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Friday, June 26, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | मालव जननी | विक्रम | डॉ. वर्षा. सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय मित्रों, ये दो तस्वीरें हैं... एक है वर्ष 1953 में मेरी माता जी विद्यावती ‘मालविका’ जी की और दूसरी "विक्रम" पत्र के दिसम्बर 1953 के अंक में प्रकाशित उनके गीत "मालव जननी" के पत्र-कतरन की।
एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक का अंश है... "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी", मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित विक्रमादित्य का नगर उज्जैन मेरी माता जी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ की जन्मभूमि है। लेखन में उनकी रुचि बाल्यकाल से रही है। माताजी ने अपने पिता यानी मेरे नाना जी संत ठाकुर श्यामचरण सिंह जी के विचारों से प्रभावित हो कर 12-13 वर्ष की आयु से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। उनकी गहरी साहित्यिक अभिरुचि को पहचान कर उज्जैन के प्रकाण्ड विद्वान, स्वनामधन्य कवि एवं "विक्रम" पत्र के यशस्वी सम्पादक पण्डित सूर्यनारायण व्यास जी ने उन्हें "मालविका" अर्थात् मालव कन्या के उपनाम से विभूषित किया था। "विक्रम" के दिसम्बर 1953 के अंक में प्रकाशित माता जी का यह गीत उन दिनों बहुत लोकप्रिय हुआ था।
         अपने विवाह पश्चात माताजी ने मालवा से विदा लेने के उपरांत रीवा और तत्पश्चात  अपने जीवन के लगभग 6 दशक बुन्देलखण्ड में व्यतीत किए हैं, जिसमें से लगभग 30 वर्ष पन्ना में और 30 वर्ष से अधिक समय सागर में... वर्तमान में वे मकरोनिया, सागर में निवासरत हैं।
डॉ. विद्यावती "मालविका" युवावस्था में... @ साहित्य वर्षा

दिसम्बर 1953 में "विक्रम" (उज्जैन) में प्रकाशित डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत "मालव जननी"



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Saturday, June 20, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | ज्योत्सना | दीदी | डॉ. वर्षा. सिंह

.... और यह है मेरी माता जी डॉ. विद्यावती 'मालविका' जी का "दीदी" पत्रिका में जनवरी 1949 में प्रकाशित एक गीत...

दीदी पत्रिका, जनवरी 1949, @ साहित्य वर्षा


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Thursday, June 11, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | नववर्ष | दीदी | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय मित्रों, आज पढ़िए मेरी माताजी डॉ. विद्यावती 'मालविका' का वर्ष 1948 में इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका "दीदी" के जनवरी अंक में प्रकाशित एक गीत....

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत - @ साहित्य वर्षा

     मित्रों, दरअसल मेरी माताजी डॉ. विद्यावती मालविका, जिन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, वे नियमित रूप से समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं जर्नल्स में कविता, कहानी, लेख, विचार दर्शन आदि लिखा करती रही हैं। यूं तो वे अभी भी लेखन, पठन-पाठन से जुड़ी हुई हैं किन्तु आज उनकी एक पुरानी फाइल पलटते हुए मुझे यह विचार आया कि आप सबसे भी उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएं साझा करूं।

Monday, April 6, 2020

डॉ. विद्यावती सिंह "मालविका" का साक्षात्कार..."लॉकडाउन मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा" - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

     मेरी माता जी डॉ. विद्यावती सिंह "मालविका" जो वरिष्ठ साहित्यकार हैं, वे चकित हैं लॉकडाउन पर, चिंतित हैं कोरोना संकट पर और ईश्वर से प्रार्थना किया करती हैं प्रत्येक व्यक्ति के स्वस्थ रहने के लिए।राजस्थान पत्रिका के सागर एडीशन "पत्रिका" द्वारा लिया गया उनका साक्षात्कार आज दि. 06.04.20 को "पत्रिका" में प्रकाशित हुआ है। जिसे आप भी पढ़ें...
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏

मैं डॉ. वर्षा सिंह और मेरी माता जी डॉ. विद्यावती सिंह "मालविका"
 
