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Friday, March 26, 2021

ब्रह्मवादिनी : भारतीय संस्कृति से परिचित कराता काव्य संग्रह | पुस्तक समीक्षा | डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh



प्रिय ब्लॉग पाठकों,

     आज दिनांक 26.03.2021 को दैनिक समाचार पत्र 'आचरण' में मेरी लिखी पुस्तक समीक्षा प्रकाशित हुई है।

हार्दिक आभार 'आचरण' 🙏

इस ब्लॉग के सुधी पाठकों की पठन सुविधा हेतु वह समीक्षा  यहां प्रस्तुत है -

पुस्तक समीक्षा

ब्रह्मवादिनी : भारतीय संस्कृति से परिचित कराता काव्य संग्रह

            - डाॅ. वर्षा सिंह

                

 काव्य संग्रह - ब्रह्मवादिनी

 कवयित्री - डाॅ. सरोज गुप्ता

 प्रकाशक - जे.टी.एस. पब्लिकेशन्स, वी-508, गली नं. 17, विजय पार्क, दिल्ली-110053

 मूल्य - रुपए 595/-

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          संस्कृति मानव जीवन का परिष्कृत स्वरूप है। संस्कृति मनुष्य की वैचारिक परिपक्वता को प्रतिबिम्बित करती है। संस्कृति की व्युत्पत्ति ‘‘सम्यक कृतिः संस्कृतिः’’ की भांति पाणिनी के अनुसार ‘‘स्त्रियां क्तिन्’’ सूत्र से क्तिन् प्रत्यय से हो कर संस्कृति शब्द की उत्पत्ति होती है तथा भारत में विकसित होने वाली संस्कृति भारतीय संस्कृति कहलाती है। संस्कृति मनुष्य के भूत तथा भविष्य का आकलन एवं निर्धारण करती है। संस्कृति से ही संस्कार बनते हैं और संस्कार मनुष्य को संस्कारित करते हैं। भारतीय संस्कृति में स्त्रियों का विशेष स्थान रहा है। प्राचीन भारत में स्त्रियों को वैद पढ़ने और वैदिक मंत्रों के सृजन करेन का अधिकार था। भारत में पुरुषों के साथ ही भारतीय महिला दार्शनिकों तथा साध्वियों की लम्बी परंपरा रही है। वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी स्त्रियों का योगदान रहा है। ऋग्वेद के बहुत से मंत्र और सूक्त स्त्रियों द्वारा रचे गए हैं। इन लेखिकाओं को ‘‘ऋषिका’’ और ‘‘ब्रम्हवादिनी’’ कहा जाता था। इन्हीं में से एक, वाक नामक कवयित्री ने देवी सूक्त की रचना की थी। घोषा, लोपामुद्रा, शाश्वती, अपाला, इन्द्राणी, सिकता, निवावरी आदि विदुषी स्त्रियों के कई नाम मिलते हैं जो वैदिक मन्त्रों तथा स्तोत्रों की रचयिता हैं । ऋग्वेद में बृहस्पति तथा उनकी पत्नी जुहु की कथा मिलती है ।

            समीक्ष्य पुस्तक ‘‘ब्रम्हवादिनी’’ यूं तो एक काव्य संग्रह है किन्तु यह प्राचीन भारत के यशस्वी पक्ष को सामने रखता है। विदुषी लेखिका एवं कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता की इस काव्यात्मक कृति में ब्रह्मवादिनी ऋषिकाओं का विस्तृत परिचय मिलता है। यह काव्यसंग्रह कोरोनाकाल के अवसादी वातावरण को उत्साह में कदलते हुए लिखा गया। जैसा कि पुस्तक के प्रथम फ्लैप में आचार्य पंडित दुर्गाचरण शुक्ला ने लिखा है - ‘‘कोरोना महामारी की घोर निराशा भरी महानिशा जैसे दुष्काल में जब पूरे विश्व में मृत्यु के संत्रास से पूरी मानव जाति पीड़ित थी उसके बीच में भी कुछ मानुष मृत्यु को चुनौती दे रहे थे- ‘न मृत्यु अवतस्थेकदाचन’ (ऋग्वेद -10/49/5) मैं मृत्यु के लिए नहीं बना, मैं तो अमृत पुत्र हूं। डॉ सरोज गुप्ता उसी मानुष वर्ग की है। उसने महामारी की चुनौती स्वीकारी और आगम निगम ज्ञान की धाराओं के सामान्य परिचय प्रदान करने को मुझ से आग्रह किया। मैं तो जाने कब से यह आशा किए प्रतीक्षा कर रहा था कि कभी कोई जिज्ञासु ज्ञान की इन धाराओं के मूल उत्स को जानने समझने की इच्छा करे और मेरी संचित इस ज्ञान संपत्ति को सार्थकता प्रदान करे। इसी पृष्ठभूमि में अध्ययन प्रारंभ हुआ जिसका प्रथम प्रसून डॉ सरोज की यह ब्रह्मवादिनी काव्य संग्रह है।“




