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Friday, January 8, 2021

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 16 | बात कैत दो टूक कका जू | बुंदेली ग़ज़ल संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरे कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " में पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत सोलहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर  ज़िले के कवि महेश कटारे 'सुगम' के बुंदेली ग़ज़ल संग्रह "बात कैत दो टूक कका जू" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
     
सागर : साहित्य एवं चिंतन

 पुनर्पाठ : बात कैत दो टूक कका जू
                           -डॉ. वर्षा सिंह
                            
            इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर जिले के बीना तहसील मुख्यालय में निवासरत बुंदेलखंड के चर्चित कवि महेश कटारे ‘सुगम’ के बुंदेली गजल संग्रह - ‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ को। बुंदेली एक लोकभाषा है। यह लोकभाषा बोली से भाषा तक के सफर में संघर्षरत है लेकिन इसकी साहित्य संपदा पर्याप्त समृद्ध है। यूं भी जब किसी बोली में मौलिक साहित्य सृजन होने लगता है तो वह भाषा के समीप पहुंच जाती है। यदि हिन्दी भाषा की बोलियों और उपभाषा की चर्चा की जाए तो उत्तर भारत की बोलियों ने निरंतर विकास किया है। भाषाई परिभाषा के आधार पर उत्तर भारत की जो प्रमुख बोलियां मानी गई हैं, उनमें प्रमुख हैं- ब्रज, कन्नौजी, बुंदेली, बघेली, अवधी, भोजपुरी, मगधी, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, राजस्थानी और रोहेलखण्ड में बोली जाने वाली खड़ी बोली। इन सभी बोलियों में उत्कृष्ट साहित्य सृजन किए जाने की उल्लेखनीय परम्परा चली आ रही है, जो इन बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने योग्य सिद्ध करती है। बुंदेली में एक से बढ़ कर एक काव्य सृजन किए गए हैं। चाहे वीर रस में जगनिक के ‘‘आल्ह खण्ड’’ की बात की जाए या फिर श्रृंगार रस में ईसुरी की फागों की। बुंदेली में गजब का लचीलापन है। इसने अपनी परम्परागत जातीय गरिमा को बनाए रखते हुए विभिन्न भाषाओं के शब्दों को इस तरह आत्मसात किया है कि मानों वे शब्द ठेठ बुंदेली के हों। बुंदेली में छंदबद्ध रचनाएं लिखी गईं तो छंदमुक्त रचनाएं भी लिखी गईं। दोहे, घनाक्षरी, अतुकांत कविताओं के साथ ही गजलें भी बुंदेली में लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। बुंदेली गजल के क्षेत्र में एक चिरपरिचित नाम है कवि महेश कटारे ‘सुगम’ का। 24 जनवरी 1954 को ललितपुर में जन्में कवि ‘सुगम’ मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में प्रयोगशाला तकनीशियन के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद बीना में निवासरत हैं। ‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ गजल संग्रह सन् 2018 में प्रकाशित हुआ, जिसकी गजलें कवि के बुंदेली के प्रति समर्पण और समसामयिक परिदृश्य पर पैनी निगाह की परिचायक हैं।
वर्तमान परिदृश्य व्यवस्थाओं की दृष्टि से स्वस्थ नहीं कहा जा सकता है। तरह-तरह के फर्जी बाड़े के समाचारों से अखबारों के पन्ने भरे रहते हैं। लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द के प्रति असंवेदनशील हो चले हैं। यह सब एक संवेदनशील कवि के रूप में महेश कटारे ‘सुगम’ को रोष से भर देता है। उनका यह रोष उनकी इस गजल में देखा जा सकता है-
भैया तू भौतई फर्जी है
खूब चला रओ मनमर्जी है
दुनिया भर में घूमत फिर रओ
घरे रुके की एलरजी है
काट लेत सींवौ नई जानत
एसौ जो कैसो दर्जी है
को का कै रओ कभऊं नई सुनत
फेंक देत सबकी अर्जी है

महेश कटारे की गजलों में एक खास बात यह है कि वे बुंदेली के रोजमर्रा के शब्दों को अपने शेरों में पिरोते हैं। ’ढिंगा’, ‘फुइया’, ‘ओली’, ‘कुठरिया’ जैसे खांटी बुंदेली शब्दों के साथ खड़ी बोली के ‘शुद्ध’ जैसे शब्द को बड़ी सुंदरता के साथ प्रयोग में लाते हैं, जिससे बुंदेली की विशेषता भी बनी रहती है और कथ्य की वजनदारी भी। उदाहरण देखिए-
तनक छांयरे में सुस्ता लो
भूख लगी तौ रोटी खा लो
काम लगो रेनें जीवन भर
बैठो आओ ढिंगा बतया लो
फुइया से मौड़ा मौड़ी हैं
ओली ले के इने खिला लो
सड़ रहे काय कुठरिया भीतर
बाहर आ कें शुद्ध हवा लो

गांव के विकास की बातें हर जगह की जाती हैं। अकसर आंकड़ों में गांवों कें विकास के दम भरे जाते हैं लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ अलग ही तस्वीर दिखाती है। इसी बात पर कवि कटारे प्रश्न उठाते हैं कि -
गांव अबै तक जां के तां हैं
सड़कें बिजली पानी कां हैं
काय जांय हम तीरथ करवे
घर में जब दद्दा अम्मा हैं
अपनौ ईशुर बस मेनत है
तुमखों सब विष्णु बिरमा हैं
जात धरम उर बोली बानी
झगड़े झांसे खामोखां हैं

