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Sunday, October 13, 2019

शरद पूर्णिमा एक, मान्यताएं अनेक - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
          वर्ष भर में पड़ने वाली समस्त पूर्णिमा में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रि के समाप्त होने के बाद शरद पूर्णिमा आती है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन माह यानी क्वांर मास की पूर्णिमा तिथि पर शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। इस बार वर्ष 2019 में यह आज 13 अक्टूबर को है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर रात भर अपनी किरणों से अमृत की वर्षा करता है। माना जाता है कि इस दिन दूध और चावल से बनाई गई खीर को खुले आसमान के नीचेे रखने से ओस के कण के रूप में अमृत बूंदें खीर के पात्र में भी गिरती हैं जिसके फलस्वरूप यह खीर अमृत तुल्य हो जाती है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्य तथा कांति में श्रीवृद्धि होती है। मान्यता है कि चंद्रमा कि किरणें उस पर पड़ने से यह खीर औषधियुक्त हो जाती है।

शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की किरणों को अवशोषित करती खीर

          बुंदेलखंड के सागर दमोह आदि क्षेत्र में शरद पूर्णिमा पर महिलाएं व्रत रखकर भगवान विष्णु को मावा के लड्डूओं का भोग लगाती हैं। व्रत के दौरान कथा एवं चंद्रदेव, तुलसी और भगवान विष्णु का विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। विशेष तौर पर भगवान को मावा यानी खोबा एवं शक्कर से निर्मित 6 लड्डुओं का भोग लगाया जाता है, जिसमें से एक लड्डू भगवान विष्णु को, दूसरा पंडित को, तीसरा गर्भवती स्त्री को एवं चौथा अपनी सहेली को दिये जाने की परम्परा है।

शरद पूर्णिमा का पूजन

     शरद पूर्णिमा की रात को छत पर खुले आसमान के नीचेे खीर को रखने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य भी निहित है। खीर दूध और चावल के मिश्रण को पकाने से बनकर तैयार होती है। दरअसल दूध में लैक्टिक नाम का एक अम्ल होता है। यह एक ऐसा तत्व है जो चंद्रमा की किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति अवशोषित कर लेता है। वहीं चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया सरल हो जाती है। इस खीर का सेवन करना अत्यंत लाभप्रद होता है। शरद पूर्णिमा का दिन कई मायनों में महत्वपू्र्ण है। इस दिन जहां उत्तर भारत में इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और खीर का प्रसाद बनाकर रात को चंद्रमा के नीचे रखा जाता है।

भगवान विष्णु

अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के साथ कोजागर पूर्णिमा भी कहा जाता है।
पूरे साल में 12 पूर्णिमा तिथि आती है जिनमें, आषाढ़, कार्तिक और शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। शरद पूर्णिमा के बारे में कहा जाता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर आसमान से अमृत की वर्षा करता है। इस रात देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी भ्रमण के लिए आती हैं। इसलिए कहते हैं कि जो इस रात में जागरण करता है मां लक्ष्मी उसकी झोली सुख संपत्ति से भर देती हैं। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को कोजागरा और कोजागरी की रात कहते हैं। कोजागरा व्रत पर इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि और रवि नामक शुभ योग बन रहे हैं जो इस दिन को और भी शुभ बना रहे हैं। इस दिन को देवी लक्ष्मी के जन्मोत्सव के रूप में भी जाना जाता है। कथाओं के अनुसार सागर मंथन के समय देवी लक्ष्मी शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र से उत्पन्न हुई थीं।

