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Saturday, March 13, 2021

जीवेत शरद: शतम् शतम् | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

जीवेत शरद: शतम् शतम्।

सुदिनं सुदिनं जन्मदिनम्।।

भवतु मंगलम जन्मदिनम्।

विजयी भव सर्वदा।

जन्मदिनस्य हार्दिक शुभेच्छा:।।


    किसी कवि को दी गई जन्मदिन की शुभकामनाएं, रूप से उसकी सृजनधर्मिता, उसकी काव्यसृजनात्मकता और उसकी देवी सरस्वती की सतत् समर्पण की भावना के प्रति भी शुभकामनाएं होती हैं।

   मध्यप्रदेश के इस सागर नगर में अनेक कवि- कवयित्रियां हैं, जो कविता लेखन से सम्बद्ध हैं। कुछ गुणवत्तापूर्ण सृजन में विश्वास रखते हैं,  कुछ गणनापूर्ण सृजन में.... क्वालिटी और क्वांटिटी की दृष्टि से देखा जाए तो क्वालिटी के पैमाने में मात्र उंगलियों पर गिने जा सकने वाले रचनाकार हैं। जबकि क्वांटिटी के पैमाने में बहुतेरे ऐसे रचनाकार हैं जो थोक में कथित लेखन कर रहे हैं। 

    संख्यात्मक और गुणात्मक लेखन में फ़र्क यही है कि संख्यात्मक लेखन गुणवत्ता के लगभग अभाव में नदी के जलप्रवाह के साथ बह कर आने वाले कचरे के समान काव्यसरिता के तट पर इकट्ठा हो-हो कर स्वमुग्धता के जाल में ग्रसित, अंजाने ही सुधी पाठकों को स्वयं से दूर कर देता है। जबकि गुणात्मक लेखन काव्यसरिता के जल की तरह  शनै:-शनै: प्रवाहमान रह कर अपनी मौलिकता और स्निग्धता से सुधी पाठकों के मानस को तृप्ति देने में सक्षम होने के कारण उन्हें अपनी ओर बार-बार आकर्षित करता है।

   लगभग वर्ष भर लम्बे और ऊबाऊ कोरोना काल के ऑनलाइन जन्मदिन आयोजनों के बाद, विगत दिनों एक ऐसे समारोह में मैं यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह जन्मदिन समारोह में प्रत्यक्ष शामिल हुई, जो किसी कवि का था। मेरी अनुजा डॉ.(सुश्री) शरद सिंह भी साथ थीं। 

  सागर नगर के वयोवृद्ध कवि दादा निर्मलचंद निर्मल स्वांत: सुखाय लेखन में रुचि रखते हैं। प्रत्येक वर्ष उनके लगभग दो कविता संग्रह प्रकाशित होते हैं। वैसे तो निर्मल जी का यह जन्मदिन समारोह, जिसमें निर्मल जी के इस वर्ष के नवीनतम कविता संग्रह का लोकार्पण भी शामिल था, श्यामलम् संस्था के सहयोग से उनके पुत्र-पौत्रों आदि ने आयोजित किया था, किन्तु सागर शहर के अनेक कवि-लेखकों ने उसमें सहभागिता की। मेरे लिहाज़ से विशेष बात यह भी थी कि इस समारोह में एक सोपान कविसम्मेलन का भी था जिसमें अपना काव्यपाठ करने वाले शहर के प्रमुख चार कवियों में मैं भी शामिल थी।

यहां प्रस्तुत हैं उसी अवसर की कुछ तस्वीरें - 


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Wednesday, July 17, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 58 .... एक विविध शिल्पी कवि सी.एल. कंवल - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि सी.एल.कंवल पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

एक विविध शिल्पी कवि सी.एल. कंवल

                   - डॉ. वर्षा सिंह

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परिचय :
नाम  :- सी. एल. कंवल
जन्म :-  01 फरवरी 1953
जन्म स्थान :- खुरई, जिला सागर, म.प्र,
माता-पिता :- श्रीमती सरजू एवं श्री कुंजीलाल
शिक्षा  :- बी.ए., बी.टी.
लेखन विधा :- काव्य।
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काव्य एक ऐसी विधा है जिसने संवेदनशील व्यक्तियों का हमेशा मनमोहा है। सागर नगर में कवियों की एक समृद्ध परम्परा चली आ रही है। उर्दू के साथ ही हिन्दी (खड़ी बोली) के कवियों ने सागर नगर की साहित्यधारा को सदैव ऊर्जावान बनाए रखा है। इसी क्रम में तेजी से उभरता हुआ नाम है कवि सी.एल. कंवल का । सागर जिले की खुरई तहसील में श्री कुंजीलाल एवं श्रीमती सरजू के घर 01 फरवरी 1953 को जन्मे सी.एल. कंवल को अपने माता-पिता से जो संस्कार मिले उन संस्कारों ने उनके भीतर साहित्य के प्रति रुझान को न केवल जन्म दिया अपितु सृजनधर्मिता में भी प्रवृत्त किया। अपनी औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने बी.टी. किया। भारतीय स्टेट बैंक से शाखा प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त सी.एल. कंवल ने औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त जैन धर्म एवं गांधी दर्शन का अध्ययन किया। उन्होंने अखिल भारतीय दिगम्बर जैन परिषद् परीक्षा बोर्ड दिल्ली से जैन धर्म परीक्षा उत्तीर्ण की।  सन् 1984 में डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर द्वारा दिल्ली में आयोजित दलित साहित्य अकादमी  द्वारा फैलोशिप प्राप्त की। सन् 1984 से सागर नगर में निवासरत सी.एल. कंवल बैंक की अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर काव्यसृजन करते रहे। सेवानिवृत्ति के उपरांत साहित्यक्षेत्र में उनकी सक्रियता बढ़ गई है।

कवि सी.एल. कंवल मानते हैं कि साहित्यसृजन विचार क्षमता बढ़ाता है तथा जीवन को समझने में और अधिक सहायता करता है। संभवतः इसीलिए उनकी ग़ज़लों में जीवन की सरसता और विडम्बनाओं के प्रति विचारों की समान भाव से  सहज अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी ग़ज़लों में श्रृंगार रस की मधुरता भी है, आस्था एवं विश्वास भी और अव्यवस्थाओं के विरुद्ध ललकार भी। वे उन लोगों से भी मुख़ातिब होते हैं जो जरा-जरा सी बात पर हिम्मत हारने लगते हैं और यह मान बैठते हैं कि बातचीत अथवा सहजता से कोई मसला हल नहीं हो सकता है। ऐसे लोगों को सम्बोधित करते हुए वे कहते हैं-

विश्वास को बुनियाद बना कर तो देखिए
उन दुश्मनों से हाथ मिला कर तो देखिए
टूटेंगी अपने-आप ही नफरत की दीवारें
इंसानियत को दिल में जगाकर तो देखिए
हम और तुम का फासला मिट जाएगा खुद ही
ये मज़हबों की होड़ मिटा कर तो देखिए
आनन्द स्वर्ग का यदि लेना है आपको
रोते हुए बच्चे को उठाकर तो देखिए
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

