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Friday, March 26, 2021

ब्रह्मवादिनी : भारतीय संस्कृति से परिचित कराता काव्य संग्रह | पुस्तक समीक्षा | डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh



प्रिय ब्लॉग पाठकों,

     आज दिनांक 26.03.2021 को दैनिक समाचार पत्र 'आचरण' में मेरी लिखी पुस्तक समीक्षा प्रकाशित हुई है।

हार्दिक आभार 'आचरण' 🙏

इस ब्लॉग के सुधी पाठकों की पठन सुविधा हेतु वह समीक्षा  यहां प्रस्तुत है -

पुस्तक समीक्षा

ब्रह्मवादिनी : भारतीय संस्कृति से परिचित कराता काव्य संग्रह

            - डाॅ. वर्षा सिंह

                

 काव्य संग्रह - ब्रह्मवादिनी

 कवयित्री - डाॅ. सरोज गुप्ता

 प्रकाशक - जे.टी.एस. पब्लिकेशन्स, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053

 मूल्य - रुपए 595/-

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          संस्कृति मानव जीवन का परिष्कृत स्वरूप है। संस्कृति मनुष्य की वैचारिक परिपक्वता को प्रतिबिम्बित करती है। संस्कृति की व्युत्पत्ति ‘‘सम्यक कृतिः संस्कृतिः’’ की भांति पाणिनी के अनुसार ‘‘स्त्रियां क्तिन्’’ सूत्र से क्तिन् प्रत्यय से हो कर संस्कृति शब्द की उत्पत्ति होती है तथा भारत में विकसित होने वाली संस्कृति भारतीय संस्कृति कहलाती है। संस्कृति मनुष्य के भूत तथा भविष्य का आकलन एवं निर्धारण करती है। संस्कृति से ही संस्कार बनते हैं और संस्कार मनुष्य को संस्कारित करते हैं। भारतीय संस्कृति में स्त्रियों का विशेष स्थान रहा है। प्राचीन भारत में स्त्रियों को वैद पढ़ने और वैदिक मंत्रों के सृजन करेन का अधिकार था। भारत में पुरुषों के साथ ही भारतीय महिला दार्शनिकों तथा साध्वियों की लम्बी परंपरा रही है। वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी स्त्रियों का योगदान रहा है। ऋग्वेद के बहुत से मंत्र और सूक्त स्त्रियों द्वारा रचे गए हैं। इन लेखिकाओं को ‘‘ऋषिका’’ और ‘‘ब्रम्हवादिनी’’ कहा जाता था। इन्हीं में से एक, वाक नामक कवयित्री ने देवी सूक्त की रचना की थी। घोषा, लोपामुद्रा, शाश्वती, अपाला, इन्द्राणी, सिकता, निवावरी आदि विदुषी स्त्रियों के कई नाम मिलते हैं जो वैदिक मन्त्रों तथा स्तोत्रों की रचयिता हैं । ऋग्वेद में बृहस्पति तथा उनकी पत्नी जुहु की कथा मिलती है ।

            समीक्ष्य पुस्तक ‘‘ब्रम्हवादिनी’’ यूं तो एक काव्य संग्रह है किन्तु यह प्राचीन भारत के यशस्वी पक्ष को सामने रखता है। विदुषी लेखिका एवं कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता की इस काव्यात्मक कृति में ब्रह्मवादिनी ऋषिकाओं का विस्तृत परिचय मिलता है। यह काव्यसंग्रह कोरोनाकाल के अवसादी वातावरण को उत्साह में कदलते हुए लिखा गया। जैसा कि पुस्तक के प्रथम फ्लैप में आचार्य पंडित दुर्गाचरण शुक्ला ने लिखा है - ‘‘कोरोना महामारी की घोर निराशा भरी महानिशा जैसे दुष्काल में जब पूरे विश्व में मृत्यु के संत्रास से पूरी मानव जाति पीड़ित थी उसके बीच में भी कुछ मानुष मृत्यु को चुनौती दे रहे थे- ‘न मृत्यु अवतस्थेकदाचन’ (ऋग्वेद -10/49/5) मैं मृत्यु के लिए नहीं बना, मैं तो अमृत पुत्र हूं। डॉ सरोज गुप्ता उसी मानुष वर्ग की है। उसने महामारी की चुनौती स्वीकारी और आगम निगम ज्ञान की धाराओं के सामान्य परिचय प्रदान करने को मुझ से आग्रह किया। मैं तो जाने कब से यह आशा किए प्रतीक्षा कर रहा था कि कभी कोई जिज्ञासु ज्ञान की इन धाराओं के मूल उत्स को जानने समझने की इच्छा करे और मेरी संचित इस ज्ञान संपत्ति को सार्थकता प्रदान करे। इसी पृष्ठभूमि में अध्ययन प्रारंभ हुआ जिसका प्रथम प्रसून डॉ सरोज की यह ब्रह्मवादिनी काव्य संग्रह है।“




          वर्तमान वैश्विक युग में जब पाश्चात्य सांस्कृतिक मूल्य विभिन्न संचार माध्यमों से हर आयुवर्ग के स्त्री-पुरुषों को प्रभावित करते रहते हैं, तब ऐसे दौर में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की पुनस्र्थापना की आवश्यकता महसूस होने लगती है। इस दृष्टि से यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्राचीन भारत में, विशेष रूप से वैदिक युग में स्त्रियों की स्थिति कितनी सुदृढ़ थी। यह जान कर सुखद लगता है कि वैदिक युग में अनेक स्त्रियां ऐसी हुईं जिन्होंने ऋचाओं का सृजन किया। ऋचाओं का सृजन करने के कारण इन स्त्रियों को  ऋषिकाएं कहा गया। इन्हीं ऋषिकाओं के बारे में पंडित दुर्गाचरण शुक्ला ने ‘ब्रह्मवादिनी-दृष्ट मंत्र भाष्य एवं अवदान’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक से प्रेरणा प्राप्त कर डाॅ. सरोज गुप्ता ने ऋषिकाओं पर काव्य रचा।

        कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता ने ‘‘पूर्व पाठिका’’ के रूप में काव्य संग्रह की भूमिका में अपनी इस पुस्तक की प्रेरणा, आधार एवं सृजन के बारे में लिखा है- ‘‘जब लीक से अलग हटकर चिंतन मनन की दिशा बदलती है कुछ विशेष कार्य संपन्न होता है तो आत्मिक खुशी मिलती है। परमेश्वर की असीम अनुकंपा एवं गुरुदेव के आशीर्वाद के परिणाम स्वरूप मुझे वैदिक काल की ऋषिकाओं को पढ़ने का अवसर मिला। मुझे कोरोनाकाल में गुरुदेव आचार्य पंडित दुर्गाचरण शुक्ल जी की पुस्तक ‘ब्रह्मवादिनी-दृष्ट मंत्र भाष्य एवं अवदान’ प्राप्त हुई। सरल एवं सहज भाषा में संस्कृत की जटिलताओं से सर्वथा मुक्त ज्ञान गंगा की तरह निर्मल, शीतल जल के प्रवाह सी सतत प्रवाहमाना भाषा शैली, आत्मिक शांति प्रदान करने वाली अद्वितीय वैदिक ज्ञानगम्य पुस्तक मैंने पढ़ी। इस पुस्तक में वैदिक ऋषिकाओं की, ऋचाओं की, विद्वतापूर्ण गवेष्णात्मक व्याख्यायें, भाष्य टीका और गुरुदेव के अनुभवों और चिंतन की एक नवीन दृष्टि मुझे मिली। मैं ऋषिकाओं की कालजयी और कालातीत ऋचाओं के पढ़ने के आनंद को आज तक महसूस कर रही हूं। ऋषिका को पढ़ते-पढ़ते मन पर जो प्रतिक्रिया हुई, मन की आंखों ने कल्पना में भजन-पूजन करते-करते उन्हें जिस रूप में देखा, उसी को काव्य रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास इन रचनाओं में किया है। मुझे लगा कि हमारे भारत देश व बुंदेलखंड की स्त्रियां ज्ञान के क्षेत्र में इतनी आगे थीं तो यह आदर्श नई पीढ़ी एवं नारी शक्ति के समक्ष पहुंचना चाहिए। अतः ‘ब्रह्मवादिनी’  काव्य संग्रह वैदिक काल की ऋषिकाओं की तपस्या साधना व उनके द्वारा अंतर्भासिक दिव्य ज्ञानदृष्टि को जानने-समझने की दिशा में एक छोटा सा प्रयास है।’’

        इस काव्य संग्रह में संग्रहीत प्रत्येक कविता एक-एक ब्रह्मवादिनी ऋषिका का परिचय प्रस्तुत करती है। लोपामुद्रा, रोमशा, विश्ववारा आत्रेयी, अपाला अत्रिसुता, शश्वती, नद्यः ऋषिका, यमी वैवश्वती, वसुक्रपत्नी, काक्षीवती घोषा, अगस्त्यस्वसा, दाक्षयणी अदितिः, सूर्या सावित्री, उर्वशी, दक्षिणा प्राजापत्या, सरमा देवशुनी, जुहूः ब्रह्मजाया, वाग आम्भृणी, रात्रि भारद्वाजी, गोधा, इंद्राणी, श्रद्धा कामायनी, देवजामयःइंद्रमातरः, पौलोमी शची, सार्पराज्ञी, निषद उपनिषद, लाक्षा, मेधा तथा श्री नामक ऋषिकाओं का सुंदर विवरण संग्रह में दिया गया है। छंद मुक्त इन कविताओं में सुंदर शब्दों का चयन एवं पठनीय लयात्मकता है। उदाहरण के लिए नद्यः ऋषिका कविता की यह पंक्तियां देखें -