शरद पूर्णिमा पर श्री कृष्ण का महारास

पेंटिंग... महारास में लीन राधा, कृष्ण और गोपिकाएं

    चूंकि महामति प्राणनाथ बुंदेलखंड केसरी  छत्रसाल के गुरु थे और कृष्ण के सखी भाव से उपासक थे अतः मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के पन्ना जिले के सुप्रसिद्ध मंदिर श्री प्राणनाथ जी मंदिर में शरदऋतु की शरदपूर्णिमा पर हजारों व लाखों देशी व विदेशी श्रद्धालुओं के साथ प्रतिवर्ष अक्टूबर के महिने में श्री 108 प्राणनाथ ट्रस्ट के एवं प्रशासन के सहयोग से बडे ही धूमधाम से आयोजित किया जाता है। महारास की यह link देखें....
      https://youtu.be/jmuO_RVlwS0
        अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा का मुख्य समारोह पूर्णिमा की रात्रि में होता है । रात्रि में करीब 12 बजे बंगला जी मंदिर में श्रीजी की सवारी ब्रम्हक चबूतरे में लाई जाती है । पूर्णमासी की महारास का उल्लास रात्रि भर चलता है । श्रीजी की सवारी ब्रम्ह‍ चबूतरे पर पांच दिन तक रूकी रहती है । इस दौरान पांच दिन तक गरबा सहित विविध धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन चलता रहता है ।
श्रद्धालुओं द्वारा महारास, गरबा आदि किया जाता है...
https://youtu.be/8VPjMBMIIwE

महामति प्राणनाथ मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश

       पन्ना में शरद पूर्णिमा महोत्स्व का पहला कार्यक्रम संवत 1740 में हुआ था । स्थानीय  प्रणामी धर्माविलंबियों के मतानुसार श्री प्राणनाथ जी बंगला जी मंदिर में अपने पांच हजार सुंदरसाथ के साथ ठहरे थे । पूर्णिमा की चांदनी रात में वे सुंदरसाथ के साथ श्रीकृष्ण द्वारा ग्वांलवालों व सखियों के साथ खेले जाने वाले महारास की चर्चा कर रहे थे । इसी दौरान उनके साथ आए सुंदरसाथ नें महामति प्राणनाथ जी से अखंड महारास का अनुभव कराने का निवेदन किया तब पूर्णिमा की अर्ध रात्रि शुरू होने वाली थी । इस पर महामति प्राणनाथ जी नें पांच हजार सुंदरसाथ के साथ महारास खेलना शुरू किया । यह महारास पांच दिन तक बिना रूके, बिना थके चलता रहा । तभी से यह हर साल मनाया जाता है ।

महामति प्राणनाथ मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश

        यूं तो अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं किन्तु बहुश्रवणीय, जनसामान्य में बहुप्रचलित एक लोककथा के अनुसार एक साहुकार को दो पुत्रियां थीं। दोनो पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। लेकिन बड़ी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी संतान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक करने से तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।  उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। बाद में उसे एक लड़का पैदा हुआ। जो कुछ दिनों बाद ही फिर से मर गया। उसने लड़के को एक पाटे (पीढ़ा) पर लेटा कर ऊपर से कपड़ा ढंक दिया। फिर बड़ी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पाटा दे दिया। बड़ी बहन जब उस पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छूते ही रोने लगा। तब बड़ी बहन ने कहा कि तुम मुझे कलंक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता। तब छोटी बहन बोली कि यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा का श्रवण एवं पूजन दृश्य

      चूंकि आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है इसलिए शरद पूर्णिमा को चंद्रमा पूरा नजर आने से इसे महापूर्णिमा भी कहते हैं। चंद्रमा इस दिन 16 कलाओं से युक्त रहता है। ये कलाएं मनुष्य के लिए सुख, सिद्धि दायक एवं उन्नति कारक मानी जाती है। सर्वार्थसिद्घ और अमृत सिद्ध का संयोग भी इस दिन बना रहता है। शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा की रात को ही भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास रचाया था। वैसे ताे हर माह में पूर्णिमा आती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। शरद पूर्णिमा से ही स्नान और व्रत प्रारंभ हो जाता है। साथ ही माताएं अपनी संतान की मंगल कामना से देवी,देवताओं का पूजन करती है। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत समीप आ जाता है। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारंभ होता है। शरद ऋतु में मौसम एकदम साफ़ रहता है। इस दिन आकाश में न तो बादल होते हैं और न ही धूल-गुबार। इस रात्रि में भ्रमण और चंद्र किरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना गया है। प्रति पूर्णिमा को व्रत करने वाले इस दिन भी चंद्रमा का पूजन करके भोजन करते हैं।

