Showing posts with label पत्रिका. Show all posts
Showing posts with label पत्रिका. Show all posts

Saturday, March 13, 2021

सुश्री शरद सिंह और श्रीबाई धानक एक मंच पर | पत्रिका का सम्मान समारोह | अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2021 | डॉ. वर्षा सिंह


अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर डॉ. वर्षा सिंह का सम्मान

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 08 मार्च, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर  पत्रिका समूह के 66वें स्थापना दिवस उपलक्ष्य में  'पत्रिका' समाचार पत्र के सागर संस्करण (राजस्थान पत्रिका ग्रुप) और हीरो सेंट्रल मोटर्स, सागर द्वारा आयोजित भव्य सम्मान समारोह में सागर ज़िले की निवासी और विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर विशिष्ट ख्याति अर्जित करने वाली महिलाओं में मुझे भी सम्मानित किया गया। दिलचस्प बात यह थी कि इस आयोजन की विशिष्ट अतिथि मेरी अनुजा एवं हिन्दी की प्रख्यात लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह थीं और मुख्य अतिथि सागर के ग्रामीण क्षेत्र की बहादुर महिला श्रीमती श्रीबाई धानक थीं।

 
  सागर नगर की गौरव और पिछले पन्ने की औरतें, पचकौड़ी, कस्बाई सीमोन और शिखण्डी : स्त्री देह से परे जैसे चर्चित उपन्यासों एवं औरत : तीन तस्वीरें, पत्तों में क़ैद औरतें जैसे स्त्री विमर्श की पुस्तकों की ख्यातनाम लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह से तो सभी परिचित हैं। श्रीमती श्रीबाई के बारे में मैं अपने इस  ब्लॉग के पाठकों को बताना चाहूंगी। 
       मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के सागर ज़िले के सानौधा थाना क्षेत्र के प्रागैतिहासिक काल के गुफा चित्रों के लिए प्रसिद्ध आबचंद क्षेत्र के समीपस्थ स्थित आबचंद गांव में रहने वाली 50 वर्षीय श्रीबाई धानक खेती करती हैं। उनके परिवार में दो बेटा, दो बहू हैं। चार बेटियां हैं। दो ननद हैं। मां-बाप हैं। जो सब गांव में खेती-किसानी करते हैं। श्रीबाई ने 27 सितंबर 2020 को गैंगरेप पीड़ित एक महिला को चार दरिंदों से बचाया था। उनके इस शौर्य के लिए दो माह पहले जनवरी 2021 में प्रदेश के "मामा जी" के नाम से लोकप्रिय एवं सभी के चहेते मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने मिंटो हाल, भोपाल में वर्चुअल सम्मान समारोह में और फिर सागर कलेक्टोरेट के एनआईसी कक्ष में आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रम में भोपाल से श्रीबाई का अभिनंदन किया था। इसके बाद कमिश्नर मुकेश शुक्ला व आईजी अनिल शर्मा ने श्रीबाई धानुक को 'मैं हूं असली हीरो' सम्मान के रूप में प्रशस्ति पत्र प्रदान किया था। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री जी ने पहले श्रीबाई से ही बात की। उनके साहस व जज्बे की प्रशंसा करते हुए दूसरों को भी इससे प्रेरणा लेने के लिए कहा।

  
    मुख्यमंत्री जी ने जब घटना का विवरण श्रीबाई से ही जानना चाहा तो श्रीबाई ने बुंदेली में बताया कि - "मामाजी .. दोपहर एक बजे तिली काट रहे थे, हम खेत पर। महिला दौड़ते हुए आकर कहने लगी कि बाई बचा लें। तीन लोग मारने के लिए पीछे लगे हैं। महिला के साथ एक, एक साल को और एक दो महीना को बच्चा हतो। बा हमसे लिपड़ गई कि हमें बचा लें। हमने कई कोई न मार पे है, हम खड़े हैं। हंसिया लए थे हम तिली काट रए थे। वो आदमी कहन लगो कि हमाई साली आए। ऐ खो छोड़ों। हमने कई नई छोड़ रए। बा केवे के अम्मा तुम छोड़ ने दिओ न जो हमें मार दे है। हमने कई नई तुम इते से डग नहीं धर रईं हम खड़े। हम हंसिया लए थे, हमने हाथ में ले लो और कई आओ। एक आओ और कहन लगो कि हमाई साली आए जा छोड़ो। तुमाई को आए जे, तुम काये बचा रईं। हमने कई हम भी मर जे ओ के संगे, ओ खो नई मार सकत तुम। इतने में हमने हमाए लड़का देवराज को आवाज लगाई। इते आओ बाहरी आदमी आए एक और खो मार रए और हमें मार रए। देवराज आओ सो कहन लगो खड़े रहो मई। फिर कोटवार को और थानेदार को फोन लगवावे की कही, पुलिस बुलवा रए। इतने में सब गदबद दे गए। फिर महिला को हम घरे ले गए गांवों और साड़ी पहनाकर कोटवार के पास महिला कर दई। ओ के बच्चों को खाना-पीना खिलाओ, दूध पियाओ हमने। 100 नंबर खो फोन लगाओ थाने सूचना दई।"


