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Friday, November 13, 2020

बुंदेलखंड का दिवारी नृत्य | दीपावली पर्व विशेष | डॉ. वर्षा सिंह

       बुन्देलखण्ड में लोकनृत्यों की लम्बी परम्परा है। राई, सैरा, मोनिया, नौरता, बरेदी, दिवारी यहां के प्रमुख लोकनृत्य हैं।  दिवारी, दीवारी या देवारी नृत्य दीपावली के अवसर पर  किया जाता है। यह नृत्य बुन्देलों के शौर्य एवं वीरता का प्रतीक है। 
         मान्यताओं के अनुसार यह नृत्य द्वापर युग में भगवान् कृष्ण के समय से इस क्षेत्र में प्रचलित है। माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने जब कंस का वध किया था तब उसका समाचार सुन कर बुंदेलखंड में दिवारी नृत्य किया गया था जो आज भी परम्परागत तरीक़े से ज़ारी है। यह भी कहा जाता है कि कृष्ण ने जब गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर उठा कर ब्रजवासियों को इन्द्र के प्रकोप से बचाया था तब ब्रजवासियों ने खुश हो कर यह दिवारी नृत्य कर श्री कृष्ण की इन्द्र पर विजय का जश्न मनाया था तथा ब्रज के ग्वालावाले ने इसे दुश्मन को परास्त करने की सबसे अच्छी कला माना था। इसी कारण इन्द्र को श्री कृष्ण की लीला को देख कर परास्त होना पड़ा। 
        बुंदेलखंड के उत्तरप्रदेश वाले क्षेत्र बांदा, चित्रकूट, जालौन, झाँसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा जनपद में वीर आल्हा, उदल की वीरता की झलक दिवारी नृत्य में दिखाई देती है।  बुंदेलखंड के इलाकों में ये दीवारी नृत्य टोलियों में होता है। अपने-अपने गांवों की टोलिया बनाकर सभी वर्गों के लोग आत्मरक्षा वाली इस कला का प्रदर्शन करते हैं। नर्तक इस नृत्य के दौरान आपस में लाठियां एक दूसरे को मारते और बचाव करते हैं। बुन्देलखण्ड के मध्यप्रदेश वाले हिस्से में बुंदेला राजा छत्रसाल की वीरता से इसे जोड़ा जाता है।
सागर, दमोह, पन्ना, छतरपुर, टीकमगढ़ और दतिया ज़िलों में यह परंपरागत लोक नृत्य जिमनास्टिक की तरह प्रस्तुत किया जाता है।  ढोलक की थाप पर रंगबिरंगी वेषभूषा में हाथों में मज़बूत लाठी ले कर दिवारी लोक नृत्य खेलने वाले अलग ही दिखाई देते हैं। उनकी पोशाकें -जांघिए और कुर्तियां, चटक पीले,हरे,नीले या लाल रंग के कपड़ों और रेशमी गोटों से बनी होती हैं। उनमें कौड़ियां और बड़े घुंघरू टंके होते हैं। साथ ही किनारों पर रंग-बिरंगे फुंदने लटकते रहते हैं। मौनिया नर्तक पांवों में छोटे घुंघरू बांधते हैं और हाथों में मोरपंखों का गुच्छा या बांस की लाठियां लिए रहते हैं। यह माना जाता है कि चंदेलों के शासन काल में पारम्परिक रूप से युद्ध कौशल को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस लोक नृत्य की शुरुआत हुई।        
  
         बुंदेलखंड के ग्रामवासी, बल्कि ख़ास तौर पर यादववंशी यानी अहीर जाति के ग्वाले पुरुष इस नृत्य में भाग लेते हैं। यह पुरुषों का समूह लोकनृत्य है और नाचने वाले ‘दिवरिया’ या ‘मौनिया’ कहलाते हैं। वस्तुतः इस नृत्य के साथ दिवारी लोक गीत गाया जाता है और इसीलिए इस नृत्य को 'दिवारी नृत्य' कहते हैं। 
एक दिवारी गीत की बानगी देखिए -

बाबा नंद के छौना, तुमने भली डराई रीत, कातिक के महीना मां घर-घर दीन सूचना,

व देश दीवारी दो दिना, मथुरा बारह मास, नित राही गोवर्धन धरे, कान्हा खिलावें गाय,

इस नृत्य में ढोल-नगाड़े की टंकार के साथ पैरों में घुंघरू और कमर में पट्टा बांध कर हाथों में लाठियां ले कर जोशीले अंदाज में एक-दूसरे पर लाठी से प्रहार करते हैं। किन्तु कोई आहत नहीं होता। बुन्देलखंड का यह विशिष्ट लोक नृत्य 'मार्शल आर्ट' जैसा ही कहा जा सकता है। हाथों में मोरपंख लेकर थिरकन और विशेष लय में पद संचालन के साथ गोल घेरे में घूम कर नचइयों का समूह-नृत्य और नृत्य के बीच या अंत में लाठियों की टकराहट के साथ अनूठे खेल और करतब यानी हैरतअंगेज वीरता को प्रदर्शित करता मार्शल आर्ट। दिवारी गाने वाले सैकड़ों ग्वाले लोग गांव नगर के संभ्रांत लोगों के दरवाजे पर पहुंचकर कड़ु़वा तेल पियाई चमचमाती मजबूत लाठियों से दिवारी खेलते हैं। उस समय युद्ध का सा दृश्य न आता है। एक आदमी पर एक साथ १८-२० लोग एक साथ लाठी से प्रहार करते हैं, और वह अकेला पटेबाज खिलाड़ी इन सभी के वारों को अपनी एक लाठी से रोक लेता है। इसके बाद फिर लोगों को उसके प्रहारों को झेलना होता है। चट-चटाचट चटकती लाठियों के बीच दिवारी गायक जोर-जोर से दीवारी --गीत-- गाते हैं और ढ़ोल बजाकर वीर रस से युक्त ओजपूर्ण नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। पाई डण्डा नृत्य ८-१० व्यक्तियों के समूह में विभिन्न प्रकार के करतब्य मजीरा-नगड़ियां के साथ दिखाते हैं।
दीपावली के कुछ दिन पूर्व से ही गांव-गांव में लोग टोलियां बना दीवारी नृत्य का अभ्यास करने लगते हैं। बुंदेलखंड में धनतेरस से लेकर दीपावली की दूज तक गाँव-गाँव में दिवारी नृत्य खेलते नौजवानों की टोलियाँ घूमती रहती हैं। दिवारी देखने के लिए हजारों की भीड़ जुटती है। 
     लगभग धनतेरस से शुरू हो कर यह नृत्य भाईदूज पर्व तक चलता रहता है। ग्रामीण क्षेत्रों में कार्तिक माह में हर तरफ इस नृत्य की हलचल व्याप्त रहती है।
      इस दिवारी नृत्य को बड़े, बूढ़े और बच्चे सभी पसंद करते हैं और इसमें बढ़ चढ कर भाग लेते हैं। इस नृत्य की विशेष बात यह है कि इस दिवारी नृत्य में सिर्फ हिन्दू धर्मावलंबी ही नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोग भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।


    एक और दिवारी गीत देखें - 

टेरत-टेरत दूर निकल गईं,
लेत तुम्हारो नाम।
       तुम्हें तो टेरत हैं घनश्याम ...

गोरी-गोरी उमर की छोटी,
राधा उनका नाम।   तुम्हें तो...
टेरत हैं घनश्याम

कहां का रहना, कहां का मिलना,
कहां भई पहचान।   तुम्हें तो...
टेरत हैं घनश्याम

गोकुल रहना, मथुरा मिलना,
बरसाने पहचान।   तुम्हें तो...
टेरत हैं घनश्याम...