शिव-पार्वती

    शरद पूर्णिमा के दिन शिव-पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है। यही पूर्णिमा कार्तिक स्नान के साथ राधा-दामोदर पूजन व्रत धारण करने का भी दिन है। 
     
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की बहुचर्चित पेंटिंग "शरद पूर्णिमा"



Sunday, September 8, 2019

पन्ना के मंदिर और बुंदेली लोकगीत - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

मध्यप्रदेश  के सागर संभाग का एक जिला है पन्ना, जिसके जिला मुख्यालय में स्थित हिरण बाग़ नामक स्थान में रहते हुए मेरा बचपन और युवावस्था के प्रारंभिक दिन व्यतीत हुए हैं। मेरी शिक्षा-दीक्षा भी पन्ना मुख्यालय में ही हुई । शासकीय मनहर कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय  एवं महाराजा छत्रसाल शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय मेरी शिक्षा के केंद्र रहे हैं । अब पन्ना से लगभग 186 कि.मी. दूर यहां सागर मुख्यालय के मकरोनिया उपनगर में रहते हुए पन्ना में व्यतीत किए हुए दिनों की स्मृतियां आज भी ताज़ा प्रतीत होती हैं। पन्ना के मंदिर मेरी स्मृतियों को हमेशा ही जागृत करते रहते हैं... कितने सुंदर और भव्य मंदिर! माना कि सागर में भी एक से एक सुंदर मंदिर स्थापित हैं किंतु पन्ना के मंदिरों का तो जवाब ही नहीं।
पन्ना में स्थापित भव्य मंदिरों की महिमा लोकगीतों में भी गाई जाती है, जैसे जुगलकिशोर मंदिर में स्थापित राधा -कृष्ण की प्रतिमा के लिए विख्यात लोकगीत है …
"पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े हैं…."

पन्ना….जैसा कि नाम है "पन्ना", वास्तव में यह पन्ना नामक रत्न से कम नहीं है । यह क्षेत्र विंध्याचल के अंचल में स्थित है और इसीलिये पन्ना में जंगल है हरियाली है और प्राकृतिक सौंदर्य की अनुपम छटा है । केन, किलकिला,बेरमा आदि नदियां यहां अपने कलकल निनाद से क्षेत्र को गुंजायमान करती हैं।  जितने सुंदर प्राकृतिक दृश्य पन्ना में मौजूद हैं वैसे ही इसकी दुर्लभ हीरे की खदानें विश्व प्रसिद्ध हैं। पन्ना का सर्वाधिक विकास बुंदेलखंड केसरी महाराज छत्रसाल के समय में हुआ था। पन्ना में अनेक सुंदर मंदिर हैं जो पर्यटन की दृष्टि से दर्शनीय तो हैं ही साथ ही धार्मिक स्थलों के रूप में इनकी अपनी मान्यताएं हैं। 

पद्मावती मंदिर
माई तोहरे रूप हजार, मातु जागदम्बिके
मोरी सुनियो अरज पुकार, मातु जागदम्बिके

पद्मावती देवी का मंदिर किलकिला नदी के तट पर स्थित यहां का सबसे प्राचीन मंदिर है देवी दुर्गा के नौ रूपों की यहां पर प्रतिमाएं विद्यमान हैं। पद्मावती देवी पन्ना नरेश की कुलदेवी थीं। इस अत्यंत सुंदर मंदिर के चारों ओर का  दृश्य अत्यंत मनोहारी है।

