Tuesday, December 25, 2018

" अतुल्य भारत : संस्कृति और राष्ट्र " विषय पर अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
'संस्कृति' शब्द संस्कृत भाषा की धातु 'कृ' (करना) से बना है। कृ की उपस्थिति इन तीन शब्दों में विशेष रूप से है-  'प्रकृति' (मूल स्थिति), 'संस्कृति' (परिष्कृत स्थिति) और 'विकृति' (अवनति स्थिति)। शाब्दिक अर्थ देखें तो 'संस्कृति'  का शब्दार्थ है- उत्तम या सुधरी हुई स्थिति अर्थात किसी वस्तु को यहां तक संस्कारित और  परिष्कृत करना कि इसका अंतिम स्वरूप प्रशंसनीय और सम्मानित किए जाने योग्य हो।
भारतीय संस्कृति आत्मविज्ञान एवं आत्मज्ञान की संस्कृति है। अधोतल से  ऊर्ध्वगामी बनाने वाली। भारत में सच्चे अर्थों में वसुधैव कुटुम्बकम् के दर्शन होते हैं। हमारा देश प्रकृति पूजक है। हम जल, धरती, वायु, आकाश सभी प्राकृतिक स्पंदनों से संचालित होते हैं। यह धरोहर किसी और देश के पास नहीं है।

"अतुल्य भारत : संस्कृति और राष्ट्र " विषय पर अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी में बाएं से प्रथम डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

         पंडित दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय, सागर के हिन्दी विभाग द्वारा " अतुल्य भारत : संस्कृति और राष्ट्र " विषय पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का शुभारंभ रविवार दिनांक 23.12.2018 को किया गया। जिसमें बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को व्याख्यान देने हेतु एवं मुझे यानी आपकी इस मित्र डॉ. वर्षा सिंह को काव्यपाठ करने हेतु आमंत्रित किया गया।
संगोष्ठी में लंदन से आई लूसी गेस्ट, अमेरिका से आए डॉ. अनुभव मिश्रा, डॉ. श्याम सुंदर दुबे, श्रीराम परिहार आदि ने अपने विचार रखे। अतिथि विद्वान के रूप में साहित्यकार एवं संस्कृतिविद् डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने  अपना महत्वपूर्ण व्यक्तव्य दिया।






          डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने " भारतीय संस्कृति और मानवमूल्य " शीर्षक के अंतर्गत अपना महत्वपूर्ण व्यक्तव्य दिया।
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ‘खजुराहो की मूर्तिकला का सौंदर्यात्मक अध्ययन’’ विषय में पीएच.डी,.सामयिक प्रकाशन (नई दिल्ली) की साहित्यिक पत्रिका ‘‘सामायिक सरस्वती’’ की कार्यकारी संपादक, विभिन्न विषयों पर पचास से अधिक पुस्तकों की लेखिका, इतिहासविद्, स्तम्भकार, ब्लॉगर एवं साहित्यकार हैं।