   08 मार्च 2021 को 'पत्रिका' समाचार पत्र द्वारा आयोजित इस समारोह में श्रीबाई से मिल कर, उनसे चर्चा कर हम सभी को प्रसन्नता हुई। डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने अपने उद्बोधन में उनकी बहादुरी की प्रशंसा करते हुए मंच पर उनका हाथ पकड़ कर उनका अभिनंदन किया। इस रोमांचक दृश्य का उपस्थित सभी महिलाओं ने तालियों की गड़गड़ाहट से ज़ोरदार स्वागत किया। वह दृश्य वास्तव में अविस्मरणीय था।


एक विशेष बात यह भी कि मैंने इस समारोह में अपनी ताज़ा ग़ज़ल भी सुनाई, जिसे सभी ने बहुत पसंद किया। मेरी उस ग़ज़ल का मतला और एक शेर यहां प्रस्तुत है -

ख़ूबसूरत सा ख़्वाब है औरत

ज़ुल्मतों का जवाब है औरत


इसको पढ़ना ज़रा आहिस्ता से 

प्यार की इक किताब है औरत


अन्य सभी तस्वीरें उसी समारोह की हैं -


 डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
 डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
 डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
श्रीमती श्रीबाई और डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
श्रीमती श्रीबाई और डॉ. (सुश्री) शरद सिंह
श्रीमती श्रीबाई और डॉ. (सुश्री) शरद सिंह


   
#महिलादिवस2021 
#महिलादिवस #womensday2021 #womenday #womendayspecial #patrika #PatrikaNews #sagarpatrikanews #sagar  #PatrikaFoundationDay  #PatrikaPublication  #PatrikaGroup #सागर #सागरपत्रिका #HeroMotoCorp #सेंट्रलमोटर्स #HeroMotorcycles #herocentral #हीरोसेंट्रल #herochallenge #Hero #HeroScooty #heroscooters #centralmoters

Friday, September 18, 2020

अंगना में ठाड़े बड्डे | बुंदेली व्यंग्य | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज मेरा बुंदेली व्यंग्य लेख "पत्रिका" समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏
बुंदेली व्यंग्य
              अंगना में ठाड़े बड्डे
                              - डॉ. वर्षा सिंह

       हमाए एक बड़े भैया जी आंए, जोन से हम बड्डे कहत हैं। भौतई नोनो सुभाव है उनखों। जोन चाए की मदद खों तैयार रैत हैं, मनो ना कहबो तो उन्ने सीखोई नईंया। बरहमेस, दूसरन के लाने अपनो पूरो टेम दे देत हैं। उनकी जेई आदत पे भौजी सो भारी खिजात हैं उन पे। मनो तनक सी डांट- डपट कर के बे सोई बड्डे खों संग देन लगत हैं। अब करें भी का। कोनऊ की मदद करे बिना उनखों जी सोई नईं मानत है। 
      हमाए बड्डे आयोजन करवाबे में भौतई एक्सपर्ट आएं। बे जोन आयोजन कराबे के लाने ‘‘हऔ’’ बोल देत हैं, तो मनो ऊ आयोजन कभऊं फेल तो होई नईं सकत आए। जा कोरोनाकाल के पैलें आयोजन कराबे के लाने उनके ऐंगर भीड़ लगी रैत्ती। काय से के उन्ने ऐसे-ऐसे आयोजन कराए के लोग देखतई रै गए। कोरोनाकाल में उन्ने भीड़-भाड़ बारो आयोजन खों काम बंद कर दौ है। काय से के बे कोरोना गाइडलाइन खों पालन कर रए हैं। बाकी कल बड्डे के संगे भौतई गजब भऔ। भओ जे के कल जब बे दुपैरी खों अपने अंगना में ठाड़े हते, उनके ऐंगर हरीरो सो सलूखा पैरे एक आदमी आओ, औ कहन लगो के हमाए लाने एक आयोजन करा देओ। 

