Wednesday, October 10, 2018

जीवेत् शरदः शतम् - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh
  शारदीय  नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं   
  🙏 🌺🙏
      सागर शहर के सिद्ध क्षेत्र मां हरसिद्धि देवी बाघराज मंदिर परिसर में पूरे वर्ष भर अनेक मांगलिक कार्य सम्पन्न होते हैं। पिछले दिनों 02 अक्टूबर 2018 को बाघराज मंदिर परिसर में स्थित सिद्ध हनुमान मंदिर प्रांगण में सागर शहर के समस्त साहित्यकारों, कवियों, बुद्धिजीवियों ने मिल कर वरिष्ठ कवि मणिकांत चौबे "बेलिहाज" जी का 73 वां जन्मदिन समारोहपूर्वक मनाया। मैंने यानी आपकी इस मित्र डॉ. वर्षा सिंह और डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने भी इस गरिमामय आयोजन में सम्मिलित हो कर "बेलिहाज" जी को अपनी आत्मीय शुभकामनाएं दीं।
हरसिद्धि देवी, बाघराज, सागर, म.प्र.
 यह माना जाता है कि भारतीय दर्शन और साहित्य का आरंभ वेदों से हुआ है। वेद भारतीय धर्म, दर्शन, संस्कृति, साहित्य आदि के मूल स्रोत हैं। वर्तमान समय में भी धार्मिक और सांस्कृतिक कृत्यों के अवसर पर वेद-मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।  वेद अनेक दर्शन और सम्प्रदाय का आधार हैं। वेद को हम दर्शन के चिंतन से उपजे काव्य साहित्य का संकलन हैं। उनमें प्राचीन भारतीय परिवेश के अनेक विषयों का समावेश है। अधिकांश भारतीय दर्शन वेदों को अपना आदिस्त्रोत मानते हैं। ये "आस्तिक दर्शन" कहलाते हैं। प्रसिद्ध षड्दर्शन इन्हीं के अंतर्गत हैं। जो दर्शनसंप्रदाय अपने को वैदिक परंपरा से स्वतंत्र मानते हैं वे भी कुछ सीमा तक वैदिक विचारधाराओं से प्रभावित हैं।वेद के 04 भाग हैं- ऋगवेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
ऋग्वेद चारों वेदों में सबसे प्राचीन माना जाता है। यजुर्वेद में गद्य और पद्य दोनों ही हैं। इसमें यज्ञ कर्म की प्रधानता है। सामवेद गेय ग्रन्थ है। अथर्ववेद में गणित, विज्ञान, आयुर्वेद, समाज शास्त्र, कृषि विज्ञान, आदि अनेक विषय वर्णित हैं।
           भारतीय परम्परा के अनुसार जन्मदिन की शुभकामनाएं देते हुए "जीवेत् शरदः शतम् " की कामना की जाती है। वस्तुतः "जीवेम शरदः शतम्" अथर्ववेद का एक सूक्त है जिसमें मानव के सम्पूर्ण शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य सहित उसके दीर्घायु होने की कामना व्यक्त की गयी है । वस्तुतः यह सूक्त आठ मंत्रों का समुच्चय है, जो इस प्रकार हैं :-
पश्येम शरदः शतम् 
जीवेम शरदः शतम् 
बुद्धियेम शरदः शतम्
रोहेम शरदः शतम् 
पूषेम शरदः शतम् 
भवेम शरदः शतम् 
भूयेम शरदः शतम् 
भूयसीः शरदः शतम्
              (अथर्ववेद, काण्ड 19, सूक्त 67)



इन सूक्तों का अर्थ है – 
हम सौ शरदों तक अपनी दृष्टि से देखें,
सौ वर्षों तक हम जीवित रहें ,
सौ वर्षों तक बुद्धि से सक्षम बने रहें, 
सौ वर्षों तक वृद्धि करते रहें, 
सौ वर्षों तक पुष्टि प्राप्त करते रहें, 
सौ वर्षों तक बने रहें,
सौ वर्षों तक हम कुत्सित भावनाओं से मुक्त हो कर पवित्र बने रहें,  
सौ वर्षों से अधिक समय तक कल्याण होता रहे