          वर्तमान वैश्विक युग में जब पाश्चात्य सांस्कृतिक मूल्य विभिन्न संचार माध्यमों से हर आयुवर्ग के स्त्री-पुरुषों को प्रभावित करते रहते हैं, तब ऐसे दौर में भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों की पुनस्र्थापना की आवश्यकता महसूस होने लगती है। इस दृष्टि से यह जानना महत्वपूर्ण हो जाता है कि प्राचीन भारत में, विशेष रूप से वैदिक युग में स्त्रियों की स्थिति कितनी सुदृढ़ थी। यह जान कर सुखद लगता है कि वैदिक युग में अनेक स्त्रियां ऐसी हुईं जिन्होंने ऋचाओं का सृजन किया। ऋचाओं का सृजन करने के कारण इन स्त्रियों को  ऋषिकाएं कहा गया। इन्हीं ऋषिकाओं के बारे में पंडित दुर्गाचरण शुक्ला ने ‘ब्रह्मवादिनी-दृष्ट मंत्र भाष्य एवं अवदान’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक से प्रेरणा प्राप्त कर डाॅ. सरोज गुप्ता ने ऋषिकाओं पर काव्य रचा।

        कवयित्री डाॅ. सरोज गुप्ता ने ‘‘पूर्व पाठिका’’ के रूप में काव्य संग्रह की भूमिका में अपनी इस पुस्तक की प्रेरणा, आधार एवं सृजन के बारे में लिखा है- ‘‘जब लीक से अलग हटकर चिंतन मनन की दिशा बदलती है कुछ विशेष कार्य संपन्न होता है तो आत्मिक खुशी मिलती है। परमेश्वर की असीम अनुकंपा एवं गुरुदेव के आशीर्वाद के परिणाम स्वरूप मुझे वैदिक काल की ऋषिकाओं को पढ़ने का अवसर मिला। मुझे कोरोनाकाल में गुरुदेव आचार्य पंडित दुर्गाचरण शुक्ल जी की पुस्तक ‘ब्रह्मवादिनी-दृष्ट मंत्र भाष्य एवं अवदान’ प्राप्त हुई। सरल एवं सहज भाषा में संस्कृत की जटिलताओं से सर्वथा मुक्त ज्ञान गंगा की तरह निर्मल, शीतल जल के प्रवाह सी सतत प्रवाहमाना भाषा शैली, आत्मिक शांति प्रदान करने वाली अद्वितीय वैदिक ज्ञानगम्य पुस्तक मैंने पढ़ी। इस पुस्तक में वैदिक ऋषिकाओं की, ऋचाओं की, विद्वतापूर्ण गवेष्णात्मक व्याख्यायें, भाष्य टीका और गुरुदेव के अनुभवों और चिंतन की एक नवीन दृष्टि मुझे मिली। मैं ऋषिकाओं की कालजयी और कालातीत ऋचाओं के पढ़ने के आनंद को आज तक महसूस कर रही हूं। ऋषिका को पढ़ते-पढ़ते मन पर जो प्रतिक्रिया हुई, मन की आंखों ने कल्पना में भजन-पूजन करते-करते उन्हें जिस रूप में देखा, उसी को काव्य रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास इन रचनाओं में किया है। मुझे लगा कि हमारे भारत देश व बुंदेलखंड की स्त्रियां ज्ञान के क्षेत्र में इतनी आगे थीं तो यह आदर्श नई पीढ़ी एवं नारी शक्ति के समक्ष पहुंचना चाहिए। अतः ‘ब्रह्मवादिनी’  काव्य संग्रह वैदिक काल की ऋषिकाओं की तपस्या साधना व उनके द्वारा अंतर्भासिक दिव्य ज्ञानदृष्टि को जानने-समझने की दिशा में एक छोटा सा प्रयास है।’’