तोरे द्वार पड़े हम आज, भवानी दरसन दो दरसन दो मैया रानी, भवानी दरसन दो
मैहर में तू मातु शारदे, पद्मावती पन्ना में भवानी दरसन दो
दरसन दो, हे विंध्यवासिनी दरसन दो
तोरे द्वार पड़े हम आज, भवानी दरसन दो






बलदेव मंदिर
 पन्ना में स्थित बलदेव मंदिर में भगवान कृष्ण के अग्रज बलराम की प्रतिमा स्थपित है। इस मंदिर का निर्माण 140 साल पहले तत्कालीन पन्ना नरेश रुद्र प्रताप सिंह ने कराया था । कहा जाता है कि कृषि कार्य में उनकी विशेष रुचि थी, जिसकी वजह से उन्होंने हल धारण किए बलदाऊ के  भव्य मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर कई विशेषताओं से परिपूर्ण है। इसकी वास्तु शैली पूर्व और पश्चिम के धर्म का संगम कराती प्रतीत होती है। बाहर से देखने पर मंदिर किसी शानदार और विशाल चर्च की तरह नजर आता है जबकि अंदर से एक भव्य मंदिर का रूप लिए है। इस मंदिर के निर्माण में भगवान श्रीकृष्ण की सोलह कलाओं का विशेष ध्यान रखा गया है। मंदिर में प्रवेश करने के लिए 16 सीढिय़ां हैं अंदर 16 मंडप और 16 झरोखे हैं। मंदिर 16 विशाल स्तंभों पर टिका है।






इस मंदिर के स्थापत्य की विशेषता यह है कि यह लंदन के सेंट कैथेड्रल गिरजाघर की अनुकृति के रूप में निर्मित किया गया है। इस मंदिर में गर्भगृह में बलदेव की काले पत्थर की अत्यंत आकर्षक प्रतिमा मौजूद है। विशाल सभा कक्ष है, ऊपर गुंबद है और सभाकक्ष में अनेक गोल स्तंभ हैं। हल षष्ठी  अर्थात भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को देव बलराम के जन्मोत्सव को बड़े ही समारोह पूर्वक मनाया जाता है। बुंदेलखंड में यह अपनी तरह का एकमात्र मंदिर है जो दर्शनीय है और साथ ही श्रद्धालुओं की श्रद्धा का केंद्र बिंदु भी है।

 प्राणनाथ मंदिर 
पन्ना प्राणनाथ मंदिर के लिए भी जाना जाता है। पूरे भारत में इस तरह का यह अपनी तरह का मंदिर है । महामति प्राणनाथ, मध्ययुगीन भारत के अंतिम संत-कवि थे। उन्होंने अपना समस्त जीवन धार्मिक एकता के लिए समर्पित किया था। इसके लिए प्रणामी नामक एक नए पंथ की स्थापना की जिसमे सभी धर्म के लोग सम्मिलित हुए। उनकी वाणी का सार 'तारतम सागर' ग्रंथ में संकलित है जिसमे सभी धर्मों के दिव्य ज्ञान का निचोड़ प्रस्तुत किया गया है। अब यह प्रणामी संप्रदाय का प्रमुख और पवित्रतम ग्रंथ है। महामति प्राणनाथ महाराजा छत्रसाल के गुरु कहे जाते हैं । महाराजा छत्रसाल प्राणनाथ के समर्पित शिष्य थे। छत्रसाल बुंदेलखंड में औरंगजेब के अत्याचारी शासन के खिलाफ लड़ना चाहते थे। लेकिन उनके पास सेना व शस्त्रागार के निर्माण के लिए धन नहीं था। उन्होंने प्राणनाथ से सहायता मांगी। प्राणनाथ ने छत्रसाल को आशीर्वाद दिया। कहा जाता है कि महाराज छत्रसाल को उनके गुरु प्राणनाथ ने यह कहते हुए हीरे का पता बताया था कि 
"छत्ता तेरे राज में धक-धक धरती होय।
 जित जित घोड़ा पग धरे उत-उत हीरा होय।।"