           यहां शरद् शब्द ऋतु के साथ एक वर्ष का पर्याय है। इस सूक्त में एक शरद् का अर्थ एक वर्ष लिया गया है । षट ऋतुओं में शरद ऋतु का विशेष महत्व है। यह शरद  ऋतु पांच अन्य ऋतुओं के परिवर्तन समय में संधिकाल की ऋतु है। भारतीय कलैंडर में चैत्र एवं वैशाख मास में वसन्त,  ज्येष्ठ तथा आषाढ़ मास में ग्रीष्म,  श्रावण एवं भाद्रपद मास में वर्षा ऋतु , आश्विन तथा कार्तिक मास में शरद, मार्गशीर्ष एवं पौष मास में हेमन्त और माघ तथा फाल्गुन मास में शिशिर ऋतु होती है।
             दरअसल वैदिक काल में व्यक्ति लगभग सौ वर्ष की आयु से अधिक समय तक जीवित रहते थे। इसीलिए सौ वर्ष की आयु की कामना व्यक्त की गयी है, वह भी पूर्ण दैहिक और मानसिक स्वास्थ्य के साथ । इस सूक्त में पूर्ण स्वास्थ्य के साथ सौ वर्ष का सक्षम एवं सक्रिय इंद्रियों के साथ जीवन जीने की शुभकामनाएं व्यक्त की गई हैं।

         शरद ऋतु और देवी की आराधना पर्व नवरात्रि का भी आपसी संबंध है। ऋतु संधिकाल  में देवी उपासना उपवास और ध्यान के जरिये की जाती है। देवी उपासना के स्थल बाघराज मंदिर की अपनी ही विशेषता है। सागर शहर के मध्य से 03 कि.मी. दक्षिण दिशा में एक छोटी पहाड़ी पर मां हरसिद्धि देवी बाघराज मंदिर है। जनश्रुतियों के अनुसार 1600 ई. के आसपास इस घने जंगल से निकलने वाले एक मजदूर को देवी स्वरुप एक कन्या पहाड़ी के नीचे मिली। मजदूर इस बात से आश्चर्यचकित रह गया कि इस घने जंगल में लोग आने से डरते है, यह लड़की यहां क्या कर रही है। इसी बीच लड़की के कहने पर मजदूर उसे कंधे पर उठाकर पहाड़ी पर ले गया। मजदूर ने जैसे ही उस लड़की को कंधे से नीचे उतारा वह मूर्ति में परिवर्तित हो गई।
हरसिद्धि देवी, बाघराज, सागर

मां हरसिद्धि देवी, बाघराज देवी मंदिर, सागर

सिद्ध हनुमान, बाघराज देवी मंदिर

हरसिद्धि देवी बाघराज मंदिर, सागर
इसके अलावा यहां ऐसी कहावत भी प्रचलित है कि मंदिर में बनी एक गुफा में शेर रहता था जो माता हरसिद्धि देवी का पूजन करने मंदिर में आता था, इसलिये यह क्षेत्र बाघराज के नाम से विख्यात हो गया।




            चैत्र तथा आश्विन यानी क्वांर माह की नवरात्रि में यहाँ दुर्गा माँ की विशेष पूजा की जाती है तथा मेले का आयोजन किया जाता है। बाघराज में देवी मन्दिर के अलावा हनुमान मन्दिर , शिव मन्दिर तथा भैरव बाबा मन्दिर भी हैं।