    ‘‘काय को आयोजन?’’- बड्डे ने पूछी।

   ‘‘मोय सम्मान कार्यक्रम कराने है।’’ ऊने बड्डे से कही। फेर बोलो -‘‘अच्छो बड़ो सो आयोजन, जीमें हजार-खांड़ लुगवा-लुगाई जुड़ जाएं सो मनो मजो आ जाए।’’
‘‘अब न जुड़हें हजार-खांड, तुमें ओनलाईन कराने हो सो बोलो’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘जे ओन-फोनलाईन हमें नईं करानें। हमाए लाने तो तीनबत्ती से पूरो कटरा बजारे लों भर दइयो। बो भी रात नौ के बाद, काय से के दिन में तो उते हमाए भक्तन की भीड़ जुड़ई रैत आय। सम्मान करबे खों मजा तो मनो रातई में आहै।’’ हरीरो सलूखा बारे ने कही।

    ‘‘कोन को सम्मान, कैसो सम्मान, हमाई कछ्छू समझ में ने आ रओ। काय से के ई टेम पे भीड़-भाड़़ जोड़बे वारो कौनऊ आयोजन हम नईं करवा रए। औ रात की तो सोचियो भी नई।’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘ऐसो न बोलो भैय्या, तुमाओ बड़ो नाम सुनो है, तुमाए ऐंगर बड़ी आसा ले के आएं हैं।’’ बा गिड़गिड़ात भओ बोलो।

   ‘‘मनो तुम हो कौन? औ कौन को सम्मान करो चात हो?’’ बड्डे खिझात भए बोले।

   ‘‘हओ, सो तुम काए चीनहो हमाए लाने। काय से के तुम तो घरई में पिड़े रैत हो। चलो, हमाई बता देत हैं के हम को आएं। तो सुनो, हम कोरोना आएं। औ हमें उन औरन खों सम्मान करने है जो बिना मास्क लगाए, बिना डिस्टेंसिंग बनाए बजार-हाट में नांए-मांए घूमत रैत हैं। कोनऊ की नईं सुनत हैं। बे हमाए से मिलबे खों उधारे से फिरत हैं। सो हमें भी लग रओ है के हमें अपने ऐसे भक्तन खों सम्मान कारो चइए। काय, ठीक सोची ने हमने?’’ ऊने कही।

   अंगना में ठाड़े बड्डे ने इत्ती सुनी, औ लगा दई दौड़ कमरा के भीतरे। कोरोना हतो सो, अपनो सो मों ले के लौट गओ, बाकी हमाए बड्डे तभई, ओई टेम से उन औरन खों पानी पी-पी के कोस रए हैं जो गाइड- माइड लाईन भुला के कोरोना खों मूड़ पे बिठाए गली-गैल, बजार-हाट में खुल्ला मों लेके नांय-मांय सटत फिरत हैं। सो बड्डे कभऊं कोरोना खों गरियात हैं, सो कभऊं कोरोना भक्तन खों।
               -------------- 
#पत्रिका #व्यंग्य #बुंदेली #बुंदेलखंड #जयबुंदेलखंड #जयबुंदेली #अपनीबोलीअपनीबानी #सागर #लेख #drvarshasingh1 #सरोकार #कोरोनाकाल #कोरोना

Friday, September 4, 2020

'अन्वेषिका' | संकट के दौर में एक महत्वपूर्ण पत्रिका | समीक्षा | डॉ. वर्षा सिंह

 















प्रिर ब्लॉग पाठकों, मेरे द्वारा लिखी सागर से प्रकाशित 'अन्वेषिका' पत्रिका की समीक्षा आज दैनिक 'आचरण' समाचार पत्र में प्रकाशित हुई है। जिसे मैं यहां आप सब से शेयर कर रही हूं।
हार्दिक धन्यवाद आचरण 🙏🌹🙏
दिनांक 03.09.2020