इस मंदिर का निर्माण महाराजा छत्रसाल ने कराया था । मंदिर के गर्भगृह में गुंबद के ठीक नीचे भगवान कृष्ण के मुरली और मुकुट विराजमान हैं। यहां किसी मूर्ति की स्थापना नहीं की गई है क्योंकि प्राणनाथ ने भगवान कृष्ण की सखी भाव से उपासना की थी इसलिए मंदिर में कृष्ण के प्रतीक स्वरूप मुकुट जिसमें मयूर पंख लगा हुआ है और मुरली स्थापित है, जिसकी विधि विधान पूर्वक पूजा अर्चना की जाती है। स्वयं महामति की वाणी देखें….
"प्रेमें गम अगम की करी, प्रेम करी अलख की लाख ! कहें श्री महामति प्रेम समान, तुम दूजा जिन कोई जान !!
नवधा से न्यारा कह्या, चौदे भवन में नाहीं ! सो प्रेम कहाँ से पाइए, जो बसत गोपिका माहिं !!"
 प्रणामी संप्रदाय का यह तीर्थ क्षेत्र माना जाता है । महामति प्राणनाथ प्रणामी धर्म के प्रणेता थे। प्रत्येक शरद पूर्णिमा के अवसर पर हर वर्ष इस मंदिर में देश विदेश से प्रणामी धर्म के अनेक अनुयायी उपस्थित होते हैं, महारास रचाते हैं, पूजन- आराधन- अर्चन करते हैं और कृष्ण की भक्ति में लीन हो जाते हैं। अत्यंत अलौकिक दृश्य देखने को मिलता है। अद्भुत छटा रहती है इस मंदिर के प्रांगण की । शरद पूर्णिमा की प्रखर रोशनी में दुग्ध सा श्वेत धवल मंदिर का गुंबद अपनी अलौकिक छटा बिखेरता है और प्रांगण में होने वाला महारास आत्मा- परमात्मा को एकाकार करता हुआ प्रतीत होता है।

जुगलकिशोर मंदिर
     बुंदेलखंड में गाया जाने वाला एक प्रसिद्ध लोकगीत है जिसकी प्रथम पंक्ति है -
"पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े हैं"
 पन्ना का जुगल किशोर मंदिर बुंदेलखंड के अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण महाराजा हिंदूपत ने कराया था जो पन्ना नरेश थे। इसका वास्तु उत्तर मध्य कालीन स्थापत्य शैली का है। मंदिर का प्रवेश द्वार अत्यंत भव्य है। गर्भगृह के ऊपर स्थित विशाल गुंबद कमल की पंखुड़ियों से सुसज्जित है। इस जुगल किशोर मंदिर में राधा कृष्ण की प्रतिमाएं स्थापित हैं।



मथुरा के मंदिरों के ही समान पन्ना के जुगल किशोर मंदिर की मान्यता है । इस मंदिर में हर वर्ष जन्माष्टमी का समारोह अत्यंत श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है। भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव देखने के लिए दूर-दूर से अनेक श्रद्धालु यहां आते हैं।
जुगल किशोर की लीला का वर्णन इस लोकगीत में देखें ….
"भई ने बिरज की मोर 
सखी री मैं तो भई ने बिरज की मोर ।।
कौन बन उड़ती कौन बन चुनती
कौन बन करती किलोल 
भई ने बिरज की मोर ।।
बन में उड़ती, बन में चुनती
बनई में करती किलोल
भई ने बिरज की मोर ।।
उड़-उड़ पंख गिरे धरनी पै 
बीनत जुगल किशोर 
सखी री मैं तो भई ने बिरज की मोर।।