धर्म के नाम पर वैमनस्य फैलाने वाले न तो कभी समाज का भला कर सकते हैं और न कभी अपनों की भला कर सकते हैं। कवि कंवल मानते हैं कि यदि गंभीरता से प्रयास किया जाए तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है और तमाम वैमनस्य को मिटाया जा सकता है। यह बानगी देखिए जिसमें वे फिरकापरस्तों से प्रश्न कर रहे हैं-

तुमने उठाए हाथ में हथियार किस लिए
अपनों पे कर रहे हो भला वार किस लिए
मंदिर कहीं बना है तो मस्जिद कहीं बनी
इन दोनों के दरमियान ये दीवार किस लिए
खुद की ख़बर नहीं है न औरों की ख़बर है
पढ़ रहे हो फिर यहां अखबार किस लिए
हद से गज़र रहे हो सरहदों के वास्ते
गैर की जमीन पर है अधिकार किस लिए
मुद्दा बड़ा है देश का मिट जाएगा ‘कंवल’
हल करने को बैठे हैं हम चार किस लिए

किसी भी व्यक्ति को उसकी अच्छाईयां ही बड़ा बनाती हैं। आर्थिक सम्पन्नता नहीं अपितु मिलनसारिता, नेकनीयत और एकता की भावना व्यक्ति में बुनियादी गुण होने चाहिए, तभी वह दूसरों की सहायता करने में सक्षम हो सकता है। सी.एल. कंवल की यह रचना इसी भावना को सामने रखती है-

रुतबा, गुरुर, हैसियत, ये शान किस लिए
नेकियां न  हों  जहां,  ईमान  किस लिए
बांटा नहीं किसी को कमाने के बाद भी
घटता ही जा रहा है ये ज्ञान किस लिए
सोने की थालियों में हों चांदी की रोटियां
भूखे ने मांगा रब से वरदान किस लिए

कवि कंवल ने ग़ज़लों के साथ ही अतुकांत कविताएं, दोहे और मुक्तक भी लिखे हैं। उनकी छंदमुक्त कविताएं सामाजिक सरोकार के और अधिक निकट हैं। इन कविताओं में बिम्ब योजना भी अधिक प्रभावी दिखाई देती है। उदाहरण के लिए ‘रोज देखता हूं’ शीर्षक कविता देखिए -

रोज देखता हूं
एक असहाय दीपक को
अंधेरा निगल रहा है
हम चारपाई पर पड़े
हाथों का सहारा देने में असमर्थ
पलकें मूंद लेते हैं
अत्याचार के नाम पर
अज्ञात भय से सहमें हम
गलियारे में झाड़ू की आवाज ले-ले कर
सुबह होने का अंदाजा भांपते हैं
फिर रह-रह कर आता है ख्याल
दीपक की असहाय अवस्था का
अंधेरे से जूझते रहने की व्यवस्था का
सो रहा हूं
और जाग रहा हूं
उठ-उठकर, कर रहा हूं प्रतीक्षा
नए भोर की
कवि सी.एल. कंवल # साहित्य वर्षा

छंदमुक्त कविताओं में सी.एल. कंवल की एक और कविता है, जिसका शीर्षक है- गंध। इस कविता में गंध को आधार बना कर छूटे हुए गांव की स्म्तियों का गहन आत्मीयतापूर्ण वर्णन किया गया है-

गंध मिट्टी की
पानी के साथ मिल कर
सोंधी हो जाती है।
तब मुझे मेरे गांव की खेती याद आती है।
गंध फूलों की
सुबह-शाम बाग में टहलती है
हौले-होले मेरे मस्तिष्क में
घुल जाती है
एक शंखनाद मन को
झकझोरता है
तब मुझे मदिर की याद आती है।
गंध जली रोटी की
मुझे बहुत भाती है
मेरी भूख और बढ़़ाती है
तब चौके में बैठी
रोटियां बेलती हुई
मुझे मेरी मां की याद आती है।

सी.एल. कंवल के दोहों में प्रकृति के बिम्बों में समाज ओर पारिवारिक संबंधों को संतुलित ढंग से पिरोया गया है। वे अपने दोहों में महुआ, कचनार, कोयल के साथ ही बेटी के महत्व, मां की ममता और महाजन की बदनियती की सहजता से चर्चा करते हैं। गजलों की अपेक्षा दोहों में उनकी पकड़ अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई देती है। ये दोहे इस तथ्य का साक्ष्य हैं -

महुआ महके मेढ़ पर, अंगना में कचनार।
गोरी महके सेज पर , कर सोलह सिंगार।।
कोयल कुहुके बाग में, आम रहे गदराय।
दूर देश के सूअना, चख-चख कर उड़ जाए।।
बेटों से बेटी भली , रखे सभी का ख्याल।
बेटों के मन डोलते, भली लगे ससुराल।।
नजर महाजन की गड़ी, खड़ी फसल पर यार।
पहले सूद वसूल के, राखे असल संवार।।
मां की ममता है बड़ी, बड़ा बाप का प्यार।
जीवन की इस नाव के दोनों खेवनहार।।

एक विविध शिल्पी कवि के रूप में सी.एल. कंवल अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए सागर नगर की साहित्य सम्पदा में अपना उल्लेखनीय योगदान दे रहे है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 17.07.2019)
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Wednesday, July 10, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 57 ... बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, नाटककार एवं लेखक डॉ. आलोक चौबे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि डॉ. आलोक चौबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, नाटककार एवं लेखक डॉ. आलोक चौबे
                                                        -       
                   - डॉ. वर्षा सिंह
                               