Tuesday, October 9, 2018

पाठक मंच : भावनाओं के नये मुहावरे गढ़ती हैं मदनमोहन उपाध्याय की कविताएं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
साहित्य अकादमी म.प्र. संस्कृति परिषद की स्थानीय इकाई सागर पाठकमंच की 65 वीं गोष्ठी में मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह  मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुई। दिनांक 07.10.2018 को आयोजित इस गोष्ठी में कवि मदनमोहन उपाध्याय के कविता संग्रह 'खुशियों के रंग' पर समीक्षा पाठ एवं चर्चा की गई। गोष्ठी में पाठक मंच इकाई के केंद्र संयोजक उमाकांत मिश्र, लेखिका एवं समाजसेवी डॉ. (सुश्री) शरद सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित थे।
 इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मेरे द्वारा दिए गए उद्बोधन के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं-   काव्य साहित्य की वह विधा है जिससे मनुष्य सबसे पहले जुड़ता है। मां की लोरी के रूप में काव्य की है जो सबसे पहले मनुष्य को साहित्यिक स्पर्श देता है।  काव्य छंदबद्ध हो सकता है और छंदमुक्त भी। यह भ्रम प्रचलित है कि छंदमुक्त विधा पश्चिमी साहित्य से हिन्दी में आईं किन्तु यदि हमारे पौराणिक ग्रंथों को देखा जाए तो अनेक ग्रंथ ऐसे मिल जाएंगे जिनमें छंदमुक्त कविताएं लिखी गई हैं।  छंदमुक्त कविताओं के भी अपने नियम-क़ायदे होते हैं। गद्य वाक्यों को तोड़-तोड़ कर एक के नीचे एक लिख देने से कविता नहीं बन जाती है। कविता चाहे छंदबद्ध हो या फिर छंदमुक्त एक प्रवाह की मांग करती है। छंदमुक्त कविताओं में भी एक रसात्मकता होनी चाहिए। ऐसा प्रवाह, ऐसी रसात्मकता कि जब कोई उसे कविता को पढ़े या सुने तो उसके भावों के साथ बह निकले। 
 14वीं शताब्दी के संस्कृत काव्य शास्त्र के प्रकांड विद्वान हुए आचार्य  विश्वनाथ। जिनका पूरा नाम था आचार्य विश्वनाथ महापात्र। इन्हें अलाउद्दीन खिलजी का समकालीन माना जाता है। आचार्य विश्वनाथ ने आचार्य मम्मट के ग्रंथ ‘काव्य प्रकाश’ की “काव्यप्रकाश दर्पण“ के नाम से टीका भी की है जिसका नाम है। आचार्य विश्वनाथ ने काव्य के संबंध में कहा है कि - “रसात्मकं वाक्यं काव्यम्“ अर्थात् रसात्मक वाक्य ही काव्य है।  जिसमें रसबोध न हो वह काव्य हो ही नहीं सकता है। फ्रीवर्स यानी छंदमुक्त कविताओं की संरचना के बारे में वर्डवर्थ्स ने बहुत अच्छा उदाहरण दिया है कि ‘‘छंदमुक्त या अतुकांत कविता स्थिर पानी में टपकने वाली उस बूंद के समान होनी चाहिए जो भावनाओं की वर्तुल लहरें पैदा कर सकें।’’  छंदमुक्त कविता नारेबाजी नहीं होनी चाहिए और न गद्य को तोड़-मरोड़ कर लिखे गए आधे-अधूरे वाक्य। जिसमें छंद न हो ऐसी कविताएं और अधिक श्रम की मांग करती हैं रसमय होने के लिए।         

     
कवि मदनमोहन उपाध्याय  'साहिल' तख़ल्लुस से गीत, ग़ज़ल व कविताएँ लिखते हैं I ‘खुशियों के रंग' पुस्तक का नाम ही इस बात का संकेत दे रहा है कि इसमें संग्रहीत कविताएं मन में खुशियों का संचार करने में सक्षम हैं। 
 इस पुस्तक में जो कविताएं हैं उनमें कवि के लगभग 30 वर्ष के अनुभवों का निचोड़ है। ये अनुभव प्रकृति के हैं, साहित्य की विडम्बनाओं के है और प्रेम के अटूट विश्वास के हैं।' जी की कविताएं ज़िन्दगी से संवाद करने में पूर्ण सक्षम हैं।
चूंकि कवि के इससे पहले दो ग़ज़ल संग्रह आ चुके हैं अतः यह माना जा सकता है कि छंद का अनुशासन वे जानते हैं। उनकी कविताओं में उर्दू , अरबी, फारसी के शब्दों की बहुलता भी स्वाभाविक रूप से मौजूद है। 