        इस काव्य संग्रह में संग्रहीत प्रत्येक कविता एक-एक ब्रह्मवादिनी ऋषिका का परिचय प्रस्तुत करती है। लोपामुद्रा, रोमशा, विश्ववारा आत्रेयी, अपाला अत्रिसुता, शश्वती, नद्यः ऋषिका, यमी वैवश्वती, वसुक्रपत्नी, काक्षीवती घोषा, अगस्त्यस्वसा, दाक्षयणी अदितिः, सूर्या सावित्री, उर्वशी, दक्षिणा प्राजापत्या, सरमा देवशुनी, जुहूः ब्रह्मजाया, वाग आम्भृणी, रात्रि भारद्वाजी, गोधा, इंद्राणी, श्रद्धा कामायनी, देवजामयःइंद्रमातरः, पौलोमी शची, सार्पराज्ञी, निषद उपनिषद, लाक्षा, मेधा तथा श्री नामक ऋषिकाओं का सुंदर विवरण संग्रह में दिया गया है। छंद मुक्त इन कविताओं में सुंदर शब्दों का चयन एवं पठनीय लयात्मकता है। उदाहरण के लिए नद्यः ऋषिका कविता की यह पंक्तियां देखें -

नद्यः ऋषिका को पढ़ते पढ़ते

मैंने नदी को दृष्टि भर अपलक देखा

वह मुझमें मेरे अस्तित्व में समाती हुई

मां का वात्सल्य, बहिन का स्नेह, प्रेयसी का प्यार

उंड़ेलती हुई, अनंत गहराई लिए, तापसी सी।

अविराम अहिर्निश गति को साधती सी

कत्र्तव्यपथ की प्रेरणा बन, सम्मुख प्रस्तुत हुई

मौन, निःशब्द प्रार्थना के स्वर में झंकृत हो

मेरे ही कण्ठ से।


 


डाॅ. सरोज गुप्ता की इन कविताओं में संस्कृतनिष्ठ शब्दों से उत्पन्न भाव प्रभाव पाठक के मन को वैदिक अनुभूति कराने में सक्षम हैं। जैसे ऋषिका रात्रि भारद्वाजी पर केन्द्रित कविता की ये पंक्तियां -

