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Tuesday, February 11, 2020

एक मुलाकात शायर डॉ. मधुर नज़्मी से - डॉ. वर्षा सिंह


शे'र जब उभरते हैं सन्दली ख़यालों से
शाइरी महकती है तब नये सवालों से

अब अदब के गुलशन में फूल कम ही खिलते हैं
ज़ह्र फैलते हैं अब बे-अदब रिसालों में

छा रहा है सूरज पर अब्र का नया टुकड़ा
दूर कर न दे हमको तीरगी उजालों से

बेपरों की परवाज़ें बे-असर ही ठहरेंगी
पस्तियाँ ही आएँगी आपकी उछालों से

नफ़रतों का क़द शायद छोटा होने वाला है
लोग हो गए वाक़िफ़ रहबरों की चालों से

क्यों चला नहीं जाता, पाँव रुक गये हैं क्यों
हर जवाब मिल जाता पूछते जो छालों से

ऐ 'मधुर' अब उम्मीदें ख़ाक हो गयीं सारी
वक़्त का मछेरा ही घिर गया है जालों से

- मधुर नज़्मी

 विगत जनवरी 2020 में देश के प्रख्यात शायर मधुर नज़्मी जी का मोहम्मदाबाद गोहना, मऊ (उ.प्र.) से मेरे शहर सागर आए।  इस दौरान मैंने उन्हें अपने  पांचवें ग़ज़ल संग्रह "दिल बंजारा" की प्रति भेंट की तथा मैंने और मेरी बहन डॉ शरद सिंह ने उनसे साहित्यिक चर्चाएं कीं। उसी तारतम्य में मैंने उनका एक अनौपचारिक साक्षात्कार लिया जिसका मुख्य अंश यहां प्रस्तुत है -
*डॉ. वर्षा सिंह -* आप इतने बड़े ग़ज़लगो हैं, आप ग़ज़ल के वर्तमान परिदृश्य को कैसा पाते हैं?
*डॉ. मधुर नज़्मी-* ग़ज़ल का वर्तमान परिदृश्य चिन्ताजनक है क्योंकि सोशल मीडिया पर कथित शायरों की बाढ़ आ जाने से ग़ज़ल की गम्भीरता नष्ट हो रही है। आप लोगों जैसे शायरों की ग़ज़ल के प्रति प्रतिबद्धता यह भरोसा दिलाती है कि इस विधा को गम्भीरता से लेने वाले लोग अभी शेष हैं और ग़ज़ल की श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प हैं।

*डॉ. वर्षा सिंह -* अक्सर यह सुनने में आता है कि साहित्य के प्रति अब लोगों मैं पहले जैसी रुचि नहीं रही। खुले मंच चुटकुलेबाजी का अड्डा बनते जा रहे हैं, आपका इस बारे में क्या कहना है?
*डॉ. मधुर नज़्मी-* आपका कहना सच है कि मंचों का स्तर अब पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन मैं निराश नहीं हूं। साहित्य में बहुत ताकत होती है यदि  ईमानदारी से अपनाया जाए तो साहित्य सारी दुनिया से जोड़ने की ताकत रखता है। मैं मुफ़लिसी में पैदा हुआ लेकिन मेरी शायरी ने दस देशों में जा कर मुशायरे पढ़ने का मौका दिया।
*डॉ. वर्षा सिंह -* उर्दू ग़ज़ल और हिन्दी ग़ज़ल, इन दो भाषाई नामों पर भी अक्सर बहसें होती रहती हैं। क्या आप इस बंटवारे को उचित मानते हैं?
*डॉ. मधुर नज़्मी-* मैं ग़ज़ल विधा के संदर्भ में भाषाई विवाद को तरज़ीह नहीं देता हूं। ग़ज़ल तो वह है जो दिल से कही जाए और सुनने वाले के दिल को छू जाए।
*डॉ. वर्षा सिंह -* सागर आ कर आपको कैसा महसूस हो रहा है?
*डॉ. मधुर नज़्मी-* जी, सागर आ कर मुझे बहुत अच्छा लगा। सागर को मैं त्रिलोचन शास्त्री जी के सागर प्रवास के कारण जानता था, फिर आपके नाम से इसे जाना। यहां के लोग बहुत मिलनसार हैं।
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तीनबत्ती न्यूज़.कॉम
साहित्य सारी दुनिया से जोड़ने की ताकत रखता है- डॉ #मधुर #नज़्मी
#साक्षात्कार/डॉ #वर्षासिंह
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Friday, January 17, 2020

हां, मुझे प्यार है अपने शहर सागर से - डॉ. वर्षा सिंह

   
Dr. Varsha Singh
     मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड वाले हिस्से में स्थित सागर ज़िला, सागर संभाग का संभागीय मुख्यालय है। यहां डॉ॰ हरीसिंह गौर द्वारा स्वयं निजी पूंजी से दी गई  दानराशि से 18 जुलाई 1946 को स्थापित सागर विश्वविद्यालय है। अपनी स्थापना के समय यह भारत का 18वां विश्वविद्यालय था। किसी एक व्यक्ति के दान से स्थापित होने वाला यह देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है। वर्ष 1983 में इसका नाम डॉ॰ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कर दिया गया। पहले यह म.प्र. राज्य शासन के स्वायत्तशासी था फिर 27 मार्च 2008  से इसे केन्द्रीय विश्वविद्यालय की श्रेणी प्रदान की गई। 





       सागर के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार छठवीं शताब्दी में यह उत्तर भारत के महाजनपदों में से एक चेदी साम्राज्य का हिस्सा बन गया था। इसके बाद इसे पुलिंद शहर में शामिल कर लिया गया। गुप्तवंश के शासनकाल में इसे काफी महत्व मिला। समुद्र गुप्त के शासनकाल में इसे स्वभोग नगर का रूप मिला। यह राजकीय तथा सैन्य गतिविधियों का महत्वपूर्ण केन्द्र था। नौवीं शताब्दी में चंदेल और कल्चुरी राजवंशों ने यहां राज किया। इसके बाद परमारों का और फिर तेरवीं व चौदहवीं शताब्दी में मुगलों का शासनकाल यहां था।
 एेतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार  सागर का प्रथम शासक श्रीधर वर्मन था। 15 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सागर पर गौड़ शासकों ने कब्जा जमा लिया। फिर महाराज छत्रसाल ने धामौनी, गढ़ाकोटा और खिमलासा में मुगलों को हराकर अपनी सत्ता स्थापित की। बाद में इसे मराठाओं को सौंप दिया। 




