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Friday, August 28, 2020

सागर : साहित्य एवं चिंतन 71| डॉ. राजेश दुबे : कविता और व्यंग्य के साहित्यकार | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार डॉ.राजेश दुबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

            डॉ. राजेश दुबे : कविता और व्यंग्य के साहित्यकार
                        - डॉ. वर्षा सिंह
                                         
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परिचय :- डॉ. राजेश दुबे
जन्म :-  01 जुलाई 1953
जन्म स्थान :- सागर
माता-पिता :- श्रीमती राजेश्वरी दुबे एवं श्री चन्द्र कुमार दुबे
शिक्षा :- एम.ए., पीएच.डी.
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन :-  तीन पुस्तकें प्रकाशित
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     सागर शहर का हिन्दी साहित्य न केवल समृद्ध है, बल्कि निरंतर ऊर्जावान है। कवियों और लेखकों की लेखनी से सागर की साहित्यिक भूमि किसी उपवन की तरह शब्दों के नैनाभिराम दृश्य और भावनाओं की सुगंध से सुसज्जित रहती है। अनेक नवोदित साहित्यकारों ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए यहां श्रमसाघ्य लेखन किया है। इसी संदर्भ में कवि एवं लेखक डॉ. राजेश दुबे का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने अपनी तीन पुस्तकों के प्रकाशित होते-होते सागर के साहित्य जगत में अपनी एक विशेष पहचान बना ली। श्री चन्द्र कुमार दुबे एवं श्रीमती राजेश्वरी दुबे के पुत्र के रूप में 01 जुलाई 1953 को सागर में जन्में राजेश दुबे का एक परम्परावादी एवं धार्मिक विचारों से परिपूर्ण परिवार में लालन-पालन हुआ। आगे चल कर उन्होंने हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। इसके बाद ‘प्रेमचंद परम्परा और वर्तमानकालीन हिन्दी उपन्यास-1960 के उपरांत’ विषय में सागर विश्वविद्यालय से पी. एचडी. की उपाधि प्राप्त की। आजीविका के क्षेत्र में उन्होंने राज्य प्रशासनिक सेवा करते हुए डिप्टी कलेक्टर पद से सेवानिवृत्त हुए।
       डॉ. राजेश दुबे को साहित्य, धर्म दर्शन एवं समाजविज्ञान में सदैव रुचि रही है। जिसकी झलक उनकी कविताओं और लेखों में देखी जा सकती है। व्यंग्य विधा में भी उन्होंने लेखन किया है। डॉ. दुबे की तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें हैं - अमृतराय के उपन्यासों पर समीक्षात्मक पुस्तक ‘हंसते-बोलते दस्तावेज’ व्यंग्य पुस्तक ‘नागफनी’ तथा कविता संग्रह ‘गांव से लौटते हुए’। ‘नागफनी’ में संग्रहीत व्यंग्यों के संबंध में डॉ. राजेश दुबे ने पुस्तक के आमुख में लिखा है कि ‘‘प्रशासनिक सेवा में रहते हुए मैंने आम आदमी के दुखों तकलीफों, उनकी चिन्ताओं को बहुत नज़दीक से देखा, जाना, परखा है। आज भी हमारा किसान और मजदूर वर्ग वैसा ही जीवन जी रहा है जैसे प्रेमचंद के पात्र भोग रहे थे। आज भी घीसू, माधव, होरी, धनिया, गोबर, झुनिया मिलते हैं, बोलते हें, बतियाते हैं। वे आज भी वैसे ही दुखी हैं। वे आज भी वैसे ही सुखी हैं। समयानुसार अंतर आया है तो सिर्फ़ इतना कि झोपड़ियों में कुछ थूनियां लगा दी गई हैं जो झोपड़ी को ज़मींदोज़ होने से बचा रही हैं। देहातों में इमारतों के जंगल उग आए हैं आज भी शोषण की परिस्थितियां और शोषण की कुटिल मनोवृत्तियां पूर्ववत क़ायम हैं।’’
  
     
       समाज में व्याप्त आर्थिक, सामाजिक, वर्गीय विद्रूपताओं को देख कर मन का द्रवित होना स्वाभाविक है। जब मन द्रवित होता है तो लेखनी से शब्द फूट पड़ते हैं और ये शब्द स्वतः अपनी शैली चुनते हुए कभी कविता, कभी कहानी, कभी निबंध तो कभी व्यंग्य लेखों में ढल जाते हैं। डॉ. राजेश दुबे ने भी जो विद्रूपताएं अपनी आंखों से देखी और महसूस कीं उन्हें वे व्यंग्य लेखों में ढलने से नहीं रोक सके। इसीलिए उनके‘‘नागफनी’’ व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य चुटीले और धारदार हैं। इसी संग्रह में एक व्यंग्य लेख है ‘‘चश्मा’’ शीर्षक से। चश्मे को एक क्षेपक की तरह प्रयोग करते हुए डॉ दुबे ने व्यंग्य किया है कि -‘‘आदमी के शरीर पर जो महत्व कपड़ों का है, वही महत्व आंखों पर चश्मे का है। बग़ैर चश्में के आदमी की आंखें सूनी लगती हैं। चश्मा पहने आदमी आदमी-सा दिखता है, बग़ैर ख्श्मा पहना आदमी चौपाए-सा दिखता है। जब आदमी कोरी आंखों से देखता है तब वह ज़्यादा बारीक़ी में नहीं जा पाता है और ज़्यादा नुक़्ताचीनी नहीं कर पाता है, और जो है उसी में प्रसन्न रहता है। यह प्रसन्नता उसके स्वस्थ और दीर्घ जीवन का राज़ है। ऐसे समय वह संतोषी और सुखी रहता है। यही नहीं, वह झगड़े-टंटे से अपनी टांग बचाए रखने का हिमायती होता है। पर जब से उसने चश्मा पहनना शुरू कर दिया है, उसका क़द बढ़ गया है। उसमें सोचने-समझने की क्षमता का विकास हुआ है। अब वह बुद्धू से बुद्धिमान हो गया है। उसकी दृष्टि विकसित हो गई है। परिणामतः उसकी चिन्ताएं बढ़ गई हैं।’’
जहां तक व्यंग्य विधा में पैनेपन और कटाक्ष की क्षमता का प्रश्न है तो यह दोनों अनुभवों की ग्राह्यता से आती है। इस संबंध में हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार डॉ सुरेश आचार्य ने अपने एक अन्य ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में लिखा है कि ‘‘ईमानदार व्यंग्य रचना सदैव सामाजिक यथार्थ से संबंधित होती है। यह कहीं भी अमूर्त नहीं होती बल्कि सदैव सत्य से साक्षात करती चलती है।  दैनंदिन जीवन के कष्ट आडंबर मिथ्याचार और अनीतियों का तिरस्कार, उद्घाटन और उपहास ही उसका लक्ष्य होता है।’’

       डॉ. राजेश दुबे ने व्यंग्य के साथ ही कविताएं भी लिखी हैं। उनका काव्य संग्रह ‘‘गांव से लौटते हुए’’ अतुकांत शैली की कविताओं का संग्रह है। इस संग्रह की भूमिका में समीक्षक एवं साहित्यकार प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने लिखा है -‘‘इस संग्रह की कविताओं में अभिव्यक्ति का टटकापन, भाषा का बांकपन, देशज़ अंदाज़, जीवन की सच्ची अनुभूति, संप्रेषणीयता, कहन की सहजता, बिम्बों और प्रतीकों की नवता, जीवन और प्रकृति की बहुत गहरी जुगलबंदी, मानवता के कल्याण की भावना, विचारशीलता, जीवन का सौंदर्य आदि अनेक बातें डॉ. राजेश दुबे को समर्थ कवि कहे जाने का हक़ देती हैं। निःसंदेह ‘गांव से लौटते हुए’ संग्रह की कविताएं अपनी संरचना, कथन वैविध्य, वैचारिकता, भाषाशिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।’’
      जीवन के अनुभव और वैचारिक सामंजस्य से भरपूर कविताओं में डॉ. राजेश दुबे ने अनुभवजनित अनेक दृश्यों को अपने शब्दों में पिरोया है। संग्रह की पहली कविता ‘‘विश्वास की सोन चिरैया’’ की ये पंक्तियां देखें-
जब से मेरे हाथ
होम करते जले हैं
विश्वास की सोच चिरैया
घायल है
तब से मन में
एक चोर बसने लगा है
लगता है सब लोग
मुझे ठग लेना चाहते हैं।

     बेशक़ वर्तमान परिदृश्य में धोखा, छल, कपट इतना अधिक व्याप्त है कि अविश्वास का प्रतिशत बढ़ चला है। डॉ. राजेश दुबे की एक और कविता है ‘‘हर सुबह अख़बार’’। इस कविता में उन्होंने मानवीय मूल्यों के ह्रास का मार्मिक चित्रण किया है-
हर सुबह
अख़बार के पृष्ठ दर पृष्ठ पर
अंकित
दुष्कर्म, हत्या, ठगी, हिंसा
जाति-सम्प्रदायगत
षडयंत्रों की
कुत्सित उपलब्धियां
बटोर लेती हैं
सारी की सारी सुर्खियां।

       अपने सागर शहर की दशा को बिम्ब के रूप में लेते हुए उन तमाम शहरों पर कटाक्ष करती है उनकी कविता ‘‘आवारा मवेशियों की भीड़’’, जो ऐसी दुरावस्थाओं से गुज़र रहे हैं। कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं-
मेरे नगर में सड़कों पर
आवारा मवेशियों की भीड़ है
आड़े-तिरछे बैठे
मौज मनाते
जुगाली करते
यातायात व्यवस्था को
रौंदते हुए खड़े हैं
इस अव्यवस्था पर
जब कोई
झुंझलाता हुआ
सूचना देता है
तब मवेशियों के समर्थन में
कुछ संगठन आ कर
हमारे ज्ञान में
इज़ाफ़ा करते हैं
मवेशियों की
आज़ादी के प्रश्न पर हमें
नीचा दिखाते हैं।