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ व्यवस्था और राजनीति में ही दोहरापन आया हो, मानवीय आचरण में भी दोहरापन समा गया है। आज अकसर व्यक्ति अपने अधिकार की लड़ाई में अकेला ही खड़ा दिखाई पड़ता है। इस तथ्य पर महेश कटारे ने बड़ी बेबाकी से शेर कहे हैं-
अब आपस में प्यार कितै है
मनचीनौ व्यवहार कितै है
दुख में सैकर परौ आदमी
लड़वे खौं तैयार कितै है
सबरे गुड़ीमुड़ी हो जाते
जनता में हुंकार कितै है

बुंदेलखंड 2004 से ही सूखे की चपेट में रहा। जब बहुत शोर मचा तो पहली बार इलाके को 2007 में सूखाग्रस्त घोषित किया गया। 2014 में ओलावृष्टि की मार ने किसानों को तोड़ दिया। सूखा और ओलावृष्टि से यहां के किसान अब तक नहीं उबर पाए हैं। खेती घाटे का सौदा बन गई है और किसान तंगहाली में पहुंच चुके हैं। जब किसान तंगहाल होता है तो शेष व्यवसाय भी लड़खड़ाने लगते हैं। बुंदेलखंड की भुखमरी भी सुर्खियों में रही है। इस समाचार ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था कि ‘‘बुंदेलखंड में लोग घास की रोटियां बनाकर खा रहे हैं’’। बुंदेलखंड में खेती खत्म होने, उद्योग न होने और बेरोजगारी-भुखमरी के कारण पलायन की विवशता जागी। किसान दूसरे प्रांतों में मजदूरी करने को विवश हो गए। इस कटु यथार्थ को बड़े ही मार्मिक ढंग से अपनी ग़ज़ल में व्यक्त किया है महेश कटारे ने-
हो हो कें हैरान मरौ है
फांसी लगा किसान मरौ है
मरतौ नईं तौ फिर का करतौ
फसलन कौ मीजान मरौ है
अन्न उगा कें पेट भरततौ
भूखन कौ वरदान मरौ है
गांव गांव में जाकें देखौ
खेत और खरियान मरौ है


बात कैत दो टूक कका जू (बुंदेली ग़ज़ल संग्रह) - महेश कटारे 'सुगम' 


       जीवन में दिखावे की प्रवृत्ति इस कदर प्रभावी हो जा रही है कि लोग ममत्व, अपनत्व और मानवीयता को दरकिनार करने लगे हैं। ऐसे लोगों को विलासिता पर व्यय करते समय उन भूखे-प्यासे इंसानों की याद नहीं आती है। देश में न जाने कितने बच्चे, बूढ़े, महिलाएं, पुरुष भिखारियों का जीवन बिता रहे हैं। उन्हें कभी एक समय की रोटी मिल जाती है तो कभी दो-दो, तीन-तीन दिन फांके करने पड़ते हैं। आत्मकेंद्रित जीवन के चलन में वृद्ध माता-पिता के दुख-पीड़ा भी भुला दी जाती है। यह परिदृश्य किसी भी कवि की आंखों में आंसू ला सकता है। कवि महेश कटारे भी इस परिदृश्य से द्रवित हो उठते हैं। लेकिन वे आंसू बहा कर चुप नहीं रह जाते हैं वरन् ऐसे आत्मकेन्द्रित लोगों को ललकारते हैं तथा उनकी चेतना जगाने का प्रयास करते हैं-  
भूखन खौं दुत्कार भगा रये शरम करौ
पथरन खौं तुम खीर चढ़ा रये शरम करौ
अम्मा दद्दा भूखे बैठे हैं घर में
पुण्य कमाने तीरथ जा रये शरम करौ
धरम करम ईमान टांग दऔ खूंटा पै
पैसा खौं कैसे भैरा रये शरम करौ
बच्चा भूखे रो रये हैं फुटपातन पै
कुत्ता घर में बिस्कुट खा रये शरम करौ

यूं तो जीवन में अनेक समस्याएं हैं लेकिन इनमें से कई समस्याएं जिस कारण से पैदा होती हैं वह है - मंहगाई। वर्तमान समय में मंहगाई की समस्या अत्यंत विकराल रूप धारण कर चुकी है। कालाधन, जमाखोरी, भ्रष्टाचार, मुद्रा का अवमूल्यन आदि कारण गिनाए जा सकते हैं इस बढ़ती हुई मंहगाई के लिए। किन्तु मात्र कारण गिनाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। समाज का निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग मंहगाई की सबसे अधिक मार झेलता है। वह अपनी आवश्यक जरूरतें पूरी करने के लिए कर्ज लेता है और कर्ज न चुका पाने की स्थिति में या तो तिल-तिल कर मरता रहता है या फिर आत्महत्या का रास्ता ढूंढने लगता है। यह जीवन की कटुता भरी सच्चाई है। मंहगाई जीवन की सरसता को किस तरह सोख लेती है वह महेश कटारे के इन शेरों में महसूस किया जा सकता है -
सुख कौ पन्ना मोरौ भैया
रऔ कोरो को कोरौ भैया
हत्यारी ई मेंगाई नें
सब कौ गरौ मरोरौ भैया

‘‘बात कैत दो टूक कका जू’’ गजल संग्रह की गजलों में वह लोकभाषाई आत्मीयता है जो इन्हें बार-बार पढ़ने के लिए उकसाती है। इस संग्रह की गजलों में महेश कटारे ने ग्रामीण और कस्बाई जिन्दगी की समस्याओं को बिना किसी लागलपेट के सामने रखा है। वे भूख, गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक तथा आर्थिक विषमता जैसी समस्याओं पर खुल कर कलम चलाते दिखाई देते हैं। ये सभी मुद्दे समसामयिक गजलकारों की गजलों में बखूबी देखी जा सकती है। लेकिन महेश कटारे की गजलें यदि उनमें अपनी अलग पहचान बना पाई हैं तो उसका मूल कारण है उन गजलों का बुंदेली में लिखा जाना और यही इसके पुनर्पाठ का सबसे बड़ा प्रेरक तत्व भी है। अपनी बोली का सोंधापन भला किसे नहीं भाता।

