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Tuesday, December 22, 2020

अख़लाक़ सागरी : जिनके लिए मंदिर की घंटियां भी अज़ान थीं | डाॅ. वर्षा सिंह | पुण्यतिथि पर विशेष | लेख

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज  दिनांक 22.12.2020 को सागर नगर के अंतरराष्ट्रीय ख़्यातिप्राप्त मशहूर शायर मरहूम अख़लाक़ सागरी की दूसरी पुण्यतिथि पर "दैनिक भास्कर" समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ है मेरा यह विशेष लेख "अख़लाक़ सागरी : जिनके लिए मंदिर की घंटियां भी अज़ान थीं"
हार्दिक आभार दैनिक भास्कर 🙏

नमन है सागर के गौरव मरहूम शायर अख़लाक़ सागरी जी को 🙏💐🙏

मरहूम शायर अख़लाक़ सागरी की पुण्यतिथि पर डॉ. वर्षा सिंह का दैनिक भास्कर में प्रकाशित लेख

मेरा यह लेख ब्लॉग पाठकों की पठन- सुविधा के लिए जस का तस प्रस्तुत है :- 

22 दिसम्बर पुण्यतिथि पर विशेष:-


 अख़लाक़ सागरी : जिनके लिए मंदिर की घंटियां भी अज़ान थीं

         - डाॅ. वर्षा सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार


इश्क़ में हम तुम्हें क्या बताएं, किस क़दर चोट खाये हुए हैं।

मौत ने उनको मारा है और हम, ज़िन्दगी के सताये हुए हैं।

ऐ लहद अपनी मिट्टी से कह दे, दाग़ लगने न पाये कफ़न को,

आज ही हमने बदले हैं कपड़े, आज ही हम नहाये हुए हैं।

इस ग़ज़ल से दुनिया भर में छा जाने वाले सागर के शायर अख़लाक़ सागरी किसी परिचय के मोहताज़ नहीं हैं। इस ग़ज़ल के पीछे एक दिलचस्प वाक़या रहा। जब वे कक्षा 11वीं में पढ़ते थे, तब उन्हें एक लड़की से प्रेम हो गया। लेकिन उस लड़की ने उन्हें धोखा दे दिया। इससे उनके दिल को गहरी चोट पहुंची और यह ग़ज़ल बन गई।

अख़लाक़ सागरी की ग़ज़लों को बालीवुड के नामचीन गायकों के साथ ही पाकिस्तानी गायक अताउल्ला खां ने भी अपनी आवाज़ दी है। अपने समय में मुशायरों में जान डालने वाले अख़लाक़ सागरी क़ौमी एकता के प्रबल समर्थक थे। मुझे याद है सतना जिले के जैतवारा में हुए कविसम्मेलन की वह घटना, मैं भी उस कविसम्मेलन में काव्यपाठ के लिए आमंत्रित थी। सभी कवियों के ठहरने की व्यवस्था मंदिर के पास एक घर में की गई थी। शाम की चाय के समय मंदिर में जब आरती की घंटियां बजीं तो एक बददिमाग़ कवि ने अख़लाक़ साहब को छेड़ते हुए पूछा- ‘‘आप को इस आवाज़ से परेशानी तो नहीं हो रही है?’’ इस पर अख़लाक़ साहब हंस कर बोले- ‘‘ये आवाज़ तो मेरे लिए पाक अज़ान की तरह है, भला मुझे इससे क्या परेशानी होगी’’ उत्तर सुन कर पूछने वाला कवि अपना सा मुंह ले कर रह गया।

इश्क़ मुहब्बत की शायरी के साथ ही अख़लाक़ सागरी ने मुफ़लिसी पर भी गजलें कही। उनके ये मिसरे बेहद मशहूर हैं -

फुटपाथ पर पड़ा था वो कौन था बेचारा।

भूखा था कई दिन का दुनिया से जब सिधारा।

कुर्ता उठा के देखा, तो पेट पर लिखा था

सारे ज़हां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।


मशहूर शायर अख़लाक़ सागरी ने उर्दू शायरी को एक अलग ही ज़मीन दी। आज उनके पुत्र अयाज़ सागरी अपने पिता की इस विरासत को न केवल सहेज रहे हैं बल्कि अपनी शायरी से समृद्ध कर रहे हैं।