          डॉ. (सुश्री) शरद सिंह द्वारा दिया गया व्यक्तव्य आप भी पढ़ें, जो निम्नलिखित है :-

         संस्कृति, राष्ट्र और समाज ये तीन ईकाइयां हैं, जो मानव संस्कृति को आकार देती हैं। सुसंस्कृति से सुराष्ट्र आकार लेता है और अपसंस्कृति से अपराष्ट्र। शब्द अनसुना सा लग सकता है-‘‘अपराष्ट्र’‘। किन्तु यदि राष्ट्रों की राजनीतिक स्तर पर अपराधों में लिप्तता राजनीतिक कुसंस्कारों को जन्म देती है और यही कुसंस्कार राष्ट्र में अतंकवाद की गतिविधियों को प्रश्रय देते हैं। विश्व में कई देश ऐसे हैं जो राजनीतिक दृष्टि से अपराष्ट्र की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। वहीं भारत की संस्कृति का स्वरूप इस प्रकार का है जिसमें अपसंस्कारों की कोई जगह नहीं है। भारतीय संस्कृति ‘‘अप्प देवो भव’’ की संस्कृति है। यदि प्रत्येक मनुष्य में देवत्व के गुण जाग्रत हो जाएं तो सांस्कृतिक विकार जागने अथवा किसी विषम पल में जाग भी जाए तो उसके स्थाई रूप से बने रहने का प्रश्न ही नहीं है। संस्कृत में प्रणीत हमारा संपूर्ण वाङ्मय वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, भागवत, भगवद्गीता आदि के रूप में विद्यमान है, जिसमें हमारे जीवन को सार्थक बनाने के सभी उपक्रमों का विस्तृत विवरण विद्यमान है। इन प्राचीन ग्रंथों में स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है कि संस्कृति एक शाब्दिक ईकाई नहीं वरन् जीवन की समग्रता की द्योतक है। संस्कृति मात्र चेतन तत्वों के लिए ही नहीं अपितु जड़तत्वों के लिए भी प्रतिबद्धता का आग्रह करती है। अब प्रश्न उठता है कि क्या जड़ तत्वों के लिए भी कोई सांस्कृतिक आह्वान होता है जबकि जड़ तो जड़ है, निचेष्ट, निर्जीव। फिर निर्जीव के लिए संसकृति का कैसा स्वरूप, कैसा रूप? ठीक इसी बिन्दु पर भारतीय संस्कृति की महत्ता स्वयंसिद्ध होने लगती है।




        भारतीय संस्कृति समस्त जड़ ओर समस्त चेतन जगत से तादात्म्य स्थापित करने का तीव्र आग्रह करती है। यही आग्रह आज हम पर्यावरण संतुलन के आग्रह के रूप में देखते हैं, सुनते हैं और उसके लिए चिन्तन-मनन करते हैं। जब पा्रणियों का शरीर पंचतत्वों से बना हुआ है और ये पंचतत्व वही हैं जिनसे संसार के जड़ तत्वों की भी पृथक-पृथक रचना हुई है, तो जड़ और चेतन के पारस्परिक संबंध अलग कहां हैं? ये दोनों तो घनिष्ठता से परस्पर जुड़े हुए हैं।
संस्कृति की ध्वजा को फहराते रहने का दायित्व मानव का है क्योंकि वही धरती पर उपस्थित शेष प्राणियों में सबसे अधिक विचारवान और निर्मितिपूर्ण है। निर्माणकौशल के सतत् विकास ने मानव को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठतर बना दिया है। मनुष्य के निर्माणकौशल ने ही उसे सामाजिक प्राणी बनाया और मिलजुल कर रहने के लाभ को जानना सिखाया। मानव के निर्माणकौशल के विकास ने आज उसे इलेक्ट्रॉनिकयुग तक पहुंचा दिया है और यह विकासयात्रा अभी जारी है। किन्तु इसी विकास ने मानवजीवन में ‘‘मूल्य’’ शब्द के स्वरूप को अर्थतंत्र का अनुगामी बना दिया है। यूं तो ‘‘मूल्य’’ एक मानक है श्रेष्ठता के आकलन का। जिसके लिए अधिक श्रम, अधिक मुद्रा खर्च करनी पड़े, जिसके लिए मानव मन में अधिक ललक हो किन्तु उपलब्धता सीमित हो, वह मूल्यवान है। इसके विपरीत जो सुगमता से, कम मुद्राओं में मिल जाए, जिसकी उपलब्धता भी प्रचुर हो और जिसके प्रति मानव मन में अधिक ललक न हो वह सस्ता कहलाता है। यही परिभाषा बनाई है अर्थशास्त्रियों ने। किन्तु जब बात संसकृति की हो अर्थात् जीवनशैली की हो तो ‘‘मूल्य’’ शब्द का अर्थ असीमित और अपरिमित हो जाता है। संस्कृति बाजत्रार की वस्तु नहीं है, उसे खरीदा या बेचा नहीं जा सकता है। संस्कृति तो आचरण है जिसे अपनाया अथवा छोड़ा जा सकता है। जो संस्कृति को अपनाता है वह संस्कारवान होता है और जो संस्कृति का त्याग कर देता है, त्याग से यहां आशय सांस्कृति मूल्यों के त्याग से है। तो, जो संस्कृति को त्याग देता है वह असंस्कारी हो जाता है।






