख़लाक की शायरी को गानों के रूप में रखा गया। तीन बार लाल किले में मुशायरा पढ़ने का गौरव प्राप्त करने वाले अख़लाक सागरी अपने सहज स्वभाव के कारण वे साहित्य समाज में भी लोकप्रिय थे। मुझे भी उनके साथ अनेक मंच साझा करने का अवसर मिला था। 
इश्क में हम तुम्हें क्या बताएं, किस कदर चोट खाये हुए हैं।
मौत ने उनको मारा है और हम, ज़िन्दगी के सताये हुए हैं।
ऐ लहद अपनी मिट्टी से कह दे, दाग़ लगने न पाये कफ़न को ,
आज ही हमने बदले हैं कपड़े, आज ही हम नहाये हुए हैं।



                  इस ग़ज़ल से दुनिया भर में छा जाने वाले सागर नगर के शायर अख़लाक सागरी यूं तो किसी परिचय के मोहताज़ नहीं थे। अपनी मशहूर ग़ज़ल ‘‘ इश्क में हम तुम्हें क्या बताएं’’ कैसे बनी इसके बारे में अख़लाक सागरी ने एक अन्य साक्षात्कार में बताया था कि जब वे कक्षा 11वीं में पढ़ते , तब उन्हें एक लड़की से प्रेम हो गया था। यह प्रेम 2 साल तक परवान चढ़ा, फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि लड़की ने उन्हें धोखा दे दिया। इससे उनके दिल को चोट पहुंची और यह ग़ज़ल बन गई।
     अख़लाक सागरी ने पुरस्कारों की राजनीति पर टिप्पणी की थी कि - ‘‘मेरा नाम तीन बार पद्म भूषण पुरस्कार के लिए भेजा गया लेकिन राजनीति के चलते मुझे यह अवार्ड नहीं मिल सका। इस बात का मलाल मुझे मरते दम तक रहेगा।’’
        पुरस्कारों के मामले में अख़लाक सागरी भले ही राजनीति के शिकार हो गए हों, लेकिन शायरी पसन्द करने वालों के दिलों में उनकी सत्ता आज भी कायम है। सागर शहर की जानी मानी संस्था श्यामलम् ने साहित्य परिक्रमा के अंतर्गत 26 जनवरी 2014 को अख़लाक सागरी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित भव्य आयोजन करते हुए उन्हें सम्मानित भी किया था। उर्दू शायरी की मशहूर वेबसाइट ‘‘रेख्ता’’ और ‘‘वर्ड प्रेस’’ पर अख़लाक की शायरी आज भी रुचि से पढ़ी जाती है। अमेरिका के रेडियो चैनलस पर अख़लाक की शायरी को प्रसारित किया जाता है। उनकी शायरी की ख़ूबसूरती सीधे दिलों को छूती है। ये उदाहरण देखें -
बिगड़ो तो दमकती है जबीं और जियादा
तुम तैश में लगते हो हसीं  और जियादा
निकलोगे आप भर के जहां मांग में अफशां
झेंपेंगे सितारे तो वहीं और जियादा
आ जाओं कि होठों पे अभी जान है वरना
फिर वक़्त मेरे पास नहीं और जियादा
दैनिक आचरण 23.12.2018
     