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परिचय :- डॉ आलोक चौबे
जन्म :-  20 मई 1979
जन्म स्थान :- ललितपुर ,उत्तर प्रदेश
पिता एवं माताः- श्री प्रताप नारायण चौबे एवं श्रीमती अंजू चौबे
शिक्षा :- मनोविज्ञान तथा पत्रकारिता और जनसंचार में परास्नातक, संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विषय में पीएचडी, उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से स्क्रिप्ट लेखन शिक्षा, भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कोझिकोड से एग्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम अध्ययनरत।
लेखन विधा :- गीत, लेख, नाटक, कहानी, पुस्तक समीक्षा, शोधपत्र।
प्रकाशन :- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
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          सागर नगर की माटी में वह ममता है कि जो भी यहां आता है, वह यहीं का हो कर रह जाता है। अनेक साहित्यकार जो प्रदेश के दूसरे जिलों अथवा देश के दूसरे प्रदेशों से सागर आए, शीघ्र ही सागर उनकी कर्मभूमि अर्थात् सृजनभूमि बन गई। 20 मई 1979 को उत्तरप्रदेश के ललितपुर में जन्मे डॉ आलोक चौबे विगत सन् 2002 से सागर में निवासरत हैं। यह कहा जा सकता है कि सागर उनकी वास्तविक कर्मभूमि है। अपने पिता श्री प्रताप नारायण चौबे एवं माताश्री अंजू चौबे से मिले संस्कारों ने उन्हें अध्ययनशीलता का गुण प्रदान किया। उन्होंने मनोविज्ञान तथा पत्रकारिता और जनसंचार में डबल एम. ए. किया। इसके बाद मनोविज्ञान में ही विशेष अध्ययन एवं शोधकार्य करते हुए संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विषय में पीएचडी उपाधि प्राप्त की। लेखन की रुचि ने डॉ आलोक चौबे को उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से स्क्रिप्ट लेखन शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा दी। आज भी वे भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कोझिकोड से एग्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम अध्ययनरत हैं।
             बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ आलोक चौबे आकाशवाणी सागर से कैजुअल अनाउंसर के रूप में जुड़े। सागर नगर की चर्चित नाट्य संस्था अन्वेषण थिएटर ग्रुप के सचिव रहे। चाइल्ड राइट्स ऑब्जर्वेटरी मध्य प्रदेश, भोपाल के जनरल बॉडी मेंबर, पब्लिक रिलेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया के सदस्य तथा सोसाइटी फॉर आइडियल ग्लोबल नीड्स के अध्यक्ष हैं। यूनिसेफ, उत्तर प्रदेश में राज्य संचार सलाहकार के तौर पर भी काम कर चुके हैं। अपने लेखन एवं सृजन की विविधता के अंतर्गत डॉ आलोक चौबे ने कई राज्यों और संस्थाओं की योजनाओं की संचार सामग्री का निर्माण किया। उन्होंने बीबीसी मीडिया के उपक्रम बीबीसी मीडिया एक्शन के साथ भी स्वास्थ्य संचार परियोजना में कार्य किया। वे सागर के शहीदों पर केन्द्रित ‘‘हम भूल न जाएं उनको’’ स्मारिका का संपादन कर चुके हैं जिसके अब तक दो संस्करण सन् 2004, 2014 में  प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. आलोक चौबे लेख भी लिखते हैं। सन् 1999 से मनो-सामाजिक-राजनीतिक और संचार विषयों पर देश के 15 से अधिक राज्यों के अखबारों में सम्पादकीय पृष्ठों पर उनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं।
            भ्रमण मनुष्य की चिंतन क्षमता को नए आयाम प्रदान करता है। उसे नवीन अनुभवों से जोड़ता है। डॉ. चौबे के लेखन में अनुभवजन्य विविधता मिलती है। इसका कारण है कि वे अब तक बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हिमाचल, उत्तरांचल, महाराष्ट्र ,हरियाणा, दिल्ली, पंजाब आदि राज्यों के शासकीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ कार्य करते हुए सैकड़ों गांवों की सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक विविधताओं से साक्षात्कार कर चुके हैं। इसके साथ ही वे मंचों पर काव्यपाठ करते हैं। इसी तारतम्य में वे विभिन्न प्रदेशों के कवि सम्मेलनों, मुशायरों में काव्यपाठ कर चुके हैं। जहां तक प्रसारण की बात है तो डॉ. चौबे की रचनाओं का आकाशवाणी छतरपुर, सागर और झांसी से प्रसारण हो चुका है।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

              डॉ. आलोक चौबे की पत्नी प्रिया जैन भी लेखन में रुचि रखती हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ चौबे एवं उनकी पत्नी प्रिया जैन ने ‘‘टर्निंग पॉइंट’’ नाटक मिल कर लिखा था जिसका मंचन थर्ड बेल थिएटर ग्रुप द्वारा किया गया था। डॉ चौबे ने कई नुक्कड़ नाटक भी लिखे जिनका प्रदर्शन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर किया जाता रहा है। वे नाटकों में अभिनय भी कर चुके हैं। उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन, निर्माण एवं निर्देशन भी किया जिनमें प्रमुख हैं- लाइफ ऑन लाइन, संभावनाओं का सागर, हंगरमार्च आदि।
          कविता में जब यथार्थ एवं कल्पना का सुंदर समन्वय हो तो उसकी भाव संपदा द्विगुणित हो जाती है। ऋतुओं का अनुभव तो सभी करते हैं किन्तु एक कवि जब ऋतुओं का अनुभव करता है तो उसके ऋतुवर्णन में जीवन का दर्शन और सौंदर्य निखर आता है। जैसे डॉ आलोक चौबे जब वर्षा ऋतु को अपनी कविताओं में उतारते हैं तो उसमें बारिश की एक अलग ही छटा दिखाई देती है जो ऋतु की सरसता अनुभव कराते हुए एक पल ठहर कर सोचने को भी विवश करती है। उदाहरण के लिए उनकी यह कविता देखिए -
गीले बादल आसमान में नज़र आने लगे ..
अब बारिश होगी...मिट्टी में सोंधी-सोंधी खुशबू आएगी...
नयी कोंपलें निकलेंगी ....नए पत्ते निकलेंगे ...
चारों तरफ फैलेगी हरियाली चादर .....
और मन भावन होगा सब कुछ....
धरती की प्यास बुझेगी..../किसानांं की आस जगेगी.. ..
बच्चे कागज़ की नाव चलाएंगे...
नवयुगल भीगकर बारिश में.../प्रेममय हो जायेंगे...
घर के आंगन में पानी की बूंदे अठखेलियां करेंगी...
चलो इन खूबसूरत लम्हों को सहेज ले....
इन पानी की बूंदों को समेट ले....
ताकि प्यास बुझी रहे../आस जगी रहे .......

           अतुकांत कविताओं के साथ ही मुक्तक के रूप में तुकांत काव्य में भी मौसम की सुंदर व्याख्या करते हैं डॉ आलोक चौबे। यह मुक्तक उल्लेखनीय है-
वारिस सपनों का बनाता है कोई
वसीयत गमले में उगाता है कोई
सांसों से सींच दूं अगर नींदों को
बादलों से प्यास बुझाता है कोई
डॉ. आलोक चौबे

           कवि डॉ. आलोक चौबे की रेलवे स्टेशन पर एक लम्बी कविता है जिसमें उन्होंने स्टेशन की आपाधापी भरी गतिविधियों का सजीव चित्रण किया है। रेलवे स्टेशन यूं भी मनोभावों का एक ऐसा जमावड़ा अपने आप में समेटे होता है जिसमें मिलन का सुख तो विदाई का दुख, परिचितों की भीड़ तो अपरिचितों का हुजूम, मन के एकाकीपन से भीड़ के कोलाहल तक सभी कुछ निबद्ध रहता है। डॉ चौबे की कविता में रेलवे स्टेशन की ये सारी खूबियां दृश्य की तरह उभरती हैं। इस कविता को उनकी प्रतिनिधि कविताओं में गिना जा सकता है-
रंगमंच सा ये स्टेशन
1, 2 3 ए सी , स्लीपर और
जनरल में भी बंटा स्टेशन
करता है पर भेद भाव भी
आदमी आदमी में स्टेशन
पैसे की माया है सबकुछ
जान गया है अब स्टेशन
जाने कितने एकाकों का
घर परिवार है ये स्टेशन
जाने कितने घर परिवारों
को मिलवाता है स्टेशन
जाने कितने मजदूरों को
काम दिलाता है स्टेशन
मैं भी अक्सर रहता हूं साथी
इस स्टेशन , उस स्टेशन।