 
         भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका में पाये गये शैलचित्र, नर्मदा घाटी में की गई खुदाई तथा कुछ अन्य नृवंशीय एवं पुरातत्त्वीय प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि भारत भूमि आदि मानव की प्राचीनतम कर्मभूमि रही है। भारतीय संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि हज़ारों वर्षों के बाद भी यह संस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में जीवित है, जबकि मिस्र, असीरिया, यूनान और रोम की संस्कृतियों अपने मूल स्वरूप को लगभग विस्मृत कर चुकी हैं। भारत में नदियों, वट, पीपल जैसे वृक्षों, सूर्य तथा अन्य प्राकृतिक देवी - देवताओं की पूजा अर्चना का क्रम शताब्दियों से चला आ रहा है। देवताओं की मान्यता, हवन और पूजा-पाठ की पद्धतियों की निरन्तरता भी आज तक अप्रभावित रही हैं। वेदों और वैदिक धर्म में करोड़ों भारतीयों की आस्था और विश्वास आज भी उतना ही है, जितना हज़ारों वर्ष पूर्व था। गीता और उपनिषदों के सन्देश हज़ारों साल से हमारी प्रेरणा और कर्म का आधार रहे हैं। समयानुसार परिवर्तनों के बाद भी भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्त्वों, जीवन मूल्यों और वचन पद्धति में निरन्तरता रही है।
भारतीय संस्कृति वह मार्ग सुझाती है कि वे सांस्कृतिक मूल्य कहां से सीखें जाएं जो मनावजीवन को मूल्यवान बना दे -
परोपकाराय फलन्ति वृक्षः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदम् शरीरम्।

अर्थात् - वृक्ष परोपकार के लिए फलते हैं, नदियां परोपकार के लिए बहती हैं, गाय परोकार के लिए दूध देती हैं अतः अपने शरीर अर्थात् अपने जीवन को भी परोपकार में लगा देना चाहिए।





भारतीय संस्कृति की यह सबसे बड़ी विशेषता है कि वह चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि को सबसे श्रेष्ठ मानती है किन्तु साथ ही अन्य योनियों की महत्ता को भी स्वीकार करती है। जिसका आशय है कि प्रकृति के प्रत्येक तत्व से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। और यह तभी संभव है जब प्रकृति के प्रति मनुष्य की आत्मीयता ठीक उसी प्रकार हो जैसे अपने माता-पिता, भाई, बहन, गुरु और सखा आदि प्रियजन से होती है। यह आत्मीयता भारतीय संस्कृति में जिस तरह रची-बसी है कि उसकी झलक गुरुगंभीर श्लोकों के साथ ही लोकव्यवहार में देखा जा सकता है। यहां कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
लोक जीवन में आज भी जल और पर्यावरण के प्रति सकारात्मक चेतना पाई जाती है। एक किसान धूल या आटे को हवा में उड़ा कर हवा की दिशा का पता लगा लेता है। वह यह भी जान लेता है कि यदि चिड़िया धूल में नहा रही है तो इसका मतलब है कि जल्दी ही पानी बरसेगा। लोकगीत, लोक कथाएं एवं लोक संस्कार प्रकृतिक के सभी तत्वों के महत्व की सुन्दर व्याख्या करते हैं। लोक जीवन की धारणा में पहाड़ मित्र है तो नदी सहेली है, धरती मां है तो अन्न देवता है। प्रकृति के वे सारे तत्व जिनसे मिल कर यह पृथ्वी और पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जड़-चेतन मनुष्य के घनिष्ठ हैं, पूज्य हैं ताकि मनुष्य का उनसे तादात्म्य बना रहे और मनुष्य इन सभी तत्वों की रक्षा के लिए सजग रहे।
एक नदी लोकजीवन में किस तरह आत्मीय हो सकती है यह तथ्य बुन्देलखण्ड में गाए जाने वाले बाम्बुलिया लोकगीत में देखा जा सकता है। गंगा नदी को मां का स्थान दिया जाता है किन्तु यह स्थान सिर्फ़ गंगा के लिए नहीं है, मातृत्व का दर्ज़ा तो प्रत्येक उस नदी के लिए है जो जीवन के लिए आवश्यक तत्व प्रदान करती है। नर्मदा नदीघाटी की प्राचीन संस्कृति इसका एक उदाहरण है। इसीलिए बुंदेलखण्ड में नर्मदा को भी मां का स्थान दिया गया है। नर्मदा स्नान करने को नर्मदातट पर पहुंची मनुष्यों की टोली नर्मदा को देखते ही गा उगती है-
नरबदा मैया ऐसे तौ मिली रे
अरे, ऐसे तौ मिली के जैसे मिल गए मताई औ बाप रे
नरबदा मैया... हो....

