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Sunday, January 26, 2020

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं - डॉ. वर्षा सिंह


🇮🇳 गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🇮🇳
🇮🇳♥🇮🇳 🙏🇮🇳♥🇮🇳🙏🇮🇳♥🇮🇳

शान तिरंगा है, अपनी आन तिरंगा है ।
सारी दुनिया से कह दो सम्मान तिरंगा है।

वीरों ने कुर्बानी दे कर इसे सजाया  है,
देशभक्ति गौरवगाथा का गान तिरंगा है।

हम भारत के वासी, हमको निर्भय रहना है,
हर इक भारतवासी का अभिमान तिरंगा है।

लोकतंत्र विश्वास हमारा, सांस भारती हैै,
अमृत है गणतंत्र और वरदान तिरंगा है।

संविधान के प्रति निष्ठा पहचान हमारी है
रहे सदा आज़ाद देश,  ईमान तिरंगा है।

जाति-धर्म, भाषाएं, बोली ढेरों हैं लेकिन
सबके दिल की एक कथा, उन्वान तिरंगा है

"वर्षा" हमने जन्मभूमि को मां का मान दिया,
रहे सदा सबसे ऊंचा, अरमान तिरंगा है।

                         - डॉ. वर्षा सिंह

🇮🇳♥🇮🇳♥🇮🇳♥🇮🇳♥🇮🇳♥🇮🇳


प्रिय मित्रों,
      गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ❤🇮🇳❤
      मेरी ग़ज़ल को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 26 जनवरी 2020 में स्थान मिला है।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=24567








Friday, March 22, 2019

होली की हार्दिक शुभकामनाएं !!!

Dr. Varsha Singh

फागु की भीर ,अहीरिन ने गहि, गोविन्द लै गई भीतर गोरी।
हाय करी मन की पद्माकर, उपर नाई अबीर की झोरी ।
छीने पीतांबर कम्मर तैं, सु बिदा कर दई मीडि कपोलन रोरी।
नैन नचाय,कही मुसकाय,लला फिर आइयो खेलन होरी ।
 - कवि पद्माकर
सागर शहर अपनी अनेक मौलिकताओं से जाना जाता है । उनमे से एक है यहाँ के साहित्यकारों की होली । रीति काल के महाकवि पद्माकर का जन्म स्थान सागर है। उनकी जन्मस्थली के निकट सागर झील के तट पर स्थथित चकराघाट पर उनकी आदमकद मूर्ति स्थापित है।
        होली के दिन सागर नगर के साहित्यकार  सबसे पहले चकराघाट पर एकत्रित होकर महाकवि पद्माकर की मूर्ति तालाब के जल से स्नान कराते  है जिसमें कभी वे स्वयं नहाते थे, फिर पद्माकर की मूर्ति को तिलक लगाकर उस पर माल्यार्पण करते हैं और इसके बाद ही  आपस में तिलक लगाकर  होली खेलते हैं।


....ऐसे अनूठे अंदाज में बुंदेलखंड में सतरंगी छटा के त्यौहार होली पर सांस्कृतिक परंपराओं की छटा देखते बनती है.
होली पर मेरे यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह के कुछ बुंदेली छंद यहां प्रस्तुत हैं....

बुंदेली छंद

पीर मोसे मन की कही न जाए मोरी बिन्ना, बिरहा की अगन में जिया जरो जाए है ।।
जाने कैसे निठुर से नैना भये चार मोरे,
देख दशा मोरी मंद मंद मुस्काए है ।।
फागुनी बयार चली खेत गांव गली गली,
रंग की उमंग में तरंग चढ़ी जाए है ।।
टेरू तो सुनत नइयां बतियां मोरी कछु
दूर दूर भाग रये मों सो बिचकाय है।।

मोहे ना सजाओ मोरे माथे ना लगाओ बेंदी पिया मोसे रूठे मोहे कछु नहीं भाये है ।।
ऐसी कौन भूल गई मोसे मैं विचारूं भौत
बेर बेर सोचूं कछु समझ न आए है ।।
द्वार सारे बंद भये सखी सुख की गैल के
दुख ने किवरिया पे तारे चटकाए हैं ।।
जिया को उबारे कौन तारन की कुची धरे
पिया इत उत फिरें अब लौं रिसाए हैं।।