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( दैनिक, आचरण  दि.08.01.2021)
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Thursday, August 13, 2020

बुंदेली लोकगीतों में स्वाधीनता का स्वर | स्वतंत्रता दिवस | डॉ. वर्षा सिंह

 
क्षेत्र की संस्कृति और सभ्यता को पहचानने में लोकगीतों का अभूतपूर्व योगदान रहता है। बुंदेलखंड की पहचान भी यहां की लोक भाषा बुंदेली में गाए जाने वाले लोकगीत हैं। बुंदेली बोली बहुत मीठी, सरल, सहज, प्रेम और लालित्य से भरी बोली-भाषा है , जिसकी अपनी अलग पहचान है। 
     लोकगीतों में लोक अर्थात् जनजीवन का सच्चा दर्द, रस-उल्लास, आनंद-उत्सव, रीति-रिवाज, लोक परंपराएं, राग-विराग और सुख-दुख के आख्यान साथ ही आत्मसम्मान, आत्मगौरव और स्वाधीनता की अनकही बातें व्यक्त होती हैं। किसी जनपद या ग्रामांचल के लोकगीतों में ढलकर हवा में गूँज उठने वाले स्वर ही गाँव की सीधी-सादी अनपढ़ जनता के गीत हैं, पर वे इस भारत देश की महान संस्कृति और हजारों बरस पुरानी लोक परंपराओं के वाहक भी हैं, जिनसे इस देश की कोटि-कोटि जनता के मन और आत्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। अलग-अलग बोलियाँ और भाषा बोलने वाले जनपद और ग्रामांचलों के ये लोकगीत मिलकर एक ऐसा साझा पुल बनाते थे, जिसे समझे बिना इस महान देश की हजारों बरस पुरानी सभ्यता और संस्कृति को समझना असंभव है। ज्यादातर लोकगीत गांव की पृष्ठभूमि से उपजे हैं। लेकिन ‘लोक’ की परिव्याप्ति ज्यादा है तथा वह एक ऐसी चेतना की उपज है जो मनुष्य और मनुष्य में फर्क नहीं करती, ग्रामीण और शहरी जीवन में भी नहीं। लोक साहित्य पर सबसे पहला अधिकार जनता का है, ‘धरतीपुत्रों’ का है. पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी, तथाकथित संस्कृति चिंतक और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर इनकी बारीक-बारीकतर व्याख्याएँ भले ही कर लें, पर रहेंगी ये ग्राम्य जीवन की धरोहर ही।

चिर-परिचित शब्द, चिर-परिचित बातें, चिर-परिचित स्वर... यही लोकगीत की शक्ति है। कोई गीत पहाड़ी पगडंडी के समान ऊँचा-नीचा तो कोई समतल प्रदेश के दूर तक फैले हुए क्षितिज की छवि लिए हुए, नीरव, उदास दोपहरी के गीतों का प्रतिरूप होता है तो कोई गीत रात्रि के गीतों का प्रतिरूप। समय-चक्र के साथ लोकगीत के पहिए निरंतर चलते रहते हैं।

बुंदेलखंड क्षेत्र हमेशा से वीरता का प्रतीक रही है। महाराज छत्रसाल बुंदेला ने मुगलशासक औरंगजेब के समक्ष कभी घुटने नहीं टेके। 
हार ना मानी छत्ता तैंने
मुगलन को दई धूर चटाय।
कभऊं ना हिम्मत हारी तनकऊ
महाबली राजा कहलाय।

बुंदेलखंड में "आल्हा" गायन की परम्परा आज भी कायम है। प्रसिद्ध आल्ह- रुदल तेईस मैदान और बावन लड़ाइयों की सप्रसंग व्याख्या है, जिसको सुनकर ही लोग वीरता की भावना से ओत- प्रोत हो जाते हैं। आल्ह खंड में प्रेम और युद्ध के प्रसंग घटना- क्रम में सुनाये जाते हैं। पूरे काव्य में नैनागढ़ की लड़ाई सबसे रोचक व लोकप्रिय मानी जाती है।

अन्य कई लोक- गाथाओं की तरह आल्ह- रुदल भी समय के साथ अपने मूल रुप में नहीं रह गया है। इसने अपने आँचल में नौं सौ वर्ष समेटे हैं। विस्तार की दृष्टि से यह राजस्थान के सुदूर पूर्व से लेकर आसाम के गाँवों तक गाया जाता है। इसे गानेवाले "अल्हैत' कहलाते हैं। साहित्यिक दृष्टि से यह "आल्हा' छंद में गाया जाता है। हमीरपुर (बुंदेलखंड) में यह गाथा "सैरा' या "आल्हा' कहलाती है। इसके अंश "पँवाड़ा', "समय' या "मार' कहे जाते हैं। सागर, दमोह में भी आल्हा गायकों की कमी नहीं। वीरता के लोकमूल्य को उजागर करती ' आल्हा' की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-

मानसु देही जा दुरलभ हैस आहै समै न बारंबार ।
पात टूट कें ज्यों तरवर को कभऊँ लौट न लागै डार ।।
मरद बनाये मर जैबे कों खटिया पर कें मरै बलाय ।
जे मर जैहैं रनखेतन मा, साकौ चलो अँगारुँ जाय ।।