              समाज में घटित होने वाली जघन्य घटनाएं कवि के मन को खुरचती हैं और इससे उत्पन्न पीड़ा प्रश्न करती है कि अपराध का मूल कारण क्या है? समाज में बढ़ते जा रहे लैंगिक अपराधों का स्मरण कराते हुए कवि आलोक चौबे ने एक लम्बी कविता लिखी है ‘‘दुष्कर्मी कौन?’’। इस कविता का एक अंश देखिए-
दुष्कर्मी कौन?
वो जिसने बुरा कर्म किया
उनका क्या जो व्यवसाय करते हैं
मसालेदार ख़बरों का ...
और परोसते है नारी देह को
उपभोग की वस्तु की तरह .....
इस अपाहिज समाज में ...
नपुंसकता हावी है अब ....
तमाम विकृतियों के तंत्र साथ
राजनीति में, प्रशासन में, न्याय में
और आदमी में भी ...
कहीं नारीत्व लजा रहा है स्वयं को
और पुरुषत्व वो तो जैसे बचा ही नहीं
वीरो की इस धरा पर ..... दुष्कर्मी कौन?
सिर्फ वो जिसने बुरा कर्म किया
वो क्यूं नहीं जो इन कर्मो को
प्रेरित करता है ...
उकसाता है कुत्सित विचार
और नहीं रहता सजग ...
कि कहीं कोई विकृत मानसिकता का पुरुष
मासूम मुस्कान न छीन ले किसी गुडिया की .....
अब नहीं कोई निर्भया सब भय में है?
क्यूंकि हम कोई सुकर्म भी
नहीं करते ,मतलबपरस्ती हावी है
व्यक्ति पर, समाज पर और तंत्र पर
हम सब पर .......
तो दुष्कर्मी कौन? तो दुष्कर्मी कौन?? तो दुष्कर्मी कौन???

               डॉ. आलोक चौबे सागर नगर के वे साहित्यकार हैं जो अपनी विविधतापूर्ण लेखनी, संवेदनाओं की धनी कविताओं एवं कटाक्ष करते नाटकों से हिन्दी साहित्य संपदा में निरंतर श्रीवृद्धि कर रहे हैं। उनका लेखन उन्हें एक अलग पहचान देने में पूर्ण सक्षम है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 10.07.2019)
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Wednesday, September 19, 2018

कवि राजेश जोशी मेरे शहर सागर में .... डॉ. वर्षा सिंह

From left : Rajesh Joshi, Dr. (Miss) Sharad Singh & Dr. Varsha Singh

समकालीन कविता के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर राजेश जोशी दिनांक 18.09.2018 को मेरे शहर सागर म.प्र. में मौज़ूद थे। अवसर था शहर की नामचीन संस्था बुनियाद सांस्कृतिक समिति, सागर द्वारा आयोजित विख्यात कवि राजेश जोशी का एकल काव्य-पाठ एवं डॉ. छबिल कुमार मेहेर द्वारा संपादित "कालजयी मुक्तिबोध" और "राजेश जोशी संचयिता" का विमोचन कार्यक्रम।

   राजेश जोशी की उपस्थिति के मायने हैं हवाओं में कविता के ध्वनित होने की हलचल को महसूस करना। एक दिन बोलेंगे पेड़, मिट्टी का चेहरा, नेपथ्य में हंसी, दो पंक्तियों के बीच, चांद की वर्तनी - इन पांच पुस्तकों में हिलोरें लेती कविता की मुखरिता से कितनी ही दफ़ा रू-ब-रू हो चुकी हूं मैं, लेकिन स्वयं कवि के मुख से निकली कविता के रसास्वादन की बात ही कुछ और होती है।
हां, इस एकल काव्यपाठ के दौरान राजेश जोशी ने अपनी उस कविता का पाठ भी किया जिसने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया है.....
सुबह सुबह
बच्‍चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण के तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्‍यों जा रहे हैं बच्‍चे?
क्‍या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्‍या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्‍या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्‍या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्‍या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आंगन
खत्‍म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्‍या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्‍यादा यह
कि हैं सारी चीज़ें हस्‍बमामूल
पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजरते हुए
बच्‍चे, बहुत छोटे छोटे बच्‍चे
काम पर जा रहे हैं।


        राजेश जोशी को सुनना और उनसे मिल कर साहित्यिक विमर्श करना एक अविस्मरणीय अनुभव था।
इस अवसर पर  शहर के अन्य प्रबुद्धजनों सहित मेरे साथ थीं विदुषी साहित्यकार एवं बहुविधायुक्त सृजनात्मक लेखन की धनी डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, जो मेरी अनुजा हैं।
        -  डॉ. वर्षा सिंह

©Dr.Varsha Singh

Thursday, August 23, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन - 25 गीत-ग़ज़ल के साधक कवि ऋषभ समैया ‘जलज’ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि ऋषभ समैया "जलज" पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

गीत-ग़ज़ल के साधक कवि ऋषभ समैया ‘जलज’
                   - डॉ. वर्षा सिंह
               
सागर नगर में गीत और हिन्दी ग़ज़ल की रसधार समान रूप से बहती रही है। काव्य-साधकों ने अपनी रुचि के अनुरूप साहित्य की विधाओं को अपना कर नगर की साहित्यिक संपदा को समृद्ध किया है। नगर के एक समृद्ध व्यवसायी परिवार में 07 सितम्बर 1947 जन्मे ऋषभ समैया ने अपनी पारिवारिक विरासत को पूरी लगन से परवान चढ़ाते हुए साहित्य के प्रति अपने रुझान को भी पर्याप्त अवसर दिया। ‘‘जलज’’ उपनाम अपनाते हुए गीत और ग़ज़ल विधा को अपनाया। हिन्दी और बुंदेली में काव्यसृजन करने वाले ऋषभ समैया ‘जलज’ डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से एम.काम. किया। इसके बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की। पारिवारिक जिम्मेदारियों एवं व्यावसायिक व्यस्तताओं के कारण एल.एल.बी. की पढ़ाई अधूरी छोड़नी पड़ी। सामाजिक कार्यों में भी अपना योगदान देने वाले ऋषभ समैया की काव्य रचनाएं आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से प्रसारित होती रही हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। स्थानीय दैनिक समाचार पत्र ‘पदचाप’ के मानसेवी संपादक रहते हुए पत्रिकरता की बारीकियों को भी भली-भांति जाना और समझा। साहित्य सृजन एवं समाजसेवा के लिए उन्हें अनेक संस्थाओं से सम्मानित किया जा चुका है।

