Friday, March 26, 2021

ब्रह्मवादिनी : भारतीय संस्कृति से परिचित कराता काव्य संग्रह | पुस्तक समीक्षा | डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh



प्रिय ब्लॉग पाठकों,

     आज दिनांक 26.03.2021 को दैनिक समाचार पत्र 'आचरण' में मेरी लिखी पुस्तक समीक्षा प्रकाशित हुई है।

हार्दिक आभार 'आचरण' 🙏

इस ब्लॉग के सुधी पाठकों की पठन सुविधा हेतु वह समीक्षा  यहां प्रस्तुत है -

पुस्तक समीक्षा

ब्रह्मवादिनी : भारतीय संस्कृति से परिचित कराता काव्य संग्रह

            - डाॅ. वर्षा सिंह

                

 काव्य संग्रह - ब्रह्मवादिनी

 कवयित्री - डाॅ. सरोज गुप्ता

 प्रकाशक - जे.टी.एस. पब्लिकेशन्स, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053

 मूल्य - रुपए 595/-

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          संस्कृति मानव जीवन का परिष्कृत स्वरूप है। संस्कृति मनुष्य की वैचारिक परिपक्वता को प्रतिबिम्बित करती है। संस्कृति की व्युत्पत्ति ‘‘सम्यक कृतिः संस्कृतिः’’ की भांति पाणिनी के अनुसार ‘‘स्त्रियां क्तिन्’’ सूत्र से क्तिन् प्रत्यय से हो कर संस्कृति शब्द की उत्पत्ति होती है तथा भारत में विकसित होने वाली संस्कृति भारतीय संस्कृति कहलाती है। संस्कृति मनुष्य के भूत तथा भविष्य का आकलन एवं निर्धारण करती है। संस्कृति से ही संस्कार बनते हैं और संस्कार मनुष्य को संस्कारित करते हैं। भारतीय संस्कृति में स्त्रियों का विशेष स्थान रहा है। प्राचीन भारत में स्त्रियों को वैद पढ़ने और वैदिक मंत्रों के सृजन करेन का अधिकार था। भारत में पुरुषों के साथ ही भारतीय महिला दार्शनिकों तथा साध्वियों की लम्बी परंपरा रही है। वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी स्त्रियों का योगदान रहा है। ऋग्वेद के बहुत से मंत्र और सूक्त स्त्रियों द्वारा रचे गए हैं। इन लेखिकाओं को ‘‘ऋषिका’’ और ‘‘ब्रम्हवादिनी’’ कहा जाता था। इन्हीं में से एक, वाक नामक कवयित्री ने देवी सूक्त की रचना की थी। घोषा, लोपामुद्रा, शाश्वती, अपाला, इन्द्राणी, सिकता, निवावरी आदि विदुषी स्त्रियों के कई नाम मिलते हैं जो वैदिक मन्त्रों तथा स्तोत्रों की रचयिता हैं । ऋग्वेद में बृहस्पति तथा उनकी पत्नी जुहु की कथा मिलती है ।

            समीक्ष्य पुस्तक ‘‘ब्रम्हवादिनी’’ यूं तो एक काव्य संग्रह है किन्तु यह प्राचीन भारत के यशस्वी पक्ष को सामने रखता है। विदुषी लेखिका एवं कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता की इस काव्यात्मक कृति में ब्रह्मवादिनी ऋषिकाओं का विस्तृत परिचय मिलता है। यह काव्यसंग्रह कोरोनाकाल के अवसादी वातावरण को उत्साह में कदलते हुए लिखा गया। जैसा कि पुस्तक के प्रथम फ्लैप में आचार्य पंडित दुर्गाचरण शुक्ला ने लिखा है - ‘‘कोरोना महामारी की घोर निराशा भरी महानिशा जैसे दुष्काल में जब पूरे विश्व में मृत्यु के संत्रास से पूरी मानव जाति पीड़ित थी उसके बीच में भी कुछ मानुष मृत्यु को चुनौती दे रहे थे- ‘न मृत्यु अवतस्थेकदाचन’ (ऋग्वेद -10/49/5) मैं मृत्यु के लिए नहीं बना, मैं तो अमृत पुत्र हूं। डॉ सरोज गुप्ता उसी मानुष वर्ग की है। उसने महामारी की चुनौती स्वीकारी और आगम निगम ज्ञान की धाराओं के सामान्य परिचय प्रदान करने को मुझ से आग्रह किया। मैं तो जाने कब से यह आशा किए प्रतीक्षा कर रहा था कि कभी कोई जिज्ञासु ज्ञान की इन धाराओं के मूल उत्स को जानने समझने की इच्छा करे और मेरी संचित इस ज्ञान संपत्ति को सार्थकता प्रदान करे। इसी पृष्ठभूमि में अध्ययन प्रारंभ हुआ जिसका प्रथम प्रसून डॉ सरोज की यह ब्रह्मवादिनी काव्य संग्रह है।“