         यह भी माना जाता है कि सागर नगर को राजा निहालशाह के वंशज ऊदनशाह ने बसाया था। पुराने समय से मध्य भारत में एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में शुमार सागर का इतिहास 1660 से शुरू माना जाता है, जब निहालशाह के वंशज ऊदनशाह ने तालाब किनारे स्थित एक किले के स्थान पर छोटे किले का निर्माण कराया। इसके आसपास गांव बसाया गया जिसे परकोटा नाम दिया। परकोटे के आसपास हुई बसाहट से अब वह शहर के मध्य में पहुंच गया है। वर्तमान किला और उसके अंदर एक बस्ती का निर्माण पेशवा के अधिकारी गोविंदारव पंडित ने 1735 में कराया। एेसा माना जाता है कि जिले का नाम सागर विशाल सरोवर के किनारे बसे होने के कारण पड़ा।
सन् 1818 में अंग्रेजों ने अपना कब्जा जमाया और यहां ब्रिटिश साम्राज्‍य का आधिपत्य हो गया। सन् 1861 में इसे प्रशासनिक व्यवस्था के लिए नागपुर में मिला दिया गया और यह व्यवस्था सन् 1956 में नए मध्यप्रदेश राज्‍य का गठन होने तक बनी रही।






       सागर जिला मध्य प्रदेश के उत्तर मध्य भाग और भारत के मध्य भाग में 23.10 उत्तरी अक्षांश से 24.27 उत्तरी अक्षांश तथा 78.5 पूर्व देशांश से 79.21 पूर्व देशांश के मध्य में स्थित है। यह क्षेत्र भाषाई आधार पर एवं बुंदेला शासकों के कारण बुंदेलखंड के रूप में जाना जाता है। इसके उत्तर में छतरपुर और ललितपुर, पश्चिम में विदिशा, दक्षिण में नरसिंहपुर और रायसेन तथा पूर्व में दमोह जिले की सीमाएं लगती हैं। यहां की बोली बुंदेली कहलाती है। सागर जिले के दक्षिणी भाग से कर्क रेखा गुजरती है। भौगोलिक दृष्टि से सागर देश के मध्य में स्थित है और इसे ‘‘भारत का हृदय’’ कहना उचित होगा। विंध्य पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित यह जिला प्राचीन समय से ही मध्य भारत का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। सागर के आरंभिक इतिहास की कोई निश्चित जानकारी तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन किताबों में दर्ज विवरणों के अनुसार प्रागैतिहासिक काल में यह क्षेत्र गुहा मानव की क्रीड़ा स्थली रहा। आपचंद की गुफाओं में मिले शैलचित्र इसका प्रमाण हैं।

   पौराणिक साक्ष्यों में ऐसे संकेत मिलते हैं कि इस जिले का भूभाग रामायण और महाभारत काल में विदिशा और दशार्ण जनपदों में शामिल था। इसके बाद ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में यह उत्तर भारत के विस्तृत महाजनपदों में से एक चेदी साम्राज्‍य का हिस्सा बन गया। इसके उपरांत ज्ञात होता है कि इसे पुलिंद देश में सम्मिलित कर लिया गया पुलिंद देश में बुंदेलखंड का पश्चिमी भाग और सागर जिला शामिल था।

  सागर जिले में प्रमुख रूप से धसान, बेबस, बीना, बामनेर और सुनार नदियां निकलती हैं। इसके अलावा कड़ान, देहार व कुछ अन्य छोटी नदियां भी हैं जो बारिश में ज़्यादा जलप्रवाहित करती हैं। प्राकृतिक संसाधनों के मामले में सागर जिले को समृद्ध नहीं कहा जा सकता है। कृषि उत्पादन में सागर जिले की खुरई तहसील में उन्नत किस्म के गेहूं का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है, जो पूरे देश में निर्यातित होता है।




       सागर शहर में सिविल लाइन स्थित चंद्रा पार्क बहुत पुराना है। स्मार्ट सिटी प्राेजेक्ट के अंतर्गत चंद्रा पार्क के पास सेल्फी प्वाइंट और ग्रीन वाॅल बनाई गई है। वर्तमान में चंद्रा पार्क का  प्रवेश द्वार है, जबकि दूसरा प्रवेश द्वार आशीर्वाद होटल के पास पिम्पलापुरे मार्ग पर है। यहां शहर के युवा, बच्चे, बड़े सभी सुबह- शाम सैर के लिए आते हैं।

Wednesday, July 10, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 57 ... बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, नाटककार एवं लेखक डॉ. आलोक चौबे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि डॉ. आलोक चौबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, नाटककार एवं लेखक डॉ. आलोक चौबे
                                                        -       
                   - डॉ. वर्षा सिंह
                               
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परिचय :- डॉ आलोक चौबे
जन्म :-  20 मई 1979
जन्म स्थान :- ललितपुर ,उत्तर प्रदेश
पिता एवं माताः- श्री प्रताप नारायण चौबे एवं श्रीमती अंजू चौबे
शिक्षा :- मनोविज्ञान तथा पत्रकारिता और जनसंचार में परास्नातक, संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विषय में पीएचडी, उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से स्क्रिप्ट लेखन शिक्षा, भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कोझिकोड से एग्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम अध्ययनरत।
लेखन विधा :- गीत, लेख, नाटक, कहानी, पुस्तक समीक्षा, शोधपत्र।
प्रकाशन :- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
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          सागर नगर की माटी में वह ममता है कि जो भी यहां आता है, वह यहीं का हो कर रह जाता है। अनेक साहित्यकार जो प्रदेश के दूसरे जिलों अथवा देश के दूसरे प्रदेशों से सागर आए, शीघ्र ही सागर उनकी कर्मभूमि अर्थात् सृजनभूमि बन गई। 20 मई 1979 को उत्तरप्रदेश के ललितपुर में जन्मे डॉ आलोक चौबे विगत सन् 2002 से सागर में निवासरत हैं। यह कहा जा सकता है कि सागर उनकी वास्तविक कर्मभूमि है। अपने पिता श्री प्रताप नारायण चौबे एवं माताश्री अंजू चौबे से मिले संस्कारों ने उन्हें अध्ययनशीलता का गुण प्रदान किया। उन्होंने मनोविज्ञान तथा पत्रकारिता और जनसंचार में डबल एम. ए. किया। इसके बाद मनोविज्ञान में ही विशेष अध्ययन एवं शोधकार्य करते हुए संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विषय में पीएचडी उपाधि प्राप्त की। लेखन की रुचि ने डॉ आलोक चौबे को उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से स्क्रिप्ट लेखन शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा दी। आज भी वे भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कोझिकोड से एग्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम अध्ययनरत हैं।
             बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ आलोक चौबे आकाशवाणी सागर से कैजुअल अनाउंसर के रूप में जुड़े। सागर नगर की चर्चित नाट्य संस्था अन्वेषण थिएटर ग्रुप के सचिव रहे। चाइल्ड राइट्स ऑब्जर्वेटरी मध्य प्रदेश, भोपाल के जनरल बॉडी मेंबर, पब्लिक रिलेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया के सदस्य तथा सोसाइटी फॉर आइडियल ग्लोबल नीड्स के अध्यक्ष हैं। यूनिसेफ, उत्तर प्रदेश में राज्य संचार सलाहकार के तौर पर भी काम कर चुके हैं। अपने लेखन एवं सृजन की विविधता के अंतर्गत डॉ आलोक चौबे ने कई राज्यों और संस्थाओं की योजनाओं की संचार सामग्री का निर्माण किया। उन्होंने बीबीसी मीडिया के उपक्रम बीबीसी मीडिया एक्शन के साथ भी स्वास्थ्य संचार परियोजना में कार्य किया। वे सागर के शहीदों पर केन्द्रित ‘‘हम भूल न जाएं उनको’’ स्मारिका का संपादन कर चुके हैं जिसके अब तक दो संस्करण सन् 2004, 2014 में  प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. आलोक चौबे लेख भी लिखते हैं। सन् 1999 से मनो-सामाजिक-राजनीतिक और संचार विषयों पर देश के 15 से अधिक राज्यों के अखबारों में सम्पादकीय पृष्ठों पर उनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं।
            भ्रमण मनुष्य की चिंतन क्षमता को नए आयाम प्रदान करता है। उसे नवीन अनुभवों से जोड़ता है। डॉ. चौबे के लेखन में अनुभवजन्य विविधता मिलती है। इसका कारण है कि वे अब तक बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हिमाचल, उत्तरांचल, महाराष्ट्र ,हरियाणा, दिल्ली, पंजाब आदि राज्यों के शासकीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ कार्य करते हुए सैकड़ों गांवों की सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक विविधताओं से साक्षात्कार कर चुके हैं। इसके साथ ही वे मंचों पर काव्यपाठ करते हैं। इसी तारतम्य में वे विभिन्न प्रदेशों के कवि सम्मेलनों, मुशायरों में काव्यपाठ कर चुके हैं। जहां तक प्रसारण की बात है तो डॉ. चौबे की रचनाओं का आकाशवाणी छतरपुर, सागर और झांसी से प्रसारण हो चुका है।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

