Monday, October 14, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 66 ... एक संवेदनशील लेखिका देवकी भट्ट नायक दीपा - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की लेखिका देवकी नायक भट्ट दीपा पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

      एक संवेदनशील लेखिका  देवकी भट्ट नायक दीपा
                            - डाॅ. वर्षा सिंह

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       परिचय:- देवकी भट्ट नायक दीपा
       जन्म:-   27 दिसंबर 1964
       जन्म स्थान:- पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)
       माता-पिता:- स्व. कमला देवी भट्ट एवं स्व.रूद्र दत्त भट्ट
      शिक्षा:- हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य तथा अर्थशास्त्र में एम.ए. पत्रकारिता में डिप्लोमा
लेखन विधा:- गद्य, पद्य
प्रकाशन:- पत्र, पत्रिकाओं में
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        लेखन के क्षेत्र में महिलाओं की दस्तक पिछली सदी से ही पड़नी शुरू हो गई थी। वे साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने लगी थीं। सागर में भी लेखिकाओं ने अपनी लेखनी को साबित करने का हरसंभव प्रयास किया है। देवकी भट्ट नायक दीपा सागर नगर की एक ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने प्रचुरता से तो नहीं लिखा है किन्तु उनका लेखन अनदेखा नहीं किया जा सकता है। देवकी भट्ट नायक दीपा का जन्म 27 दिसंबर 1964 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ नामक जिले में हुआ था। वे अपने नाम के संबंध में बताती हैं कि विवाह पूर्व उनका नाम देवकी भट्ट था तथा विवाहोपरांत ‘नायक’ सरनेम जुड़ा। जब वे लेखन के क्षेत्र में प्रविष्ट हुईं तो उन्होंने ‘दीपा भट्ट’ के नाम से भी रचनाएं लिखीं। देवकी भट्ट नायक दीपा के पिता स्वर्गीय रूद्रदत्त भट्ट  भारतीय सेना में आनरेरी कैप्टन थे एवं माता स्वर्गीय कमला देवी गृहणी थीं। देवकी भट्ट ने और हिंदी साहित्य अंग्रेजी साहित्य तथा अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है उन्होंने पत्रकारिता मे डिप्लोमा कोर्स भी किया। उनकी रचनाओं का प्रकाशन दैनिक नवदुनिया, नारी संबल, आचरण, नाइस डे, अबला नहीं नारी, साहित्य सरस्वती आदि पत्र-पत्रिकाओं में हो चुका है। इनकी कविताओं और कहानियों का प्रसारण आकाशवाणी सागर तथा भोपाल दूरदर्शन से भी हुआ है। साहित्यिक गोष्ठियों में कहानी एवं कविता का पाठ कर चुकी हैं। महिला सशक्तिकरण में विश्वास रखने वाली देवकी भट्ट नायक ने रुद्र कमला महिला एवं बाल विकास समिति के माध्यम से गरीब और श्रमिक महिलाओं के बीच कई कार्य किए हैं। भारतीय महिला फेडरेशन की संयोजक होने के साथ ही महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सागर मध्य प्रदेश में शिक्षक हैं। उल्लेखनीय है कि जहां उत्कृष्ट सेवा कार्यों के लिए राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है।
         देवकी भट्ट नायक दीपा ने कहानियां भी लिखी हैं और कविताएं भी। उनकी कविता में स्त्री के रोजमर्रा के जीवन के अनेक दृश्य दिखाई देते हैं। जैसे उनकी एक कविता है-‘औरत जात’। इस कविता का एक अंश देखिए-
बात चलती है
तो कह देते हैं लोग मुझसे
कि अब सबसे ज्यादा धर्म
औरतों में बचा है
मैं घुसती हूं बातों के तालाब की
गहराई में
जहां मर्द से पहले उठकर
झाड़ू बुहारी करती
घर लिपती, बर्तन धोती, खाना बनाती
गर्म-गर्म औरों को खिलाकर
बचा-खुचा खुद खाती
बच्चे जनती
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

        इसी कविता का एक और अंश स्त्रियों की पारिवारिक एवं सामाजिक दशा के परिप्रेक्ष्य में चिंतन करने योग्य हैः-
रक्ताल्पता की शिकार होती
हड़बड़ा कर, बच्चों को तैयार करती
नाश्ता कराती, स्कूल भेजती
पति की तमाम तैयारियों के बाद
स्वयं जल्दी-जल्दी तैयार होकर
दफ्तर जाती स्त्रियों का समूह है
तमगा लटकाए मंगलसूत्र का
भोगती अमंगल
एक पूरी की पूरी जमात है।

        दहेज भारतीय समाज में एक ऐसा कलंक है जो आज भी पूरी तरह नहीं मिट सका है।  दहेज की बलिवेदी पर प्रति वर्ष अनेक नववधू मृत्यु की भेंट चढ़ा दी जाती हैं। यह कलंक समाज के प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के मन को कचोटता है। ‘‘दहेज’’ शीर्षक रचना में देवकी भट्ट नायक दीपा लिखती हैं-
मैंने आत्मा को नहीं मारा
गला घोंटा नहीं जमीर का
इसीलिए आज बेचैन हूं
आज जब मेरी सहेली की
शादी की पक्यिात की बात हो रही है
उसमें हो रही है खुल कर सौदेबाजी
कितनी बरेक्षा, कितना फलदान
और कितना दहेज
किस-किस जिंस में दिया जाएगा
बता रहे हैं वरपक्ष की ओर से
आए हुए मध्यस्थ
एक-एक रेशा उधाड़ा जा रहा है
इज्जत की सीवन का
और मैं विवश खड़ी हूं