दैदीप्यमान, प्रकाशवती विश्वाःश्रियाः

सृष्टि के मूल की रात्रि रूप महाबीज

विशिष्ट नक्षत्र रूप नेत्रों से सब ओर झांकती

तम रूप ओजस्वी ओढ़ती सारी चमक

जीवरात्रि, ईशरात्रि, महाप्रलयकालरात्रि

सृष्टि की अव्यक्त शक्ति

ब्रह्ममयी एकार्णव चित्तशक्ति

ऋषिका रात्रि भारद्वाजी


         कलेवर की दृष्टि से यह पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण एवं पठनीय है। यह रेखाचित्रों से सुसज्जित नयनाभिराम आकर्षक आवरण वाली लगभग 150 पृष्ठों की हार्ड बाउंड पुस्तक है। किन्तु इस पुस्तक की कीमत रुपये 595/- है जो कि बहुत अधिक है। यदि इस पुस्तक की कीमत कुछ कम होती तो यह अधिक पाठकों द्वारा खरीद कर पढ़ी जा पाती। फिर भी इस काव्य संग्रह में पिरोए गए ज्ञान का महत्व इसके मूल्य से कहीं अधिक है। जैसा कि पुस्तक के दूसरे फ्लैप में भारतीय संस्कृति के अध्येता डाॅ. श्यामसुंदर दुबे ने इस काव्य संग्रह के बारे में बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है-‘‘ विदुषी लेखिका ने अपनी भूमिका में यह पूर्ण रूप से स्पष्ट कर दिया है कि ब्रह्मवादिनी उन सभी ऋषिकाओं के निमित्त है जो मंत्र दृष्टा रही हैं। इन ऋषिकाओं का जन्म क्षेत्र, उनका व्यक्तित्व और कृतित्व इस विशिष्ट कृति में समावेशित है। साथ ही साथ उनके काव्य के भावना परिदृश्य को भी इसमें प्रत्यक्ष किया है। भारतीय मेधा का यह प्राकट्य हमारे वर्तमान कालिक चिंतन को नवीन दिशा प्रदान करेगा और नारी विमर्श के परिदृश्य को विस्तारित करेगा। चित्रों से सुसज्जित यह कृति अपनी अभिराम शैली में अपने पाठक वर्ग को न केवल सम्मोहित करेगी बल्कि उसके ज्ञानात्मक अवबोधन के क्षेत्रफल का विस्तार भी करेगी।’’

         भारतीय संस्कृति के एक महत्वपूर्ण पक्ष को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करके डाॅ. सरोज गुप्ता ने निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण कार्य किया है जिसके लिए वे बधाई की पात्र हैं।                                                                                           -----------------

Wednesday, September 25, 2019

समीक्षा ... जीवन की सच्चाइयों को रेखांकित करता काव्य संग्रह - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      पिछले दिनों सागर नगर के कवि वीरेंद्र प्रधान की लोकार्पित पुस्तक ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ पर मेरा समीक्षात्मक आलेख मेरठ से प्रकाशित " दैनिक विजय दर्पण टाइम्स" में दिनांक 24.09.2019 को साहित्य, संस्कृति, कला-दर्पण के अंतर्गत प्रकाशित हुआ है। कृपया आप भी पढ़ें।
हार्दिक आभार दैनिक विजय दर्पण टाइम्स के प्रति 🙏
.... और शुभकामनाएं वीरेंद्र प्रधान जी को 💐

जीवन की सच्चाइयों को रेखांकित करता काव्य संग्रह
                       - डॉ. वर्षा सिंह
                         