‘‘रण दुदुंभी बज उठी, गगन में
आज हवा तूफानी है,
जाग उठा हर हिन्दुस्तानी
अब कीमत पहचानी हैं।’’
ये पक्तियां वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मदनमोहन उपाध्याय की।
मदनमोहन उपाध्याय सेंट स्टीफन्स कॉलेज दिल्ली से बी.एस-सी. आनर्स की डिग्री लेने के बाद भारतीय वन सेवा में 1978 से 1980 तक रहे। फिर 1980 में इंडियन रेलवे ट्रेफिक सर्विस में आ गये। इसके बाद 1981 में आईएएस में चयन हो गया। तब से वे मध्यप्रदेश प्रशासनिक सेवा के उच्चतम पदों पर कार्यरत रहे।
मदनमोहन उपाध्याय
"खुशियों के रंग" छंद मुक्त कविताओं का एक ऐसा संग्रह है जिसमें कवि मदनमोहन उपाध्याय ने अपने जीवन के लगभग 30 वर्ष के अनुभवों को कविता के रूप ढाला है। इन अनुभवों में प्राकृतिक सौंदर्य से जुड़ाव, साहित्य की विडंबनाओं, परम्पराओं का टूटना-बिखरना और इन सबके साथ शाश्वत प्रेम के प्रति अटूट विश्वास मदनमोहन की कविताओं को विशिष्ट बनाता है।


"खुशियों के रंग" में संग्रहीत कविताओं में ज़िन्दगी से सम्वाद करने की पूर्ण क्षमता है और ये कविताएं इन्हें पढ़ने वालों को एक अलग ही धरातल पर ले जाती हैं।
   


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https://www.bhaskar.com/mp/sagar/news/poems-of-the-colors-of-happiness-dr-varsh-singh-045036-2924339.html

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Thursday, October 4, 2018

बुद्धि के देवता गणेश और दैनिक भास्कर पुरस्कार 2018

Dr. Varsha Singh
बुद्धि के देवता गणेश और साहित्य का गहन संबंध है। इस संबंध को दर्शाने वाली अनेक पौराणिक कथाएं वैदिक साहित्य में उपलब्ध हैं। महर्षि वेद-व्यास को जब "महाभारत" की कथा को लिपिबद्ध करने का विचार आया तो आदि देव ब्रह्माजी ने परम विद्वान श्रीगणेश के नाम का प्रस्ताव रखा।इस पर उनके द्वारा यह शर्त रखी गई कि वे कथा तब लिखेंगे, जब लेखन के समय उनकी लेखनी को विराम न करना पड़े। इससे पूर्व परम्परागत पद्धति से कंठस्थ किया जाता था परन्तु "जय संहिता" जो "महाभारत" कहलाई, प्रथम लिपिबद्ध कथा है अतः स्पष्ट है कि आर्य साहित्य में लेखन की परम्परा के प्रारम्भकर्ता पार्वतीपुत्र ही हैं।

      पूरे भारत देश को एक सूत्र में बांधने वाला एकमात्र उत्सव गणेश उत्सव है, जो राष्ट्रीय एकता का ज्वलंत प्रतीक है। गणेश उत्सव का ऐतिहासिक महत्व है। सातवाहन और चालुक्य वंश के शासन काल से गणेश पूजन चलता आ रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने राष्ट्रीय संस्कृति और एकता को बढ़ावा देने के लिए गणेश उत्सव शुरू किया था। 
        दैनिक भास्कर समाचार पत्र सिर्फ एक समचार पत्र ही नहीं, वरन् समाज की, देश की बेहतरी के लिये प्रतिबद्ध एक ऐसा उत्प्रेरक है, जो अपनी सोच, अपनी मुहिम के जरिए नित नये संकल्प के साथ नित नये उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्लास्टर ऑफ पेरिस से गणेश प्रतिमा निर्माण के स्थान पर दैनिक भास्कर समूह कई वर्षों से 'मिट्टी के गणेश-घर में ही विसर्जन' अभियान चला रहा है। इसका मूल उद्देश्य यही है कि हम अपने तालाब और नदियों को प्रदूषित होने से बचा सकें। इसलिए घर या कॉलोनी में कुंड बनाकर विसर्जन करने और उस पवित्र मिट्टी में एक पौधा लगाने हेतु जनमानस को प्रेरित किया था। इससे न सिर्फ ईश्वर का आशीर्वाद, बल्कि उनकी याद भी साल दर साल घर-आंगन में महकती रहेगी। यह पौधा बड़ा होकर पर्यावरण में योगदान देगा। साथ ही घर में नई समृद्ध परंपरा का संचार होगा। हानिकारिक पीओपी की बजाय लोग ईको फ्रेंडली तरीके से मिट्टी के गणेश की प्रतिमा को प्राथमिकता देने लगे हैं।