लेखिका देवकी भट्ट नायक दीपा

       दीपा रुद्र भट्ट के नाम से प्रकाशित देवकी भट्ट नायक दीपा की कहानी ‘‘उनसे पूछ लो’’ में उन बंधनों का विवरण है जिसमें एक आम स्त्री बंधी रहती है। ये बंधन पारिवारिक रिश्तों में संतुलन बनाए रखने में भी कभी-कभी कठिनाइयां पैदा करने लगते हैं और तब स्थितियां जटिल हो जाती हैं। मन संत्रास के झंझावात से गुजरने लगता है। इस कहानी का एक अंश यहां प्रस्तुत है -
‘‘इंतिजार की घड़ियां कितनी लम्बी होती हैं। एक-एक पल युगों सा प्रतीत होता है। जैसे घड़ी रुक गई हो। उस दिन कम्मू का बुरा हाल था। वह बेसब्री से पति के घर आने का इंतिजार कर रही थी। दोपहर का एक बजा था। उसने बिना चबाए ही खाना गटक लिया ताकि देर न हो जाए। फिर बाहर निकल कर देखा तो वहां कोई न था। वह वापस अंदर गई। घड़ी देखी तो एक बज कर पांच मिनट ही हुए थे। पांच मिनट में वह खाना खा कर तैयार हो गई थी। प्रतिदिन एक से दो बजे के बीच उसके पति परेश दुकान बंद करके घर खाना खाने आते थे। जो अभी तक प्रकट नहीं हुए थे। कम्मू को मां की याद बहुत सता रही थी। रह-रह कर उनका चेहरा जेहन में आ जाता था। सूचना मिली थी कि उनका स्वास्थ्य खराब है। मां इसी शहर में रहती थी।’’
     देवकी भट्ट नायक दीपा सागर शहर की एक ऐसी संवेदनशील लेखिका हैं जिनमें गम्भीर साहित्य सृजन की सम्भावनाएं हैं।

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( दैनिक, आचरण  दि. 14.10.2019)
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Sunday, October 13, 2019

शरद पूर्णिमा एक, मान्यताएं अनेक - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
          वर्ष भर में पड़ने वाली समस्त पूर्णिमा में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रि के समाप्त होने के बाद शरद पूर्णिमा आती है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन माह यानी क्वांर मास की पूर्णिमा तिथि पर शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। इस बार वर्ष 2019 में यह आज 13 अक्टूबर को है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर रात भर अपनी किरणों से अमृत की वर्षा करता है। माना जाता है कि इस दिन दूध और चावल से बनाई गई खीर को खुले आसमान के नीचेे रखने से ओस के कण के रूप में अमृत बूंदें खीर के पात्र में भी गिरती हैं जिसके फलस्वरूप यह खीर अमृत तुल्य हो जाती है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्य तथा कांति में श्रीवृद्धि होती है। मान्यता है कि चंद्रमा कि किरणें उस पर पड़ने से यह खीर औषधियुक्त हो जाती है।

शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की किरणों को अवशोषित करती खीर

          बुंदेलखंड के सागर दमोह आदि क्षेत्र में शरद पूर्णिमा पर महिलाएं व्रत रखकर भगवान विष्णु को मावा के लड्डूओं का भोग लगाती हैं। व्रत के दौरान कथा एवं चंद्रदेव, तुलसी और भगवान विष्णु का विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। विशेष तौर पर भगवान को मावा यानी खोबा एवं शक्कर से निर्मित 6 लड्डुओं का भोग लगाया जाता है, जिसमें से एक लड्डू भगवान विष्णु को, दूसरा पंडित को, तीसरा गर्भवती स्त्री को एवं चौथा अपनी सहेली को दिये जाने की परम्परा है।

शरद पूर्णिमा का पूजन

     शरद पूर्णिमा की रात को छत पर खुले आसमान के नीचेे खीर को रखने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य भी निहित है। खीर दूध और चावल के मिश्रण को पकाने से बनकर तैयार होती है। दरअसल दूध में लैक्टिक नाम का एक अम्ल होता है। यह एक ऐसा तत्व है जो चंद्रमा की किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति अवशोषित कर लेता है। वहीं चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया सरल हो जाती है। इस खीर का सेवन करना अत्यंत लाभप्रद होता है। शरद पूर्णिमा का दिन कई मायनों में महत्वपू्र्ण है। इस दिन जहां उत्तर भारत में इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और खीर का प्रसाद बनाकर रात को चंद्रमा के नीचे रखा जाता है।

भगवान विष्णु

अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के साथ कोजागर पूर्णिमा भी कहा जाता है।
पूरे साल में 12 पूर्णिमा तिथि आती है जिनमें, आषाढ़, कार्तिक और शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। शरद पूर्णिमा के बारे में कहा जाता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर आसमान से अमृत की वर्षा करता है। इस रात देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी भ्रमण के लिए आती हैं। इसलिए कहते हैं कि जो इस रात में जागरण करता है मां लक्ष्मी उसकी झोली सुख संपत्ति से भर देती हैं। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को कोजागरा और कोजागरी की रात कहते हैं। कोजागरा व्रत पर इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि और रवि नामक शुभ योग बन रहे हैं जो इस दिन को और भी शुभ बना रहे हैं। इस दिन को देवी लक्ष्मी के जन्मोत्सव के रूप में भी जाना जाता है। कथाओं के अनुसार सागर मंथन के समय देवी लक्ष्मी शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र से उत्पन्न हुई थीं।