नद्यः ऋषिका को पढ़ते पढ़ते

मैंने नदी को दृष्टि भर अपलक देखा

वह मुझमें मेरे अस्तित्व में समाती हुई

मां का वात्सल्य, बहिन का स्नेह, प्रेयसी का प्यार

उंड़ेलती हुई, अनंत गहराई लिए, तापसी सी।

अविराम अहिर्निश गति को साधती सी

कत्र्तव्यपथ की प्रेरणा बन, सम्मुख प्रस्तुत हुई

मौन, निःशब्द प्रार्थना के स्वर में झंकृत हो

मेरे ही कण्ठ से।


 


डाॅ. सरोज गुप्ता की इन कविताओं में संस्कृतनिष्ठ शब्दों से उत्पन्न भाव प्रभाव पाठक के मन को वैदिक अनुभूति कराने में सक्षम हैं। जैसे ऋषिका रात्रि भारद्वाजी पर केन्द्रित कविता की ये पंक्तियां -

दैदीप्यमान, प्रकाशवती विश्वाःश्रियाः

सृष्टि के मूल की रात्रि रूप महाबीज

विशिष्ट नक्षत्र रूप नेत्रों से सब ओर झांकती

तम रूप ओजस्वी ओढ़ती सारी चमक

जीवरात्रि, ईशरात्रि, महाप्रलयकालरात्रि

सृष्टि की अव्यक्त शक्ति

ब्रह्ममयी एकार्णव चित्तशक्ति

ऋषिका रात्रि भारद्वाजी


         कलेवर की दृष्टि से यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण एवं पठनीय है। यह रेखाचित्रों से सुसज्जित नयनाभिराम आकर्षक आवरण वाली लगभग 150 पृष्ठों की हार्ड बाउंड पुस्तक है। किन्तु इस पुस्तक की कीमत रुपये 595/- है जो कि बहुत अधिक है। यदि इस पुस्तक की कीमत कुछ कम होती तो यह अधिक पाठकों द्वारा खरीद कर पढ़ी जा पाती। फिर भी इस काव्य संग्रह में पिरोए गए ज्ञान का महत्व इसके मूल्य से कहीं अधिक है। जैसा कि पुस्तक के दूसरे फ्लैप में भारतीय संस्कृति के अध्येता डाॅ. श्यामसुंदर दुबे ने इस काव्य संग्रह के बारे में बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है-‘‘ विदुषी लेखिका ने अपनी भूमिका में यह पूर्ण रूप से स्पष्ट कर दिया है कि ब्रह्मवादिनी उन सभी ऋषिकाओं के निमित्त है जो मंत्र दृष्टा रही हैं। इन ऋषिकाओं का जन्म क्षेत्र, उनका व्यक्तित्व और कृतित्व इस विशिष्ट कृति में समावेशित है। साथ ही साथ उनके काव्य के भावना परिदृश्य को भी इसमें प्रत्यक्ष किया है। भारतीय मेधा का यह प्राकट्य हमारे वर्तमान कालिक चिंतन को नवीन दिशा प्रदान करेगा और नारी विमर्श के परिदृश्य को विस्तारित करेगा। चित्रों से सुसज्जित यह कृति अपनी अभिराम शैली में अपने पाठक वर्ग को न केवल सम्मोहित करेगी बल्कि उसके ज्ञानात्मक अवबोधन के क्षेत्रफल का विस्तार भी करेगी।’’

         भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण पक्ष को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करके डाॅ. सरोज गुप्ता ने निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कार्य किया है जिसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।                                                                                           -----------------

Monday, February 22, 2021

तुम कितनी खूबसूरत हो | नाटक | अन्वेषण थिएटर ग्रुप की बेजोड़ प्रस्तुति | समीक्षात्मक रिपोर्ट | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों,   
      यूं तो दृश्य-श्रव्य के मनोरंजन देने वाले अनेक माध्यम हैं, लेकिन निःसंदेह टीवी, सिनेमा, ओटीटी प्लेटफार्म या यू-ट्यूब में किसी ड्रामा को देखने से कहीं सौ गुना ज़्यादा आनंद मिलता है थियेटर में जा कर प्रत्यक्ष किसी ड्रामा या नाटक को देखने पर। सागर शहर में कोरोना लॉकडाऊन के बाद से अभी तक स्थगित नाटकों के मंचन को पुनः मंच देने का कार्य किया कल दिनांक 21.02.2021 को मेरे सागर शहर की अग्रणी संस्था अथग यानी अन्वेषण ग्रुप ऑफ थिएटर ने स्थानीय रवींद्र भवन में यशपाल की कहानी  के अख़तर अली द्वारा किए गए नाट्य रूपांतरण की दो शो में सफल प्रस्तुति के माध्यम से।

   मित्रों, ज़ाहिर है कि मैंने भी इस नाटक को रुचिपूर्वक देखा और इसके मंचन पर मैंने अपनी राय प्रकट की। मैं शुक्रगुज़ार हूं स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" की जिन्होंने मेरी राय... मेरी समीक्षात्मक टिप्पणी को प्रमुखता से प्रकाशित किया।
हार्दिक धन्यवाद आचरण 🙏 
साधुवाद अथग 🙏

जी हां, मेरे द्वारा लिखी नाट्य समीक्षा को आचरण दिनांक 22 फरवरी 2021 में स्थान मिला है, जो जस की तस इस ब्लॉग के सुधी पाठकों के लिए मैं यहां प्रस्तुत कर रही हूं।

समीक्षात्मक रिपोर्ट 

अन्वेषण थिएटर ग्रुप की बेजोड़ प्रस्तुति: नाटक ‘‘तुम कितनी खूबसूरत हो’’ 


          -डॉ. वर्षा सिंह, नाट्य समीक्षक 


किसी भी नाटक की प्रस्तुति कई स्तरों पर समाज को आईना दिखाती है। सुन्दरता समाज में एक टैबू (जुनून) की तरह है। जब बात किसी स्त्री की हो तो उसके व्यक्तित्व की पहली शर्त होती है उसका सुन्दर होना। स्त्री की सुन्दरता के अजीबोगरीब मानक किसी भी स्त्री के लिए डिप्रेशन (अवसाद) का कारण बन जाते हैं। इस डिप्रेशन के चलते वह गम्भीर रूप से बीमार भी पड़ सकती है और उसकी जीने की इच्छा समाप्त भी हो सकती है। वहीं यह नाटक एक संदेश ले कर सामने आता है कि सुन्दरता को ले कर पैदा हुआ डिप्रेशन सुन्दर ढंग से खत्म भी किया जा सकता है। इस केन्द्रीय भावना को ले कर नाटक ‘‘तुम कितनी खूबसूरत हो’’ प्रस्तुत किया गया। रविवार, 21 फरवरी 2021 को दोपहर 3 बजे एवं पुनः शाम 7 बजे  स्थानीय रवीन्द्र भवन, सागर में अन्वेषण थियेटर ग्रुप यानी अथग द्वारा यह नाटक कोरोना संकटकाल के दौरान जनसेवा के लिए जी जान से लगे रहे कोरोना वॉरियर्स के लिये समर्पित किया गया। इस नाटक में डाक्टर, नर्स तथा चिकित्सकीय व्यवस्था का वह मानवीय रूप बखूबी रेखांकित किया गया जो इस कोरोनाकाल में लगभग सभी ने अनुभव किया है। 


दैनिक समाचार पत्र "आचरण", सागर दि. 22.02.2021 


यह नाटक सुप्रसिद्ध कथाकार यशपाल की कहानी का अख्तर अली द्वारा किया गया नाट्य रूपांतरण है जिसका निर्देशन अथग के वरिष्ठ नाट्य निर्देशक जगदीश शर्मा ने किया। सधे हुए कुशल निर्देशन के साथ ही कथानक, अभिनय, मंचसज्जा, संगीत, नाटक में किये गये अभिनव प्रयोग और दर्शकों से लगातार संवाद बनाये रखना ही किसी नाटक की संपूर्ण सफलता का कारण बनते हैं। इस प्रस्तुति में मानसिक हलचल और अंतद्वंद्व को मंच पर बड़ी खूबसूरती से अभिनीत किया गया। मंचसज्जा, लाइट एंड साउंड, बैकग्राउंड साउंड इफेक्ट के खूबसूरत उपयोग से यह नाटक जीवंत हो उठा। नाटक के आरंभ में विषय के अनुकूल प्रस्तुत नृत्य ने एक सम्मोहक शुरुआत की। जिसके बाद नाटक प्रवाहपूर्ण ढंग से अपनी ऊंचाईयों को छूता चला गया।


बुंदेली मिश्रित देशज लहजे में बोले गए चुटीले संवादों ने गंभीर विषय को अत्यंत रोचक बना दिया। लगभग हर दूसरे दृश्य पर तालियों की गडगड़ाहट या हंसी की फुहार ने कलाकारों की हौसला अफजाई जारी रखी। सभी कलाकारों ने शानदार अभिनय किया। मामा के किरदार में वरिष्ठ रंगकर्मी रविंद्र दुबे कक्का ने अपनी दमदार उपस्थिति साबित कर दी। वहीं उमंग के नायकत्व चरित्र में कपिल नाहर ने दर्शकों को प्रभावित किया। नायिका सुगन्धा के चुनौती भरे रोल में करिश्मा गुप्ता ने सब का मन मोह लिया। इनके अतिरिक्त मंच पर विविध भूमिकाओं में दीपक राय, आयुषी चौरसिया, चंचल आठिया, समर पांडेय, प्रवीण कैम्या ने भी अपने अभिनय की छाप छोड़ी। नाटक का सह निर्देशन रिषभ सैनी, मंच प्रबंधन अतुल श्रीवास्तव, गीत-कविता आशीष चौबे, संगीत पार्थो घोष और यशगोपाल श्रीवास्तव, कंपोजर स्व. के.जी. श्रीवास्तव, गायन साक्षी पाण्डेय, कोरस अखिलेश अहिरवार और पार्थो घोष, दृश्य परिकल्पना राजीव जाट, प्रकाश परिकल्पना संतोष दांगी ‘सरस’ का था।  वहीं वस्त्र विन्यास प्रवीण कैम्या,  प्रॉपर्टी नितिन दुबे और आनंद शर्मा, रूप सज्जा कपिल नाहर और नितिन दुबे, ध्वनि प्रभाव सतीश साहू और ऋषभ सैनी की थी। आकर्षक ब्रोशर डिजाइन शहर के मशहूर चित्रकार असरार अहमद ने की थी।