       लॉकडाउन मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा
                   - डॉ. विद्यावती सिंह "मालविका"
                      वरिष्ठ साहित्यकार, सागर

             मैंने अपने 90 वर्ष की आयु के दौरान अनेक बार कर्फ्यू की स्थिति देखी है।  ब्रिटिश काल में कई बार कर्फ्यू की स्थिति बन जाती थी और इसी प्रकार दंगे फसाद के समय भी कर्फ्यू लगाया जाता था  लेकिन लॉकडाउन मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा है, जब मंदिर के पट भी बंद हैं और अस्पतालों में ओपीडी भी बंद कर दी गई है। पहले जब कर्फ्यू  लगाया जाता था तो उस कर्फ्यू के नियमों को तोड़ने वालों पर पुलिस के डंडे चलते थे या उन्हें जेल भेज दिया जाता था लेकिन आज अगर लॉकडाउन के नियमों का पालन नहीं करेंगे तो हम अपने ही स्वास्थ्य  ही नहीं अपने परिवार के अपने पड़ोसियों के स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाएंगे। यह जीवन और मृत्यु का सवाल है अतः हमें इसे गंभीरता से लेना होगा। कोरोना वायरस को किसी भी हाल में और फैलने. नहीं देना है।
          देश में लॉकडाउन पहली बार किया गया है तो  ऐसा संकट भी तो पहली बार आया है। कोरोना वायरस का असर इतना भीषण है कि पूरा देश, पूरी मानव जाति संकट में आ गई है। इस संकट से उबरने के लिए हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने जनता कर्फ्यू भी लगाया लेकिन दुख है कि लोगों ने उसका ढंग से पालन नहीं किया। कोरोना वायरस संक्रमण को देखते हुए अत्यधिक सतर्कता बरतने की जरूरत है। कोरोना वायरस से सम्बन्धित लक्षण यदि किसी भी व्यक्ति में पाए जाते है तो उसे तुरंत नजदीकी हस्पताल में ले जाएं।
             प्रशासन की तरह मेरा भी सबसे अनुरोध है कि  नवरात्रि में घर में रह कर पूजा-पाठ करें। घर से बाहर बिलकुल नहीं निकलें। जो भी वस्तुएं घर में हों उन्हीं से नवरात्रि मनाएं। यह अच्छा है कि नवरात्रि में आयोजित होने वाले वार्षिक मेला, भजन संध्या, अखंड रामध्वनि आदि कार्यक्रमों को स्थगित कर दिया गया है। ईश्वर भक्ति से प्रसन्न होता है, जोकि घर में रह कर भी उतनी ही श्रद्धा से की जा सकती है। घर में रहें और प्रार्थना करें कि दुनिया में सभी मनुष्य स्वस्थ-प्रसन्न रहें। यह मानें कि  ईश्वर हमारी परीक्षा ले रहा है और हमें इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना ही है।
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#Lockdown
#GoCorona
#Corona #PatrikaSagar
#SagarPatrika


Saturday, April 27, 2019

National Tell a Story Day नेशनल टेल ए स्टोरी डे (राष्ट्रीय कथा कहन दिवस ) पर डॉ. विद्यावती "मालविका" के विचार

Dr. Varsha Singh
आज नेशनल टेल ए स्टोरी डे है। बचपन में दादा-दादी और नाना-नानी से कहानियां हम सभी ने अक्सर सुनीं होंगी। लेकिन अब यह आधुनिक और डिजिटल होती दुनियां में गुम हो गई हैं। इनकी जगह कार्टून और मोबाइल वीडियो ने ले ली है। यही कारण है कि न अब वो कहानियां सुनाने वाले दादा-दादी और नाना-नानी रहे। न ही इनको सुनने वाले बच्चे। इसका असर बच्चों के बचपन पर भी दिख रहा है। दादी-नानी की कहानियांं पौराणिक संदर्भों पर केंद्रित होती थी। ये कहानियां बहुत ज्ञानवर्धक थीं। स्कूल जाने के पहले ही बच्चों को ये कहांनियां कंठस्थ हो जाती थीं, जो उसे स्कूल में शिक्षा के दौरान बहुत सहायक होती थीं।