                  -----------------
#बुंदेलखंड #दिवारी #दीपावली #लोकनृत्य #दीवारी #देवारी #कृष्ण #द्वापर

Friday, September 18, 2020

अंगना में ठाड़े बड्डे | बुंदेली व्यंग्य | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज मेरा बुंदेली व्यंग्य लेख "पत्रिका" समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏
बुंदेली व्यंग्य
              अंगना में ठाड़े बड्डे
                              - डॉ. वर्षा सिंह

       हमाए एक बड़े भैया जी आंए, जोन से हम बड्डे कहत हैं। भौतई नोनो सुभाव है उनखों। जोन चाए की मदद खों तैयार रैत हैं, मनो ना कहबो तो उन्ने सीखोई नईंया। बरहमेस, दूसरन के लाने अपनो पूरो टेम दे देत हैं। उनकी जेई आदत पे भौजी सो भारी खिजात हैं उन पे। मनो तनक सी डांट- डपट कर के बे सोई बड्डे खों संग देन लगत हैं। अब करें भी का। कोनऊ की मदद करे बिना उनखों जी सोई नईं मानत है। 
      हमाए बड्डे आयोजन करवाबे में भौतई एक्सपर्ट आएं। बे जोन आयोजन कराबे के लाने ‘‘हऔ’’ बोल देत हैं, तो मनो ऊ आयोजन कभऊं फेल तो होई नईं सकत आए। जा कोरोनाकाल के पैलें आयोजन कराबे के लाने उनके ऐंगर भीड़ लगी रैत्ती। काय से के उन्ने ऐसे-ऐसे आयोजन कराए के लोग देखतई रै गए। कोरोनाकाल में उन्ने भीड़-भाड़ बारो आयोजन खों काम बंद कर दौ है। काय से के बे कोरोना गाइडलाइन खों पालन कर रए हैं। बाकी कल बड्डे के संगे भौतई गजब भऔ। भओ जे के कल जब बे दुपैरी खों अपने अंगना में ठाड़े हते, उनके ऐंगर हरीरो सो सलूखा पैरे एक आदमी आओ, औ कहन लगो के हमाए लाने एक आयोजन करा देओ। 

    ‘‘काय को आयोजन?’’- बड्डे ने पूछी।

   ‘‘मोय सम्मान कार्यक्रम कराने है।’’ ऊने बड्डे से कही। फेर बोलो -‘‘अच्छो बड़ो सो आयोजन, जीमें हजार-खांड़ लुगवा-लुगाई जुड़ जाएं सो मनो मजो आ जाए।’’
‘‘अब न जुड़हें हजार-खांड, तुमें ओनलाईन कराने हो सो बोलो’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘जे ओन-फोनलाईन हमें नईं करानें। हमाए लाने तो तीनबत्ती से पूरो कटरा बजारे लों भर दइयो। बो भी रात नौ के बाद, काय से के दिन में तो उते हमाए भक्तन की भीड़ जुड़ई रैत आय। सम्मान करबे खों मजा तो मनो रातई में आहै।’’ हरीरो सलूखा बारे ने कही।

    ‘‘कोन को सम्मान, कैसो सम्मान, हमाई कछ्छू समझ में ने आ रओ। काय से के ई टेम पे भीड़-भाड़़ जोड़बे वारो कौनऊ आयोजन हम नईं करवा रए। औ रात की तो सोचियो भी नई।’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘ऐसो न बोलो भैय्या, तुमाओ बड़ो नाम सुनो है, तुमाए ऐंगर बड़ी आसा ले के आएं हैं।’’ बा गिड़गिड़ात भओ बोलो।

   ‘‘मनो तुम हो कौन? औ कौन को सम्मान करो चात हो?’’ बड्डे खिझात भए बोले।

   ‘‘हओ, सो तुम काए चीनहो हमाए लाने। काय से के तुम तो घरई में पिड़े रैत हो। चलो, हमाई बता देत हैं के हम को आएं। तो सुनो, हम कोरोना आएं। औ हमें उन औरन खों सम्मान करने है जो बिना मास्क लगाए, बिना डिस्टेंसिंग बनाए बजार-हाट में नांए-मांए घूमत रैत हैं। कोनऊ की नईं सुनत हैं। बे हमाए से मिलबे खों उधारे से फिरत हैं। सो हमें भी लग रओ है के हमें अपने ऐसे भक्तन खों सम्मान कारो चइए। काय, ठीक सोची ने हमने?’’ ऊने कही।

   अंगना में ठाड़े बड्डे ने इत्ती सुनी, औ लगा दई दौड़ कमरा के भीतरे। कोरोना हतो सो, अपनो सो मों ले के लौट गओ, बाकी हमाए बड्डे तभई, ओई टेम से उन औरन खों पानी पी-पी के कोस रए हैं जो गाइड- माइड लाईन भुला के कोरोना खों मूड़ पे बिठाए गली-गैल, बजार-हाट में खुल्ला मों लेके नांय-मांय सटत फिरत हैं। सो बड्डे कभऊं कोरोना खों गरियात हैं, सो कभऊं कोरोना भक्तन खों।
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Friday, August 21, 2020

बुंदेलखंड में हरितालिका तीज | हरितालिका व्रत | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज हरितालिका तीज है और आप सभी को हरितालिका तीज की हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏💐

भाद्रपद अर्थात् भादों मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीज का पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह प्रचलित है कि हरितालिका तीज के दिन सावन में भगवान शिव और माता पार्वती का पुनर्मिलन हुआ था। इसका वर्णन शिवपुराण में भी मिलता है, इसलिए इस दिन सुहागिन महिलाएं मां पार्वती और शिवजी की आराधना करती हैं, जिससे उनका दांपत्य जीवन खुशहाल बना रहे। उत्तर भारत के राज्यों में तीज का पर्व बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। अच्छे वर की प्राप्ति के लिए कुंवारी कन्याएं भी इस दिन व्रत कर सकती हैं।

भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने 107 जन्म लिए थे। धार्मिक मान्यता है कि मां पार्वती के कठोर तप और उनके 108वें जन्म में भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया, तब से इस व्रत की शुरुआत हुई। इस दिन जो सुहागन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा करती हैं, उनका सुहाग लंबे समय तक बना रहता है। यह व्रत धर्म पारायण पतिव्रता सुहागिन औैर कुंवारी कन्याओं का सौभाग्य दायिनी विशेष व्रत है। सुहागिन स्त्रियों अपने पति के लंबी आयु, स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य व सौभाग्य की कामना के लिए और कुंवारी कन्याएं मनपसंद वर की प्राप्ति की कामना के लिए यह व्रत रखती है। यह पर्व ऐसा है कि इसमें महिलाएं अपने घर जाकर पति के लिए व्रत रखती है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के में पाने के लिए किया था। जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान शंकर की अर्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ तब से महिलाएं यह व्रत रख रही है। भविष्य पुराण की कथा के अनुसार राजा हिमाचल व रानी मैनी की पुत्री पार्वती जन्मांतर भगवान शंकर को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कृत संकल्पित थीं। अपने पिता द्वारा भगवान विष्णु से अपने विवाह की बात सुनकर पार्वती ने दुखी मन से यह बात अपनी सखी को बताई। उनकी सखी उन्हें जंगल ले गई, जहां माता पार्वती ने घोर तपस्या शुरू की। उन्होंने भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए अन्न-जल का त्याग कर दिया। उन्होंने वर्षाें तक पेड़ों के पत्ते खाकर, तपती धूप में पंचाग्नि साधना कर, ठंड में पानी के अंदर खड़े होकर, सावन में निराहार रहकर और भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को बालू की शिव मूर्ति बनाई। जिसे पत्तों और फूलों से सजाकर श्रद्धापूर्वक पूजन और रात्रि जागरण करती रहीं। इससे भगवान शिव प्रसन्न हो गए और माता पार्वती को पति रूप में प्राप्त हुए। माता पार्वती का व्रत-पूजन व जागरण सहित दुष्कर तपस्या भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को सफल हुई थी, इसलिए इसे तीजा कहते है।

हरितालिका तीज पूजा में इस मंत्र का जाप किया जाता है -
देहि सौभाग्य आरोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
पुत्रान देहि सौभाग्यम देहि सर्व।
कामांश्च देहि मे।।

हरितालिका तीज के दिन हरे वस्त्र, हरी चुनरी, हरा लहरिया, हरी चूड़ीयां, सोलह श्रृंगार , मेहंदी, झूला-झूलने की परंपरा भी है। इस दिन लड़कियों के मायके से श्रृंगार का सामान और मिठाइयां आती हैं। नवविवाहिताओं के लिए बहुत खास होता है। महिलाएं इस दिन गीत गाती है और झूला झूलती है।

बुंदेलखंड में भी हरितालिका तीज मनायी जाती है। इस दौरान पूजा स्थल पर भगवान के लिए छोटा झूला स्थापित करके उसे आम या अशोक के पल्लव और रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है. इसे फुलेरा कहते हैं। जिसके घर में फुलेरा बंधता है वहां मुहल्ले की महिलाएं एकत्रित हो कर पूजन, भजन गायन और रात्रि जागरण करती हैं। सभी महिलाएं शिव-पार्वती का स्एमरण करते हुए मधुर स्वर में लोकगीत गाती हैं। इस अवसर पर तृतीया देवी यानी तीजा माता से जुडे़ खास तरह के लोकगीत गाए जाते हैं, जिन्हें तीजा गीत भी कहा जाता है। एक बानगी देखिए -

दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

निरजल व्रत मैय्या मैंने राखो
मों में अन्न तनक नईं डारो
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

अपनो साज सिंगार करो है
तुम्हरो साज सिंगार करो है
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

माहुर पांव लगा रई सखियां
कजरा कारो लगा लौ अंखियां
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

गौरा पूजन करबे चलत हैं
शंकर जू खों नाम जपत हैं    ‎
दईयो दईयो अखंड सुहाग माईं तीजा

सागर में भी हरतालिका तीज या हरियाली तीज बहुत ही श्रद्धा के साथ परम्परागत तरीके से मनाई जाती है। फुलेरा के नीचे विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं। उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं। सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर पूजन किया जाता हैं  कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं। कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।
पूजन सामग्री में विशेष रूप से निम्नलिखित पदार्थ आवश्यक होते हैं -
1- फुलेरा विशेष प्रकार से फूलों से सजा होता है।
2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।
3- केले का पत्ता।
4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।
5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।
6- जनेऊ , नाडा, वस्त्र,।
7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं।
इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।
8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।
9- पञ्चामृत - घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।
उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं। तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं। उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है।

इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं। इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं। इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है।

आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है। हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।

प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं, उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं। ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं। उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं। अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।
इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण महिलाएं किसी एक घर में एकत्रित हो कर फुलेरा बांधने की बजाय अपने-अपने घरों में अलग-अलग फुलेरा बांध कर पूजन एवं रात्रि जागरण करेंगी।

फुलेरा बांध कर पूजन की पूर्ण तैयारी कर महिलाएं रात्रि जागरण करती हैं। शिव-पार्वती के भजनों के साथ ही कजरी, झूला, चौमासा आदि गीत गाती हैं।

कजरी गीत

अरे रामा रिमझिम पड़त फुहार,
 श्याम नहीं आए रे हारी..., 
अरे रामा आज बिरज में श्याम बने मनिहारी रे हारी...। 

 झूला गीत

देखो-देखो सखि सावनवां 
सखि झूले डरें है आंगनवां 

दूर है अमरइया चले जइयो 
दूर है अमरइया 
अमरइया में झूला डरें हैं
झूले बहन और भैया
देखो-देखो सखि सावनवां
सखि झूले डरें है आंगनवां 

चौमासा गीत

मोहे राजा छतरिया लगाओ हो रस की बूंदे परी 
चार महीना बसकारे के लागे मोरे राजा बंगलिया छवाओ हो रस की बूंदें परी

हरितालिका तीज व्रत की कथा इस प्रकार है -

भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।

श्री भोलेशंकर बोले- हे गौरी! पर्वतराज हिमालय पर स्थित गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया।

वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।

तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे। उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।

नारदजी ने कहा- गिरिराज! मैं भगवान विष्णु के भेजने पर यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है। इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में आपकी राय जानना चाहता हूं।

नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए। प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌! यदि स्वयं विष्णु मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं, तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है। वे तो साक्षात ब्रह्म हैं।

हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है, कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने। पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया। मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।
 
तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा। तब तुमने बताया - मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया। मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं। अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए। नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें। सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई। मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं। यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा। मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा। यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं। भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था। उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया। रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं। तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई। मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने समक्ष पाकर तुमने कहा - मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं। यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

तब मैं 'तथास्तु' कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया। उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा। उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है। मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं। आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई। अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए। कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

हे पार्वती! भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी आराधना करके जो व्रत किया था, उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका। इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं। इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

Thursday, August 13, 2020

बुंदेली लोकगीतों में स्वाधीनता का स्वर | स्वतंत्रता दिवस | डॉ. वर्षा सिंह

 
क्षेत्र की संस्कृति और सभ्यता को पहचानने में लोकगीतों का अभूतपूर्व योगदान रहता है। बुंदेलखंड की पहचान भी यहां की लोक भाषा बुंदेली में गाए जाने वाले लोकगीत हैं। बुंदेली बोली बहुत मीठी, सरल, सहज, प्रेम और लालित्य से भरी बोली-भाषा है , जिसकी अपनी अलग पहचान है। 
     लोकगीतों में लोक अर्थात् जनजीवन का सच्चा दर्द, रस-उल्लास, आनंद-उत्सव, रीति-रिवाज, लोक परंपराएं, राग-विराग और सुख-दुख के आख्यान साथ ही आत्मसम्मान, आत्मगौरव और स्वाधीनता की अनकही बातें व्यक्त होती हैं। किसी जनपद या ग्रामांचल के लोकगीतों में ढलकर हवा में गूँज उठने वाले स्वर ही गाँव की सीधी-सादी अनपढ़ जनता के गीत हैं, पर वे इस भारत देश की महान संस्कृति और हजारों बरस पुरानी लोक परंपराओं के वाहक भी हैं, जिनसे इस देश की कोटि-कोटि जनता के मन और आत्मा का साक्षात्कार किया जा सकता है। अलग-अलग बोलियाँ और भाषा बोलने वाले जनपद और ग्रामांचलों के ये लोकगीत मिलकर एक ऐसा साझा पुल बनाते थे, जिसे समझे बिना इस महान देश की हजारों बरस पुरानी सभ्यता और संस्कृति को समझना असंभव है। ज्यादातर लोकगीत गांव की पृष्ठभूमि से उपजे हैं। लेकिन ‘लोक’ की परिव्याप्ति ज्यादा है तथा वह एक ऐसी चेतना की उपज है जो मनुष्य और मनुष्य में फर्क नहीं करती, ग्रामीण और शहरी जीवन में भी नहीं। लोक साहित्य पर सबसे पहला अधिकार जनता का है, ‘धरतीपुत्रों’ का है. पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी, तथाकथित संस्कृति चिंतक और विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर इनकी बारीक-बारीकतर व्याख्याएँ भले ही कर लें, पर रहेंगी ये ग्राम्य जीवन की धरोहर ही।

चिर-परिचित शब्द, चिर-परिचित बातें, चिर-परिचित स्वर... यही लोकगीत की शक्ति है। कोई गीत पहाड़ी पगडंडी के समान ऊँचा-नीचा तो कोई समतल प्रदेश के दूर तक फैले हुए क्षितिज की छवि लिए हुए, नीरव, उदास दोपहरी के गीतों का प्रतिरूप होता है तो कोई गीत रात्रि के गीतों का प्रतिरूप। समय-चक्र के साथ लोकगीत के पहिए निरंतर चलते रहते हैं।

बुंदेलखंड क्षेत्र हमेशा से वीरता का प्रतीक रही है। महाराज छत्रसाल बुंदेला ने मुगलशासक औरंगजेब के समक्ष कभी घुटने नहीं टेके। 
हार ना मानी छत्ता तैंने
मुगलन को दई धूर चटाय।
कभऊं ना हिम्मत हारी तनकऊ
महाबली राजा कहलाय।

बुंदेलखंड में "आल्हा" गायन की परम्परा आज भी कायम है। प्रसिद्ध आल्ह- रुदल तेईस मैदान और बावन लड़ाइयों की सप्रसंग व्याख्या है, जिसको सुनकर ही लोग वीरता की भावना से ओत- प्रोत हो जाते हैं। आल्ह खंड में प्रेम और युद्ध के प्रसंग घटना- क्रम में सुनाये जाते हैं। पूरे काव्य में नैनागढ़ की लड़ाई सबसे रोचक व लोकप्रिय मानी जाती है।

अन्य कई लोक- गाथाओं की तरह आल्ह- रुदल भी समय के साथ अपने मूल रुप में नहीं रह गया है। इसने अपने आँचल में नौं सौ वर्ष समेटे हैं। विस्तार की दृष्टि से यह राजस्थान के सुदूर पूर्व से लेकर आसाम के गाँवों तक गाया जाता है। इसे गानेवाले "अल्हैत' कहलाते हैं। साहित्यिक दृष्टि से यह "आल्हा' छंद में गाया जाता है। हमीरपुर (बुंदेलखंड) में यह गाथा "सैरा' या "आल्हा' कहलाती है। इसके अंश "पँवाड़ा', "समय' या "मार' कहे जाते हैं। सागर, दमोह में भी आल्हा गायकों की कमी नहीं। वीरता के लोकमूल्य को उजागर करती ' आल्हा' की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-

मानसु देही जा दुरलभ हैस आहै समै न बारंबार ।
पात टूट कें ज्यों तरवर को कभऊँ लौट न लागै डार ।।
मरद बनाये मर जैबे कों खटिया पर कें मरै बलाय ।
जे मर जैहैं रनखेतन मा, साकौ चलो अँगारुँ जाय ।।