सागर : साहित्य एवं चिंतन -25 गीत-ग़ज़ल के साधक कवि ऋषभ समैया ‘जलज’ - डॉ. वर्षा सिंह
ऋषभ समैया ‘जलज’ की कविताओं में पारिवारिक दायित्वों एवं संबंधों का गहन चिंतन मिलता है। मां और पिता प्रत्येक परिवार की महत्वपूर्ण इकाई होते हैं। ये ही परिवार के वे दो स्तम्भ होते हैं जो प्रत्येक पीढ़ी को न केवल जन्म देते हैं वरन उनमें परम्पराओं एवं संस्कारों को संजोते हैं। इसीलिए मां की महत्ता के प्रति ध्यान आकर्षित करते हुए ऋषभ समैया लिखते हैं-
जीवन  देने  वाली  है मां।
पालन-पोषण वाली  है मां।
मन भर नेह  परोसा करती
प्रिय भोजन की थाली है मां।
जितनी ज़्यादा लदी फलों से
उतनी झुकती  डाली है मां।
बहुत  दूरदृष्टि  रखती, पर
पापा  को  घरवाली है मां।

ऋषभ समैया जहां मां को परिवार की धुरी के रूप में देखते हैं और उसके त्याग, उसकी ममता एवं परिवार के प्रति उसके समर्पण की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं वहीं उनकी कवि दृष्टि यह भी देख लेती है कि पिता के लिए मां का स्वरूप एक ‘घरवाली’ का ही है। पुरुषवादी समाज में पिता अपनी अर्द्धांगिनी के सम्पूर्ण गुणों को नहीं देख पाता है। लेकिन इसका कारण भी कवि ढूंढने में सक्षम है। कवि को अहसास है कि पिता इतने अधिक दायित्वों से घिरे रहते हैं कि कई बार उन्हें खुद पर भी ध्यान देने का अवसर नहीं मिलता है। पिता भी मां की भांति दायित्वों का निर्वहन करते हैं और सारी पीड़ाओं को अपने मन में ही दबाए रखते हैं। पिता पर केन्द्रित रचना की इन पंक्तियों को देखिए -
स्मृतियों से बंधे पिता जी।
दायित्वों से लदे पिता जी।
जीवन की पथरीली राहें
ठिठके, फिसले, सधे पिता जी।
घर भर की नींदें मीठी हों
रात-रात भर जगे पिता जी।
ऋषभ समैया 'जलज'

कवि ‘जलज’ ने अपने गीतों में सामाजिक सरोकारों का भी बखूबी बयान किया है। वे मानते हैं कि जीवन का सौंदर्य सद्भावना से ही निर्मित होता है। आपसी प्रेम-व्यवहार एवं सद्भाव ज़िन्दगी को फूल, नदी और झरने के समान सुनदर बना देता है। अपने इस भाव को कवि ने इन पंक्तियों में कुछ इस तरह पिरोया है-
सहेजें सद्भावना से
धरोहर सी ज़िन्दगी।
नदी-सी निश्छल रवानी
तदों से हिल-मिल बहे
फले-फूले कछारों में
गेह सागर की गहे।
कभी झरना, कभी निश्चल
सरोवर सी ज़िन्दगी।

जीवन में संतोष से बड़ा कोई धन नहीं होता - इस तथ्य को वर्तमान बाज़ारवादी युग मानो भूलता जा रहा है। और-और की चाहत ने लोगों का सुख-चैन छीन रखा है। उपभोक्ता संस्कृति ने इंसान को भौतिकवादी बना दिया है। कवि का मानना है कि यदि व्यक्ति के पास जो है, उसी में संतुष्ट रहे तो जीवन सुख-यांति से व्यतीत हो सकता है। ये पंक्तियां देखिए -
जो  प्राप्त  है,   पर्याप्त है।
सुख-शांति इसमें व्याप्त है।
ईर्ष्या,  अहम्,  तृष्णा, वहम
यश, चैन, चहक समाप्त है।
दुर्गन्ध है   या  सुगन्ध है
यह ज़िन्दगी की शिनाख़्त है।
अपना भला,   सबका  बुरा
यह सोच कलुष, विषाक्त है।




शहरों की ज़िन्दगी जिस तरह प्रदूषित और भागमभाग वाली हो गई है उससे भी कवि का चिन्तित होना स्वाभाविक है। ये पंक्तियां देखिए -
हड़बड़ाते, हांफते से
अधमरे होते शहर।
सो रहे हैं सुध बिसर कर
बांसुरी की, भोर की
कान को आदत पड़ी है
चींख भरते शोर की
देर रातों तक लगाते
मदभरे गोते शहर।

ऋषभ समैया ‘जलज’ के गीतों एवं ग़ज़लों में समाज और समय के प्रति जिस प्रकार की प्रतिबद्धता का स्वर ध्वनित होता है, वह उन्हें एक सजग कवि के रूप में स्थापित करता है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 23.08.2018)
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Monday, August 20, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन -23 प्रीत का पाहुन और कवि सीरोठिया का छायावादी स्वर - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. वर्षा सिंह

स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र "सागर झील" में प्रकाशित मेरा कॉलम "साहित्य वर्षा " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के वरिष्ठ कवि श्याम मनोहर सीरोठिया पर। पढ़िए और मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को जानिए ....🙏

सागर : साहित्य एवं चिंतन

‘प्रीत का पाहुन’ और कवि सीरोठिया का छायावादी स्वर 

                             - डॉ. वर्षा सिंह

                                                                                            आदि मानव ने जब पंक्षियों के मधुर कंठों का गायन सुना होगा, नदियों-झरनों के नाद घोष में आत्मा की पुकार अनुभव की होगी, उन्मुक्त प्रकृति के प्रांगण में चांद-तारों की रोशनी में, फूलों की हंसी में सौंदर्य भाव बोध अनुभव किया होगा, उसी समय से गीतों ने आकार पाया होगा। अनेक विद्वान मानते हैं कि गीत काव्य की शायद सबसे पुरानी विधा है। महाकवि निराला ने ‘गीतिका’ की भूमिका में कहा है, ‘गीत-सृष्टि शाश्वत है। समस्त शब्दों का मूल कारण ध्वनिमय ओंकार है। इसी निःशब्द-संगीत से स्वर-सप्तकों की भी सृष्टि हुई। समस्त विश्व, स्वर का पूंजीभूत रूप है।’  

जीवन के विभिन्न रस-भावों के अनुभव से गीत की उत्पत्ति होती है। यह लयात्मकता शब्द की उड़ान से उत्पन्न होती है। स्वर, पद और ताल से युक्त जो गान होता है वह गीत कहलाता है। गीत, सहित्य की एक लोकप्रिय विधा है। इसमें एक मुखड़ा तथा कुछ अंतरे होते हैं। प्रत्येक अंतरे के बाद मुखड़े को दोहराया जाता है। गीत में एक ही भाव, एक ही विचार एक ही अवस्था का चित्रण होता है।