इन पंक्तियों में युद्ध के मैदान में वीरतापूर्वक जूझ जाने को परम मूल्य माना गया है और उसी में व्यक्ति और समाज के युगधर्मी कल्याण अंतर्निहित हैं । विदेशी आक्रमणकारियों से सुरक्षा में सभी का हित है और मनुष्य की देह को दुर्लभ मानने में मानव और मानवता की गरीमा सुरक्षित है । यूद्ध में मृत्यु का वरण करने से कीर्ति पाने का लोकविश्वास बहुत प्राचीन है और जब तक युद्ध रहेगा, तब तक बना रहेगा । इसी तरह शरीर को पेड़ के पत्ते की तरह नश्वर मानना भी शाश्वत लोकमूल्य है, जो आज भी लोकप्रचलित है।

बुंदेलखंड की प्रसिद्ध लोकगाथाएं
'मनोगूजरी' और 'मथुरावली' नारी के बलिदान की प्रामाणिक गवाह हैं । मथुरावली खड़ी-खड़ी जल जाती है, उसका भाई कहता है-
 राखी बहना पगड़ी की लाज, 
बिहँस कहें राजा बीर, 
ठाँड़ी जरै मथुरावली ।
     दरअसल पगड़ी पुरुष के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा की प्रतीक है। पगड़ी की लाज रखना उस समय का प्रमुख लोकमूल्य था, क्योंकि अनेक लोकगीतों में इसे प्रधानता मिलती है । 

    स्वाधीनता संग्राम की बुनियादी प्रेरणा लोकगीतों - लोकगाथाएं से मिलती रही है। 
 सन् 1857 के विप्लवियों की वीरता पर एक से एक अद्भुत लोकगीत गाए गए। कई गीतों में वीर कुँवरसिंह और रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का रोमांचकारी बखान है। ऐसे ही एक गीत में राजा बेनीमाधवबख्श सिंह की वीरता का अद्भुत का वर्णन है। अंग्रेज बार-बार चिट्ठी लिखकर उन्हें अपने साथ मिलने के लिए मना रहे हैं, उधर उनकी वीरता और पराक्रम ने अंग्रेजी सेना को दहला दिया है-

राजा बहादुर सिपाही अवध में,
धूम मचाई मोरे राम !
लिख-लिख चिठिया लाट ने भेजा,
आव मिलो राना भाई मोरे राम !
जंगी खिलत लंदन से मँगा दूँ,
अवध में सूबा बनाई मोरे राम !
जब तक प्राण रहें तन भीतर,
तुम कन खोद बहाई मोरे राम !

.... और 1940 के दशक में लोकप्रिय यह लोकगीत देखें, जिसमें तिरंगे झंडे के प्रति उच्च सम्मान की भावना झलकती है -

तीन रंग को प्यारो तिरंगा
ईको मान रखो भैय्या।
देस हमाओ जान से प्यारो
इतनो भान रखो भैय्या ।

इस लोकगीत में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति नफ़रत की भावना दिखाई देती है -

गोरी मेम बनो ना बिन्ना
चलो चलिए भरन खों पनिया
हमसे कभऊं ना करियो बिन्ना
लाट- गवरनर की बतिया

... और यह एक अन्य लोकगीत - 

विपदा सहत है धरती मइया, 
कोऊ बखर हांके तो कोेऊ हाकें गइंया
अंगरेजन की हुकुम हुकूमत
हमाई लेत कौनऊ खबर नइंया

डांडी मार्च के समय जनमन को प्रतिध्वनित करने वाला यह लोकगीत भी सर्वत्र गूंजा था- 
 
काहे पे आवें बीर जवाहर, काहे पे गांधी महराज? 
काहे पे आवें भारत माता, काहे पे आवे सुराज ?
  
घोड़े पे आवें बीर जवाहर, पैदल गांधी महराज। 
हाथी पे आवें भारत माता डोली पे आवे सुराज।

     लोकगीत लोक के गीत हैं। जिन्हें कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा लोक समाज अपनाता है। बुंदेलखंड के ये लोकगीत भी बुंदेलखंड ही नहीं वरन् पूरे देश की धरोहर हैं।
            ---------------------

#स्वतंत्रता #स्वाधीनता #आत्मसम्मान #आत्मगौरव #गांधी #नेहरू #बुंदेलखंड #बुंदेली #लोकगीत #सागर #आल्हा
#मनोगूजरी #मथुरावली #छत्रसाल




Thursday, July 9, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | प्रिय है धरा बुंदेली | डॉ. वर्षा. सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों, मेरी माता जी, जो कि हिन्दी की जानी-मानी कवयित्री एवं लेखिका हैं - डॉ. विद्यावती "मालविका", वे मालवा क्षेत्र के उज्जैन की बेटी हैं और विवाहोपरांत उनके जीवन की लगभग 60 वर्ष की अवधि बुंदेलखंड के पन्ना और फिर अब सागर में व्यतीत हो रही है। डॉ. विद्यावती जी द्वारा मध्यप्रदेश के मालवा और बुंदेलखंड क्षेत्र की संस्कृतियों के प्रति स्नेहांजलि स्वरूप रचित यह गीत आज यहां प्रस्तुत है -

प्रिय है धरा बुंदेली
          - डॉ. विद्यावती "मालविका"

मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।
शिप्रा मेरी बहिन सरीखी, सागर झील सहेली।।

उज्जैयिनी ने सदा मुझे स्नेह दिया
विक्रम की धरती ने मेरा मान किय,
बुंदेली वसुधा ने मुझे दुलार दिया
गौर भूमि ने मुझे सदा सम्मान दिया,

सदा लुभाती मुझको सुंदर ऋतुओं की अठखेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।

महाकाल के चरणों में बचपन बीता 
रहा न मेरा अंतस साहस से रीता,
यहां बुंदेली संस्कृति को अपनाने पर
हुई समाहित मेरे मन में ज्यों गीता,