'अन्वेषिका' पत्रिका की समीक्षा

    संकट के दौर में एक महत्वपूर्ण पत्रिका
                                       - डॉ. वर्षा सिंह
-------------------------                                       
 पत्रिका - अन्वेषिका (ई-पत्रिका)
 अंक  -  बेटी विशेषांक
 वर्ष -  2019-20
 प्रधान संपादक - सुनीला सराफ
 प्रकाशक - हिन्दी लेखिका संघ, सागर, म.प्र.
-------------------------------

       जब एक ओर कादम्बिनी और नंदन जैसी पत्रिकाओं के प्रकाशन बंद होने की सूचना ने साहित्यप्रेमियों को चौंका दिया, वहीं दूसरी ओर एक ऐसी पत्रिका ऑनलाईन प्रकाशित हो कर सामने आई और पाठकों के द्वारा रुचि ले कर पढ़ी जा रही है। जबकि यह एक स्मारिका है तथा इसका प्रकाशन वार्षिक है। पत्रिका का नाम है- अन्वेषिका। यह हिन्दी लेखिका संघ, सागर, म.प्र. का वार्षिक प्रकाशन है। विगत वर्ष इसका प्रथमांक आया था। सुन्दर मुद्रण के साथ। किन्तु इस वर्ष कोरोना संकट के कारण ई पत्रिका के रूप में प्रकाशित किया गया। ताकि यह सुगमता से पाठकों तक पहुंच सके।  पत्रिका की प्रधान संपादक सुनीला सराफ हैं तथा संपादन सहयोग डॉ. चंचला दवे और डॉ. सरोज गुप्ता ने किया है। साहित्यिक पत्रिका संपादन के क्षेत्र में नवोदित टीम होते हुए भी परिष्कृत कलेवर वाली एक सुन्दर पत्रिका का स्वरूप स्मारिका को दिया है जिससे उसकी साहित्यिक मूल्यवत्ता को महसूस किया जा सकता है।
       वर्तमान समय दोहरे संकट का समय है। यह दोहरा संकट है साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन निरंतर बंद होते जाना और दूसरा संकट कोरोना महामारी का। हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं की ओर दृष्टि डाली जाए तो दिखाई देता है कि धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, दिनमान जैसी पत्रिकाएं वर्षों पहले बंद हो गईं। इन पत्रिकाओं के बंद होने के पीछे के कारणों को टटोला जाए तो प्रकाशकों का कहना था कि इन पत्रिकाओं के प्रकाशन से उन्हें आर्थिक घाटा हो रहा था। साथ ही यह भी चर्चा उठी कि हिन्दी में साहित्यिक पत्रिकाओं के पाठकों में कमी होती जा रही है। पाठक संख्या और उत्पादन की मात्रा दोनों परस्पर पूरक कहे जा सकते हैं। यदि कोई पत्रिका पढ़ेगा नहीं तो वह किसके लिए प्रकाशित की जाएगी  लेकिन यह मिथक जल्दी ही टूट गया। हंस, वागर्थ, नया ज्ञानोदय, वर्तमान साहित्य, समीक्षा, पाखी, सामयिक सरस्वती, तद्भव आदि साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रति पाठकों की ललक ने साबित कर दिया कि पाठकों की संख्या में उतनी भी गिरावट नहीं आई है जितनी कि समझी जाने लगी थी।
       भारतेंदु हरिश्चंद्र ने वाराणसी से कविता केंद्रित पत्रिका ’कविवचनसुधा’ का प्रकाशन 15 अगस्त, 1867 को प्रारंभ किया था। इस तरह हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता के 150 वर्ष पूरे हुए। भारतेंदु ’कवि वचन सुधा’ में आरंभ में पुराने कवियों की रचनाएँ छापते थे जैसे चंद बरदाई का रासो, कबीर की साखी, जायसी का पदमावत, बिहारी के दोहे, देव का अष्टयाम और दीन दयाल गिरि का अनुराग बाग। लेकिन जल्द ही पत्रिका में नए कवियों को भी स्थान मिलने लगा। भारतेंदु ने एक स्त्री शिक्षोपयोगी मासिक पत्रिका की जरूरत को शिद्दत से महसूस किया और जनवरी, 1874 में ’बाला बोधिनी’ नामक आठ पृष्ठों की डिमाई साइज की पत्रिका प्रकाशित की। उसके मुखपृष्ठ पर यह कविता प्रकाशित होती थी -
जो हरि सोई राधिका जो शिव सोई शक्ति।
जो नारि सोई पुरुष या में कुछ न विभक्ति।।
सीता अनुसूया सती अरुंधती अनुहारि।
शील लाज विद्यादि गुण लहौ सकल जग नारि।।
पितु पति सुत करतल कमल लालित ललना लोग।
पढ़ै गुनैं सीखैं सुनै नासैं सब जग सोग।।
और प्रसविनी बुध वधू होई हीनता खोय।
नारी नर अरधंग की सांचेहि स्वामिनि होय।।