जब नर्मदा माता है तो गंगा, यमुदना और सरस्वती की त्रिवेणी? क्या उनसे कोई नाता नहीं रह जाता है? लोकमानस त्रिवेणी से भी अपने रिश्तों को व्याख्यायित करता है-
नरबदा मोरी माता लगें रे
अरे, माता तौ लगें रे, तिरबेनी लगें मोरी बैन रे
नरबदा मैया... हो...
वहीं भोजपुरी लोकगीतों में गंगा को मां, यमुना को बहन, चांद और सूरज को भाई कहा गया है और साथ ही स्त्री की झिझक को प्रकट करते हुए यह भी कहा गया है कि इनके द्वारा अपने परदेसी पति को संदेश कैसे भिजवाऊं, तुम्हीं संदेश पहुंचाओ मेरी सखी।
चननिया छिटकी मैं का करूं गुंइया
गंगा मोरी मइया, जमुना मोरी बहिनी,
चान सुरुज दूनो भइया,
पिया को संदेस भेजूं गुंइया।


प्रकृति का मानवीकरण भोजपुरी लोकगीतों में बड़े सुन्दर ढंग से मिलता है। जैसे उपनयन, विवाह आदि संस्कारों में तीर्थस्थल गया को और तीर्थराज प्रयाग को निमंत्रण भेजा जाता है-
गया जी के नेवतिले आजु त
नेवीतीं बेनीमाधव हो
नेवतिलें तीरथ परयाग,
तबहीं जग पूरन हो ...

अर्थात् जब गया और तीर्थराज प्रयाग जैसे पावन स्थलों को आमंत्रित किया जाएगा, तभी यज्ञ तभी पूरा होगा।
भारतीय संस्कृति में मानवमूल्य की महत्ता इतनी सघन है कि प्रकृति को भी रक्तसंबंधियों से अधिक घनिष्ठ माना जाता है। इसके उदाहरण लोकसंस्कारों में देखे जा सकते हैं जो आज भी ग्रामीण अंचलों में निभाए जाते हैं-

कुआ पूजन - विवाह के अवसर पर विभिन्न पूजा-संस्कारों के लिए जल की आवश्यकता पड़ती है। यह जल नदी, तालाब अथवा कुए से लाया जाता है। इस अवसर पर रोचक गीत गाए जाते हैं। ऐसा ही एक गीत है जिसमें कहा गया है कि विवाह संस्कार के लिए पानी लाने जाते समय एक सांप रास्ता रोक कर बैठ जाता है। स्त्रियां उससे रास्ता छोड़ने का निवेदन करती हैं किन्तु वह नहीं हटता है। जब स्त्रियां उसे विवाह में आने का निमंत्रण देती हें तो वह तत्काल रास्ता छोड़ देता है।

सप्तपदी में जल विधान - विवाह में सप्तपदी के समय पर जो पूजन-विधान किया जाता है, उसमें भी जल से भरे मिट्टी के सात कलशों का पूजन किया जाता है। ये सातो कलश सात समुद्रों के प्रतीक होते हैं। इन कलशों के जल को एक-दूसरे में मिला कर दो परिवारों के मिलन को प्रकट किया जाता है।

पूजा-पाठ में जल का प्रयोग - पूजा-पाठ के समय दूर्वा से जल छिड़क कर अग्नि तथा अन्य देवताओं को प्रतीक रूप में जल अर्पित किया जाता है जिससे जल की उपलब्धता सदा बनी रहे।

