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Friday, September 18, 2020

अंगना में ठाड़े बड्डे | बुंदेली व्यंग्य | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज मेरा बुंदेली व्यंग्य लेख "पत्रिका" समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏
बुंदेली व्यंग्य
              अंगना में ठाड़े बड्डे
                              - डॉ. वर्षा सिंह

       हमाए एक बड़े भैया जी आंए, जोन से हम बड्डे कहत हैं। भौतई नोनो सुभाव है उनखों। जोन चाए की मदद खों तैयार रैत हैं, मनो ना कहबो तो उन्ने सीखोई नईंया। बरहमेस, दूसरन के लाने अपनो पूरो टेम दे देत हैं। उनकी जेई आदत पे भौजी सो भारी खिजात हैं उन पे। मनो तनक सी डांट- डपट कर के बे सोई बड्डे खों संग देन लगत हैं। अब करें भी का। कोनऊ की मदद करे बिना उनखों जी सोई नईं मानत है। 
      हमाए बड्डे आयोजन करवाबे में भौतई एक्सपर्ट आएं। बे जोन आयोजन कराबे के लाने ‘‘हऔ’’ बोल देत हैं, तो मनो ऊ आयोजन कभऊं फेल तो होई नईं सकत आए। जा कोरोनाकाल के पैलें आयोजन कराबे के लाने उनके ऐंगर भीड़ लगी रैत्ती। काय से के उन्ने ऐसे-ऐसे आयोजन कराए के लोग देखतई रै गए। कोरोनाकाल में उन्ने भीड़-भाड़ बारो आयोजन खों काम बंद कर दौ है। काय से के बे कोरोना गाइडलाइन खों पालन कर रए हैं। बाकी कल बड्डे के संगे भौतई गजब भऔ। भओ जे के कल जब बे दुपैरी खों अपने अंगना में ठाड़े हते, उनके ऐंगर हरीरो सो सलूखा पैरे एक आदमी आओ, औ कहन लगो के हमाए लाने एक आयोजन करा देओ। 

    ‘‘काय को आयोजन?’’- बड्डे ने पूछी।

   ‘‘मोय सम्मान कार्यक्रम कराने है।’’ ऊने बड्डे से कही। फेर बोलो -‘‘अच्छो बड़ो सो आयोजन, जीमें हजार-खांड़ लुगवा-लुगाई जुड़ जाएं सो मनो मजो आ जाए।’’
‘‘अब न जुड़हें हजार-खांड, तुमें ओनलाईन कराने हो सो बोलो’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘जे ओन-फोनलाईन हमें नईं करानें। हमाए लाने तो तीनबत्ती से पूरो कटरा बजारे लों भर दइयो। बो भी रात नौ के बाद, काय से के दिन में तो उते हमाए भक्तन की भीड़ जुड़ई रैत आय। सम्मान करबे खों मजा तो मनो रातई में आहै।’’ हरीरो सलूखा बारे ने कही।

    ‘‘कोन को सम्मान, कैसो सम्मान, हमाई कछ्छू समझ में ने आ रओ। काय से के ई टेम पे भीड़-भाड़़ जोड़बे वारो कौनऊ आयोजन हम नईं करवा रए। औ रात की तो सोचियो भी नई।’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘ऐसो न बोलो भैय्या, तुमाओ बड़ो नाम सुनो है, तुमाए ऐंगर बड़ी आसा ले के आएं हैं।’’ बा गिड़गिड़ात भओ बोलो।

   ‘‘मनो तुम हो कौन? औ कौन को सम्मान करो चात हो?’’ बड्डे खिझात भए बोले।

   ‘‘हओ, सो तुम काए चीनहो हमाए लाने। काय से के तुम तो घरई में पिड़े रैत हो। चलो, हमाई बता देत हैं के हम को आएं। तो सुनो, हम कोरोना आएं। औ हमें उन औरन खों सम्मान करने है जो बिना मास्क लगाए, बिना डिस्टेंसिंग बनाए बजार-हाट में नांए-मांए घूमत रैत हैं। कोनऊ की नईं सुनत हैं। बे हमाए से मिलबे खों उधारे से फिरत हैं। सो हमें भी लग रओ है के हमें अपने ऐसे भक्तन खों सम्मान कारो चइए। काय, ठीक सोची ने हमने?’’ ऊने कही।

   अंगना में ठाड़े बड्डे ने इत्ती सुनी, औ लगा दई दौड़ कमरा के भीतरे। कोरोना हतो सो, अपनो सो मों ले के लौट गओ, बाकी हमाए बड्डे तभई, ओई टेम से उन औरन खों पानी पी-पी के कोस रए हैं जो गाइड- माइड लाईन भुला के कोरोना खों मूड़ पे बिठाए गली-गैल, बजार-हाट में खुल्ला मों लेके नांय-मांय सटत फिरत हैं। सो बड्डे कभऊं कोरोना खों गरियात हैं, सो कभऊं कोरोना भक्तन खों।
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Sunday, June 28, 2020

डॉ. विद्यावती "मालविका" का गीत | देव दया तुम करना | कोरोना के विरुद्ध | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों, यह है मेरी माता जी डॉ. विद्यावती "मालविका" द्वारा लिखा गया एक ताज़ा गीत ... जिसे wab magazine युवाप्रवर्तक ने दि. 16.06.2020 के अंक में प्रकाशित किया है।
हार्दिक आभार "युवाप्रवर्तक" 🙏
http://yuvapravartak.com/?p=35019
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कोरोना संक्रमण के विरुद्ध एक गीत :

देव दया तुम करना
             - डॉ. विद्यावती 'मालविका'

सहनशक्ति की कठिन परीक्षा, देव दया तुम करना।
कष्ट निवारण करना सारे, दया दृष्टि तुम रखना।

हम भारत की संतानों का अहित न होने पाए,
करें सामना साहस से हम यदि जो विपदा आए,
हम गंगा की पावन धारा, हमें निरंतर बहना।
सहनशक्ति की कठिन परीक्षा, देव दया तुम करना।

सूर्य मुदित हो उदित सर्वदा, हर्ष नित्य बिखराए,
निशा चंद्रमा औ तारों की अनुपम ज्योति सजाए,
सुप्त-जागृत आंखों देखा, हो पूरा हर सपना।
सहनशक्ति की कठिन परीक्षा, देव दया तुम करना।
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Thursday, June 4, 2020