      इलाहाबाद (वर्तमान में प्रयागराज) उ.प्र. से वर्ष 1939 से प्रकाशित होने वाली भारतीय महिलाओं के लिए सचित्र मासिक पत्रिका ‘दीदी’ में लेखिकाओं को प्रमुखता से स्थान दिया जाता था यद्यपि उन दिनों बहुत कम लेखिकाएं थीं। जिन लेखिकाओं की रचनाएं ‘दीदी’ में निरंतर प्रकाशित होती थीं उनमें प्रमुख नाम थे- डॉ. विद्यावती ‘मालविका’, कंचनलता सब्बरवाल आदि। इसके बाद प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिकाओं में भी लेखिकाओं को पर्याप्त स्थान दिया जाता रहा है। क्योंकि एक लेखिका स्त्री जीवन को जितनी गहराई से साहित्य में अभिव्यक्त कर सकती है उतनी गहराई से एक लेखक नहीं कर सकता है। सद्यः प्रकाशित ‘अन्वेषिका’ इस अर्थ में और अधिक महत्वपूर्ण है कि इसमें लेखिकाओं के द्वारा लेखिकाओं की रचनाओं को प्रकाशित किया गया है।
       ‘अन्वेषिका’ का यह ताज़ा अंक ‘बेटी विशेषांक’ के रूप में प्रकाशित किया गया है। बेटी विषय पर केन्द्रित कुल 43 रचनाएं पत्रिका में हैं। इनमें सभी विधाओं को संजोया गया है। पत्रिका में हिन्दी साहित्य जगत की सुपरिचित कथालेखिका डॉ. शरद सिंह की कहानी ‘पराई बेटी’ के साथ ही निरंजना जैन की कहानी ‘सम्मान की खातिर’ तथा मधु गुप्ता की कहानी ’मेरा अक्स मेरी बेटी’ ने समाज में बेटियों के जीवन को बड़े रोचक एवं मर्मस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया है।
‘बेटियां’ शीर्षकों के अंतर्गत दो पृथक-पृथक लेखों में आलोचक डॉ. लक्ष्मी पाण्डेय तथा संध्या दरे ने बेटियों की क्षमता और योग्यता को तार्किक ढंग से सामने रखा है। पत्रिका में बेटियों के जीवन पर केन्द्रित तीन ग़ज़लें हैं, जिनमें ‘बेटी’ शीर्षक से एक गजल डॉ. वर्षा सिंह (अर्थात् मेरी) की, इसी शीर्षक से दूसरी गजल डॉ. राजश्री रावत की तथा तीसरी गजल ज्योति विश्वकर्मा की है जिसका शीर्षक है- ‘दो कुलों का दीपक जलाती हैं ये’। ‘एक पाती बेटी के नाम’ शीर्षक से एक रोचक पत्र लेखिका राजश्री मयंक दवे ने लिखा है जिसमें एक मां की अपनी बेटी के प्रति गर्व भरी भावना का उद्घाटन है।