डॉ. भगवतशरण उपाध्याय ने गीत को परिभाषित करते हुए कहा है- ‘‘गीत कविता की वह विधा है जिसमें स्वानुभूति प्रेरित भावावेश की आर्द्र और कोमल आत्माभिव्यक्ति होती है।’’ 

इसी सन्दर्भ में केदार नाथ सिंह कहते हैं - ‘‘गीत कविता का एक अत्यन्त निजी स्वर है ग़ीत सहज, सीधा, अकृत्रिम होता है।’’ 

डॉ. नगेन्द्र के अनुसार- “गीत वास्तव में काव्य का सबसे तरल रूप है।’’

इस प्रकार गीत की मूल विशेषताएं है गीत में कवि की भावना की पूर्ण व व्यापक अभिव्यंजना समाई रहती है। गीत कवि के भावावेश अवस्था से उत्पन्न होता है। गीत एक पद में एक ही भाव की निबद्ध रचना होता है। संगीतात्मकता भी इसका एक विशेषगुण है।

गीत एक ऐसी विधा है जिससे मनुष्य का जुड़ाव अपने जन्म से ही हो जाता है। मां की लोरी के रूप में गीत के शब्द, छंद, स्वर मनुष्य के हृदय में बस जाते हैं। गीत की सबसे बड़ी शक्ति होती है उसकी ध्वन्यात्मकता। गीत हृदय से उत्पन्न होते हैं। संवेदनाओं, अनुभूतियों व भावनाओं के ज्वार जब उमड़ते हैं तो गीत किसी नदी के जल के समान बह निकलते हैं। उनमें भावनाओं की वे सारी तरंगें होती हैं जो गीत को सुनने और पढ़ने वाले के हृदय को रससिक्त कर देती है। जैसे लोरी के लिए हृदय में ममत्व की आवश्यकता होती है उसी प्रकार गीत रचने के लिए प्रत्येक भावना को आत्मसात् कर लेने की क्षमता की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही आवश्यकता होती है अभिव्यक्ति के उस कौशल की जो कठोर से कठोर तथ्य को कोमलता के साथ प्रस्तुत कर सके। डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया में वह कौशल है कि जिससे वे दुनिया के तमाम खुरदुरे अहसास को बड़ी ही कोमलता से अपने गीतों में ढाल देते हैं। यूं भी एक चिकित्सक जब गीत लिखता है तो उसमें संवेदनाओं का एक अलग ही स्वर होता है। एक ऐसा स्वर जिसमें जगत की तमाम कोमल भावनाओं का अनहद नाद समाहित रहता है। व्यक्ति व समाज की भावनाओं, संवेदनाओं व अपेक्षाओं को अपेक्षाकृत अधिक निकट से परखता है, जान पाता है एवं ह्ृदय तल की गहराई से अनुभव कर पाता है। डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया ने अपने जीवन में एक सफल चिकित्सक होने के साथ ही एक सफल गीतकार की भूमिका को भी आत्मसात किया है। यूं तो अब तक उनके चार गीत संग्रह ‘‘साक्षी समय है’’, ‘‘गीतों का मधुबन’’,‘‘सुधियों का आंचल’’ तथा ‘‘रजनीगंधा अपनेपन की’’ प्रकाशित हो चुके हैं। ‘‘प्रीत का पाहुन’’ डॉ. सीरोठिया का पांचवां गीत संग्रह है।  

‘प्रीत का पाहुन’ के गीत मूलतः छायावादी हैं। संयोग एवं वियोग इन गीतों का मूल विषय भाव है। इन गीतों में प्रेम, मिलन, विरह, स्मृतियां, एवं सामाजिक सरोकार का सुंदर समन्वय हैं। प्रस्तुत कृति, जिसमें भावपक्ष तो उत्कृष्ट है ही कलापक्ष भी सफल, सुगठित व श्रेष्ठ है। यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है कि जब गीत विधा नवगीत और मुक्तिका से हो कर अपने मूल स्वरूप को पुनः पाने के लिए जूझ रही है, ‘‘प्रीत का पाहुन’’ जैसी कृति का प्रकाशित होना गीत के संघर्ष के विजय का प्रतीक बन कर उभरता दिखाई देता है। हरिवंश राय ‘बच्चन’, गोपाल दास ‘नीरज’ जैसे गीतकारों ने जिस लयात्मकता और संवाद भाव से गीत लिखे हैं वही भाव डॉ. सिरोठिया के गीतों में दिखाई देता है। डॉ सीरोठिया ने ‘‘आत्म निवेदन’’ में इस बारे में स्वयं लिखा है कि ‘‘गीतों की सफलता और सार्थकता संवाद शैली में होती है।’’ इस संवाद शैली का एक उदाहरण देखिए -

आसमान के चांद-सितारे

  मिटा न पाए जो अंधियारे

    तुमने मन के अंधियारों में

      नेह दीप उजियार दिया है

        तुमने कितना प्यार दिया है।   (पृ. 35)

   

बांए से - उमाकांत मिश्र, डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया

अपनों द्वारा प्रदत्त पीड़ा अधिक कष्टदायी होती है, नैराश्य भी उत्पन्न करती है परन्तु डॉ सीरोठिया के विरहगीतों में भी नैराश्य नहीं है अपितु व्यक्तिगत दुख दुनियावी दुख से एकाकार होता चलता है जैसे ये पंक्तियां देखें -

          मुस्कुराहट के नए मैं गीत लिख कर क्या करूंगा

          बस्तियां जब प्यार की वीरान होती जा रही हैं 


इसी गीत के अंतिम बंध की पंक्तियां -’

          पिंडलियों का दर्द जब

            हर सांस भारी हो रहा है

             मंज़िलों के गीत मोहक

              किस तरह मैं गुनगुनाऊं

               कौन सौंपेगा किसे अब

                बोझ दायित्वों का आगे-

                 पीढ़ियां आपस में जब 

                  अनजान होती जा रही हैं।   (पृ. 53-54)


डॉ सीरोठिया के गीतों में प्रेम के प्रति समर्पण की विशेष छटा दिखाई देती है। एक ऐसी छटा जिसमें लौकिक प्रेम से आगे बढ़ कर अलौकिक प्रेम ध्वनित होने लगता हैं। जैसे शायर मौजीराम ‘मौजी’ का मशहूर शेर है-  

         दिल के आईने में है तस्वीर-ए-यार 

         जब ज़रा गर्दन झुकाई देख ली


 प्रेम जब सप्रयास किया जाए तो वह प्रेम नहीं होता, वास्तविक प्रेम स्वतः घटने वाली घटना होती है जिसमें प्रियजन के प्रति समस्त चेष्टाएं स्वतः होती जाती हैं-