शरद पूर्णिमा पर श्री कृष्ण का महारास

पेंटिंग... महारास में लीन राधा, कृष्ण और गोपिकाएं

    चूंकि महामति प्राणनाथ बुंदेलखंड केसरी  छत्रसाल के गुरु थे और कृष्ण के सखी भाव से उपासक थे अतः मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के पन्ना जिले के सुप्रसिद्ध मंदिर श्री प्राणनाथ जी मंदिर में शरदऋतु की शरदपूर्णिमा पर हजारों व लाखों देशी व विदेशी श्रद्धालुओं के साथ प्रतिवर्ष अक्टूबर के महिने में श्री 108 प्राणनाथ ट्रस्ट के एवं प्रशासन के सहयोग से बडे ही धूमधाम से आयोजित किया जाता है। महारास की यह link देखें....
      https://youtu.be/jmuO_RVlwS0
        अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा का मुख्य समारोह पूर्णिमा की रात्रि में होता है । रात्रि में करीब 12 बजे बंगला जी मंदिर में श्रीजी की सवारी ब्रम्हक चबूतरे में लाई जाती है । पूर्णमासी की महारास का उल्लास रात्रि भर चलता है । श्रीजी की सवारी ब्रम्ह‍ चबूतरे पर पांच दिन तक रूकी रहती है । इस दौरान पांच दिन तक गरबा सहित विविध धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन चलता रहता है ।
श्रद्धालुओं द्वारा महारास, गरबा आदि किया जाता है...
https://youtu.be/8VPjMBMIIwE

महामति प्राणनाथ मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश

       पन्ना में शरद पूर्णिमा महोत्स्व का पहला कार्यक्रम संवत 1740 में हुआ था । स्थानीय  प्रणामी धर्माविलंबियों के मतानुसार श्री प्राणनाथ जी बंगला जी मंदिर में अपने पांच हजार सुंदरसाथ के साथ ठहरे थे । पूर्णिमा की चांदनी रात में वे सुंदरसाथ के साथ श्रीकृष्ण द्वारा ग्वांलवालों व सखियों के साथ खेले जाने वाले महारास की चर्चा कर रहे थे । इसी दौरान उनके साथ आए सुंदरसाथ नें महामति प्राणनाथ जी से अखंड महारास का अनुभव कराने का निवेदन किया तब पूर्णिमा की अर्ध रात्रि शुरू होने वाली थी । इस पर महामति प्राणनाथ जी नें पांच हजार सुंदरसाथ के साथ महारास खेलना शुरू किया । यह महारास पांच दिन तक बिना रूके, बिना थके चलता रहा । तभी से यह हर साल मनाया जाता है ।

महामति प्राणनाथ मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश

        यूं तो अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं किन्तु बहुश्रवणीय, जनसामान्य में बहुप्रचलित एक लोककथा के अनुसार एक साहुकार को दो पुत्रियां थीं। दोनो पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। लेकिन बड़ी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी संतान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक करने से तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।  उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। बाद में उसे एक लड़का पैदा हुआ। जो कुछ दिनों बाद ही फिर से मर गया। उसने लड़के को एक पाटे (पीढ़ा) पर लेटा कर ऊपर से कपड़ा ढंक दिया। फिर बड़ी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पाटा दे दिया। बड़ी बहन जब उस पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छूते ही रोने लगा। तब बड़ी बहन ने कहा कि तुम मुझे कलंक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता। तब छोटी बहन बोली कि यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा का श्रवण एवं पूजन दृश्य

      चूंकि आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है इसलिए शरद पूर्णिमा को चंद्रमा पूरा नजर आने से इसे महापूर्णिमा भी कहते हैं। चंद्रमा इस दिन 16 कलाओं से युक्त रहता है। ये कलाएं मनुष्य के लिए सुख, सिद्धि दायक एवं उन्नति कारक मानी जाती है। सर्वार्थसिद्घ और अमृत सिद्ध का संयोग भी इस दिन बना रहता है। शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा की रात को ही भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास रचाया था। वैसे ताे हर माह में पूर्णिमा आती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। शरद पूर्णिमा से ही स्नान और व्रत प्रारंभ हो जाता है। साथ ही माताएं अपनी संतान की मंगल कामना से देवी,देवताओं का पूजन करती है। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत समीप आ जाता है। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारंभ होता है। शरद ऋतु में मौसम एकदम साफ़ रहता है। इस दिन आकाश में न तो बादल होते हैं और न ही धूल-गुबार। इस रात्रि में भ्रमण और चंद्र किरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना गया है। प्रति पूर्णिमा को व्रत करने वाले इस दिन भी चंद्रमा का पूजन करके भोजन करते हैं।

शिव-पार्वती

    शरद पूर्णिमा के दिन शिव-पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है। यही पूर्णिमा कार्तिक स्नान के साथ राधा-दामोदर पूजन व्रत धारण करने का भी दिन है। 
     
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की बहुचर्चित पेंटिंग "शरद पूर्णिमा"