        डॉ. राजेश दुबे शिद्दत के साथ अपने रचनाकर्म से जुड़े हैं। वे अपने अनुभवों को अपनी गद्य एवं पद्य रचनाओं में उतार देते हैं। यही उनकी लेखनी की विशेषता है। उनका शिल्प एवं भाषा आडम्बरविहीन सरल और सहज होती है। जो उनके लेखन को पठनीय बनाती है। 
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( दैनिक, आचरण  दि.28.08.2020)
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आगडं पर प्र

Thursday, July 30, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 5 | प्रेम रूपी रंग कितने | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत पांचवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के वयोवृद्ध कवि निर्मलचंद 'निर्मल' के काव्य संग्रह  "प्रेम रूपी रंग कितने" का पुनर्पाठ।

सागर: साहित्य एवं चिंतन

    पुनर्पाठ: ‘प्रेम रूपी रंग कितने’ काव्य संग्रह
                               -डॉ. वर्षा सिंह
                             
           काव्य संग्रह ‘‘प्रेम रूपी रंग कितने’’ का प्रथम संस्करण सन् 2010 में प्रकाशित हुआ था। यह संग्रह सागर नगर के वरिष्ठ कवि निर्मल चंद ‘निर्मल’ का है। अपने इस संग्रह में कवि निर्मल ने उन कविताओं को एक संग्रह के रूप में समेटा है जो प्रेम के विविध रूपों को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने लिखीं थीं।  काव्य और प्रेम का निकट संबंध है। दोनों संवेदनाओं और कोमल भावनाओं से उपजती हैं। इस संग्रह की कविताओं से गुज़रते हुए एक प्रश्न कौंधता है कि प्रेम क्या है? वस्तुतः प्रेम की परिभाषा उतनी ही दुष्कर है, जितनी जगत-नियंता की। तभी तो नारद भक्ति-सूत्र, से लेकर आजतक सभी मीमांसा-विशारद प्रेम को अनिर्वचनीय मानते हैं। किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच पाये जाने वाले प्रेम के उत्तरोत्तर विकास भावना प्रेमास्पद के रूप गुण, स्वभाव, सान्निध्य के कारण उत्पन्न सुखद अनुभूति होती है जिसमें सदैव हित की भावना निहित रहती है। संत कबीर ने कहा है-
‘‘काम काम सब कोई कहै, काम न चीन्है कोय ।
जेती मन की कामना, काम कहीजै सोय ।।‘‘
        हजारी प्रसाद द्विवेद्वी लिखते हैं कि ‘प्रेम से जीवन को अलौकिक सौंदर्य प्राप्त होता है। प्रेम से जीवन पवित्र और सार्थक हो जाता है। प्रेम जीवन की संपूर्णता है।’
प्रेम की इसी विचित्रता को रसखान ने इन शब्दों में लिखा है -
प्रेम रूप दर्पण अहे, रचै अजूबो खेल।
या में अपनो रूप कछु, लखि परिहै अनमेल।। 
हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम आधीन।
याही ते हरि आपु ही, याहि बड़प्पन दीन ।।
              जब कवि निर्मल मूर्त प्रेम पर कविता लिखते हैं तो उसमें प्राकृतिक, नैसर्गिक अमूर्त का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। कवि निर्मल मानते हैं कि प्रेम को अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों की अनिवार्यता नहीं होती है। प्रेम की भाषा ही अलग होती है जो निःशब्द होती है। उनका यह कवितांश देखें-
प्रेम नहीं शब्दों का कायल आंखें कह जाती
ये भाषा ऐसी है जिसमें शब्द नहीं चलते
पाषाणी पर्वत कठोर भी मोम सदृश गलते
मन वीराना हरियााली से पूरित होता है
नेह निमन्त्रण जाने कितने सपने बोता है
मरुथल से नीरस प्राणों में सरिता बह जाती
प्रेम नहीं शब्दों का कायल आंखें कह जाती

समीक्ष्य कृति "प्रेम रूपी रंग कितने"

       प्रेम स्मृतियों के तार जोड़ता है। प्रेम में वह शक्ति है जो अनुपस्थित की उपस्थिति का बोध करा देता है। अर्थात जो प्रत्यक्षतः सशरीर उपस्थित नहीं है उसके भी साक्षात दर्शन प्रेम की भावना में हो जाते हैं। जैसा कि कवि निर्मल ने लिखा है -
तुम नहीं हो किन्तु तुमसे रोज मिलता हूं
सोचते हो तुम, बिछुड़ कर छूट जाऊंगा
नेह के बंधन यथा कैसे निभाऊंगा
किन्तु यह मन है तुम्हें तो ढूंढ लेता है
एक क्षण लम्बा, वृहत् दूरी प्रणेता है

        निःसंदेह प्रेम अपने विविध रूपों में प्रस्तुत हो कर हमारे जीवन में अनेक रंग भरता है। लेकिन परिस्थितिवश प्रेम की भावना विविध सोपानों पर विदीर्ण होने लगती है। ‘‘प्रेम रूपी रंग कितने’’ में कवि निर्मलचंद निर्मल ने इस विदीर्णता को भी रेखांकित किया है जहां प्रेम पर विपरीत परिस्थिति अधिक प्रभावी हो उठती है। दाम्पत्य जीवन का प्रेम भी शिथिल पड़ने लगता है। माता-पिता का बच्चों के प्रति प्रेम क्रोघ से उपजी कटुता में बदल जाता है और तब प्रेम अपना मूल आकार खोने लगता है। उसकी भावनाओं के कोण खुल कर, बिखर कर समांनांतर रेखाओं में बदलने लगते हैं, जैसे नदी के दो किनारे अथवा रेल की दो पटरियां जिनमें क्रोध का उफान और आर्थिक असमर्थता का कम्पन व्याप्त रहता है। प्रेम अपना स्वरूप खोता है तो पारिवारिक संबंध भी अपना स्वरूप खोने लगते हैं। इस तथ्य को देखिए कवि निर्मल की इन पंक्तियों में -
घर के समीकरण बिगड़े हैं, मंहगाई की मार में
पति-पत्नी पीड़ित अभाव से, मौन साध कर बैठे
बिना बात ही क्रोधित हा,े बच्चों के कान उमेंठे
बुद्धि ऐसी कुंद हो गई, जैसे खेत तुषार में

          ‘‘प्रेम रूपी रंग कितने’’ काव्य संग्रह में यूं तो प्रकृति, देश, काल एवं परिस्थितियों पर केन्द्रित कविताएं भी हैं किन्तु इस संग्रह का पुनर्पाठ करते समय मेरा ध्यान संग्रह के मूल विषय प्रेम पर ही केन्द्रित रहा और संग्रह के इसी पक्ष को मैंने सामने रखा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल मानते थे कि ‘प्रेम एक संजीवनी शक्ति है। संसार के हर दुर्लभ कार्य को करने के लिए यह प्यार संबल प्रदान करता है। आत्मविश्वास बढ़ाता है। यह असीम होता है। इसका केंद्र तो होता है लेकिन परिधि नहीं होती।’ अतः प्रेम को समझने में कवि निर्मल के इस संग्रह का पुनर्पाठ दृष्टिकोण को विस्तार दे सकता है।
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साहित्य वर्षा ... पुनर्पाठ


( दैनिक, आचरण  दि.30.07.2020)
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Thursday, July 23, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 4 | स्त्री तेरे हज़ार नाम ठहरे | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,
         स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत चौथी कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के वयोवृद्ध साहित्यकार महेन्द्र फुसकेले के काव्य संग्रह  "स्त्री तेरे हज़ार नाम ठहरे" का पुनर्पाठ।

सागर: साहित्य एवं चिंतन

     पुनर्पाठ: ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ काव्य संग्रह
                  -डॉ. वर्षा सिंह
         
          हर दौर में मानवीय सरोकारों में स्त्री की पीड़ा प्रत्येक साहित्यकार संवेदनशीलता एवं सृजन का केन्द्र रही है। सन् 1934 को जन्में, सकल मानवता के प्रति चिंतनशील सागर नगर के वरिष्ठ साहित्यकार एवं उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले ने जब कविताओं का सृजन किया तो उनकी कविताओं में अपनी संपूर्णता के साथ स्त्री की उपस्थिति स्वाभाविक थी। जी हां, इस बार पुनर्पाठ में कविता संग्रह ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ काव्य संग्रह। महेन्द्र फुसकेले स्त्री के विविध रूपों के बारे में अपनी एक कविता में कहते हैं -
स्त्री तो स्त्री है
अनेक रूप, अनेक भूमिकाएं
विवाहित स्त्री एवं कुंवारी स्त्री
संतान के बिना स्त्री, बच्चों वाली स्त्री
स्त्री तो बस स्त्री है, वामा है...
स्त्री है मूलधुरी, आदिशक्ति

          स्त्री को अपने जीवन में कदम-कदम पर विभिन्न प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। एक कठिनाई जो जीवनपर्यंत उससे जुड़ी रहती है वह है उसकी सुंदरता या असुंदरता। बाजारतंत्र के इस वर्तमान में बाजार का पूरा प्रचार-प्रसार, पूरा का पूरा विज्ञापन उद्योग, समूचा मनोरंजन उद्योग जैसे सिर्फ स्त्री की देह पर टिका है। साबुन से लेकर आटोमोबाइल तक बेचने के लिए स्त्री देह का इस्तेमाल किया जा रहा है। जिसने स्त्री की दैहिक आजादी को एक नई तरह की छुपी हुई गुलामी में बदल डाला है। यह अनायास नहीं है कि जिस दौर में स्त्री लगातार आजादी और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ी है, उसी दौर में स्त्री उत्पीड़न भी बढ़ा है, देह का कारोबार भी बढ़ा है, उसका आयात-निर्यात भयावह घृणित स्तरों तक फैला है। आज का बाजार जो गोरेपन की क्रीमों से भरा रहता है, वह भी इसी मानसिकता को बढ़ावा देता रहता है कि औरतों की चमड़ी का रंग गोरा ही होना चाहिए। जब समाज में स्त्री को उसकी योग्यता से नहीं बल्कि चमड़ी के रंग से आंका जाने लगता है तो तमाम प्रकार की वैचारिक विकृतियां पनपने लगती हैं, जिसका शिकार बनना पड़ता है स्त्रियों को। महेन्द्र फुसकेले की एक कविता है ‘दृष्टि सौंदर्य की’। कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
       अदालत में एक स्त्री पर
       तलाक का मुकद्दमा चला
       स्त्री ने बताया
       पति का आरोप है कि मैं सुंदर नहीं हूं
       ............ कि वह असुंदर है
       उसका रंग साफ नहीं, बदसूरत है।
समीक्ष्य कृति "स्त्री तेरे हज़ार नाम ठहरे " @ साहित्य वर्षा