        सच कहता हूं अनजाने ही गीत रचे सब

          मैंने तो बस केवल नाम तुम्हारा गाया।

             सदा सत्य, शिव, सुन्दरता का सम्बल जिसमें

             प्यार मुझे वह पावन इक प्रतिमान रहा है,

             मेरे मन का रहा समर्पण इस सीमा तक

             अपने प्रिय का रूप मुझे भगवान रहा है,

             सच कहता हूं अनजाने हो गई प्रार्थना

             मैंने तो सिर मन मंदिर के द्वार झुकाया।  (पृ. 67) 

 

गोपाल सिंह नेपाली ने कवि और वियोग का जो संबंध अपनी इन पंक्तियों में व्यक्त किया है कि - ‘‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजे होंगे गान

                   निकलकर आँखों से चुपाचाप, बही होगी कविता अनजान।’’ 

- यही भाव डॉ. सीरोठिया के विरह गीतों में एक अलग ही गरिमा के साथ प्रकट होता है। ये दो पंक्तियां देखिए -

         रही तुम्हारे मन में नफ़रत, मेरे मन में प्यार रहा

         यही हमारे रिश्ते का बस, जीवन में आधार रहा।   (पृ. 97)


या फिर इन पंक्तियों को देखिए -

        कोर नयन की बेमौसम जब भर आती है

        आकुल मन को पीड़ा अकसर दुलराती है     (पृ. 107)

 

डॉ. सीरोठिया ने अपने गीतों में नवीन बिम्बों का बड़े सुंदर ढंग से प्रयोग किया है। यदि कोई अपना सगा-संबंधी किसी बात पर रूठ जाए तो मन विकट दुविधा में पड़ जाता है। किसी तरह उस रूठे हुए संबंधी को मना भी लिया जाए और यदि वह मिलने आ भी जाए तो भी वह उलाहना देने से नहीं चूकता हैं। इसी विडम्बना को कवि ने प्रकृति और सामाजिक संबंधों की परस्पर तुलना करते हुए लिखा है कि- ‘

        रूठे रिश्तेदारों जैसे

          बहुत दिनों में आए बादल

            प्राण जले अंगारों जैसे

              तन-मन सब अकुलाए बादल।  (पृ. 47) 


‘‘प्रीत का पाहुन’’ गीत संग्रह भाव-अनुभूतिजन्य गीत-कृति है अतः कलापक्ष को सप्रयास नहीं सजाया गया है अपितु वह कलात्मक गुणों से स्वतः ही शोभायमान है, सशक्त है। भाषा शुद्ध सरल साहित्यिक हिन्दी है। शब्दावली सुगठित सरल सुग्राह्य है। शैली छायावादी होते हुए भी दुरूह नहीं है। आवश्यकतानुसार लक्षणा व व्यंजना का भी बिम्ब प्रधान प्रयोग भी है। जल की तरह निर्मल एवं पारदर्शी भावनाओं को उकेरतीं ये गीत-रचनाएं कवि के रागात्मक आयाम से न केवल परिचय कराती हैं, बल्कि उनकी कहन, उनके शब्द रागात्मकता का सुंदर पाठ भी पढ़ाते हैं। ऐसा पाठ जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है और ऐसी दुनिया के निर्माण में सहायक बनता है जहां मनुष्य के ही नहीं वरन् जड़-चेतन के भी गीत गाये जाते हैं।

कहा जा सकता है कि डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया के गीतों में जीवन को ऊर्जा प्रदान करने वाली स्वतःस्फूर्त चेतना है। लोकधर्मी चेतना से ध्वनित डॉ सीरोठिया के इन गीतों में घनीभूत आत्मसंवेदना का सुंदर समन्वय है। हिंदी गीतों के संवर्द्धन और पुनर्स्थापन के प्रति डॉ सीरोठिया का यह गीत संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 

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धन्यवाद सागर झील !!!


(साप्ताहिक सागर झील दि. 27.02.2018)

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सागर : साहित्य एवं चिंतन -22 डॉ. गोपीरंजन साक्षी : जिनके काव्य में आध्यात्मिकता है - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. वर्षा सिंह
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि डॉ. गोपीरंजन साक्षी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....
सागर : साहित्य एवं चिंतन
डॉ. गोपीरंजन साक्षी : जिनके काव्य में आध्यात्मिकता है
- डॉ. वर्षा सिंह
वर्तमान युग इतना अधिक मशीनी हो चला है कि मानव-धर्म और आध्यात्म के पल सिकुड़ते चले जा रहे हैं। इन दिनों ध्यान और योग आत्मिक सुख और शांति के लिए नहीं गोया फैशन के लिए अपनाए जाने लगे हैं। इस प्रकार का आधुनिक आडम्बर समाज का परिष्कार भला कैसे कर सकता है? यही कारण है कि समाज में असंवेदनशीलता बढ़ रही है और अपराध एवं अनाचार बढ़ रहा है। सागर के कवि एवं आध्यात्मिक चिंतक डॉ. गोपीरंजन साक्षी अपनी कविताओं में समाज की वर्तमान दशा के प्रति चिन्ता को आध्यात्मिक मूल्यों पर परखते हुए सब के सामने रखते हैं। डॉ. साक्षी के जीवन पर ओशो के विचारों का गहन प्रभाव है। यही कारण है कि प्रेम के प्रति उनका दृष्टिकोण संकुचित न हो कर अनन्त विस्तार लिए हुए है। उन्होंने प्रेम के प्रति अपने विचार अपने कविता संग्रह ‘‘जेहि घट प्रेम न संचरै’’ के ‘आत्मकथ्य’ में इन शब्दों में व्यक्त किया है कि -‘‘प्रेम परमात्मा है लेकिन समाज में प्रायः उसका घृणित वासनात्मक रूप ही दिखाई दे रहा है। पुत्र-पुत्री अपने स्वजनों के समक्ष चर्चा करने से कतराते हैं। ऐसी दृष्टि समाज में पल्लवित है, जबकि सभी संतों, कवियों ने प्रेमाभक्ति से परमात्मा को प्राप्त किया है। प्रेमसाधना भी है और साध्य भी। यही नूतन दृष्टि आज के सम्यक सम्बुद्ध ओशो ने नए युग के मनुष्य को दी है।’’
डॉ. गोपी रंजन साक्षी