              डॉ. आलोक चौबे की पत्नी प्रिया जैन भी लेखन में रुचि रखती हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ चौबे एवं उनकी पत्नी प्रिया जैन ने ‘‘टर्निंग पॉइंट’’ नाटक मिल कर लिखा था जिसका मंचन थर्ड बेल थिएटर ग्रुप द्वारा किया गया था। डॉ चौबे ने कई नुक्कड़ नाटक भी लिखे जिनका प्रदर्शन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर किया जाता रहा है। वे नाटकों में अभिनय भी कर चुके हैं। उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन, निर्माण एवं निर्देशन भी किया जिनमें प्रमुख हैं- लाइफ ऑन लाइन, संभावनाओं का सागर, हंगरमार्च आदि।
          कविता में जब यथार्थ एवं कल्पना का सुंदर समन्वय हो तो उसकी भाव संपदा द्विगुणित हो जाती है। ऋतुओं का अनुभव तो सभी करते हैं किन्तु एक कवि जब ऋतुओं का अनुभव करता है तो उसके ऋतुवर्णन में जीवन का दर्शन और सौंदर्य निखर आता है। जैसे डॉ आलोक चौबे जब वर्षा ऋतु को अपनी कविताओं में उतारते हैं तो उसमें बारिश की एक अलग ही छटा दिखाई देती है जो ऋतु की सरसता अनुभव कराते हुए एक पल ठहर कर सोचने को भी विवश करती है। उदाहरण के लिए उनकी यह कविता देखिए -
गीले बादल आसमान में नज़र आने लगे ..
अब बारिश होगी...मिट्टी में सोंधी-सोंधी खुशबू आएगी...
नयी कोंपलें निकलेंगी ....नए पत्ते निकलेंगे ...
चारों तरफ फैलेगी हरियाली चादर .....
और मन भावन होगा सब कुछ....
धरती की प्यास बुझेगी..../किसानांं की आस जगेगी.. ..
बच्चे कागज़ की नाव चलाएंगे...
नवयुगल भीगकर बारिश में.../प्रेममय हो जायेंगे...
घर के आंगन में पानी की बूंदे अठखेलियां करेंगी...
चलो इन खूबसूरत लम्हों को सहेज ले....
इन पानी की बूंदों को समेट ले....
ताकि प्यास बुझी रहे../आस जगी रहे .......

           अतुकांत कविताओं के साथ ही मुक्तक के रूप में तुकांत काव्य में भी मौसम की सुंदर व्याख्या करते हैं डॉ आलोक चौबे। यह मुक्तक उल्लेखनीय है-
वारिस सपनों का बनाता है कोई
वसीयत गमले में उगाता है कोई
सांसों से सींच दूं अगर नींदों को
बादलों से प्यास बुझाता है कोई
डॉ. आलोक चौबे

           कवि डॉ. आलोक चौबे की रेलवे स्टेशन पर एक लम्बी कविता है जिसमें उन्होंने स्टेशन की आपाधापी भरी गतिविधियों का सजीव चित्रण किया है। रेलवे स्टेशन यूं भी मनोभावों का एक ऐसा जमावड़ा अपने आप में समेटे होता है जिसमें मिलन का सुख तो विदाई का दुख, परिचितों की भीड़ तो अपरिचितों का हुजूम, मन के एकाकीपन से भीड़ के कोलाहल तक सभी कुछ निबद्ध रहता है। डॉ चौबे की कविता में रेलवे स्टेशन की ये सारी खूबियां दृश्य की तरह उभरती हैं। इस कविता को उनकी प्रतिनिधि कविताओं में गिना जा सकता है-
रंगमंच सा ये स्टेशन
1, 2 3 ए सी , स्लीपर और
जनरल में भी बंटा स्टेशन
करता है पर भेद भाव भी
आदमी आदमी में स्टेशन
पैसे की माया है सबकुछ
जान गया है अब स्टेशन
जाने कितने एकाकों का
घर परिवार है ये स्टेशन
जाने कितने घर परिवारों
को मिलवाता है स्टेशन
जाने कितने मजदूरों को
काम दिलाता है स्टेशन
मैं भी अक्सर रहता हूं साथी
इस स्टेशन , उस स्टेशन।

              समाज में घटित होने वाली जघन्य घटनाएं कवि के मन को खुरचती हैं और इससे उत्पन्न पीड़ा प्रश्न करती है कि अपराध का मूल कारण क्या है? समाज में बढ़ते जा रहे लैंगिक अपराधों का स्मरण कराते हुए कवि आलोक चौबे ने एक लम्बी कविता लिखी है ‘‘दुष्कर्मी कौन?’’। इस कविता का एक अंश देखिए-
दुष्कर्मी कौन?
वो जिसने बुरा कर्म किया
उनका क्या जो व्यवसाय करते हैं
मसालेदार ख़बरों का ...
और परोसते है नारी देह को
उपभोग की वस्तु की तरह .....
इस अपाहिज समाज में ...
नपुंसकता हावी है अब ....
तमाम विकृतियों के तंत्र साथ
राजनीति में, प्रशासन में, न्याय में
और आदमी में भी ...
कहीं नारीत्व लजा रहा है स्वयं को
और पुरुषत्व वो तो जैसे बचा ही नहीं
वीरो की इस धरा पर ..... दुष्कर्मी कौन?
सिर्फ वो जिसने बुरा कर्म किया
वो क्यूं नहीं जो इन कर्मो को
प्रेरित करता है ...
उकसाता है कुत्सित विचार
और नहीं रहता सजग ...
कि कहीं कोई विकृत मानसिकता का पुरुष
मासूम मुस्कान न छीन ले किसी गुडिया की .....
अब नहीं कोई निर्भया सब भय में है?
क्यूंकि हम कोई सुकर्म भी
नहीं करते ,मतलबपरस्ती हावी है
व्यक्ति पर, समाज पर और तंत्र पर
हम सब पर .......
तो दुष्कर्मी कौन? तो दुष्कर्मी कौन?? तो दुष्कर्मी कौन???

