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Thursday, July 9, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | प्रिय है धरा बुंदेली | डॉ. वर्षा. सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों, मेरी माता जी, जो कि हिन्दी की जानी-मानी कवयित्री एवं लेखिका हैं - डॉ. विद्यावती "मालविका", वे मालवा क्षेत्र के उज्जैन की बेटी हैं और विवाहोपरांत उनके जीवन की लगभग 60 वर्ष की अवधि बुंदेलखंड के पन्ना और फिर अब सागर में व्यतीत हो रही है। डॉ. विद्यावती जी द्वारा मध्यप्रदेश के मालवा और बुंदेलखंड क्षेत्र की संस्कृतियों के प्रति स्नेहांजलि स्वरूप रचित यह गीत आज यहां प्रस्तुत है -

प्रिय है धरा बुंदेली
          - डॉ. विद्यावती "मालविका"

मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।
शिप्रा मेरी बहिन सरीखी, सागर झील सहेली।।

उज्जैयिनी ने सदा मुझे स्नेह दिया
विक्रम की धरती ने मेरा मान किय,
बुंदेली वसुधा ने मुझे दुलार दिया
गौर भूमि ने मुझे सदा सम्मान दिया,

सदा लुभाती मुझको सुंदर ऋतुओं की अठखेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।

महाकाल के चरणों में बचपन बीता 
रहा न मेरा अंतस साहस से रीता,
यहां बुंदेली संस्कृति को अपनाने पर
हुई समाहित मेरे मन में ज्यों गीता,

ऋणी रहूंगी मैं नतमस्तक, बांधे युगल हथेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।
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Dr. Vidyawati "Malvika"
#गीत #बुंदेलखंड #मालवा #सागर #पन्ना #कवयित्री

Sunday, June 28, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | देव दया तुम करना | कोरोना के विरुद्ध | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों, यह है मेरी माता जी डॉ. विद्यावती "मालविका" द्वारा लिखा गया एक ताज़ा गीत ... जिसे wab magazine युवाप्रवर्तक ने दि. 16.06.2020 के अंक में प्रकाशित किया है।
हार्दिक आभार "युवाप्रवर्तक" 🙏
http://yuvapravartak.com/?p=35019
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कोरोना संक्रमण के विरुद्ध एक गीत :

देव दया तुम करना
             - डॉ. विद्यावती 'मालविका'

सहनशक्ति की कठिन परीक्षा, देव दया तुम करना।
कष्ट निवारण करना सारे, दया दृष्टि तुम रखना।

हम भारत की संतानों का अहित न होने पाए,
करें सामना साहस से हम यदि जो विपदा आए,
हम गंगा की पावन धारा, हमें निरंतर बहना।
सहनशक्ति की कठिन परीक्षा, देव दया तुम करना।

सूर्य मुदित हो उदित सर्वदा, हर्ष नित्य बिखराए,
निशा चंद्रमा औ तारों की अनुपम ज्योति सजाए,
सुप्त-जागृत आंखों देखा, हो पूरा हर सपना।
सहनशक्ति की कठिन परीक्षा, देव दया तुम करना।
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#युवाप्रवर्तक #गीत #कोरोना #भारत #गंगा
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Saturday, June 27, 2020

आधुनिक हिन्दी कवयित्रियों के प्रेमगीत | डॉ. विद्यावती 'मालविका' | परिचय | गीत | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय मित्रों, आज पढ़िए "आधुनिक हिन्दी कवयित्रियों के प्रेमगीत"  पुस्तक में संकलित मेरी माताजी डॉ. विद्यावती "मालविका" जी का गीत जो इस पुस्तक में उनके छायाचित्र एवं परिचय सहित प्रकाशित है। देश के प्रख्यात साहित्यकार एवं यशस्वी संपादक क्षेमचन्द्र "सुमन" जी द्वारा संपादित यह ग्रंथ वर्ष 1962 में राजपाल एण्ड संस, दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। इस पुस्तक में महादेवी वर्मा से ले कर प्रकाशन वर्ष तक की अवधि की देश की जानीमानी कवयित्रियों का परिचय एवं उनके गीत संकलित हैं।