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Friday, September 18, 2020

अंगना में ठाड़े बड्डे | बुंदेली व्यंग्य | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज मेरा बुंदेली व्यंग्य लेख "पत्रिका" समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏
बुंदेली व्यंग्य
              अंगना में ठाड़े बड्डे
                              - डॉ. वर्षा सिंह

       हमाए एक बड़े भैया जी आंए, जोन से हम बड्डे कहत हैं। भौतई नोनो सुभाव है उनखों। जोन चाए की मदद खों तैयार रैत हैं, मनो ना कहबो तो उन्ने सीखोई नईंया। बरहमेस, दूसरन के लाने अपनो पूरो टेम दे देत हैं। उनकी जेई आदत पे भौजी सो भारी खिजात हैं उन पे। मनो तनक सी डांट- डपट कर के बे सोई बड्डे खों संग देन लगत हैं। अब करें भी का। कोनऊ की मदद करे बिना उनखों जी सोई नईं मानत है। 
      हमाए बड्डे आयोजन करवाबे में भौतई एक्सपर्ट आएं। बे जोन आयोजन कराबे के लाने ‘‘हऔ’’ बोल देत हैं, तो मनो ऊ आयोजन कभऊं फेल तो होई नईं सकत आए। जा कोरोनाकाल के पैलें आयोजन कराबे के लाने उनके ऐंगर भीड़ लगी रैत्ती। काय से के उन्ने ऐसे-ऐसे आयोजन कराए के लोग देखतई रै गए। कोरोनाकाल में उन्ने भीड़-भाड़ बारो आयोजन खों काम बंद कर दौ है। काय से के बे कोरोना गाइडलाइन खों पालन कर रए हैं। बाकी कल बड्डे के संगे भौतई गजब भऔ। भओ जे के कल जब बे दुपैरी खों अपने अंगना में ठाड़े हते, उनके ऐंगर हरीरो सो सलूखा पैरे एक आदमी आओ, औ कहन लगो के हमाए लाने एक आयोजन करा देओ। 

    ‘‘काय को आयोजन?’’- बड्डे ने पूछी।

   ‘‘मोय सम्मान कार्यक्रम कराने है।’’ ऊने बड्डे से कही। फेर बोलो -‘‘अच्छो बड़ो सो आयोजन, जीमें हजार-खांड़ लुगवा-लुगाई जुड़ जाएं सो मनो मजो आ जाए।’’
‘‘अब न जुड़हें हजार-खांड, तुमें ओनलाईन कराने हो सो बोलो’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘जे ओन-फोनलाईन हमें नईं करानें। हमाए लाने तो तीनबत्ती से पूरो कटरा बजारे लों भर दइयो। बो भी रात नौ के बाद, काय से के दिन में तो उते हमाए भक्तन की भीड़ जुड़ई रैत आय। सम्मान करबे खों मजा तो मनो रातई में आहै।’’ हरीरो सलूखा बारे ने कही।

    ‘‘कोन को सम्मान, कैसो सम्मान, हमाई कछ्छू समझ में ने आ रओ। काय से के ई टेम पे भीड़-भाड़़ जोड़बे वारो कौनऊ आयोजन हम नईं करवा रए। औ रात की तो सोचियो भी नई।’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘ऐसो न बोलो भैय्या, तुमाओ बड़ो नाम सुनो है, तुमाए ऐंगर बड़ी आसा ले के आएं हैं।’’ बा गिड़गिड़ात भओ बोलो।

   ‘‘मनो तुम हो कौन? औ कौन को सम्मान करो चात हो?’’ बड्डे खिझात भए बोले।

   ‘‘हओ, सो तुम काए चीनहो हमाए लाने। काय से के तुम तो घरई में पिड़े रैत हो। चलो, हमाई बता देत हैं के हम को आएं। तो सुनो, हम कोरोना आएं। औ हमें उन औरन खों सम्मान करने है जो बिना मास्क लगाए, बिना डिस्टेंसिंग बनाए बजार-हाट में नांए-मांए घूमत रैत हैं। कोनऊ की नईं सुनत हैं। बे हमाए से मिलबे खों उधारे से फिरत हैं। सो हमें भी लग रओ है के हमें अपने ऐसे भक्तन खों सम्मान कारो चइए। काय, ठीक सोची ने हमने?’’ ऊने कही।