               डॉ. आलोक चौबे सागर नगर के वे साहित्यकार हैं जो अपनी विविधतापूर्ण लेखनी, संवेदनाओं की धनी कविताओं एवं कटाक्ष करते नाटकों से हिन्दी साहित्य संपदा में निरंतर श्रीवृद्धि कर रहे हैं। उनका लेखन उन्हें एक अलग पहचान देने में पूर्ण सक्षम है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 10.07.2019)
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Friday, July 5, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 56 .... एक उदीयमान कवि प्रदीप पाण्डेय - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि प्रदीप पाण्डेय पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

       एक उदीयमान कवि प्रदीप पाण्डेय
                                 - डॉ. वर्षा सिंह         
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परिचय :
नाम  :- प्रदीप पाण्डेय
जन्म :-  18 फरवरी 1975
जन्म स्थान :- सागर
माता-पिता :- श्रीमती सरस्वती देवी पाण्डेय एवं स्व. हरिनारायण पाण्डेय
शिक्षा  :- समाजशास्त्र एवं इतिहास में एम.ए., मास्टर डिप्लोमा इन सोशल वर्क ,एम.बी.ए. (एच.आर.),डाक्टरेट इन एन्त्रप्रान्यौरशिप।
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य।
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          सागर नगर में साहित्य के प्रति रुझान मानो यहां की हवा और पानी में घुले हुए हैं। इसीलिए विविध क्षेत्रों में प्रवृत्त व्यक्ति भी साहित्य सृजन की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह पाते हैं। महाकवि पद्माकर की इस पुण्य भूमि में ऐसा होना स्वाभाविक है। राजीव नगर वार्ड के प्रसिद्ध कर्मकाण्डी विद्वान पं. हरिनारायण पाण्डेय एवं श्रीमती सरस्वती देवी पाण्डेय के यहां 18 फरवरी 1975 को जन्मे प्रदीप पाण्डेय यूं तो एक ‘मोटिवेशनल गुरु’ के रूप में युवाओं का मार्गदर्शन करते हैं किंतु स्वयं वे साहित्यसृजन के प्रति पूर्णनिष्ठा से अभ्यासरत हैं। उनकी बाल्यावस्था परमधार्मिक वातावरण में व्यतीत हुई जिससे धर्म एवं दर्शन को उन्हें समझने का अवसर मिला। वस्तुतः उनके घर में पांडित्य कार्य पीढ़ियों से चला आ रहा है। किंतु प्रदीप पाण्डेय ने धार्मिक संकीर्णता के बजाय धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया जिसकी प्रेरणा उन्हें अपने माता-पिता से मिली थी। प्रदीप पाण्डेय ने समाज शास्त्र ,इतिहास से एम.ए. किया। इसके साथ ही सोशल वर्क में डिप्लोमा किया। इसके बाद एम.बी.ए. (एच.आर.), डाक्टरेट इन एन्त्रप्रान्यौरशिप भी किया। प्रदीप पाण्डेय ने हमेशा इस बात की आकांक्षा रखी है कि युवावर्ग को उचित मार्गदर्शन मिल सके ताकि वे अपने जीवन में निराशा को दूर हटा कर सफलताएं प्राप्त कर सकें। इसी दिशा में पहले स्वयं को तैयार करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने ज्ञान एवं अनुभव के भंडार को बढ़ाते हुए जवाहरलाल नेहरू लीडरशिप इंस्टीट्यूट मे लीडरशिप मैनेजमेंट पर प्रशिक्षण कार्य ,आई आई एम-इंदौर “मैनेजरियल स्किलस“ पर प्रशिक्षण कार्य , लीड बैंक द्वारा संचालित ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण केन्द्र का संचालन व प्रशिक्षण कार्य किया। आज वे युवाओं के लिए मोटीवेशनल स्पीकर एवं फ्रीलांस प्रशिक्षक है। उल्लेखनीय है कि सागर मे 2003 से 2008 प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निःशुल्क कोचिंग ‘‘दी वे’’ संस्था द्वारा युवाओं की तैयारी कराई जिसके परिणामस्वरूप लगभग 3200 युवाओं का सरकारी सेवाओं मे चयन हुआ।
              सांस्कृतिक अभिरुचि से प्रेरित हो कर प्रदीप पाण्डेय नगर में लगभग 122 सांस्कृतिक आयोजन करा चुके हैं। “सिटी गाईड-2000’’, ‘‘शताब्दी परीक्षा विशेष’’ के प्रकाशन के अतिरिक्त सागर के सामाजिक मुद्दों पर चार डाक्युमेंट्री बना चुके हैं जिनमें सन् 2011 में बनाई गई डाक्युमेंट्री “तिल तिल मरती झील“ विशेष रूप से चर्चित रही। इन तमाम उपलब्धियों के साथ ही प्रदीप पाण्डेय काव्य के क्षेत्र में पूर्ण गंभीरता से अभ्यासरत हैं। साथ ही वे बताते हैं कि पत्र-पत्रिकाओं में अब तक उनके 42 लेखों का प्रकाशन हो चुका है तथा वे 100 से उपर कविताएं लिख चुके हैं। साहित्य के क्षेत्र में अपनी अब तक की उपलब्धियों का श्रेय वे अपने ‘मेंंटोर’ को देते हुए कहते हैं कि-‘‘ श्यामलम् संस्था के श्री उमाकांत मिश्र जी ने मुझे साहित्य के क्षेत्र में पहचान दिलवाई।’’

Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

              प्रदीप पाण्डेय अपने साहित्य सृजन के प्रति झुकाव के बारे में बताते हुए कहते हैं कि- ‘‘एक वक्ता को श्रोता होने के साथ अध्ययनशील होना, मै समझता हूँ प्रथम एवं अनिवार्य है। अतः मोटीवेशनल स्पीकर यदि लेखक हो तो लेखन बोलने की कला भी विकसित करता है यही सोचकर लिखने का प्रयास करता रहा। ये बात अलग है जो मन मे आता है वह लिख देता हूं किन्तु साहित्य की सीमाओं और साहित्य का ज्ञान  आज भी न्यून है। पत्रिकाओं और अखबारों मे प्रकाशन स्थानीय स्तर मतलब सागर में ही हुआ। लिखने का शौक बचपन से है कैसा जुड़ा ये कहना कठिन है। सन 2000 मे जब मेरी पत्रिका “सिटी गाईड “ का प्रकाशन हुआ तब उसमे मैंने एक लेख लिखा था “इश्क“। फिर एक कार्यक्रम हुआ 2003 रविन्द्र भवन में संगीत कार्यक्रम का नाम “ये लम्हे“ जिसका ब्रोशर मुझे लिखना था। जिसमें में मैने “ये लम्हे’’ कविता लिखी। कविता की प्रशंसा ने मुझे लिखने के लिये प्रेरणा दी और मेरी लिखने की गति बढ गई। फिर तो मैने युवाओं की सोच के अनुसार इश्क-मोहब्बत, देश, समाज और हास्य कविताओं के साथ आर्टिकल लिखना शुरु किए। मेरे आर्टीकल युवाओं को उत्साहवर्धन एवं वर्तमान परिप्रेक्ष्य  को लेकर ही लिखे गये। देशबंधु में 2016 से 2017 तक लगातार प्रकाशित हुए।’’
            अपने लेखन के प्रति साफगोई रखने वाले नवोदित कवि के रूप में सागर के साहित्याकाश में तेजी से प्रकाशित होने वाले कवि प्रदीप पाण्डेय की कविताओं में जीवन के विविध पक्ष उभर कर आते हैं। उनकी कविताओं में एक ऊर्जास्विता है। उदाहरण के लिए ‘‘वक़्त की ही तू तलाश है’ शीर्षक यह कविता की कुछ पंक्तियां देखिए -
कर इरादे ,नभ से ऊँचे
और ऊँची ,भर उडान ।
साध ले ,फिर लक्ष्य अपना
नये लक्ष्य को,कर संधान ।।
है बराबर; कौन तेरे ?
है कौन तुझसा ;साहसी ?
तू सजग है ,तू अमिट है
है कहाँ ,तुझसी शुचि ?
आजकर ,इसी वक्त कर
एक प्रण! कर ठान ले ।
है तू  ही सर्वज्ञ जग में
आज इतना जान ले ।।
उठ जिगर मे,भरकर आंधी
बैठा क्यों ,होकर उदास है
वक्त ने बोया है ,तुझको
वक्त की ही ,तू तलाश है ।।

वृक्षारोपण करते हुए मध्य में डॉ (सुश्री) शरद सिंह एवं दायें से प्रथम प्रदीप पाण्डेय


              ‘‘हुनर अपना भी आजमाऊंगा’’ शीर्षक कविता में आशावाद का एक सकारात्मक रूप दिखाई देता है जो कवि प्रदीप पाण्डेय द्वारा युवाओं को दिए जाने वाले संदेश की भांति है। इस कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-
तीर है तुणीर में
समझूँ सबकी पीर मै
एक लक्ष्य, एक ध्येय
एक प्रण और प्राण है
एक शर मे
बिहंगम सी
खाई पाट जाऊंगा
आया हूँ तो ये तय
हुनर अपना भी आजमाऊंगा

            समाज और राजनीति की तत्कालीन दशाओं से हर युग में कवि प्रभावित हुए हैं। अव्यवस्थाओं के विरोध में जन्मे कटाक्ष का कविता में ढल कर सामने आना स्वाभाविक है। प्रदीप पाण्डेय ने भी अपनी कविता ‘‘बस मौन ही रहना’’ में भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्थाओं पर कटाक्ष किया है। बानगी देखिए-
फिर सजेगी सेज मुहब्बत की
फिर चिताओं पे रुदन होगा ।
फिर चलेगी चर्चा हिंद के धर्म की
फिर अरमानों का हरण होगा ।
टपकेगा खून किसानों के माथे से
फिर सत्ता की, गली में जश्न होगा ।
फिर लुटेगी अस्मिता मासूम की
फिर न्याय ;अन्याय में दफ़न होगा ।
फिर जमी़र बिकेगा,ईमान बिकेंगें
चहुँओर नैतिकता का पतन होगा ।
हुआ - हुआ चिल्लायेंगे भेड़िये
फिर कहेंगे अमन ही अमन होगा ।
फिर चलेगी बात होंगी तकरीरें
मरेगा गाँधी और वेवा वतन होगा ।
रागों में ही चलेगी सियासत
सिपाही की मौत और निंदा का कफन होगा ।
बात मुहब्बत की होगी वार पीठ पे होगा
मंत्र में तुम मरो, गाली का भजन होगा ।
तुम मौन हो,बस मौन ही रहना
फिर उसी वेदी में तुम्हारा ही हवन होगा ।।

          प्रेम के प्रति समाज के दृष्टिकोण को बड़े ही सहजभाव से रखते हुए ‘‘मुहब्बत पूजा है’’ शीर्षक कविता में प्रदीप पाण्डेय प्रेम की श्रेष्ठता को इस प्रकार स्थापित करते हैं-
इबादत है/ प्रार्थना है
उपवास है/स्पंदन है
अद्भुत रहस्य है/सुन्दर अहसास है
बस लोग है!
करने नहीं देते ।

           यह सच है कि काव्यशिल्प के मर्मज्ञों को प्रदीप पाण्डेय के काव्यसृजन में अभी एक कच्चापन दिखाई देगा किंतु उनके सृजन की निरंतरता एवं उनके द्वारा गंभीरतापूर्वक किया जा रहा सृजन-अभ्यास इस बात की आश्वस्ति कराता है कि वर्तमान में उदीयमान कवि के रूप में दिखने वाले प्रदीप पाण्डेय एक दिन भावों के साथ-साथ शिल्प में भी अपनी मजबूत पकड़ बना लेंगे, क्यों कि उनमें काव्य की समझ और सृजन के प्रति लगन दोनों ही खूबियां मौजूद हैं। 
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( दैनिक, आचरण  दि. 05.07.2019)
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Wednesday, June 19, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 54 .... संवेदनशील एवं ऊर्जावान कवयित्री डॉ. चंचला दवे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की कवयित्री डॉ. चंचला दवे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

संवेदनशील एवं ऊर्जावान कवयित्री डॉ. चंचला दवे
                     - डॉ. वर्षा सिंह
                     