मैंने तो मनाओ बहुत चार बेर दस बेर
कहां लौं मनाऊं मोरे होंठाई पिराने हैं।।
सुने ना सुनाएं कछु मनई मगन रहें,
जाने की की बातन में सुध बिसराने हैं।।
मोरे तो जिया में जेई उपजत बेर बेर ,
नैनवा पिया के कहीं और उरझाने हैं ।।
मोहे जा बतारी बिन्ना तोहे है कसम मोरी,
मोसे नोनी को है,जा पे पिया जी रिझाने हैं।।
- डॉ. वर्षा सिंह

   होली पर्व पर मंगलकामनाएं.

       बुंदेलखंड में होली की हर जगह पर धूम रहती है। बुंदेलखंड में फागुन के महीने में गांव की चौपालों में 'फाग' की अनोखी महफिलें जमती हैं, जिनमें रंगों की बौछार के बीच गुलाल-अबीर से सने चेहरों वाले फगुआरों के होली गीत (फाग) जब फिजा में गूंजते हैं तो ऐसा लगता है कि श्रृंगार रस की बारिश हो रही है।
फाग के बोल सुनकर बच्चे, जवान व बूढ़ों के साथ महिलाएं भी झूम उठती हैं। 
फाग-सी मस्ती का नजारा कहीं और देखने को नहीं मिलता है। सुबह हो या शाम गांव की चौपालों में सजने वाली फाग की महफिलों में ढोलक की थाप और मंजीरे की झंकार के साथ उड़ते हुए अबीर-गुलाल के साथ मदमस्त किसानों बुंदेलखंडी होली गीत (फाग) गाने का अंदाज-ए-बयां इतना अनोखा और जोशीला होता है कि श्रोता मस्ती में चूर होकर थिरकने, नाचने पर मजबूर हो जाते हैं।
फाग सुनकर उनकी दिनभर की थकावट एक झटके में दूर हो जाती है और व मस्ती से भर उठते हैं।  कवि ईसुरी की फाग के बोल किसानों के दिल की आवाज है। फाग किसानों के दिल दिमाग में छा जाती है।
बुंदेलखंड में मध्यप्रदेश सहित उत्तरप्रदेश के भी कई जिले व गांव आते हैं। जिनमें फागुन के महीनों में ऋतुराज बसंत के आते ही जब टेसू के पेड़ लाल सुर्ख फूलों से लद जाते हैं, तब वातावरण में मादकता छा जाती है और पूरा महौल रोमांच से भर जाता है तब शुरू होती है फाग की महफिलें। गांव-गांव की चौपालों में बुंदेलखंड के मशहूर लोक कवि ईसुरी के बोल फाग की शक्ल में फिजा में गूंजकर किसानों को मदमस्त कर देते हैं।

 कवि ईसुरी के फागों में जादू है। दिनभर की मेहनत-मजदूरी करके शाम को जब थका-हारा किसान वापस आता है, तब फाग की महफिलों की मस्ती उसकी पूरी थकान दूर कर उसे तरो-ताजा कर देती है।
बुंदेलखंड में फागुन को महोत्सव के तौर पर मनाने की पुरानी रवायत है। बसंत से लेकर होली तक इस इलाके के हर गांव की चौपालों में फागों की धूम मची रहती है जिससे हर जगह मस्ती छाई रहती है।


        मौज का यह आलम होता है कि कहीं 80 साल का बूढ़ा बाबा बांसुरी से फाग की धुन निकालता नजर आता है तो कहीं 12 साल का छोटा बच्चा नगाड़ा बजाकर फाग शुरू होने का ऐलान करता दिखाई देता है तो महिलाएं भी इस मस्ती में पीछे नहीं रहती हैं। वे भी एक-दूसरे को रंग-अबीर लगाती हुईं फाग के विरह गीत गाकर माहौल को और भी रोमांचक बना देती हैं।
     फाग में विरह, श्रृंगार, ठिठोली और वीर रस भरे गीत गाए जाते हैं इसलिए फाग का जादू बुंदेली किसानों के सिर चढ़कर बोलता है।