          वर्तमान वैश्विक युग में जब पाश्चात्य सांस्कृतिक मूल्य विभिन्न संचार माध्यमों से हर आयुवर्ग के स्त्री-पुरुषों को प्रभावित करते रहते हैं, तब ऐसे दौर में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की पुनस्र्थापना की आवश्यकता महसूस होने लगती है। इस दृष्टि से यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्राचीन भारत में, विशेष रूप से वैदिक युग में स्त्रियों की स्थिति कितनी सुदृढ़ थी। यह जान कर सुखद लगता है कि वैदिक युग में अनेक स्त्रियां ऐसी हुईं जिन्होंने ऋचाओं का सृजन किया। ऋचाओं का सृजन करने के कारण इन स्त्रियों को  ऋषिकाएं कहा गया। इन्हीं ऋषिकाओं के बारे में पंडित दुर्गाचरण शुक्ला ने ‘ब्रह्मवादिनी-दृष्ट मंत्र भाष्य एवं अवदान’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक से प्रेरणा प्राप्त कर डाॅ. सरोज गुप्ता ने ऋषिकाओं पर काव्य रचा।

        कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता ने ‘‘पूर्व पाठिका’’ के रूप में काव्य संग्रह की भूमिका में अपनी इस पुस्तक की प्रेरणा, आधार एवं सृजन के बारे में लिखा है- ‘‘जब लीक से अलग हटकर चिंतन मनन की दिशा बदलती है कुछ विशेष कार्य संपन्न होता है तो आत्मिक खुशी मिलती है। परमेश्वर की असीम अनुकंपा एवं गुरुदेव के आशीर्वाद के परिणाम स्वरूप मुझे वैदिक काल की ऋषिकाओं को पढ़ने का अवसर मिला। मुझे कोरोनाकाल में गुरुदेव आचार्य पंडित दुर्गाचरण शुक्ल जी की पुस्तक ‘ब्रह्मवादिनी-दृष्ट मंत्र भाष्य एवं अवदान’ प्राप्त हुई। सरल एवं सहज भाषा में संस्कृत की जटिलताओं से सर्वथा मुक्त ज्ञान गंगा की तरह निर्मल, शीतल जल के प्रवाह सी सतत प्रवाहमाना भाषा शैली, आत्मिक शांति प्रदान करने वाली अद्वितीय वैदिक ज्ञानगम्य पुस्तक मैंने पढ़ी। इस पुस्तक में वैदिक ऋषिकाओं की, ऋचाओं की, विद्वतापूर्ण गवेष्णात्मक व्याख्यायें, भाष्य टीका और गुरुदेव के अनुभवों और चिंतन की एक नवीन दृष्टि मुझे मिली। मैं ऋषिकाओं की कालजयी और कालातीत ऋचाओं के पढ़ने के आनंद को आज तक महसूस कर रही हूं। ऋषिका को पढ़ते-पढ़ते मन पर जो प्रतिक्रिया हुई, मन की आंखों ने कल्पना में भजन-पूजन करते-करते उन्हें जिस रूप में देखा, उसी को काव्य रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास इन रचनाओं में किया है। मुझे लगा कि हमारे भारत देश व बुंदेलखंड की स्त्रियां ज्ञान के क्षेत्र में इतनी आगे थीं तो यह आदर्श नई पीढ़ी एवं नारी शक्ति के समक्ष पहुंचना चाहिए। अतः ‘ब्रह्मवादिनी’  काव्य संग्रह वैदिक काल की ऋषिकाओं की तपस्या साधना व उनके द्वारा अंतर्भासिक दिव्य ज्ञानदृष्टि को जानने-समझने की दिशा में एक छोटा सा प्रयास है।’’