   अंगना में ठाड़े बड्डे ने इत्ती सुनी, औ लगा दई दौड़ कमरा के भीतरे। कोरोना हतो सो, अपनो सो मों ले के लौट गओ, बाकी हमाए बड्डे तभई, ओई टेम से उन औरन खों पानी पी-पी के कोस रए हैं जो गाइड- माइड लाईन भुला के कोरोना खों मूड़ पे बिठाए गली-गैल, बजार-हाट में खुल्ला मों लेके नांय-मांय सटत फिरत हैं। सो बड्डे कभऊं कोरोना खों गरियात हैं, सो कभऊं कोरोना भक्तन खों।
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Friday, August 21, 2020

बुंदेलखंड में हरितालिका तीज | हरितालिका व्रत | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज हरितालिका तीज है और आप सभी को हरितालिका तीज की हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏💐

भाद्रपद अर्थात् भादों मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीज का पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह प्रचलित है कि हरितालिका तीज के दिन सावन में भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था। इसका वर्णन शिवपुराण में भी मिलता है, इसलिए इस दिन सुहागिन महिलाएं मां पार्वती और शिवजी की आराधना करती हैं, जिससे उनका दांपत्य जीवन खुशहाल बना रहे। उत्तर भारत के राज्यों में तीज का पर्व बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। अच्छे वर की प्राप्ति के लिए कुंवारी कन्याएं भी इस दिन व्रत कर सकती हैं।

भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने 107 जन्म लिए थे। धार्मिक मान्यता है कि मां पार्वती के कठोर तप और उनके 108वें जन्म में भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, तब से इस व्रत की शुरुआत हुई। इस दिन जो सुहागन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं, उनका सुहाग लंबे समय तक बना रहता है। यह व्रत धर्म पारायण पतिव्रता सुहागिन औैर कुंवारी कन्याओं का सौभाग्य दायिनी विशेष व्रत है। सुहागिन स्त्रियों अपने पति के लंबी आयु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य व सौभाग्य की कामना के लिए और कुंवारी कन्याएं मनपसंद वर की प्राप्ति की कामना के लिए यह व्रत रखती है। यह पर्व ऐसा है कि इसमें महिलाएं अपने घर जाकर पति के लिए व्रत रखती है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के में पाने के लिए किया था। जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शंकर की अर्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तब से महिलाएं यह व्रत रख रही है। भविष्य पुराण की कथा के अनुसार राजा हिमाचल व रानी मैनी की पुत्री पार्वती जन्मांतर भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कृत संकल्पित थीं। अपने पिता द्वारा भगवान विष्णु से अपने विवाह की बात सुनकर पार्वती ने दुखी मन से यह बात अपनी सखी को बताई। उनकी सखी उन्हें जंगल ले गई, जहां माता पार्वती ने घोर तपस्या शुरू की। उन्होंने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए अन्न-जल का त्याग कर दिया। उन्होंने वर्षाें तक पेड़ों के पत्ते खाकर, तपती धूप में पंचाग्नि साधना कर, ठंड में पानी के अंदर खड़े होकर, सावन में निराहार रहकर और भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को बालू की शिव मूर्ति बनाई। जिसे पत्तों और फूलों से सजाकर श्रद्धापूर्वक पूजन और रात्रि जागरण करती रहीं। इससे भगवान शिव प्रसन्न हो गए और माता पार्वती को पति रूप में प्राप्त हुए। माता पार्वती का व्रत-पूजन व जागरण सहित दुष्कर तपस्या भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को सफल हुई थी, इसलिए इसे तीजा कहते है।

हरितालिका तीज पूजा में इस मंत्र का जाप किया जाता है -
देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
पुत्रान देहि सौभाग्यम देहि सर्व।
कामांश्च देहि मे।।

हरितालिका तीज के दिन हरे वस्त्र, हरी चुनरी, हरा लहरिया, हरी चूड़ीयां, सोलह श्रृंगार , मेहंदी, झूला-झूलने की परंपरा भी है। इस दिन लड़कियों के मायके से श्रृंगार का सामान और मिठाइयां आती हैं। नवविवाहिताओं के लिए बहुत खास होता है। महिलाएं इस दिन गीत गाती है और झूला झूलती है।