प्रगतिशील लेखक संघ की ऑनलाइन पाक्षिक गोष्ठी में काव्यपाठ - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh
 प्रगतिशील लेखक संघ की रविवार 18.05.2020 को ऑनलाइन सम्पन्न हुई पाक्षिक गोष्ठी में मैंने प्रवासी मज़दूरों की व्यथा संदर्भित अपनी ग़ज़ल का पाठ किया... "कांधे पर है बोझ गृहस्थी का पांवों में छाले हैं। दर -दर की ठोकर लिक्खी है, खोटी क़िस्मत वाले हैं। गांव, गली, घर छोड़ा था सब, पैसे चार कमाने को, अब जाना ये महानगर भी दिल के कितने काले हैं।"
साहित्यिक आयोजनों के समाचारों को सदैव प्रमुखता से प्रकाशित करने में अग्रणी "दैनिक भास्कर" को बहुत बहुत धन्यवाद 🙏💐


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Thursday, May 7, 2020

विशेष लेख - कोरोना लाॅकडाउन और ऑनलाईन हास्य कविसम्मेलन - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
कृपया पढ़ें स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में आज प्रकाशित मेरा विशेष आलेख - " कोरोना लॉकडाउन और ऑनलाइन हास्य कवि सम्मेलन "। ( दैनिक, आचरण दि. 07.05.2020)
विशेष लेख -

        कोरोना लाॅकडाउन और ऑनलाईन हास्य कविसम्मेलन

          - डॉ. वर्षा सिंह
                                        
    कोरोना आपदा ने साहित्यकारों को भी घर के भीतर रहने को विवश कर दिया। कोरोना के कारण साहित्य के मंचीय कार्यक्रम, गोष्ठियां, कविसम्मेलन, सेमिनार आदि थम गए। लेकिन साहित्यकार किसी भी आपदा से कभी हार नहीं मानते। उन्होंने टेक्नालाॅजी का लाभ उठाते हुए आॅनलाइन साहित्यिक कार्यक्रम करने शुरू कर दिए। सागर नगर में जहां उमाकांत मिश्र जैसे साहित्यप्रेमी एवं नवाचारी आयोजक हों, वहां आॅनलाइन कविसम्मेलन की योजना बनते देर नहीं लगी। यूं भी प्रति वर्ष मई माह के पहले रविवार को सागर नगर की जागरूक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था श्यामलम् एवं ऑरिकल इवेंट मैनेजमेंट ग्रुप के तत्वाधान में विश्व हास्य दिवस के अवसर पर हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष कोरोना लाॅकडाउन के कारण यह आयोजन नहीं हो पा रहा था, किन्तु हमेशा नवाचार में आगे रहने वाली श्यामलम् संस्था ने अपने  व्हाटसएप्प ग्रुप पर हास्य कवि सम्मेलन ‘‘हास्य- व्यंग्य के रंग कोरोना के संग’’ का आॅनलाइन आयोजन किया। जिसमें नगर के कई प्रमुख कवियों ने काव्यपाठ किया। यह आयोजन सागर नगर के फिल्मी हास्य कलाकार स्व. श्यामाकांत मिश्र, हास्य कवि स्व. दिनकर राव दिनकर, मिमिक्री आर्टिस्ट स्व. शकूर खान को श्रद्धांजलि स्वरूप था। जिसका आरम्भ डाॅ. वर्षा सिंह द्वारा सरस्वती वंदना के साथ हुआ। यह सरस्वती वंदना कोरोना के विरुद्ध शक्ति ओर सुरक्षा की प्रार्थना के रूप में थी-
कोरोना के जाल में, लॉकडाउन काल में
शक्ति दें मुझे कि मैं, कोरोना से ना डरूं।
रच के कवित्त नित्य, आस्था- विश्वास के
दूसरों के मन को भी, भय से मुक्त मैं करूं।

डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया की अध्यक्षता में कवि कपिल बैसाखिया ने कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए सरस्वती वंदना के उपरांत व्यंग्य के पुरोधा डाॅ सुरेश आचार्य को आमंत्रित किया जिन्होंने अपने विशेष अंदाज में हास्य व्यंग्य के छींटे मारते हुए कहा कि -
कोरोना काल में
खास प्रार्थना है कि
कृपया घर में भी सोशल डिस्टेन्स बनाये रखें
वरना जनसंख्या वृद्धि करके
सब किए कराए पर पानी फेर के मत रख देना ।  

डाॅ. अरविंद गोस्वामी ने कोरोना पर काव्य पाठ करते हुए कहा कि -
चीन से आया है जो कोरोना का वायरस
दुनिया में फैलने पर बड़ा सस्पेंस है

डाॅ नलिन जैन की अभिव्यक्ति देखें-
जनता कफर््यू लगो है भैया निकरो ने तुम बाहर
वरना सड़क पे जो भी हुईये कर ने पैहो जाहर


 कवि आर.के.तिवारी ने ‘‘कोरोना रंगदार ’’ रचना प़ढ़ते हुए हास्य की चटपटी छौंक लगाई-
  देखो तो संसार में आ गओं जो कैसो रंगदार
  कि कर दओ सबको हाल खराब

कवि प्रभात कटारे ने हास्य कविताएं पढ़ते हुए ये चुटीली पंक्तियां प्रस्तुत कीं-
सैलूनें हैं बंद पार्लर डरे हैं तारे
गोरे नारे करिया हो गए, करिया गोरे नारे

रंगकर्मी कवि अतुल श्रीवास्तव ने लाॅकडाउन के दौरान पुरुषों की दशा पर हास्य का तड़का लगाया-
बर्तनों के ढेर पे रसोई के सिंक में,
जाकर उनपे पानी ही घुमा दिया।
दिन में एक आध बार कमरों में
कभी पोंछा लगा दिया।।
इस  लाॅकडाउन ने हमें अब ऐंसा बना दिया।।

कवि अशोक तिवारी ‘अलख’ ने अपने ही अंदाज में लाॅकडाउन का उल्लंघन करने वालों पर कुछ इस तरह कटाक्ष किया -
कोरोना संकट में भी वे, चैराहे  खों लपके।
तबईं कहूँ सें, चार पुलिस वारे, सिर पे आ टपके।
फिर का है, पीछे सें जब डंडा फटकारे चार,
पेण्ट निबक गई,भगे उतै सें, जैसें तैसें सटके।

कवि मणीकांत चैबे ने लोगों की वर्तमान मानसिक स्थिति को हास्यमय गम्भीरता से प्रस्तुत किया-
कोरोना ने बिठा रखा घर में आदमी है बहुत विवश
चंद पलों की मुस्कुराहट को हम मना रहे हास्य दिवस