        इस काव्य संग्रह में संग्रहीत प्रत्येक कविता एक-एक ब्रह्मवादिनी ऋषिका का परिचय प्रस्तुत करती है। लोपामुद्रा, रोमशा, विश्ववारा आत्रेयी, अपाला अत्रिसुता, शश्वती, नद्यः ऋषिका, यमी वैवश्वती, वसुक्रपत्नी, काक्षीवती घोषा, अगस्त्यस्वसा, दाक्षयणी अदितिः, सूर्या सावित्री, उर्वशी, दक्षिणा प्राजापत्या, सरमा देवशुनी, जुहूः ब्रह्मजाया, वाग आम्भृणी, रात्रि भारद्वाजी, गोधा, इंद्राणी, श्रद्धा कामायनी, देवजामयःइंद्रमातरः, पौलोमी शची, सार्पराज्ञी, निषद उपनिषद, लाक्षा, मेधा तथा श्री नामक ऋषिकाओं का सुंदर विवरण संग्रह में दिया गया है। छंद मुक्त इन कविताओं में सुंदर शब्दों का चयन एवं पठनीय लयात्मकता है। उदाहरण के लिए नद्यः ऋषिका कविता की यह पंक्तियां देखें -

नद्यः ऋषिका को पढ़ते पढ़ते

मैंने नदी को दृष्टि भर अपलक देखा

वह मुझमें मेरे अस्तित्व में समाती हुई

मां का वात्सल्य, बहिन का स्नेह, प्रेयसी का प्यार

उंड़ेलती हुई, अनंत गहराई लिए, तापसी सी।

अविराम अहिर्निश गति को साधती सी

कत्र्तव्यपथ की प्रेरणा बन, सम्मुख प्रस्तुत हुई

मौन, निःशब्द प्रार्थना के स्वर में झंकृत हो

मेरे ही कण्ठ से।


 


डाॅ. सरोज गुप्ता की इन कविताओं में संस्कृतनिष्ठ शब्दों से उत्पन्न भाव प्रभाव पाठक के मन को वैदिक अनुभूति कराने में सक्षम हैं। जैसे ऋषिका रात्रि भारद्वाजी पर केन्द्रित कविता की ये पंक्तियां -

दैदीप्यमान, प्रकाशवती विश्वाःश्रियाः

सृष्टि के मूल की रात्रि रूप महाबीज

विशिष्ट नक्षत्र रूप नेत्रों से सब ओर झांकती

तम रूप ओजस्वी ओढ़ती सारी चमक

जीवरात्रि, ईशरात्रि, महाप्रलयकालरात्रि

सृष्टि की अव्यक्त शक्ति

ब्रह्ममयी एकार्णव चित्तशक्ति

ऋषिका रात्रि भारद्वाजी


         कलेवर की दृष्टि से यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण एवं पठनीय है। यह रेखाचित्रों से सुसज्जित नयनाभिराम आकर्षक आवरण वाली लगभग 150 पृष्ठों की हार्ड बाउंड पुस्तक है। किन्तु इस पुस्तक की कीमत रुपये 595/- है जो कि बहुत अधिक है। यदि इस पुस्तक की कीमत कुछ कम होती तो यह अधिक पाठकों द्वारा खरीद कर पढ़ी जा पाती। फिर भी इस काव्य संग्रह में पिरोए गए ज्ञान का महत्व इसके मूल्य से कहीं अधिक है। जैसा कि पुस्तक के दूसरे फ्लैप में भारतीय संस्कृति के अध्येता डाॅ. श्यामसुंदर दुबे ने इस काव्य संग्रह के बारे में बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है-‘‘ विदुषी लेखिका ने अपनी भूमिका में यह पूर्ण रूप से स्पष्ट कर दिया है कि ब्रह्मवादिनी उन सभी ऋषिकाओं के निमित्त है जो मंत्र दृष्टा रही हैं। इन ऋषिकाओं का जन्म क्षेत्र, उनका व्यक्तित्व और कृतित्व इस विशिष्ट कृति में समावेशित है। साथ ही साथ उनके काव्य के भावना परिदृश्य को भी इसमें प्रत्यक्ष किया है। भारतीय मेधा का यह प्राकट्य हमारे वर्तमान कालिक चिंतन को नवीन दिशा प्रदान करेगा और नारी विमर्श के परिदृश्य को विस्तारित करेगा। चित्रों से सुसज्जित यह कृति अपनी अभिराम शैली में अपने पाठक वर्ग को न केवल सम्मोहित करेगी बल्कि उसके ज्ञानात्मक अवबोधन के क्षेत्रफल का विस्तार भी करेगी।’’

         भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण पक्ष को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करके डाॅ. सरोज गुप्ता ने निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कार्य किया है जिसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।                                                                                           -----------------

Tuesday, March 16, 2021

समृद्ध सोच की गवाही देती हैं ऐतिहासिक धरोहर - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | पुस्तक लोकार्पण समारोह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों,  दिनांक 14.03.2021 को मुझे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह को विशिष्ट अतिथि के रूप में एक पुस्तक का  लोकार्पण करते हुए इस बात की प्रसन्नता हुई कि यह पुस्तक जिसका नाम है "ब्रह्मवादिनी", भारतीय संस्कृति और उसके मूल्य पर आधारित विचारों से युक्त उन स्त्रियों के बारे में है जिन्होंने भारतीय संस्कृति को आकार देने में अपनी महती भूमिका निभाई है। इस पुस्तक की विदुषी लेखिका हैं डॉ सरोज गुप्ता।
इस लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता की मेरी छोटी बहन डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने, मुख्य अतिथि थीं 'आचरण' समाचार पत्र की प्रबंध संपादक श्रीमती निधि जैन, तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में मेरे साथ थीं नगर की प्रतिष्ठित गायनोलॉजिस्ट डॉ (श्रीमती) ज्योति चौहान। कांची रेस्टोरेंट में आयोजित इस आयोजन में भारतीय शिक्षण मंडल सागर की सभी बहनें उपस्थित थीं।
     वैदिक काल स्त्रियों का मान-सम्मान पुरुषों से कम नहीं था। अनसूया, अहल्या, अरुन्धती, मदालसा आदि अगणित स्त्रियाँ वेदशास्त्रों में पारंगत थीं। अनसूया, अहल्या, अरुन्धती, मदालसा आदि अगणित स्त्रियाँ वेदशास्त्रों में पारंगत थीं। स्त्रियां भी पुरुषों की तरह वेदाध्ययन व यज्ञ करती और कराती थीं। वे यज्ञ- विद्या और ब्रह्म- विद्या में पारंगत थीं।
"तैत्तिरीय ब्राह्मण’’ में सोम द्वारा ‘सीता- सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है—

तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त। 
अथ ह सीता सावित्री। 
सोमँ राजानं चकमे। 
तस्या उ ह त्रीन् वेदान् प्रददौ। 
इस मन्त्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता- सावित्री को तीन वेद दिये।
ऋग्वेद 10/ 85 में सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिका ‘सूर्या- सावित्री’ है। ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है—

ऋषिर्दर्शनात्। स्तोमान् ददर्शेति। ऋषयो मन्त्रद्रष्टर:।
अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है। 
ऋषियों के समतुल्य ऋषिकाओं को भी विद्याअध्ययन, वेदों पर शास्त्रार्थ आदि का अधिकार था। इनमें ऋषिका लोपामुद्रा, ऋषिका विश्ववारा, ऋषिका अपाला, ऋषिका शाश्वती, ऋषिका रोमशा, ऋषिका श्री, ऋषिका लाक्षा, ऋषिका सार्पराज्ञी प्रमुख हैं। वागाम्भृणी, यमी वैवश्वती, सरमा, सूर्यासावित्री, श्रृद्धा, मेधा, दक्षिणा आदि ने आरण्यक कुटियों में गृहस्थ जीवन जीते हुए ब्रह्म से साक्षात्कार किया। हमारा अतीत बहुत समृद्ध है और आज वह हमारा ज्ञान पश्चिम में पुष्पित- पल्लवित हो रहा है जबकि हम पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं।    