        वीरेन्द्र प्रधान का काव्य संग्रह ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ भले ही उनका प्रथम काव्य संग्रह है किन्तु उनकी काव्यात्मक-यात्रा दीर्घकालीन है। अपने पारिवारिक दायित्वों तथा आजीविका संबंधी व्यस्तताओं ने उन्हें साहित्य साधना के लिए अपेक्षाकृत कम समय दिया फिर भी वे व्यस्तताओं से समय चुरा कर साहित्य से जुड़े रहे। मुझे स्मरण है कि सन् 2000 में मेरे तीसरे ग़ज़ल संग्रह ‘‘हम जहां पर हैं’’ के विमोचन के अवसर पर वीरेन्द्र प्रधान जी ने उपस्थित हो कर मेरे संग्रह पर अपने अमूल्य विचार व्यक्त किए थे। आज जब भाई वीरेन्द्र प्रधान के प्रथम काव्य संग्रह पर मुझे आलेख वाचन करते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे दोनों आयोजनों के बीच का कुछ क़दम का फ़ासला मिट गया हो। वस्तुतः यही साहित्य की कालजीविता है। साहित्य देश, समाज, परिवार और दिलों के फ़ासलों को मिटाता है और नई ऊर्जा का संचार करता है।
           ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ पुस्तक का यह नाम अपने आप में समग्रता लिए हुए है। दूख और सुख, रात और दिन, विश्वास और अविश्वास, अव्यवस्था और व्यवस्था इन सभी के बीच कुछ क़दम का फ़ासला ही तो होता है। यह फ़ासला तय होते ही सारे दृश्य बदल जाते हैं, जीवन बदल जाता है अर्थात् अतीत, वर्तमान ओर भविष्य बदल जाता है।
संग्रह की पहली कविता है ‘‘मां’’। यह उचित भी है क्योंकि मां आरंभ है उन अनुभूतियों की जो   संतान में संवेदनशीलता का बीजारोपण करती है। मां को बच्चे की प्रथम शिक्षिका होती है। अपनी लोरियों के द्वारा भी मां जहां कल्पनाओं का सुन्दर संसार रचती है, वहीं यथार्थ की कठोरता से भी परिचित कराती रहती है। मां सिर्फ जननी नहीं, परिवार और संस्कारों की रीढ़ होती है। मां का ममत्व हर संतान पर एक ऐसा ऋण होता है जिससे वह कभी भी उऋण नहीं हो सकता। इस भावना को वीरेन्द्र प्रधान ने ‘मां’ शीर्षक अपनी कविता में बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है-
मां, तेरा मुझ पर है कर्ज बहुत
अनगिनत जन्म ले कर भी
उसे न चुका पाउंगा मैं
गर्भ से ले कर जन्म तक
और जन्म के बाद अपार कष्ट सह
तूने जो परवरिश की
उसे न भूल पाउंगा मैं
बुझ रही पीढ़ी के प्रति ध्पूर्ण सम्मान के साथ
हो सकता है दे सकूं
अगली  पीढ़ी को
उसका अंश मात्र भी
जो तूने मुझे दिया समय-समय पर
लोरियों की शक्ल में घूंटियों के रूप में
या रहीम, रसखान ओर कबीर की
शिक्षाओं के माध्यम से
भावना यही है कि
गांठ में बांध लूं तेरी हर सीख (पृ.20)
   
         वीरेन्द्र प्रधान की कविताएं कृत्रिम कारीगरी से दूर अपने मौलिक रूप में दिखाई देती हैं। अपनी कविताओं के माध्यम से वे सीधे संवाद करते हैं। उनकी कविताओं में जीवन की कोमलता और विडंबनाएं साझा रूप में अभिव्यक्त होती हैं। कुल इक्यासी कविताओं के गुलदस्ता रूपी काव्य संग्रह ‘‘कुछ क़दम का फ़ासला’’ पर चर्चा का आरम्भ इसी संग्रह की ‘सिद्धांत’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियों से -
लोगों के अपने-अपने
सिद्धांत हुआ करते हैं।
कुछ मिशन बना देते हैं जीवन को
जख़्मों को मरहम बन जाते हैं
तो कुछ अपनों को ही चोटें दे कर
हमदर्दी में दुखती रगें छुआ करते हैं। (पृ.70) 

        जब जीवन का आकलन घनीभूत रूप ले लेता है तो विचारों का स्वरूप जीवन दर्शन में ढलने लगता है। लोग अपने जीवन को सुखद बनाने के लिए विभिन्न प्रकार का जोड़-घटाना करते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप जीवन शुष्क गणितीय समीकरण बन कर रह जाता है। किन्तु कवि वीरेन्द्र प्रधान ने जीवन के गणित में साहित्य को स्थान दे कर जीवन को देखने का एक दार्शनिक दृष्टिकोण अपनाया है। संग्रह की कविताओं में जीवन का पक्ष जैसे स्वयं मुखरित है। हर्ष है इसमें, उल्लास है, वेदना है, पीड़ा है, कहीं स्नेह से भरी-पूरी अनुभूति है, तो कहीं पीड़ा की तीव्रता है। समय और समाज की धड़कनें इन कविताओं में स्पंदित होती हैं। वीरेन्द्र प्रधान अपनी तुकांत एवं अतुकांत कविताओं के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त करते रहते हैं। उनकी कविताओं में दार्शनिक बोध स्पष्ट रूप से दिखई देता है। उनकी ‘‘जन्म-जन्मान्तर’’ कविता का एक अंश देखें -
पुण्य और पाप के मध्य
एक विभाजन रेखा
खींचते हुए
पता नहीं कब तक जीना है?
और फिर अंत में सिर्फ़ दो मुट्ठी ख़ाक बन कर
विसर्जित होना है। (पृ.35)
जीवन के सत्य को गंभीरता से स्वीकार करते हुए भी वीरेन्द्र प्रधान के भीतर का कवि पलायनवादी नहीं है। वे अपनी कविताओं में धैर्य और संयम को एक आश्वस्ति के रूप में सामने रखते हैं। जैसा कि उनकी कविता ‘‘छिन्द्रान्वेषी’’ में देखा जा सकता है -
क़द में/ पद में/ प्रतिष्ठा में
अपने से बड़ा
कोई भी व्यक्त्वि देख कर
हीनता का बोध नहीं होता
मगर अपने सापेक्ष
किंचित भी छोटा व्यक्तित्व
देख कर विराट लगता है
अपना व्यक्तित्व
और बौना लगता है
वह व्यक्ति।