बचपन की कहानियों में मनोरंजन के साथ संस्कारों की पाठशाला भी होती थी, इनके गुम होने से बच्चे संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं। दरअसल यह किस्से कहानियां बच्चों में संस्कारों और आदर्शों को विकसित करती हैं। जो अब गुम हो रहे हैं। कहानियां बंद होने के पीछ एक बडा़ कारण संयुक्त परिवार खत्म होना भी है। जिस कारण बच्चे दादा-दादी और नाना-नानी से दूर हो गए है।
National Tell a Story Day नेशनल टेल ए स्टोरी डे (राष्ट्रीय कथा कहन दिवस ) संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रत्येक वर्ष 27 अप्रैल को मनाया जाता है।  सभी उम्र के लोगों को नेशनल टेल ए स्टोरी डे पर सभी प्रकार की कहानियों को साझा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।  चाहे वह किसी पुस्तक से पढ़ा गया हो, आपकी कल्पना से या बचपन की याद से एक वास्तविक कहानी। 27 अप्रैल की तारीख दोस्तों और परिवार को इकट्ठा करने और उन कहानियों को साझा करने का दिन है।

 भारत में भी बच्चों के लिए विशेष कहानी कहने के साथ देश भर के पुस्तकालय नेशनल टेल ए स्टोरी डे में भाग लेते हैं।

 कहानी सुनाना एक प्राचीन प्रथा है जिसका उपयोग एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ज्ञान को सौंपने के लिए किया जाता है।  परिवार की परंपराओं, इतिहास और लंबे समय से सुनाई जा रही अन्य ज्ञानवर्धक कहानियों को  साझा करने पर शैक्षिक के साथ-साथ मनोरंजक हो सकता है। वास्तव में बहुत ही बेहतरीन कहानियों में से कुछ वास्तविक जीवन के अनुभव से आती हैं।

 कई लोग अपने दादा-दादी को सुनने का आनंद लेते हैं । जब बचपन से किशोरावस्था तक की यात्रा के  बारे में अपनी कहानियों को साझा करते हैं।  परिवार, दोस्तों और प्रियजनों के साथ कहानियां कहने में समय बिताना सभी के लिए एक-दूसरे से सीखने, याद रखने और साथ-साथ बढ़ने के लिए एक बहुत अच्छा जरिया है।

 नेशनल टेल ए स्टोरी डे पर, यह मायने नहीं रखता कि कहानी एक छोटी कहानी है या लंबी कहानी, कल्पना या गैर-कहानी, एक लंबी कहानी या लोककथा।  यह उन सभी के लिए एक ऐसा दिन है जब हम परस्पर अपनी कहानियों को बताने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और यहां तक ​​कि #NationalTellAStoryDay का उपयोग करके उन्हें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं।
http://epaper.patrika.com/c/38879359

http://epaper.patrika.com/c/38879359

पत्रिका (राजस्थान पत्रिका समूह का मध्यप्रदेश संस्करण) समाचारपत्र सदैव नये नये विषयों के साथ साथ परम्परागत विषयों को भी प्राथमिकता देता है।
आज दिनांक 27.04.2019 को "पत्रिका" समाचारपत्र के सागर संस्करण में ' नेशनल टेल ए स्टोरी डे ' पर मेरी माताश्री डॉ. विद्यावती "मालविका" के विचार प्रकाशित हुए हैं....
डॉ. श्रीमती विद्यावती ‘मालविका’ के विचार