 राम जानकी मंदिर 
जी के रामचंद्र रखवारे, को कर सकत दगा रे।
दीपक दया धरम को जारे, सदा रहत उजियारे।।
        पन्ना मुख्यालय में स्थापित राम जानकी मंदिर भी अत्यंत भव्य है। इसका निर्माण जुगल किशोर मंदिर की स्थापत्य शैली में ही किया गया है। पन्ना नरेश महाराजा लोकपाल सिंह की पत्नी सुजान कुंवरि ने इस मंदिर का निर्माण कराया था । इसकी वास्तुकला और भव्यता देखने वालों का मन मोह लेती है। इस मंदिर में भगवान राम, लक्ष्मण और सीता की अत्यंत सुंदर प्रतिमाएं स्थापित हैं। रामनवमी का पर्व प्रत्येक वर्ष बड़े ही समारोह पूर्वक यहां मनाया जाता है, जिसमें मौजूदा पन्ना नरेश स्वयं उपस्थित होकर भगवान राम, लक्ष्मण और सीता का पूजन अर्चन करते हैं।
यह सुंदर लोकगीत राम जानकी की महिमा का बखान करने वाला है….
मोरी नैया पार लगाओ जानकी मैया जू 
राम कृपा मिल जाए मोरी मैया जू
जो जीवन तर जाए  मोरी मैया जू 
मोरी नैया पार लगाओ जानकी मैया जू





 गोविंद मंदिर
 पन्ना मुख्यालय में बलदेव मंदिर के ही पार्श्व में कुछ दूरी पर स्थित है गोविंद मंदिर। गोविंद मंदिर में भगवान कृष्ण की अत्यंत सुंदर प्रतिमा स्थापित है । यह मंदिर भी अपनी भव्यता के लिए जाना जाता है। यह मंदिर भी मध्ययुगीन  गुंबद शैली की वास्तुकला पर आधारित मंदिर है । इसका प्रांगण काफी बड़ा है । मंदिर के गुंबद में कमल की पंखुड़ियों की आकृति मौजूद है। श्रद्धालु इसके दर्शन हेतु दूर-दूर से यहां आते हैं इसका निर्माण भी तत्कालीन पन्ना नरेश द्वारा कराया गया था।
कृष्ण गोविंद की लीला अपरम्पार है...
अपने वनमाली कों  तांसे, कहो जसोदा मां से ।
लै गऔ दूध दही की दौनी, उठा हमारे घर से। 
मैं तो बूंद बूंद से जोरत, ऐसो आए कहां से।।


गोविंद मंदिर में भक्तों के द्वारा गाया जाता यह लोकभजन अक्सर ही सुनाई दे जाता है...
भज लो रे गोविंद, भजो घनश्याम
नाम ल्यौ कान्हा को ।।
जाकी माता जसुदा मैया 
पिता नंद महाराज, भजो घनश्याम
नाम ल्यौ कान्हा को ।।


 जगन्नाथ स्वामी मंदिर
  बुंदेलखंड में यह अपनी तरह का अनोखा जगन्नाथ स्वामी मंदिर पन्ना मुख्यालय में पन्ना नरेश के निवास राजमहल "राजमंदिर पैलेस" के निकट स्थित है। कहा जाता है कि पन्ना के तत्कालीन महाराजा किशोर सिंह भगवान जगन्नाथ स्वामी के अनन्य भक्त थे । जब उन्होंने जगन्नाथ पुरी की यात्रा की तो भगवान जगन्नाथ ने स्वप्न में उन्हें यह निर्देश दिया कि वे पन्ना में जगन्नाथ स्वामी का मंदिर निर्मित कराएं । जगन्नाथ स्वामी मंदिर में भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम की मूर्तियां स्थापित हैं। ये मूर्तियां पुरी, उड़ीसा स्थित भगवान जगन्नाथ के मंदिर में स्थापित मूर्तियों की ही प्रतिकृति हैं।