कवयित्री डॉ. वर्षा सिंह ने लाॅकडाउन 3.0 पर अपनी दो हास्य बुंदेली रचनाओं का सस्वर पाठ किया जिनमें से एक गीत की पंक्तियां इस प्रकार थी-
इकनी, दुकनी, तिरका तीन।
लॉकडाउन की बज रई बीन।
टीवी, पेपर, मोबाईल पे
कोरोना के मुदके सीन।

कवयित्री श्रीमती निरंजना जैन ने अपनी व्यंग्य कविता प्रस्तुत की-
इस कोरोना ने तो क्या-क्या करवा दिया है
मुझ जैसे नास्तिक को आस्तिक बनवा दिया है

कवयित्री एवं कथाकार डॉ. सुश्री शरद सिंह ने कोरेना पर अपने दो बुंदेली हास्य गीतों का पाठ किया जिनमें एक गीत ‘बाम्बुलिया’ की तर्ज पर था। जबकि दूसरा बुंदेली ‘गारी’ की तर्ज पर था-
बे ओरें चमगादड़ खाएं
इते  हमें उल्टो लटकाएं
जे तरकीब समझ ने आई
ऐसी कम तैसी, कोरोना तुमाई

लेखिका श्रीमती सुनीला सराफ ने अपनी व्यंग्य रचना पढ़ते हुए कहा-
दरवाजे खिड़की बंदई रखियो
बिन्ना बाहर नेई निकरियो

कवि बृन्दावन राय सरल ने आल्हा की तर्ज पर कोरोना गीत पढ़ा-
कोरेना को रोग निरालो, दुनिया सब ईंसे थर्राय
जाल में ईके जो फंस जाबे, अपनी जान बचा ने पाय

कवि आशीष ज्योतिषी ने कोरोना पर राजनीतिक कटाक्ष करते हुए कविता पढ़ी कि-
काय करोना भैया, तुमने गजब कर दओ ।
जों सरकारें ने कर पाई, तुमने कर दओ ।

कवि डॉ.अनिल जैन ने भूत भगाने के समान कोरेाना को भगाने की बात अपनी कविता में कही-
ऐसी कविता कहो, कि डरकर भूत-पिशाच भी भागे
सुनकर उस कविता को आए कोरोना को रोना।

कवि वीरेन्द्र प्रधान ने वर्तमान परिदृश्य पर ये पंक्तियां पढ़ीं-
काम ढूंडबे तुम निकरत  ते रोजई बाहर घर सें,
आज लुके छिपे बैठे हौ घर में कोरोना के डर सें।

इस हास्य कवि सम्मेलन के कुशल संचालक कवि कपिल बैसाखिया ने अपनी हास्य कविता के जरिए सभी को गुदगुदाया-
धमा चैकड़ी मची घर में, सड़क पे पसरो सन्नाटो
करी जा  गत कोरोना ने, कौनऊं  तो ऊंको डांटो
दिन थे बे भौतई अच्छे, जिते मन ने कही, जात ते
अब तो घर घुस्सा हो गये, बने जेसे जे दिन काटो
                                     
कार्यक्रम के अध्यक्ष एवं कवि डॉ.श्याम मनोहर सीरोठिया ने अपना अध्यक्षीय उद्बबोधन देने के साथ ही  कोरेाना पर कविता पाठ करते हुए कहा कि-
कोरोना लाॅकडाउन के दौरान बाॅस का फोन आया
मैंने विनम्रतापूर्वक बतलाया कि सर....
अभी हाथ में झाड़ू है पोंछा है,
पहले घर का काम करूं फिर आपसे बात करूं

इस कवि सम्मेलन में एडवोकेट अंकलेश्वर दुबे अन्नी ने आयोजन के संबंध में विस्तृत जानकारी दी तथा आयोजन के अंत में श्यामलम के अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने आभार प्रदर्शन किया। इस आॅनलाइन हास्य कविसम्मेलन का बड़ी संख्या में लोगों ने रसास्वादन किया। सभी ने इसे बहुत सराहा तथा इस नवाचार का भरपूर स्वागत किया।
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Tuesday, May 5, 2020

विश्व हास्य दिवस के अवसर पर ऑनलाइन कवि सम्मेलन - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

      मई माह के पहले रविवार यानी 03 मई 2020 को विश्व हास्य दिवस के अवसर पर सागर नगर की जागरूक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था श्यामलम् एवं ऑरिकल इवेंट मैनेजमेंट ग्रुप  के तत्वाधान में श्यामलम्  के Whatsapp group पर On Line आयोजित हास्य कवि सम्मेलन "हास्य- व्यंग्य के रंग कोरोना के संग" में मैंने भी सहभागिता की। जिसमें मैंने सरस्वती वंदना का पाठ एवं साथ ही हास्य- व्यंग्य आधारित कोरोना /लॉकडाउन संदर्भित अपने दो बुंदेली गीतों का पाठ किया। दैनिक भास्कर, सागर संस्करण दिनांक 05.05.2020 में प्रकाशित समाचार आप सभी के अवलोकन हेतु...।

हार्दिक आभार Shyamlam Kala के अध्यक्ष भाई उमाकांत मिश्र जी 🙏 एवं सचिव भाई कपिल बैसाखिया जी 🙏

हार्दिक आभार ऑरिकल इवेंट मैनेजमेंट ग्रुप के संचालक भाई एड. अंकलेश्वर दुबे जी 🙏




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Friday, May 1, 2020

प्रलेस की ऑनलाइन कविगोष्ठी - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

     कोरोना लॉकडाउन के कारण इस दफ़ा प्रगतिशील लेखक संघ मकरोनिया इकाई, सागर की पाक्षिक गोष्ठी ऑनलाइन की गई। जिसमें मैंने बहन डॉ. शरद सिंह एवं अन्य सभी प्रतिभागियों ने कोरोना से बचाव संबंधी अपनी हिन्दी एवं बुंदेली कविताओं का वाचन किया। जिसका समाचार दैनिक भास्कर, सागर संस्करण  एवं वेब मैगजीन युवाप्रवर्तक में प्रकाशित हुआ है।

दैनिक भास्कर, सागर संस्करण
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   युवाप्रवर्तक में इस समाचार को पढ़ने के लिए कृपया इस link पर जाएं...
http://yuvapravartak.com/?p=30923
युवाप्रवर्तक को हार्दिक आभार 🙏









Tuesday, April 28, 2020

पारिवारिक रिश्तों को आईना दिखा रहा कोरोना लाॅकडाउन : यही समय है रिश्तों को सुधारने का - डाॅ वर्षा सिंह

   
Dr. Varsha Singh
    आज दिनांक 28.04.2020 को दैनिक "स्वदेश ज्योति" में प्रकाशित हुआ मेरा लेख यहां प्रस्तुत है... कृपया पढ़ कर प्रतिक्रिया से अवगत कराएं।
हार्दिक आभार स्वदेश ज्योति 🙏