वरिष्ठ साहित्यकार एवं सेवानिवृत्त व्याख्याता डॉ. श्रीमती विद्यावती ‘मालविका’ मानती हैं कि बच्चों में संस्कारों के प्रवाह और कल्पनाशक्ति के विकास में नानी-दादी की कहानियों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। मेरी दोनों बेटियां वर्षा सिंह और शरद सिंह यदि आज ख्यातिनाम साहित्यकार हैं तो इसमें उनके नानाजी द्वारा उन्हें सुनाई गईं उन कहानियों का सुपरिणाम है जिन्होंने इन दोनों बच्चियों में कल्पनाशीलता का विकास किया। नानी-दादी की कहानियां ही हैं जो बच्चों में उनके बालपन से ही उनके भीतर संवेदनाएं जगाती हैं और रोचक ढंग से परहित का पाठ पढ़ाती हैं। किन्तु मुझे आजकल का वातावरण देख कर दुख होता है कि आज के बच्चे पल भर के लिए भी अपनी नानी-दादी के पास नहीं बैठना चाहते हैं। वे या तो पढ़ाई में जुटे रहते हैं या फिर मोबाईल में डूबे रहते हैं। कहानियां बच्चों को संस्कार देती हैं।हमें याद रखना चाहिए कि जो संस्कार बच्चों को अपने बुजुर्गों से मिलते हैं, वही उनके जीवन में स्थाई प्रभाव डालते हैं। यह परम्परा बनी रहनी चाहिए।"
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Friday, November 16, 2018

डॉ. विद्यावती "मालविका" हिन्दी विभाग, डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में


Dr Varsha Singh
    कल दिनांक 15.11.2018 को मेरी माताश्री डॉ. विद्यावती "मालविका" जी, जो स्वयं हिन्दी की व्याख्याता रही हैं, ने डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के हिंदी विभाग में जाने की इच्छा प्रकट की । उन्होंने कहा कि मैं आज विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में जाना चाहती हूं जहां आचार्य नंददुलारे बाजपेई, आचार्य रामरतन भटनागर, डॉ. भगीरथ मिश्र, प्रेम शंकर,  डॉ. कांति कुमार जैन सरीखे प्रकांड विद्वानों से अनेक अवसरों, आयोजनों में मिलना हुआ करता था। अतः मैं और बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह उन्हें विश्वविद्यालय लेकर गए जहां हिन्दी विभाग के वर्तमान विभागाध्यक्ष डॉ आनंद प्रकाश त्रिपाठी तथा विद्वत स्टाफ डॉ. आशुतोष मिश्रा, डॉ राजेंद्र यादव, डॉ. लक्ष्मी पांडे इत्यादि से उनकी आत्मीय मुलाकात हुई। सभी ने माताश्री का बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया।
बायें से:- डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. आशुतोष मिश्र, डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी, डॉ. श्रीमती विद्यावती "मालविका", मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. सुश्री शरद सिंह एवं डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय



        चर्चा के दौरान माताश्री ने " हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव" विषय में प्राप्त अपनी पी.एचडी. उपाधि और डॉ. गौर से संबंधित संस्मरण साझा किये। जिसमें उन्होंने याद करते हुए यह भी कहा कि पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनका वाईवा लिया था।
बायें से:- डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. आशुतोष मिश्र, डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी, डॉ. श्रीमती विद्यावती "मालविका", डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय , मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह एवं डॉ. सुश्री शरद सिंह 
तत्पश्चात माताश्री को बुंदेली पीठ, हिन्दी विभाग की पत्रिका " ईसुरी" के सम्पादक एवं बुंदेली पीठ के सचिव डॉ. राजेन्द्र यादव ने बुंदेली लोकगीतों पर एकाग्र पत्रिका का ताज़ा अंक भेंट किया।
बायें से:- डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय,  डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी, डॉ. आशुतोष मिश्र, डॉ. श्रीमती विद्यावती "मालविका", मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. सुश्री शरद सिंह एवं डॉ. राजेंद्र यादव




बायें से:- डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय,  डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी. श्रीमती विद्यावती "मालविका", मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. सुश्री शरद सिंह एवं डॉ. राजेंद्र यादव
         विश्वविद्यालय से लौटते हुए सिविल लाइन स्थित अमूल रेस्टोरेंट में हमने काफी पी। जहां हमारे पारिवारिक आत्मीयजन कपिल बैसाखिया से भी उनकी भेंट हुई।