इन पंक्तियों में युद्ध के मैदान में वीरतापूर्वक जूझ जाने को परम मूल्य माना गया है और उसी में व्यक्ति और समाज के युगधर्मी कल्याण अंतर्निहित हैं । विदेशी आक्रमणकारियों से सुरक्षा में सभी का हित है और मनुष्य की देह को दुर्लभ मानने में मानव और मानवता की गरीमा सुरक्षित है । यूद्ध में मृत्यु का वरण करने से कीर्ति पाने का लोकविश्वास बहुत प्राचीन है और जब तक युद्ध रहेगा, तब तक बना रहेगा । इसी तरह शरीर को पेड़ के पत्ते की तरह नश्वर मानना भी शाश्वत लोकमूल्य है, जो आज भी लोकप्रचलित है।

बुंदेलखंड की प्रसिद्ध लोकगाथाएं
'मनोगूजरी' और 'मथुरावली' नारी के बलिदान की प्रामाणिक गवाह हैं । मथुरावली खड़ी-खड़ी जल जाती है, उसका भाई कहता है-
 राखी बहना पगड़ी की लाज, 
बिहँस कहें राजा बीर, 
ठाँड़ी जरै मथुरावली ।
     दरअसल पगड़ी पुरुष के मान-सम्मान और प्रतिष्ठा की प्रतीक है। पगड़ी की लाज रखना उस समय का प्रमुख लोकमूल्य था, क्योंकि अनेक लोकगीतों में इसे प्रधानता मिलती है । 

    स्वाधीनता संग्राम की बुनियादी प्रेरणा लोकगीतों - लोकगाथाएं से मिलती रही है। 
 सन् 1857 के विप्लवियों की वीरता पर एक से एक अद्भुत लोकगीत गाए गए। कई गीतों में वीर कुँवरसिंह और रानी लक्ष्मीबाई की वीरता का रोमांचकारी बखान है। ऐसे ही एक गीत में राजा बेनीमाधवबख्श सिंह की वीरता का अद्भुत का वर्णन है। अंग्रेज बार-बार चिट्ठी लिखकर उन्हें अपने साथ मिलने के लिए मना रहे हैं, उधर उनकी वीरता और पराक्रम ने अंग्रेजी सेना को दहला दिया है-

राजा बहादुर सिपाही अवध में,
धूम मचाई मोरे राम !
लिख-लिख चिठिया लाट ने भेजा,
आव मिलो राना भाई मोरे राम !
जंगी खिलत लंदन से मँगा दूँ,
अवध में सूबा बनाई मोरे राम !
जब तक प्राण रहें तन भीतर,
तुम कन खोद बहाई मोरे राम !

.... और 1940 के दशक में लोकप्रिय यह लोकगीत देखें, जिसमें तिरंगे झंडे के प्रति उच्च सम्मान की भावना झलकती है -

तीन रंग को प्यारो तिरंगा
ईको मान रखो भैय्या।
देस हमाओ जान से प्यारो
इतनो भान रखो भैय्या ।

इस लोकगीत में अंग्रेजी हुकूमत के प्रति नफ़रत की भावना दिखाई देती है -

गोरी मेम बनो ना बिन्ना
चलो चलिए भरन खों पनिया
हमसे कभऊं ना करियो बिन्ना
लाट- गवरनर की बतिया

... और यह एक अन्य लोकगीत - 

विपदा सहत है धरती मइया, 
कोऊ बखर हांके तो कोेऊ हाकें गइंया
अंगरेजन की हुकुम हुकूमत
हमाई लेत कौनऊ खबर नइंया

डांडी मार्च के समय जनमन को प्रतिध्वनित करने वाला यह लोकगीत भी सर्वत्र गूंजा था- 
 
काहे पे आवें बीर जवाहर, काहे पे गांधी महराज? 
काहे पे आवें भारत माता, काहे पे आवे सुराज ?
  
घोड़े पे आवें बीर जवाहर, पैदल गांधी महराज। 
हाथी पे आवें भारत माता डोली पे आवे सुराज।

     लोकगीत लोक के गीत हैं। जिन्हें कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरा लोक समाज अपनाता है। बुंदेलखंड के ये लोकगीत भी बुंदेलखंड ही नहीं वरन् पूरे देश की धरोहर हैं।
            ---------------------

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#मनोगूजरी #मथुरावली #छत्रसाल




Monday, August 3, 2020

रक्षाबंधन | आल्हा | डॉ. वर्षा सिंह

🚩 रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🚩

आज श्रावण मास की पूर्णिमा है यानी रक्षाबंधन का पर्व है। साथ ही सुयोग यह कि आज श्रावण का अंतिम सोमवार भी है। रक्षाबंधन पर्व की कथा हमारे पुरातन ग्रंथों में मिलती है। महाभारत के अनुसार एक बार युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा- 'हे अच्युत! मुझे रक्षा बंधन की वह कथा सुनाइए जिस से मनुष्यों की प्रेतबाधा तथा दुख दूर होता है।' 
        भगवान कृष्ण ने कहा- हे पांडव श्रेष्ठ! एक बार दैत्यों तथा सुरों में युद्ध छिड़ गया और यह युद्ध लगातार बारह वर्षों तक चलता रहा। असुरों ने देवताओं को पराजित करके उनके प्रतिनिधि इंद्र को भी पराजित कर दिया।
           ऐसी दशा में देवताओं सहित इंद्र अमरावती चले गए। उधर विजेता दैत्यराज ने तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। उसने राजपद से घोषित कर दिया कि इंद्रदेव सभा में न आएं तथा देवता व मनुष्य यज्ञ-कर्म न करें। सभी लोग मेरी पूजा करें।
         दैत्यराज की इस आज्ञा से यज्ञ-वेद, पठन-पाठन तथा उत्सव आदि समाप्त हो गए। धर्म के नाश से देवताओं का बल घटने लगा। यह देख इंद्र अपने गुरु वृहस्पति के पास गए तथा उनके चरणों में गिरकर निवेदन करने लगे- गुरुवर! ऐसी दशा में परिस्थितियां कहती हैं कि मुझे यहीं प्राण देने होंगे। न तो मैं भाग ही सकता हूं और न ही युद्धभूमि में टिक सकता हूं। कोई उपाय बताइए।
वृहस्पति ने इंद्र की वेदना सुनकर उसे रक्षा विधान रने को कहा। श्रावण पूर्णिमा को प्रातःकाल निम्न मंत्र से रक्षा विधान संपन्न किया गया।
'येन बद्धो बलिर्राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिवध्नामि रक्षे मा चल मा चलः।'
         इंद्राणी ने श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर द्विजों से स्वस्तिवाचन करवा कर रक्षा का तंतु लिया और इंद्र की दाहिनी कलाई में बांधकर युद्धभूमि में लड़ने के लिए भेज दिया। 'रक्षा बंधन' के प्रभाव से दैत्य भाग खड़े हुए और इंद्र की विजय हुई। राखी बांधने की प्रथा का सूत्रपात यहीं से होता है।
           बुंदेलखंड में सैकड़ों साल पुरानी परंपरा का गांवों में निर्वहन होने से पता चलता है कि आल्हा-ऊदल की वीरता आज भी लोगों के दिलों में समाई है। जोश भरने वाली वीरता की गाथा सुनकर युवा, वृद्ध समेत सभी की भुजाएं फड़क उठती हैं। रक्षाबंधन के अगले दिन इन्हीं दोनों की वीरता से संबंध रखने वाला कजली मेला मनाए जाने की परंपरा कोरोना महामारी के कारण टूट सी गई है। अब सामाजिक दूरी के बीच ग्रामीण इलाकों में यह कार्यक्रम सिर्फ रस्म अदायगी तक सीमित होगा।
        सैकड़ों साल पहले रक्षाबंधन के दिन राजा पृथ्वीराज चौहान ने महोबा में हमला कर दिया था। उनकी सेना ने रानी मल्हना के डोले लूट लिए थे। तब वीर भूमि के लोगों ने इस त्यौहार को रद्द कर दिया था। इस ऐतिहासिक घटना के बाद आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज चौहान की सेना से मोर्चा लेकर लूटे गए डोले वापस लिए थे। इसलिए उस दिन रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया गया था। लूटे गए कजली से भरे डोले वापस मिलने के बाद महोबा के कीरत सागर में रानी मल्हना ने रक्षाबंधन के अगले दिन कजलियों का विसर्जन कर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया था। 
    यह कथा इस तरह भी प्रचलित है कि सन् 1182 में राजा परमाल की पुत्री चंद्रावलि 1400 सखियाें के साथ भुजरियों के विसर्जन के लिए कीरत सागर जा रही थीं। रास्ते में पृथ्वीराज चौहान के सेनापति चामुंडा राय ने आक्रमण कर दिया था। पृथ्वीराज चौहान की योजना चंद्रावलि का अपहरण कर उसका विवाह अपने बेटे सूरज सिंह से कराने की थी। यह वह दौर था जब आल्हा ऊदल को राज्य से निष्कासित कर दिया गया था और वह अपने मित्र मलखान के पास कन्नौज में रह रहे थे। रक्षाबंधन के दिन जब राजकुमारी चंद्रावल अपनी सहेलियों के साथ भुजरियां विसर्जित करने जा रही थी तभी पृथ्वीराज की सेना ने उन्हें घेर लिया। आल्हा ऊदल के न रहने से महारानी मल्हना तलवार ले स्वयं युद्ध में कूद पड़ी थी। दोनों सेनाओं के बीच हुए भीषण युद्ध में राजकुमार अभई मारा गया और पृथ्वीराज सेना राजकुमारी चंद्रावल को अपने साथ ले जाने लगी। अपने राज्य के अस्तित्व व अस्मिता के संकट की खबर सुन साधु वेश में आये वीर आल्हा ऊदल ने अपने मित्र मलखान के साथ उनका डटकर मुकाबला किया। चंदेल और चौहान सेनाओं की बीच हुये युद्ध में कीरतसागर की धरती खून से लाल हो गई। युद्ध में दोनों सेनाओं के हजारों योद्धा मारे गये। राजकुमारी चंद्रावल व उनकी सहेलियां अपने भाईयों को राखी बांधने की जगह राज्य की सुरक्षा के लिये युद्ध भूमि में अपना जौहर दिखा रही थी। इसी वजह से भुजरिया विसर्जन भी नहीं हो सका। तभी से यहां एक दिन बाद भुजरिया विसर्जित करने व रक्षाबंधन मनाने की परंपरा है। महोबा की अस्मिता से जुड़े इस युद्ध में विजय पाने के कारण ही कजली महोत्सव विजयोत्सव के रूप में मनाया जाता है। सावन माह में कजली मेला के समय गांव देहातों में लगने वाली चौपालों में आल्हा गायन सुन यहां के वीर बुंदेलों में आज भी 1100 साल पहले हुई लड़ाई का जोश व जुनून ताजा हो जाता है।
       सागर में भी रक्षाबंधन का पर्व परम्परागत तरीक़े से मनाया जाता है। इस दिन घर-घर जलेबी खाने की परंपरा भी है। बहनें भाइयों के हाथों में रक्षा सूत्र । हैं। कजली लेकर महिलाएं सावन गीत गाती हैं और तालाबों में विसर्जन करती हैं।जगह-जगह आल्हा-ऊदल की वीरगाथा आल्हा के माध्यम से गाए जाते हैं।  बुंदेलखंड में रक्षाबंधन व कजली महोत्सव के दौरान यदि आल्हा न सुनाई पड़े तो सावन मनभावन नहीं लगता है।