Tuesday, October 8, 2019

बुंदेलखंड में दशहरा - डॉ. वर्षा सिंह



🚩अधर्म पर धर्म की विजय,
असत्य पर सत्य की विजय,
बुराई पर अच्छाई की विजय,
पाप पर पुण्य की विजय
अत्याचार पर सदाचार की विजय
क्रोध पर दया व क्षमा की विजय
रावण पर श्रीराम की विजय के
प्रतीक पावन पर्व
विजयदशमी की
आपको व आपके परिवार को
हार्दिक शुभकामनाएं।
आज सत्य पर असत्य की विजय का पर्व विजयदशमी पूरे देश में बहुत धूमधाम के साथ मनाया जाता है. आज के दिन अस्त्र-शस्त्र का पूजन और रावण दहन के बाद बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
           विजयादशमी पर प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी पीटीसी ग्राउंड पर 51 फीट का रावण दहन किया गया। जय श्रीराम के जयकारों के साथ रावण के पुतले की नाभी में राम का स्वरूप धारण किए हुए व्यक्ति द्वारा छोड़ा गया तीर लगते ही रावण धूं-धूं कर जलने लगा। रावण दहन  बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। सागर शहर के नागरिकों ने अपने परिवार सहित दशानन रावण का अहंकार पलभर में राख होते देखा।
        समूचे बुंदेलखंड में आज के दिन पान का बीड़ा हनुमानजी के चढ़ाया जाता है। पान हनुमाजी को बहुत पसंद है और इस बार दशहरा मंगलवार को है इसलिए यह दिन और भी खास हो जाता है। पान को जीत का प्रतीक माना गया है। पान का 'बीड़ा' शब्द का एक महत्व यह भी है इस दिन हम सही रास्ते पर चलने का 'बीड़ा' उठाते हैं। पान प्रेम का पर्याय है। दशहरे में रावण दहन के बाद पान का बीड़ा खाने की परम्परा है। ऐसा माना जाता है दशहरे के दिन पान खाकर लोग असत्य पर हुई सत्य की जीत की खुशी मनाते हैं। पान का पत्ता मान और सम्मान का प्रतीक है. इसलिए हर शुभ कार्य में इसका उपयोग किया जाता है. नवरात्रि पूजन के दौरान भी मां को पान-सुपारी चढ़ाने का विधान होता है. इसी के साथ पान के पत्ते का उपयोग विवाह से लेकर कथा पाठ तक हर शुभ काम में किया जाता है.


Monday, October 7, 2019

लेखक हिमांशु राय से डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की चर्चा

Dr. Varsha Singh

             दिनांक 29.09.2019 को  My Mute Girl Friend और Am Always Here With You उपन्यासों के लेखक हिमांशु राय की उपस्थिति में उनके लेखन पर सार्थक चर्चा हुई... कला साहित्य संस्कृति और भाषा के विकास व संरक्षण के लिये समर्पित संस्था श्यामलम् के "भाषा विमर्श " श्रृंखला के अंतर्गत, जिसमें लेखक से चर्चा करते हुए डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए।

...तस्वीरें उसी अवसर की....










Monday, September 30, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 65 ... एक संजीदा शायर सिराज़ सागरी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के शायर सिराज सागरी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

       एक संजीदा शायर सिराज सागरी
                                 - डॉ. वर्षा सिंह
                       
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परिचय :
नाम  :- सिराज़उद्दीन अंसारी उर्फ़ सिराज़ सागरी
जन्म :-  25 फरवरी 1965
जन्म स्थान :- सागर, म.प्र,
माता-पिता :- श्रीमती अख़्तर बेगम एवं श्री बाहाजु़द्दीन अंसारी
शिक्षा  :- बी काम.
लेखन विधा :- काव्य
प्रकाशन     :- पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
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                  सागर नगर की शायरी के क्षेत्र में शायर सिराज़ सागरी का नाम महत्वपूर्ण शायरों में गिना जाता है। सिराज़ सागरी को शायरी का हुनर अपने पिता से विरासत में मिला। उनके पिता बाहाजुद्दीन अंसारी एक नामचीन शायर थे और ‘वाहिद सागरी के नाम से शायरी करते थे। सिराज़ सागरी बताते हैं कि उनके पिता के पास अनके मशहूर शायरों का आना-जाना होता रहता था। घर में शायरी का माहौल था। बात सन् 1983 की है जब सिराज़ सागरी बी.ए. में पढ़ रहे थे। एक शाम उनके घर में शायरों का जमावड़ा लगा हुआ था और शायरी की तत्कालीन दशा-दिशा पर चिंतन किया जा रहा था। बात निकली तो वहां मौजूद शायर मायूस सागरी ने चिंतित होते हुए कहा कि-‘‘आजकल जो माहौल है उसे देख कर लगता है कि शायरी के प्रति गंभीरता ख़त्म होती जा रही है। न कोई बहर पर ध्यान देता है और न क़ाफ़िए पर। हमारे बाद कोई हम जैसी शायरी भी करेगा या नहीं, सोच कर चिंता होती है।’’
वहीं कुछ दूर बैठे सिराज़ सागरी ने यह बात सुनी तो उन्होंने उसी समय ठान लिया कि वे शायरी की परम्परा को गंभीरता से निभाते हुए पूरी लगन और समझ के साथ शायरी करेंगे ताकि उनके बुजुर्गों को शायरी की दशा को ले कर चिंतित न होना पड़े। सिराज़ सागरी जिनका मूल नाम सिराज़उद्दीन अंसारी है, उन्होंने ‘सिराज़ सागरी’ का तख़ल्लुस रखते हुए शायरी की दुनिया में पूरी गंभीरता से क़दम रखा। इस घटना के कुछ माह बाद ‘गौर जयंती’ पर डॉ. हरीसिंह गौर के जन्मस्थल बंगला स्कूल में आयोजित कवि सम्मेलन-मुशायरे में उन्होंने अपने वे चार मिसरे पढ़े जो उन्होंने बतौर ‘शायर सिराज़ सागरी’ सबसे पहले लिखे थे। वे मिसरे थे-
सर गौर हरीसिंह ने वो बात बनाई
तारीक़ी ज़ेहालत की है सागर से मिटाई
बनवा के यूनीवर्सिटी सागर से नगर में
इक शम्मा इल्म की है अंधेरे में जलाई

Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Sagar

             सिराज़ सागरी मानते हैं कि उनके इस मिसरे में ख़ामियां थीं लेकिन उन्होंने इन्हें कभी सुधारा नहीं और एक यादगार के रूप में यथावत रहने दिया। जिससे उन्हें उनके शायरी के सफ़र की शुरुआत एक कच्ची ज़मीन की तरह हमेशा याददाश्त में बनी रहे।
श्रीमती अख़्तर बेगम और श्री बाहाजुद्दीन अंसारी के पुत्र के रूप में 25 फरवरी 1965 को सागर में जन्मे सिराज़ सागरी ने स्नातक तक शिक्षा पाने के उपरांत अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को अपना लिया। आज वे ट्रांसपोर्ट के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। उन्हें जहां शायरी का गुण अपने पिता से मिला वहीं सामाजिक एवं धार्मिक संस्कार अपनी मां से प्राप्त हुए। पारिवारिक दायित्वों के चलते उनकी शायरी का सृजन तनिक धीमा अवश्य हुआ किन्तु उससे नाता नहीं टूटा। इस दौरान उन्हें प्रतिष्ठित शायरों से इस्लाह लेने का अवसर मिला। जिनमें आज़र छतरपुरी, निश्तर दमोही और हक़ छतरपुरी को वे अपना उस्ताद शायर मानते हैं। सिराज़ सागरी ग़ज़ल के साथ ही नज़्म, गीत, छंद रचनाएं भी लिखते हैं।  उनके सृजन का दायरा किसी एक भाषा तक सीमित नहीं है, वे उर्दू के साथ ही हिंदी और बुंदेली में भी ग़ज़लें लिखते हैं। वे आकाशवाणी के सागर, छतरपुर केन्द्र तथा दूरदर्शन के भोपाल केन्द्र से काव्यपाठ कर चुके हैं। पत्र पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं का प्रकाशन होता रहता है। उन्हें अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। शायरी के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित मंचों पर आमंत्रित किया जाता है।
               ग़ज़ल काव्य की वह विधा है जो एक उन्दबद्ध रचना की भांति अनुशासन मांगती है। रदीफ, काफिया, बहर और वजन गजल के शिल्प को आकार देते हैं। वहीं किसी भी बात को दिल की गहराईयों से कहने की अदायगी गजल की रूह को आकार देती है। सिराज़ सागरी ने गजल के शिल्प ओर कथ्य दोनों को खूबसूरती से सम्हाला है। उनकी ग़ज़लों में प्रेम की कोमल भावना और दुनियावी समस्याओं पर चिंता एक साथ देखी जा सकती है। जैसे यह ग़ज़ल देखें -
तड़पा न कर इस दर्जा, न बैचेन हुआ कर
जब अपनी हथेली पे मेरा नाम लिखा कर
बच्चों के लिए अपने रहे -हक़ पे चला कर
असलाफ़ की अरवाह को तसकीन अता कर
इक मैं कि वफ़ा करके लुटा बैठा हूँ सब कुछ
इक वो है जो कहता है अभी और वफ़ा कर
गुम रहता है दुनियाँ की सदाओं में ब हर वक़्त
फुरसत में कभी अपनी भी आवाज़ सुना कर
कश्ती के सवारों ने उसे ही किया गर्क़ाब
तूफ़ान से कश्ती को जो लाया था बचाकर
रख लाज अताओं की तू अपनी मिरे मौला
दस्तार जिन्हें दी है उन्हें सर भी अता कर
हो जाये “सिराज़“ अम्न का हर आन बसेरा
करता हूँ दुआ दामने दिल अपना बिछाकर

              सिराज़ सागरी की शायरी में जिन्दगी की तहजीब और अहसास की तर्जुमानी में आज के माहौल की विसंगतियां देखी जा सकती हैं। कदम-कदम पर व्याप्त भ्रष्टाचार ज़िन्दगी की कठिनाई को और बढ़ा देता है। इस तथ्य को बड़ी ही खूबसूरती से सिराज़ सागरी ने अपनी इस गजल में बयान किया है -
अद्ल काइल था बेगुनाही का
मसअला था मगर गवाही का
बादशाह पर है बेहिसी तारी
क्या करे हौसला सिपाही का
ताज़ काँटों भरा है फिर तुझको
शौक़ क्यों इतना बादशाही का
है इताअत का क़र्ज़ सर पे मेरे
वज़्न काँधों पे सर बराही का
सोच ये क्या निबाह मुमकिन है
फ़िक़्र का और कम निगाही का
दुश्मनों का ख़ुदा पे है ईमान
आसरा मुझको भी ख़ुदा ही का
बादलों के हिसार से जागा
चाँदनी पर गुमाँ सियाही का
मुझको पहचानते “सिराज़“ हैं लोग
है करम ये बड़ा इलाही का