           बसंत से लेकर होली तक फाग की फुहारों से पूरा बुंदेलखंड सराबोर हो जाता है। ऐसा लगता है कि जैसे यहां श्रृंगार का देवता उतर आया हो। इस इलाके में सभी उम्र के लोग फाग में इतना मदमस्त हो जाते हैं कि यहां पर 'फागुना में बाबा देवर लागे' की कहावत सच लगने लगती है।

     ईसुरी ने रजऊ के माध्यम से बुंदेलखंड की गरिमामयी नारी जीवन के विविध चरणों का चित्रण किया है। बुन्देली माटी के यशस्वी कवि ईसुरी की फागें कालजयी हैं।नारी चित्रण की सहजता, स्वाभाविकता, जीवन्तता, मुखरता तथा सात्विकता के पञ्चतत्वों से ईसुरी ने अपनी फागों का श्रृंगार किया है। ईसुरी ने अपनी प्रेरणास्रोत ‘रजऊ’ को केंद्र में रखकर नारी-छवियों के मनोहर शब्द-चित्र अंकित किये हैं। किशोरी रजऊ चंचलतावश आते-जाते समय घूँघट उठा-उठाकर कनखियों से ईसुरी को देखते हुए भी अनदेखा करना प्रदर्शित करते हुए उन्हें अपनी रूप राशि के दर्शन सुअवसर देती है:-
चलती कर खोल खें मुइयाँ रजऊ वयस लरकइयाँ
हेरत जात उँगरियन में हो तकती हैं परछइयाँ
लचकें तीन परें करया में फरकें डेरी बइयाँ
बातन मुख झर परत फूल से जो बागन में नइयाँ
धन्य भाग वे सैयाँ ईसुर जिनकी आयँ मुनइयाँ

बुंदेली लोक कवियों ने फाग गीतों पर कुछ ज्यादा ही कलम चलाई है। लोक कवि ईसुरी की फागों के रंग हर चौपाल व मंदिरों में बिखरते हैं। ब्रज एवं अवध क्षेत्र के मंदिरों में भी इन फागों की धूम रहती है।

भींजी फिरे राधिका रंग में, मन मोहन के संग में,
रंग की धूमल धाम मचा दई ब्रज की सब गलियन में,
कोऊ माजूम धतूरा फांके, कोई छक दई भंग में,
तन कपड़ा गए ऊंघर ईसुरी करी ढाक सब रंग में।’
      - ईसुरी
               ईसुरी द्वारा रचित यह फाग जहां राधिका एवं श्रीकृष्ण के प्रेम को दर्शाती है, वहीं होली के हुल्लड़ को भी अभिव्यक्त करती है। इसी प्रकार संत कवि चंद्रसखी का फाग गीत ‘होरी खेलन आयो श्याम आज जाए रंग में बोरो री’ को भी ब्रज एवं बुंदेलखंड के मंदिरों में संगीतज्ञों एवं फाग कलाकारों द्वारा गया जाता है।
'नईयाँ रजऊ तुमारी सानी सब दुनियाँ हम छानी।
सिंघल दीप छान लओ घर-घर, ना पदमिनी दिखानी।
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन, खोज लई रजधानी।
रूपवंत जो तिरियाँ जग में, ते भर सकतीं पानी।
बड़ भागी हैं ओई ‘ईसुरी’ तिनकी तुम ठकुरानी।।
      - ईसुरी

           कवि प्रकाश का फाग गीत ‘मौं पर जो रंग जिते निहारों, उते बोई रंग डारो’ भी खूब पसंद किया जाता है। कई बुंदेली कवियों के फाग गीत हिंदी फिल्मों में भी गाए गए हैं। बुंदेलखंड के भक्ति कालीन युग के बुंदेली कवि पद्माकर व्यास, हरीराम व्यास, मदनेश एवं वर्तमान में महाकवि अवधेश ने कई बेमिसाल फाग गीत लिखे हैं, जो आज बुंदेलखंड की फाग गायकी की शान हैं।

हम पे नाहक रंग न डारो, घरे न प्रीतम प्यारो ।
फीकी फाग लगत बलम बिन, मन मे तुमई बिचारो ।
अतर गुलाल अबीर न छिरको, पिचकारी न मारो ।
ईसुर सूझत प्रान पति बिन, मोय जग मे अधियारो ।।
              - कवि  ईसुरी
 डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का बुंदेली बोली में लिखा आलेख बहुत रोचक है -
http://epaper.patrika.com/c/8957514