नाटक की मजबूत पटकथा, संवाद एवं कलाकारों के बेजोड़ अभिनय ने नाटक के दौरान दर्शकों को बांधे रखा। कोरोना आपदा के चलते स्थगित रहे नाट्य प्रदर्शन को पुनः मंच प्रदान करते हुए अथग ने एक सफल शुरुआत की है। बड़ी संख्या में दर्शकों ने कोरोना गाइड लाइन का पालन करते हुए इस बेजोड़ नाटक का भरपूर आनंद उठाया। 


नाटक के कुछ रोचक दृश्य जिन्हें नाटक के मंचन के दौरान डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने अपने कैमरे में क़ैद कर लिया।

डॉ (सुश्री) शरद सिंह
डॉ. वर्षा सिंह
डॉ. वर्षा सिंह
डॉ. वर्षा सिंह
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह




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#नाटक #अथग #रवीन्द्रभवन #मंचन

Friday, January 8, 2021

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 16 | बात कैत दो टूक कका जू | बुंदेली ग़ज़ल संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरे कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " में पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत सोलहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर  ज़िले के कवि महेश कटारे 'सुगम' के बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "बात कैत दो टूक कका जू" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
     
सागर : साहित्य एवं चिंतन

 पुनर्पाठ : बात कैत दो टूक कका जू
                           -डॉ. वर्षा सिंह
                            
            इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर जिले के बीना तहसील मुख्यालय में निवासरत बुंदेलखंड के चर्चित कवि महेश कटारे ‘सुगम’ के बुंदेली गजल संग्रह - ‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ को। बुंदेली एक लोकभाषा है। यह लोकभाषा बोली से भाषा तक के सफर में संघर्षरत है लेकिन इसकी साहित्य संपदा पर्याप्त समृद्ध है। यूं भी जब किसी बोली में मौलिक साहित्य सृजन होने लगता है तो वह भाषा के समीप पहुंच जाती है। यदि हिन्दी भाषा की बोलियों और उपभाषा की चर्चा की जाए तो उत्तर भारत की बोलियों ने निरंतर विकास किया है। भाषाई परिभाषा के आधार पर उत्तर भारत की जो प्रमुख बोलियां मानी गई हैं, उनमें प्रमुख हैं- ब्रज, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, अवधी, भोजपुरी, मगधी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, राजस्थानी और रोहेलखण्ड में बोली जाने वाली खड़ी बोली। इन सभी बोलियों में उत्कृष्ट साहित्य सृजन किए जाने की उल्लेखनीय परम्परा चली आ रही है, जो इन बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने योग्य सिद्ध करती है। बुंदेली में एक से बढ़ कर एक काव्य सृजन किए गए हैं। चाहे वीर रस में जगनिक के ‘‘आल्ह खण्ड’’ की बात की जाए या फिर श्रृंगार रस में ईसुरी की फागों की। बुंदेली में गजब का लचीलापन है। इसने अपनी परम्परागत जातीय गरिमा को बनाए रखते हुए विभिन्न भाषाओं के शब्दों को इस तरह आत्मसात किया है कि मानों वे शब्द ठेठ बुंदेली के हों। बुंदेली में छंदबद्ध रचनाएं लिखी गईं तो छंदमुक्त रचनाएं भी लिखी गईं। दोहे, घनाक्षरी, अतुकांत कविताओं के साथ ही गजलें भी बुंदेली में लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। बुंदेली गजल के क्षेत्र में एक चिरपरिचित नाम है कवि महेश कटारे ‘सुगम’ का। 24 जनवरी 1954 को ललितपुर में जन्में कवि ‘सुगम’ मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में प्रयोगशाला तकनीशियन के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद बीना में निवासरत हैं। ‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ गजल संग्रह सन् 2018 में प्रकाशित हुआ, जिसकी गजलें कवि के बुंदेली के प्रति समर्पण और समसामयिक परिदृश्य पर पैनी निगाह की परिचायक हैं।
वर्तमान परिदृश्य व्यवस्थाओं की दृष्टि से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है। तरह-तरह के फर्जी बाड़े के समाचारों से अखबारों के पन्ने भरे रहते हैं। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द के प्रति असंवेदनशील हो चले हैं। यह सब एक संवेदनशील कवि के रूप में महेश कटारे ‘सुगम’ को रोष से भर देता है। उनका यह रोष उनकी इस गजल में देखा जा सकता है-
भैया तू भौतई फर्जी है
खूब चला रओ मनमर्जी है
दुनिया भर में घूमत फिर रओ
घरे रुके की एलरजी है
काट लेत सींवौ नई जानत
एसौ जो कैसो दर्जी है
को का कै रओ कभऊं नई सुनत
फेंक देत सबकी अर्जी है

महेश कटारे की गजलों में एक खास बात यह है कि वे बुंदेली के रोजमर्रा के शब्दों को अपने शेरों में पिरोते हैं। ’ढिंगा’, ‘फुइया’, ‘ओली’, ‘कुठरिया’ जैसे खांटी बुंदेली शब्दों के साथ खड़ी बोली के ‘शुद्ध’ जैसे शब्द को बड़ी सुंदरता के साथ प्रयोग में लाते हैं, जिससे बुंदेली की विशेषता भी बनी रहती है और कथ्य की वजनदारी भी। उदाहरण देखिए-
तनक छांयरे में सुस्ता लो
भूख लगी तौ रोटी खा लो
काम लगो रेनें जीवन भर
बैठो आओ ढिंगा बतया लो
फुइया से मौड़ा मौड़ी हैं
ओली ले के इने खिला लो
सड़ रहे काय कुठरिया भीतर
बाहर आ कें शुद्ध हवा लो

गांव के विकास की बातें हर जगह की जाती हैं। अकसर आंकड़ों में गांवों कें विकास के दम भरे जाते हैं लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ अलग ही तस्वीर दिखाती है। इसी बात पर कवि कटारे प्रश्न उठाते हैं कि -
गांव अबै तक जां के तां हैं
सड़कें बिजली पानी कां हैं
काय जांय हम तीरथ करवे
घर में जब दद्दा अम्मा हैं
अपनौ ईशुर बस मेनत है
तुमखों सब विष्णु बिरमा हैं
जात धरम उर बोली बानी
झगड़े झांसे खामोखां हैं

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ व्यवस्था और राजनीति में ही दोहरापन आया हो, मानवीय आचरण में भी दोहरापन समा गया है। आज अकसर व्यक्ति अपने अधिकार की लड़ाई में अकेला ही खड़ा दिखाई पड़ता है। इस तथ्य पर महेश कटारे ने बड़ी बेबाकी से शेर कहे हैं-
अब आपस में प्यार कितै है
मनचीनौ व्यवहार कितै है
दुख में सैकर परौ आदमी
लड़वे खौं तैयार कितै है
सबरे गुड़ीमुड़ी हो जाते
जनता में हुंकार कितै है

बुंदेलखंड 2004 से ही सूखे की चपेट में रहा। जब बहुत शोर मचा तो पहली बार इलाके को 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। जब किसान तंगहाल होता है तो शेष व्यवसाय भी लड़खड़ाने लगते हैं। बुंदेलखंड की भुखमरी भी सुर्खियों में रही है। इस समाचार ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था कि ‘‘बुंदेलखंड में लोग घास की रोटियां बनाकर खा रहे हैं’’। बुंदेलखंड में खेती खत्म होने, उद्योग न होने और बेरोजगारी-भुखमरी के कारण पलायन की विवशता जागी। किसान दूसरे प्रांतों में मजदूरी करने को विवश हो गए। इस कटु यथार्थ को बड़े ही मार्मिक ढंग से अपनी ग़ज़ल में व्यक्त किया है महेश कटारे ने-
हो हो कें हैरान मरौ है
फांसी लगा किसान मरौ है
मरतौ नईं तौ फिर का करतौ
फसलन कौ मीजान मरौ है
अन्न उगा कें पेट भरततौ
भूखन कौ वरदान मरौ है
गांव गांव में जाकें देखौ
खेत और खरियान मरौ है


बात कैत दो टूक कका जू (बुंदेली ग़ज़ल संग्रह) - महेश कटारे 'सुगम' 