कल का दिन उनके लिए थका देने वाला, किन्तु अत्यंत सुखद रहा।
डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर शिक्षा के क्षेत्र में मध्यप्रदेश और भारत.देश ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में अपनी विशिष्ट शैक्षणिक उपादेयता की ख्याति के कारण विख्यात है। इसकी स्थापना की कथा भी अन्यों से सर्वथा भिन्न है।
डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर का प्रवेश द्वार

डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय का ड्रोन से लिया गया हवाई फोटोग्राफ
सागर विश्वविद्यालय की स्थापना डॉ. हरी सिंह गौर ने 18 जुलाई 1946 को अपनी स्वयं की निजी पूंजी से की थी। उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से 20 लाख रुपये की धनराशि से अपनी जन्मभूमि सागर में सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की तथा वसीयत द्वारा अपनी पैतृक सपत्ति से 2 करोड़ रुपये दान भी दिया था। वे सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक, उपकुलपति होने के साथ ही अपने जीवन के आखिरी समय दिनांक 25 दिसम्बर 1949 तक इसकी समृद्धि के लिए प्रयासरत रहे। डॉ. गौर का स्वप्न था कि सागर विश्वविद्यालय को कैम्ब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों जैसी मान्यता और कीर्ति प्राप्त हो। डॉ. हरी सिंह गौर स्वयं एक शिक्षाशास्त्री, ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, न्यायविद्, समाज सुधारक, साहित्यकार कवि, उपन्यासकार एवं देशभक्त थे।
अपनी स्थापना के समय सागर विश्वविद्यालय भारत का 18 वां विश्वविद्यालय था। किसी एक व्यक्ति के दान से स्थापित होने वाला यह देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है। वर्ष 1983 में जनभावनाओं का सम्मान करते हुए सागर विश्वविद्यालय का नाम परिवर्तित कर  डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कर दिया गया। इसे 27 मार्च 2008 से  केन्द्रीय विश्वविद्यालय की श्रेणी प्रदान की गई।
   डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में देश के जानेमाने विद्वतजन अधिष्ठाता, प्राध्यापक और व्याख्याता रहे हैं। जिनमें आचार्य नंददुलारे बाजपेई, आचार्य रामरतन भटनागर, डॉ. भगीरथ मिश्र, प्रेम शंकर,  डॉ. कांति कुमार जैन का नाम प्रमुख है।
आचार्य नंददुलारे बाजपेई

      उन्नाव जिले के मगरायल नामक ग्राम में सन् 1906 ई. में जन्में नंददुलारे बाजपेई की प्रारंभिक शिक्षा हजारीबाग में हुई थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे कुछ समय तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदीविभाग में अध्यापक तथा बाद में अनेक वर्षों तक सागर विश्वविद्यालय के हिंदीविभाग के अध्यक्ष रहे। वरिष्ठ आलोचक के रूप में आचार्य वाजपेयी ने छायावाद का परिवर्धन एवं उन्नयन करते हुए भारतीय काव्यशास्त्र की आधारभूत मान्यताओं को ग्रहण करते हुए चर्चित कवियों, लेखकों एवं उनकी कृतियों की जो वस्तुपरक आलोचनाएँ प्रस्तुत की हैं, वे हिन्दी साहित्य की बहुमूल्य धरोहर हैं।
डॉ. रामरतन भटनागर
      प्रख्यात आलोचक एवं निबन्धकार  डॉ रामरतन भटनागर ने 1951 से डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के हिन्दी विभाग में शिक्षण कार्य शुरु किया और वहीं से 1976 में प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए। आलोचना और निबंध की उनकी लगभग 75 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। वे एक संवेदनशील कवि भी थे। ताण्डव, प्रकाश जहां भी है, वेणुगीत, गीतों के अमलतास आदि उनके चर्चित काव्य संग्रह हैं। उन्होंने उपन्यास भी लिखे जिनमें अम्बपाली, जय वासुदेव और आकाश की कथा शामिल हैं।
डॉ. भगीरथ मिश्र