ऋणी रहूंगी मैं नतमस्तक, बांधे युगल हथेली।
मैं हूं मालव कन्या मुझको, प्रिय है धरा बुंदेली।।
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Dr. Vidyawati "Malvika"
#गीत #बुंदेलखंड #मालवा #सागर #पन्ना #कवयित्री

Sunday, August 25, 2019

"बुन्देली लोक संस्कृति तथा उसके संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका" विषय पर परिचर्चा आयोजित - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     दिनांक 23.08.2019 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर सागर शहर के वृन्दावन वार्ड, गोपालगंज स्थित सत्यम कला एवं संस्कृति संग्रहालय में  "बुन्देली लोक संस्कृति तथा उसके संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका" विषय पर आयोजित परिचर्चा में मुझे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ वर्षा सिंह और बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को सम्मिलित होकर अपने विचार रखने का सुखद अवसर मिलाा। विशेष बात यह  है कि यह संग्रहालय, संग्रहालय के संस्थापक एवं अध्यक्ष श्री दामोदर अग्निहोत्री के निजी प्रयासों से स्थापित किया गया है, एवं इसके संरक्षक श्री उमाकांत मिश्र हैं।
           डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने कहा कि संग्रहालय भविष्य से अतीत को जोड़ने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आने वाली पीढ़ियों को अपने अतीत की विरासत से जोड़ने का महान कार्य यहां किया जा रहा है। ब्रिटिश-मुगल रियासतों के सिक्के, तेंदू और पलाश पर मुद्रण, 1899 के पोस्ट कार्ड व लिफाफे, आजादी पूर्व के समाचार पत्र और बुंदेलखण्ड संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं को सहजने काम दामोदर अग्रिहोत्री ने किया है। दामोदर अग्रिहोत्री ने घर पर ही सत्यम बुंदेली संग्रहालय बनाया है। यहां वे  प्राचीन विरासत से जुड़ी वस्तुओं को सहेज कर रखे हैं। अपने संबोधन में दामोदर अग्रिहोत्री ने बताया कि उन्हें बचपन से ही ऐसी वस्तुएं जोड़ने का शौक था।
तस्वीरें उसी अवसर की।
















   

















Tuesday, May 7, 2019

बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
     
हिंदू कैलेन्डर के वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के रूप में एक पर्व मनाया जाता है।
अक्षय तृतीया को बुंदेलखंड में अक्ती भी कहते हैं। साथ ही इस दिन बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया पर ग्रामीण क्षेत्रों में गुड्डा और गुड्डी की शादी रचाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है। गुड्डा और गुड्डी को यहां बुंदेली बोली में पुतरा और पुतरिया कहा जाता है। घर - घर मंडप सजाकर बुंदेलखंड की परंपरा निभाई जाती है।
# साहित्य वर्षा

बच्चों में अक्षय तृतीया यानी अक्ती का उत्साह सप्ताह भर पहले से ही देखा जाने लगता है। बच्चे बाजार से मिट्टी के गुड्डा गुड्डी , यानी पुतरा - पुतरिया खरीदकर उनके ब्याह की पूरी तैयारी करते हैं।  विधि विधान से विवाह की रस्में सम्पन्न कराई जाती हैं। बड़े- बुजुर्ग भी उनका भरपूर सहयोग करते हैं।
माना जाता है कि इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने के लिए पंचागं देखने की जरूरत नहीं है। अक्षय तृतीया पर किए गए कार्यों का कई गुना फल प्राप्‍त होता है। इस साल अक्षय तृतीया पर शनि की चाल बदलना भी एक विशेष घटना है जिसका प्रभाव सभी राशियों पर अगले छ: महीने तक देखने को मिलेगा। इसे अखतीज के नाम से भी जाना जाता है।
# साहित्य वर्षा

जिस तिथि का कभी क्षय नहीं होता उसे अक्षय कहा जाता है चूंकि कभी क्षय न होने वाली तिथि बैसाख शुक्ल तृतीया को मानी जाती है। इसलिए यह तिथि अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है।

पुराणों में बताया गया है कि यह बहुत ही पुण्यदायी तिथि है इसदिन किए गए दान पुण्य के बारे में मान्यता है कि जो कुछ भी पुण्यकार्य इस दिन किए जाते हैं उनका फल अक्षय होता है यानी कई जन्मों तक इसका लाभ मिलता है।
# साहित्य वर्षा

भगवान विष्‍णु के छठें अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम का जन्‍म हुआ था। परशुराम ने महर्षि जमदाग्नि और माता रेनुकादेवी के घर जन्‍म लिया था। यही कारण है कि अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्‍णु की उपासना की जाती है। इसदिन परशुरामजी की पूजा करने का भी विधान है।
अक्षय तृतीया के दिन ही पांडव पुत्र युधिष्ठर को अक्षय पात्र की प्राप्ति भी हुई थी। इसकी विशेषता यह थी कि इसमें कभी भी भोजन समाप्त नहीं होता था।
अक्षय तृतीया के अवसर पर ही म‍हर्षि वेदव्‍यास जी ने महाभारत लिखना शुरू किया था। महाभारत को पांचवें वेद के रूप में माना जाता है। इसी में श्रीमद्भागवत गीता भी समाहित है।
भगवान परशुराम # साहित्य वर्षा

इस दिन मां गंगा स्वर्ग से धरती पर अवतरीत हुई थीं। राजा भागीरथ ने गंगा को धरती पर अवतरित कराने के लिए हजारों वर्ष तक तप कर उन्हें धरती पर लाए थे। कहा जाता है कि इस दिन पवित्र गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

कहते हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है जिससे अक्षय पुण्य मिलता है।