       जीवन में दिखावे की प्रवृत्ति इस कदर प्रभावी हो जा रही है कि लोग ममत्व, अपनत्व और मानवीयता को दरकिनार करने लगे हैं। ऐसे लोगों को विलासिता पर व्यय करते समय उन भूखे-प्यासे इंसानों की याद नहीं आती है। देश में न जाने कितने बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, पुरुष भिखारियों का जीवन बिता रहे हैं। उन्हें कभी एक समय की रोटी मिल जाती है तो कभी दो-दो, तीन-तीन दिन फांके करने पड़ते हैं। आत्मकेंद्रित जीवन के चलन में वृद्ध माता-पिता के दुख-पीड़ा भी भुला दी जाती है। यह परिदृश्य किसी भी कवि की आंखों में आंसू ला सकता है। कवि महेश कटारे भी इस परिदृश्य से द्रवित हो उठते हैं। लेकिन वे आंसू बहा कर चुप नहीं रह जाते हैं वरन् ऐसे आत्मकेन्द्रित लोगों को ललकारते हैं तथा उनकी चेतना जगाने का प्रयास करते हैं-  
भूखन खौं दुत्कार भगा रये शरम करौ
पथरन खौं तुम खीर चढ़ा रये शरम करौ
अम्मा दद्दा भूखे बैठे हैं घर में
पुण्य कमाने तीरथ जा रये शरम करौ
धरम करम ईमान टांग दऔ खूंटा पै
पैसा खौं कैसे भैरा रये शरम करौ
बच्चा भूखे रो रये हैं फुटपातन पै
कुत्ता घर में बिस्कुट खा रये शरम करौ

यूं तो जीवन में अनेक समस्याएं हैं लेकिन इनमें से कई समस्याएं जिस कारण से पैदा होती हैं वह है - मंहगाई। वर्तमान समय में मंहगाई की समस्या अत्यंत विकराल रूप धारण कर चुकी है। कालाधन, जमाखोरी, भ्रष्टाचार, मुद्रा का अवमूल्यन आदि कारण गिनाए जा सकते हैं इस बढ़ती हुई मंहगाई के लिए। किन्तु मात्र कारण गिनाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। समाज का निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग मंहगाई की सबसे अधिक मार झेलता है। वह अपनी आवश्यक जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेता है और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में या तो तिल-तिल कर मरता रहता है या फिर आत्महत्या का रास्ता ढूंढने लगता है। यह जीवन की कटुता भरी सच्चाई है। मंहगाई जीवन की सरसता को किस तरह सोख लेती है वह महेश कटारे के इन शेरों में महसूस किया जा सकता है -
सुख कौ पन्ना मोरौ भैया
रऔ कोरो को कोरौ भैया
हत्यारी ई मेंगाई नें
सब कौ गरौ मरोरौ भैया

‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ गजल संग्रह की गजलों में वह लोकभाषाई आत्मीयता है जो इन्हें बार-बार पढ़ने के लिए उकसाती है। इस संग्रह की गजलों में महेश कटारे ने ग्रामीण और कस्बाई जिन्दगी की समस्याओं को बिना किसी लागलपेट के सामने रखा है। वे भूख, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक तथा आर्थिक विषमता जैसी समस्याओं पर खुल कर कलम चलाते दिखाई देते हैं। ये सभी मुद्दे समसामयिक गजलकारों की गजलों में बखूबी देखी जा सकती है। लेकिन महेश कटारे की गजलें यदि उनमें अपनी अलग पहचान बना पाई हैं तो उसका मूल कारण है उन गजलों का बुंदेली में लिखा जाना और यही इसके पुनर्पाठ का सबसे बड़ा प्रेरक तत्व भी है। अपनी बोली का सोंधापन भला किसे नहीं भाता।

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( दैनिक, आचरण  दि.08.01.2021)
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Monday, November 2, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 13 | समग्र दृष्टिकोण | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत तेरहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के प्रतिष्ठित विचारक, चिन्तक, लेखक एवं उद्योगपति स्व. मोतीलाल जैन की पुस्तक "समग्र दृष्टिकोण" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
सागर : साहित्य एवं चिंतन

     पुनर्पाठ : मोतीलाल जैन कृत ‘समग्र दृष्टिकोण’ 
                           -डॉ. वर्षा सिंह
                                  
           इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो जीवन के विभिन्न पक्षों को गहन दृष्टिकोण के साथ व्याख्यायित करती है। यह पुस्तक है चिंतक एवं विचारक मोतीलाल जैन की पुस्तक ‘समग्र दृष्टिकोण’।

दृष्टिकोण व्यक्ति की आंतरिक वैचारिक स्थिति का द्योतक होता है। दृष्टिकोण की अवधारणा को मनोविज्ञान के अंतर्गत परिभाषित किया गया है। मनोवैज्ञानिक गाॅर्डन आलपोर्ट के अनुसार दृष्टिकोण मनुष्य के मानसिक स्वभाव पर आधारित होता है जिस पर उसके परिवेश के दिन प्रति दिन के व्यवहार का सीधा असर पड़ता है। दृष्टिकोण हमेशा किसी विशेष को इंगित करता है। मनोवैज्ञानिक ईगली और चैकेन के अनुसार किसी भी चीज को विचार की वस्तु में परिवर्तित किया जा सकता है जो कि दृष्टिकोण की वस्तु बन सकती है। एक ही वातावरण, परिस्थिति और अनुशासन में रहते हुए भी हर व्यक्ति के विचार ओर चिंतन में अंतर होता है। यही अंतर प्रत्येक व्यक्ति का दृष्टिकोण प्रदर्शित करता है। वस्तुतः दृष्टिकोण का आधार व्यक्ति के संस्कार होते हैं। ये संस्कार भी दो प्रकार के होते हैं। पहला संस्कार व्यक्ति हैरीडिटी के रूप में जन्म से ही अपने साथ लाता है। दूसरा संस्कार उसे शिक्षा और वातावरण से मिलता है।  ये दोनों संस्कार जब सकारात्मक विचाारों को ग्रहण करते हैं तो व्यक्ति में स्वस्थ दृष्टिकोण का विकास होता है। यह स्वस्थ दृष्टिकोण व्यक्ति को राष्ट्र, राष्ट्र के निवासियों, प्रकृति, प्रकृति की उपादेयता के बारे में चिंतनशील बनाता है। जब दृष्टिकोण के साथ समग्रता का भाव हो तो जीवन के प्रत्येक पक्ष उसमें समाहित हो जाते हैं। ‘समग्र दृष्टिकोण’ वह पुस्तक है जो आमजन जीवन, धर्म, राजनीति और व्यक्ति की एक साथ चर्चा करती है। 

‘समग्र दृष्टिकोण’ में लेखक मोतीलाल जैन ने अपने लेखों को संग्रहीत किया है। यूं तो प्रत्येक पुस्तक में ‘समर्पण’ के शब्द लेखक के निहायत व्यक्तिगत भावनात्मक विचार होते हैं, जिनके द्वारा लेखक के समग्र विचारों को अथवा उसके लेखकीय संस्कार को पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता है। किन्तु कई बार ‘समर्पण’ के शब्दों से ही लेखक के लेखकीय व्यक्तित्व एवं लेखकीय संस्कार का सांगोपांग परिचय मिल जाता है। ‘समग्र दृष्टिकोण’ को पुनः पढ़ते समय भी ‘भावांजलि’ के रूप लिखी गई ‘समर्पण’ की पंक्तियां लेखक मोतीलाल जैन के लेखकीय संस्कार की बुनियाद से साक्षात्कार करा देती हैं- ‘‘ मेरे शब्द, मेरे विचार, मेरी क्रियाशीलता और रचनात्मक बोध, मेरे पितृ पुरुष की व्यक्ति चेतना का प्रतिबिम्बन और ध्वनि है। उनकी चेतना हमारा आत्मविश्वास बन कर जीवन के प्रत्येक सोपान पर हमें जागृत करता है और वह शक्ति देता है कि वे प्रतिपल हमारे साथ हैं। यही हमारा आत्मविश्वास है जो हमारी ऊर्जा बन कर हमें गति देता है। उनकी स्मृति को प्रणाम करता हुआ मैं अपना यह संकलन उन्हें समर्पित करता हूं।’’ समर्पण की इन पंक्तियों के साथ लेखक ने अपने पिता जो ‘कक्का जी’ कहलाते थे को समर्पित किया किन्तु इन पंक्तियों की मूल भावना अपने उन सभी पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करने की रही जिनसे उन्हें जीवन की सूक्ष्मताओं को समझने, बूझने और जानने की क्षमता मिली। 