बुंदेलखंड में भी हरितालिका तीज मनायी जाती है। इस दौरान पूजा स्थल पर भगवान के लिए छोटा झूला स्थापित करके उसे आम या अशोक के पल्लव और रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है. इसे फुलेरा कहते हैं। जिसके घर में फुलेरा बंधता है वहां मुहल्ले की महिलाएं एकत्रित हो कर पूजन, भजन गायन और रात्रि जागरण करती हैं। सभी महिलाएं शिव-पार्वती का स्एमरण करते हुए मधुर स्वर में लोकगीत गाती हैं। इस अवसर पर तृतीया देवी यानी तीजा माता से जुडे़ खास तरह के लोकगीत गाए जाते हैं, जिन्हें तीजा गीत भी कहा जाता है। एक बानगी देखिए -

दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

निरजल व्रत मैय्या मैंने राखो
मों में अन्न तनक नईं डारो
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

अपनो साज सिंगार करो है
तुम्हरो साज सिंगार करो है
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

माहुर पांव लगा रई सखियां
कजरा कारो लगा लौ अंखियां
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

गौरा पूजन करबे चलत हैं
शंकर जू खों नाम जपत हैं    ‎
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

सागर में भी हरतालिका तीज या हरियाली तीज बहुत ही श्रद्धा के साथ परम्परागत तरीके से मनाई जाती है। फुलेरा के नीचे विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं  कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।
पूजन सामग्री में विशेष रूप से निम्नलिखित पदार्थ आवश्यक होते हैं -
1- फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।
2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।
3- केले का पत्ता।
4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।
5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।
6- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।
7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं।
इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।
8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।
9- पञ्चामृत - घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।
उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है।

इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है।

आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं, उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।
इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण महिलाएं किसी एक घर में एकत्रित हो कर फुलेरा बांधने की बजाय अपने-अपने घरों में अलग-अलग फुलेरा बांध कर पूजन एवं रात्रि जागरण करेंगी।

फुलेरा बांध कर पूजन की पूर्ण तैयारी कर महिलाएं रात्रि जागरण करती हैं। शिव-पार्वती के भजनों के साथ ही कजरी, झूला, चौमासा आदि गीत गाती हैं।

कजरी गीत

अरे रामा रिमझिम पड़त फुहार,
 श्याम नहीं आए रे हारी..., 
अरे रामा आज बिरज में श्याम बने मनिहारी रे हारी...। 

 झूला गीत

देखो-देखो सखि सावनवां 
सखि झूले डरें है आंगनवां 

दूर है अमरइया चले जइयो 
दूर है अमरइया 
अमरइया में झूला डरें हैं
झूले बहन और भैया
देखो-देखो सखि सावनवां
सखि झूले डरें है आंगनवां 

चौमासा गीत

मोहे राजा छतरिया लगाओ हो रस की बूंदे परी 
चार महीना बसकारे के लागे मोरे राजा बंगलिया छवाओ हो रस की बूंदें परी

हरितालिका तीज व्रत की कथा इस प्रकार है -

भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।

श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया।

वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।

तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।

नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।

नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं, तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं।

हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है, कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।
 
तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

Monday, August 3, 2020

रक्षाबंधन | आल्हा | डॉ. वर्षा सिंह

🚩 रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🚩

आज श्रावण मास की पूर्णिमा है यानी रक्षाबंधन का पर्व है। साथ ही सुयोग यह कि आज श्रावण का अंतिम सोमवार भी है। रक्षाबंधन पर्व की कथा हमारे पुरातन ग्रंथों में मिलती है। महाभारत के अनुसार एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- 'हे अच्युत! मुझे रक्षा बंधन की वह कथा सुनाइए जिस से मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है।' 
        भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार दैत्यों तथा सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित करके उनके प्रतिनिधि इंद्र को भी पराजित कर दिया।
           ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएं तथा देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें। सभी लोग मेरी पूजा करें।
         दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख इंद्र अपने गुरु वृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- गुरुवर! ऐसी दशा में परिस्थितियां कहती हैं कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे। न तो मैं भाग ही सकता हूं और न ही युद्धभूमि में टिक सकता हूं। कोई उपाय बताइए।
वृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान रने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया।
'येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः।'
         इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बांधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया। 'रक्षा बंधन' के प्रभाव से दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्र की विजय हुई। राखी बांधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है।
           बुंदेलखंड में सैकड़ों साल पुरानी परंपरा का गांवों में निर्वहन होने से पता चलता है कि आल्हा-ऊदल की वीरता आज भी लोगों के दिलों में समाई है। जोश भरने वाली वीरता की गाथा सुनकर युवा, वृद्ध समेत सभी की भुजाएं फड़क उठती हैं। रक्षाबंधन के अगले दिन इन्हीं दोनों की वीरता से संबंध रखने वाला कजली मेला मनाए जाने की परंपरा कोरोना महामारी के कारण टूट सी गई है। अब सामाजिक दूरी के बीच ग्रामीण इलाकों में यह कार्यक्रम सिर्फ रस्म अदायगी तक सीमित होगा।
        सैकड़ों साल पहले रक्षाबंधन के दिन राजा पृथ्वीराज चौहान ने महोबा में हमला कर दिया था। उनकी सेना ने रानी मल्हना के डोले लूट लिए थे। तब वीर भूमि के लोगों ने इस त्यौहार को रद्द कर दिया था। इस ऐतिहासिक घटना के बाद आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान की सेना से मोर्चा लेकर लूटे गए डोले वापस लिए थे। इसलिए उस दिन रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया गया था। लूटे गए कजली से भरे डोले वापस मिलने के बाद महोबा के कीरत सागर में रानी मल्हना ने रक्षाबंधन के अगले दिन कजलियों का विसर्जन कर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया था। 
    यह कथा इस तरह भी प्रचलित है कि सन् 1182 में राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि 1400 सखियाें के साथ भुजरियों के विसर्जन के लिए कीरत सागर जा रही थीं। रास्ते में पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडा राय ने आक्रमण कर दिया था। पृथ्वीराज चौहान की योजना चंद्रावलि का अपहरण कर उसका विवाह अपने बेटे सूरज सिंह से कराने की थी। यह वह दौर था जब आल्हा ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया गया था और वह अपने मित्र मलखान के पास कन्नौज में रह रहे थे। रक्षाबंधन के दिन जब राजकुमारी चंद्रावल अपनी सहेलियों के साथ भुजरियां विसर्जित करने जा रही थी तभी पृथ्वीराज की सेना ने उन्हें घेर लिया। आल्हा ऊदल के न रहने से महारानी मल्हना तलवार ले स्वयं युद्ध में कूद पड़ी थी। दोनों सेनाओं के बीच हुए भीषण युद्ध में राजकुमार अभई मारा गया और पृथ्वीराज सेना राजकुमारी चंद्रावल को अपने साथ ले जाने लगी। अपने राज्य के अस्तित्व व अस्मिता के संकट की खबर सुन साधु वेश में आये वीर आल्हा ऊदल ने अपने मित्र मलखान के साथ उनका डटकर मुकाबला किया। चंदेल और चौहान सेनाओं की बीच हुये युद्ध में कीरतसागर की धरती खून से लाल हो गई। युद्ध में दोनों सेनाओं के हजारों योद्धा मारे गये। राजकुमारी चंद्रावल व उनकी सहेलियां अपने भाईयों को राखी बांधने की जगह राज्य की सुरक्षा के लिये युद्ध भूमि में अपना जौहर दिखा रही थी। इसी वजह से भुजरिया विसर्जन भी नहीं हो सका। तभी से यहां एक दिन बाद भुजरिया विसर्जित करने व रक्षाबंधन मनाने की परंपरा है। महोबा की अस्मिता से जुड़े इस युद्ध में विजय पाने के कारण ही कजली महोत्सव विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सावन माह में कजली मेला के समय गांव देहातों में लगने वाली चौपालों में आल्हा गायन सुन यहां के वीर बुंदेलों में आज भी 1100 साल पहले हुई लड़ाई का जोश व जुनून ताजा हो जाता है।
       सागर में भी रक्षाबंधन का पर्व परम्परागत तरीक़े से मनाया जाता है। इस दिन घर-घर जलेबी खाने की परंपरा भी है। बहनें भाइयों के हाथों में रक्षा सूत्र । हैं। कजली लेकर महिलाएं सावन गीत गाती हैं और तालाबों में विसर्जन करती हैं।जगह-जगह आल्हा-ऊदल की वीरगाथा आल्हा के माध्यम से गाए जाते हैं।  बुंदेलखंड में रक्षाबंधन व कजली महोत्सव के दौरान यदि आल्हा न सुनाई पड़े तो सावन मनभावन नहीं लगता है।