 ..... किन्तु बात पुतरा- पुतरिया के विवाह तक सीमित नहीं रहती। जी हां, आज अक्षय तृतीया है .... और बाल विवाह जैसी कुरीति को अपराध की श्रेणी में रखे जाने के बावजूद कुछ रूढ़िवादी व्यक्ति अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर इस अपराध को करने- कराने में ज़रा भी नहीं झिझकते। जबकि  बाल विवाह के दुष्परिणाम हमारे सामने हैं, जिनमें शिशु तथा मातृ मृत्यु दर में वृद्धि होना प्रमुख है।
# साहित्य वर्षा

     अक्षय तृतीया को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। 'मुहूर्त' अर्थात् किसी भी कार्य को करने का श्रेष्ठतम समय। शास्त्रानुसार मास श्रेष्ठ होने पर वर्ष का, दिन श्रेष्ठ होने पर मास का, लग्न श्रेष्ठ होने पर दिन का एवं मुहूर्त श्रेष्ठ होने पर लग्न सहित समस्त दोष दूर हो जाते हैं। हमारे शास्त्रों में शुभ मुहूर्त्त का विशेष महत्त्व बताया गया है। इसीलिए अक्षय तृतीया के अबूझ मुहूर्त में अनेक विवाह सम्पन्न कराये जाते हैं। अनेक स्थानों पर, ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां अभी भी अशिक्षा और अंधविश्वास के कारण अनेक कुरीतियां व्याप्त हैं, बाल विवाह कराये जाते हैं।
      आज अक्षय तृतीया के अवसर पर  बाल विवाह के विरुद्ध जागरूकता केन्द्रित मेरे बुंदेली गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 07 मई 2019 में स्थान मिला है।

युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

http://yuvapravartak.com/?p=14485

मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...

बचपन न छीनो- छिनाओ
           - डॉ. वर्षा सिंह

बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !
अक्षय तीजा खूबई मनइयो
पुतरा-पुतरियन को ब्याओ रचइयो
नबालिग को ब्याओ न कराओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !

खेलत- पढ़त की जोई उमरिया
मूड़े न धरियो भारी गगरिया
अबई से दुलैया न बनाओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो - छिनाओ मोरी बिन्ना !

अठरा बरस की मोड़ी हो जैहे
इक्किस को मोड़ा जब मिल जैहे
माथे पे सेहरा बंधाओ मोरी बिन्ना
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !

बच्चन की शिक्छा-दिक्छा कराओ
जिम्मेदारी को पाठ पढ़ाओ
मड़वा तबई गड़ाओ  मोरी बिन्ना !
बचपन न छीनो - छिनाओ मोरी बिन्ना !

छोटी उमर को ब्याव बुरो है
जिनगी भर को कष्ट बनो है
समझो जा बात समझाओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !
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#बुंदेली वर्षा

बुंदेली गीत - डॉ. वर्षा सिंह # साहित्य वर्षा

Friday, March 22, 2019

विश्व जल संरक्षण दिवस पर बुंदेली लेख -पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
बुंदेली लेख     
     पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ
                      
             - डॉ. वर्षा सिंह

एक दिना बे हते  जब हमई ओरें शान से कहत ते के -
बुंदेलन की सुनो कहानी, बुंदेलन की बानी में ....
पानीदार इते हैं सबरे,  आग इते के पानी में ।
अब जे दिना आ गए हैं के पानीदार तो सबई हैं, पर पानी खों तरस रए। ताल, तलैया, कुआ, बावड़ी, बंधा-बंधान सबई सूखत जा रये। अपने बुंदेलखण्ड में पानी की कमी कभऊ ने रही। बो कहो जात है न, के -
इते ताल हैं,  उते तलैया, इते कुआ, तो उते झिरैया।।
खेती कर लो, सपर खोंर लो, पानी कम न हुइये भैया।।


मगर पानी तो मानो रूठ गओ है। औ रूठहे काए न, हमने ऊकी कदर भुला दई। हमें नल औ बंधान से पानी मिलन लगो, सो हमने कुआ, बावड़ी में कचरा डालबो शुरू कर दओ। हम जेई भूल गए के जे बेई कुआ आएं जिनखों पूजन करे बगैर कोनऊ धरम को काम नई करो जात हतो। कुआ पूजबे के बादई यज्ञ-हवन होत ते। नई बहू को बिदा की बेरा में कुआ में तांबे को सिक्का डालो जात रहो और रस्ते में पड़बे वारी नदी की पूजा करी जात हती। जो सब जे लाने करो जात हतो के सबई जल के स्रोतन की इज्ज्त करें, उनको खयाल रखें। पानी से नाता जोड़बे के लाने जचकी भई नई-नई मां याने प्रसूता को कुआ के पास ले जाओ जात है औ कहूं-कहूं मां के दूध की बूंदें कुआ के पानी में डरवाई जात हैं। काए से के जैसे मां अपने दूध से बच्चे को जिनगी देत है, ऊंसई कुआ अपने पानी से सबई को जिनगी देत है। सो, प्रसूता औ कुआ में बहनापो सो बन जात है। पर हमने तो मानो जे सब भुला दओ है। लेकिन वो कहो जात है न, सुबह को भूलो, संझा घरे आ जाए तो भुलो ने कहात आए। हमें पानी को मोल समझनई परहे। पानी नईं सो जिंदगानी नईं। सो भैया, जे गनीमत आए के अब पानी बचाबे के लाने  सबई ने कमर कस लई है। कुआ, बावड़ी, ताल, तलैया, चौपड़ा सबई की सफाई होन लगी है। जो अब लों आगे नई आए उनखों सोई आगे बढ़ के पानी बचाबे में हाथ बंटाओ चाइए। वाटर हार्वेस्टिंग से बारिश में छत को पानी जमीन में पोंचाओ, नलों में टोटियां लगाओ, कुआ, बावड़ी गंदी ने करो औ पानी फालतू ने बहाओ फेर मजे से जे गीत गाओ-
पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ ।
कुंइया तलैया खों फेर के जगाओ।।
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- डॉ. वर्षा सिंह




होली की हार्दिक शुभकामनाएं !!!