Friday, November 16, 2018

डॉ. विद्यावती "मालविका" हिन्दी विभाग, डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में


Dr Varsha Singh
    कल दिनांक 15.11.2018 को मेरी माताश्री डॉ. विद्यावती "मालविका" जी, जो स्वयं हिन्दी की व्याख्याता रही हैं, ने डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के हिंदी विभाग में जाने की इच्छा प्रकट की । उन्होंने कहा कि मैं आज विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में जाना चाहती हूं जहां आचार्य नंददुलारे बाजपेई, आचार्य रामरतन भटनागर, डॉ. भगीरथ मिश्र, प्रेम शंकर,  डॉ. कांति कुमार जैन सरीखे प्रकांड विद्वानों से अनेक अवसरों, आयोजनों में मिलना हुआ करता था। अतः मैं और बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह उन्हें विश्वविद्यालय लेकर गए जहां हिन्दी विभाग के वर्तमान विभागाध्यक्ष डॉ आनंद प्रकाश त्रिपाठी तथा विद्वत स्टाफ डॉ. आशुतोष मिश्रा, डॉ राजेंद्र यादव, डॉ. लक्ष्मी पांडे इत्यादि से उनकी आत्मीय मुलाकात हुई। सभी ने माताश्री का बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया।
बायें से:- डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. आशुतोष मिश्र, डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी, डॉ. श्रीमती विद्यावती "मालविका", मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. सुश्री शरद सिंह एवं डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय



        चर्चा के दौरान माताश्री ने " हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव" विषय में प्राप्त अपनी पी.एचडी. उपाधि और डॉ. गौर से संबंधित संस्मरण साझा किये। जिसमें उन्होंने याद करते हुए यह भी कहा कि पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनका वाईवा लिया था।
बायें से:- डॉ. राजेंद्र यादव, डॉ. आशुतोष मिश्र, डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी, डॉ. श्रीमती विद्यावती "मालविका", डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय , मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह एवं डॉ. सुश्री शरद सिंह 
तत्पश्चात माताश्री को बुंदेली पीठ, हिन्दी विभाग की पत्रिका " ईसुरी" के सम्पादक एवं बुंदेली पीठ के सचिव डॉ. राजेन्द्र यादव ने बुंदेली लोकगीतों पर एकाग्र पत्रिका का ताज़ा अंक भेंट किया।
बायें से:- डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय,  डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी, डॉ. आशुतोष मिश्र, डॉ. श्रीमती विद्यावती "मालविका", मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. सुश्री शरद सिंह एवं डॉ. राजेंद्र यादव




बायें से:- डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय,  डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी. श्रीमती विद्यावती "मालविका", मैं यानी डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. सुश्री शरद सिंह एवं डॉ. राजेंद्र यादव
         विश्वविद्यालय से लौटते हुए सिविल लाइन स्थित अमूल रेस्टोरेंट में हमने काफी पी। जहां हमारे पारिवारिक आत्मीयजन कपिल बैसाखिया से भी उनकी भेंट हुई।





कल का दिन उनके लिए थका देने वाला, किन्तु अत्यंत सुखद रहा।
डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर शिक्षा के क्षेत्र में मध्यप्रदेश और भारत.देश ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में अपनी विशिष्ट शैक्षणिक उपादेयता की ख्याति के कारण विख्यात है। इसकी स्थापना की कथा भी अन्यों से सर्वथा भिन्न है।
डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर का प्रवेश द्वार

डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय का ड्रोन से लिया गया हवाई फोटोग्राफ
सागर विश्वविद्यालय की स्थापना डॉ. हरी सिंह गौर ने 18 जुलाई 1946 को अपनी स्वयं की निजी पूंजी से की थी। उन्होंने अपनी गाढ़ी कमाई से 20 लाख रुपये की धनराशि से अपनी जन्मभूमि सागर में सागर विश्वविद्यालय की स्थापना की तथा वसीयत द्वारा अपनी पैतृक सपत्ति से 2 करोड़ रुपये दान भी दिया था। वे सागर विश्वविद्यालय के संस्थापक, उपकुलपति होने के साथ ही अपने जीवन के आखिरी समय दिनांक 25 दिसम्बर 1949 तक इसकी समृद्धि के लिए प्रयासरत रहे। डॉ. गौर का स्वप्न था कि सागर विश्वविद्यालय को कैम्ब्रिज तथा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों जैसी मान्यता और कीर्ति प्राप्त हो। डॉ. हरी सिंह गौर स्वयं एक शिक्षाशास्त्री, ख्यति प्राप्त विधिवेत्ता, न्यायविद्, समाज सुधारक, साहित्यकार कवि, उपन्यासकार एवं देशभक्त थे।
अपनी स्थापना के समय सागर विश्वविद्यालय भारत का 18 वां विश्वविद्यालय था। किसी एक व्यक्ति के दान से स्थापित होने वाला यह देश का एकमात्र विश्वविद्यालय है। वर्ष 1983 में जनभावनाओं का सम्मान करते हुए सागर विश्वविद्यालय का नाम परिवर्तित कर  डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय कर दिया गया। इसे 27 मार्च 2008 से  केन्द्रीय विश्वविद्यालय की श्रेणी प्रदान की गई।
   डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में देश के जानेमाने विद्वतजन अधिष्ठाता, प्राध्यापक और व्याख्याता रहे हैं। जिनमें आचार्य नंददुलारे बाजपेई, आचार्य रामरतन भटनागर, डॉ. भगीरथ मिश्र, प्रेम शंकर,  डॉ. कांति कुमार जैन का नाम प्रमुख है।
आचार्य नंददुलारे बाजपेई

      उन्नाव जिले के मगरायल नामक ग्राम में सन् 1906 ई. में जन्में नंददुलारे बाजपेई की प्रारंभिक शिक्षा हजारीबाग में हुई थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे कुछ समय तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदीविभाग में अध्यापक तथा बाद में अनेक वर्षों तक सागर विश्वविद्यालय के हिंदीविभाग के अध्यक्ष रहे। वरिष्ठ आलोचक के रूप में आचार्य वाजपेयी ने छायावाद का परिवर्धन एवं उन्नयन करते हुए भारतीय काव्यशास्त्र की आधारभूत मान्यताओं को ग्रहण करते हुए चर्चित कवियों, लेखकों एवं उनकी कृतियों की जो वस्तुपरक आलोचनाएँ प्रस्तुत की हैं, वे हिन्दी साहित्य की बहुमूल्य धरोहर हैं।
डॉ. रामरतन भटनागर
      प्रख्यात आलोचक एवं निबन्धकार  डॉ रामरतन भटनागर ने 1951 से डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के हिन्दी विभाग में शिक्षण कार्य शुरु किया और वहीं से 1976 में प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए। आलोचना और निबंध की उनकी लगभग 75 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। वे एक संवेदनशील कवि भी थे। ताण्डव, प्रकाश जहां भी है, वेणुगीत, गीतों के अमलतास आदि उनके चर्चित काव्य संग्रह हैं। उन्होंने उपन्यास भी लिखे जिनमें अम्बपाली, जय वासुदेव और आकाश की कथा शामिल हैं।
डॉ. भगीरथ मिश्र

 लगभग 32 स्वतंत्र ग्रंथों और हिन्दी के दर्जनों ग्रंथों की प्राथमिक, समीक्षात्मक भूमिकाओं के लेखक डॉ भगीरथ प्रसाद मिश्र सागर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर, अध्यक्ष रहे। बाद में वे यहीं कुलपति भी रहे। उनका जन्म 1914 में कानपुर जिले के एक छोटे से गाँव ‘सैंथा’ में हुआ था। लखनऊ विश्वविद्यालय से ‘हिन्दी काव्य-शास्त्र का इतिहास’ विषय में पी-एच.डी. डॉ. भगीरथ मिश्र की हिन्दी काव्यशास्त्र का इतिहास, काव्यशास्त्र, पाश्चात्य काव्यशास्त्र, तुलसी रसायन, काव्यरस चिन्तन और आस्वाद, भाषा-विवेचन, हिन्दी रीति साहित्य आदि उल्लेखनीय पुस्तकें  हैं। अनेक विद्वानों ने समय- समय पर अपने ज्ञान से इस विश्वविद्यालय को सिंचित किया।
       प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह भी वर्ष 1959 से 1960 तक सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में व्याख्याता के रूप में  कार्यरत रहे।
नामवर सिंह
वर्तमान में वरिष्ठ समालोचिक एवं साहित्यकार डॉ. आनंद प्रकाश त्रिपाठी हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष के रूप में विभाग का यशवर्धन करने हेतु संकल्पित हैं।