बारह बरिस ल कुक्कुर जीऐं, औ तेरह लौ जिये सियार।
बरिस अठारह छत्री जीयें,  आगे जीवन को धिक्कार।।
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#आल्हा  #रक्षाबंधन 

Thursday, July 9, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | प्रिय है धरा बुंदेली | डॉ. वर्षा. सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों, मेरी माता जी, जो कि हिन्दी की जानी-मानी कवयित्री एवं लेखिका हैं - डॉ. विद्यावती "मालविका", वे मालवा क्षेत्र के उज्जैन की बेटी हैं और विवाहोपरांत उनके जीवन की लगभग 60 वर्ष की अवधि बुंदेलखंड के पन्ना और फिर अब सागर में व्यतीत हो रही है। डॉ. विद्यावती जी द्वारा मध्यप्रदेश के मालवा और बुंदेलखंड क्षेत्र की संस्कृतियों के प्रति स्नेहांजलि स्वरूप रचित यह गीत आज यहां प्रस्तुत है -

प्रिय है धरा बुंदेली
          - डॉ. विद्यावती "मालविका"

मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।
शिप्रा मेरी बहिन सरीखी, सागर झील सहेली।।

उज्जैयिनी ने सदा मुझे स्नेह दिया
विक्रम की धरती ने मेरा मान किय,
बुंदेली वसुधा ने मुझे दुलार दिया
गौर भूमि ने मुझे सदा सम्मान दिया,

सदा लुभाती मुझको सुंदर ऋतुओं की अठखेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।

महाकाल के चरणों में बचपन बीता 
रहा न मेरा अंतस साहस से रीता,
यहां बुंदेली संस्कृति को अपनाने पर
हुई समाहित मेरे मन में ज्यों गीता,

ऋणी रहूंगी मैं नतमस्तक, बांधे युगल हथेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।
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Dr. Vidyawati "Malvika"
#गीत #बुंदेलखंड #मालवा #सागर #पन्ना #कवयित्री

Wednesday, June 10, 2020

बुंदेलखंड हिन्दी साहित्य-संस्कृति विकास मंच, सागर की ऑनलाइन कवि गोष्ठी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय मित्रों, मानना पड़ेगा कि इस कोरोना काल में काव्यगोष्ठी ने ऑनलाईन हो कर सोशल मीडिया पर अपना रंग जमा लिया है। Whatsapp Group हो या Facebook Live .... Zoom App हो या WebEx Meet ... काव्यगोष्ठी ज़ारी है... तो लीजिए पढ़िये दैनिक "देशबंधु" में प्रकाशित यह समाचार... जी हां, कल शनिवार 23.05.2020 को सम्पन्न On Line गोष्ठी में मैंने सरस्वती वंदना की और अपनी ग़ज़ल का पाठ किया ....

धन्यवाद बुंदेलखंड हिन्दी साहित्य-संस्कृति विकास मंच, सागर 🙏



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#दैनिकदेशबन्धु
#बुंदेलखंड #जयबुंदेलखण्ड #जयबुंदेली
#हिंदी #साहित्य #संस्कृति #विकासमंच

Sunday, March 8, 2020

पर्यावरण संरक्षण के लिए खेलिए सूखी होली - डॉ. वर्षा सिंह


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏💐🙏
      आज 08 मार्च को पत्रिका समाचारपत्र ने प्रमुखता से हमारे संकल्प को स्थान दिया है, यह महत्वपूर्ण है... धन्यवाद पत्रिका 🙏

पत्रिका समाचारपत्र दिनांक 08.03.2020
      होली का पर्व यानी उल्लास-उमंग और सद्भाव का पर्व। इस त्योहार पर आपसी दूरियां कम हो जाती हैं और भाईचारा बढ़ता है। सामाजिक समरसता के प्रतीक इस त्योहार को मनाने के गलत तरीकों से हम अपने साथ ही समाज का भी नुकसान करते हैं। जल का दुरूपयोग भी इसी श्रेणी में आता है, लिहाजा इस बार होली के पर्व पर जल संचय का संदेश भी दें।