पारिवारिक रिश्तों को आईना दिखा  रहा कोरोना लाॅकडाउन

यही समय है रिश्तों को सुधारने का
- डाॅ वर्षा सिंह,  वरिष्ठ लेखिका

      कोरोना लाॅकडाउन ने पारिवारिक रिश्तों के चेहरे से नक़ाब हटा दिए हैं। कहीं बंधन सुदृढ़ हुए हैं तो कहीं घरेलू हिंसा में वृद्धि हो गई है। कोरोना संकट के कारण देश व्यापी लॉकडॉउन चल रहा है। जिसके कारण सभी को पूरे समय घर पर ही रहना पड़ रहा है। ऐसे वक्त में पारिवारिक झगड़े होने लगे हैं। लॉकडॉउन के दौरान राष्ट्रीय महिला आयोग के पास अब तक बड़ी संख्या में शिकायतें घरेलू हिंसा को लेकर आ चुकी है। महिलाओं के प्रति होने वाले इन अपराधों की संख्या आम दिनों की अपेक्षा अधिक हैं, जो परिवार में महिलाओं की स्थिति को सामने लाती हैं। देखा जाए तो लाॅकडाउन ने महिलाओं की स्थिति का आकलन कर के उनका पारिवारिक जीवन सुधारने का एक मौका दिया है।
      भारतीय पारिवारिक संरचना मूलरूप से संयुक्त परिवार की रही है।’मनुस्मृति’ (3/56) में कहा गया है कि
‘‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।।   
      अर्थात जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते हैं और जहां स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है वहां पूर्व में किए गए समस्त अच्छे कर्म भी निष्फल हो जाते हैं। किन्तु आज महिलाओं का मान-सम्मान आए दिन धूल में मिलता रहता है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि पाश्चात्य प्रभाव के कारण ये संयुक्त परिवार न्यूक्लियर फैमली में ढलते जा रहे हैं जिनमें बुर्जुगों के लिए कोई स्थान नहीं है। युवा माता-पिता और स्कूल की आयु तक के बच्चे। स्कूल आयु पूरी करते ही बच्चे दूसरे शहरों के कोचिंग  सेंटर्स में चले जाते हैं और माता-पिता अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं के पीछे भागते रहते हैं। परिवार का भारतीय कंसेप्ट यह कभी नहीं रहा। ऐसे परिवारों में बच्चों में संस्कारों के बीज पनप ही नहीं पाते हैं। जब संस्कार नहीं होंगे तो महलिाओं के पगहत सम्मान की भावना कहां से आएगी? दरअसल जब सामाजिक संरचना के स्वस्थ नियमों को तोड़ा जाता है तो अस्वस्थ स्थितियां सामने आने लगती हैं। यही हो रहा है लाॅकडाउन के दौरान।
         पति-पत्नी जो चौबीस घंटे में छः-सात घंटे ही साथ में व्यतीत करते थे वे अब पूरे चौैबीस घंटे एक ही छत के नीचे साथ-साथ रह रहे हैं। इस स्थिति से अनेक परिवार अत्यंत प्रसन्न हैं क्योंकि वे जिस साथ के लिए तरसते थे वह उन्हें मिल रहा है। बच्चे अपने माता-पिता का भरपूर प्यार पा रहे हैं। माता-पिता भी अपने बच्चों का साथ पा कर उनकी इच्छाओं एवं उनके सपनों को समझ पा रहे हैं। इन सबके दौरान सबसे खुश है वे बुजुर्ग जो अकेलेपन से त्रस्त थे। ऐसे बुजुर्गों को अपने बच्चों, अपने नाती-पोतों सभी का साथ मिल रहा है। वे जिस भरे-पूरे घर का सपना देखते थे, उसे अपनी जागती आंखों से देख पा रहे हैं। लेकिन जैसे हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, लाॅकडाउन के दौरान पारिवारिक रिश्तों के भी दो पहलू हैं। एक पहलू खुशहाली का है तो दूसरा मार-पीट और हिंसा का।
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स्वदेश ज्योति - पारिवारिक रिश्तों को आईना दिखा  रहा कोरोना लाॅकडाउन यही समय है रिश्तों को सुधारने का- डाॅ वर्षा सिंह

#स्वदेश_ज्योति #लॉकडाउन #कोरोना #Varsha_Singh #परिवार #रिश्ते #हिंसा #StayAtHome

Sunday, April 26, 2020

विशेष लेख - कोरोना लाॅकडाउन और सागर का काव्यजगत - डॉ. वर्षा सिंह

   
Dr. Varsha Singh
   
      स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में कल दिनांक 25.04.2020 को प्रकाशित मेरा विशेष आलेख - " कोरोना लॉकडाउन और सागर का काव्य जगत "। 

विशेष लेख -

कोरोना लाॅकडाउन और सागर का काव्यजगत

             - डॉ. वर्षा सिंह

         सागर शहर अपनी अनूठी विशेषताओं का शहर है। यहां झील के रूप में प्राकृतिक छटा है तो काव्य के रूप में प्रतिभाएं मुखर हैं। कोरोना आपदा के विश्वव्यापी संकट के कारण सागर शहर में लाॅकडाउन का सन्नाटा पसरा हुआ है लेकिन सागर के साहित्यकारों की लेखनी थमी नहीं है। वे निरंतर सृजन कर रहे हैं। जहां एक ओर वे आमजनता को लाॅकडाउन के नियमों का पालन करने की समझाइश दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर कोरोना वारियर्स का हौलसा बढ़ा रहे हैं। तो यहां प्रस्तुत है सागर शहर के कुछ कवियों की वे कविताएं जो कोरोना संकट पर केन्द्रित हैं।

प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी 
         तो आरम्भ प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी की कविता के इस अंश से जो कोरोना की भयावह स्थिति का दृश्य प्रस्तुत करती है-

लाकडाउन काल
सड़कों पर डंसता  सन्नाटा  देखा है

हंसता जीवन
सहमा सहमा और डरावना देखा है

महामारी कोरोना
लोगों के दिल की धड़कन  बढ़ते देखा है

जान है तो जहान है
इस सच  को जीते देखा है

कोरोना का भयावह संक्रमण
लोगों को अति बेबस  होते देखा है

Dr. Sharad Singh
      कोरोना की ये भयावहता ही है जिसने हर व्यक्ति को अपने घर के भीतर क़ैद कर दिया है क्योंकि इस क़ैद में ही जीवन की सुरक्षा है। इसीलिए कवयित्री डॉ (सुश्री) शरद सिंह अपनी बुंदेली गीत के द्वारा हर व्यक्ति से निवेदन करती हैं कि -