इस वर्ष गांधी जयंती यानी 02.10.2018 को " दैनिक भास्कर" के सागर संस्करण द्वारा शहर में विगत गणेशोत्सव के दौरान मिट्टी से निर्मित चयनित श्रेष्ठ प्रतिमाओं को पुरस्कृत किया गया।


इस पुरस्कार वितरण समारोह में मेरे सहित मेरी बहन  डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, माननीय सागर विधायक शैलेन्द्र जैन , नगरनिगम सागर के महापौर अभय दरे, प्रतिष्ठित बिल्डर प्रकाश चौबे, दैनिक भास्कर के संपादक अनिल कर्मा, यूनिट हेड अनिल खरे आदि उपस्थित थे। आपकी इस मित्र डॉ. वर्षा सिंह को यानी मुझे भी दैनिक भास्कर की ओर से स्मृतिचिह्न प्रदान किया गया।




Wednesday, October 3, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 30 - विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी : कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के वरिष्ठ कवि मणिकांत चौबे 'बेलिहाज' पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....
 
सागर : साहित्य एवं चिंतन

विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी : कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज
                  - डॉ. वर्षा सिंह
                           
परिचय :- मणिकांत चौबे
जन्म   :- 02 अक्टूबर 1946
जन्म स्थान :- सागर (म.प्र.)
शिक्षा :- मैट्रिक एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलन की परीक्षाएं उत्तीर्ण
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य