पुस्तक में पहला लेख है ‘पलायनवाद और वीतरागता’। 29 जून 1932 को सागर में जन्में मोतीलाल जैन को औद्योगिक सम्पदा विरासत में मिली। उन्होंने जहां इस सम्पदा का संरक्षण एवं विकास किया तथा देश के प्रतिष्ठित उद्योगपतियों में स्थान पाया वहीं अपनी अंतःचेतना के बल पर धर्म, दर्शन, राजनीति और संस्कृति का समय-समय पर आकलन किया और निष्कर्षों को भी सामने रखा। पुस्तक का प्रथम लेख ‘पलायनवाद और वीतरागता’ उनकी अंतःचेतना का प्रतिफलन है। वे अपने इस लेख में पलायनवाद के कारणों की व्याख्या करते हैं वे लिखते हैं कि ‘‘मन विकारों से भरा होना और शरीर से श्रम करने से जी चुराना तथा भयभीत रहना ही निष्क्रीयता और पलायनवाद को प्रोत्साहन देता है इससे मनुष्य कर्तव्य से च्युत हो जाता है।’’ अपने इसी लेख में वे आगे वीतरागता पर प्रकाश डालते हैं। वे लिखते हैं कि - ‘‘सब सुखी हों, सब का कल्याण हो, ऐसा करुणा का स्रोत अंदर से मन को भिगोए रहता है और मन द्रवित रहता है, तो उदासीनता का सच्चा अभ्युदय होता है। यही उदासीन भाव दृढ़ता को पा कर जब अंतरेग को सराबोर रखने में सफल होता है तो मनुष्य का आत्मा से आत्म-परिणाम और आत्म-स्वभाव से सीधा नाता जुड़ जाता है और संसार के सभी अन्य द्रव्यों से, यहां तक कि अपने स्वयं के शरीर से भी मोह, राग व आसक्ति हट जाती है। ऐसा होने पर ही राग बीत गया ऐसा कहा जाता है। यह सच्चे वीतरागी की विलक्षण योग्यता है।’’
संसार में रहते हुए सांसारिकता से विमुक्त रहना दुश्कर कार्य है। जब व्यक्ति कर्म की बात करता है तो उस कर्म के सफत या असफल होने को वह भाग्य से जोड़ने लगता है। भाग्य और पुरुषार्थ के बारे में चिंतन करते हुए लेखक मोतीलाल जैन ने ‘भाग्य (कर्मफल) और पुरुषार्थ’ शीर्षक के अंतर्गत लिखा है कि भाग्य पुरुषार्थ से ही निर्धारित होता है। अपने एक अन्य लेख ‘बदलता सोच’ में आधुनिक जीवनचर्या और पारम्परिक जीवन शैली के अंतर को बहुत सुंदर ढंग से सामने रखा है। इसमें वे कटाक्ष के साथ यथाथ्र को सामने रखते हैं और पाठकों को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते हैं। उदााहरण देते हुए वे लिखते हैं -‘‘आज दूरदर्शन ने ‘योगी’ के माध्यम से खाना खाने से पहले हाथ धोने का महत्व समझाया। आज का पढ़ा-लिखा वर्ग किसको समझााइश देना चाहता है। खुद को या अंग्रेजी सभ्यता में रंगे छुरी-कांटे से खाने वालों को, या गरीब वर्ग को। शायद सभी को यह शिक्षा उपयोगी है। विडम्बना यह है कि कुछ सालों से हम भारत के शहरी लोगों ने अपने बुजुर्ग लोगों को गंवार, अनपढ़ और जाहिल समझना शुरू कर दिया है। हमें परम्परा से जो जीवन शैली मिला करती थी उसमें इस नई सभ्यता ने बहुत गड़बड़ कर दिया है और उसमें विकृति पैदा कर दी है।’’ लेखक ने सिर्फ नई सभ्यता से उत्पन्न विकृति की ही बात नहीं की है अपितु पारम्परिक जीवन शैली का भी स्मरण किया है। लेखक के अनुसार - ‘‘हमारी परम्परा रसोई की शुद्धता पर ही आधारित थी।रसोई में जूते-चप्पल तो दूर, अशुद्ध वस्त्र तक ले जाना वर्जित था। नहा-धो कर ही भोजन किया जाता था। बर्तनों एवं गंदे हाथों की शुद्धि जल एवं राख अथवा साफ मिट्टी से ही की जाती थी। यहां तक कि भोजन पालथी लगा कर, बैठ कर शांतिपूर्वक किया जाता था। आजकल की पाश्चात्य सभ्यता और पढ़े-लिखे होने के अहंकार ने हमारी तमाम विधियों को उलट दिया है। अब तो टाॅयलेट कम बेडरूम सभ्यता है। जूते पहन कर भोजन करना ओर चप्पलें पहन कर रसोई बनाने का फैशन है। कई दिनों का बासी और खराब भोजन खाने को रख कर फ्रिज रसोई में क्रांतिकारी कार्य कर रहे हैं।’’ यह सच है कि जीवन शैली बदलती है तो हमारी सोच बदलती है और सोच के साथ दृष्टिकोण बदल जाता है। वर्तमान में पाश्चात्य प्रभावित जीवन शैली ने लगभग हरेक व्यक्ति को उपभोक्ता बना दिया है। जब व्यक्ति का दृष्टिकोण बाजार केन्द्रित हो जाए तो वह आत्मिक शांति को भुला कर नफा-नुक्सान में डूबता चला जाता है। भले ही इस फेर में वह अपने स्वास्थ्य ओर प्रतिष्ठा को भी दांव में लगा बैठता है। 

‘समग्र दृष्टिकोण’ में धर्म और धार्मिक दृष्टिकोण की भी चर्चा की गई है। ‘धर्म का स्वरूप और धर्मान्धता’ शीर्षक लेख में लेखक मोतीलाल जैन ने लिखा है - 
‘‘ जिन की ध्वनि है ओंकार रूप ।
  निर-अक्षर मय, महिमा अनूप ।।
 लोक में ऐसा कहा जाता है कि भगवान आदिनाथ ने ऐसा कहा, ऐसा समझा और कि भगवान महावीर ने ऐसा उपदेश दिया है। पूर्वाचार्यों ने आगम में जो लिखा है उससे यह भासित होता है कि केवलज्ञान हो जाने के उपरांत तीर्थकर तो इच्छारहित मौन हो जाते हैं।’’ लेखक आगे लिखते हैं कि -‘‘ऐसी दशा में तो शब्दों का उच्चारण तो हो ही नहीं सकता है।’’ लेखक धर्मांधता के बारे में चर्चा करते हुए लिखते हैं कि - ‘‘ हम लोगों को तो अपने रीत-रिवाजों और क्रियाकाण्डों ने ऐसा जकड़ रखा है कि हम अन्य दूसरों की बात शांति से सुनना भी नहीं चाहते हैं। समानता, सहकारिता और सहयोग की तो मात्र बातें होतीं हैं, मन तो सदैव पक्षपात से ही पीड़ित रहता है। पक्षपात से पीड़ित मनुष्य यदि निरपेक्षता की बात करे और अपनी बात के प्रभाव से अन्य को अपने पक्ष में लाने को लालायित रहता हो और व्याकुल रहता हो तो उसे कैसे उमझाया जा सकता है।’’

अपने एक और लेख ‘असाता ही अधर्म’ में मोतीलाल जैन ने अधर्म को स्पष्ट करने के लिए सरल शब्दों में असाता की व्याख्या की है -‘‘असाता यानी साता नहीं। साता यानी सुकून-शांति-चैन आदि। यह साता इच्छाओं की आंशिक पूर्ति हो जाने से नहीं होती है। वस्तुओं, पदार्थाे एवं इष्टजनों के मिल जाने पर तो उनके बिछुड़ जाने का भय फौरन सताने लगता है और हम उनकी सुरक्षा के लिए बेचैन होने लग जाते हैं। बेचैनी बढ़ना ही चिन्ता का कारण बनता है और इससे असाता में वृद्धि होने लगती है।’’

पुस्तक ‘समग्र दृष्टिकोण’के सम्पूर्ण कलेवर को दो भागों में बांटा गया है। पहले भाग में धर्म, जीवन, जीवनशैली आदि पर चिंतनयुक्त लेख हैं तो दूसरे भाग में राजनीति, अपसंस्कृति और भ्रष्टाचार को लक्ष्यित किया गया है। दूसरे भाग के प्रथम लेख ‘‘देश का सौभाग्य और दुर्भाग्य’’ में देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के बीच बिगड़त अंतर्संबंधों को रेखांकित किया है। लेखक मोतीलाल जैन लिखते हैं कि -‘‘अभी दो दिन पूर्व अख़बार में एक लेख पढ़ा। उसमें मंत्री महोदय ने किसी व्यक्ति की उच्च न्यायालय से जमानत हो जाने को दुर्भाग्यपूर्ण कहा। जब न्यायाधीशों के फैसले व उनकी राय दुर्भाग्यपूर्ण हो सकती है तो इस देश को सौभाग्य कौन प्रदान करेगा? जब न्यायपालिका को ही शासन देश का दुर्भाग्य कहने लगे तो फिर उस देश का सौभाग्य कहां छिपा है, यह शासन, मंत्री या प्रशासन ही बता सकते हैं।’’ 

इस पुस्तक में एक और महत्वपूर्ण लेख है जो वर्तमान व्यवस्थाओं पर तीखा कटाक्ष करते हुए सभी से चिंतन-मनन करने का आग्रह करता है। यह लेख है-‘‘सरकार और भगवान’’। इसमें लेखक मेातीलाल जैन निर्भीकता से लिखते हैं कि -‘‘आज की बीसवीं सदी के अंत में दो ही चीज़ें सर्वव्यापक हो रही हैं- एक भगवान तो दूसरी सरकार। दोनों ही अदृश्य हैं। यानी इन चर्मचक्षुओं से दिखाई नहीं देती हैं। दोनों को देखने, समझने व जानने के लिए ज्ञान व बुद्धि के नेत्र चाहिए। सो या तो पढ़े-लिखे सम्पन्नवर्ग के पास बुद्धि और चालाकी रहती है या फिर परम्परा से सत्तासीन घरानों में ही इस ज्ञान का दीप सदैव प्रकाशवान रहता है। भगवान का दर्शन कराने के लिए तो वेद, पुराण और शास्त्र हैं या फिर तीर्थों और मंदिरों में कुंण्डली जमाए, फन फैलाए हुए मठाधीश, पुजारी, पंडे, प्रभारी, मंत्री, प्रचारक आदि हैं। इनके द्वारा जनता को अपनी औकात, उद्गम स्थान, कुल गोत्र आदि सहित भगवान के विभिन्न रूपों व शक्तियों का दर्शन कराया जाता है और ज्ञान कराया जाता है।’’

इसी लेख में लेखक ने सरकार के संबंध में लिखा है कि-‘‘इसी प्रकार सरकार का दर्शन कराने को हमारा संविधान है। जिसे मुख्यतया दिल्ली में सात पर्दो के भीतर तालों में सुरक्षित रखा गया है और शायद उसकी एक ताम्रपत्रलिपि को ज़मीन के अंदर सीमेंट, कांक्रीट के मजबूत बाॅक्स में गाड़ दिया गया है ताकि हज़ार वर्ष बाद की पीढ़ी उसे ज्यों की त्यों सुरक्षित देख सके। सरकार का दर्शन कराने के लिए दिल्ली एवं सभी प्रादेशिक तीर्थ रूपी राजधानियों में राष्ट्रपति एवं राज्यपाल हैं। इसके साथ-साथ सरकार की शक्तियों को बताने के लिए मंत्री, उपमंत्री, सांसद, विधायक हैं जो समय-समय पर हमें सरकार के विराट रूप का दर्शन कराते रहते हैं।’’

