Friday, July 10, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 2 | तमाई | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत दूसरी कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के लोकप्रिय कवि टीकाराम त्रिपाठी 'रुद्र' के काव्य संग्रह  "तमाई" का पुनर्पाठ।

सागर: साहित्य एवं चिंतन

      पुनर्पाठ- ‘तमाई’ काव्य संग्रह

                   -डॉ. वर्षा सिंह
                     
हमें अच्छी तरह पता है कि
यह समाजवादी अर्थव्यवस्था है
यदि यह सच नहीं है तो इस व्यवस्था को बदलने की जरूरत है
और इसके लिए हमें करनी होगी समाज की तमाई
तब ही हमारे जीवन के जोड़ में शायद शून्य से बड़ी होगी हासिलाई

        ये पंक्तियां हैं सागर नगर के वरिष्ठ कवि टीकाराम त्रिपाठी ‘रूद्र’ की तमाई शीर्षक कविता की। यही नाम है उनके काव्य संग्रह का जिसका पुनर्पाठ ज़रूरी है। दरअसल तमाई मात्र एक शब्द नहीं, वरन् एक पूरा उद्यम है अनुपयोगी और अवांछित को हटा कर नवीन की स्थापना करने का। इस शब्द से वे लोग भली-भांति परिचित हैं जो बुंदेलखण्ड के हैं और खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। खेती-किसानी कर्मशील क्रिया है जिसमें अनेक शब्द विशेषण बन कर समाए हुए हैं जैसे बुआई, जुताई, रोपाई, निंदाई, गुड़ाई आदि..इसी तरह का एक शब्द और भी है तमाई। एक पूर्ण कार्मिक शब्द। एक ऐसा शब्द जो सृजन की नई कड़ी के लिए भूमिका बांधता है। यानी खेत जोतने से पहले खेत में से घास आदि निकालने की क्रिया है तमाई,  ताकि खरपतवार ज़मीन से दूर हो जाएं और खेत की तैयार ज़मीन को जोत कर उसमें बीजारोपण किया जा सके। खरपतवार के रहते खेत में दोबारा फसल नहीं उगाई जा सकती है। दोबारा नई फसल उगाना है तो पहले खरपतवार हटाने होंगे, ज़मीन की फिर से जोताई करनी होगी और ज़मीन तैयार करनी होगी नए सिरे से। बिलकुल किसी नए-नकोर खेत की तरह।
           जीवन में भी अनके ऐसी स्थितियां आती हैं जब हम खरपतवार जैसी भावनाओं से घिर जाते हैं। बुद्धि कुंद होने लगती है और हम कुछ नया सोचने में कठिनाई महसूस करने लगते हैं। ऐसे में आता है हताशा और निराशा का दौर। नई सुबह की भांति नयापन हमेशा नवीन विचारों का संचार करता है। यह चिंतन, मनन और आकलन का आग्रह करता है। जब हम कुछ नया सोचते हैं तो कुछ नया कर पाते हैं। पुरानी सड़ी-गली सोच और सड़ी-गली व्यवस्थाओं पर नवीनता के भवन खड़े नहीं किए जा सकते हैं। इसीलिए समय-समय पर पहले से चले आ रहे विचारों, व्यवस्थाओं और मान्यताओं की तमाई जरूरी है। कवि टीकाराम त्रिपाठी जब तमाई शब्द का प्रयोग करते हैं तो ठीक इसी संदर्भ में। वे बदल देना चाहते हैं उन सारी व्यवस्थाओं को जो समाज, विचार और व्यवहार के लिए अनुकूल नहीं हैं।
           तमाई के लिए भी जरूरी है पड़ताल। यह जांचे-समझे बिना कि तमाई की स्थिति आ गई है या नहीं, तमाई नहीं की जा सकती है। ‘पड़ताल’ शीर्षक अपनी कविता में कवि रुद्र लिखते हैं-
पड़ताल जरूरी है
जीवन से सभी पक्षों की
उन्नति और अवनति के
ऊबड़-खाबड़, तिकड़मी शिखरों की/कक्षों की
उन्नत है या नत है
विनयावनत है या उन्नतिविगत है?

      सच है, पड़ताल के बिना कुछ भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। जैसे-फर्श पर चिकनी-चमकदार टाईल्स लगवाने, दीवारों की रंगाई-पुताई करवाने, फर्नीचर बदलवाने से यह तय नहीं किया जा सकता है कि उस घर में रहने वाले व्यक्ति का स्वभाव भी निश्चछल, निष्कपट और निरापद हो गया है। वह तो उससे चर्चा-परिचर्चा करने पर ही पता चलता है कि वह व्यक्ति दिखावे मात्र में बदला है अथवा सचमुच उसमें परिवर्तन आ गया है। मल्टीनेशनल कंपनियों के चमचमाते दफ़्तरों के वातानुकूलित कक्षों में श्रम का जिस तरह शोषण होता है, वह उन कक्षों में पहुंच कर ही अनुभव किया जा सकता है। अनुभव पड़ताल के मार्ग से चल कर लक्ष्य तक पहुंचने की प्रक्रिया ही तो है। भौतिक वस्तुओं में किए गए परिवर्तन तब अर्थहीन हो जाते हैं जब व्यक्ति की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं होता, वह जस की तस बनी रहती है।

तमाई, काव्य संग्रह @ साहित्य वर्षा

          तमाई के साथ ही एक और प्रक्रिया जुड़ी होती है, मानों दो प्रक्रियासूचक शब्द एक ही कोष्ठक में लिख दिए गए हों। तो दूसरा शब्द है नरवाई यानी खरपतवार। नरवाई जलाकर नष्ट करना आमबात है। भले ही हर आम बात अच्छी नहीं होती। जैसे नरवाई का जलाया जाना भीषण प्रदूषण का कारण बनता है। नरवाई का जलाया जाना देश की राजधानी का भी दम घोंटने का माद्दा रखता है लेकिन बुराई यह कि दम घुटता है आम आदमी का जिसमें बहुसंख्यक निम्नवर्ग और मध्यमवर्ग होता है। एक अनुभव, एक पड़ताल और फिर निष्कर्ष कि हर आग की जलनशील प्रकृति न तो जलने वाले की पीड़ा समझ सकती है और न उसके धुंए से घुटने वाले दम की कसमसाहट महसूस कर सकती है। ‘तमाई’ काव्य संग्रह में एक कविता है ‘आग’।
आग सुलगाना बहुत आसान साथी
बुझाना लेकिन नहीं आसान होता
खुद बा खुद लगती नहीं वह अब कहीं भी
मित्र, लगवाई सदा जाती रही है
शत्रुओं का नाम ले कर सगों पर ही
घटा युद्धों की सदा छाती रही है

       सन् 2010 में ‘तमाई’ का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था। लगभग एक दशक बीतने पर भी यह काव्य संग्रह प्रासंगिक है। यूं भी समाज से सरोकारित साहित्य कभी अप्रासंगिक नहीं होता है अपितु बार-बार पढ़ने और समझने योग्य होता है।

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तमाई, पुनर्पाठ @ साहित्य वर्षा


( दैनिक, आचरण  दि. 10.07.2020)
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