मंदिर के द्वार पर दो विशाल सिंह की प्रतिमा मौजूद है। मुख्य मंदिर मध्ययुगीन वास्तुकला पर आधारित गुंबद शैली का है, जिसके शिखर पर स्वर्ण कलश मौजूद है। पुरी की ही भांति इस मंदिर में भी आषाढ़ शुक्ल  द्वितीय को रथ यात्रा महोत्सव का आयोजन किया जाता है । भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलराम सहित रथ पर सवार हो पन्ना से लगभग 5 किलोमीटर दूर जनकपुर नामक स्थल तक जाते हैं। रथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा समारोह पूर्वक पूजन-अर्चन किया जाता है।
आरती श्री जगन्नाथ मंगलकारी,
परसत चरणारविन्द आपदा हरी।
निरखत मुखारविंद आपदा हरी,
कंचन धूप ध्यान ज्योति जगमगी।
अग्नि कुण्डल घृत पाव सथरी। आरती..

 राधिका रानी मंदिर 
किलकिला नदी के तट पर राधिका रानी का मंदिर स्थित है। प्रणामी धर्म के अनुयायी इस मंदिर में विशेष रूप से पूजा अर्चन करते हैं । इस मंदिर का निर्माण भूषण दास धामी द्वारा कराया गया था। इस सुंदर एवं भव्य मंदिर में राधा जी की अत्यंत सुंदर प्रतिमा मौजूद है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें सीढ़ीयुक्त एक कलात्मक प्राचीन बावड़ी है। प्रणामी धर्म के अनुयायी महामति प्राणनाथ के मंदिर दर्शन के उपरांत राधिका रानी के मंदिर का भी दर्शन अवश्य करते हैं। शरद पूर्णिमा महोत्सव के दौरान इस मंदिर की छटा, साज-सज्जा देखने लायक रहती है। 

देश-विदेश से श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं।
राधिका रानी और कृष्ण कन्हैया का होली खेलने का वर्णन इस लोकगीत में चित्रित हुआ है….
राधा खेले हो, मनमोहन के साथ मोरे रसिया 
कै मन केसर गारी हो 
कै मन उड़त गुलाल मोरे रसिया 
नौ मन केसर गारी हो,
दस मन उड़त गुलाल मोरे रसिया 
कौंना की चूनर भींजी हो 
कौंना की पंचरंग पाग मोरे रसिया 
राधा की चूनर भींजी हो 
कान्हा की पंचरंग पाग मोरे रसिया 

लोककवि ईसुरी राधिका रानी और गिरधर गोपाल की लीला का वर्णन करते हुए कहते हैं...
नैना श्री वृषभानु कुंवरि के, दरस लेत गिरधर के।
अंजन मुकुर कंज वन गंजन, रंजन वारे सर के।।




 हनुमान मंदिर 
पन्ना मुख्यालय में पहाड़ कोठी  एवं धर्मसागर तालाब के समीप स्थित हनुमान मंदिर अत्यंत प्राचीन मंदिर है, जहां प्रत्येक मंगलवार एवं शनिवार को श्रद्धालुओं की भीड़ लगती है। अनेक दर्शनार्थियों दूर- दूर से मंदिर में आते हैं और श्री हनुमान का अत्यंत श्रद्धापूर्वक पूजन -अर्चन करते हैं। यह अत्यंत सिद्ध क्षेत्र माना जाता है।
इस लोकगीत में महावीर हनुमान की महिमा का बखान किया गया है...
हे महाबीर हनुमान, 
तोरी महिमा न्यारी कलयुग में
तू संकटहारी कलयुग में

    पन्ना ज़िले में भी अनेक प्राचीन मंदिर हैं, जैसे ग्राम नचना का शिव मंदिर, भैरव घाटी स्थित काल भैरव मंदिर, मुख्यालय स्थित चोपड़ा मंदिर, बंगला मंदिर, बड़े गणेश मंदिर, भगवान पार्श्वनाथ मंदिर आदि।
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