लॉकडाउन को पालन कर लेओ
सुन लेओ, भैया मोरे।

जेई सबई खों बचा सकत है
हाथ तुमाए जोरे।

पूरो लॉक करा दओ सागर
ऐसी करी घुमाई
बचो रहे अब सागर सगरो
कर लेओ जेई दुहाई

सबई के प्रानन पे बन जेहे
कोऊ किवरिया खोरे
हाथ तुमाए जोरे।।

 
कपिल बैसाखिया
   संकट के दिन कितने भी लम्बे क्यों न लगें किन्तु यदि धैर्य से बिताए जाएं तो आसानी से व्यतीत हो जाते हैं। कुछ यही बात कवि कपिल बैसाखिया अपने इन दोहों के माध्यम से सभी को समझाना चाहते हैं-                       

मन से हों मजबूत हम, रहे तन सावधान।
दूरी में  ही निकटता, अपने पन का भान।।

कुछही दिन की बात है, लाना है बदलाव।
घर में हों गर कैद  हम, होगा तभी बचाव।।

 
डॉ. वर्षा सिंह
     लेकिन कुछ लोग जो स्थिति की गंभीरता को अनदेखा कर के लाॅकडाउन के नियमों को तोड़ते रहते हैं वे स्वयं को संकट में तो डालते ही हैं, साथ ही अपने परिचितों, मित्रों और रिश्तेदारों के लिए भी प्राणघातक बन बैठते हैं। ऐसे लोगों के कारण ही लाॅकडाउन की अवधि बढ़ाने की नौबत आई है। तो कवयित्री डॉ. वर्षा सिंह यानी मैं भी बुंदेली में ऐसे लोगों से निरंतर प्रार्थना करती रहती हूं कि-

तीन पांच लों लॉकडाउन है, तीन पांच ने करियो।
तारा डारे हम घर बैठे, तुम अपने घर  रहियो।।

पुलिस, कलक्टर संगे हमरे, संगे पीएम, सीएम,
सात बचन खों पालन करबै में तनकऊ ने डरियो।।

ढाल बने से खड़े वारियर, देत सुरक्छा हमखों,
उन ओरन की सच्चे मन से जयकारे सब करियो।।

 
डॉ नलिन जैन
     सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना और बार-बार हाथ धोना बचा सकता है कोरोना के खतरे से। इस तथ्य को कवि नलिन जैन अपनी काव्य रचना में कुछ इस प्रकार कहते हैं-

स्टे  एट  होम  ही,  हुआ  जरूरी  आज
क्षुद्र  वायरस  देखिये,  संक्रमण  है काज

करिये  कसरत रोज ही, आधा  घंटे  रोज
कफ इससे पिघले स्वयं, ठहरे ना ये नोज

कुछ भी ना पकड़े अभी,सतह जो भी अंजान
सेनिटेशन  कीजिये, बार - बार  यह  काम

अशोक मिज़ाज बद्र
     ऐसे लोग जो सुरक्षा के लिए लगाए गए लाॅकडाउन के महत्व को समझ नहीं रहे हैं और संक्रमण का एक भी केस सामने आने पर ढिठाई ओढ़ कर सारी जिम्मेदारी सरकार पर मढ़ने लगते हैं, उन्हें उलाहना देते हुए शायर अशोक मिजाज कहते हैं-

मौतों के आंकड़ों से खबरदार नहीं है।
क्या अपनी जिंदगी से तुझे प्यार नहीं है।

खुद अपनी देखरेख हमें करनी पड़ेगी,
हर शय की जिम्मेदार तो सरकार नहीं है।

 
सतीश पाण्डेय
  जिस तरह हमारा देश और हम कोरोना संकट से लोहा ले रहे हैं आज पूरा विश्व उसकी प्रशंसा कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी ‘रामायण’ का संदर्भ उद्धृत करते हुए ‘लक्ष्मणरेखा’ का स्मरण कराया कि यदि हम सुरक्षा की लक्ष्मणरेखा नहीं लांघे तो कोराना हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यही बात कवि डाॅ. सतीश पाण्डेय अपने इन दोहों में समझाते हुए कुछ इस प्रकार कहते हैं-

लक्ष्मण रेखा खीच कर , कोरोना से जंग ।
बात सभी ने मान ली , फिर होंगें रसरंग ।

करें सहन थोड़े दिवस , कठिनाई यदि देश।
संयम नियम विवेक से होगा शुभ परिवेश।।

जप तप पूजा पाठ भी , तभी करेंगे काम ।
लॉकडाउन के नियम का,पालन हो अभिराम।।

     कोरोना आपदा और लाॅकडाउन ने सागर शहर के विविध विषयों पर कविता करने वाले कवियों को जिस प्रकार कोरोना आपदा रूपी एक विषय में सूत्रबद्ध कर दिया है, उसी प्रकार प्रत्येक नागरिक को एकसूत्रीय होते हुए आपदा के नियमों का पालन करते हुए धैर्य और संयम का परिचय देना चाहिए तभी हम कोरोना रूपी राक्षस का विनाश कर सकेंगे। 

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( दैनिक, आचरण  दि. 25.04.2020)
#आचरण

Wednesday, April 22, 2020

पृथ्वी दिवस विशेष : पृथ्वी दिवस , लॉकडाउन और पर्यावरण - डॉ वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