बारह बरिस ल कुक्कुर जीऐं, औ तेरह लौ जिये सियार।
बरिस अठारह छत्री जीयें,  आगे जीवन को धिक्कार।।
               -----------
#आल्हा  #रक्षाबंधन 

Wednesday, June 10, 2020

बुंदेलखंड हिन्दी साहित्य-संस्कृति विकास मंच, सागर की ऑनलाइन कवि गोष्ठी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय मित्रों, मानना पड़ेगा कि इस कोरोना काल में काव्यगोष्ठी ने ऑनलाईन हो कर सोशल मीडिया पर अपना रंग जमा लिया है। Whatsapp Group हो या Facebook Live .... Zoom App हो या WebEx Meet ... काव्यगोष्ठी ज़ारी है... तो लीजिए पढ़िये दैनिक "देशबंधु" में प्रकाशित यह समाचार... जी हां, कल शनिवार 23.05.2020 को सम्पन्न On Line गोष्ठी में मैंने सरस्वती वंदना की और अपनी ग़ज़ल का पाठ किया ....

धन्यवाद बुंदेलखंड हिन्दी साहित्य-संस्कृति विकास मंच, सागर 🙏



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Sunday, October 13, 2019

शरद पूर्णिमा एक, मान्यताएं अनेक - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh
          वर्ष भर में पड़ने वाली समस्त पूर्णिमा में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। शारदीय नवरात्रि के समाप्त होने के बाद शरद पूर्णिमा आती है। हिंदू पंचांग के अनुसार आश्विन माह यानी क्वांर मास की पूर्णिमा तिथि पर शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। इस बार वर्ष 2019 में यह आज 13 अक्टूबर को है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होकर रात भर अपनी किरणों से अमृत की वर्षा करता है। माना जाता है कि इस दिन दूध और चावल से बनाई गई खीर को खुले आसमान के नीचेे रखने से ओस के कण के रूप में अमृत बूंदें खीर के पात्र में भी गिरती हैं जिसके फलस्वरूप यह खीर अमृत तुल्य हो जाती है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से आरोग्य तथा कांति में श्रीवृद्धि होती है। मान्यता है कि चंद्रमा कि किरणें उस पर पड़ने से यह खीर औषधियुक्त हो जाती है।

शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की किरणों को अवशोषित करती खीर

          बुंदेलखंड के सागर दमोह आदि क्षेत्र में शरद पूर्णिमा पर महिलाएं व्रत रखकर भगवान विष्णु को मावा के लड्डूओं का भोग लगाती हैं। व्रत के दौरान कथा एवं चंद्रदेव, तुलसी और भगवान विष्णु का विशेष पूजन-अर्चन किया जाता है। विशेष तौर पर भगवान को मावा यानी खोबा एवं शक्कर से निर्मित 6 लड्डुओं का भोग लगाया जाता है, जिसमें से एक लड्डू भगवान विष्णु को, दूसरा पंडित को, तीसरा गर्भवती स्त्री को एवं चौथा अपनी सहेली को दिये जाने की परम्परा है।

शरद पूर्णिमा का पूजन

     शरद पूर्णिमा की रात को छत पर खुले आसमान के नीचेे खीर को रखने के पीछे वैज्ञानिक तथ्य भी निहित है। खीर दूध और चावल के मिश्रण को पकाने से बनकर तैयार होती है। दरअसल दूध में लैक्टिक नाम का एक अम्ल होता है। यह एक ऐसा तत्व है जो चंद्रमा की किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति अवशोषित कर लेता है। वहीं चावल में स्टार्च होने के कारण यह प्रक्रिया सरल हो जाती है। इस खीर का सेवन करना अत्यंत लाभप्रद होता है। शरद पूर्णिमा का दिन कई मायनों में महत्वपू्र्ण है। इस दिन जहां उत्तर भारत में इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और खीर का प्रसाद बनाकर रात को चंद्रमा के नीचे रखा जाता है।

भगवान विष्णु

अश्विन मास के शुक्‍ल पक्ष की इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के साथ कोजागर पूर्णिमा भी कहा जाता है।
पूरे साल में 12 पूर्णिमा तिथि आती है जिनमें, आषाढ़, कार्तिक और शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है। शरद पूर्णिमा के बारे में कहा जाता है कि इस दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं से युक्त होकर आसमान से अमृत की वर्षा करता है। इस रात देवी लक्ष्मी भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी भ्रमण के लिए आती हैं। इसलिए कहते हैं कि जो इस रात में जागरण करता है मां लक्ष्मी उसकी झोली सुख संपत्ति से भर देती हैं। इसलिए शरद पूर्णिमा की रात को कोजागरा और कोजागरी की रात कहते हैं। कोजागरा व्रत पर इस वर्ष सर्वार्थ सिद्धि और रवि नामक शुभ योग बन रहे हैं जो इस दिन को और भी शुभ बना रहे हैं। इस दिन को देवी लक्ष्मी के जन्मोत्सव के रूप में भी जाना जाता है। कथाओं के अनुसार सागर मंथन के समय देवी लक्ष्मी शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र से उत्पन्न हुई थीं।