Shayar Siraj Sagari # Sahitya Varsha

         आज इंसान आत्मकेंंद्रित हो चला है। बाजारवाद की अंधी दौड़ ने परिवारों के बीच दरारें डाल रखी हैं। जहां अपनों की पीड़ा चेतना पर दस्तक न दे पाती हो वहां परायों का दर्द भला कैसे ध्यानाकर्षित कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे लोगों को अव्यवस्थाओं में जीने की आदत पड़ गई है। माहौल के इस रूखेपन को सिराज़ सागरी पूरी तल्खी के साथ, लेकिन अपने ही अंदाज में कुछ इस तरह कहते हैं-
कुछ भी हो जाये चीखती ही नहीं
ज़िन्दगी जैसे ज़िन्दगी ही नहीं
उस तरफ मुन्तज़र मिरी खुशियाँ
गम की दीवार टूटती ही नहीं
ख़्वाब क्या खाक देखता कोई
रात भर आँख तो लगी ही नहीं
दोस्तों का हुजूम चारों तरफ
दोस्ती मुझको जानती ही नहीं
आदमीयत की बात क्या मानी
हम में जब कोई आदमी ही नहीं
मुझ से आबाद है मगर दुनिया
मेरा अहसान मानती ही नहीं
फिर रही है मुझे उठाये हयात
बोझ सर से उतारती ही नहीं
नस्ले-नौ जल्दबाज़ियों का शिकार
ये तो तहज़ीब जानती ही नहीं
आसुओं ने बयान की है सिराज
दर्द की दास्ताँ लिखी ही नहीं

              सिराज़ सागरी की ग़ज़लें अपने कहन के तरीके से लुत्फअंदोज करती है। उनकी ग़ज़लें दिल और दिमाग पर दस्तक देती हैं। संवेदनाओं और भावनाओं का अहसास शेर-दर-शेर साथ-साथ चलता है। यही एक संजीदा शायर की पहचान भी है। जो सिराज़ सागरी की गजलों में बखूबी उभर कर सामने आती है।
तारीख़ कह रही है-‘थे तुम हम नबा- ऐ-गुल’
पहचानते नहीं हो तुम्हीं क्यूं सदा-ए- गुल
इज़हारे इश्क़ से हो गुरेजां तो ये बताओ
जूड़े में किसके वास्ते तुमने सजाये गुल
खारों से मेरी राह सजाई है उसने आज
मैंने हमेशा राह में जिसकी सजाये गुल
यक बारगी सज़ा-ऐ-चमन खुश गबार है
कौन आ गया चमन में ये क्यों मुस्कराए गुल
आया न नाजुकी में कोई फर्क आन को
पैरों तले दबाए कि सर पे सजाये गुल
यह और बात है कि मैं हँसता रहा “सिराज़“
अपनों ने मेरे साथ हमेशा खिलाये गुल

              यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि सागर नगर की गजलगोई की दुनिया में सिराज़ सागरी वह हीरा है जिन्होंने अपनी मेहनत से अपने हुनर को तराशा है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 30.09.2019)
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Wednesday, September 25, 2019

समीक्षा ... जीवन की सच्चाइयों को रेखांकित करता काव्य संग्रह - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      पिछले दिनों सागर नगर के कवि वीरेंद्र प्रधान की लोकार्पित पुस्तक ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ पर मेरा समीक्षात्मक आलेख मेरठ से प्रकाशित " दैनिक विजय दर्पण टाइम्स" में दिनांक 24.09.2019 को साहित्य, संस्कृति, कला-दर्पण के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है। कृपया आप भी पढ़ें।
हार्दिक आभार दैनिक विजय दर्पण टाइम्स के प्रति 🙏
.... और शुभकामनाएं वीरेंद्र प्रधान जी को 💐

जीवन की सच्चाइयों को रेखांकित करता काव्य संग्रह
                       - डॉ. वर्षा सिंह
                         