पुस्तक समीक्षा - डॉ. वर्षा सिंह @ साहित्य वर्षा

      पुस्तक की सभी कविताएं हृदय से निकली संवेदनाएं प्रतीत होती हैं। वीरेन्द्र प्रधान की कुछ कविताओं में सूफियाना रंग भी दिखता है। उन कविताओं में वे आत्मा को एक समर्पित तत्व के रूप में देखते हैं। ‘मैं तो प्रेम में मस्त’ शीर्षक कविता में कवि के सूफियाना लहजे को देखा जा सकता है-
कान्हा के रंग में रंगी,
है शेष रंग बेकार
अपने अंतर में मैं बसी
मोहे व्यर्थ सभी घर-बार
प्रीत आत्मा में जगी
मुझे भावे न संसार
बनती मैं मीरा कभी
और कभी रसखान
मैं प्रेम के रंग में मस्त हूं
मोहे लागे एक समान -
रस या विष का पान। (पृ.45)
        ‘‘ यत्र नास्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ’’ अर्थात् जहां नारी का सम्मान होता है वहां देवता का वास होता है। क्योंकि नारी परिवार और समाज को सुंदर आकार प्रदान करती है। अपने अधिकारों के लिए उलाहना दिए बिना परिवार की सेवा में लगी रहती है। नारी को समर्पित अपनी कविता ‘‘नारी’’ में वीरेन्द्र प्रधान ने नारी के गरिमामय महत्व को प्रस्तुत किया है-
नारी के बिना नहीं कल्पना संसार की
राम, कृष्ण, गौतम, यीशू के अवतार की
यही नारी सहती है पुरुषों के चुपचाप सितम
कैसी है रीत, विधि तेरे संसार की।
पुत्री, भगिनी, पत्नी तो जननी किसी की तू
हे नारी, तू तो है संचालक परिवार की।(पृ.89)

       और अंत में इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कविता जिसमें जितनी गंभीरता से वर्तमान जीवन की विडम्बनाएं मुखर हुई हैं उतनी ही प्रभावी ढंग से दृश्यात्मकता उभर कर सामने आई है, मानो सब कुछ आंखों के सामने घटित हो रहा हो। कविता का श्ीर्षक है ‘‘गोण्डवाना एक्सप्रेस’’। पंक्तियों की दृश्यात्मकता पर ध्यान दें-
बिला नागा समय पर आने और जानेवाली
सीमित समय रुकने वाली
कभी-कभी छोड़ जाती है मुझे गोण्डवाना एक्सप्रेस
और काम की थकान लिए रुक जाता हूं
प्लेटफार्म पर ही
इंतज़ार करते-करते सो जाते हैं बच्चे
दिन भर काम कर थकी-मांदी
बूढ़ी और बीमार पत्नी राह देखती रह जाती है
उसे तो कल से फिर जूझना है
जीवन के संघर्षों से
और मुझे भी। (पृ.66)