          भारतीय समाज में एक विडम्बना आज भी व्याप्त है कि अनेक परिवारों में बेटी को जन्म देना मां का अपराध माना जाता है। बेटी को जन्म देते ही मां तानों और उलाहनों के कटघरे में खड़ी कर दी जाती है। सभी वैज्ञानिक तथ्यों को भुला कर यह मान लिया जाता है कि बेटी के जन्म के लिए सिर्फ मां ही जिम्मेदार होती है और ऐसी मां को जीवन भर परिवार की प्रताड़ना सहनी पड़ती है। ‘कभी तो हंसो मां’ कविता में एक बेटे के शब्दों में अपनी मां की उस पीड़ा को व्यक्त किया गया है जो उसने लगातार दो बेटियां पैदा करने के कारण भुगती थी। महेन्द्र फुसकेले की इन पंक्तियों पर गौर करें -
खेत के अधगिरे खड़ेरा में
मुझे अपने कंधे पर बैठाले हुए
खूब रोई मां छुप कर।
मां का कसूर था
उसने मेरी दो छोटी बहनों को
एक के बाद एक जना।

          स्त्री के अस्तित्व का विवरण उसके लावण्य के वर्णन के बिना अधूरा है। शायद इसीलिए जीवन के यथार्थ की कठोरता के बीच कवि स्त्री में वसंत को देखता है-
जो वसंत
दिलों की मखमली सेज पर
उबासी ले रहा है
वह जल्दी अंगड़ाई ले लेगा
स्त्री के गेसुओं से
स्त्री की वेणी से खुलकर आवेगा।

        महेन्द्र फुसकेले का यह काव्य संग्रह वर्तमान दौर में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है जब स्त्रियों को उपभोग की वस्तु अथवा बाज़ारतंत्र में ‘शोपीस’ मात्र समझा जाने लगा है। स्त्री के प्रति बढ़ते अपराधों को देखते हुए भी स्त्री के अस्तित्व की महत्ता को समझने के लिए इस काव्यसंग्रह को बार-बार पढ़ा जाना जरूरी है।

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( दैनिक, आचरण  दि.23.07.2020)
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Sunday, April 26, 2020

विशेष लेख - कोरोना लाॅकडाउन और सागर का काव्यजगत - डॉ. वर्षा सिंह

   
Dr. Varsha Singh
   
      स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में कल दिनांक 25.04.2020 को प्रकाशित मेरा विशेष आलेख - " कोरोना लॉकडाउन और सागर का काव्य जगत "। 

विशेष लेख -

कोरोना लाॅकडाउन और सागर का काव्यजगत

             - डॉ. वर्षा सिंह

         सागर शहर अपनी अनूठी विशेषताओं का शहर है। यहां झील के रूप में प्राकृतिक छटा है तो काव्य के रूप में प्रतिभाएं मुखर हैं। कोरोना आपदा के विश्वव्यापी संकट के कारण सागर शहर में लाॅकडाउन का सन्नाटा पसरा हुआ है लेकिन सागर के साहित्यकारों की लेखनी थमी नहीं है। वे निरंतर सृजन कर रहे हैं। जहां एक ओर वे आमजनता को लाॅकडाउन के नियमों का पालन करने की समझाइश दे रहे हैं वहीं दूसरी ओर कोरोना वारियर्स का हौलसा बढ़ा रहे हैं। तो यहां प्रस्तुत है सागर शहर के कुछ कवियों की वे कविताएं जो कोरोना संकट पर केन्द्रित हैं।

प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी 
         तो आरम्भ प्रो. आनंद प्रकाश त्रिपाठी की कविता के इस अंश से जो कोरोना की भयावह स्थिति का दृश्य प्रस्तुत करती है-

लाकडाउन काल
सड़कों पर डंसता  सन्नाटा  देखा है

हंसता जीवन
सहमा सहमा और डरावना देखा है

महामारी कोरोना
लोगों के दिल की धड़कन  बढ़ते देखा है

जान है तो जहान है
इस सच  को जीते देखा है

कोरोना का भयावह संक्रमण
लोगों को अति बेबस  होते देखा है

Dr. Sharad Singh
      कोरोना की ये भयावहता ही है जिसने हर व्यक्ति को अपने घर के भीतर क़ैद कर दिया है क्योंकि इस क़ैद में ही जीवन की सुरक्षा है। इसीलिए कवयित्री डॉ (सुश्री) शरद सिंह अपनी बुंदेली गीत के द्वारा हर व्यक्ति से निवेदन करती हैं कि -

लॉकडाउन को पालन कर लेओ
सुन लेओ, भैया मोरे।

जेई सबई खों बचा सकत है
हाथ तुमाए जोरे।

पूरो लॉक करा दओ सागर
ऐसी करी घुमाई
बचो रहे अब सागर सगरो
कर लेओ जेई दुहाई

सबई के प्रानन पे बन जेहे
कोऊ किवरिया खोरे
हाथ तुमाए जोरे।।

 
कपिल बैसाखिया
   संकट के दिन कितने भी लम्बे क्यों न लगें किन्तु यदि धैर्य से बिताए जाएं तो आसानी से व्यतीत हो जाते हैं। कुछ यही बात कवि कपिल बैसाखिया अपने इन दोहों के माध्यम से सभी को समझाना चाहते हैं-                       

मन से हों मजबूत हम, रहे तन सावधान।
दूरी में  ही निकटता, अपने पन का भान।।

कुछही दिन की बात है, लाना है बदलाव।
घर में हों गर कैद  हम, होगा तभी बचाव।।

 
डॉ. वर्षा सिंह
     लेकिन कुछ लोग जो स्थिति की गंभीरता को अनदेखा कर के लाॅकडाउन के नियमों को तोड़ते रहते हैं वे स्वयं को संकट में तो डालते ही हैं, साथ ही अपने परिचितों, मित्रों और रिश्तेदारों के लिए भी प्राणघातक बन बैठते हैं। ऐसे लोगों के कारण ही लाॅकडाउन की अवधि बढ़ाने की नौबत आई है। तो कवयित्री डॉ. वर्षा सिंह यानी मैं भी बुंदेली में ऐसे लोगों से निरंतर प्रार्थना करती रहती हूं कि-

तीन पांच लों लॉकडाउन है, तीन पांच ने करियो।
तारा डारे हम घर बैठे, तुम अपने घर  रहियो।।

पुलिस, कलक्टर संगे हमरे, संगे पीएम, सीएम,
सात बचन खों पालन करबै में तनकऊ ने डरियो।।

ढाल बने से खड़े वारियर, देत सुरक्छा हमखों,
उन ओरन की सच्चे मन से जयकारे सब करियो।।

 
डॉ नलिन जैन
     सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क पहनना और बार-बार हाथ धोना बचा सकता है कोरोना के खतरे से। इस तथ्य को कवि नलिन जैन अपनी काव्य रचना में कुछ इस प्रकार कहते हैं-

स्टे  एट  होम  ही,  हुआ  जरूरी  आज
क्षुद्र  वायरस  देखिये,  संक्रमण  है काज

करिये  कसरत रोज ही, आधा  घंटे  रोज
कफ इससे पिघले स्वयं, ठहरे ना ये नोज

कुछ भी ना पकड़े अभी,सतह जो भी अंजान
सेनिटेशन  कीजिये, बार - बार  यह  काम

अशोक मिज़ाज बद्र
     ऐसे लोग जो सुरक्षा के लिए लगाए गए लाॅकडाउन के महत्व को समझ नहीं रहे हैं और संक्रमण का एक भी केस सामने आने पर ढिठाई ओढ़ कर सारी जिम्मेदारी सरकार पर मढ़ने लगते हैं, उन्हें उलाहना देते हुए शायर अशोक मिजाज कहते हैं-

मौतों के आंकड़ों से खबरदार नहीं है।
क्या अपनी जिंदगी से तुझे प्यार नहीं है।

खुद अपनी देखरेख हमें करनी पड़ेगी,
हर शय की जिम्मेदार तो सरकार नहीं है।

 
सतीश पाण्डेय
  जिस तरह हमारा देश और हम कोरोना संकट से लोहा ले रहे हैं आज पूरा विश्व उसकी प्रशंसा कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने भी ‘रामायण’ का संदर्भ उद्धृत करते हुए ‘लक्ष्मणरेखा’ का स्मरण कराया कि यदि हम सुरक्षा की लक्ष्मणरेखा नहीं लांघे तो कोराना हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। यही बात कवि डाॅ. सतीश पाण्डेय अपने इन दोहों में समझाते हुए कुछ इस प्रकार कहते हैं-

लक्ष्मण रेखा खीच कर , कोरोना से जंग ।
बात सभी ने मान ली , फिर होंगें रसरंग ।

करें सहन थोड़े दिवस , कठिनाई यदि देश।
संयम नियम विवेक से होगा शुभ परिवेश।।

जप तप पूजा पाठ भी , तभी करेंगे काम ।
लॉकडाउन के नियम का,पालन हो अभिराम।।

     कोरोना आपदा और लाॅकडाउन ने सागर शहर के विविध विषयों पर कविता करने वाले कवियों को जिस प्रकार कोरोना आपदा रूपी एक विषय में सूत्रबद्ध कर दिया है, उसी प्रकार प्रत्येक नागरिक को एकसूत्रीय होते हुए आपदा के नियमों का पालन करते हुए धैर्य और संयम का परिचय देना चाहिए तभी हम कोरोना रूपी राक्षस का विनाश कर सकेंगे। 