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परिचय :
नाम  :- डॉ. चंचला दवे
जन्म :-  13 मार्च 1952
जन्म स्थान :- चंद्रपुर (महाराष्ट्र)
माता-पिता :- स्व. सूरज बेन पंड्या एवं स्व. सोमनाथ पंड्या
शिक्षा  :- बी.एड., एम.ए., पी.एच. डी.
लेखन विधा :- काव्य।
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        सागर के साहित्यिक जगत को जितना समृद्ध हिन्दी भाषियों ने किया है उतना ही समृद्ध किया है अहिन्दी भाषियों ने जिनमें महाकवि पद्माकर तेलगूभाषी थे। वर्तमान में डॉ. चंचला दवे इसका एक अनुपम उदाहरण हैं। डॉ. चंचला दवे बहुभाषी हैं। उनकी मातृभाषा गुजराती है। उनका जन्म 13 मार्च 1952 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में हुआ। जहां उन्हें मराठी भाषा का ज्ञान प्राप्त हुआ। अपनी अभिरुचि के अनुरुप उन्होंने हिन्दी का गहन अध्ययन किया और डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। तदोपरांत बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल से ' नई कविता के संदर्भ में भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं का अनुशीलन’ विषय में पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। गुजराती, मराठी, और हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी ओर संस्कृत का भी उन्हें पर्याप्त ज्ञान है।
         मृदुभाषी एवं आत्मीयता से परिपूर्ण डॉ चंचला दवे सन् 1972 से सागर में निवासरत हैं। उनके पति श्री सुशील दवे बैंककर्मी रहे हैं जिसके कारण उन्हें स्थानान्तरण का अनुभव होता रहा। सन् 1983 में उनके पति का स्थानांतरण सागर की खुरई तहसील स्थित बैंक शाखा में हो गया। डॉ चंचला दवे ने वहीं सन् 1983 से 1994 तक होली फैमिली कान्वेंट हायर सेकंडरी स्कूल में व्याख्याता के पद पर शिक्षण कार्य किया। इसके बाद अक्टूबर 1994 से 2012 तक श्रीवल्लभ दास माहेश्वरी महाविद्यालय खुरई जिसे कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय के नाम से भी जाना जाता है, में प्राध्यापक के पद पर रहते हुए शिक्षण कार्य किया। इस दौरान अनेक अवसर पर उन्हें प्रभारी प्राचार्य का दायित्व भी सम्हालना पड़ा। सेवा कार्य के साथ ही वे साहित्य सृजन से लगातार जुड़ी रहीं। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी लगभग 35 कविताओं का प्रकाशन हुआ। साहित्यिक पत्रिका ‘आकंठ’ में भी उनकी कविता प्रकाशित हुई। उन्होंने अनेक पुस्तकों की समीक्षाएं एवं आलेख लिखे जो देश की पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। उन्हें अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीयों में सहभागिता का भी अवसर मिला। डॉ. दवे ‘सृजन के स्वर’ नामक पुस्तक की सहायक संपादक रहीं। आकाशवाणी सागर, भोपाल से उनकी रचनाओं का प्रसारण होता रहता है।
         श्रीवल्लभ दास माहेश्वरी महाविद्यालय खुरई  से सन् 2012 मे सेवा निवृत्त हुईं डॉ. चंचला दवे सेवा निवृत्ति के उपरांत साहित्य सृजन में पुनः सक्रिय हो गईं। जिसका सुपरिणाम उनकी काव्यकृति ‘‘गुलमोहर’’ के रूप में सामने आया।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh


        साहित्य सृजन के लिए उन्हें अब तक अनेक सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है जिनमें प्रमुख हैं- गुजराती बाज खेडावाल समाज के रजत जयंती समारोह में 22 जून 2018 को राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल म प्र द्वारा साहित्य सम्मान, सन् 2018 में ही संभागीय साहित्यकार सम्मेलन सागर द्वारा सुधारानी डालचंद जैन सम्मान, 14 सितम्बर 2017 को श्यामलम् संस्था, सागर द्वारा स्व. डॉ सरोज तिवारी स्मृति में, ‘नारी प्रतिभा सम्मान’। इससे पूर्व हिंदी साहित्य संमेलन प्रयाग द्वारा प्रज्ञा भारती की मानद उपाधि, हिंदी साहित्य संमेलन प्रयाग द्वारा महादेवी वर्मा की जन्म शती पर सारस्वत सम्मान, महिला सम्मान सागर,  जे एम डी पब्लिकेशन नईदिल्ली द्वारा, हिंदी सेवी सम्मान, विचार संस्था सागर सागर गौरवसम्मान, डालचंद जैन की स्मृति में साहित्यकार सम्मान भी उन्हें प्राप्त हो चुका है। वे अनेक सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक समारोहों का सफल मंच संचालन कर चुकी हैं। वे सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं की सदस्य भी हैं जैसे एलांयंस क्लब इंटरनेशनल, समर्पण सागर क्लब, सरस्वती शिशु मंदिर विद्वत परिषद, म प्र लेखिका संघ, लायंस क्लब सागर झील। वे स्थानीय संगीत श्रोता समाज की उपाध्यक्ष भी हैं।
         अपने जीवनानुभव एवं रचनाकर्म के बारे में डॉ चंचला दवे का कहना है कि -‘‘ कविताएं लिखने का शौक स्कूल के दिनो से ही था, बचपन में पिता को खो देने के बाद,उन पर भाईयो पर कविता लिखते रहे, महाविद्यालय में भी यह शौक जारी रहा। मेरा विवाह 19 वर्ष में हो गया था। बी.ए. के बाद सारा अध्ययन विवाहोपरांत हुआ। राष्ट्र, समाज, नगर में घटित होने वाली  घटनाएं मेरी आत्मा को प्रभावित करती रहती है। इसी अन्तर्मथन से जो भाव शब्द बनकर निकलते है, कविता का रूप ले लेते है.अधिकांश कवितांएं मेरे जीवन में घटित होने वाली ,घटनाओं की परिणती है। मेरे जीवन का स्वर्ण काल खुरई में व्यतीत हुआ। वही मेरी कर्म भूमि रही। मातृभाषा गुजराती होने के बाद सृजन हिंदी में ही होता रहा। अभी गुजराती पुस्तक का हिंदी अनुवाद कर रही हूं। कुछ गुजराती कविताओं का हिंदी अनुवाद जारी है। मेरी कुछ कविताओं का मराठी अनुवाद, डॉ संध्या टिकेकर कर रही है।’’
          डॉ. चंचला दवे की कविताओं में समाज में व्याप्त विद्रूपताओं का मार्मिक दृश्य देखने को मिलता है जो एक अतिसंवेदनशील कवयित्री के रूप में उनकी पहचान स्थापित करता है। लड़कियों पर लगाई जाने वाली बंदिशें और उनके प्रति होने वाले अपराध कवयित्री के मन को कचोटते हैं और उनकी ‘‘सुरक्षा कवच’’ शीर्षक से यह कविता सामने आती है-
ऐसा न हो
कल, फिर से बेटियों को
रखने लगे/ पर्दो में
लौटने लगे/मुगलों की प्रवृति
शेर चीते,भालू,लोमड़ी,सियार
घूमने लगे आस पास
सांसे लेना हो जाएं दूभर
केवल दिखे फौज/नरभक्षियों की
बेटियों का रोना चीखना
उसकी करूण पुकार
क्यों बहरे हो गये हैं हम?
आइए हम बनते है/सुरक्षा कवच
अपनी बेटियों का/बचाते हैं,उन्हे
नर भक्षी भेडियों से।
बायें से : डॉ.वर्षा सिंह, डॉ. चंचला दवे, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, श्रीमती चौधरी एवं श्रीमती सीमा दुबे