मातृत्व साझा कराना - सद्यःप्रसूता जब पहली बार प्रसूति कक्ष से बाहर निकलती है तो सबसे पहले वह कुएं पर जल भरने जाती है। यह कार्य एक पारिवारिक उत्सव के रूप में होता है। उस स्त्री के साथ चलने वाली स्त्रियां कुएं का पूजन करती हैं फिर प्रसूता स्त्री अपने स्तन से दूध की बूंदें कुएं के जल में निचोड़ती हैं। इस रस्म के बाद ही वह कुएं से जल भरती है। इस तरह पह पेयजल को अपने मातृत्व से साझा कराती है क्योंकि जिस प्रकार नवजात शिशु के लिए मां का दूध जीवनदायी होता है उसी प्रकार समस्त प्राणियों के लिए जल जीवनदायी होता है।

जिस संस्कृति में पृथ्वी की रक्षा से ले कर पारिवारिक संबंधों की गरिमा तक पर समुचित ध्यान दिया जाता हो उस संस्कृति में मानवमूल्यों का पीड़ी दर पीढ़ी प्रवाहमान रहना स्वाभाविक है। यहां दो लोक कथाएं उदाहरण के लिए समीचीन होंगी- एक उरांव लोककथा और दूसरी बोडो लोककथा।

उरांव जनजाति में प्रचलित कथा है जिसमें केकड़े और कछुए के के द्वारा मनुष्य को पृथ्वी की रक्षा करने का मार्ग समझाया गया है। कथा कुछ इस प्रकार है कि - परमात्मा धरमेस ने मानव-संसार बसाने के लिए पृथ्वी का सृजन किया। उस समय पृथ्वी महासागर में तैरती थी। जिसके कारण पृथ्वी पर अस्थिरता बनी रहती थी। एक दिन परमात्मा धरमेस की पत्नी पार्वती स्वर्ग में बैठ कर पृथ्वी के दृश्यों का आनन्द ले रही थीं कि उसी समय पृथ्वी ने हिचकोला खाया और दृश्य बदल गया। सुन्दर दृश्य के स्थान पर असुन्दर दृश्य दिखाई पड़ने लगा।
‘यह कैसी पृथ्वी बनाई है आपने? जब देखो, हिलती-डुलती रहती है। या तो आप इसे स्थिर करिए या फिर इसे नष्ट कर दीजिए।’ पार्वती ने रुष्ट होते हुए कहा।
  ‘मैं इसे कछुवे की पीठ पर रख देता हूं। जिससे यह अधिक हिलेगी-डुलेगी नहीं।’ यह कहते हुए परमात्मा धरमेस ने पृथ्वी को कछुवे की पीठ पर रख दिया।
  कुछ समय तक तो सब ठीक-ठाक रहा किन्तु पार्वती ने देखा कि कछुवा जब थक जाता है तो करवटें लेने लगता है जिससे पृथ्वी पर उथल-पुथल मच जाती है।
  ‘यह आपने कैसी व्यवस्था की है? अधिक समय पृथ्वी हिलती रहती है। उस पर कोई सुन्दर दृश्य अधिक समय टिक नहीं पाता है। आपका ये कछुवा बहुत हिलता है।’ पार्वती ने परमात्मा धरमेस से शिकायत की।
‘ठीक है, मैं इस बाधा को भी दूर किए देता हूं।’ परमातमा धरमेस ने कहा और एक केकड़े को कछुवे के पास नियुक्त कर दिया। केकडे़ का काम था, कछुवे को चारो ओर से अपने हाथों से जकड़े रहना जिससे कछुवा अधिक हिले-डुले नहीं।
यद्यपि कभी-कभार कछुवा थक कर थोड़ी-बहुत चेष्टाएं करता है जिससे भूकम्प आते हैं। फिर भी कछुवे और केकड़े की व्यवस्था के बाद पृथ्वी अधिक सुरक्षित हो गई अन्यथा गेंद के समान गोल, महासागर में तैरती पृथ्वी अब तक न जाने कहां चली गई होती। अर्थात् पृथ्वी को बचाना है तो विविधता में एकता को अपनाना ही होगा।