    इस समारोह में मैंने यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ वर्षा सिंह ने महिलाओं की सहृदयता एवं सशक्तिकरण को अपना सृजनात्मक स्वर दे कर ग़ज़ल प्रस्तुत की - 

इसमें दुर्गा, इसी में मीरा भी
आधी दुनिया का आब है औरत

इसको पढ़ना ज़रा आहिस्ता से
प्यार की इक किताब है औरत

डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने अध्यक्षीय उद्बोधन में अनेक उदाहरणों के साथ कहा कि प्राचीन भारत में भारतीय जनमानस की सोच संकुचित नहीं थी। प्रागैतिहासिक काल के भित्तिचित्र इस बात के साक्ष्य हैं कि उस समय भी स्त्रियां पुरुषों की तरह आखेट में, आयुध संचालन में बढ़चढ़कर हिस्सा लेती थीं। डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने ऋषि याज्ञवल्क्य और गार्गी के मध्य हुए शास्त्रार्थ की कथा सुनाई। साथ ही कहा कि वैदिक काल में धर्म, ज्योतिष, ज्यामिति, पाककला, नृत्य, संगीत आदि चौंसठ कलाओं में वे निपुण हुआ करती थीं। वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी स्त्रियों का योगदान रहा है। वैदिक काल से लेकर मुगलकाल के पहले तक वैचारिक रूप से महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता थी। ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के समय के देश की समृद्धि, उत्कृष्ट सोच व खुले विचारों की गवाही देश की ऐतिहासिक धरोहरें, मूर्तिकला, चित्रकला, स्थापत्य कला के केन्द्र खजुराहो, कोणार्क जैसे मंदिर देते हैं। जहां जिस मंदिर के गर्भगृह में शिव, विष्णु, सूर्य आदि देवप्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं, वहीं उसी मंदिर की भित्तियों पर मिथुन मूर्तियों से ले कर जीवन के प्रत्येक सोपान को, रोजाना के कार्यकलाप को, उस समय के देशकाल को प्रदर्शित करती सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। यह तत्कालीन भारतीय जनमानस की उदात्तता अर्थात् ब्रॉडमाइंड का साक्ष्य है। आक्रांताओं के कारण आई पर्दा प्रथा , सती प्रथा, बालविवाह जैसी कुरीतियों का
का अनेक समाज उद्धारकों ने विरोध कर स्त्री को इनसे मुक्त कराया। वर्तमान समय की नारी हर क्षेत्र में आपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज़ करा  रही है। वह ब्रह्मवादिनी की ही तरह सम्मान पा रही है। ब्रह्मवादिनी काव्यसंग्रह का उद्देश्य वैदिक संस्कृति के ज्ञान का प्रसारण करना है। 
यहां प्रस्तुत तस्वीरें और समाचार उसी लोकार्पण समारोह की हैं -

 

Monday, March 15, 2021

चित्रकला कार्यशाला जहां कला ने जीवन्त किया वैज्ञानिकों को | समीक्षात्मक रिपोर्ट | डाॅ. वर्षा सिंह,

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, कल दिनांक 14 मार्च 2021 को 'आचरण' समाचार पत्र के सागर संस्करण में चित्रकला वर्कशॉप पर मेरी समीक्षात्मक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। जिसके लिए मैं 'आचरण'  की आभारी हूं। 🙏
    वस्तुतः चित्रकला का हम दोनों बहनों को बचपन से ही शौक रहा है। इसीलिए जब भी मेरे शहर में चित्रकला की कोई एक्जीबिशन या वर्कशॉप होता है, तो हम उसे देखने अवश्य जाती हैं। इस बार शहर के 'रंग के साथी' ग्रुप के असरार अहमद और अंशिता वर्मा ने वर्कशॉप किया जिसकी थीम थी 'विज्ञान में रंग'।