 लगभग 32 स्वतंत्र ग्रंथों और हिन्दी के दर्जनों ग्रंथों की प्राथमिक, समीक्षात्मक भूमिकाओं के लेखक डॉ भगीरथ प्रसाद मिश्र सागर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर, अध्यक्ष रहे। बाद में वे यहीं कुलपति भी रहे। उनका जन्म 1914 में कानपुर जिले के एक छोटे से गाँव ‘सैंथा’ में हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय से ‘हिन्दी काव्य-शास्त्र का इतिहास’ विषय में पी-एच.डी. डॉ. भगीरथ मिश्र की हिन्दी काव्यशास्त्र का इतिहास, काव्यशास्त्र, पाश्चात्य काव्यशास्त्र, तुलसी रसायन, काव्यरस चिन्तन और आस्वाद, भाषा-विवेचन, हिन्दी रीति साहित्य आदि उल्लेखनीय पुस्तकें  हैं। अनेक विद्वानों ने समय- समय पर अपने ज्ञान से इस विश्वविद्यालय को सिंचित किया।
       प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह भी वर्ष 1959 से 1960 तक सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में व्याख्याता के रूप में  कार्यरत रहे।
नामवर सिंह
वर्तमान में वरिष्ठ समालोचिक एवं साहित्यकार डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में विभाग का यशवर्धन करने हेतु संकल्पित हैं।

डॉ. विद्यावती "मालविका"

Sunday, August 19, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन -14 साहित्य साधिका डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. वर्षा सिंह
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है डॉ. (श्रीमती) विद्यावती "मालविका" पर आलेख, जो कि मेरे शहर सागर की वरिष्ठ कवयित्री एवं साहित्यकार होने के साथ ही मेरी माताश्री भी हैं । पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन
साहित्य साधिका डॉ. विद्यावती ‘मालविका’
- डॉ. वर्षा सिंह
- drvarshasingh1@gmail.com

डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ सागर नगर की एक ऐसी साहित्यकार हैं जिनका साहित्य-सृजन अनेक विधाओं, यथा- कहानी, एकांकी, नाटक एवं विविध विषयों पर शोध प्रबंध से ले कर कविता और गीत तक विस्तृत है। लेखन के साथ ही चित्रकारी के द्वारा भी उन्होंने अपनी मनोभिव्यक्ति प्रस्तुत की है। सन् 1928 की 13 मार्च को उज्जैन में जन्मीं डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ ने अपने जीवन के लगभग 6 दशक बुन्देलखण्ड में व्यतीत किए हैं, जिसमें 30 वर्ष से अधिक समय से वे मकरोनिया, सागर में निवासरत हैं। डॉ. ‘मालविका’ को अपने पिता संत ठाकुर श्यामचरण सिंह एवं माता श्रीमती सुमित्रा देवी "अमोला" से साहित्यिक संस्कार मिले। पिता संत श्यामचरण सिंह एक उत्कृष्ट साहित्यकार एवं गांधीवादी स्वतं़त्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अस्पृश्यता उन्मूलन एवं नशाबंदी में उल्लेखनीय योगदान दिया था। डॉ. विद्यावती अपने पिता के विचारों से अत्यंत प्रभावित रहीं और उन्होंने 12-13 वर्ष की आयु से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। बौद्ध धर्म एवं प्रणामी सम्प्रदाय पर उन्होने विशेष अध्ययन एवं लेखन किया।
Sagar Sahitya Chintan -14 Sahitya Sadhika Dr Vidyawati Malvika - Dr Varsha Singh

डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा। दो बेटियों के जन्म के कुछ समय बाद ही उन्हें वैधव्य का असीम दुख सहन करना पड़ा, किन्तु वे अपने कर्त्तव्य से विमुख नहीं हुईं। ससुराल पक्ष से कोई सहायता न मिलने पर उन्होंने शिक्षिका के रूप में आत्मनिर्भरतापूर्वक अपने वृद्ध पिता को सहारा दिया और अपने अनुज कमल सिंह को पढ़ा-लिखा कर योग्य बनाया जो कि आदिम जाति कल्याण विभाग मघ्यप्रदेश शासन के हायर सेकेंडरी स्कूल के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए। डॉ. विद्यावती ने अपने बलबूते पर अपनी दोनों पुत्रियों वर्षा सिंह और शरद सिंह का लालन-पालन कर उन्हें उच्च शिक्षित किया। उन्होंने व्याख्याता के रूप में मध्यप्रदेश शासन के शिक्षा विभाग में उज्जैन, रीवा एवं पन्ना आदि स्थानों में अपनी सेवाऐं दीं और सन् 1988 में सेवानिवृत्त हुईं। वे शासकीय सेवा के साथ ही लेखन एवं शोध कार्यां में सदैव संलग्न रहीं। स्वाध्याय से हिन्दी में एम.ए. करने के उपरांत सन् 1966 में आगरा विश्वविद्यालय से उन्होंने ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। पीएच.डी. में उनके शोध निर्देशक (गाइड) हिन्दी तथा बौद्ध दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान राहुल सांकृत्यायन एवं पाली भाषा तथा बौद्ध दर्शन के अध्येता डॉ. भिक्षु धर्मरक्षित थे। उनका यह शोध प्रबंध आज भी युवा शोधकर्ताओं के लिए दिशानिर्देशक का काम करता है। 




इनकी अब तक अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं जिनमें प्रमुख हैं - कामना, पूर्णिमा, बुद्ध अर्चना (कविता संग्रह) श्रद्धा के फूल, नारी हृदय (कहानी संग्रह), आदर्श बौद्ध महिलाएं, भगवान बुद्ध (जीवनी) बौद्ध कलाकृतियां (पुरातत्व), सौंदर्य और साधिकाएं (निबंध संग्रह), अर्चना (एकांकी संग्रह), मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव, महामति प्राणनाथ-एक युगान्तरकारी व्यक्तित्व (शोध ग्रंथ) आदि। ‘‘आदर्श बौद्ध महिलाएं’’ पुस्तक का बर्मी एवं नेपाली भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुआ।
Dr Vidyawati Malvika
डॉ. ‘मालविका’ को हिन्दी साहित्य सेवा के लिए अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए। जिनमें उल्लेखनीय हैं- सन् 1957 में स्वतंत्रता संग्राम शताब्दी सम्मान समारोह में मध्यप्रदेश शासन का साहित्य सृजन सम्मान, सन् 1958 में उत्तरप्रदेश शासन का कथा लेखन सम्मान, सन् 1959 में उत्तरप्रदेश शासन का जीवनी लेखन सम्मान, सन् 1964 में मध्यप्रदेश शासन का कथा साहित्य सम्मान, सन् 1966 में मध्यप्रदेश शासन का मीरा पुरस्कार प्रदान किया गया। सेवानिवृत्ति के बाद भी डॉ. विद्यावती ने अपना लेखन सतत् जारी रखा। उनके इस साहित्य के प्रति सर्मपण को देखते हुए उन्हें सन् 1998 में महारानी लक्ष्मीबाई शास. उ.मा. कन्या विद्यालय क्रमांक-एक, सागर द्वारा ‘‘वरिष्ठ साहित्यसेवी सम्मान’’, सन् 2000 में भारतय स्टेट बैंक सिविल लाइनस् शाखा सागर द्वारा ‘‘साहित्यसेवी सम्मान’’, वर्ष 2007 में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन सागर द्वारा ‘‘सुंदरबाई पन्नालाल रांधेलिया स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सम्मान’’ एवं सन् 2016 में हिन्दी दिवस पर श्यामलम् संस्था सागर द्वारा ‘‘आचार्य भगीरथ मिश्र हिन्दी साहित्य सम्मान’’ से सम्मानित किया गया। 