  इस पुस्तक की सामग्री को अनेक शोधग्रंथों एवं शोधात्मक लेखन में विशेष संदर्भ के रूप में सम्मिलित किया जाता है।
साथ ही मित्रों, मैं निवेदन करना चाहूंगी कि मेरी माता जी डॉ. विद्यावती 'मालविका' ने शतकाधिक गीत लिखे हैं, जो हिंदी साहित्य की धरोहर हैं। अनेक शोध ग्रंथों में उनके गीतों को सम्मिलित किया गया है एवं अनेक समवेत संकलनों में भी उनकी रचनाएं विद्यमान हैं। वह वर्तमान में भी यदा-कदा छंदबद्ध  कविताएं, गीत इत्यादि लिखती रहती हैं।

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Friday, June 26, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | मालव जननी | विक्रम | डॉ. वर्षा. सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय मित्रों, ये दो तस्वीरें हैं... एक है वर्ष 1953 में मेरी माता जी विद्यावती ‘मालविका’ जी की और दूसरी "विक्रम" पत्र के दिसम्बर 1953 के अंक में प्रकाशित उनके गीत "मालव जननी" के पत्र-कतरन की।
एक प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक का अंश है... "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी", मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में स्थित विक्रमादित्य का नगर उज्जैन मेरी माता जी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ की जन्मभूमि है। लेखन में उनकी रुचि बाल्यकाल से रही है। माताजी ने अपने पिता यानी मेरे नाना जी संत ठाकुर श्यामचरण सिंह जी के विचारों से प्रभावित हो कर 12-13 वर्ष की आयु से ही साहित्य सृजन आरम्भ कर दिया था। उनकी गहरी साहित्यिक अभिरुचि को पहचान कर उज्जैन के प्रकाण्ड विद्वान, स्वनामधन्य कवि एवं "विक्रम" पत्र के यशस्वी सम्पादक पण्डित सूर्यनारायण व्यास जी ने उन्हें "मालविका" अर्थात् मालव कन्या के उपनाम से विभूषित किया था। "विक्रम" के दिसम्बर 1953 के अंक में प्रकाशित माता जी का यह गीत उन दिनों बहुत लोकप्रिय हुआ था।
         अपने विवाह पश्चात माताजी ने मालवा से विदा लेने के उपरांत रीवा और तत्पश्चात  अपने जीवन के लगभग 6 दशक बुन्देलखण्ड में व्यतीत किए हैं, जिसमें से लगभग 30 वर्ष पन्ना में और 30 वर्ष से अधिक समय सागर में... वर्तमान में वे मकरोनिया, सागर में निवासरत हैं।
डॉ. विद्यावती "मालविका" युवावस्था में... @ साहित्य वर्षा

दिसम्बर 1953 में "विक्रम" (उज्जैन) में प्रकाशित डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत "मालव जननी"



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Saturday, June 20, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | चातकी | दीदी | डॉ. वर्षा. सिंह

प्रिय मित्रों, इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से प्रकाशित होने वाली जिस मासिक पत्रिका "दीदी" में मेरी माता जी विद्यावती जी (तब वे अविवाहित थीं और हिन्दी साहित्य में विशारद की उपाधि प्राप्त कर चुकी थीं) की यह रचना वर्ष 1950 में प्रकाशित हुई है , वह पत्रिका पूरी हिंदी पट्टी यानी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार आदि अनेक राज्यों के कन्या शालाओं के लिए मान्यता प्राप्त स्वीकृत पत्रिका थी जिसमें नारी उत्थान और नारी शिक्षा से संबंधित सामग्री लगातार प्रकाशित की जाती थी। देश की आजादी के 3 वर्ष बाद अगस्त 1950 में मेरी माता जी की प्रकाशित या रचना इस बात का प्रमाण है कि विषम परिस्थितियों के बावजूद कुछ जागरूक साहित्यकार, समाजसेवी महिला शिक्षा के प्रति उस समय भी जागरूक थे। किंतु विशेषकर उन परिवारों में जहां परिवार के मुखिया स्वयं शिक्षित थे। मेरे नाना जी संत श्यामचरण सिंह जी स्वयं विद्वान लेखक साहित्यकार एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाजसेवी थे इसलिए उन्होंने मेरी माता जी की शिक्षा- दीक्षा में कभी अवरोध उत्पन्न नहीं किया, बल्कि लेखन, पठन-पाठन के लिए हमेशा उन्हें प्रोत्साहित भी किया।  मेरी माता जी इस पत्रिका में गीत, कहानी, कविताएं आदि नियमित रूप से लिखती थीं। उनकी अनेक रचनाएं इस पत्रिका में प्रकाशित हुई उनकी कुछ और प्रकाशित कृतियां मैं आप सबसे भविष्य में साझा करती रहूंगी इसी प्रकार आत्मीयता एवं स्नेह बनाए रखें, सादर प्रस्तुत है माता जी की फाइल से उनकी यह रचना🙏
दीदी पत्रिका 1950 @ साहित्य वर्षा