भारतीय चित्रकला का इतिहास बहुत पुराना है। भारतीय कला की लंबी परंपरा है। प्रागैतिहासिक काल की रॉक पेंटिंग्स सबसे पुरानी भारतीय पेंटिंग्स हैं। भीमबैठका (भोपाल), आबचंद (सागर) मध्यप्रदेश के रॉक आश्रयों जैसे स्थानों में पाए जाने वाले पाषाण युग के रॉक चित्रों में अनेक लगभग 30,000 वर्ष पुराने हैं। अजंता गुफाओं की पेंटिंग्स विश्व धरोहर हैं। मुगल चित्रकला, राजस्थानी क़लम आदि पूरी दुनिया में मशहूर हैं। आधुनिक भारतीय चित्रकला का उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध में अधिक विकास हुआ। कोलकाता, मुम्बई और चेन्नई आदि प्रमुख भारतीय शहरों में  यूरोपीय मॉडल पर कला स्कूल स्थापित हुए। त्रावणकोर के राजा रवि वर्मा के मिथकीय और सामाजिक विषयवस्तु पर आधारित तैल चित्र इस काल में सर्वाधिक लोकप्रिय हुए। रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, इ.बी हैवल और आनन्द केहटिश कुमार स्वामी ने बंगाल कला शैली की चित्रकारी में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बंगाल कला शैली ‘शांति निकेतन’ में  रवीन्द्रनाथ टैगोर के सान्निध्य में फली-फूली। टैगोर ने वहां ‘कलाभवन’ की स्थापना की। जहां प्रतिभाशील कलाकार जैसे नंदलाल बोस, विनोद बिहारी मुखर्जी, आदि उभरते कलाकार प्रशिक्षित हुए। नन्दलाल बोस भारतीय लोक कला तथा जापानी चित्रकला से प्रभावित थे और विनोद बिहारी मुकर्जी प्राच्य परम्पराओं में गहरी रुचि रखते थे। इस काल के अन्य चित्रकार जैमिनी राय ने उड़ीसा की पट-चित्रकारी और बंगाल की कालीघाट चित्रकारी से प्रेरणा प्राप्त की। भारतीय महिलाओं में अमृता शेरगिल ने पेरिस, बुडापेस्ट में शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद भारतीय विषयवस्तु को लेकर गहरे चटख रंगों से चित्रकारी की। उन्होंने विशेषरूप से भारतीय नारी और किसानों को अपने चित्रों का विषय बनाया। यद्यपि इनकी मृत्यु अल्पायु में ही हो गई परंतु वह अपने पीछे भारतीय चित्रकला की समृद्ध विरासत छोड़ गई हैं। इन सभी चित्रकारों का योगदान अविस्मरणीय है।
   आज चित्रकला छोटे शहरों में भी लोगों में रुचि उत्पन्न कर रही है।
ब्लॉग पाठकों की पठन-सुविधा हेतु  यहां प्रस्तुत है मेरे प्रकाशित लेख जस का तस..

समीक्षात्मक रिपोर्ट
  चित्रकला कार्यशाला जहां कला ने जीवन्त किया वैज्ञानिकों को
               - डाॅ. वर्षा सिंह, कला समीक्षक
                       
     आज विज्ञान हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। बिना वैज्ञानिक सुविधाओं के हमारा रोजमर्रा का जीवन सुचारु रूप से चल ही नहीं सकता है। विज्ञान से समाज को लाभान्वित करने वाले वैज्ञानिकों को कैनवास पर जीवन्त करने की कार्यशाला का आयोजन किया नगर की संस्था रंग के साथी ने। शासकीय उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सागर में विगत 08 मार्च से 13 मार्च तक छः दिवसीय कार्यशाला में रंग के साथी ग्रुप के कलाकारों ने विद्यार्थियों के साथ मिल कर 16 वैज्ञानिकों के चित्र कैनवास पर चित्रित किए। इस पोट्रेट पेंटिंग कार्यशाला को नाम दिया गया ‘‘विज्ञान में रंग’’। इस कार्यशाला का उद्देश्य नगर में छिपी प्रतिभाओं को एक मंच देना और विद्यार्थियों को चित्रकला के प्रति रुचि जगाना है। इस कार्यशाला की विशेष बात यह है कि इसमें प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक के वैज्ञानिकों के चित्र बनाए गए जिसे दर्शकों, विद्यार्थियों और कलाप्रेमियों को चरक से ले कर डाॅ.अब्दुल कलाम तक अपने देश के वैज्ञानिकों को स्मरण करने और उनके प्रति आभार प्रकट करने का एक कलात्मक अवसर मिला।