       पत्रिका में डॉ. प्रेमलता नीलम का गीत ‘बेटी की पीड़ा’ के अतिरिक्त शेष रचनाएं कविता के रूप में हैं - ‘राजदुलारी मेरी बेटी’ मघु दरे, ‘बेटियां फूल सी’ पुष्पा चिले, ‘मां मुझको जग में आने दो’ डॉ. वंदना गुप्ता, ‘मेरी प्यारी बेटी’ नंदनी चौधरी, ‘स्मृतियां’ डॉ. छाया चौकसे, ‘बिटिया’ डॉ. चंचला दवे, ‘बेटियां स्वाभिमान बेटियां सम्मान’ डॉ. सरोज गुप्ता, ‘बेटी तू मन को लुभाने लगी’ ज्योति झुड़ेले, ‘बेटी’ जयंती सिंह लोधी, ‘पत्र जो लिखा नहीं’ डॉ. कविता शुक्ला, ‘हिन्द की बेटी हूं’ सुनीला सराफ, ‘बेटियां’ क्लीं राय, ‘बेटियां’ पारुल दरे, ‘बेटी’ सरिता जैन, ‘बधाई हो बेटी हुई’ विनीता केशरवानी, ‘मेरी बेटी’ शशी दीक्षित, ‘बेटी’ डॉ. ऊषा मिश्रा, ‘नहीं पराई बेटियां’ डॉ. नम्रता फुसकेले, ‘बेटी’ निशा शाह, ‘मैं बेटी हूं हिन्द की’ पुष्पलता पाण्डेय, ‘बेटियां’ शोभा सराफ, ‘बेटी’ अनीता पाली, ‘भारत की बेटी’ डॉ. अनूपी सर्मया, ‘बेटी  खास अहसास’ स्मिता गोड़बोले, ‘झट से रूठ जाना’ अंशिका गुलाटी, ‘मां-बाप की बगिया में’ कंचन केशरवानी, ‘बेटी’ निधि यादव, ‘बेटी’ भारती सोनी, ‘बेटी’ ज्योति दीक्षित, ‘त्याग की मूरत है बेटी’ पूनम साहू, ‘बेटियां’ सुनीता जड़िया, ‘हमारी बेटियां’ ऊषा बर्मन, ‘खूबसूरत सा ख्वाब होती हैं बेटियां’ किरण सराफ।
‘अन्वेषिका’ के इस अंक में हिन्दी लेखिका संघ, सागर की वर्ष भर संचालित हुई गतिविधियों की तस्वीरें तथा संघ की उपलब्धियों एवं कार्यों का विवरण भी प्रकाशित किया गया है। महिला रचनाकारों की रचनाओं की विषयगत विशेषता ने इस अंक को पठनीय एवं संग्रहणीय बना दिया है। सकारात्मक पक्ष यह भी है कि कि यह अंक ई पत्रिका के रूप में होने के कारण सहज उपलब्ध है। आज जब साहित्य समाज साहित्य की पठनीयता को ले कर तथा हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं की घटता संख्या के विषय में चिंतित है, ऐसे समय में ‘अन्वेषिका’ का प्रकाशन महत्वपूर्ण एवं प्रशंसनीय है।  
                 -----------------
#समीक्षा #आचरण #अन्वेषिका #पत्रिका #हिन्दी_लेखिका_संघ #सागर #हिन्दी_पत्रिका