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डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | ज्योत्सना | दीदी | डॉ. वर्षा. सिंह

.... और यह है मेरी माता जी डॉ. विद्यावती 'मालविका' जी का "दीदी" पत्रिका में जनवरी 1949 में प्रकाशित एक गीत...

दीदी पत्रिका, जनवरी 1949, @ साहित्य वर्षा


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Thursday, June 11, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | नववर्ष | दीदी | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय मित्रों, आज पढ़िए मेरी माताजी डॉ. विद्यावती 'मालविका' का वर्ष 1948 में इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका "दीदी" के जनवरी अंक में प्रकाशित एक गीत....

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत - @ साहित्य वर्षा

     मित्रों, दरअसल मेरी माताजी डॉ. विद्यावती मालविका, जिन्होंने अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, वे नियमित रूप से समाचार पत्रों, पत्रिकाओं एवं जर्नल्स में कविता, कहानी, लेख, विचार दर्शन आदि लिखा करती रही हैं। यूं तो वे अभी भी लेखन, पठन-पाठन से जुड़ी हुई हैं किन्तु आज उनकी एक पुरानी फाइल पलटते हुए मुझे यह विचार आया कि आप सबसे भी उनकी कुछ प्रकाशित रचनाएं साझा करूं।

Monday, April 29, 2019

अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस (29.04.2019 ) पर हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

सदा सृष्टि में चलता रहता है, ऋतुओं का नर्तन।
नृत्य बिना सूना रहता है प्राणी मात्र का जीवन।

नृत्य सदा परिभाषित करता सुख-दुख के अनुभव को,
अपने सम्मोहन में रखता देव और दानव को,

धरा गगन को बांधे रहता, यह अदृश्य इक बंधन ।
नृत्य बिना सूना रहता है प्राणी मात्र का जीवन।

जड़-चेतन के बीच सेतु की भांति व्यापत रहता है,
नृत्य, जगत के दृश्य-पटल पर इक हलचल रखता है,

मुद्राओं के ताल मेल से खुलते सारे गोपन।
नृत्य बिना सूना रहता है प्राणी मात्र का जीवन।

नृत्य व्यक्त करता है मन की सारी मनोदशा को,
सूर्य, चन्द्रमा से संचालित करता दिवस, निशा को,

शिव का प्रिय, रसिया कान्हा का, नृत्य मर्म का दरपन।
नृत्य बिना सूना रहता है प्राणी मात्र का जीवन।
             - डॉ. वर्षा सिंह
   
             
           अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस प्रत्येक वर्ष 29 अप्रैल को विश्व स्तर पर मनाया जाता है।  इसकी शुरुआत 29 अप्रैल 1982 से हुई, जब यूनेस्को के अंतरराष्ट्रीय थिएटर इंस्टिट्यूट की अंतरराष्ट्रीय डांस कमेटी ने 29 अप्रैल को नृत्य दिवस के रूप में स्थापित किया।  यह दिन एक महान रिफॉर्मर जीन जार्ज नावेरे की स्मृति में अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस के रूप में मनाया जाता है।