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सागर नगर में स्व.श्री जे.पी. चौबे एवं श्रीमती भगवती चौबे के पुत्र मणिकांत चौबे स्पष्टवादी व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। संभवतः अपने इसी स्वाभाव के कारण उन्होंने अपना उपनाम रखा ‘बेलिहाज बुन्देलखंडी’। मित्रों और परिचितों के बीच वे ‘बेलिहाज’ उपनाम से ही पुकारे जाते हैं। एक कहावत है कि जो स्पष्टवक्ता होता है, वह दिल का भी साफ होता है। यह कहावत मणिकांत बेलिहाज पर खरी उतरती है। उनके बारे में यह प्रचलित है कि वे राजनीति में भी रुचि रखते हैं किन्तु किसी सं झूठे वादे नहीं करते हैं। जो काम उनके वश में होता है उसी के लिए वे हामी भरते हैं, अन्यथा तत्काल साफ मना कर देते हैं। उनके इस तरह काम करने से मना करने पर सामने वाले व्यक्ति को भले ही दो पल के लिए बुरा लगे किन्तु बाद में वह इस बात के लिए उन्हें धन्यवाद देता है कि उन्होंने उसे भुलावे में नहीं रखा। उनका यह स्वभाव कवि मणिकांत चौबे को एक विशिष्ट व्यक्ति बनाता है। जिंदादिल, हंसमुंख और कर्मठता - ये तीनों गुण भी उनमें मौजूद हैं।
मणिकांत चौबे ‘बेलिहाज’ नगर की विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की सागर जिला इकाई के महामंत्री हैं। बुंदेलखंड हिन्दी साहित्य संस्कृति विकास मंच के संयोजक महामंत्री हैं तथा हिन्दी उर्दू साहित्यकार मंच के भी संयोजक हैं। तरुण साहित्य एवं सांस्कृतिक मिलन संस्था जबलपुर की सागर इकाई के महासचिव हैं। इन संस्थाओं के अतिरिक्त बज़्में दाग़, नगर साहित्यकार समिति, कलमकार परिषद् भोपाल की सागर इकाई, सरस्वती नाट्यमंच, विद्यापुरम साहित्यकार समिति के भी सक्रिय पदाधिकारी हैं। मणिकांत चौबे वरिष्ठ नागरिक मंडल, सागर के सचिव तथा संस्कृत महाविद्यालय, धर्मश्री सागर के उपाध्यक्ष हैं।
बायें से :- डॉ. वर्षा सिंह, भावुक जी, पूरन सिंह राजपूत एवं मणिकांत चौबे 'बेलिहाज'
गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में अपनी कलम चलाने वाले कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज एक बेहतरीन कार्यक्रम एवं मंच संचालक के रूप में भी जाने जाते हैं। उललेखनीय है कि लगभग पांच हजार आयोजनों का वे सफल मंच संचालन कर चुके हैं। साहित्य के क्षेत्र में विगत 32 वर्ष से सक्रिय रहते हुए उन्होंने हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी भाषा के लिए कार्यशालाएं आयोजित की हैं। एकता, सद्भावना एवं सहभागिता के उद्देश्य को ले कर विगत 25 वर्ष से गोष्ठियों का निरंतर आयोजन कर रहे हैं। सन् 1993 से राष्ट्रीय एकता को आधार बना कर कविता पोस्टर प्रदर्शिनी का आयोजन भी उनकी साहित्य सेवा का उल्लेखनीय अवदान है। वैसे अब तक वे आठ नगर स्तरीय, तीन जिला स्तरीय, आठ संभाग स्तरीय एवं एक प्रांतीय स्तर की कार्यशालाएं करा चुके हैं। इसी क्रम में उनकी भावी योजना है कि प्रतिभावान युवाओं के लिए लेखन शिविरों का आयोजन एवं रंगमंच की स्थापना की जाए। मणिकांत चौबे ‘बेलिहाज’ साम्प्रदायिकता एवं धार्मिक संकीर्णता के कट्टर विरोधी हैं। उनके उद्बोधन एवं लेखन में संकीर्णतावादियों के प्रति फटकार स्पष्टरूप से सुनी-देखी जा सकती है। सागर साहित्यकार मंच के संयोजक पद पर रहते हुए उन्होने सन् 1984 के दंगों के दौरान अपने साहित्यकार साथियों को साथ ले कर धार्मिक वैमनस्य को दूर करने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों का दौरा कर के सौहार्द्य का संदेश देने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। समाज की सुख-शांति के लिए वे कौमी एकता एवं अखण्डता को वे आवश्यक मानते हैं।
साहित्य एवं चिंतन - डॉ. वर्षा सिंह
स्वाध्याय एवं जीवनानुभवों से विपुल व्यावहारिक ज्ञान अर्जित करने वाले कवि बेलिहाज को प्रदेश एवं देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मान एवं मानद उपाधियां प्रदान की जा चुकी हैं। जिनमें प्रमुख हैं- राजस्थान के भवानीगंज, कोटा तथा रामगंज में सम्मानित, गोंदिया महाराष्ट्र में सम्मानए जबलपुर साहित्यकार मंच द्वारा यश सम्मान, ग्रामश्री साहित्य परिषद ढाना द्वारा साहित्य मार्तंड की मानद उपाधि, युवा प्रगति मंच द्वारा बुंदेलखंड रत्न उपाधि, अखिल भारतीय हास्य हंगामा द्वारा हिंदी उन नायक उपाधि, सर्व ब्राम्हण सभा द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सेवा सम्मान, दिनकरराव स्मृति समिति द्वारा दिनकर सम्मान, सागर हरीश स्मृति समिति खुरई द्वारा हरीश सम्मान, विगत 35 वर्षों से कौमी एकता के लिए सक्रिय संस्था ईद दिवाली मिलन एकता समिति सागर द्वारा सम्मानित, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा साहित्य सेवा के लिए सम्मान, हिंदी साहित्य सम्मेलन इकाई पन्ना द्वारा बुंदेली रत्न सम्मान, विधायक सागर द्वारा साहित्यिक सम्मान, सागर की साहित्य एवं सामाजिक सम्मान समिति द्वारा सम्मानित, पूर्व सांसद उद्योगपति श्री डालचंद जैन द्वारा दाजी सम्मान, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति सागर द्वारा सम्मानित, श्रमण साहित्यकार परिषद सागर द्वारा सम्मानित, सरस्वती पुस्तकालय एवं वाचनालय समिति द्वारा प्रशस्ति पत्र एवं सम्मान कलमकार परिषद भोपाल की सागर इकाई द्वारा सम्मानित। पीली कोठी ट्रस्ट प्रियदर्शनी कला संगम समिति गौर स्मृति संगठन दिगंबर जैन युवा उत्सव समिति राहतगढ़ खुरई द्वारा प्रशस्ति पत्र एवं सम्मानित खादी ग्राम उद्योग के प्रदेश प्रदर्शनी में सम्मानित रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा वरिष्ठ नागरिक सम्मान तुलसी साहित्य सम्मान टीकमगढ़ सामूहिक क्षमा वाणी पर्व पर विधायक शैलेंद्र जैन द्वारा सम्मान अनेक संस्थाओं द्वारा सामाजिक सरोकारों के लिए तथा साहित्य क्षेत्र में प्रदेश के बाहर सम्मानित एवं पुरस्कृत।
कवि बेलिहाज की रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी केंद्र सागर एवं छतरपुर से होता रहता है तथा दूरदर्शन भोपाल से भी उनकी कविताओं का प्रसारण हुआ है। सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत उनकी यह कविता देखिए -
सुबह की कोमल सी /भुर-भूरी धूप आती है
कर्म का, संघर्ष का /संदेश लाती है
हमें काम से लगाती है /फिर चढ़े हुए दिन की
तपी हुई धूप याद कराती है