        वीरेन्द्र प्रधान का काव्य संग्रह ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ भले ही उनका प्रथम काव्य संग्रह है किन्तु उनकी काव्यात्मक-यात्रा दीर्घकालीन है। अपने पारिवारिक दायित्वों तथा आजीविका संबंधी व्यस्तताओं ने उन्हें साहित्य साधना के लिए अपेक्षाकृत कम समय दिया फिर भी वे व्यस्तताओं से समय चुरा कर साहित्य से जुड़े रहे। मुझे स्मरण है कि सन् 2000 में मेरे तीसरे ग़ज़ल संग्रह ‘‘हम जहां पर हैं’’ के विमोचन के अवसर पर वीरेन्द्र प्रधान जी ने उपस्थित हो कर मेरे संग्रह पर अपने अमूल्य विचार व्यक्त किए थे। आज जब भाई वीरेन्द्र प्रधान के प्रथम काव्य संग्रह पर मुझे आलेख वाचन करते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे दोनों आयोजनों के बीच का कुछ क़दम का फ़ासला मिट गया हो। वस्तुतः यही साहित्य की कालजीविता है। साहित्य देश, समाज, परिवार और दिलों के फ़ासलों को मिटाता है और नई ऊर्जा का संचार करता है।
           ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ पुस्तक का यह नाम अपने आप में समग्रता लिए हुए है। दूख और सुख, रात और दिन, विश्वास और अविश्वास, अव्यवस्था और व्यवस्था इन सभी के बीच कुछ क़दम का फ़ासला ही तो होता है। यह फ़ासला तय होते ही सारे दृश्य बदल जाते हैं, जीवन बदल जाता है अर्थात् अतीत, वर्तमान ओर भविष्य बदल जाता है।
संग्रह की पहली कविता है ‘‘मां’’। यह उचित भी है क्योंकि मां आरंभ है उन अनुभूतियों की जो   संतान में संवेदनशीलता का बीजारोपण करती है। मां को बच्चे की प्रथम शिक्षिका होती है। अपनी लोरियों के द्वारा भी मां जहां कल्पनाओं का सुन्दर संसार रचती है, वहीं यथार्थ की कठोरता से भी परिचित कराती रहती है। मां सिर्फ जननी नहीं, परिवार और संस्कारों की रीढ़ होती है। मां का ममत्व हर संतान पर एक ऐसा ऋण होता है जिससे वह कभी भी उऋण नहीं हो सकता। इस भावना को वीरेन्द्र प्रधान ने ‘मां’ शीर्षक अपनी कविता में बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है-
मां, तेरा मुझ पर है कर्ज बहुत
अनगिनत जन्म ले कर भी
उसे न चुका पाउंगा मैं
गर्भ से ले कर जन्म तक
और जन्म के बाद अपार कष्ट सह
तूने जो परवरिश की
उसे न भूल पाउंगा मैं
बुझ रही पीढ़ी के प्रति ध्पूर्ण सम्मान के साथ
हो सकता है दे सकूं
अगली  पीढ़ी को
उसका अंश मात्र भी
जो तूने मुझे दिया समय-समय पर
लोरियों की शक्ल में घूंटियों के रूप में
या रहीम, रसखान ओर कबीर की
शिक्षाओं के माध्यम से
भावना यही है कि
गांठ में बांध लूं तेरी हर सीख (पृ.20)
   
         वीरेन्द्र प्रधान की कविताएं कृत्रिम कारीगरी से दूर अपने मौलिक रूप में दिखाई देती हैं। अपनी कविताओं के माध्यम से वे सीधे संवाद करते हैं। उनकी कविताओं में जीवन की कोमलता और विडंबनाएं साझा रूप में अभिव्यक्त होती हैं। कुल इक्यासी कविताओं के गुलदस्ता रूपी काव्य संग्रह ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ पर चर्चा का आरम्भ इसी संग्रह की ‘सिद्धांत’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियों से -
लोगों के अपने-अपने
सिद्धांत हुआ करते हैं।
कुछ मिशन बना देते हैं जीवन को
जख़्मों को मरहम बन जाते हैं
तो कुछ अपनों को ही चोटें दे कर
हमदर्दी में दुखती रगें छुआ करते हैं। (पृ.70) 

        जब जीवन का आकलन घनीभूत रूप ले लेता है तो विचारों का स्वरूप जीवन दर्शन में ढलने लगता है। लोग अपने जीवन को सुखद बनाने के लिए विभिन्न प्रकार का जोड़-घटाना करते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप जीवन शुष्क गणितीय समीकरण बन कर रह जाता है। किन्तु कवि वीरेन्द्र प्रधान ने जीवन के गणित में साहित्य को स्थान दे कर जीवन को देखने का एक दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाया है। संग्रह की कविताओं में जीवन का पक्ष जैसे स्वयं मुखरित है। हर्ष है इसमें, उल्लास है, वेदना है, पीड़ा है, कहीं स्नेह से भरी-पूरी अनुभूति है, तो कहीं पीड़ा की तीव्रता है। समय और समाज की धड़कनें इन कविताओं में स्पंदित होती हैं। वीरेन्द्र प्रधान अपनी तुकांत एवं अतुकांत कविताओं के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त करते रहते हैं। उनकी कविताओं में दार्शनिक बोध स्पष्ट रूप से दिखई देता है। उनकी ‘‘जन्म-जन्मान्तर’’ कविता का एक अंश देखें -
पुण्य और पाप के मध्य
एक विभाजन रेखा
खींचते हुए
पता नहीं कब तक जीना है?
और फिर अंत में सिर्फ़ दो मुट्ठी ख़ाक बन कर
विसर्जित होना है। (पृ.35)
जीवन के सत्य को गंभीरता से स्वीकार करते हुए भी वीरेन्द्र प्रधान के भीतर का कवि पलायनवादी नहीं है। वे अपनी कविताओं में धैर्य और संयम को एक आश्वस्ति के रूप में सामने रखते हैं। जैसा कि उनकी कविता ‘‘छिन्द्रान्वेषी’’ में देखा जा सकता है -
क़द में/ पद में/ प्रतिष्ठा में
अपने से बड़ा
कोई भी व्यक्त्वि देख कर
हीनता का बोध नहीं होता
मगर अपने सापेक्ष
किंचित भी छोटा व्यक्तित्व
देख कर विराट लगता है
अपना व्यक्तित्व
और बौना लगता है
वह व्यक्ति।