         30 जनवरी 1930 को मोहम्मद इस्माइल हाज़िक़ एवं बशीरन बी के घर जन्में अख़लाक सागरी का पूरा नाम था - अख़लाक अहमद खान। यूं तो अख़लाक सागरी की औपचारिक शिक्षा मैट्रिक तक ही हो सकी थी लेकिन शायरी के प्रति उनके रुझान ने उन्हें उर्दू भाषा और साहित्य से जोड़े रखा। अख़लाक सागरी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि -‘‘ मैं अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी का शायर हूं। बचपन से ही उर्दू और फारसी की शिक्षा मिली। लगभग 13 साल की उम्र में पहली बार ग़ज़ल की कुछ पंक्तियां लिखीं। खुश हो कर पिता जी को दिखायीं। पिता जी हंस कर बोले- अख़लाक, ग़ज़ल लिखी नहीं पढ़ी जाती है। इसके बाद ग़ज़ल पढ़ने में मेरा ऐसा मन लगा कि मैंने इसे अपनी ज़िन्दगी का मकसद बना लिया।’’
        अख़लाक सागरी की ग़ज़लों को बालीवुड गायक सोनू निगम, अनुराधा पौडवाल से ले कर गुरदास मान, जानी बाबू कव्वाल, पंकज उधास, मनहर उधास, मुन्नी बाई, अयाज़ अली, पिनाज़ मसानी, साबरी ब्रदर्स, मज़ीद शोला और देश की सीमा-पार के अताउल्ला खां जैसे प्रसिद्ध गायकों ने अपनी आवाज़ दी।
        उर्दू शायरी की परम्परागत शैली अख़लाक की शायरी में देखी जा सकती है, विशेष रूप से मुहब्बत पर कही गई उनकी ग़ज़लों में।- 
मुहब्बत करने वाले इस कदर मजबूर ही देखे।
कि दिल गमगीं हों लेकिन शक्ल से मसरूर ही देखे।
हंसी माना लबों पर थी मगर जब गौर से देखा,
तो दिल में आशिकों के सैंकड़ों नासूर ही देखे।
गिला इक तुझसे क्या, तेरे तकब्बुर का कि हमने तो,
हसीं जितने भी देखे हैं, बड़े मगरूर ही देखे।
         अख़लाक सागरी दीनहीन, लाचार इंसानों को देख कर द्रवित हो उठते थे। मुझे याद है कि एक बार जबलपुर से लौटते समय कटनी स्टेशन पर एक दिव्यांग भिखारी को देख कर उनकी आंखों में आंसू आ गए थे और उन्होंने कहा था कि- ‘‘हमारे देश से ये गरीबी और लाचारी क्यों नहीं जाती।’’ उनके यही भाव उनके अनेक शेरों में उतर कर आये हैं, जैसे उनकी एक मशहूर गजल है, जिसमें उन्होंने देश की दशा पर तीखा कटाक्ष किया है-
फुटपाथ पर पड़ा था वो कौन था बेचारा।
भूखा था कई दिन का दुनिया से जब सिधारा।
कुर्ता उठा के देखा, तो पेट पर लिखा था
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।
दैनिक भास्कर दिनांक 23.12.2018

        अख़लाक जी की हमेशा यही इच्छा रहती थी कि सभी परस्पर मिल-जुल कर चैन और अमन से रहें। ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ के शाश्वत विचार रखने वाले वरिष्ठ शायर अखलाक सागरी ने हमेशा यही दुआ की, कि लोग धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठ कर आपसी सद्भाव के माहौल में रहें -
अब दिवाली में दिये ऐसे जलाना चाहिये।
ईद की खुशियां भी जिनमें जगमगाना चाहिये।
सौंप कर मुस्लिम के हाथों में दशहरे का जुलूस,
ताजिया हिन्दू के कंधे पर उठाना चाहिये।
      अखलाक सागरी ने आत्मसम्मान के साथ जीवन जिया। यदि वे चाहते तो बालीवुड की चकाचौंध में अपनी शायरी को गिरवी रख कर अपार धन कमा सकते थे, किन्तु उन्होंने अपने शहर, अपने आत्मीय जन और अपने आत्मसम्मान को चुना तथा सागर में ही अपनी अंतिम सांस ली। आज उनका एक शेर बार - बार याद आ रहा है -
‘अखलाक’ सिर्फ नाम का अखलाक ही नहीं,
दुश्मन से भी मिलेगा तो इक यार की तरह।“
   अख़लाक सागरी को मेरी अश्रुपूरित विनम्र श्रद्धांजलि ! अलविदा शायर अखलाक सागरी !!
दैनिक भास्कर दिनांक 23.12.2018


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दिनांक 23.12.2018, #आचरण , #दैनिक_भास्कर , #अखलाक_सागरी

Monday, August 20, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन -21 अख़लाक सागरी : दुनिया भर में पढ़ी जाती हैं जिनकी ग़ज़लें - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. वर्षा सिंह

स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के मशहूर शायर अख़लाक़ सागरी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

अख़लाक सागरी : दुनिया भर में पढ़ी जाती हैं जिनकी ग़ज़लें
- डॉ. वर्षा सिंह

इश्क में हम तुम्हें क्या बताएं, किस कदर चोट खाये हुए हैं।
मौत ने उनको मारा है और हम, ज़िन्दगी के सताये हुए हैं।
ऐ लहद अपनी मिट्टी से कह दे, दाग़ लगने न पाये कफ़न को ,
आज ही हमने बदले हैं कपड़े, आज ही हम नहाये हुए हैं।