डॉ. विद्यावती "मालविका"

Thursday, October 4, 2018

बुद्धि के देवता गणेश और दैनिक भास्कर पुरस्कार 2018

Dr. Varsha Singh
बुद्धि के देवता गणेश और साहित्य का गहन संबंध है। इस संबंध को दर्शाने वाली अनेक पौराणिक कथाएं वैदिक साहित्य में उपलब्ध हैं। महर्षि वेद-व्यास को जब "महाभारत" की कथा को लिपिबद्ध करने का विचार आया तो आदि देव ब्रह्माजी ने परम विद्वान श्रीगणेश के नाम का प्रस्ताव रखा।इस पर उनके द्वारा यह शर्त रखी गई कि वे कथा तब लिखेंगे, जब लेखन के समय उनकी लेखनी को विराम न करना पड़े। इससे पूर्व परम्परागत पद्धति से कंठस्थ किया जाता था परन्तु "जय संहिता" जो "महाभारत" कहलाई, प्रथम लिपिबद्ध कथा है अतः स्पष्ट है कि आर्य साहित्य में लेखन की परम्परा के प्रारम्भकर्ता पार्वतीपुत्र ही हैं।

      पूरे भारत देश को एक सूत्र में बांधने वाला एकमात्र उत्सव गणेश उत्सव है, जो राष्ट्रीय एकता का ज्वलंत प्रतीक है। गणेश उत्सव का ऐतिहासिक महत्व है। सातवाहन और चालुक्य वंश के शासन काल से गणेश पूजन चलता आ रहा है। छत्रपति शिवाजी महाराज ने राष्ट्रीय संस्कृति और एकता को बढ़ावा देने के लिए गणेश उत्सव शुरू किया था। 
        दैनिक भास्कर समाचार पत्र सिर्फ एक समचार पत्र ही नहीं, वरन् समाज की, देश की बेहतरी के लिये प्रतिबद्ध एक ऐसा उत्प्रेरक है, जो अपनी सोच, अपनी मुहिम के जरिए नित नये संकल्प के साथ नित नये उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्लास्टर ऑफ पेरिस से गणेश प्रतिमा निर्माण के स्थान पर दैनिक भास्कर समूह कई वर्षों से 'मिट्टी के गणेश-घर में ही विसर्जन' अभियान चला रहा है। इसका मूल उद्देश्य यही है कि हम अपने तालाब और नदियों को प्रदूषित होने से बचा सकें। इसलिए घर या कॉलोनी में कुंड बनाकर विसर्जन करने और उस पवित्र मिट्टी में एक पौधा लगाने हेतु जनमानस को प्रेरित किया था। इससे न सिर्फ ईश्वर का आशीर्वाद, बल्कि उनकी याद भी साल दर साल घर-आंगन में महकती रहेगी। यह पौधा बड़ा होकर पर्यावरण में योगदान देगा। साथ ही घर में नई समृद्ध परंपरा का संचार होगा। हानिकारिक पीओपी की बजाय लोग ईको फ्रेंडली तरीके से मिट्टी के गणेश की प्रतिमा को प्राथमिकता देने लगे हैं।

इस वर्ष गांधी जयंती यानी 02.10.2018 को " दैनिक भास्कर" के सागर संस्करण द्वारा शहर में विगत गणेशोत्सव के दौरान मिट्टी से निर्मित चयनित श्रेष्ठ प्रतिमाओं को पुरस्कृत किया गया।


इस पुरस्कार वितरण समारोह में मेरे सहित मेरी बहन  डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, माननीय सागर विधायक शैलेन्द्र जैन , नगरनिगम सागर के महापौर अभय दरे, प्रतिष्ठित बिल्डर प्रकाश चौबे, दैनिक भास्कर के संपादक अनिल कर्मा, यूनिट हेड अनिल खरे आदि उपस्थित थे। आपकी इस मित्र डॉ. वर्षा सिंह को यानी मुझे भी दैनिक भास्कर की ओर से स्मृतिचिह्न प्रदान किया गया।