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( दैनिक, आचरण  दि. 25.04.2020)
#आचरण

Friday, December 20, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 69 .... सामाजिक सरोकारों के कवि रमेश दुबे - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि रमेश दुबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

      सामाजिक सरोकारों के कवि रमेश दुबे
                                  - डाॅ. वर्षा सिंह               
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परिचय:- रमेश दुबे
जन्म:-  09 जुलाई 1944
जन्म स्थान:- ग्राम सहजपुर, जिला सागर (मप्र)
माता-पिता:- श्रीमती बेनीबाई एवं हरिनारायण दुबे
शिक्षा:- बी.ए.,
लेखन विधा:- पद्य
प्रकाशन:- पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
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           जीवन के अनुभवों से उपजी कविताओं का अपना अलग महत्व होता है। ऐसी कविताएं शैली अथवा भाषा पर केंद्रित न होकर भावनाओं पर तथा विचारों पर केंद्रित होती हैं। इस प्रकार की कविताओं की महत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता है। सागर के साहित्य जगत में कवि रमेश दुबे का नाम ऐसी ही कवियों की पंक्ति में सम्मान रखा जा सकता है, जिन्होंने समाज और परिवेश से अनुभव जताते हुए उन्हें अपने काव्य में पिरोया है और इस प्रकार से जन करते हुए उन्होंने अभिव्यक्ति को महत्ता दी है जबकि शैली की विशेषताएं उनके लिए गौण रही हैं।

          सागर जिले के ग्राम सहजपुर में पंडित हरि नारायण दुबे एवं श्रीमती बेनी भाई के घर 9 जुलाई 1944 को जन्मे रमेश दुबे एक प्रतिभा संपन्न बालक के रूप में अपने माता-पिता की प्रिय रहे।

 कक्षा चौथी तक ग्रामीण परिवेश में रहने के बाद सन 1954 में रमेश दुबे जी सागर आ गए। यहां मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद सागर विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। जहां बाद में उन्हें आजीविका भी प्राप्त हो गई। सन 2004 में सेवानिवृत्ति के बाद स्थानीय तीनबत्ती स्थित खादी भंडार में साहित्यकारों से उनका मिलना होने लगा। जहां वे अपने मित्रों से साहित्य की चर्चाएं करते रहे। साहित्य में रुझान के चलते सरस्वती वाचनालय में होने हर शनिवार को होने वाली हिंदी साहित्य सम्मेलन की कवि गोष्ठी में निरंतर सहभागी बनते रहे, जिससे उन्हें साहित्य सृजन की प्रेरणा मिलती रही। वे बताते हैं कि एक दिन निर्मल चंद निर्मल जी ने हमसे कहा- पढ़े-लिखे हो तुम भी कविता लिखना शुरु कर दो। मैं धीरे-धीरे अपनी मन की बात जो मैं देखा करता था उसी पर लिखने लगा। मेरी पहली कविता 'प्यार के अभाव में दिल कठोर होता है' लिखी उसी समय भीतर बाजार में एक कवि गोष्ठी हुई उसमें सागर के सब कवि आए थे। मुझसे सबसे पहले कविता पढ़ने को कहा गया। मैंने यही कविता पढ़ी। निर्मल जी तथा कई कवियों को यह कविता अच्छी लगी। बस, इसके बाद मेरा का सृजन आरंभ हो गया।"


     'समस्या' शीर्षक कविता में उस समस्या को बड़ी गंभीरता से उठाया है जिससे आज पूरा देश ही नहीं पूरा विश्व ग्रस्त है। यह समस्या है निरंतर बढ़ती आबादी की। जो भीड़ के रूप में हमारे सामने है। कवि ने इस समस्या को ना केवल अनुभव किया है, उस पर चिंतन किया है, अपितु उस पर व्यंग भी किया है। देखिए यह कविता-

अपने इस देश में
जनता ही चिंता बढ़ती जा रही है तभी तो रोजगार और
रहने की कमी आ रही है
रोजगार पाने युवकों की भीड़ है रहने के लिए मकानों में भीड़ है जहां देखो वहां भीड़ है
मोटर और टेंपो में भीड़ है अस्पतालों और स्कूलों में भीड़ है सड़कों पर चलने में भीड़ है
यहां से वहां दौड़ने में भीड़ है
जहां नज़र डालो राशन पानी की भीड़ है
हर जगह समस्या की भीड़ है कारखाने खुल गए खेत और खलिहान में
हजारों मकान बन गए बगीचों और श्मशान में
अंतिम संस्कार को जगह नहीं श्मशान में
बढ़ती गई जनता तो रोजगार कहां से लाएंगे
रहने को कहा जाएंगे
खेतों का अन्य कहां से लाएंगे
कटते रहे पेड़ तो हवा पानी कहां से लाएंगे
इन सब के लिए क्या चंद्रलोक में जाएंगे?

      कवि रमेश दुबे समाज में व्याप्त सभी समस्याओं पर बारीकी से चिंतन करते हैं और उन्हें अपने काव्य में बखूबी पिरोते हैं। उनकी एक कविता है 'कम उम्र में शादी'। इस कविता में उन्होंने कम उम्र में विवाह होने पर व्यक्ति के जीवन में तथा परिवार में होने वाले दुष्परिणाम को बड़ी गहराई से सामने रखा है। कविता इस प्रकार है-

गरीब की कम उम्र में शादी
उसकी बर्बादी
कई बच्चों के बाप बन जाना
ज्यादा खर्च के चक्कर में उलझ कर रह जाना
बच्चे पौष्टिक आहार से दूर
रुखा-सूखा खाने को मजबूर
बच्चे पढ़ने-लिखने से दूर
मां-बच्चों का बोझ लादे-लादे
कम उम्र में बूढ़ी हो चली है
बाप सुबह से शाम तक बच्चों को पालने के चक्कर में
जब असमर्थ नजर आता है
बड़े बेटे को जो दस साल का है साथ चलने, काम करने को मजबूर करने लगता है
कुछ दिन बाद सभी बच्चे रुखा-सूखा खाकर
बिना पढ़े-लिखे
स्कूल न जाकर स्कूल की दीवार के पत्थर ढोने में लगे रहते हैं
स्कूल क्या है वे नहीं जानते
सिर्फ सिर पर पत्थर रखकर स्कूल तक ले जाना जानते हैं।
कवि रमेश दुबे

       इस समय जब सारी दुनिया प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है तो कभी प्रदूषण के बारे में चिंता ना करें यह भला कैसे संभव है? प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति की भांति एक कवि भी समाज में व्याप्त समस्याओं पर मनन चिंतन करता है और उसकी तह तक पहुंचने का प्रयास करता है। रमेश दुबे की कविता जिसका शीर्षक है    'प्रदूषण' में उन्होंने परिवार के भीतर मौजूद प्रदूषण की बात उठाई है। दरअसल, यह प्रदूषण मानसिक प्रदूषण है जो विचारों को दूषित कर के घर के भीतर रिश्तों के बीच दीवारें खड़ी कर देता है। इस कविता पर गौर कीजिए-

अपने घर के द्वार
खिड़कियां खोल दिए जाएं
मेरी तरफ से कोई बाधा नहीं होगी उजियारे के आने में।
अवरोध तो अपने बच्चों द्वारा बंद किए गए खिड़की दरवाजे ही हैं, उनके कारण ही रुका हुआ है उजियारा ।
बच्चों ने घर में जगह-जगह दीवारें बनाकर रोक रखा है उजियारा, उनके कारण ही भीतर उसका प्रवेश नहीं हो रहा है
उनकी होशियारी, उनकी चालाकी उनकी कुशलता है बाधा बनी हुई है उजियारे के आने में।
कमरे में शुद्ध वायु का आना
गंदी वायु का निकल जाना ही
खुली खिड़कियों के रोशनदान और दरवाजों का योगदान है।


    जिस धरा पर मनुष्य का जीवन मौजूद है उस धरा और उस माटी की महत्ता को समझना भी मनुष्य के लिए आवश्यक है इसी मर्म को ध्यान में रखते हुए कवि रमेश दुबे ने 'माटी' शीर्षक से यह कविता लिखी है -

खुद को पूरा गलाकर
माटी गुणवान बन गई है अलग-अलग भागों में बंट गई है कुछ गमलों, मटकों और सुराही में बदल गई है
कुछ फूल और फुलवारी में बदल गई
कुछ खेतों और खलिहान में बदल गई
कुछ रूपवान बनकर आस्था की देवी बन गई
सारी दुनिया उसके चरणों में झुक गई
माटी पालनहार है माटी बिन सब सून
माटी में पैदा हुए माटी खाकर खड़े हुए
माटी से सब पल रहे खा-खा कर उसका अन्न
देश तरक्की कर रहा
उसी धरा पर पल रहा
माटी है तो जगत है
माटी बिन सब सून।



      रमेश दुबे की कविताओं का स्वरूप भले ही अनगढ़ प्रतीत हो किंतु उनके भावों और विचारों की गहनता उनकी कविताओं को प्रभावी बना देती है। उनकी कविताओं में मौजूद जीवन के प्रति चिंतन एवं चिंता दोनों ही महत्वपूर्ण ढंग से सामने आती हैं जो युवा कवियों का मार्ग प्रशस्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 20.12.2019)
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Monday, October 14, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 66 ... एक संवेदनशील लेखिका देवकी भट्ट नायक दीपा - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की लेखिका देवकी नायक भट्ट दीपा पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

      एक संवेदनशील लेखिका  देवकी भट्ट नायक दीपा
                            - डाॅ. वर्षा सिंह