Dr. Varsha Singh

फागु की भीर ,अहीरिन ने गहि, गोविन्द लै गई भीतर गोरी।
हाय करी मन की पद्माकर, उपर नाई अबीर की झोरी ।
छीने पीतांबर कम्मर तैं, सु बिदा कर दई मीडि कपोलन रोरी।
नैन नचाय,कही मुसकाय,लला फिर आइयो खेलन होरी ।
 - कवि पद्माकर
सागर शहर अपनी अनेक मौलिकताओं से जाना जाता है । उनमे से एक है यहाँ के साहित्यकारों की होली । रीति काल के महाकवि पद्माकर का जन्म स्थान सागर है। उनकी जन्मस्थली के निकट सागर झील के तट पर स्थथित चकराघाट पर उनकी आदमकद मूर्ति स्थापित है।
        होली के दिन सागर नगर के साहित्यकार  सबसे पहले चकराघाट पर एकत्रित होकर महाकवि पद्माकर की मूर्ति तालाब के जल से स्नान कराते  है जिसमें कभी वे स्वयं नहाते थे, फिर पद्माकर की मूर्ति को तिलक लगाकर उस पर माल्यार्पण करते हैं और इसके बाद ही  आपस में तिलक लगाकर  होली खेलते हैं।


....ऐसे अनूठे अंदाज में बुंदेलखंड में सतरंगी छटा के त्यौहार होली पर सांस्कृतिक परंपराओं की छटा देखते बनती है.
होली पर मेरे यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह के कुछ बुंदेली छंद यहां प्रस्तुत हैं....

बुंदेली छंद

पीर मोसे मन की कही न जाए मोरी बिन्ना, बिरहा की अगन में जिया जरो जाए है ।।
जाने कैसे निठुर से नैना भये चार मोरे,
देख दशा मोरी मंद मंद मुस्काए है ।।
फागुनी बयार चली खेत गांव गली गली,
रंग की उमंग में तरंग चढ़ी जाए है ।।
टेरू तो सुनत नइयां बतियां मोरी कछु
दूर दूर भाग रये मों सो बिचकाय है।।

मोहे ना सजाओ मोरे माथे ना लगाओ बेंदी पिया मोसे रूठे मोहे कछु नहीं भाये है ।।
ऐसी कौन भूल गई मोसे मैं विचारूं भौत
बेर बेर सोचूं कछु समझ न आए है ।।
द्वार सारे बंद भये सखी सुख की गैल के
दुख ने किवरिया पे तारे चटकाए हैं ।।
जिया को उबारे कौन तारन की कुची धरे
पिया इत उत फिरें अब लौं रिसाए हैं।।

मैंने तो मनाओ बहुत चार बेर दस बेर
कहां लौं मनाऊं मोरे होंठाई पिराने हैं।।
सुने ना सुनाएं कछु मनई मगन रहें,
जाने की की बातन में सुध बिसराने हैं।।
मोरे तो जिया में जेई उपजत बेर बेर ,
नैनवा पिया के कहीं और उरझाने हैं ।।
मोहे जा बतारी बिन्ना तोहे है कसम मोरी,
मोसे नोनी को है,जा पे पिया जी रिझाने हैं।।
- डॉ. वर्षा सिंह

   होली पर्व पर मंगलकामनाएं.

       बुंदेलखंड में होली की हर जगह पर धूम रहती है। बुंदेलखंड में फागुन के महीने में गांव की चौपालों में 'फाग' की अनोखी महफिलें जमती हैं, जिनमें रंगों की बौछार के बीच गुलाल-अबीर से सने चेहरों वाले फगुआरों के होली गीत (फाग) जब फिजा में गूंजते हैं तो ऐसा लगता है कि श्रृंगार रस की बारिश हो रही है।
फाग के बोल सुनकर बच्चे, जवान व बूढ़ों के साथ महिलाएं भी झूम उठती हैं। 
फाग-सी मस्ती का नजारा कहीं और देखने को नहीं मिलता है। सुबह हो या शाम गांव की चौपालों में सजने वाली फाग की महफिलों में ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार के साथ उड़ते हुए अबीर-गुलाल के साथ मदमस्त किसानों बुंदेलखंडी होली गीत (फाग) गाने का अंदाज-ए-बयां इतना अनोखा और जोशीला होता है कि श्रोता मस्ती में चूर होकर थिरकने, नाचने पर मजबूर हो जाते हैं।
फाग सुनकर उनकी दिनभर की थकावट एक झटके में दूर हो जाती है और व मस्ती से भर उठते हैं।  कवि ईसुरी की फाग के बोल किसानों के दिल की आवाज है। फाग किसानों के दिल दिमाग में छा जाती है।
बुंदेलखंड में मध्यप्रदेश सहित उत्तरप्रदेश के भी कई जिले व गांव आते हैं। जिनमें फागुन के महीनों में ऋतुराज बसंत के आते ही जब टेसू के पेड़ लाल सुर्ख फूलों से लद जाते हैं, तब वातावरण में मादकता छा जाती है और पूरा महौल रोमांच से भर जाता है तब शुरू होती है फाग की महफिलें। गांव-गांव की चौपालों में बुंदेलखंड के मशहूर लोक कवि ईसुरी के बोल फाग की शक्ल में फिजा में गूंजकर किसानों को मदमस्त कर देते हैं।