शरद पूर्णिमा पर श्री कृष्ण का महारास

पेंटिंग... महारास में लीन राधा, कृष्ण और गोपिकाएं

    चूंकि महामति प्राणनाथ बुंदेलखंड केसरी  छत्रसाल के गुरु थे और कृष्ण के सखी भाव से उपासक थे अतः मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड के पन्ना जिले के सुप्रसिद्ध मंदिर श्री प्राणनाथ जी मंदिर में शरदऋतु की शरदपूर्णिमा पर हजारों व लाखों देशी व विदेशी श्रद्धालुओं के साथ प्रतिवर्ष अक्टूबर के महिने में श्री 108 प्राणनाथ ट्रस्ट के एवं प्रशासन के सहयोग से बडे ही धूमधाम से आयोजित किया जाता है। महारास की यह link देखें....
      https://youtu.be/jmuO_RVlwS0
        अंतर्राष्ट्रीय शरद पूर्णिमा का मुख्य समारोह पूर्णिमा की रात्रि में होता है । रात्रि में करीब 12 बजे बंगला जी मंदिर में श्रीजी की सवारी ब्रम्हक चबूतरे में लाई जाती है । पूर्णमासी की महारास का उल्लास रात्रि भर चलता है । श्रीजी की सवारी ब्रम्ह‍ चबूतरे पर पांच दिन तक रूकी रहती है । इस दौरान पांच दिन तक गरबा सहित विविध धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन चलता रहता है ।
श्रद्धालुओं द्वारा महारास, गरबा आदि किया जाता है...
https://youtu.be/8VPjMBMIIwE

महामति प्राणनाथ मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश

       पन्ना में शरद पूर्णिमा महोत्स्व का पहला कार्यक्रम संवत 1740 में हुआ था । स्थानीय  प्रणामी धर्माविलंबियों के मतानुसार श्री प्राणनाथ जी बंगला जी मंदिर में अपने पांच हजार सुंदरसाथ के साथ ठहरे थे । पूर्णिमा की चांदनी रात में वे सुंदरसाथ के साथ श्रीकृष्ण द्वारा ग्वांलवालों व सखियों के साथ खेले जाने वाले महारास की चर्चा कर रहे थे । इसी दौरान उनके साथ आए सुंदरसाथ नें महामति प्राणनाथ जी से अखंड महारास का अनुभव कराने का निवेदन किया तब पूर्णिमा की अर्ध रात्रि शुरू होने वाली थी । इस पर महामति प्राणनाथ जी नें पांच हजार सुंदरसाथ के साथ महारास खेलना शुरू किया । यह महारास पांच दिन तक बिना रूके, बिना थके चलता रहा । तभी से यह हर साल मनाया जाता है ।

महामति प्राणनाथ मंदिर, पन्ना, मध्यप्रदेश

        यूं तो अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं किन्तु बहुश्रवणीय, जनसामान्य में बहुप्रचलित एक लोककथा के अनुसार एक साहुकार को दो पुत्रियां थीं। दोनो पुत्रियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। लेकिन बड़ी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधूरा व्रत करती थी। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की संतान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितों से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी, जिसके कारण तुम्हारी संतान पैदा होते ही मर जाती है। पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक करने से तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है।  उसने पंडितों की सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। बाद में उसे एक लड़का पैदा हुआ। जो कुछ दिनों बाद ही फिर से मर गया। उसने लड़के को एक पाटे (पीढ़ा) पर लेटा कर ऊपर से कपड़ा ढंक दिया। फिर बड़ी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पाटा दे दिया। बड़ी बहन जब उस पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया। बच्चा घाघरा छूते ही रोने लगा। तब बड़ी बहन ने कहा कि तुम मुझे कलंक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता। तब छोटी बहन बोली कि यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह जीवित हो गया है। तेरे पुण्य से ही यह जीवित हुआ है। उसके बाद नगर में उसने पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया।

शरद पूर्णिमा व्रत कथा का श्रवण एवं पूजन दृश्य

      चूंकि आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है इसलिए शरद पूर्णिमा को चंद्रमा पूरा नजर आने से इसे महापूर्णिमा भी कहते हैं। चंद्रमा इस दिन 16 कलाओं से युक्त रहता है। ये कलाएं मनुष्य के लिए सुख, सिद्धि दायक एवं उन्नति कारक मानी जाती है। सर्वार्थसिद्घ और अमृत सिद्ध का संयोग भी इस दिन बना रहता है। शरद पूर्णिमा को रास पूर्णिमा भी कहा जाता है। शरद पूर्णिमा की रात को ही भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ रास रचाया था। वैसे ताे हर माह में पूर्णिमा आती है, लेकिन शरद पूर्णिमा का महत्व उन सभी से कहीं अधिक है। शरद पूर्णिमा से ही स्नान और व्रत प्रारंभ हो जाता है। साथ ही माताएं अपनी संतान की मंगल कामना से देवी,देवताओं का पूजन करती है। इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत समीप आ जाता है। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से ही प्रारंभ होता है। शरद ऋतु में मौसम एकदम साफ़ रहता है। इस दिन आकाश में न तो बादल होते हैं और न ही धूल-गुबार। इस रात्रि में भ्रमण और चंद्र किरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना गया है। प्रति पूर्णिमा को व्रत करने वाले इस दिन भी चंद्रमा का पूजन करके भोजन करते हैं।

शिव-पार्वती

    शरद पूर्णिमा के दिन शिव-पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है। यही पूर्णिमा कार्तिक स्नान के साथ राधा-दामोदर पूजन व्रत धारण करने का भी दिन है। 
     
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह की बहुचर्चित पेंटिंग "शरद पूर्णिमा"



Tuesday, October 8, 2019

बुंदेलखंड में दशहरा - डॉ. वर्षा सिंह



🚩अधर्म पर धर्म की विजय,
असत्य पर सत्य की विजय,
बुराई पर अच्छाई की विजय,
पाप पर पुण्य की विजय
अत्याचार पर सदाचार की विजय
क्रोध पर दया व क्षमा की विजय
रावण पर श्रीराम की विजय के
प्रतीक पावन पर्व
विजयदशमी की
आपको व आपके परिवार को
हार्दिक शुभकामनाएं।
आज सत्य पर असत्य की विजय का पर्व विजयदशमी पूरे देश में बहुत धूमधाम के साथ मनाया जाता है. आज के दिन अस्त्र-शस्त्र का पूजन और रावण दहन के बाद बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
           विजयादशमी पर प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी पीटीसी ग्राउंड पर 51 फीट का रावण दहन किया गया। जय श्रीराम के जयकारों के साथ रावण के पुतले की नाभी में राम का स्वरूप धारण किए हुए व्यक्ति द्वारा छोड़ा गया तीर लगते ही रावण धूं-धूं कर जलने लगा। रावण दहन  बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। सागर शहर के नागरिकों ने अपने परिवार सहित दशानन रावण का अहंकार पलभर में राख होते देखा।
        समूचे बुंदेलखंड में आज के दिन पान का बीड़ा हनुमानजी के चढ़ाया जाता है। पान हनुमाजी को बहुत पसंद है और इस बार दशहरा मंगलवार को है इसलिए यह दिन और भी खास हो जाता है। पान को जीत का प्रतीक माना गया है। पान का 'बीड़ा' शब्द का एक महत्व यह भी है इस दिन हम सही रास्ते पर चलने का 'बीड़ा' उठाते हैं। पान प्रेम का पर्याय है। दशहरे में रावण दहन के बाद पान का बीड़ा खाने की परम्परा है। ऐसा माना जाता है दशहरे के दिन पान खाकर लोग असत्य पर हुई सत्य की जीत की खुशी मनाते हैं। पान का पत्ता मान और सम्मान का प्रतीक है. इसलिए हर शुभ कार्य में इसका उपयोग किया जाता है. नवरात्रि पूजन के दौरान भी मां को पान-सुपारी चढ़ाने का विधान होता है. इसी के साथ पान के पत्ते का उपयोग विवाह से लेकर कथा पाठ तक हर शुभ काम में किया जाता है.