पोट्रेट पेंटिंग चित्रकला की एक ऐसी शैली है जो असीम धैर्य और रंग संयोजन में महारत की मांग करती है। इसमें किसी व्यक्ति के चेहरे, भावभंगिमा के साथ ही उसके देशकाल और समय को भी एकसाथ चित्रित करना होता है। इसमें लाईट और शेड्स की इतने कमाल की प्रस्तुति होनी चाहिए कि पेंटिंग को देखने वाला यह आसानी से समझ सके कि पेंटिंग में जिस व्यक्ति को दिखाया गया है वह कितने उजाले में और किस समय अपना पोज़ दे रहा था। उस समय उसकी मनोदशा और भाव-भंगिमा क्या थी। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है लियोनार्दो द विंसी की मोनालिसा पोट्रेट पेंटिंग। यूं भी यूरोपियन रेनासां काल की पोट्रेट पेंटिंग्स सारी दुनिया के लिए आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करती हैं जबकि भारत में राजा रवि वर्मा ने इस कला को एक अलग ही स्थापना दी। रंग के साथी ग्रुप द्वारा आयोजित ‘‘विज्ञान में रंग’’ कार्यशाला में एक्रेलिक रंगों से कैनवास पर बनाए गए पोट्रेट मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालने में सक्षम रहे। इन पोट्रेट्स में रंगों के कुशल संयोजन ने वैज्ञानिकों के चित्रों को जीवन्त कर दिया।  
 असरार अहमद ने वैज्ञानिक डाॅ. अब्दुल कलाम, अंशिता वर्मा ने होमी जहांगीर भाभा, शालू सोनी ने हरगोविन्द खुराना, अनुषा जैन ने विक्रम साराभाई, रश्मि पवार ने चरक, मोनिका जैन ने विश्वेश्वेरैया, लक्ष्मी पटेल ने सुश्रुत, काजोल गुप्ता ने बाणभट्ट, भूमिका ने सी.वी. रमन, सीमा कटारे ने प्रफुल्लचंद्र राय, मीनाक्षी ने जगदीशचंद्र बोस, हिमानी ने एस. रामानुजम, दिव्या ने कणाद, मुस्कान ने सुब्रमन्यम चंद्रशेखर, दीपिका ने आर्यभट्ट को अपनी तूलिका से कैनवास पर जीवंत कर दिया। गहरे और धूसर रंगों के सुदर संयोजन के साथ ही सभी चित्रों में चेहरे का आनुपातिक सौष्ठव बड़े सुंदर ढंग से प्रदर्शित किया गया।

रंग के साथी ग्रुप के माध्यम से सागर नगर में चित्रकारी की अलख जगाए रखने वाले नगर के सुप्रसिद्ध चित्रकार असरार अहमद ने बताया कि ‘‘इस कार्यशाला के द्वारा हम चाहते हैं कि नगर के कला प्रेमियों के साथ ही छात्र-छात्राओं में भी चित्रकला की बारीकियों के प्रति रुझान बढ़े और वे इस बात को जानें कि चित्रकला में किसी भी विषय को पेंटिंग का विषय बनाया जा सकता है। इसीलिए इस बार हमने भारतीय वैज्ञानिकों के पोट्रेट बनाने का निर्णय लिया। इससे कला और विज्ञान को एक साथ देखा जा सकता है।’’ पूरी तरह सफल रहे इस आयोजन में विद्यालय की छात्राओं ने बताया कि उन्हें चित्रकारी का शौक है किन्तु वे रंगों का सही और संतुलित प्रयोग करना नहीं जानती थीं जो इस कार्यशाला के द्वारा उन्हें पता चला। चित्रकला के प्रति छात्राओं में जो उत्साह देखने को मिला वह इस कार्यशाला के उद्देश्य को पूरा करने में सक्षम रहा।
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