 कवि ईसुरी के फागों में जादू है। दिनभर की मेहनत-मजदूरी करके शाम को जब थका-हारा किसान वापस आता है, तब फाग की महफिलों की मस्ती उसकी पूरी थकान दूर कर उसे तरो-ताजा कर देती है।
बुंदेलखंड में फागुन को महोत्सव के तौर पर मनाने की पुरानी रवायत है। बसंत से लेकर होली तक इस इलाके के हर गांव की चौपालों में फागों की धूम मची रहती है जिससे हर जगह मस्ती छाई रहती है।


        मौज का यह आलम होता है कि कहीं 80 साल का बूढ़ा बाबा बांसुरी से फाग की धुन निकालता नजर आता है तो कहीं 12 साल का छोटा बच्चा नगाड़ा बजाकर फाग शुरू होने का ऐलान करता दिखाई देता है तो महिलाएं भी इस मस्ती में पीछे नहीं रहती हैं। वे भी एक-दूसरे को रंग-अबीर लगाती हुईं फाग के विरह गीत गाकर माहौल को और भी रोमांचक बना देती हैं।
     फाग में विरह, श्रृंगार, ठिठोली और वीर रस भरे गीत गाए जाते हैं इसलिए फाग का जादू बुंदेली किसानों के सिर चढ़कर बोलता है।

           बसंत से लेकर होली तक फाग की फुहारों से पूरा बुंदेलखंड सराबोर हो जाता है। ऐसा लगता है कि जैसे यहां श्रृंगार का देवता उतर आया हो। इस इलाके में सभी उम्र के लोग फाग में इतना मदमस्त हो जाते हैं कि यहां पर 'फागुना में बाबा देवर लागे' की कहावत सच लगने लगती है।

     ईसुरी ने रजऊ के माध्यम से बुंदेलखंड की गरिमामयी नारी जीवन के विविध चरणों का चित्रण किया है। बुन्देली माटी के यशस्वी कवि ईसुरी की फागें कालजयी हैं।नारी चित्रण की सहजता, स्वाभाविकता, जीवन्तता, मुखरता तथा सात्विकता के पञ्चतत्वों से ईसुरी ने अपनी फागों का श्रृंगार किया है। ईसुरी ने अपनी प्रेरणास्रोत ‘रजऊ’ को केंद्र में रखकर नारी-छवियों के मनोहर शब्द-चित्र अंकित किये हैं। किशोरी रजऊ चंचलतावश आते-जाते समय घूँघट उठा-उठाकर कनखियों से ईसुरी को देखते हुए भी अनदेखा करना प्रदर्शित करते हुए उन्हें अपनी रूप राशि के दर्शन सुअवसर देती है:-
चलती कर खोल खें मुइयाँ रजऊ वयस लरकइयाँ
हेरत जात उँगरियन में हो तकती हैं परछइयाँ
लचकें तीन परें करया में फरकें डेरी बइयाँ
बातन मुख झर परत फूल से जो बागन में नइयाँ
धन्य भाग वे सैयाँ ईसुर जिनकी आयँ मुनइयाँ

बुंदेली लोक कवियों ने फाग गीतों पर कुछ ज्यादा ही कलम चलाई है। लोक कवि ईसुरी की फागों के रंग हर चौपाल व मंदिरों में बिखरते हैं। ब्रज एवं अवध क्षेत्र के मंदिरों में भी इन फागों की धूम रहती है।

भींजी फिरे राधिका रंग में, मन मोहन के संग में,
रंग की धूमल धाम मचा दई ब्रज की सब गलियन में,
कोऊ माजूम धतूरा फांके, कोई छक दई भंग में,
तन कपड़ा गए ऊंघर ईसुरी करी ढाक सब रंग में।’
      - ईसुरी
               ईसुरी द्वारा रचित यह फाग जहां राधिका एवं श्रीकृष्ण के प्रेम को दर्शाती है, वहीं होली के हुल्लड़ को भी अभिव्यक्त करती है। इसी प्रकार संत कवि चंद्रसखी का फाग गीत ‘होरी खेलन आयो श्याम आज जाए रंग में बोरो री’ को भी ब्रज एवं बुंदेलखंड के मंदिरों में संगीतज्ञों एवं फाग कलाकारों द्वारा गया जाता है।
'नईयाँ रजऊ तुमारी सानी सब दुनियाँ हम छानी।
सिंघल दीप छान लओ घर-घर, ना पदमिनी दिखानी।
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन, खोज लई रजधानी।
रूपवंत जो तिरियाँ जग में, ते भर सकतीं पानी।
बड़ भागी हैं ओई ‘ईसुरी’ तिनकी तुम ठकुरानी।।
      - ईसुरी

           कवि प्रकाश का फाग गीत ‘मौं पर जो रंग जिते निहारों, उते बोई रंग डारो’ भी खूब पसंद किया जाता है। कई बुंदेली कवियों के फाग गीत हिंदी फिल्मों में भी गाए गए हैं। बुंदेलखंड के भक्ति कालीन युग के बुंदेली कवि पद्माकर व्यास, हरीराम व्यास, मदनेश एवं वर्तमान में महाकवि अवधेश ने कई बेमिसाल फाग गीत लिखे हैं, जो आज बुंदेलखंड की फाग गायकी की शान हैं।

हम पे नाहक रंग न डारो, घरे न प्रीतम प्यारो ।
फीकी फाग लगत बलम बिन, मन मे तुमई बिचारो ।
अतर गुलाल अबीर न छिरको, पिचकारी न मारो ।
ईसुर सूझत प्रान पति बिन, मोय जग मे अधियारो ।।
              - कवि  ईसुरी
 डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का बुंदेली बोली में लिखा आलेख बहुत रोचक है -
http://epaper.patrika.com/c/8957514