         डॉ. चंचला दवे की रचनाशीलता की यह विशेषता है कि वे जीवन के कठोर पक्ष का आकलन तो करती ही हैं साथ ही, जीवन के कोमन पक्ष को भी बड़ी सुंदरता से अपनी अभिव्यक्ति में शामिल करती हैं। जैसे उनकी एक कविता है ‘‘मेरे मन के चांद हुए’’। इस कविता में प्रेमाभिव्यक्ति का मधुर रूप परिलक्षित होता है-
तुम मेरी
अनदेखी अनजानी प्रीत हो
दिल में तुम/आन बसे हो
जब से मिले हो/तुम
रंग मेरे मकरंद हुए
जब से सुना है/तुम को
साजो के सुर/मंद हुये
सपनों का तुम रूप/मनोहर
मेरे मन के चांद हुये
अधरों के स्वर/सूख गये
लेखन का रंग/लाल हुआ
नदिया की तुम/निर्मल धारा
जीवन का तुम गान हुए
शब्द सभी/निःशब्द हुए
मेरा तुम/ विश्वास हुए

           मनुष्य ने अपने जीवन को समयबद्ध करने के लिए घंटे, मिनट और वर्ष बनाए। नए वर्ष का आगमन और पुराने वर्ष का गमन एक समयमापी प्रक्रिया ही तो है किन्तु मनुष्य अपने बनाए सांचों  अथवा मानवों के प्रति किस प्रकार अनुरक्त हो जाता है कि वह समय के गुजरने की आहट को भी ठीक से सुन नहीं पाता है। डॉ चंचला दवे ने अपनी कविता ‘‘नया साल’’ में इसी तथ्य को व्यावहारिक ढंग से उठाया है-
आज 19 दिसंबर है
2018 को जाने में
बाकी है पूरे 12 दिन
फिर आयेगा, नया साल
आज का/साल बीता हो जायेगा
अतीत में/केलेंडर की तरह
फड़फडाती जिन्दगी
हवा में/उड़ती रहेगी
न पंख होंगे/ उड़ने को
और न बतियाने जीभ
काटने के लिये, नहीं होंगे/दांत
होगी तो केवल
जेहन में याद करने/स्मृतियां।

          डॉ. चंचला दवे एक ऊर्जावान कवयित्री हैं। भले ही अपने पारिवारिक दायित्वों के कारण उनकी सृजनशीलता की गति धीमी रही किन्तु अब वे एक बार फिर काव्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की ओर लौट आई हैं। यही आशा है कि उनका काव्य सृजन सागर नगर के साहित्यिक संपदा में निरंतर श्रीवृद्धि करेगा।
 
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( दैनिक, आचरण  दि. 19.06.2019)
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कवयित्री चंचला दवे की whatsapp पर टिप्पणी का स्क्रीन शॉट....

# साहित्य वर्षा

Wednesday, June 5, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 51 ... मंचीय काव्य परम्परा के कवि पुष्पेंद्र दुबे ‘सागर’ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि पुष्पेंद्र दुबे "सागर" पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

 मंचीय काव्य परम्परा के कवि पुष्पेंद्र दुबे ‘सागर’
                - डॉ. वर्षा सिंह
                   
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परिचय :- पुष्पेंद्र दुबे ’सागर’
जन्म :-  10 सितम्बर 1973
जन्म स्थान :- ग्राम नेगुवां, सागर (म.प्र.)
पिता :- स्व. गोपीलाल दुबे
शिक्षा :- स्नातक
लेखन विधा :- गीत, गजल
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            सागर का मंचीय काव्य जगत नवीन कवियों से निरंतर सुसज्जित होता जा रहा है। जहां एक ओर अनेक युवा कवि प्रकाशन के क्षेत्र में सामने आ रहे हैं, वही कई कवि मंचीय स्तर पर अपनी जगह बना रहे हैं। इसी क्रम में एक नाम है कवि पुष्पेंद्र दुबे ‘सागर’ का।
               ग्राम नेगुवां, पो. अमरमऊ, थाना शाहगढ़ तहसील बंडा जिला सागर में 10 सितंबर 1973 को जन्मे पुष्पेंद्र दुबे आज ‘सागर’ उपनाम से रचनाएं लिखते हैं। इनके पिता स्व. गोपीलाल दुबे वन विभाग में पदस्थ थे। उनका निरंतर स्थानांतरण होता रहता था। अपने पिता के साथ रहते हुए विभिन्न स्थानों में उन्होंने शिक्षा ग्रहण की। अंबिकापुर, बैकुंठपुर के अतिरिक्त सागर जिले के पड़रई बुजुर्ग, राहतगढ़ केसली, जैसीनगर, मालथौन आदि स्थानों पर रहने का अवसर मिला। पुष्पेंद्र दुबे ने दसवीं कक्षा राहतगढ़ से उत्तीर्ण की। तदुपरांत 12 वीं कक्षा सागर से उत्तीर्ण की। स्नातक स्तर की शिक्षा डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से 1995 में पूर्ण की।
कवि पुष्पेंद्र दुबे "सागर"