वर्तमान में जिस प्रकार संवादहीनता का फैलाव होता जा रहा है कवि बेलिहाज उसका विरोध करते हुए परस्पर संवाद का अह्वान करते हैं-

आओ साथ साथ बैठे /मन की कहे सुने
जिंदगी के मैदान में /सांसो को चलने दो
उहापोह भागम भाग /निरंतर चलने का क्रम
मिलने बिछड़ने का ढंग /नित्य का उपक्रम
निर्बाध गति से चलने दो /आशा निराशा उपलब्धियां
मन को बांधते तोड़ते /क्रमबद्ध सुख दुख से
काल गति चक्र को चलने दो

उपभोक्तावाद ने स्वार्थपरता का स्तर इतना अधिक बढ़ा दिया है कि मनुष्य अपने वास्तविक चरित्र और गुणों को भूलता जा रहा है। बनावटीपन के मुखौटे ने उसके चेहरे को ढांक लिया हैं। इस दुरावस्था की ओर संकेत करते हुए कवि मणिकांत बेलिहाज कहते हैं-‘अंधेरा बहुत गहरा है‘ -

चिंतन का विषय/कौन करे रखवाली
निःशब्द शून्य का बसेरा है /चरित्र व्यवहार अब
चकित करता परिवर्तन /घटनाओं की निरंतरता
रोज रोज का परिवर्द्धन /हृदय व्यथित करता
अदृश्य पर क्रंदन /किसका नाम ले
धमाके दे दना दन /हर पल डरा सहमा है
’बेलिहाज’ हर कान बहरा है
अंधेरा बहुत गहरा है।

जब अंधेरा गहरा हो तो चिंता के कारण नींद नहीं आना स्वाभाविक है। कवि बेलिहाज की ‘जाग जाता हूं’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां देखिए-

हां, मैं कभी कभी
सोते-सोते जाग जाता हूं
अनगिनत अनसुलझे प्रश्न /अपने सामने पाता हूं
कई बार सोने का यत्न करता /पर हर बार हारा हूं

मणिकांत बेलिहाज ने दोहों के रूप में छंदबद्ध काव्य सृजन भी किया है। ऋतुओं पर केंद्रित उनकी कविताएं मात्र ऋतु वर्णन न होकर पर्यावरण से भी संबंध रखती है। उनकी इस प्रकार की कविताएं पर्यावरण असंतुलन की ओर संकेत करते हुए चिंता प्रकट करती है -

निष्ठुर गर्मी ले गई हरी-भरी सब छांव।
हर प्राणी को चाहिए बरगद जैसी ठांव ।।
बरखा ने आकर किया जीवन का संचार ।
धरती ने भी दे दिया अपना खूब दुलार ।।
डॉ. वर्षा सिंह एवं डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के साथ अपने जन्मदिन के अवसर पर कवि मणिकांंत चौबे 'बेलिहाज'