पृथ्वी दिवस , लॉकडाउन और पर्यावरण
         - डॉ वर्षा सिंह

आज अर्थ डे यानीे पृथ्वी दिवस है।
      ... और अपनी इस 'अर्थ' पर कोरोना वायरस के 'अनर्थ' के बादल छाए हुए हैं। तो आईए हम संकल्प लें कि लॉकडाउन के नियमों का पालन कर हम बचे रहेंगे और पर्यावरण संरक्षण नियमों का पालन कर बचाए रहेंगे अपनी धरती यानी Mother Earth को अर्थ डे यानी पृथ्वी दिवस एक वार्षिक इवेंट है जिसे दुनियाभर में आज यानी की 22 अप्रैल को पर्यावरण संरक्षण के लिए मनाया जाता है। इसे पहली बार साल 1970 में मनाया गया था। इस साल पृथ्वी दिवस के 50 साल पूरे हो रहे हैं जहां इसका थीम 'क्लाइमेट एक्शन' रखा गया है। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए "पृथ्वी दिवस या अर्थ डे" मनाया जाता है। इस आंदोलन को यह नाम जुलियन कोनिग द्वारा सन् 1969 को दिया था। इसके साथ ही इसे सेलिब्रेट करने के लिए अप्रैल की 22 तारीख चुनी गई।
       इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य लोगों को पृथ्वी और पर्यावरण के संरक्षण हेतु जागरूक करना है। आधुनिक काल में जिस तरह से मृदा अपरदन हो रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रहा है और प्रदूषण फ़ैल रहा है, इनसे पृथ्वी का ह्वास हो रहा है। ऐसी स्थति में पृथ्वी की गुणवत्ता, उर्वरकता और महत्ता को बनाए रखने के लिए हमें पर्यावरण और पृथ्वी को सुरक्षित रखने की जरूरत है। इन महत्वकांक्षी उद्देश्यों को पूरा करने हेतु हर साल 22 अप्रैल पृथ्वी दिवस मनाया जाता है।
          इस वर्ष वर्तमान समय में कोरोना वायरस  के चलते पूरे देश में लॉकडाउन है। हम सभी जानते हैं कि लॉकडाउन का अर्थ है तालाबंदी ।     
लॉकडाउन एकआपातकालीन व्यवस्था है जो किसी आपदा या महामारी के वक्त लागू की जाती है। जिस इलाके में लॉकडाउन किया गया है उस क्षेत्र के लोगों को घरों से बाहर निकलने की अनुमति नहीं होती है। उन्हें सिर्फ दवा और खाने-पीने जैसी जरूरी चीजों की खरीदारी के लिए ही बाहर आने की इजाजत मिलती है, इस दौरान वे बैंक से पैसे निकालने भी जा सकते हैं.जिस तरह किसी संस्थान या फैक्ट्री को बंद किया जाता है और वहां तालाबंदी हो जाती है उसी तरह लॉक डाउन का अर्थ है कि आप अनावश्यक कार्य के लिए सड़कों पर ना निकलें। अगर लॉकडाउन की वजह से किसी तरह की परेशानी हो तो आप संबंधित पुलिस थाने, जिला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक अथवा अन्य उच्च अधिकारी को फोन कर सकते हैं। लॉकडाउन जनता की सहूलियत और सुरक्षा के लिए किया जाता है.सभी प्राइवेट और कॉन्ट्रेक्ट वाले दफ्तर बंद रहते हैं, सरकारी दफ्तर जो जरूरी श्रेणी में नहीं आते, वो भी बंद रहते हैं।
       लॉकडाउन कोरोना की जंग से जीतने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के लिए भी काफी अहम साबित हो रहा है। इन दिनों हवा एकदम साफ हो गई है, लॉकडाउन खुलने के बाद भी इस समय का अध्ययन भविष्य में प्रदूषण नियंत्रण की राह तैयार करेगा। करीब तीन सप्ताह से चल रहे लॉकडाउन से समूची पृथ्वी पर पर्यावरण में व्यापक स्तर पर बदलाव देखने को मिला है। पेट्रोल और डीजल चालित वाहन बंद होने से हवा की गुणवत्ता ही नहीं सुधरी बल्कि औद्योगिक इकाइयां बंद होने से नदियों के पानी भी काफी साफ दिखाई दे रहा है। हर स्तर के आयोजन बंद होने और जनता के भी घरों में ही रहने के कारण ध्वनि प्रदूषण के स्तर तक में खासी गिरावट दर्ज की गई है। इस बदलाव पर तमाम अध्ययन भी किए जा रहे हैं।
    पृथ्वी दिवस पर यह तथ्य विचारणीय है कि भविष्य में हमें पृथ्वी पर प्रदूषण रोकने की दिशा में सार्थक कार्य करने होंगे।
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सागर, म.प्र.

प्रिय मित्रों, यह है मेरा युवाप्रवर्तक के आज दिनांक 22.04.2020 के अंक में प्रकाशित मेरा लेख " पृथ्वी दिवस , लॉकडाउन और पर्यावरण" ।
युवा प्रवर्तक के प्रति हार्दिक आभार 🙏
मित्रों, यदि आप चाहें तो पत्रिका में इसे इस Link पर भी पढ़ सकते हैं ...
http://yuvapravartak.com/?p=29999