          वीरेन्द्र प्रधान एक ऐसे कवि हैं जो साहित्यिक परिदृश्य में नेपथ्य में रह कर भी अपनी रचनात्मक उपस्थिति का बोध कराते रहे हैं और अब अपने प्रथम काव्य संग्रह के साथ नेपत्थ्य से बाहर आए है। उनका स्वागत है उनकी उस रचनाधर्मिता के साथ जो उनसे जीवन की सच्चाइयों को रेखांकित करने वाली कविताएं सृजित कराती है। पूरा काव्य संग्रह में सरसता, स्वाभाविकता, सजीवता के गुण एक साथ मिलते हैं। कठिन शब्दों से बचा गया है। भाषा में प्रवाह है। वीरेन्द्र प्रधान जी का यह प्रथम काव्य संग्रह रोचक एवं पठनीय है। प्रखर गूंज प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित यह संग्रह कुल 106 पृष्ठों का है। इसका मूल्य है 275 रुपए। पुस्तक का मुद्रण एवं साज-सज्जा आकर्षक है। उल्लेखनीय है कि उन्होंने अपना यह संग्रह अपने गुरु स्व. त्रिलोचन शास्त्री को समर्पित किया है। 
वीरेन्द्र प्रधान जी को उनकी इस रचनायात्रा के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।
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Friday, February 1, 2019

पुस्तक समीक्षा.... युवाओं के लिए एक उपयोगी पुस्तक - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

     दिनांक 31.01.2019 को स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में  पिछले दिनों लोकार्पित एक पुस्तक पर मेरी समीक्षा प्रकाशित हुई है, कृपया आप भी पढ़ें....

पुस्तक समीक्षा

     युवाओं के लिए एक उपयोगी पुस्तक
                                                           
                      समीक्षक  - डॉ. वर्षा सिंह
                                         
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पुस्तक  : आर. ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में सफल सेल्समैन कैसे बनें?
लेखिका : कु. सुमि अनामिका साक्षी
प्रकाशक : सर्वांगीण विकास संस्थान, रजाखेड़ी, मकरोनिया, सागर (म.प्र.)
मूल्य    : रुपए 200/-
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          ‘शुद्ध जलाग्रह डायरी के पन्ने.....आर. ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में सफल सेल्समैन कैसे बनें?’ लेखिका कु. सुमि अनामिका साक्षी की वह पुस्तक है जिसमें आर. ओ. मार्केटिंग के बारे में महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं कि आर. ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में सफल सेल्समैन कैसे बनें? सुमि अनामिका साक्षी ने अपने अल्पकालीन जीवन को बहुत ही सार्थकता से जिया। साहित्य और मार्केटिंग की दुनिया में समान रूप से रुचि रखने वाली सुमि अनामिका साक्षी की यह पुस्तक जो उनकी डायरी के पन्नों में लिपिबद्ध थी, उनके जीवनकाल के बाद पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो सकी। यह पुस्तक विशेष रूप से उन युवाओं के लिए लाभप्रद है जो आर.ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में अपनी योग्यता को आजमाना चाहते हैं।
               बात चाहे उत्पाद की हो, सेवा की हो या फिर किसी आइडिया की, बाज़ार एक मंत्र है और बिक्री एक कला है। इस कला में महारत हासिल करना पहले की तुलना में कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। क्योंकि आज के ग्राहक जागरूक हैं और उनके सामने  विकल्पों की भरमार है। अब ‘बायर बी अवेयर’ जैसे वाक्य की जगह ‘सेलर बी अवेयर’ ने ली है। इसलिए ग्राहक को अपने उत्पाद के प्रति विश्वास दिलाना सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होता है। यदि ग्राहक को विश्वास हो गया तो वह न केवल स्वयं उस उत्पाद को खरीदेगा बल्कि अपने परिचितों में भी उस उत्पाद की सिफारिश करेगा। सुमि अनामिका साक्षी ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि किसी भी उत्पाद को बेचते समय 90 प्रतिशत दृढ़ निश्चय और 10 प्रतिशत उसे प्रकट करने का तरीका महत्व रखता है। एक अच्छा सेल्स प्रोफेशनल बनने के लिए सकारात्मक नजरिया विकसित करना बेहद जरूरी है। जैसे आर.ओ. मशीन बेचते समय सेल्समैन को यह बात विस्तार से पता होनी चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के लिए आर.ओ. का पानी क्यों जरूरी है ओर उससे क्या लाभ हैं। उसके वैज्ञानिक पक्ष की भी विस्तृत जानकारी सेल्समैन को होनी चाहिए। यह वैज्ञानिक जानकारी भी इस पुस्तक में दी गई है।
              मार्केटिंग के क्षेत्र में नौकरी की ढ़ेरों संभावनाएं हैं, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि युवा सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाते हैं जिससे उन्हें काम मिलने में परेशानी आती है। जीवन में, कैरियर में भी स्थिति किसी प्रोफेशनल सेल्समैन की ही तरह है, जहां किसी उत्पाद की तरह खुद को हर मोर्चे पर सामने रखना पड़ता है, ताकि नियोक्ता एम्मींदावार की योग्यता को भांप सके और उसे अपने विश्वनीय साथी की भांति काम सौंप सके। मार्केटिंग में प्रत्येक उत्पादक के लिए उसका सेल्समैन उस सेनानायक की भांति होता है जिसके द्वारा वह बाज़ार को जीत सकता है। इसके लिए जरूरी है कि सेल्समैन अपनी पर्सनैलिटी, नॉलेज, कॉन्फिडेंस, बिहैवियर, कम्युनिकेशन स्किल, आइडिया जैसे टूल्स को हर स्थिति के लिए तैयार रखे। मार्केटिंग मैनेजमेंट की बेस्टसेलर पुस्तक -‘‘ए साउथ एशियन पर्सपेक्टिव’’ के लेखकद्वय अब्राहम कोशी और फिलिप कोटलर मानते हैं कि एम बी ए की मान्यता बढ़ाने से स्टूडेंट्स को प्रोफेशनल योग्यता के साथ फील्ड वर्क यानी व्यावहारिक ज्ञान भी जरूरी है। बात चाहे सेल्स के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की हो या फिर किसी प्रोडक्ट या सेवाओं को बेच रहे बिजनेसमैन की, कामयाबी के लिए बिक्री के सामान्य नियमों का ध्यान रखना सबके लिए जरूरी है। सही एप्रोच से काम करते हुए ही सेल्समैन ग्राहक का विश्वास जीतकर बार-बार आकर्षित करने में कामयाब हो सकता है। सुमि अनामिका साक्षी की इस पुस्तक में ये सारी बारीकियां विस्तार से समझाई गई हैं।