Monday, September 2, 2019

सागर शहर में गणेशोत्सव - डॉ. वर्षा सिंह



        गणेशोत्सव लगभग पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह से मनाया जाता है। बुंदेलखंड के सागर शहर में भी इस अवसर पर लोग गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति लाकर अपने घरों में स्थापित करते हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी तक चलने वाले इस श्री गणेशोत्सव समारोह में श्रद्धालु लोग कम से कम तीन दिन या अधिकतम दस दिन तक गणेश जी की पूजन, सेवा, भोग, आरती, कीर्तन आदि से अनुष्ठान पूर्ण करके गणेश प्रतिमा को जल में सम्मानपूर्वक विसर्जित कर देते हैं। कहा जाता है कि गणेश जी के घर मे पधारने से धन-धान्य, ऋद्धि-सिद्धि आती है।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्र दर्शन करना निषेध है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन रात्रि को चांद देखने से एक वर्ष के अन्दर कोई न कोई कलंक अवश्य लगता है। पुराणों में वर्णित है कि भगवान श्रीकृष्ण को भी इस दिन चन्द्र दर्शन करने से कलंक का सामना करना पड़ा था। इसलिए इस चतुर्थी को कलंक चतुर्थी या पत्थर चतुर्थी भी कहते हैं। यदि जाने अनजाने में चंद्र दर्शन हो जाए तो वही खडे होकर एक पत्थर उठाकर चांद की ओर फेंक देना चाहिए। गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करना चाहिए।



इस वर्ष गणेश उत्सव के दौरान एक अमृत सिद्धि, दो सर्वार्थ सिद्धि और छह रवि योग रहेंगे। श्रीगणेश की स्थापना शिव-पार्वती योग में होगी। सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन है और शुक्ल योग माता पार्वती को प्रिय है। इस दिन कन्या राशि का चंद्रमा भी है। ये सभी शुभ योग आज सोमवार को है। आज ही महिलाएं जहां शिवपार्वती कार्तिकेय, नंदी, शृंगी आदि गणों को पूजेंगी वहीं घरों में और नगर में जगह- जगह गणेश स्थापना होगी। गणेश चतुर्थी पर लंबे समय बाद कई शुभ संयोग बनेंगे। एक ओर जहां ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति से शुक्ल और रवियोग बनेगा, वहीं सिंह राशि में चतुग्रही योग भी बन रहा है। अर्थात सिंह राशि में सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र एक साथ विद्यमान रहेंगे।


सागर शहर में 100 से अधिक स्थानों पर गणेशजी की झांकी लगाई जाती है, जिसकी तैयारियां पूर्ण हो गई है। गजानन को विराजित करने के लिए स्वर्ण मंदिर बनाया गया है। झांकी लगाने के लिए पंडाल सजना शुरू हो गए है। गणेश भगवान की स्थापना करने के लिए शहर की विभिन्न कमेटियां जुटी हुई हैं। विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, प्रथम पूज्य गणपति बाप्पा बुद्धि एवं समृद्धि के आराध्य देव भगवान श्री गणेश की प्रतिमा को विराजित करने के लिए वाटरप्रूभ पंडाल बनाए जा रहे हैं। बारिश का मौसम रहने के कारण पंडाल को बनने में विशेष ध्यान कमेटियों ने दिया है। गणेश भगवान के प्रतिमाओं की बुकिंग पहले ही हो गई है। पर्यावरण का ध्यान रखते हुए कमेटियों ने मिट्टी की गणेश प्रतिमाओं को ही प्राथमिकता दी है।



Wednesday, May 15, 2019

विश्व परिवार दिवस और बुंदेलखंड - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh
आज विश्व परिवार दिवस है...
प्रत्येक वर्ष 15 मई को विश्व परिवार दिवस मनाया जाता है।
सम्पूर्ण प्राणी जगत एवं समाज में परिवार सबसे छोटी इकाई है। इसे सामाजिक संगठन की मौलिक इकाई भी कहा जा सकता है। सच तो यह है कि परिवार को एक सूत्र में बांधे रखना एक बड़ी चुनौती है। वर्तमान समय में परिवार के रिश्ते टूट रहे हैं असहिष्णुता के कारण  रिश्ते मज़बूत नहीं रह गए हैं।  विश्व परिवार दिवस को संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने 1994 को अंतरराष्ट्रीय परिवार वर्ष घोषित किया था। तब से विश्व में लोगों के बीच परिवार की अहमियत बताने के लिए हर साल 15 मई को अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाने लगा और 1995 से अभी तक यह सिलसिला जारी है।

 हमारे देश में भी परिवार के महत्व को समझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस विभिन्न संस्थाओं द्वारा अनेक प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस हेतु जिस प्रतीक चिह्न को चुना गया है, उसमें हरे रंग के एक गोल घेरे के बीचों बीच एक दिल और घर अंकित किया गया है, जो यह बताता है कि किसी भी समाज का केंद्र परिवार ही होता है। परिवार ही हर उम्र के लोगों को शांति से जीना सिखाता है।

 उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण आपसी मतभेद और पारिवारिक कलह के कारण  समाज में जहां अपनत्व की भावना क्षीण होते जा रही है, वहीं रिश्ते भी तार-तार हो रहे हैं।  परिवार को साथ जोड़ने का मौका है परिवार दिवस । आज विश्व भर में एकल परिवार की मानो लहर सी फैल गयी है।

बुंदेलखंड में संयुक्त परिवार की परम्परा अब टूटती जा रही है। एकल परिवार यहां बुंदेलखंड के हृदय स्थल सागर में भी बढ़ते जा रहे हैं। ख़ास वज़ह यह भी है कि बुंदेलखंड में रोजगार के अवसर बेहद सीमित हैं। रोजगार के लिए युवा बड़े शहरों में जाने को विवश हैं। लगभग हर दूसरे परिवार में बच्चे बड़े होकर बड़े शहरों में नौकरी करने लगते हैं, तब मां-बाप अकेले रह जाते हैं और परिवार से अलग रहने पर बच्चों को बड़ों का साथ नहीं मिल पाता। जिसकी वजह से नैतिक संस्कार दिन ब दिन गिरते ही जा रहे हैं और इससे समाज में बिखराव भी होने लगा है।
अपने रीत रिवाज़, भाईचारे की भावना, मिलजुल कर रहने की आदत.... सबकुछ बहुत पीछे छूट गया है।

इसके लिए हमें एकल परिवार की पद्धति पर विराम लगाना होगा, ताकि समाज में बिखराव की स्थिति उत्पन्न न हो सके। रोजगार के साधन मुहैया कराने होंगे। ताकि युवा घरबार, परिवार छोड़ कर अंजाने शहरों में जा कर संघर्ष करने से छुटकारा पा सकें और तब मिलजुल कर एक साथ रहें। संयुक्त परिवार से हमारी संस्कृति सुरक्षित रहेगी।

मेरी यानी इस ब्लॉग लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की एक ग़ज़ल है, जो अंतरराष्ट्रीय/ विश्व परिवार दिवस पर सभी सुधीजनों को समर्पित है....

जो समझ पाते नहीं घरबार की भाषा।
जान वो पाते नहीं परिवार की भाषा।

ज़िन्दगी तन्हा गुज़ारी शौक से लेकिन,
पढ़ न पाये वो यहां त्यौहार की भाषा।

हो न नफ़रत तब दिलों के दरमियां बेशक़,
एक हो जाये अगर संसार की भाषा।

दोस्ती जिसने कलम के साथ कर ली हो
रास कब आई उसे तलवार की भाषा !

द्वेष से हासिल कभी ख़ुशियां नहीं होतीं
क्लेश देती है सदा प्रतिकार की भाषा!

रूठ जाये कोई गर अपना कभी हमसे,
याद तब कर लीजिये मनुहार की भाषा।

है गुज़ारिश आपसे "वर्षा" की इतनी सी,
सीख लीजे आप भी अब प्यार की भाषा।

       - डॉ. वर्षा सिंह
परिवार... # साहित्य वर्षा

Tuesday, May 7, 2019

बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

अक्षय तृतीया की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
     
हिंदू कैलेन्डर के वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के रूप में एक पर्व मनाया जाता है।
अक्षय तृतीया को बुंदेलखंड में अक्ती भी कहते हैं। साथ ही इस दिन बुंदेलखंड में अक्षय तृतीया पर ग्रामीण क्षेत्रों में गुड्डा और गुड्डी की शादी रचाने का सिलसिला देर रात तक चलता रहता है। गुड्डा और गुड्डी को यहां बुंदेली बोली में पुतरा और पुतरिया कहा जाता है। घर - घर मंडप सजाकर बुंदेलखंड की परंपरा निभाई जाती है।
# साहित्य वर्षा

बच्चों में अक्षय तृतीया यानी अक्ती का उत्साह सप्ताह भर पहले से ही देखा जाने लगता है। बच्चे बाजार से मिट्टी के गुड्डा गुड्डी , यानी पुतरा - पुतरिया खरीदकर उनके ब्याह की पूरी तैयारी करते हैं।  विधि विधान से विवाह की रस्में सम्पन्न कराई जाती हैं। बड़े- बुजुर्ग भी उनका भरपूर सहयोग करते हैं।
माना जाता है कि इस दिन कोई भी शुभ कार्य करने के लिए पंचागं देखने की जरूरत नहीं है। अक्षय तृतीया पर किए गए कार्यों का कई गुना फल प्राप्‍त होता है। इस साल अक्षय तृतीया पर शनि की चाल बदलना भी एक विशेष घटना है जिसका प्रभाव सभी राशियों पर अगले छ: महीने तक देखने को मिलेगा। इसे अखतीज के नाम से भी जाना जाता है।
# साहित्य वर्षा