Tuesday, March 31, 2020

प्रतिक्रिया गुलाब कोठरी जी के अग्रलेख पर....आध्यात्मिक चिंतन से दिशाबोध - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

             आज दिनांक 31.03.2020 को पत्रिका समाचारपत्र में राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठरी जी की कल दि. 30.03.2020 को प्रकाशित संपादकीय पर मेरी यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की प्रतिक्रिया प्रकाशित हुई है।
हार्दिक आभार पत्रिका 🙏



आध्यात्मिक चिंतन से दिशाबोध
       आध्यात्मिक चिंतनधारा मनोमस्तिष्क को निर्मल बनाती है। व्यक्ति की सोच अपने अंतःकरण की सोच से एकाकार हो कर कामनाओं को परिमार्जित करती है।  कोठरी जी के लेख आध्यात्मिक चिंतन को लिपिबद्ध करते हैं और दिशाबोध कराने की सामर्थ्य रखते हैं।
      - डॉ. वर्षा सिंह, साहित्यकार, सागर
 
       .... और यह है कोठरी जी की संपादकीय, जिसमें उन्होंने अपने आध्यात्मिक चिंतन पर कलम चलाई है...


Sunday, March 29, 2020

गुलाब कोठरी के अग्रलेख पर प्रतिक्रिया - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      गुलाब कोठारी भारत के एक सम्वेदनशील लेखक, पत्रकार तथा संपादक है एवं वर्तमान में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका के प्रधान सम्पादक है।  राजस्थान पत्रिका का सागर संस्करण पत्रिका के नाम से प्रकाशित होता है। कोठरी जी के लेखन के बारे में वेद विज्ञानी और जैन दर्शन के विद्वान दयानंद भार्गव विपुल का कथन है कि "जिस तरह गुलाब के कई रंग होते हैं, उसी तरह गुलाब कोठारी जब साधक होते हैं तो सफेद हो जाते हैं और जब बच्चों के साथ होते हैं तो गुलाबी और गुलाब के साथ कांटा भी होता है, इसलिए जब वे सम्पादकीय लिखते हैं तो कांटे की तरह काम करते हैं और किसी का भी फूला हुआ गुब्बारा पिचका देते हैं।"

गुलाब कोठरी

गुलाब कोठारी प्रत्येक सप्ताह लगभग 3-4 संपादकीय लिखते हैं जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारोत्तेजक होती हैं। इन पर पाठकों की प्रतिक्रियाओं को अग्रलेख पर प्रतिक्रिया के अंतर्गत प्रकाशित किया जाता है।

Sunday, March 1, 2020

चरित्र के दोहरेपन को उजागर करने वाले नाटक ‘‘कुत्ते’’ का सफल मंचन - डॉ. वर्षा सिंह, नाट्य समीक्षक


प्रिय मित्रों,    
      कल दिनांक 29.02.2020 यानी लीप ईयर की ख़ास तारीख़, इसलिए भी ख़ास थी मेरे लिए कि मुझे मेरे सागर शहर की अग्रणी संस्था अथग यानी अन्वेषण ग्रुप ऑफ थिएटर द्वारा स्थानीय रवींद्र भवन में मंचित विजय तेंदुलकर के लिखे चर्चित नाटक "कुत्ते" को देखने का अवसर मिला। मित्रों, ज़ाहिर है कि इस नाटक के मंचन पर मैंने अपनी राय प्रकट की और मैं शुक्रगुज़ार हूं उन प्रिंट और डिज़िटल मीडिया की जिन्होंने मेरी राय... समीक्षात्मक टिप्पणी को प्रकाशित किया।
हार्दिक धन्यवाद युवाप्रवर्तक 🙏 
जी हां, मेरे द्वारा लिखी नाट्य समीक्षा को web magazine युवा प्रवर्तक के अंक दिनांक 29 फरवरी 2020 में स्थान मिला है। 
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...