बोडो जनजाति में प्रचलित ‘राओना और राओनी’’ कथा-
 प्राचीन काल में एक गांव में एक भाई-बहन रहते थे। भाई का नाम था राओना और बहन का नाम था राओनी। दोनों अपनी दादी के साथ रहते थे। कुछ समय बाद दोनों विवाह योग्य बड़े हो गए। एक दिन राओनी नदी में नहा रही थी कि राओना भी उधर आ निकला। उसने अपनी बहन के निर्वस्त्रा युवा शरीर को देखा तो वह उसकी सुंदरता पर मोहित हो गया। राओना ने दादी से कहा कि वह अपनी बहन से विवाह करेगा। दादी राओना के क्रोध के भय से कुछ नहीं बोली। थेड़ी देर बाद, दादी सूपे में अनाज ले कर बैठ गई और अनाज फटकने लगी। साथ में वह गीत गाने लगी और गीत के माध्यम से उसने राओनी को राओना की मंशा के बारे में बता दिया। राओनी ने सुना तो वह दंग रह गई। उसने सोच लिया कि चाहे कुछ भी हो लेकिन वह अपने भाई से विवाह नहीं करेगी। किन्तु वहीं रहते हुए विवाह से बचा नहीं जा सकता था अतः राओनी आकाश में उड़ चली। उसी समय उसका भाई राओना आ गया। उसने राओनी को उड़ कर दूर जाते हुए देखा तो वह समझ गया कि राओनी उससे बचने के लिए भाग रही है। राओना ने राओनी का पीछा किया। राओनी ने देखा कि राओना उसके पीछे आ रहा है तो वह भाग कर बादलों में छिप गई और बादलों की ओट में उड़ने लगी। बादलों के बीच से कभी-कभी उसकी झलक दिख जाती। इस झलक से सारी धरती और सारा आकाश प्रकाशित हो जाता। राओनी को पहुंच से दूर पा कर राओनी क्रोध से गर्जना करने लगा। उसकी गर्जन से परा आकाश और समूची धरती कांप उठी। लेकिन राओनी नहीं डरी। वह बादलों के साथ-साथ उड़ती रही और अपने कुत्सित विचारों वाले भाई से स्वयं को बचाती रही। जबकि राओना अपनी बहन का पीछा करता हुआ उसे डराने के लिए गर्जनाएं करता रहा। आज भी बादलों में बिजली के रूप में राओनी दिखाई पड़ जाती है और उसके दिखने के ठीक बाद राओना की गर्जना बादलों की गर्जना के रूप में सुनाई देती है। यह कथा प्रकृति का मानवीकरण कर के द्वारा पारिवारिक संस्कारों की रक्षा करने का प्रबल आग्रह करती है।


वस्तुतः संस्कृति व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व के सतत् विकास का महत्त्व पूर्ण आधार है। मानव मूल्य संस्कृति से ही उत्पन्न होते हैं और संस्कृति की रक्षा करते हैं। सत्य, शिव और सुन्दर के शाश्वत मूल्यों से परिपूर्ण भारतीय संस्कृति में पाषाण जैसी जड़ वस्तु भी देवत्व प्राप्त कर सर्वशक्तिमान हो सकती है और नदियां एवं पर्वत माता, पिता, बहन, आदि पारिवारिक संबंधी बन जाते हैं। ऐसी भारतीय संस्कृति की नाभि में मानवमूल्य ठीक उसी तरह अवस्थित है जैसे भगवान विष्णु की नाभि में कमल पुष्प और उस कमल पुष्प पर जिस तरह ब्रह्मा विद्यमान हैं, उसी तरह मानवमूल्य पर ‘सर्वे भवन्ति सुखिनः’ की लोक कल्याणकारी भावना विराजमान है। 
मानवता का  पाठ  पढ़ाती  भारत की संस्कृति
जीवन का हर मूल्य सजाती भारत की संस्कृति
सींचा करती ज्ञानसुधा से हर  मन को  हरदम
सबके सुख के दीप जलाती भारत की संस्कृति   
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