होली का पर्व आपसी स्नेह और भाईचारे का प्रतीक है। जरूरी नहीं कि पानी का दुरूपयोग कर ही इस त्योहार का मजा लिया जाए। हमें विगत वर्षों के जल संकट से सबक लेना चाहिए। जल संचय जीवन के लिए बहुत जरूरी है, साथ ही यह शहर के विकास के लिए भी अत्यंत आवश्यक है। अत: सभी लोग होली के त्योहार पर सूखे रंगों का उपयोग करें और जल के दुरूपयोग से बचें। संत कबीरदासजी ने कहा है कि पानी चला जाने के बाद मोती, मानव और चूना नष्ट हो जाते है। जीवन के लिए आवश्यक पंच तत्वों में प्रधान जल के संचय के लिए प्रति हमें जागरूक होना ही होगा। यह दुर्भाग्य ही है कि पानी बचाने का हम संकल्प तो लेते हैं, पर उस पर गंभीरता से अमल नहीं करते हैं। इस बार सूखी होली खेलकर इस संकल्प की पूर्ति करें। जल रहेगा तो कल सुरक्षित रहेगा।

जल ही जीवन है की तर्ज पर पानी का दुरूपयोग किए बिना ही होली खेलें। सूखी होली खेलने से हम भीषण जल संकट से बच सकेंगे। इसी प्रकार जल संचय करके ही हम अपनी विकास दर निरंतर रख सकते हैं। इस बार की होली पर सिर्फ गुलाल और सूखे रंगों का उपयोग करें, जल के दुरूपयोग और अनावश्यक विवादों से बचें। दोनों ही सतर्कता सुखद भविष्य के लिए जरूरी है। इसलिए सूखी होली खेलना ही सार्थक साबित होगी।

इसीलिए होली के रंग तो खूब उड़ें मगर सूखे...। यदि कल भी हमें सुखी रहना है तो होली के उल्लास में पानी उड़ेंलने के बजाए सूखी होली मनाने का ध्येय रखना चाहिए।

मेरी पंक्तियां हैं.....

मिटा के सारी दुश्मनी, लगाएं आज हम गले
भुला के हर उलाहने, मिटा दें हर सवाल भी ।

ज़रा सी हों शरारतें , ज़रा सी शोख़ हरकतें
रहे न कोई गमज़दा,  मचे  ज़रा  धमाल भी ।

हुआ है फागुनी हवा का, इस क़दर असर यहां
मचल उठी है चाहतें,  बदल गई है चाल भी ।

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Friday, February 7, 2020

देवलचौरी गांव में रामलीला - डॉ. वर्षा सिंह


       रामलीला देखने का आनंद ही कुछ और होता है। सागर के देवलचौरी गांव में रामलीला लगभग 115 वर्षों से लगातार बसंत पंचमी के अवसर पर सात दिवसीय रामलीला का आयोजन किया जाता है। बुधवार की शाम सीता स्वयंवर के अंतर्गत श्री राम ने शिव धनुष तोड़ा,  सीता जी ने वरमाला पहनाई। राजा जनक जी की नगरी में सजे मंडप में स्वयंवर के तुरंत बाद परशुराम पहुंचे। जहां वे क्रोधित हुए, फिर मुनि विश्वामित्र के वचन सुने और धीरे धीरे उनका क्रोध शांत हो गया। अंत में परशुराम ने बड़े शांत मन से राम और सीता को आशीर्वाद दिया। इसके साथ ही रामलीला के सीता स्वयंवर प्रसंग का पटाक्षेप हुआ। .... और इसके साक्षी बने हम सब भी।
     पात्रों को श्रृंगार, आभूषण, वस्त्र साज, सज्जा में स्थानीय लोगों की भूमिका रहती है। रामलीला के पात्र निभाने वाले कलाकारों की उम्र 16 से 65 साल तक है। इस रामलीला के आयोजन की शुरुआत डॉ. महेश प्रसाद तिवारी के दादा छोटे लाल तिवारी जी ने गांव के ही कलाकारों द्वारा की थी। आज भी शासन की आर्थिक सहायता के बगैर यह रामलीला अनवरत जारी है। सागर शहर के साथ ही रामलीला देखने सेमाढाना, सत्ताढाना, भापेल सहित आसपास के 20 से अधिक गांवों से लोग ट्रैक्टर, जीप और बैलगाड़ी पर सवार होकर देवलचौरी पहुंचते हैं।