पुस्तक समीक्षा - डॉ. वर्षा सिंह @ साहित्य वर्षा

      पुस्तक की सभी कविताएं हृदय से निकली संवेदनाएं प्रतीत होती हैं। वीरेन्द्र प्रधान की कुछ कविताओं में सूफियाना रंग भी दिखता है। उन कविताओं में वे आत्मा को एक समर्पित तत्व के रूप में देखते हैं। ‘मैं तो प्रेम में मस्त’ शीर्षक कविता में कवि के सूफियाना लहजे को देखा जा सकता है-
कान्हा के रंग में रंगी,
है शेष रंग बेकार
अपने अंतर में मैं बसी
मोहे व्यर्थ सभी घर-बार
प्रीत आत्मा में जगी
मुझे भावे न संसार
बनती मैं मीरा कभी
और कभी रसखान
मैं प्रेम के रंग में मस्त हूं
मोहे लागे एक समान -
रस या विष का पान। (पृ.45)
        ‘‘ यत्र नास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ’’ अर्थात् जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवता का वास होता है। क्योंकि नारी परिवार और समाज को सुंदर आकार प्रदान करती है। अपने अधिकारों के लिए उलाहना दिए बिना परिवार की सेवा में लगी रहती है। नारी को समर्पित अपनी कविता ‘‘नारी’’ में वीरेन्द्र प्रधान ने नारी के गरिमामय महत्व को प्रस्तुत किया है-
नारी के बिना नहीं कल्पना संसार की
राम, कृष्ण, गौतम, यीशू के अवतार की
यही नारी सहती है पुरुषों के चुपचाप सितम
कैसी है रीत, विधि तेरे संसार की।
पुत्री, भगिनी, पत्नी तो जननी किसी की तू
हे नारी, तू तो है संचालक परिवार की।(पृ.89)

       और अंत में इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कविता जिसमें जितनी गंभीरता से वर्तमान जीवन की विडम्बनाएं मुखर हुई हैं उतनी ही प्रभावी ढंग से दृश्यात्मकता उभर कर सामने आई है, मानो सब कुछ आंखों के सामने घटित हो रहा हो। कविता का श्ीर्षक है ‘‘गोण्डवाना एक्सप्रेस’’। पंक्तियों की दृश्यात्मकता पर ध्यान दें-
बिला नागा समय पर आने और जानेवाली
सीमित समय रुकने वाली
कभी-कभी छोड़ जाती है मुझे गोण्डवाना एक्सप्रेस
और काम की थकान लिए रुक जाता हूं
प्लेटफार्म पर ही
इंतज़ार करते-करते सो जाते हैं बच्चे
दिन भर काम कर थकी-मांदी
बूढ़ी और बीमार पत्नी राह देखती रह जाती है
उसे तो कल से फिर जूझना है
जीवन के संघर्षों से
और मुझे भी। (पृ.66)

          वीरेन्द्र प्रधान एक ऐसे कवि हैं जो साहित्यिक परिदृश्य में नेपथ्य में रह कर भी अपनी रचनात्मक उपस्थिति का बोध कराते रहे हैं और अब अपने प्रथम काव्य संग्रह के साथ नेपत्थ्य से बाहर आए है। उनका स्वागत है उनकी उस रचनाधर्मिता के साथ जो उनसे जीवन की सच्चाइयों को रेखांकित करने वाली कविताएं सृजित कराती है। पूरा काव्य संग्रह में सरसता, स्वाभाविकता, सजीवता के गुण एक साथ मिलते हैं। कठिन शब्दों से बचा गया है। भाषा में प्रवाह है। वीरेन्द्र प्रधान जी का यह प्रथम काव्य संग्रह रोचक एवं पठनीय है। प्रखर गूंज प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित यह संग्रह कुल 106 पृष्ठों का है। इसका मूल्य है 275 रुपए। पुस्तक का मुद्रण एवं साज-सज्जा आकर्षक है। उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपना यह संग्रह अपने गुरु स्व. त्रिलोचन शास्त्री को समर्पित किया है। 
वीरेन्द्र प्रधान जी को उनकी इस रचनायात्रा के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।
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Tuesday, September 24, 2019

वनमाली सृजनपीठ मध्यप्रदेश की सागर इकाई का प्रथम आयोजन - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      रविवार, दि. 15.09.2019 को सागर में वनमाली सृजनपीठ, भोपाल की सागर इकाई के प्रथम आयोजन में मैं यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह भी शामिल हुई थी बतौर श्रोता। इस कार्यक्रम में बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने आ। आमंत्रित अतिथि कथाकार के रूप में अपनी कहानी - "प्रेमी जन की जात न पूछो " - का  पाठ किया। इस कहानी में कथित 'ऑनर' के नाम पर युवाओं की भावनाओं का किस तरह दमन किया जाता है, इसको बखूबी उजागर करने के साथ ही खाप-पंचायत की भूमिका को कठघरे में खड़ा किया गया है। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ सुरेश आचार्य ने की। ईकाई के संयोजक उमाकांत मिश्र ने स्वागत भाषण दिया।













           दिलचस्प बात यह रही कि इस आयोजन में उपस्थित श्रोताओं को भी पुस्तकें भेंट कर सम्मानित किया गया। ज़ाहिर है इसका उद्देश्य पठन- पाठन की परम्परा और पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देना है।