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       परिचय:- देवकी भट्ट नायक दीपा
       जन्म:-   27 दिसंबर 1964
       जन्म स्थान:- पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)
       माता-पिता:- स्व. कमला देवी भट्ट एवं स्व.रूद्र दत्त भट्ट
      शिक्षा:- हिंदी साहित्य, अंग्रेजी साहित्य तथा अर्थशास्त्र में एम.ए. पत्रकारिता में डिप्लोमा
लेखन विधा:- गद्य, पद्य
प्रकाशन:- पत्र, पत्रिकाओं में
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        लेखन के क्षेत्र में महिलाओं की दस्तक पिछली सदी से ही पड़नी शुरू हो गई थी। वे साहित्य में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने लगी थीं। सागर में भी लेखिकाओं ने अपनी लेखनी को साबित करने का हरसंभव प्रयास किया है। देवकी भट्ट नायक दीपा सागर नगर की एक ऐसी लेखिका हैं जिन्होंने प्रचुरता से तो नहीं लिखा है किन्तु उनका लेखन अनदेखा नहीं किया जा सकता है। देवकी भट्ट नायक दीपा का जन्म 27 दिसंबर 1964 को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ नामक जिले में हुआ था। वे अपने नाम के संबंध में बताती हैं कि विवाह पूर्व उनका नाम देवकी भट्ट था तथा विवाहोपरांत ‘नायक’ सरनेम जुड़ा। जब वे लेखन के क्षेत्र में प्रविष्ट हुईं तो उन्होंने ‘दीपा भट्ट’ के नाम से भी रचनाएं लिखीं। देवकी भट्ट नायक दीपा के पिता स्वर्गीय रूद्रदत्त भट्ट  भारतीय सेना में आनरेरी कैप्टन थे एवं माता स्वर्गीय कमला देवी गृहणी थीं। देवकी भट्ट ने और हिंदी साहित्य अंग्रेजी साहित्य तथा अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की है उन्होंने पत्रकारिता मे डिप्लोमा कोर्स भी किया। उनकी रचनाओं का प्रकाशन दैनिक नवदुनिया, नारी संबल, आचरण, नाइस डे, अबला नहीं नारी, साहित्य सरस्वती आदि पत्र-पत्रिकाओं में हो चुका है। इनकी कविताओं और कहानियों का प्रसारण आकाशवाणी सागर तथा भोपाल दूरदर्शन से भी हुआ है। साहित्यिक गोष्ठियों में कहानी एवं कविता का पाठ कर चुकी हैं। महिला सशक्तिकरण में विश्वास रखने वाली देवकी भट्ट नायक ने रुद्र कमला महिला एवं बाल विकास समिति के माध्यम से गरीब और श्रमिक महिलाओं के बीच कई कार्य किए हैं। भारतीय महिला फेडरेशन की संयोजक होने के साथ ही महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सागर मध्य प्रदेश में शिक्षक हैं। उल्लेखनीय है कि जहां उत्कृष्ट सेवा कार्यों के लिए राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है।
         देवकी भट्ट नायक दीपा ने कहानियां भी लिखी हैं और कविताएं भी। उनकी कविता में स्त्री के रोजमर्रा के जीवन के अनेक दृश्य दिखाई देते हैं। जैसे उनकी एक कविता है-‘औरत जात’। इस कविता का एक अंश देखिए-
बात चलती है
तो कह देते हैं लोग मुझसे
कि अब सबसे ज्यादा धर्म
औरतों में बचा है
मैं घुसती हूं बातों के तालाब की
गहराई में
जहां मर्द से पहले उठकर
झाड़ू बुहारी करती
घर लिपती, बर्तन धोती, खाना बनाती
गर्म-गर्म औरों को खिलाकर
बचा-खुचा खुद खाती
बच्चे जनती
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

        इसी कविता का एक और अंश स्त्रियों की पारिवारिक एवं सामाजिक दशा के परिप्रेक्ष्य में चिंतन करने योग्य हैः-
रक्ताल्पता की शिकार होती
हड़बड़ा कर, बच्चों को तैयार करती
नाश्ता कराती, स्कूल भेजती
पति की तमाम तैयारियों के बाद
स्वयं जल्दी-जल्दी तैयार होकर
दफ्तर जाती स्त्रियों का समूह है
तमगा लटकाए मंगलसूत्र का
भोगती अमंगल
एक पूरी की पूरी जमात है।

        दहेज भारतीय समाज में एक ऐसा कलंक है जो आज भी पूरी तरह नहीं मिट सका है।  दहेज की बलिवेदी पर प्रति वर्ष अनेक नववधू मृत्यु की भेंट चढ़ा दी जाती हैं। यह कलंक समाज के प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के मन को कचोटता है। ‘‘दहेज’’ शीर्षक रचना में देवकी भट्ट नायक दीपा लिखती हैं-
मैंने आत्मा को नहीं मारा
गला घोंटा नहीं जमीर का
इसीलिए आज बेचैन हूं
आज जब मेरी सहेली की
शादी की पक्यिात की बात हो रही है
उसमें हो रही है खुल कर सौदेबाजी
कितनी बरेक्षा, कितना फलदान
और कितना दहेज
किस-किस जिंस में दिया जाएगा
बता रहे हैं वरपक्ष की ओर से
आए हुए मध्यस्थ
एक-एक रेशा उधाड़ा जा रहा है
इज्जत की सीवन का
और मैं विवश खड़ी हूं

लेखिका देवकी भट्ट नायक दीपा

       दीपा रुद्र भट्ट के नाम से प्रकाशित देवकी भट्ट नायक दीपा की कहानी ‘‘उनसे पूछ लो’’ में उन बंधनों का विवरण है जिसमें एक आम स्त्री बंधी रहती है। ये बंधन पारिवारिक रिश्तों में संतुलन बनाए रखने में भी कभी-कभी कठिनाइयां पैदा करने लगते हैं और तब स्थितियां जटिल हो जाती हैं। मन संत्रास के झंझावात से गुजरने लगता है। इस कहानी का एक अंश यहां प्रस्तुत है -
‘‘इंतिजार की घड़ियां कितनी लम्बी होती हैं। एक-एक पल युगों सा प्रतीत होता है। जैसे घड़ी रुक गई हो। उस दिन कम्मू का बुरा हाल था। वह बेसब्री से पति के घर आने का इंतिजार कर रही थी। दोपहर का एक बजा था। उसने बिना चबाए ही खाना गटक लिया ताकि देर न हो जाए। फिर बाहर निकल कर देखा तो वहां कोई न था। वह वापस अंदर गई। घड़ी देखी तो एक बज कर पांच मिनट ही हुए थे। पांच मिनट में वह खाना खा कर तैयार हो गई थी। प्रतिदिन एक से दो बजे के बीच उसके पति परेश दुकान बंद करके घर खाना खाने आते थे। जो अभी तक प्रकट नहीं हुए थे। कम्मू को मां की याद बहुत सता रही थी। रह-रह कर उनका चेहरा जेहन में आ जाता था। सूचना मिली थी कि उनका स्वास्थ्य खराब है। मां इसी शहर में रहती थी।’’
     देवकी भट्ट नायक दीपा सागर शहर की एक ऐसी संवेदनशील लेखिका हैं जिनमें गम्भीर साहित्य सृजन की सम्भावनाएं हैं।

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( दैनिक, आचरण  दि. 14.10.2019)
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Saturday, September 14, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 63 .... शैलीगत बन्धनों से मुक्त कवि अम्बिका यादव - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि अम्बिका यादव पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

     शैलीगत बन्धनों से मुक्त कवि अम्बिका यादव
                           - डॉ. वर्षा सिंह
                                 
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परिचय      : अम्बिका यादव
जन्म स्थान :  सागर
जन्म         : 1 फरवरी 1950
शिक्षा        : बी.ए.
माता-पिता : श्रीमती बेनी बाई यादव,  श्री भागीरथ यादव
लेखन विधा : पद्य
प्रकाशन।     :    आसमानों से आगे (काव्य संग्रह)
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              कविता को व्याख्यायित करते हुए कवि धूमिल ने बड़ी सुन्दर पंक्तियां लिखी हैं- ‘‘ कविता क्या है/ कोई पहनावा है/ कुर्ता-पाजामा है/ ना भाई ना/ कविता शब्दों की अदालत में मुजरिम के कटघरे में खड़े/ बेकसूर आदमी का हलफनामा है। ’’ अर्थात कविता जब अंतर्मन और बाहरी दुनिया को विश्लेषित कर रसात्मक ढंग से प्रस्तुत करने लगती है तो उसकी सार्थकता के सम्मुख उसका शिल्प गौण हो जाता है। किन्तु कविता के कलेवर को साधना भी अपनेआप में चुनौती भरा एक काम होता है। ऐसी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए सागर नगर के अनेक कवियों ने कविताएं लिखी हैं। कुछ अधिक साध पाए हैं तो कुछ कम। किन्तु इससे उनके कवि कर्म के महत्व को कम करके नहीं अांंका जा सकता है।
            सागर नगर में ‘ताओ’ के उपनाम से कविता लिखने वाले कवि अम्बिका यादव काव्य सृजन के रूप में साहित्य सेवा कर रहे हैं। श्री भागीरथ यादव एवं श्रीमती बेनी बाई यादव के पुत्र के रूप में 1 फरवरी 1950 को सागर में जन्में अम्बिका यादव की आरम्भिक शिक्षा सागर में ही हुई। अपनी विद्यालयीन शिक्षा पूरी करने के बाद अम्बिका यादव ने सागर विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। तदोपरांत वे कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक में सेवाकार्य करने लगे। शाखा प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त होने के उपरांत वे इंकमीडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन एंड आई टी सागर में अध्यापन कार्य कर रहे हैं।
           अम्बिका यादव शिल्पगत बंधनों से मुक्त हो कर कविता लिखते हैं। उनकी कविताओं में गजल और गीत विधा का पुट देखा जा सकता है। वे अपनी कविताओं में प्रेम, मित्रता और दुनियादारी को अभिव्यक्ति देते हैं। प्रेम पर लिखी उनकी यह कविता देखिए-
जितनी बार पढ़ा उतनी बार नई ।
प्यार की इबारत हर बार नई ।
समंदर को मुट्ठी में भरने की ख्वाहिश
इस कोशिश में हाथ से छूटे मोती कई ।
जितना हम समझ सके वह नाकाफी है
आसमानों के पार हैं आसमान कई ।
दुनिया की कोई भी किताब पढ़ लो ‘ताओ’
प्यार के सिवा कोई बात नहीं नई।