जिस तिथि का कभी क्षय नहीं होता उसे अक्षय कहा जाता है चूंकि कभी क्षय न होने वाली तिथि बैसाख शुक्ल तृतीया को मानी जाती है। इसलिए यह तिथि अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता है।

पुराणों में बताया गया है कि यह बहुत ही पुण्यदायी तिथि है इसदिन किए गए दान पुण्य के बारे में मान्यता है कि जो कुछ भी पुण्यकार्य इस दिन किए जाते हैं उनका फल अक्षय होता है यानी कई जन्मों तक इसका लाभ मिलता है।
# साहित्य वर्षा

भगवान विष्‍णु के छठें अवतार माने जाने वाले भगवान परशुराम का जन्‍म हुआ था। परशुराम ने महर्षि जमदाग्नि और माता रेनुकादेवी के घर जन्‍म लिया था। यही कारण है कि अक्षय तृतीया के दिन भगवान विष्‍णु की उपासना की जाती है। इसदिन परशुरामजी की पूजा करने का भी विधान है।
अक्षय तृतीया के दिन ही पांडव पुत्र युधिष्ठर को अक्षय पात्र की प्राप्ति भी हुई थी। इसकी विशेषता यह थी कि इसमें कभी भी भोजन समाप्त नहीं होता था।
अक्षय तृतीया के अवसर पर ही म‍हर्षि वेदव्‍यास जी ने महाभारत लिखना शुरू किया था। महाभारत को पांचवें वेद के रूप में माना जाता है। इसी में श्रीमद्भागवत गीता भी समाहित है।
भगवान परशुराम # साहित्य वर्षा

इस दिन मां गंगा स्वर्ग से धरती पर अवतरीत हुई थीं। राजा भागीरथ ने गंगा को धरती पर अवतरित कराने के लिए हजारों वर्ष तक तप कर उन्हें धरती पर लाए थे। कहा जाता है कि इस दिन पवित्र गंगा में डूबकी लगाने से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

कहते हैं कि इस दिन जिनका परिणय-संस्कार होता है उनका सौभाग्य अखंड रहता है। इस दिन महालक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए भी विशेष अनुष्ठान होता है जिससे अक्षय पुण्य मिलता है।

 ..... किन्तु बात पुतरा- पुतरिया के विवाह तक सीमित नहीं रहती। जी हां, आज अक्षय तृतीया है .... और बाल विवाह जैसी कुरीति को अपराध की श्रेणी में रखे जाने के बावजूद कुछ रूढ़िवादी व्यक्ति अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर इस अपराध को करने- कराने में ज़रा भी नहीं झिझकते। जबकि  बाल विवाह के दुष्परिणाम हमारे सामने हैं, जिनमें शिशु तथा मातृ मृत्यु दर में वृद्धि होना प्रमुख है।
# साहित्य वर्षा

     अक्षय तृतीया को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। 'मुहूर्त' अर्थात् किसी भी कार्य को करने का श्रेष्ठतम समय। शास्त्रानुसार मास श्रेष्ठ होने पर वर्ष का, दिन श्रेष्ठ होने पर मास का, लग्न श्रेष्ठ होने पर दिन का एवं मुहूर्त श्रेष्ठ होने पर लग्न सहित समस्त दोष दूर हो जाते हैं। हमारे शास्त्रों में शुभ मुहूर्त्त का विशेष महत्त्व बताया गया है। इसीलिए अक्षय तृतीया के अबूझ मुहूर्त में अनेक विवाह सम्पन्न कराये जाते हैं। अनेक स्थानों पर, ख़ास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां अभी भी अशिक्षा और अंधविश्वास के कारण अनेक कुरीतियां व्याप्त हैं, बाल विवाह कराये जाते हैं।
      आज अक्षय तृतीया के अवसर पर  बाल विवाह के विरुद्ध जागरूकता केन्द्रित मेरे बुंदेली गीत को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 07 मई 2019 में स्थान मिला है।

युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏

http://yuvapravartak.com/?p=14485

मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...

बचपन न छीनो- छिनाओ
           - डॉ. वर्षा सिंह

बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !
अक्षय तीजा खूबई मनइयो
पुतरा-पुतरियन को ब्याओ रचइयो
नबालिग को ब्याओ न कराओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !

खेलत- पढ़त की जोई उमरिया
मूड़े न धरियो भारी गगरिया
अबई से दुलैया न बनाओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो - छिनाओ मोरी बिन्ना !

अठरा बरस की मोड़ी हो जैहे
इक्किस को मोड़ा जब मिल जैहे
माथे पे सेहरा बंधाओ मोरी बिन्ना
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !

बच्चन की शिक्छा-दिक्छा कराओ
जिम्मेदारी को पाठ पढ़ाओ
मड़वा तबई गड़ाओ  मोरी बिन्ना !
बचपन न छीनो - छिनाओ मोरी बिन्ना !

छोटी उमर को ब्याव बुरो है
जिनगी भर को कष्ट बनो है
समझो जा बात समझाओ मोरी बिन्ना!
बचपन न छीनो- छिनाओ मोरी बिन्ना !
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#बुंदेली वर्षा

बुंदेली गीत - डॉ. वर्षा सिंह # साहित्य वर्षा

Friday, March 22, 2019

विश्व जल संरक्षण दिवस पर बुंदेली लेख -पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
बुंदेली लेख     
     पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ
                      
             - डॉ. वर्षा सिंह

एक दिना बे हते  जब हमई ओरें शान से कहत ते के -
बुंदेलन की सुनो कहानी, बुंदेलन की बानी में ....
पानीदार इते हैं सबरे,  आग इते के पानी में ।
अब जे दिना आ गए हैं के पानीदार तो सबई हैं, पर पानी खों तरस रए। ताल, तलैया, कुआ, बावड़ी, बंधा-बंधान सबई सूखत जा रये। अपने बुंदेलखण्ड में पानी की कमी कभऊ ने रही। बो कहो जात है न, के -
इते ताल हैं,  उते तलैया, इते कुआ, तो उते झिरैया।।
खेती कर लो, सपर खोंर लो, पानी कम न हुइये भैया।।


मगर पानी तो मानो रूठ गओ है। औ रूठहे काए न, हमने ऊकी कदर भुला दई। हमें नल औ बंधान से पानी मिलन लगो, सो हमने कुआ, बावड़ी में कचरा डालबो शुरू कर दओ। हम जेई भूल गए के जे बेई कुआ आएं जिनखों पूजन करे बगैर कोनऊ धरम को काम नई करो जात हतो। कुआ पूजबे के बादई यज्ञ-हवन होत ते। नई बहू को बिदा की बेरा में कुआ में तांबे को सिक्का डालो जात रहो और रस्ते में पड़बे वारी नदी की पूजा करी जात हती। जो सब जे लाने करो जात हतो के सबई जल के स्रोतन की इज्ज्त करें, उनको खयाल रखें। पानी से नाता जोड़बे के लाने जचकी भई नई-नई मां याने प्रसूता को कुआ के पास ले जाओ जात है औ कहूं-कहूं मां के दूध की बूंदें कुआ के पानी में डरवाई जात हैं। काए से के जैसे मां अपने दूध से बच्चे को जिनगी देत है, ऊंसई कुआ अपने पानी से सबई को जिनगी देत है। सो, प्रसूता औ कुआ में बहनापो सो बन जात है। पर हमने तो मानो जे सब भुला दओ है। लेकिन वो कहो जात है न, सुबह को भूलो, संझा घरे आ जाए तो भुलो ने कहात आए। हमें पानी को मोल समझनई परहे। पानी नईं सो जिंदगानी नईं। सो भैया, जे गनीमत आए के अब पानी बचाबे के लाने  सबई ने कमर कस लई है। कुआ, बावड़ी, ताल, तलैया, चौपड़ा सबई की सफाई होन लगी है। जो अब लों आगे नई आए उनखों सोई आगे बढ़ के पानी बचाबे में हाथ बंटाओ चाइए। वाटर हार्वेस्टिंग से बारिश में छत को पानी जमीन में पोंचाओ, नलों में टोटियां लगाओ, कुआ, बावड़ी गंदी ने करो औ पानी फालतू ने बहाओ फेर मजे से जे गीत गाओ-
पानी बचाओ, झिन पानी बचाओ ।
कुंइया तलैया खों फेर के जगाओ।।
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- डॉ. वर्षा सिंह