चरित्र के दोहरेपन को उजागर करने वाले नाटक ‘‘कुत्ते’’ का सफल मंचन

- डॉ. वर्षा सिंह, नाट्य समीक्षक   

     सीमित संसाधनों में नाटर की मंचीय प्रस्तुति को किस प्रकार सफलता के शिखर पर पहुंचाया जा सकता है, यह ‘कुत्ते’ नामक नाटक के मंचन को देख कर अनुभव किया जा सकता है। अन्वेषण थिएटर ग्रुप सागर द्वारा विजय तेंदुलकर लिखित नाटक ‘कुत्ते’ को शनिवार को लगातार दो शो में स्थानीय रवींद्र भवन में मंचित किया गया। नाट्य विधा के लिए प्रतिबद्ध अन्वेषण थिएटर ग्रुप का नाटकों के मंचन का अपना एक गरिमापूर्ण रिकाॅर्ड है। वहीं जगदीश शर्मा एक कुशल निर्देशक के रूप में पहले ही अपनी धाक जमा चुके हैं। ‘‘कुत्ते’’ नाटक में मुख्य रूप से दुष्कर्म जैसे अपराध के पीछे का मनोविज्ञान का खुलासा किया गया है।  शहर से दूर पिछड़े क्षेत्र में नियुक्त एक सेल्समैन, उसका एक बेहद चतुर-दुनियादार सहायक घोडके, एक प्रौढ़वय स्त्री और उसके कुत्ते। इस नाटक की कथा इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। एक कमजोर मानसिक चरित्र का व्यक्ति किस प्रकार स्त्री की सहजता को उसकी स्वीकृति मान बैठता है तथा आत्मनियंत्रण खो देता है, इस नाटक को देख कर भली-भांति समझा जा सकता है। सड़क, बाजार, दफ्तर हर जगह आज स्त्री स्वंय को असुरक्षित पाती है। इस असुरक्षा के कारणों की पर्तें खोलता अन्य नाटकों की तरह विजय तेन्दुलकर के यह नाटक भी मानव-जीवन की विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को बड़े कौशल से खोलता है और दर्शक को सोच के एक नए धरातल पर ले जाता है। रंगशिल्प और मंचीय भाषा के लिहाज से भी यह नाटक विशिष्ट है। अपनी नाट्य-विधियों और गतिमयता के कारण यह दर्शकों के लिए जितना रोचक है उतना ही मंचन की दृष्टि से चुनौती भरा है। ‘‘कुत्ते’’ देश के सुविख्यात नाटककार स्व.विजय तेंदुलकर द्वारा लिखा गया नाटक है। इस नाटक का विभिन्न शहरों में अनेक बार मंचन किया जा चुका है। सागर शहर में इस नाटक का प्रथम बार सार्वजनिक मंचन किया गया।
            नाटक के निर्देशक जगदीश शर्मा के अनुसार मंचन के पूर्व सभी कलाकारों ने जी-तोड़ रिहर्सल किया था। कलाकारों की मेहनत मंच पर स्पष्ट दिखाई थी। संवादों में स्वरों का उतार-चढ़ाव और भाव-भंगिमाएं कलाकारों की कला निपुणता को प्रमाणित करती रहीं।  संतोष दांगी सरस, करिश्मा गुप्ता, दीपगंगा साहू, मनोज सोनी, प्रवीण कैम्या और अतुल श्रीवास्तव ने अपने बेजोड़ अभिनय से नाटक की कथावस्तु में जान डाल दी। मंच पर कलाकारों ने जितना कुशल अभिनय किया उतना ही सुंदर प्रभाव देखने को मिला मंच सज्जा, लाईट एण्ड साउण्ड का। जिसके लिए सतीश साहू, राजीव जाट, कपिल नाहर, आकाश विश्व कर्मा, रिषभ सैनी, असरार पिंकी, समता झुडेले, राहुल सेन आदि प्रशंसा के पात्र हैं क्योंकि किसी भी नाटक के थियेटर-मंचन के लिए मंच सज्जा, लाईट एण्ड साउण्ड भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि नाटक का कथानक, संवाद और अभिनय। एक अच्छी बात यह भी थीकि साउंड इफैक्ट में अनावश्यक शोरगुल वाली ध्वनियों के बदले अत्यावश्यक एवं माईल्ड ध्वनियों का प्रयोग किया गया। पात्रों के वस्त्रविन्यास और मेकअप कथानक के समय और काल को बखूबी रेखांकित किया। इन सारे बिन्दुओं पर खरा उतरते हुए ‘‘कुत्ते’’ नाटक ने जहां एक ओर दर्शकों का मन मोह लिया, वहीं उन्हें यह बताया कि समाज में बढ़ते बलात्कार जैसे घृणित अपराधों के पीछे कैसी विकृत मानसिकता काम करती है। कहना होगा कि निर्देशक जगदीश शर्मा नाटक के माध्यम से समाज को संदेश देने में पूर्ण सफल रहे। नाटक को जिस प्रकार निर्भयाकांड जैसी घटनाओं से को-रिलेट किया गया, उसने इस प्रस्तुति को और अधिक सामयिक बना दिया। इस तरह के नाटकों का मंचन जहां शहर में नाट्यकला के प्रति अभिरुचि बढ़ाने के लिए जरूरी है वहीं अपराधों के विरुद्ध जनजागरूकता लाने के लिए भी आवश्यक है। मानव के दोहरे-तिरहे चरित्र को बारीकी से देखकर और समझ कर उससे दूरी बनाए रखते हुए स्वयं को सुरक्षित रखने का संदेश भी इस नाटक के माध्यम से बखूबी दिया गया। 
                         ---------------------


मेरी समीक्षात्मक रिपोर्ट प्रकाशित करने हेतु
हार्दिक आभार हरमुद्दा डॉट कॉम 🙏 
http://harmudda.com/?p=14791

हार्दिक आभार दैनिक "आचरण" , मेरी समीक्षात्मक रिपोर्ट प्रकाशित करने हेतु 🙏

हार्दिक धन्यवाद "पत्रिका" 🙏

हार्दिक धन्यवाद "दैनिक भास्कर" 🙏