           अम्बिका यादव की कई कविताओं में सुन्दर बिम्ब प्रयुक्त हुए हैं जिनसे उनकी भाव-भूमि को और अधिक सरसता मिली है। उदाहरणार्थ -
काश घनघोर अंधेरा होता।
और साथ तुम्हारा होता ।
रात काली में मिलती तुम
और दूब का कालीन होता ।
तारे भले ताकते रहते
नदी किनारे मिलना होता ।
लोग सारे देखते रहते
नाव में सिर्फ तुम और मैं होता ।
सिर्फ मोहब्बत रह जाती ‘ताओ’
काश दुनिया में और कुछ न होता।

            समसामयिक वातावरण प्रत्येक संवेदनशील मन को झकझोरता है। आतंकवाद, बमविस्फोट आदि के प्रति चिन्ता अम्बिका यादव की कविताओं में भी देखी जा सकती है। दहशतगर्दी पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं-
बम फट रहे हैं पटाखों की तरह ।
आज मेरा, कल तेरा शहर पुर्जा पुर्जा पटाखों की तरह ।
इस बरस गरीबी हटाने का बिल आया है
शायद चुनावी तैयारी है हर बार की तरह ।
दहशतगर्दी का आलम ऐसा दुनिया में
अच्छा था नासमझ रहते हम बंदरों की तरह।
तरक्की का दौर, दानिश मंदी का दौर
अणु परमाणु बम जुटती दुनिया भस्मासुर की तरह।
दुनिया सिकुड़ कर मुट्ठी भर रह गई ‘ताओ’
इंसानियत फिसल रही उससे रेत की तरह।

            दूषित राजनीति का प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव को परिवर्तित कर देता है। पुराने मित्र मित्रता का अर्थ भुला देते हैं और वे एक कुशल व्यवसायी की तरह मित्रता में भी नफा-नुक्सान देखने लगते हैं तब इसी तरह की कविता बनती है जैसी कि कवि अम्बिका यादव ने यह कविता लिखी है -
वो सोचते हैं अब सियासतदारों की तरह ।
दोस्त नहीं रहे अब पुराने यारों की तरह ।
या तो हमें कुछ चाहिए  या उन्हें चाहिए हमसे
दोस्त हैं अब दुकानदारों की तरह ।
दावत में उसने उनको पास बैठाया है
वजन है तोहफों का जिसके हाथियों की तरह ।
प्यारी बातें तो है उनकी बच्चों की तरह
काश पढ़ लिख कर हम रहते उनकी तरह ।
‘ताओ’ नासमझ ही रहते हम परिंदों की तरह
काश समझदार न होते इंसानों की तरह।

             अम्बिका यादव का एक काव्य संग्रह ‘‘आसमानों से आगे’’ प्रकाशित हो चुका है। अपनी पुस्तक एवं अपनी रचनाओं के बारे में वे कहते हैं कि ‘‘बहरहाल मेरी कविताओं की यह कोशिश आपको जरूर पसंद आएगी इसी विश्वास के साथ यह पुस्तक जिसे आप गजल, गीत, कविता की तरह स्वीकार कर सकते हैं एवं इसका आनंद ले सकते हैं।’’ वे अपनी पुस्तक ‘‘आसमानों से आगे’’ की भूमिका में लिखते हैं कि ‘‘कविता अभिव्यक्ति है मन की फिर लिखने का मन सो लिखी गई यह किताब कुछ-कुछ गजल नुमा कुछ कविता और फिर जमाने की सच्चाई कहने की कोशिश है कुछ हम लोगों को पसंद थी हमारी बातें सो जस की तस उनको लिखा है।’’
 
कवि अम्बिका यादव

             शैलीगत बंधनों से मुक्त हो कर खूबसूरत ढंग से कविता कही जा सकती है। यदि कवि के हृदय में सौहार्द का आग्रह है और प्रेम की भावनाएं हैं तो वह मानता है कि जाति, धर्म कोई बाधा नहीं बन सकती है। यही भावना कवि यादव की इस कविता में निहित है-
दिल मिले न मिले आंख तो मिलाइए
फिर मिले न मिले पता तो बताइए
मील के पत्थर की तरह खड़ा हूं राह में
रुके न रुके एक नजर तो डालिए
वह गुलाबी फूल तुम्हें ताक रहा है
भर देगा खुशबू से प्यारी सी नजर तो डालिए
कब तलक बैठे रहोगे सहमें किनारे पे
एक बार प्यार के समंदर में कूद तो जाइए
आदमी में बहुत बुरा सही ‘ताओ’
दुआ सलाम, राम- राम के रिश्ते तो निभाइए

Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh 

           ‘‘ताओ’’ के उपनाम से कविताएं लिखने वाले अम्बिका यादव की ‘रोटी और हुस्न की गजल’ पर लिखी गई ये पंक्तियां भी काबिले गौर हैं-
रोटी और हुस्न की गजल आज भी नई ।
अंदाज ए बयां बदल गए वो बेवफा फिर भी नई ।
कोई क्या कहेगा, क्या नया लिखेगा
दास्तानें वही, सिर्फ उंगलियां नई ।
फूल खिलने बिखरने का सिलसिला जारी है ‘ताओ’
बगीचे वही, सुगंध वही, सिर्फ ये पौध नई।

             जीवन को अनिश्चितताओं से घिरा हुआ माना जाता है। वर्तमान समय में भौतिकतावाद इतना अधिक बढ़ गया है कि व्यक्ति आत्मिक सुख को भूल कर भौतिक सुखसुविधाओं के लिए बाजार की चकाचौंध में डूबा रहता है। ऐसे वातावरण में यदि जीवन की अनिश्चितता और बढ़ जाए तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। अम्बिका यादव अपनी रचना में इसी अनिश्चितता को रेखांकित करते दिखाई पड़तें है-
जिंदगी का सफर कहां ले जाएगा पता नहीं चलता।
साथ दोस्त चल रहा है या दुश्मन पता नहीं चलता ।
अब तो दोनों आंखें भी अलग-अलग सपने देखने लगी
हमसफर साथ तो है, दिल कहां उसका पता नहीं चलता ।
मायूस को हमदर्दी हौसले के दो जुमले
उसे दे देंगे जिंदगी नई पता नहीं चलता ।
यूं तो जमाने में अपने बहुत है दोस्त ‘ताओ’
बुरे वक्त के बिना कुछ पता नहीं चलता।

          उल्लेखनीय है कि भावों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति के साथ ही अम्बिका यादव कार्टूनों के माध्यम से भी अपने भावों को व्यक्त करते हैं। विभिन्न समाचार पत्रों में उनके कार्टूनों का प्रकाशन हो चुका है। अभिव्यक्ति की विविधता को अपनाने वाले कवि अम्बिका यादव सागर साहित्य जगत में देखे जा सकते हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 14.09.2019)
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Tuesday, September 3, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 62... साहित्य के मौन साधक डाॅ. अरविंद गोस्वामी - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार डॉ. अरविंद गोस्वामी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

         साहित्य के मौन साधक डाॅ. अरविंद गोस्वामी
                     - डाॅ. वर्षा सिंह
                 
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परिचय - डॉ अरविंद गोस्वामी
जन्म -  11 मार्च 1953
जन्म स्थल - खुर्जा, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश
माता - स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा देवी गोस्वामी
पिता - गोस्वामी मुकुंदाचार्य
शिक्षा - एमबीबीएस डीसीएच शिशु रोग विशेषज्ञ
प्रकाशन - विभिन्न समाचारपत्रों में
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         सागर नगर में साहित्य सेवा की भावना विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों में समान रूप से देखी जा सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि अध्यापन से जुड़ा व्यक्ति ही साहित्य के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखता हो। यहां चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कई मनीषी ऐसे हैं जो अपना चिकित्सकीय कार्य करते हुए समाज की सेवा के साथ ही साहित्य की सेवा भी कर रहे हैं। उन्हीं में से एक नाम है डाॅ अरविंद गोस्वामी का। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के खुर्जा में जन्मे। इसके बाद बाल्यावस्था से ही वे सागर में ही निवासरत हैं। उन्होंने प्राथमिक शाला मोरारजी एवं चिंतामनराव मॉडल बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सागर से स्कूली शिक्षा प्राप्त किया। तदोपरांत उन्होंने हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने मेडिकल कॉलेज भोपाल एवं जबलपुर से एम.बी.बी.एस तथा शिशु रोग विशेषज्ञ की उपाधि प्राप्त की।
             शासकीय चिकित्सालयों में निष्ठावान डॉक्टर के रूप में अपनी सेवाएं विभिन्न स्थानों में देने के पश्चात् उनका शासकीय सेवा का अंतिम पड़ाव जिला चिकित्सालय सागर रहा, यहीं से मार्च 2018 को शिशु रोग विशेषज्ञ के पद से सेवानिवृत्त हुए । डॉ. अरविंद गोस्वामी ने अकादमिक अध्ययन के साथ हिंदी, अंग्रेजी एवं संस्कृत साहित्य का अध्ययन बचपन से ही किया। उनके मन में अगली कतार एवं शीर्ष पर होने की जिद, भीड़ से अलग दिखने की ललक रही। वे एक सफल शिशु रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत रहे। खेलों में रुचि रखने वाले डॉ. गोस्वामी की शतरंज में गहन अभिरुचि है। क्रीडा क्षेत्र में शतरंज के अलावा टेबल टेनिस, हॉकी, फुटबॉल में भी अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई है ।
डॉ. अरविंद गोस्वामी

         साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में विभिन्न समाचार पत्रों में स्वास्थ्य संबंधी एवं सामाजिक सरोकार वाले लेखों का प्रकाशन हुआ है तथा आकाशवाणी से वार्ताएं प्रसारित होती रही है। साहित्यिक गोष्ठियों में भी उनकी महत्वपूर्ण उपस्थिति रहती है।
             डॉ. गोस्वामी  का मानना है कि ‘‘साहित्य क्षेत्र में व्यक्ति विशेष की उम्र का आकलन उसके पठन-पाठन एवं लेखन से ही तय करना चाहिए। मात्र वयोवृद्ध होना ही सम्मान का पात्र नहीं होना चाहिए।’’ वे कहते हैं कि ‘‘जिंदगी के हर पल को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । मेरी काव्य सर्जना में यथार्थ का कटु सत्य अहम् होता है यथा- हर वर्ष आता है बसंत, अब तो बस अंत आया है या कितना अजीब होता है कि लोग स्वस्थ रहने के लिए योगासन लगाते हैं मनुष्य होते हुए भी पशु पक्षियों के मुद्राएं अपनाते हैं आदमी ने आदमी के सदृश्य नहीं सीखा है चलना धरा पर ।’’
            डाॅ. अरविंद गोस्वामी की कविताओं में कथ्य की कोमलता और अभिव्यक्ति की आत्मीयता है। वे अपनी भावाभिव्यक्ति को लयात्मक ढंग से शब्दों में उतारते हैं। मसलन, सरल शब्दों में सहज अभिव्यक्ति उनके काव्य की विशेषता है। उदाहरण के लिए ये पंक्तियों देखें-
मुझको खफा न कीजिए पछताइएगा आप ।
मैं वो नहीं कि जिस को मना पाइएगा आप ।
यह दिल है इसको तोड़कर पछतायेगा आप ।
आईना देखने को तरस जाइएगा आप ।
हैं आप अभी गुम किसी रंगीं खयाल में
आऊंगा याद होश में जब आइएगा आप ।
पहले की तरह मुझको पड़ा रहने दीजिए
उठ जाऊंगा तो साफ नजर आइएगा आप।

          श्रृंगार रस जीवन में अहम् स्थान रखता है, यह श्रृंगारिक भावना चाहे इंसान के प्रति हो अथवा ईश्वर के प्रति। श्रृंगार में संयोग भी होता है और वियोग भी। कभी-कभी बेरुखी की स्थिति भी आ जाती है जिसे अपनी इन पंक्तियों में डाॅ. गोस्वामी ने बड़ी सुंदरता से व्यक्त किया है-
मिलते हैं आप मुझसे मगर बेरुखी के साथ ।
यह हादसा है खूब मेरी जिंदगी के साथ।
गम आपके दिए हुए ताजा हैं इसलिए
हमने गले लगा लिया उनको खुशी के साथ ।
नजरें चुरा के मिलते हो क्यों मुझसे इस तरह
क्या दिल लगा लिया है किसी अजनबी के साथ ।
दी हमको काटने को उल्फत की ये सजा
मिलते भी हो अगर तो बड़ी बेरुखी के साथ।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

         ऐसा नहीं है कि डाॅ. गोस्वामी के काव्य में मात्र श्रृंगार रस ही हो, उनकी अनेक रचनाओं में दर्शन की भावना भी प्रबल रूप से दिखाई देती है। एक उदाहरण देखें -
मेरे जीवन की पुस्तक का इक अध्याय बाकी है
अभी तक  हाशिए पर था  अध्यवसाय बाकी है
यहां सब लोग देते हैं दुआएं स्वस्थ जीवन की
मगर मैं जानता हूं कि प्रकृति का न्याय बाकी है

           डाॅ. गोस्वामी के मित्र कवि कपिल बैसाखिया कहते हैं कि -‘‘डाॅ. गोस्वामी जितने अच्छे कवि हैं उतने ही अच्छे इंसान भी। अपने मित्रों के बीच लोकप्रिय होने के साथ ही सदा सभी के सहयोगी रहते हैं।’’ जीवन को उद्देश्य एवं आकार देने वाले व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता का भाव होना, व्यक्ति के भीतर उपस्थित सदाशयता का परिचायक होता है। डाॅ. अरविंद गोस्वामी ने भी अपने मुक्तक में अपने माता-पिता, अपने गुरुवृंद एवं मित्रों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है-
प्रथम आभार उनका है जो मुझको जग में लाए हैं
तत्पश्चात गुरुवर है जो पथ मुझको दिखलाए हैं
मेरे मित्रों की तो कुछ बात है अद्भुत और अव्यक्त
बन कर लहू के कण मेरी रग-रग में समाए हैं

          डॉक्टर गोस्वामी ठीक सफर चिकित्सक, शिशु रोग विशेषज्ञ होने के साथ ही कवि भी है और वे अपनी इस सफल जीवन यात्रा का रहस्य अपनी स्वयं के जीवनानुभव के आधार पर बताते हुए इन पंक्तियों में कहते हैं कि -
 निष्कर्ष अनुभव का बतला रहा हूं मैं
मिलती लगन से जीत जतला रहा हूं मैं
महत्ता मेहनत की समझी जो मैंने अपने बचपन से
इसलिए गीत सफलता का अब तक गा रहा हूं मैं

        अपनी परिवार के प्रति कवि के मन में अगाध स्नेह और अपनत्व की भावना है। वे अपनी जीवन संगिनी और पुत्र-पुत्री तथा पुत्र वधू के प्रति इन पंक्तियों में अपने हृदय के उद्गार व्यक्त करते हैं -
मेरी परिवार का आधार है मेरी जीवन संगिनी
हर खुशियों का भंडार है मेरी जीवन संगिनी
पूनम की ज्योत्सना मानिंद छाई है जो जीवन में
हमारे गौरव का विस्तार है मेरी जीवन संगिनी
बहू अंकिता बिल्कुल बिटिया समान है
बेटा निमेष मेरा सारा जहान है
नजर न लग जाए इनको यही ईश्वर से बिनती है
नेहा जो बिटिया है अपने कुल की शान है

         डॉ. गोस्वामी जीवन के यथार्थ को अपनी कविता में जिस गहराई से प्रस्तुत करते हैं, वे अपनी कोमल मनोभावनाओं को भी उतनी ही गहराई से प्रकट करने में सक्षम है। उनकी यह कविता देखें-
मुद्दत हुई जैसे किसी को देखे हुए
एक तपते से रेगिस्तान के मानिंद
लंबी सी उदासी का आलम
न जाने क्यों दिल तड़पता है
एक अनजान के लिए
समय उड़ता है पंख लगा कर/पर स्मृतियां
लगता है जैसे किसी जोंक की तरह
चिपट गई है मेरे जेहन से में

       अपनी अतुकांत कविताओं में भी डाॅ. गोस्वामी उतने ही सहज नज़र आते हैं जितनी कि अपनी तुकांत रचनाओं में। उनकी इस प्रकार की कविताओं में एक अलग गंभीरता की अनुभूति होती है। जैसे यह कविता-
तुम्हारा खत मिला
धारणा ना टूटी लंबे अंतराल बाद
कि निर्जीव शब्द भी बोलते हैं
विगत से जुड़ी ग्रंथियां खोलते हैं
किंचित शब्दों में उभरता व्यतीत आह्लाद
और लहराता तुम्हारा प्यार
सच उमड़ पड़ता है/शब्दों से जुड़ी तुम
अतीव तृप्ति दे जाती हो
एक बात कहूं तुम खत न लिखा करो
क्योंकि यह सिखा देगा
तुम्हारे बिना रहना और सहना
अनगिनत त्रासों को।

      डाॅ. अरविंद गोस्वामी मंच और प्रकाशन की ललक से दूर रहते हुए एक मौन साधक की भांति सतत साहित्य साधना से आज भी सागर के साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 29.08.2019)
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Wednesday, June 19, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 54 .... संवेदनशील एवं ऊर्जावान कवयित्री डॉ. चंचला दवे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की कवयित्री डॉ. चंचला दवे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

संवेदनशील एवं ऊर्जावान कवयित्री डॉ. चंचला दवे
                     - डॉ. वर्षा सिंह
                     