इस ग़ज़ल से दुनिया भर में छा जाने वाले सागर नगर के शायर अख़लाक सागरी यूं तो किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं, लेकिन पिछले लगभग एक दशक से उम्र की मुश्किलों को झेलते हुए मानों दुनिया से कट कर जी रहे हैं। मोहम्मद इस्माइल हाज़िक़ एवं बशीरन बी के घर 30 जनवरी 1930 को एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया अख़लाक अहमद खान। उस समय शायद बालक के माता-पिता को भी इस बात का अंदाज़ा नहीं रहा होगा कि उनका पुत्र एक दिन शायरी की दुनिया का नामचीन शायर अख़लाक सागरी बन कर न केवल उनका बल्कि पूरे सागर शहर का नाम रोशन करेगा।
यूं तो अख़लाक सागरी की औपचारिक शिक्षा मैट्रिक तक ही हो सकी थी लेकिन शायरी के प्रति उनके रुझान ने उन्हें उर्दू भाषा और साहित्य से जोड़े रखा। अख़लाक सागरी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि -‘‘ मैं अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी का शायर हूं। बचपन से ही उर्दू और फारसी की शिक्षा मिली। लगभग 13 साल की उम्र में पहली बार ग़ज़ल की कुछ पंक्तियां लिखीं। खुश हो कर पिता जी को दिखायीं। पिता जी हंस कर बोले- अख़लाक, ग़ज़ल लिखी नहीं पढ़ी जाती है। इसके बाद ग़ज़ल पढ़ने में मेरा ऐसा मन लगा कि मैंने इसे अपनी ज़िन्दगी का मकसद बना लिया।’’
बायें से :- डॉ. मुज्तबा हुसैन, डॉ. वर्षा सिंह एवं अख़लाक़ सागरी


अपनी मशहूर ग़ज़ल ‘‘ इश्क में हम तुम्हें क्या बताएं’’ कैसे बनी इसके बारे में अख़लाक सागरी ने एक अन्य साक्षात्कार में बताया था कि जब वे कक्षा 11वीं में पढ़ते , तब उन्हें एक लड़की से प्रेम हो गया था। यह प्रेम 2 साल तक परवान चढ़ा, फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ कि लड़की ने उन्हें धोखा दे दिया। इससे उनके दिल को चोट पहुंची और यह ग़ज़ल बन गई।
अख़लाक सागरी की ग़ज़लों को बालीवुड गायक सोनू निगम, अनुराधा पौडवाल से ले कर गुरदास मान, जानी बाबू कव्वाल, पंकज उधास, मनहर उधास, मुन्नी बाई, अयाज़ अली, पिनाज़ मसानी, साबरी ब्रदर्स, मज़ीद शोला और देश की सीमा-पार के अताउल्ला खां जैसे प्रसिद्ध गायकों ने अपनी आवाज़ दी। अपने समय में मुशायरों में जान डालने वाले अख़लाक सागरी की ग़ज़लों के कई कैसेट जारी हुए। जैसे - बेवफा सनम, आजा मेरी जान, अफसाना, ये इश्क़-इश्क है, रात सुहानी, आ भी जा रात ढलने लगी, इश्क में बताएं लाइव इन फिजी आदि। अनेक फिल्मों में भी अख़लाक की शायरी को गानों के रूप में रखा गया। तीन बार लाल किले में मुशायरा पढ़ने का गौरव प्राप्त करने वाले अख़लाक सागरी ने पुरस्कारों की राजनीति पर टिप्पणी की थी कि - ‘‘मेरा नाम तीन बार पद्म भूषण पुरस्कार के लिए भेजा गया लेकिन राजनीति के चलते मुझे यह अवार्ड नहीं मिल सका। इस बात का मलाल मुझे मरते दम तक रहेगा।’’
Sagar Sahitya Chintan -21 Akhlakh Sagari - Duniya Bhar Me Parhi Jati Hain Jinki Ghazalen - Dr Varsha Singh