पुस्तक समीक्षा - डॉ. वर्षा सिंह
           
‘‘आर. ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में सफल सेल्समैन कैसे बनें?’’ पुसतक की सामग्री स्वास्थ्य कर आधार पानी, प्रशिक्षण, आर.ओ. उत्पादक निरुपण कैसे करें, व्यक्तिगत अभ्यास, आत्म प्रोन्नति एवं विज्ञापन सूत्र, स्वास्थ्य परामर्शदाता, संस्थान में सहकार एवं संकेत विस्तार जैसे शीर्षकों में बांटा गया है। अंत में व्यक्तित्व विकास ओर ज्ञान विस्तार के लिए पुस्तकों की सूची भी परिशिष्ट के अंतर्गत दी गई है। पुस्तक का आमुख डॉ. शैलेन्द्र शेखर ओशो शैलेन्द्र ने लिखा है और संपादन किया है डॉ. गोपीरंजन साक्षी ने। लेखिका स्व. सुमि अनामिका साक्षी की डायरी के पन्नों से सामग्री को क्रमबद्ध ढंग से पुस्तक तक लाने का कार्य किया है अमीश साक्षी ने। उल्लेखनीय है कि लेखिका सुमि अनामिका साक्षी अपने जीवनकाल में मार्केटिंग क्षेत्र में कार्यरत रहीं। अतः अनुभवों ओर ज्ञान के मिश्रण से तैयार की गई यह पुस्तक आर.ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में जाने वाले युवाओं के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
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- डॉ. वर्षा सिंह

#दैनिक_आचरण दिनांक 31.01.2019, #समीक्षा #सागर