           काव्य लेखन में रुचि के संबंध में पुष्पेंद्र दुबे बताते हैं कि-‘‘ मुझे स्मरण नहीं है कि मैं कब साहित्य से जुड़ता चला गया। बस, इतना ही बता सकता हूं कि मेरे मित्र मुझसे कविताओं की फरमाइश करते थे और मैं उन्हें कविता रच कर सुनाता रहता था। मेरा यह शौक धीरे-धीरे परवान चढ़ा और मैं साहित्य में और अधिक रमता चला गया।’’
               इसके बाद पुष्पेंद्र दुबे स्थानीय काव्य गोष्ठियों में अपनी कविताएं पढ़ने लगे। इस दौरान उनकी मुलाकात सागर नगर के वरिष्ठ कवियों शिवकुमार श्रीवास्तव, कपूरचंद बैसाखिया, निर्मल चंद निर्मल, मणिकांत बेलिहाज से हुई। शायर यार मोहम्मद यार, इशहाक मास्साब तथा साहित्यकार रमेशदत्त दुबे से भी मिलने का अवसर मिला।  सन् 1995 से वे आकाशवाणी सागर से रचनापाठ करने लगे। इसके बाद  उनके मंचीय जीवन में एक विशेष घटना घटी जब उन्हें दमोह के एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में देश के ख्याति लक्ष्य कवि अशोक चक्रधर एवं कुमार विश्वास के साथ काव्यपाठ करने का अवसर मिला। इससे मंचों के प्रति उनका लगाव और अधिक बढ़ गया। किंतु सन 1998 में उन्हें 10 वीं वाहिनी विशिष्ट सशस्त्र बल सागर में आरक्षक के पद पर नियुक्ति मिल गई, जिसके बाद नौकरी की भाग-दौड़ और व्यस्तताओं के कारण काव्यसृजन थम-सा गया। फिर वर्ष 2016 में प्रतिनियुक्ति पर आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ भोपाल में पदस्थापना हुई। सन 2018 में इसी प्रकोष्ठ की सागर इकाई में स्थानांतरण होने के बाद एक बार पुनः काव्य सृजन में प्रवृत्त होने का अवसर मिला। वर्तमान में पुष्पेंद्र दुबे सागर नगर की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं के अंतर्गत होने वाले कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर शामिल होते हैं तथा अपनी रचनाओं का पाठ करते हैं। मंचों पर काव्यपाठ का सिलसिला भी पुनः जारी हो गया है।
            सन् 2015 में उनके माता पिता का देहावसान हो गया जिसके बाद पारिवारिक जिम्मेदारी भी पुष्पेंद्र दुबे के कंधों पर आ पड़ी। किंतु अपनी पत्नी पुष्पा दुबे के सहयोग से अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए अपने काव्य सृजन के प्रति समर्पित बने हुए हैं। उनके दो पुत्र हैं पीयूष और आयुष्मान।
                   पुष्पेंद्र दुबे की रचनाओं में समसामयिक वातावरण की झलक दिखाई देती है। आज जिस तरह संवेदनाएं घट रही हैं और इंसान स्वार्थी हो चला है, यह परिदृश्य कवि के मानस को झकझोरता है। उनकी यह रचना देखें -
मेरे जीवन में हर क़दम ही उलझन निकले
धरती जिसको समझा मैंने वह गगन निकले
आज निकला जो कल की तरह कल निकले
एक और एक दिन करके ही जीवन निकले
पानी भी  गिरा,   सैलाब  भी  आया देखा
मेरी आंखों से ही लगता है सावन निकले
फूल जिसको समझकर के पनाह दी मैंने
उसके दिल में भी मेरे वास्ते पाहन निकले
एक वीराने  में  लूटा है  दरिंदों ने मुझे
मेरे पावों के घुंघरू ही मेरे दुश्मन निकले
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh

                 कवि पुष्पेंद्र प्रेम की कोमल भावनाओं को उर्दू शायरी के तर्ज़ में बखूबी रखते हैं। एक जमाने में उर्दू शायरी आशिकी के बयान के तौर पर जानी जाती थी। समय के परिवर्तन के साथ जीवन के खुरदरे सच भी शायरी का हिस्सा बनने लगे लेकिन इश्क़ और आशिकी के बयान से उसका नाता नहीं टूटा। पुष्पेंद्र भी इस नाते को बनाए रखने का प्रयास करते दिखाई देते हैं-
मेरे किस्से आशिकी के, अब तो पुराने हो गए
जिसको चाहा  मैंने वो,  हमसे बेगाने हो गए
तोड़ कर के छोड़ कर के नींव में डाला गया
टूट कर पत्थर के यारों अच्छे ठिकाने हो गए
सुख मिला है दुख मिला, सब कुछ मिला हमको यहां
हम ठोकरों में वक्त की, पलकर सयाने हो गए
मेरे कारण कैसे उनका हो गया है जख्मी दिल
मुझको उनसे बिछड़े मुंसिफ, कई जमाने हो गए
जिसने देखा उनको वह जी गया है मर गया
हम भी ‘सागर’ देखकर उनके दीवाने हो गए

            प्रेम के दो पहलू होते हैं संयोग और वियोग। संयोग श्रृंगार की रचनाओं में उतनी दार्शनिकता कम ही देखने को मिलती है जितनी कि वियोग श्रृंगार की रचनाओं में मिलती है। संयोग जहां जीवन के सुखद पक्ष का दर्शन कराता है, वहीं वियोग जीवन के दुखद पक्ष से परिचित कराता है जिससे दार्शनिकता के भाव जागृत होने लगते हैं। इन्हीं भावों पर आधारित यह रचना है पुष्पेंद्र दुबे की-
न दिल कभी टूटता, न आहें भरता
न ये जिंदगी होती, न कोई मरता
धरती होती न ये सूरज भी कभी
डूबता रोज-सा, न ही उभरता
परिंदों को देखकर यह जेहन में आए
मैं उड़ सकता, मैं भी उतरता
मिट्टी जैसा न होता ये जीवन मेरा
तो मैं न ही टूटता, न ही बिखरता
डॉ. वर्षा सिंह के विशिष्ट आतिथ्य में रचनापाठ करते पुष्पेंद्र दुबे "सागर"

            जहां आपनत्व हो वहां वैमनस्य नहीं होना चाहिए किन्तु यथार्थ जीवन में दो दिलों के बीच खाई बनते देर नहीं लगती है। सच बोलना भी कभी-कभी रिश्तों में दरार डाल देता है। कवि पुष्पेंद्र की यह रचना इसी तथ्य को व्याख्यायित करती है-
जो कभी न मिट सके ऐसी खाई हो गई
दो  दिलों  के  बीच में  गहराई हो गई
जितना खुलूस था सीने में रख लिया
मेरी जुबान भी अब तो सच्चाई हो गई
हद से ज्यादा हम तो दीवाने हो गए
देखो, खूब अपनी जग हंसाई हो गई
दे के अपना दिल पछता रहे हैं हम
जो चीज अपनी थी वह पराई हो गई

समाज में बढ़ते अपराध एवं अनाचार को देख कर कवि मन व्यथित हो उठता है और तब उसकी रचनाओं में तल्खी बढ़ जाती है-

पहले मासूमों की सिसकियां बेच दी
बाप ने फिर जवान बेटियां बेच दी
आंख बोझिल सी है दिल गमगीन है
आज के कृष्ण ने गोपियां बेच दी
हाल होगा क्या अपना जरा सोचिए
उसने बारूद को चिंगारियां बेच दी
जो भी अपनी बहन की नजर से गिरा
तो उसने खरीदी राखियां बेच दी

        कवि पुष्पेंद्र दुबे सागर जिनका मूल उद्देश्य मंचीय काव्य जगत में स्वयं को स्थापित करना है। उस दिशा में निरंतर सजगता के साथ प्रयत्नशील हैं। उनकी रचनाएं श्रोताओं को लुभाती हैं तथा स्मरण रह जाती हैं। यही उनकी रचनाओं की विशेषता है। बहरहाल, अभी उनकी यात्रा बहुत लम्बी है जो उनसे निरंतर सृजनश्रम की मांग करती रहेगी।
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( दैनिक, आचरण  दि. 30.05.2019)
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