पुरस्कारों के मामले में अख़लाक सागरी भले ही राजनीति के शिकार हो गए हों, लेकिन शायरी पसन्द करने वालों के दिलों में उनकी सत्ता आज भी कायम है। सागर शहर की जानी मानी संस्था श्यामलम् ने साहित्य परिक्रमा के अंतर्गत 26 जनवरी 2014 को अख़लाक सागरी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केन्द्रित भव्य आयोजन करते हुए उन्हें सम्मानित भी किया था। उर्दू शायरी की मशहूर वेबसाइट ‘‘रेख्ता’’ और ‘‘वर्ड प्रेस’’ पर अख़लाक की शायरी आज भी रुचि से पढ़ी जाती है। अमेरिका के रेडियो चैनलस पर अख़लाक की शायरी को प्रसारित किया जाता है। उनकी शायरी की ख़ूबसूरती सीधे दिलों को छूती है। ये उदाहरण देखें -
बिगड़ो तो दमकती है जबीं और जियादा
तुम तैश में लगते हो हसीं और जियादा
निकलोगे आप भर के जहां मांग में अफशां
झेंपेंगे सितारे तो वहीं और जियादा
आ जाओं कि होठों पे अभी जान है वरना
फिर वक़्त मेरे पास नहीं और जियादा

उनकी एक और मशहूर ग़ज़ल देखिये-
बाम पे उनको लेते देखा, जब अंगड़ाई लोगों ने।
चांद समझ कर बस्ती भर में, ईद मनाई लोगों ने।
आजादी तो देखी लेकिन, उसके पर भी छू न सके,
बस ये कहिये उड़ती चिड़िया, मार गिराई लोगों ने।
अख़लाक की शायरी में उर्दू शायरी की परम्परागत शैली भी देखी जा सकती है, जो विशेष रूप से मुहब्बत पर कही गई उनकी ग़ज़लों में उभर कर सामने आती है। ये उदाहरण देखें -
मुहब्बत करने वाले इस कदर मजबूर ही देखे।
कि दिल गमगीं हों लेकिन शक्ल से मसरूर ही देखे।
हंसी माना लबों पर थी मगर जब गौर से देखा,
तो दिल में आशिकों के सैंकड़ों नासूर ही देखे।
गिला इक तुझसे क्या, तेरे तकब्बुर का कि हमने तो,
हसीं जितने भी देखे हैं, बड़े मगरूर ही देखे।

इश्क मुहब्बत की शायरी के साथ ही अख़लाक सागरी ने देश में व्याप्त गरीबी पर कटाक्ष करते हुए बेहतरीन अशआर कहे हैं। बानगी देखिए -
फुटपाथ पर पड़ा था वो कौन था बेचारा।
भूखा था कई दिन का दुनिया से जब सिधारा।
कुर्ता उठा के देखा, तो पेट पर लिखा था
सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।
डॉ. वर्षा सिंह की अध्यक्षता में सम्पन्न साहित्य परिक्रमा आयोजन में अख़लाक़ सागरी


एक शायर हमेशा चैन और अमन की ही बात करता है। सभी परस्पर मिल-जुल कर रहें यही उसकी सबसे बड़ी इच्छा रहती है। अख़लाक सागरी ने भी हमेशा यही इच्छा की, ये शेर देखें -
अब दिवाली में दिये ऐसे जलाना चाहिये।
ईद की खुशियां भी जिनमें जगमगाना चाहिये।
सौंप कर मुस्लिम के हाथों में दशहरे का जुलूस,
ताजिया हिन्दू के कंधे पर उठाना चाहिये।

अख़लाक सागरी की शायरी में जहो मुहब्बत की बातें हैं, वहीं आम जनता की पीड़ा भी है और इन सब के साथ उनका अपना शायराना व्यक्तित्व भी उनके शब्दों में पिरोया मिलता है -
टूटा हूं मैं तो आंसुओं के तार की तरह।
बिखरा पड़ा हूं मोतियों के हार की तरह।
ज़िन्दा ही दफ्न करके मैं खुद अपने आप को
बैठा हूं इक मुज़ाविर-ए-मज़ार की तरह।
हमे ही अपने खून से सींचा ये गुलिंस्ता,
हम ही खटक रहें हैं यहां खार की तरह।
‘अखलाक’ सिर्फ नाम का अखलाक ही नहीं
दुश्मन से भी मिलेगा तो इक यार की तरह।

मशहूर शायर अख़लाक सागरी ने उर्दू शायरी को एक अलग ही जमीन दी। आज उनके पुत्र अयाज सागरी अपने पिता की इस विरासत को न केवल सहेज रहे हैं बल्कि अपनी शायरी से समृद्ध कर रहे हैं।

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( दैनिक, आचरण दि. 25.07.2018)
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— in Sagar, Madhya Pradesh.