#earthday  #लॉकडाउन
#MotherEarth. #पृथ्वीदिवस
#युवाप्रवर्तक #कोरोना

Wednesday, April 1, 2020

कोरोना, लॉकडाउन और हम - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh


  कोरोना, लॉकडाउन और हम
लॉकडाउन के अनुभवों से सीख लें
             - डॉ. वर्षा सिंह
     कुछ दिनों से मेरे घर में गौरैया चिड़िया ने नल की पाईपलाईनों के बीच एक घोंसला बनाया हुआ है। लॉकडाउन से पहले अपने कामों की व्यस्तता के कारण इस ओर मेरा ख़ास ध्यान गया ही नहीं था। अब जबकि लॉकडाउन के चलते लगातार चौबीसों घंटे  पिछले एक सप्ताह से मैं अपने घर पर ही  हूं तो सुन रही हूं गौरैया के नन्हें बच्चों की वे आवाजें जो दिन भर पूरे घर में गूंजती रहती हैं।
  हां बहुत सी ऐसी चीजें है जिनका एहसास हम घर से बाहर रहकर कर ही नहीं पाते हैं। यह जरूर है कि लॉकडाउन की स्थिति में हमें लगातार घर में रहने के लिए विवश होना पड़ा है और यह लॉकडाउन भी कोरोना वायरस के संक्रमण की विभीषिका से बचाने के लिए लागू किया गया है किंतु हर एक लाभप्रद बात के पीछे अनेक पॉजिटिव बातें भी निहित होती हैं। यदि घर से बाहर नहीं जा पाने को माइनस प्वाइंट मानें तो लॉकडाउन का प्लस प्वाइंट यह है कि घर में रहकर हम घर में होने वाली उन चीजों को भी अब जान रहे हैं जिन्हें जानने की फुर्सत हमें पहले कभी नहीं मिल पाई है।      
           जहां तक लॉकडाउन की स्थिति में समय व्यतीत करने का प्रश्न है तो महिलाओं के पास कार्यों की कमी कभी नहीं रहती है । सुबह उठने से लेकर रात को बिस्तर पर जाने के बीच कितने छोटे-बड़े काम महिलाओं के जिम्मे सुपुर्द रहते हैं कि उन्हें करते - याद रखते हुए ही पूरा दिन व्यतीत हो जाता है । अब जबकि बाहरी कार्य जैसे कहीं आना-जाना किसी से मिलना-जुलना, अन्य सामाजिक कार्यों की व्यस्तताएं बिल्कुल भी नहीं हैं, किसी किस्म के साहित्यिक आयोजन भी नहीं हो रहे हैं तो मैं घर में रहकर उन कामों की ओर स्वयं को केंद्रित कर रही हूं जिन्हें करने की इच्छा होने के बावजूद मैं कर नहीं पाई थी। इन कामों की सूची में सबसे पहला काम मम्मी यानी मेरी माता जी के पास बैठकर उनकी बातें सुनना भी शामिल है । घर के बड़े बुजुर्ग कई दफा हमें आवाज़ देते हैं, वे अपनी कोई बात कहना चाहते हैं लेकिन समय के अभाव में ठीक उसी वक्त हम उन पर ध्यान नहीं दे पाते हैं, उनका कहा सुन नहीं पाते हैं । बाद में जब हम फुर्सत में हो कर उनकी बात सुनने जाते हैं तब तक वे भूल चुके होते हैं कि वे क्या कहना चाह रहे थे और यहां-वहां की छोटी-मोटी बात होकर रह जाती है। वे अपने मन की बात जस की तस कर ही नहीं पाते । लॉकडाउन के दौरान मैंने महसूस किया कि माता-पिता के प्रति बच्चे अपना दायित्व तभी अच्छी तरह निभा सकते हैं जब किसी एक दिन वे पूरी तरह माता-पिता की सेवा में व्यतीत करें, उनकी बातें सुनें। अब जबकि लॉकडाउन की स्थिति है तो तत्काल ही उनकी वे सभी बातें सुनकर हम उनके मन को संतुष्ट रहे हैं, जिनका एहसास हम घर से बाहर रहकर कर ही नहीं पाते हैं।
      तो मुझे लगता है कि भविष्य में आने वाले दिनों में जब लॉकडाउन की स्थिति समाप्त हो जाएगी और हम पुनः सामान्य जीवन के दैनिक कार्य करने लगेंगे तब उस वक्त इस लॉकडाउन के अनुभवों से सीख ले कर सप्ताह में कोई एक दिन हम ऐसा चुने जिसमें हम अधिक से अधिक समय अपने घर के बुजुर्गों के साथ पूरी तरह समर्पित भाव से व्यतीत करें। इस तरह घर के बुजुर्गों को भी आत्मसुख का अनुभव करा सकते हैं और स्वयं भी आत्मसंतुष्टि पा सकते हैं। 
   जहां तक प्रशासन की बात है तो लॉकडाउन में कम से कम मुझे तो इस बात की पूरी तरह संतुष्टि है कि मेरे शहर सागर का प्रशासन बहुत चुस्त है। पूरी तरह समर्पण भाव के साथ हमारी जिले के अधिकारी, पुलिस विभाग और प्रशासन के साथ समाजसेवी, पत्रकार सभी जागरूकता से सेवा कार्यों में लगे हैं। ज़िला प्रशासन का जिम्मा जिला कलेक्टर प्रीति मैथिल नायक के पास है जो एक महिला हो कर पूरी तत्परता के साथ मैदानी निरीक्षण -परीक्षण कर जनता को हर प्रकार की हर संभव सुविधाएं, मदद आदि उपलब्ध कराने के लिए तत्परता से कार्य कर रही हैं। इसी प्रकार पुलिस विभाग में कार्यरत समस्त स्टाफ हर समय लॉकडाउन में अपने घरों में बंद नागरिकों की सुरक्षा-सुविधा के प्रति जागरूकता के साथ अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने कोरोना संक्रमण से सुरक्षित रखने का जो लॉकडाउन का क़दम उठाया है, वह वास्तव में स्तुत्य है। इस तरह का कदम हमारे देश के सुरक्षा के लिए अत्यंत जरुरी है ।
     तो आइए हम सभी मिल जुलकर लॉकडाउन के शेष बचे हुए दिनों में निर्धारित नियमों का पूरी आस्था के साथ पालन करें ताकि हम, हमारा परिवार, समाज, देश और साथ ही संपूर्ण विश्व सुरक्षित रह कोरोना वायरस की इस संक्रमणकारी आपदा से मुक्ति पा सके।
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मेरे इस लेख को तीनबत्ती न्यूज डॉट कॉम में प्रकाशित किया गया है। यदि आप चाहें तो निम्नलिखित link पर जा कर इसे पढ़ सकते हैं....
https://www.teenbattinews.com/2020/03/blog-post_905.html




Saturday, March 28, 2020

लॉकडाउन में कलम और मुखर, क्या खूब लिख रहे हैं साहित्यकार - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     दैनिक भास्कर ने आज 28 मार्च 2020 के अंक में प्रकाशित किया है कि सागर शहर के साहित्यकारों द्वारा कोरोना संदर्भित कौन सी कविताएं लिखी जा रही हैं... भास्कर ने प्रश्न उठाया है कि.... "अपने शहर और देश के साथ कलम के सिपाही भी इन दिनों लॉकडाउन में हैं। लेकिन क्या उनकी कलम भी लॉक हो गई है? "

   भास्कर ने ही फिर उत्तर देते हुए लिखा है  .... "जी, नहीं।भास्कर ने जब अभिव्यक्ति के इन अधिष्ठाताओं से बात की तो पाया कि आयोजन थमे हैं, कलम तो और भी ज्यादा मुखर हो उठी है। हां , विषय जरूर बदले हुए हैं। साहित्यकार अपने समय को जीता है और उसे ही अभिव्यक्त भी करता है। यही इस समय देखने को मिल रहा है। कोरोना महामारी ने दुनिया को जिस तरह से हलाकान कर रखा है , कवि-साहित्यकारों ने उसे पूरी तीव्रता के साथ अनुभूत किया है और शब्द- शक्ति का लगातार प्रहार भी वे इसेक खिलाफ कर रहे हैं। अलग-अलग रचनाओं में कहीं साहस नजर आता है, कहीं समझाइश तो कहीं भरोसा कि इस संकट से हम जल्द ही उभर जाएंगे।
महिला लेखिकाओं और कवयित्रियों के तेवर भी भी तीखे हैं। चर्चित लेखिका शरद सिंह लिखती हैं-

हो वक़्त बुरा कितना, आख़िर तो बदलता है।
दीवार कोरोना की, जल्दी है इसे ढहना।


वरिष्ठ गजलकार डॉ. वर्षा सिंह इसे एकता के रंग से जोड़तीं हैं और उसी में इसका हल देखतीं हैं-

कोरोना समझे नहीं, रंग, धरम ना जात।
मिल कर लें संकल्प हम, देनी होगी मात।।"