मणिकांत चौबे की रचनाओं में जो सामाजिक सरोकार उभर कर सामने आते हैं वे सभी समाज और आमजन के जीवन के उन्नयन की आकांक्षा से भरे पूरे हैं। कवि बेलिहाज चाहते हैं की समाज का हर वर्ग, हर तत्व सुख समृद्धि और परस्पर मेलजोल से रहे। यही अभिलाषा उनकी कविताओं में दिखाई देती है। मणिकांत बेलिहाज वर्तमान उपभोक्तावाद का समाज पर जो प्रभाव पड़ रहा है उससे भी चिंतित दिखाई देते हैं उनके अनुसार समाज तभी बहुमुखी विकास कर सकता है जब एक स्वस्थ वातावरण निर्मित हो आतंकवाद व्यभिचार अपराध आदि समाप्त हो जाए तभी एक सुंदर समाज की रचना हो सकती है कवि मणिकांत पर लिहाज ना केवल एक कवि है वरन एक जागरूक नागरिक की भांति समाज और देश का भला चाहते हैं,उनका यही विचार उनकी कविताओं को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बनाता हैं कवि मणिकांत चौबे ‘बेलिहाज’ ने अपने श्रम से साहित्यिक गतिविधियों को जिस प्रकार संचालित और संगठित किया है वह युवाओं के लिए अनुकरणीय है।         
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( दैनिक, आचरण  दि. 03.10.2018)
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Monday, October 1, 2018

“ऑफ द स्क्रीन” की चर्चा “ऑन द डायस” - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (वर्तमान में केन्द्रीय वि.वि. ) से पत्रकारिता की डिग्री लेकर दिल्ली में अख़बारों और टीवी प्रॉडक्शन हॉउस तक का सफ़र तय करने वाले मध्यप्रदेश के करेली निवासी जुझारू पत्रकार और वर्तमान में एबीपी न्यूज़ भोपाल में वरिष्ठ विशेष संवाददाता ब्रजेश राजपूत की पुस्तक “ऑफ द स्क्रीन” पर कल शाम दिनांक 30 सितम्बर 2018 को सागर के स्थानीय रवीन्द्र भवन सभागार में आयोजित चर्चा बहुत सार्थक रही।
"ऑफ द स्क्रीन" लेखक ब्रजेश राजपूत

ब्रजेश ने चुनाव रिपोर्टिंग पर अपनी पहली किताब “चुनाव, राजनीति और रिपोर्टिंग - मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2013” के बाद टीवी पर आधारित अपनी ताज़ा किताब “ऑफ द स्क्रीन” की चर्चा “ऑन द डायस” करते हुए किताब को लिखने का मकसद यही बताया कि उन्होंने यह किताब को लिखना इसलिये ज़रूरी समझा कि लोग टीवी रिपोर्टिंग के पीछे छिपी दुश्वारियों को समझ सकें. यहां यह भी बता दूं कि ब्रजेश टीवी न्यूज़ चैनल्स के कन्टेन्ट अनालिसिस पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से पीएच.डी. भी कर चुके हैं।
डॉ. वर्षा सिंह, ब्रजेश राजपूत एवं डॉ.(सुश्री) शरद सिंह




ब्रजेश राजपूत
    यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा कि इसमें लेखक स्वयं ब्रजेश राजपूत तो उपस्थित थे ही, उनके साथ एन.डी.टी.वी. के मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के प्रमुख, निर्भीक पत्रकारिता के पर्याय अनुराग द्वारी भी मौज़ूद थे। ब्रजेश तथा अनुराग, इन पत्रकारद्वय का सारगर्भित उद्बोधन दिलचस्प रहा।

अनुराग द्वारी




इस गरिमामय आयोजन की सार्थकता का अनुभव मैंने यानी डॉ. वर्षा सिंह और मेरी अनुजा डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, जो स्त्री विमर्श की लेखिका एवं दिल्ली से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका “सामयिक सरस्वती” की कार्यकारी सम्पादक हैं,  ने वहां उपस्थित रह कर किया। सागर शहर की अग्रणी साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था बुनियाद सांस्कृतिक समिति तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष स्थान रखने वाले बुंदेलखंड प्रेस क्लब, सागर के इस संयुक्त एवं भव्य आयोजन को शहर का बुद्धिजीवी वर्ग निःसंदेह बहुत दिनों तक याद रखेगा।
Off The Screen- A book by Brajesh Rajput