सन् 2007 में श्री खेमचंद जैन चेरीटेबल ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक समसामयिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी प्रासंगिकता प्रत्येक काल और दशाओं के साथ जुड़ी हुई है। इस पुस्तक में संग्रहीत लेखों पर शंकरदत्त चतुर्वेदी, डाॅ. जयकुमार जलज, डाॅ. सुरेश आचार्य, प्रो. कांतिकुमार जैन, डाॅ. आर डी मिश्र, डाॅ. शेखरचंद जैन की विशेष टिप्पणियां भी समाहित हैं जो पुस्तक के कलेवर तथा पुस्तक के लेखक मोतीलाल जैन के विचारों को समझने में सहायता प्रदान करती हैं। यह पुस्तक बार-बार पढ़े जाने योग्य है क्यों कि यह वर्तमान परिदृश्य के साथ ही हमें अपनी जड़ों से भी जोड़ती है तथा मनन-चिंतन कर निष्कर्षों तक पहुंचने को प्रेरित करती है।
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( दैनिक, आचरण  दि.02.11.2020)
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Saturday, October 17, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 12 | सुरेश आचार्य, शनीचरी का पण्डित | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत बारहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के सुपरिचित व्यंग्यकार प्रो. सुरेश आचार्य पर केन्द्रित पुस्तक "सुरेश आचार्य, शनीचरी का पंडित" का पुनर्पाठ।
   
सागर: साहित्य एवं चिंतन

पुनर्पाठ: ‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’
                               -डॉ. वर्षा सिंह
                             
         इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो एक व्यक्ति विशेष पर केंद्रित है अर्थात उस विशेष व्यक्ति के बारे में समग्र जानकारी प्रदान करने में सक्षम है, जो जनप्रिय है, लोकप्रिय है और साहित्य में ही नहीं वरन समाज में भी विशेष स्थान रखता है। जी हां, वे विशेष व्यक्ति हैं प्रो. सुरेश आचार्य। वे व्यंग विधा के पुरोधा हैं, वे सामाजिक सरोकार रखते हैं तथा वे जनप्रिय हैं। इसलिए इस किताब की अर्थवत्ता अपने आप द्विगुणित हो जाती है कि जो भी व्यक्ति डॉ सुरेश आचार्य के बारे में जानना चाहता है, उनके बचपन के बारे में, उनकी जीवनचर्या के बारे में, उनके लेखन के संबंध में, उनके राजनीतिक विचारों के बारे में, तो उसे यह सभी जानकारी इस पुस्तक में मिल सकती है। डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित यह पुस्तक कुल चारखंड में विभक्त है इसे अभिनंदन ग्रंथ भी कहा जा सकता है।

        सन् 1933 में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को काशी नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से एक अभिनंदन ग्रन्थ भेंट किया गया था जिसमें उनके अवदान पर देश-विदेश के साहित्यकारों, मनीषियों के लेख संकलित थे। उसकी भूमिका श्याम सुन्दर दास और कृष्ण दास के नाम से प्रकाशित थी। पर कहा जाता है कि यह वास्तव में नंददुलारे वाजपेयी ने लिखी थी। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित अभिनंदनग्रंथ में समालोचक मैनेजर पाण्डेय ने ‘‘आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका अभिनंदन’’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। अपने इस लेख में मैनेजर पांडेय ने अभिनंदनग्रंथ के बारे में लिखा कि ‘‘इस अभिनंदन ग्रन्थ में भूमिका और प्रस्तावना के बाद मुख्य भाग में निबंध, कविताएं, श्रद्धांजलियां, विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश के साथ एक चित्रावली भी है। निबंधों के विषयों और श्रद्धांजलियों  की विविधता चकित करने वाली है। इसमें अंग्रेजी में रेव. एडविन ग्रीब्स, पी. शेषाद्रि, प्रो. ए. बेरिन्निकोव और संत निहाल सिंह के लेख हैं। श्रद्धांजलि के अंतर्गत एक ओर महात्मा गांधी के साथ भाई परमानन्द हैं, तो दूसरी ओर अनेक विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश हैं। उस युग के अधिकांश कवियों की कविताएं इस अभिनंदन ग्रंथ में हैं। इस ग्रंथ में जो चित्रावली है उसका एक विशेष महत्व यह है कि अभिनंदन ग्रंथ के आज के पाठक आधुनिक हिंदी साहित्य के ऐसे लेखकों-कवियों का रूप-दर्शन कर सकेंगे, जिनका वे केवल नाम जानते हैं।’’
अपने लेख की अंतिम पंक्ति में मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि ‘‘इस ग्रंथ का केवल ऐतिहासिक महत्व नहीं है. इसके निबंध ‘ज्ञानराशि के संचित कोश’ होने के कारण आज भी पठनीय और मननीय हैं।’’ ठीक यही बात लागू होती है ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पर।
         ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पुस्तक के चार खंडों में प्रथम खंड है- ‘‘जल बिच कुंभ: न था मैं खुदा था’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य का आत्मकथ्य है। जिसमें उन्होंने सागर के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त किया है। इसी खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य से तीन लोगों ने बातचीत की है - लक्ष्मी पांडे, प्रो. अरुण कुमार मिश्रा और प्रो. रूपा गुप्ता ने।

      खंड 2- ‘‘सर्वे सुखम् गृह माययौ: दिल के बहलाने को गालिब ये ख़्याल अच्छा है’’ के अंतर्गत प्रोफेसर आचार्य का जीवन परिचय, वंशावली तथा परिजनों की दृष्टि में आचार्य जी के व्यक्तित्व का विवरण है जिसमें शांभवी आचार्य, शुभ्रांशु आचार्य, कृति आचार्य, श्वेतांशु आचार्य, शारदवद आचार्य, प्रतिभा आचार्य, शांतनु आचार्य, डॉ संजय आचार्य, पदमा आचार्य, शाश्वत आचार्य, डॉ शैलेश आचार्य तथा आरती तिवारी के विचार शामिल किए गए हैं।

         खंड 3- ‘‘ते तुलसी तब राम बिन जे अब राम सहाय: कमी जो पाई तो अपने खुलूस में पाई’’ - इस खंड में प्रोफेसर आचार्य को लिखे गए पत्र, अभिनंदन पत्र एवं सम्मान पत्र शामिल हैं। इसी खंड में प्रोफेसर आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखी गई श्याम मनोहर सिरोठिया, मायूस सागरी, कालिका प्रसाद शुक्ल ‘विजयी’ एवं हरिहर प्रसाद खड्डर द्वारा लिखी गई कविताएं संकलित है। साथ ही संकलित है प्रोफेसर सुरेश आचार्य की विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के अवसर पर की गई टिप्पणियां।

         खंड 4- ‘‘हम चाकर रघुवीर के: हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित कुल 50 लेख हैं। इस महत्वपूर्ण खंड में हरिशंकर परसाई, कांति कुमार जैन, उदय जैन,  रामेश्वर नीखरा, सत्य मोहन वर्मा, सुरेंद्र सिंह नेगी, कृष्णचंद्र लाल, सुरेंद्र दुबे, सुधाकर सिंह, कालीचरण स्नेही, हरिशंकर मिश्र, निर्मल चंद निर्मल, लक्ष्मी नारायण चैरसिया, चंदा बैन, राजेंद्र यादव, जीवनलाल जैन, बैजनाथ प्रसाद, रूपा गुप्ता, मनोहर देवलिया, टीकाराम त्रिपाठी, आशुतोष राणा, सरोज गुप्ता, अशोक मिजाज, अरुण कुमार मिश्र, नरेंद्र सिंह, स्मृति शुक्ला, मणिकांत चैबे, वेद प्रकाश दुबे, भोलाराम भारतीय, राजेश दुबे, शरद सिंह, नरेंद्र दुबे, राजेंद्र नागर, महेश तिवारी, निरंजना जैन, गजाधर सागर, सुखदेव प्रसाद तिवारी, छाया चौकसे, उमाकांत मिश्र, स्वर्णा वाजपेई, चंचला दवे, निधि जैन, सुखदेव मिश्र, हेमचंद्र चैधरी, किशन पंत, आशीष ज्योतिषी, ममता यादव, नेमीचंद जैन विनम्र तथा लक्ष्मी पांडे के लेख शामिल हैं।

       इस पुस्तक में प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने अपने जीवन के कुछ ऐसे प्रसंग रखे हैं जिनसे तत्कालीन सामाजिक जीवन का भी पता चलता है जैसे अपने आत्मकथ्य में ‘‘क्या सुनाएं दास्तां’’ के अंतर्गत वे लिखते हैं- ‘‘मैं खुद छोटे पंडित की भूमिका में पूजा पाठ कथा वार्ता घर-घर कराने घूमने लगा। साल में दो हाफ कमीज़ो की संख्या घटकर एक रह गई। खाकी हाफ पेंट थिगड़े लगाकर पहने जाने लगे। मेरी उद्दंडता और सीनाजोरी में इज़ाफ़ा हुआ। सागर तालाब उन दिनों शहर का एकमात्र जल स्रोत था। गर्मियों में भी पानी से लबालब भरा रहता। कमल खिलते, सिंघाड़े लगते, चक्रतीर्थ यानी चकरा घाट से बस स्टैंड का ज्यादातर यातायात नावों के जरिए होता था। चार आने सवारी। सामान फ्री। तालाब के किनारों पर बने पत्थर की सीढ़ियों पर लोग कपड़े धोते, पानी में छलांग मार कर निकलते और सीढ़ियों पर बैठकर साबुन लगाते। आमतौर पर कपड़े धोने और नहाने का एक ही साबुन होता था। लोकल मेड। बड़े लोग लाइफबाय से नहाते और सनलाइट साबुन से कपड़े धोते।’’