Friday, March 27, 2020

बारह दोहे और एक ग़ज़ल कोरोना से जंग पर - "लॉकडाउन" - डॉ. वर्षा सिंह

   
डॉ. वर्षा सिंह
 
       सावधानी में ही सुरक्षा है। कोरोना वायरस के संक्रमण जन्य महामारी को रोकने के लिए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने देश में 21 दिनों का लॉकडाउन दिनांक 24 मार्च 2020 से 14 अप्रैल2020 तक के लिए घोषित किया है।

आइए जानते हैं कि लॉक़डाउन में होता क्या है।

1. घर में रहना पड़ेगा
इस दौरान सबको घर में ही रहने होता है। जनता को घर से बाहर निकलने पर रोक है। हालांकि आप अपने जरूरी काम के लिए बाहर निकल सकते हैं। लेकिन दूसरे लोगों से मिलना जुलना, सामाजिक व्यवहार, सैर सपाटा, खाना पीना, दफ्तर इत्यादि सब पर रोक है।

2. क्या क्या बंद रहेगा
इस दौरान सभी प्राइवेट और कॉन्ट्रेक्ट वाले दफ्तर बंद रहते हैं। सरकारी दफ्तर जो जरूरी श्रेणी में नहीं आते, वो भी बंद रहते हैं।

3. क्या नहीं कर सकते
इस दौरान सड़क पर नहीं निकल सकते। पांच या पांच से ज्यादा लोगों के एक साथ एकत्र होने पर रोक है। यदि आप घर से बाहर निकलते हैं तो आपको सड़क पर गश्त कर रहे पुलिस कर्मचारी को बताना होगा कि आप किस काम से जा रहे है।

4.दफ्तर वाले क्या करेंगे
हालांकि लॉकडाउन के दौरान दफ्तर बंद कर दिए गए हैं लेकिन आप दफ्तर का काम घर से कर सकते हैं। सभी दफ्तरों को चाहें वो निजी हों या ठेके पर,  उन्हें घर से ही अपने दफ्तर के काम सुचारू करने होंगे। इसके लिए कंपनी व्यक्ति को सैलरी देने के लिए बाध्य है।


5. क्या क्या बंद होगा
स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, मॉल, दुकानें, सिनेमाहाल, धार्मिक स्थल, स्विमिंल पूल व अन्य संस्थान बंद रहते हैं। यहां जाना मना है। अगर ये खुलते हैं तो कार्रवाई होगा।

6. क्या क्या खुला रहेगा
लॉक डाउन के दौरान सबसे अच्छी बात ये है कि इस दौरान राशन, दूध, फल-सब्जी, दवाई की दुकानें खुली रहेंगी। पेट्रोल पंप, सीएनजी पंप, गैस सिलेंडर की आपूर्ति, बिजली पानी की सेवा, डॉक्टर, अस्पताल. फायर सर्विस, म्यूनिसिपल दफ्त, प्रिंट और इलेक्ट्रानिक माडिया के दफ्तर, बैंक के एटीएम, टेलीकॉम सेवाएं पूरी तरह खुली रहेंगी। यानी कि आपको सामान्य जीवन जीने के लिए तमाम तरह की जरूरी चीजों की आपूर्ति होती रहेगी। बस आप घर से बाहर नहीं निकल सकते।

    यहां प्रस्तुत हैं मेरे द्वारा लिखे बारह दोहे कोरोना से जंग पर ....

"लॉकडाउन" में है निहित...
                    - डॉ. वर्षा सिंह

कोरोना समझे नहीं, रंग, धरम ना जात।
मिल कर लें संकल्प हम, देनी होगी मात।।1।।

कोरोना की आपदा, मनुज रहा है झेल ।
रहें एकजुट हम अगर, यह भी होगा फेल।।2।।

सार्स, इबोला से नहीं ,घबराया इंसान।
कोरोना के घात का, हमको है संज्ञान।।3।।

शहर, देश, दुनिया सभी पर संकट की छांव।
बच कर स्वयं, बचाइए, अपनी बस्ती-गांव।।4।।

बहुत बुरा यह संक्रमण, इतना लीजे जान।
टीका इसका है नहीं, जा सकती है जान ।।5।।

मानव हैं हम, ये सदा हमें रहेगा भान।
करना हमें सदैव है नए-नए संधान।।6।।

कोरोना का भी कभी निकलेगा कुछ तोड़।
वर्तमान में दीजिए सभी बुराई छोड़।।7।।

"लॉकडाउन" में है निहित, सबके हित की बात।
इसी तरह दे पायेंगे, कोरोना को मात ।।8।।

वहां सुरक्षित हैं सभी, जहां सतर्क इंसान।
दूर भ्रमों से रह करें सच्चाई का भान ।।9।।

दूरी रखिए आपसी, नहीं घूमने जाएं ।
पालन वह सब कीजिए, जो पी.एम. समझाएं।।10।।

भय मन में मत पालिए, किन्तु न निर्भय होंए ।
सैनेटाइजर से सदा हाथों को मल धोंए ।।11।।

"वर्षा" भारत भूमि पर यह अप्रैल औ मार्च।
जग को पथ दिखला रहा, बन कर जलती टार्च ।।12।।
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       कोरोनावायरस को फैलने से रोकने के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी के द्वारा खींची गई एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा को महसूस करते हुए मैं, आप, हम सभी भारतवासी 21 दिन के लॉकडाउन का पालन करते हुए अपने घर से बाहर नहीं निकल रहे हैं ... तो पढ़िए मेरी यह ग़ज़ल ....

ग़ज़ल
दौर है ये आज़माइश का
         - डॉ. वर्षा सिंह

दौर है ये आज़माइश का, ज़रा धीरज धरो
कुछ दिनों की बात है फिर ख़ूब मनचाहा करो

स्याह पन्ने फाड़ कर उजली कथाएं कुछ लिखो
पृष्ठ जो हैं रिक्त, उनमें रंग जीवन का भरो

ख़ुद के दुख की दास्तानों का न कोई अंत है
भूल अपने ग़म सभी तुम पीर ग़ैरों की हरो

वक़्त है एकांत का, रहना स्वयं की क़ैद में
अब मनुजता को स्वयं के धैर्य से तारो- तरो

याद रखना वक़्त रुकता है न अच्छा ना बुरा
खेल सारा कुछ पलों का है तो आखिर क्यों डरो

मृत्यु की तय है घड़ी और ज़िन्दगी के दिन भी तय
सोच कर अंतिम क्षणों को किसलिए प्रतिपल मरो

शुष्कता ने बोरियत से भर दिया वातावरण
बन के "वर्षा"- बूंद, सूखी इस धरा पर तुम झरो
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#ग़ज़लवर्षा
#StayHome
#कोरोनावायरस