उल्लेखनीय है कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों में डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ का ससम्मान उल्लेख किया गया है, यथा :- मध्यभारत का इतिहास (चतुर्थ खंड), बुद्ध की देन, हिन्दी की महिला साहित्यकार , आधुनिक हिन्दी कवयित्रियों के प्रेमगीत, मध्यप्रदेश के साहित्यकार, रेत में कुछ चिन्ह, डॉ. ब्रजभूषण सिंह ‘आदर्श’ सम्मान ग्रंथ आदि। उनकी कुछ पुस्तकें इंटरनेट पर भी पढ़ी जा सकती हैं। नाट्यशोध संस्थान, कोलकता में उनका एकांकी संग्रह ‘‘’अर्चना’ संदर्भ ग्रंथ के रूप में पढ़ाया जाता है। इसी प्रकार नव नालंदा महाविहार, नालंदा, सम विश्वविद्यालय, बिहार के एम.ए. हिन्दी पाठ्यक्रम के चौथे प्रश्नपत्र बौद्ध धर्म- दर्शन और हिन्दी साहित्य के अंतर्गत ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ ग्रंथ पढ़ाया जाता है।



बुन्देलखण्ड पर विशेष लेखन कार्य करते हुए डॉ. विद्यावती ने ‘‘दैनिक भास्कर’’ के सागर संस्करण में वर्ष 1997-98 में सागर संभाग की कवयित्रियां शीर्षक धारावाहिक लेखमाला तथा वर्ष 1998-99 में बुंदेली शहीद महिलाओं पर आधारित ‘‘कलम आज उनकी जय बोल’’ शीर्षक धारावाहिक लेखमाला लिखी। इसके साथ ही दैनिक ‘‘आचरण’’ सागर में बुन्देली इतिहास, साहित्य, संस्कृति एवं वैभव से संबंधित अनेक लेख प्रकाशित हुए हैं। आकाशवाणी के इंदौर, उज्जैन, भोपाल एवं छतरपुर केन्द्रों से उनके रेडियो नाटकों का धारावाहिक प्रसारण किया जाता रहा है। उनकी कविताओं का नियमित रूप से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन होता रहा है। अपने बुजुर्गों से मिली साहित्य सृजन की इस परम्परा को डॉ. विद्यावती ने न केवल अपनाया अपितु अपनी दोनों पुत्रियों को भी साहित्यिक संस्कार दिए। उनकी बड़ी पुत्री (यानी मैं) डॉ. वर्षा सिंह हिन्दी गजल में एक विशेष स्थान बना चुकी हैं तथा छोटी पुत्री डॉ. (सुश्री) शरद सिंह उपन्यास एवं कथा लेखन के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित कर चुकी हैं।
डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ की कविताओं में मानवीय संवेगों की कोमल भावनाओं से ले कर वर्तमान की विषमताओं का चित्रण मिलता है। किसानों की पीड़ा और सूखे के संकट को बड़े ही सहज भाव से उन्होंने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है-
अब तो नभ में आओ बादल, धरती को नहला दो
प्यासी आंखें सूख चली है, बूंदों से सहला दो।
सूख रही है खेती, कृषक उदासे हैं
बंजर जीवन में, स्वप्न जरा से हैं
रिमझिम के स्वर से ,अब तो बहला दो।
हमने त्रुटियां की हैं, काटे पेड़ निरंतर
हमने ही तो मौसम में, लाया है अंतर
तुम दयालु हो, गलती तो झुठला दो।
ग्लोबल वार्मिंग और जल संरक्षण पर उनकी ये पंक्तियां देखिए-
तप रही धरती से, मानव
क्यों नहीं है सीख लेता
सूखती नदियां, कुओं को
काश ! संरक्षण तो देता
उनके कविता संग्रह ‘कामना’ में प्रकृति को बड़े ही सुंदर ढंग से वर्णित करती यह कविता प्रसाद-शैली का समरण कराती है-
समयचक्र चलता रहता है....
नीरव नीले अंबर में, सखि, शुभ्र चंद्र मुस्काता है
सरिताओं के चंचल जल में नव-नव खेल रचाता है
फिर भी रजनी का आंसू
ओस बना पड़ता रहता है.....
वर्तमान में शांति विहार कालोनी, मकरोनिया में निवासरत् डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ 90 वर्ष की आयु में भी सतत् अध्ययन और लेखन कार्य कर रही हैं।
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( दैनिक, आचरण दि. 05.06.2018)
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