स्व. खुमान सिंह एवं स्व. भाग्यवती के घर 2 अक्टूबर 1944 को जन्मे डॉ. गोपीरंजन साक्षी ने अध्ययन के क्षेत्र में एम.ए., पीएच.डी., बी.एड. के साथ ही आयुर्वेदरत्न, योगविद् एवं साहित्यालंकार की उपाधि प्राप्त की। वरिष्ठ स्नातकोत्तर अध्यापक, केन्द्रीय विद्यालय के पद से सेवानिवृत्ति के उपरांत डॉ. साक्षी की सक्रियता साहित्यिक एवं सामाजिक कार्यों में बढ़ गई। डॉ. साक्षी की साहित्यिक अभिरुचि उनकी पुत्री कुमारी सुमि अनामिका साक्षी एवं पुत्र अमीश कुमार साक्षी में भी पल्लवित हुआ। कुमारी सुमि एक संवेदनशील कवयित्री के रूप में अपनी प्रतिभा को उद्घाटित कर ही रही थी कि सन् 2013 में एक सड़क दुर्घटना में उसे संसार से विदा लेना पड़ा। अपनी पुत्री को यूं अचानक खोना डॉ. साक्षी के लिये बहुत बड़ा सदमा था। उनकी पुत्री साहित्यिक एवं आध्यात्मिक प्रतिभा की धनी तो थी ही, अपने परिवार का आर्थिक सहारा भी थी। सेवानिवृत्ति के बाद डॉ. साक्षी को अपनी अस्वस्थ पत्नी के इलाज पर निरंतर धनव्यय करना पड़ रहा था। पुत्री की 29 वर्ष की अल्पायु में मृत्यु के बाद अपने पुत्र और अस्वस्थ पत्नी की चिन्ता ने उन्हें एक बार फिर दृढ़ता प्रदान की। अपनी पुत्री की अप्रकाशित रचनाओं को डॉ. साक्षी ने पुस्तक के रूप में सम्पादित कर प्रकाशित कराया, जिसका नाम है-‘‘ज़िन्दगी! तू एक कविता है।’’उन कविताओं का संकलन अमीश साक्षी ने किया था। इसी के साथ अमीश के सहसंपादन में डॉ. साक्षी ने अपनी पुत्री सुमि का जीवनवृत्त ‘फिर मिलूंगी’ का लेखन एवं संपादन किया। यह दोनों पुस्तकें सन् 2016 में प्रकाशित हुईं। सन् 2016 में ही ओशो दर्शन पर आधारित उनकी पुस्तक ‘‘हंसत्व की ओर’’ प्रकाशित हुई जिसमें हंस प्रज्ञा, रेकी प्रज्ञा, महाजीवन प्रज्ञा, सम्मोहन प्रज्ञा, ज्योतिष प्रज्ञा, सूफ़ी दरबार आदि आध्यात्मिक विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई है। अपने लेख ‘उमंग प्रज्ञा’ में लेखक ने लिखा है कि ’’दुनिया में शायद ही कोई मिले जो इन दो शब्दों और उनकी अर्थवत्ता से अपरिचित हो-उदासी एवं उमंग। उदासी के प्रकोप तो सभी ने झेले हैं, यह बढ़ती हुई मनोदशा में महारोग अवसाद का कारण बनती है।’’ इसी प्रकार की व्याख्या ‘आनन्द प्रज्ञा’ के बारे में करते हुए डॉ साक्षी लिखते हैं कि ‘‘दुख से आनन्द की ओर क्यों? दुखी व्यक्ति में कोई उत्सुक नहीं होता, सभी किनारा कर जाते हैं।’’ डॉ. गोपीरंजन साक्षी के तीन काव्य संग्रह ‘हाशिए पर’, ‘रेतीले छीटें’ तथा ‘जेहि घट प्रेम न संचरै’ तथा एक खण्ड काव्य ‘लंकायन’ प्रकाशित हो चुका है। ‘कबीर साखी दर्शन’ तथा ‘कबीर की आध्यात्म साधना का स्वरूप विवेचन’ शोध ग्रंथ अभी प्रकाशनाधीन हैं। किन्तु इनसे स्पष्ट है कि उनके विचारों पर कबीर-दर्शन का भी प्रभाव है। डॉ. गोपीरंजन साक्षी की कविताओं में प्रेम का परिष्कृत रूप निखर कर सामने आया है। वे प्रेम को उद्धार का मार्ग निरुपित करते हुए लिखते हैं-
प्रिय/ तुम्हारा समर्पण ही
देगा बल/ ऊपर उठने का
सीखूंगा मैं भी समर्पण
प्रेरणा ले कर/तुम्हीं से
अतः तुम्हारा साथ/ पल दो पल का नहीं
स्थायी हो जीवन भर।
Sagar Sahitya Chintan -22 Dr Gopi Ranjan Sakshi - Jinke Kavya Me Adhyatmikta Hai - Dr Varsha Singh
‘नए तेवर’ शीर्षक कविता में प्रेम के पावन स्वरूप को रेखांकित करते हुए डॉ. साक्षी ने प्रेम की उत्पत्ति तथा अनुभूति को इन शब्दों में व्यक्त किया है-
प्रेम सिखाया नहीं जाता
यह अपने आप हो जाता है
हृदय में उमंग उठे तो
कह डालो,
प्रिये!
तुलसी-पूजन/कितना शुभ होता है
मैं तुलसी को नित्यप्रति/अर्पित करता हूं
निर्मल जल, प्रेमपूर्ण।
डॉ. गोपीरंजन साक्षी की कविताओं की लयात्मकता किसी सूफियाना धुन की भांति मधुरता से प्रवाहित होती है। ‘भेद मिट जाएंगे’ शीर्षक कविता में संयोग श्रृंगार को बड़े ही सहज शब्दों में बांधा गया है -
प्रिय/ एक ही करवट
एक ही याद में
कब तक रहोगे
करवट बदलो
आमना-सामना होगा
रूप निखर आएगा/ रंग बदल जाएगा
इमारत बुलन्द हो जाएगी
खण्डहर-सी ज़िन्दगी/क्यों ढोते हो?
‘हाशिए पर’ काव्य संग्रह में संकलित कविताओं में वर्तमान जीवनदशा के प्रति चिंतन मुखर हुआ है। ‘प्रश्नचिन्ह’ शीर्षक कविता में डॉ. साक्षी ने राकेटयुग की आधुनिकता को एक और रूढ़ि निरुपित करते हुए लिखा है-
राकेट का पदचिन्ह घूम
आकाश में तैरता है/गाला सदृश्य
उन मधुर कल्पनाओं की भांति
जो शुभ और सुंदर हैं।
राजनीतिज्ञ और वैज्ञानिक
जिसे अपनी सूझ और मेधा की
सर्वोत्तम उपलब्धि समझते हैं
वही तैरता है/ रेख
जैसे रूढ़ि हो इस नए युग की।
बेरोजगारी के दारूण से भी कविमन अछूता नहीं है। कवि डॉ. साक्षी की कविता ‘रक्तिम अनुराग’ का यह अंश किसी भी पाठक के मन को उद्वेलित करने में सक्षम है-
सर्वोच्च डिगरियां बांझ
दर-बा-दर की ठोकरें सांझ
लौटता हूं।
हिम्मत पस्त/सब अस्त-व्यस्त
उम्र का तकाज़ा/बचपन का राजा
घेरती चिंगारियां/बढ़ती भूख/उत्तर दो टूक।
डॉ. गोपीरंजन साक्षी ने कविताओं के साथ ही लेख, निबंध, कहानी, संस्मरण आदि भी लिखे हैं। आकाशवाणी के सागर, अम्बिकापुर एवं जगदलपुर केन्द्रों से उनकी रचनाओं का प्रसारण हो चुका है।
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( दैनिक, आचरण दि. 07.08.2018)
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