 

  

      यह विवरण सहज सरल सामाजिक व्यवस्था एवं वातावरण का दृश्य आंखों के सामने चलचित्र के समान चला देता है। इस ग्रंथ में अनेक रोचक प्रसंग पढ़ने को मिलते हैं जैसी अपने वक्तव्य के अंतर्गत प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने हरिशंकर परसाई के साथ जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए यह घटना लिखी है जो बड़ी ही दिलचस्प है - ‘‘मैं उनके घर ठहरा और लघु शोध प्रबंध को प्रमाणिक बनाने रोज शाम 7 बजते-बजते परसाई जी के घर पहुंच जाता। उनसे चर्चा में एक-दो घंटे गुजार कर लौटता। फिर नोट्स लेता। मैजारिटी की भाषा में परसाई जी बड़े भक्त आदमी थे। शाम होते ही भक्ति-भजन में लग जाते थे। एक शाम उन्होंने मुझसे सीधे पूछ लिया- ‘यार आचार्य, तुम पीते हो या नहीं?’ अल्लाह! क्या कहूं!! मैंने उत्तर दिया- ‘जी, मैं परहेजगार तो नहीं हूं पर रोज पीने की मेरी हैसियत नहीं है।’ उन दिनों व्हाइट हार्स नामक अंग्रेजी शराब उनका प्रिय ब्रांड थी। उन्होंने कहा- ‘प्रियवर, तब तुम सुबह 9 बजे आया करो। शाम को अपनी बात ठीक से नहीं हो पाती। उस वक्त मैं सफेद घोड़े पर सवार होता हूं और तुम पैदल चलते हो।’ मैंने समय बदल लिया। यह लघु शोध प्रबंध परसाई जी पर पहला शोध कार्य था। एम. ए. उत्तरार्द्ध की परीक्षा का यह आठवां वैकल्पिक प्रश्न पत्र था। निर्धारित 100 अंकों में से मुझे 60 अंक मिले। विभाग में कार्यरत एक अध्यापक महोदय के भतीजे को छियान्वे। पूर्वाद्ध में वे बहुत पीछे थे। उत्तरार्ध में संबंधित गुरुजनों के इस जादू के बावजूद मेरी पोजीशन बची रही।’’

        इस तरह के प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि आमतौर पर अभिनंदन ग्रंथों में संबंधित व्यक्ति को महिमामंडित ही किया जाता है। उसकी महिमाओं के बखान के अतिरिक्त अन्य जानकारियां नहीं होती हैं। किंतु इस ग्रंथ में अभिनंदन के साथ-साथ समय अनुसार परिस्थितियां, वातावरण, प्रशासनिक स्थितियां, शैक्षिक स्थितियां इन सभी के बारे में पता चलता है कि शिक्षा क्षेत्र में किस तरह से नंबरों के उतार-चढ़ाव का भ्रष्टाचार व्याप्त था। योग्यता को संबंधों के आधार पर तौला जाता था। इस प्रकार के तथ्य इस ग्रंथ को अन्य अभिनंदन ग्रंथों से इसको अलग ठहराते हैं। इस प्रकार की घटनाओं के उल्लेख से यह भी पता चलता है कि हरिशंकर परसाई जी जैसे ख्यातिनाम व्यंगकार झूठ और दिखावे में लिप्त नहीं थे बल्कि वे जैसे थे वैसे ही जीना पसंद करते थे। उन्होंने अपने शिष्य के सामने झूठा दिखावा न करते हुए इस बात को उजागर कर दिया कि वे मदिरापान करते हैं। यह तथ्य सुरेश आचार्य के बहाने परसाई जी के एक सरल, सहज व्यक्तित्व की झलक सामने रखता है।

           वहीं सुरेश आचार्य के बारे में हरिशंकर परसाई के विचार और भी महत्वपूर्ण हैं। वे लिखते हैं कि- ‘‘सुरेश आचार्य बुंदेलखंडी है। बुंदेली भाषा बहुत मीठी और लयात्मक होती है। जब बुंदेलखंडी लोग आपस में बात करते हैं तो ध्वनि की लचक बहुत मीठी होती है। मगर बुंदेली वीर भी इतिहास प्रसिद्ध हैं, तो इस मीठी भाषा में क्रोध कैसे व्यक्त किया जाता होगा? कठोर गाली कैसे दी जाती होगी? गुस्से में बुंदेलखंडी सामने वाले से बड़ी मीठी भाषा में कहेगा- ए तुम भौतई बढ़ रये हो इते। अब मौं चलाओ तो हम उठा के मैंक दैहें। कितनी मिठास है शब्दों में। लय है। मगर वह क्या कह रहा है? वह कह रहा है- तुम बहुत बढ़ रहे हो। अब मुंह चलाया तो उठा कर फेंक दूंगा। सुरेश आचार्य की बुंदेली में एकाध ही रचना है। बाकी खड़ी बोली हिंदी में है। मगर उनके व्यक्तित्व में और व्यंग में यह मूल बुंदेलीपन है। उनका वक्तव्य सहज, रोचक और निर्वैर लगता है। मगर उसमें भीतर वही मैंक देने का अर्थ होता है। उनकी भाषा में कठोरता नहीं है। व्यंग में ऊपर से घन मारने जैसा प्रहार नहीं दिखता। मगर वे सहज ही चलते-चलते ऐसे रिमार्क कर जाते हैं जिनसे हमारी समकालीन व्यवस्था की कलई खुल जाती है। झूठ, फरेब, पाखंड, भ्रष्टाचार, विसंगति आदि पर एकाध रिमार्क कर के वे आगे बढ़ जाते हैं।’’

        प्रो. सुरेश आचार्य के व्यंग्य ही नहीं अपितु व्यंग्य और समाज के परस्पर संबंधों पर किया गया शोधग्रंथ भी बहुत प्रसिद्ध है। प्रो. आचार्य पर एकाग्र इस ग्रंथ में उनकी पुस्तक ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर लेख लिखते हुए देश की प्रतिष्ठित लेखिका डाॅ शरद सिंह ने टिप्पणी की है कि -‘‘व्यंग्य समाज से ही क्यों उत्पन्न होता है? इस प्रश्न का उत्तर डाॅ. सुरेश आचार्य ने अपने शोधपूर्ण ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में विस्तारपूर्वक दिया है। डाॅ. सुरेश आचार्य हिन्दी साहित्य जगत के एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर ही डाॅ. आचार्य को डी. लिट. की उपाधि दी गई।’’

       प्रो. आचार्य की लेखकीय एवं व्यक्तित्व की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए पत्रकार एवं ‘आचरण’ समाचार पत्र की प्रबंध संपादक निधि जैन ने लिखा है कि- ‘‘शब्दों का, मुहावरों का, लोकोक्तियों का इतना भण्डार आचार्य जी के पास है जितना अन्यत्र ही किसी के पास होगा। आचार्य जी अच्छे शिक्षक होने के साथ-साथ प्रसिद्ध साहित्यकार, आलोचक, व्यंग्यकार, ज्योतिषी और कथावाचक भी हैं।’’ 

         साहित्यसेवी उमाकांत मिश्र ने प्रो. सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व पर बहुत ही सटीक लेख लिखा है जिसकी कुछ पंक्तियां देखिए- ‘‘आखिर उन्हें हम किस रूप में देखना ज्यादा पसंद करेंगे? एक विद्वान वक्ता, एक प्रोफेसर, एक अति गंभीरता के साथ साथ सादगी लिए हुए व्यक्तित्व, एक समीक्षक, साहित्यकार जिसकी कोई मिसाल ही नहीं, एक व्यंगकार जो आपको अवसाद से मुक्त कराता हो, गमगीन माहौल को अपनी वाकपटुता और ज्ञानपूर्ण उद्बोधनों के माध्यम से आपके हृदय में हलचल मचा देता हो, आपको ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता हो या फिर एक ऐसे यारबाज के रूप में जो बगैर आपकी उम्र की परवाह किए बुजुर्गों को बल्कि छोटे-छोटे बच्चों के बीच भी अपनी उपस्थिति एक यार, एक मित्र, एक दोस्त और महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में दर्ज़ करता हो।’’

         अनेक रोचक प्रसंग और आत्मीयता की अनेक लहरों से भीगे हुए, प्रो. आचार्य की खूबियों की सीपियां समेटे हुए महासागर की समग्रता लिए हुए डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित इस ग्रंथ की सबसे बड़ी उपादेयता यह है कि यह अपने प्रिय व्यक्ति, अपने प्रिय साहित्यकार, अपने प्रिय समाजसेवी, अपने प्रिय राजनीतिज्ञ (राजनेता नहीं), अपने प्रिय मार्गदर्शक के बारे में जानने का भरपूर अवसर प्रदान करता है और बार-बार पढ़े जाने की ललक पैदा करता है।
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( दैनिक, आचरण  दि.17.10.2020)
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Saturday, October 3, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 10 | तिल के फूल- तिली के दाने | गीत संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत दसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के कवि स्व. रमेशदत्त दुबे के गीत संग्रह  "तिल के फूल - तिली के दाने" का पुनर्पाठ।

सागर : साहित्य एवं चिंतन

पुनर्पाठ : ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ गीत संग्रह
            - डॉ. वर्षा सिंह

इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर के कवि स्व. रमेशदत्त दुबे की पुस्तक ‘तिल के फूल-तिली के दाने’। यह एक ऐसा गीत संग्रह है जिसके गीत बच्चों के लिए हैं। 

कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने अपने बचपन में राजा-रानी, हाथी-घोड़े, शेर-भालू, राक्षस-परी आदि की कहानियां और कविताएं न सुनी हों। हमारी दादी, नानी और मां ने हमें बचपन में ढेर सारी कहानियां सुनाई हैं और बाल कविताएं याद करवाई हैं। अगर मैं अपनी व्यक्तिगत बात करूं तो मुझे मेरे नानाजी हमें संत ठाकुर श्यामचरण सिंह पंचतंत्र, हातिमताई, चहार दरवेश, चन्द्रकांता, रामायण, महाभारत से ले कर महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ी कहानियां सुनाया करते थे। यदि बात की जाए पंडित विष्णु शर्मा के पंचतंत्र की, तो उसमें निहित कथाएं उन राजकुमारों को रोचक ढंग से शिक्षा देने के लिए पशु-पक्षियों को आधार बना कर तैयार की गई थीं जो राजकुमार पढ़ने में घोर अरुचि रखते थे। पंडित विष्णु शर्मा का यह प्रयास सफल रहा। एक उदाहरण हम अपने जीवन से भी उठा सकते हैं। हम सभी ने अपने बचपन में वह कविता तो अवश्य पढ़ी होगी जो चार पंक्तियों में मछली के जीवन से अवगत करा देती है -
मछली जल की रानी है
जीवन जिसका पानी है
हाथ लगाओ डर जाएगी
बाहर निकालो मर जाएगी

कहने का आशय यह है कि बच्चों के लिए जो साहित्य रचा जाए उसमें सरल शब्द और रोचक शैली के माध्यम से जीवन से जुड़ा ज्ञान दिया जाए। ऐसा ज्ञान जो बच्चों की कल्पना शक्ति और व्यक्तित्व का एक साथ विकास करे। बच्चों के लिए मुद्रित साहित्य की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नेशनल बुक ट्रस्ट के अंतर्गत सन् 1957 में “चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट” की स्थापना में की गई, ताकि बच्चों के लिए ज्ञानवर्द्धक, रोचक एवं स्तरीय साहित्य प्रकाशित उपलब्ध कराया जा सके। अन्य प्रकाशकों ने भी बाल साहित्य की ओर ध्यान दिया। चम्पक, नंदन, चंदामामा, पराग आदि पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती रही हैं। फिर भी बाल साहित्य कहीं पीछे छूटता गया। लेकिन कुछ साहित्यकार जितनी गम्भीरता से बड़ों के लिए साहित्य रच रहे थे उतनी ही गम्भीरता से बच्चों के लिए भी गीत रच रहे थे। कवि रमेश दत्त दुबे ने बच्चों के लिए कई गीत लिखे। जिनमें से अट्ठाइस गीत ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ नामक गीत संग्रह के रूप में संग्रहीत हैं। इस गीत संग्रह को मैंने कई बार पढ़ा है। जब भी मैं इसके गीतों को पढ़ती हूं तो अपने बचपन के दिनों में जा पहुंचती हूं। सीधे-सरल शब्दों में लयात्मकता से भरे ये गीत मुझे उन दिनों की याद दिलाते हैं जब मैंने स्कूल की प्रतियोगिता के लिए एक गीत लिखा था। मुझे याद है कि जब मैं कक्षा 06 में पढ़ती थी तब विद्यालय में एक कविता लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इसमें प्रतियोगियों के लिए कक्षावार तीन वर्ग निर्धारित किए गए थे- प्रायमरी, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक। मैंने माध्यमिक वर्ग में अपना नाम लिखा दिया। अब समस्या थी कविता लिखने की। मैंने इस संबंध में नानाजी से मदद मांगी, तो उन्होंने कहा - तुम प्रतिभागी हो इसलिए स्वयं कविता लिखो। तब मैंने पूछा कि मैं कैसे लिखूं। नानाजी ने कहा अपनी छोटी बहन पर कविता लिख डालो। और फिर क्या था, मैंने फटाफट अपनी छोटी बहन शरद पर कविता लिख डाली। मुझे उस कविता पर प्रथम पुरस्कार भी मिला। मेरी वह कविता थी -
मेरी बहना, मेरी बहना
सदा मानती मेरा कहना
खेल कूद से अधिक सुहाता
हरदम उसको लिखना-पढ़ना

यह कविता मुझे आज तक याद है जबकि आयु की परिपक्वता के साथ बाल कविताएं पीछे छूटती चली गईं। प्रायः सभी के साथ यही होता है। सरल सी प्रतीत होने वाली बाल कविताएं पीछे छूट जाती हैं और छंद, अलंकार तथा जीवन के गूढ़ विषयों से रची-बसी कविताएं सृजित होने लगती हैं। जो बाल कविताएं पढ़ने, सुनने में सहज और सरल लगती हैं उनको लिखना बड़ों के लिए लिखे जाने वाले साहित्य से कहीं अधिक कठिन होता है। यह बड़ा ही चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए पहली शर्त है बाल मनोविज्ञान की समझ होना। जैसे रमेशदत्त दुबे ने लोक भावना और बच्चों के खेल गीतों का सम्मिश्रण करते हुए ऐसे रोचक गीत लिखे जो वर्तमान परिवेश से भी बच्चों को जोड़नो में सक्षम हैं और पहेलियां सी भी बुझाते हैं। उदाहरण के लिए ‘‘हाथी, घोड़ा, पालकी’’ शीर्षक उनका यह गीत देखें-
हाथी, घोड़ा, पालकी
बातें हैं उस काल की
मोटर, साइकिल, प्लेन की
बातें हैं इस काल की।
बातों-बातों से बनती हैं
बातें बिलकुल हाल की
सभी हाल की बातों से 
छपते हैं अखबार
नौ नकद के सौदे में
तेरह हुए उधार

  समीक्ष्य कृति -  तिल के फूल तिली के दाने 

इस संग्रह में एक गीत है - ‘‘नानाजी’’ जिसमें नानाजी का वर्णन बड़े ही रोचक ढंग से किया गया है, उसका यह अंश देखें - 
कैसे तो हैं नानाजी
कैसा इनका बानाजी
चश्मा उनका मोटा है
दांत लगाए हैं नकली
छड़ी सहारे चलते हैं
झुकी कमर उनकी पतली
कैसे तो हैं नानाजी
कुछ बोलो कुछ सुनते हैं
मन ही मन कुछ गुनते हैं
गुनी हुई हर बात को
धुनिया जैसा धुनते हैं
कैसे तो हैं नानाजी

‘‘पो संपा’’ शीर्षक गीत में कवि ने बुंदेलखंड के खेलगीत को बड़ी खूबसूरती से पिरोया है। इस गीत की पंक्तियां देखें -
पो संपा भई पो संपा
पो संपा ने क्या किया
पो संपा ने रेल बनाई
रेल बना कर खूब चलाई
अब तो रेल में जाना पड़ेगा
लटके-बैठे, खड़े-खड़े
साथ चलेंगे पेड़ खड़े
छुक-छुक करती चलती रेल
डिब्बों में है रेलम्पेल
कहीं बोगदा आ जाएगा
अंधकार तब छा जाएगा

इस गीत में ‘‘पो संपा’’ खेल गीत के बहाने कवि ने रेल यात्रा का परिचय दे दिया गया है। जो उन बच्चों के मन में भी रेल यात्रा के बारे में रुचि पैदा कर सकता है जिन्होंने कभी रेल देखी भी न हो। बच्चों को बंदर, भालू, बिल्ली आदि पशुओं से भी बड़ा लगाव रहता है। ‘‘एक से तीन’’ शीर्षक गीत में बड़े चुलबुले ढंग से बंदर, भालू, बिल्ली के बारे में लिखा गया है -
एक है बिल्ली, एक चिबिल्ली
एक है मुंबई, एक है दिल्ली
एक छमाछम नाच रही
एक उछलती, एक कूदती
बैठी-बैठी एक खांसती
एक फटाफट दौड़ रही
एक को ले गया भालू, बंदर
एक छुप गई घर के अंदर
एक सभी को ढ़ूंढ रही
एक मिल गया इस कोने में
एक मिल गया उस कोने में
एक एक से तीन हुई

इन गीतों को उन सभी के लिए पढ़ना जरूरी है जो अपने मन के भीतर मौजूद बचपन से दूर होते जा रहे हैं, और इसी बिन्दु पर बात आती है ऐसे गीतों को लिखे जाने की। आज हिन्दी में बड़ों के लिए लिखे जा रहे साहित्य की अपेक्षा बाल साहित्य कम लिखा जा रहा है। हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्वयं प्रकाश ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘‘हिन्दी में बच्चों के लिए लिखने को दूसरे दर्जे का काम समझा जाता है।  जबकि हर लेखक को बच्चों के लिए कुछ न कुछ जरूर लिखना चाहिए। समर्थ लोग हैं, लिख क्यों नहीं रहे हैं। साथ ही ऐसे लेखन को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। यह कोई दूसरे दर्जे का काम नहीं है।’’ आज जब बच्चे मोबाइल और कम्प्यूटर पर तरह-तरह के गेम्स में रमें रहते हैं तब उनके लिए बाल साहित्य और भी जरूरी हो जाता है। ऐसे समय में कवि स्व. रमेशदत्त दुबे की पुस्तक ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ का पाठ एवं पुनर्पाठ दोनों महत्व रखते हैं। 
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साहित्य वर्षा
 
( दैनिक, आचरण  दि.03.10.2020)
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