इसको पूरे विश्व में मनाने का उद्देश्य जनसाधारण के बीच नृत्य के महत्व से परिचित कराना था और लोगों का ध्यान विश्वस्तर पर इस ओर आकर्षित करना था। ताकि लोगों में नृत्य के प्रति जागरुकता फैले।

          शासकीय स्तर पर भी पूरे विश्व में नृत्य की शिक्षा देने का प्रयास करना था। सन् 2005 में नृत्य दिवस को प्राथमिक शिक्षा के रूप में केंद्रित किया गया। विद्यालयों में अनेक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया जिसमें बच्चों द्वारा नृत्य पर कई निबंध व चित्र भी बनाए गए। 2007 में नृत्य को बच्चों को समर्पित किया गया।

        नृत्य की उत्पत्ति के बारे में यह कहा जाता है कि 2000 वर्ष पूर्व त्रेतायुग में देवताओं के निवेदन पर ब्रह्माजी ने नृत्य वेद तैयार किया, तभी से नृत्य की उत्पत्ति संसार में हुई। इस नृत्य वेद में सामवेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद व ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं को शामिल किया गया। जब नृत्य वेद की रचना पूरी हो गई, तब नृत्य करने का अभ्यास भरत मुनि के सौ पुत्रों ने किया।

         प्रत्येक देश की अपनी अलग संस्कृति और नृत्य संगीत होते हैं। अफ्रीका में कबीलियाई नृत्य का अपना अनोखा अंदाज़ रहता है। जबकि भारत में अनेक शास्त्रीय  नृत्य शैलियां प्रचलित हैं जैसे - कथकली, कथक, कुचिपुड़ी, भरतनाट्यम, ओडिसी, मोहनीअट्टम, मणिपुरी आदि।



         लोकशैलीबद्ध नृत्यों में राई, नौरता, बधाई, भीली, कालबेलिया नृत्य आदि प्रमुख हैं।
योरोपीय देशों में बेले, सालसा, स्टेप डांस प्रचलित हैं।




मेरे गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 30 अप्रैल 2019 में स्थान मिला है। जो कि अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस (International Dance Day दि. 29.04.2019) पर लिखा गया था।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में मेरी ग़ज़ल इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...



Friday, January 25, 2019

गीत ..... माटी मेरे सागर की - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh


मां के आंचल जैसी प्यारी ,  माटी मेरे सागर की ।।
सारे जग से अद्भुत न्यारी,  माटी मेरे सागर की ।।

🔹भूमि यही वो जहां ‘’गौर’’ ने, दान दिया था शिक्षा का
पाठ पढ़ाया  था हम सबको,  संस्कार की कक्षा का
विद्या की यह है फुलवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी..................

🔹विद्यासागर जैसे  ऋषि-मुनि की पावनता  पाती है
धर्म, ज्ञान की, स्वाभिमान की अनुपम उज्जवल थाती है
श्रद्धा, क्षमा, त्याग की क्यारी,  माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.............

🔹‘वर्णी जी’  की तपो भूमि यह, यही भूमि ‘पद्माकर’ की
‘कालीचरण’ शहीद यशस्वी, महिमा  अद्भुत सागर की
सारा जग इस पर बलिहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.................

🔹नौरादेही   में संरक्षित   वन जीवों का डेरा है
मैया  हरसिद्धी  का मंदिर, रानगिरी  का फेरा है
आबचंद की गुफा दुलारी,  माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........

🔹राहतगढ़  की छटा अनूठी ,झर-झर झरती जलधारा
गढ़पहरा,  धामौनी बिखरा ,  बुंदेली वैभव सारा
राजघाट, रमना चितहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी................

🔹एरण पुराधाम विष्णु का , सूर्यदेव हैं रहली में
देव बिहारी जी के हाथों सारा जग है मुरली में
पीली कोठी अजब सवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी....................

🔹मेरा सागर मुझको प्यारा, यहीं हुए लाखा बंजारा
श्रम से अपने झील बना कर, संचित कर दी जल की धारा
‘वर्षा’-बूंदों की किलकारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........
                    -डॉ. वर्षा सिंह
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माटी मेरे सागर की - डॉ. वर्षा सिंह