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परिचय :
नाम  :- डॉ. चंचला दवे
जन्म :-  13 मार्च 1952
जन्म स्थान :- चंद्रपुर (महाराष्ट्र)
माता-पिता :- स्व. सूरज बेन पंड्या एवं स्व. सोमनाथ पंड्या
शिक्षा  :- बी.एड., एम.ए., पी.एच. डी.
लेखन विधा :- काव्य।
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        सागर के साहित्यिक जगत को जितना समृद्ध हिन्दी भाषियों ने किया है उतना ही समृद्ध किया है अहिन्दी भाषियों ने जिनमें महाकवि पद्माकर तेलगूभाषी थे। वर्तमान में डॉ. चंचला दवे इसका एक अनुपम उदाहरण हैं। डॉ. चंचला दवे बहुभाषी हैं। उनकी मातृभाषा गुजराती है। उनका जन्म 13 मार्च 1952 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर में हुआ। जहां उन्हें मराठी भाषा का ज्ञान प्राप्त हुआ। अपनी अभिरुचि के अनुरुप उन्होंने हिन्दी का गहन अध्ययन किया और डॉ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। तदोपरांत बरकतुल्लाह विश्वविद्यालय भोपाल से ' नई कविता के संदर्भ में भवानी प्रसाद मिश्र की कविताओं का अनुशीलन’ विषय में पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। गुजराती, मराठी, और हिन्दी के साथ ही अंग्रेजी ओर संस्कृत का भी उन्हें पर्याप्त ज्ञान है।
         मृदुभाषी एवं आत्मीयता से परिपूर्ण डॉ चंचला दवे सन् 1972 से सागर में निवासरत हैं। उनके पति श्री सुशील दवे बैंककर्मी रहे हैं जिसके कारण उन्हें स्थानान्तरण का अनुभव होता रहा। सन् 1983 में उनके पति का स्थानांतरण सागर की खुरई तहसील स्थित बैंक शाखा में हो गया। डॉ चंचला दवे ने वहीं सन् 1983 से 1994 तक होली फैमिली कान्वेंट हायर सेकंडरी स्कूल में व्याख्याता के पद पर शिक्षण कार्य किया। इसके बाद अक्टूबर 1994 से 2012 तक श्रीवल्लभ दास माहेश्वरी महाविद्यालय खुरई जिसे कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय के नाम से भी जाना जाता है, में प्राध्यापक के पद पर रहते हुए शिक्षण कार्य किया। इस दौरान अनेक अवसर पर उन्हें प्रभारी प्राचार्य का दायित्व भी सम्हालना पड़ा। सेवा कार्य के साथ ही वे साहित्य सृजन से लगातार जुड़ी रहीं। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी लगभग 35 कविताओं का प्रकाशन हुआ। साहित्यिक पत्रिका ‘आकंठ’ में भी उनकी कविता प्रकाशित हुई। उन्होंने अनेक पुस्तकों की समीक्षाएं एवं आलेख लिखे जो देश की पत्र- पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे। उन्हें अनेक राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीयों में सहभागिता का भी अवसर मिला। डॉ. दवे ‘सृजन के स्वर’ नामक पुस्तक की सहायक संपादक रहीं। आकाशवाणी सागर, भोपाल से उनकी रचनाओं का प्रसारण होता रहता है।
         श्रीवल्लभ दास माहेश्वरी महाविद्यालय खुरई  से सन् 2012 मे सेवा निवृत्त हुईं डॉ. चंचला दवे सेवा निवृत्ति के उपरांत साहित्य सृजन में पुनः सक्रिय हो गईं। जिसका सुपरिणाम उनकी काव्यकृति ‘‘गुलमोहर’’ के रूप में सामने आया।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh


        साहित्य सृजन के लिए उन्हें अब तक अनेक सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है जिनमें प्रमुख हैं- गुजराती बाज खेडावाल समाज के रजत जयंती समारोह में 22 जून 2018 को राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन पटेल म प्र द्वारा साहित्य सम्मान, सन् 2018 में ही संभागीय साहित्यकार सम्मेलन सागर द्वारा सुधारानी डालचंद जैन सम्मान, 14 सितम्बर 2017 को श्यामलम् संस्था, सागर द्वारा स्व. डॉ सरोज तिवारी स्मृति में, ‘नारी प्रतिभा सम्मान’। इससे पूर्व हिंदी साहित्य संमेलन प्रयाग द्वारा प्रज्ञा भारती की मानद उपाधि, हिंदी साहित्य संमेलन प्रयाग द्वारा महादेवी वर्मा की जन्म शती पर सारस्वत सम्मान, महिला सम्मान सागर,  जे एम डी पब्लिकेशन नईदिल्ली द्वारा, हिंदी सेवी सम्मान, विचार संस्था सागर सागर गौरवसम्मान, डालचंद जैन की स्मृति में साहित्यकार सम्मान भी उन्हें प्राप्त हो चुका है। वे अनेक सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक समारोहों का सफल मंच संचालन कर चुकी हैं। वे सामाजिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं की सदस्य भी हैं जैसे एलांयंस क्लब इंटरनेशनल, समर्पण सागर क्लब, सरस्वती शिशु मंदिर विद्वत परिषद, म प्र लेखिका संघ, लायंस क्लब सागर झील। वे स्थानीय संगीत श्रोता समाज की उपाध्यक्ष भी हैं।
         अपने जीवनानुभव एवं रचनाकर्म के बारे में डॉ चंचला दवे का कहना है कि -‘‘ कविताएं लिखने का शौक स्कूल के दिनो से ही था, बचपन में पिता को खो देने के बाद,उन पर भाईयो पर कविता लिखते रहे, महाविद्यालय में भी यह शौक जारी रहा। मेरा विवाह 19 वर्ष में हो गया था। बी.ए. के बाद सारा अध्ययन विवाहोपरांत हुआ। राष्ट्र, समाज, नगर में घटित होने वाली  घटनाएं मेरी आत्मा को प्रभावित करती रहती है। इसी अन्तर्मथन से जो भाव शब्द बनकर निकलते है, कविता का रूप ले लेते है.अधिकांश कवितांएं मेरे जीवन में घटित होने वाली ,घटनाओं की परिणती है। मेरे जीवन का स्वर्ण काल खुरई में व्यतीत हुआ। वही मेरी कर्म भूमि रही। मातृभाषा गुजराती होने के बाद सृजन हिंदी में ही होता रहा। अभी गुजराती पुस्तक का हिंदी अनुवाद कर रही हूं। कुछ गुजराती कविताओं का हिंदी अनुवाद जारी है। मेरी कुछ कविताओं का मराठी अनुवाद, डॉ संध्या टिकेकर कर रही है।’’
          डॉ. चंचला दवे की कविताओं में समाज में व्याप्त विद्रूपताओं का मार्मिक दृश्य देखने को मिलता है जो एक अतिसंवेदनशील कवयित्री के रूप में उनकी पहचान स्थापित करता है। लड़कियों पर लगाई जाने वाली बंदिशें और उनके प्रति होने वाले अपराध कवयित्री के मन को कचोटते हैं और उनकी ‘‘सुरक्षा कवच’’ शीर्षक से यह कविता सामने आती है-
ऐसा न हो
कल, फिर से बेटियों को
रखने लगे/ पर्दो में
लौटने लगे/मुगलों की प्रवृति
शेर चीते,भालू,लोमड़ी,सियार
घूमने लगे आस पास
सांसे लेना हो जाएं दूभर
केवल दिखे फौज/नरभक्षियों की
बेटियों का रोना चीखना
उसकी करूण पुकार
क्यों बहरे हो गये हैं हम?
आइए हम बनते है/सुरक्षा कवच
अपनी बेटियों का/बचाते हैं,उन्हे
नर भक्षी भेडियों से।
बायें से : डॉ.वर्षा सिंह, डॉ. चंचला दवे, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, श्रीमती चौधरी एवं श्रीमती सीमा दुबे

         डॉ. चंचला दवे की रचनाशीलता की यह विशेषता है कि वे जीवन के कठोर पक्ष का आकलन तो करती ही हैं साथ ही, जीवन के कोमन पक्ष को भी बड़ी सुंदरता से अपनी अभिव्यक्ति में शामिल करती हैं। जैसे उनकी एक कविता है ‘‘मेरे मन के चांद हुए’’। इस कविता में प्रेमाभिव्यक्ति का मधुर रूप परिलक्षित होता है-
तुम मेरी
अनदेखी अनजानी प्रीत हो
दिल में तुम/आन बसे हो
जब से मिले हो/तुम
रंग मेरे मकरंद हुए
जब से सुना है/तुम को
साजो के सुर/मंद हुये
सपनों का तुम रूप/मनोहर
मेरे मन के चांद हुये
अधरों के स्वर/सूख गये
लेखन का रंग/लाल हुआ
नदिया की तुम/निर्मल धारा
जीवन का तुम गान हुए
शब्द सभी/निःशब्द हुए
मेरा तुम/ विश्वास हुए

           मनुष्य ने अपने जीवन को समयबद्ध करने के लिए घंटे, मिनट और वर्ष बनाए। नए वर्ष का आगमन और पुराने वर्ष का गमन एक समयमापी प्रक्रिया ही तो है किन्तु मनुष्य अपने बनाए सांचों  अथवा मानवों के प्रति किस प्रकार अनुरक्त हो जाता है कि वह समय के गुजरने की आहट को भी ठीक से सुन नहीं पाता है। डॉ चंचला दवे ने अपनी कविता ‘‘नया साल’’ में इसी तथ्य को व्यावहारिक ढंग से उठाया है-
आज 19 दिसंबर है
2018 को जाने में
बाकी है पूरे 12 दिन
फिर आयेगा, नया साल
आज का/साल बीता हो जायेगा
अतीत में/केलेंडर की तरह
फड़फडाती जिन्दगी
हवा में/उड़ती रहेगी
न पंख होंगे/ उड़ने को
और न बतियाने जीभ
काटने के लिये, नहीं होंगे/दांत
होगी तो केवल
जेहन में याद करने/स्मृतियां।

          डॉ. चंचला दवे एक ऊर्जावान कवयित्री हैं। भले ही अपने पारिवारिक दायित्वों के कारण उनकी सृजनशीलता की गति धीमी रही किन्तु अब वे एक बार फिर काव्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की ओर लौट आई हैं। यही आशा है कि उनका काव्य सृजन सागर नगर के साहित्यिक संपदा में निरंतर श्रीवृद्धि करेगा।
 
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( दैनिक, आचरण  दि. 19.06.2019)
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कवयित्री चंचला दवे की whatsapp पर टिप्पणी का स्क्रीन शॉट....

# साहित्य वर्षा

Friday, June 7, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 52 ... विपुल संभावनाओं के कवि प्रभात कटारे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि प्रभात कटारे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

      विपुल संभावनाओं के कवि प्रभात कटारे
               - डॉ. वर्षा सिंह
                   
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परिचय :- प्रभात कटारे
जन्म :-  13 अगस्त 1982
जन्म स्थान :- ग्राम रजौआ, सागर (म.प्र.)
माता-पिता :- श्रीमती बसंतीदेवी कटारे एवं श्री रघुवर प्रसाद कटारे
लेखन विधा :- गीत, ग़ज़ल
काव्यपाठ : - गोष्ठियों में काव्यपाठ।
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                 सागर में काव्यधारा अनेक ऐसे कवियों से हो कर बह रही है जो प्रकाशन के क्षेत्र से दूर काव्यसाधना में रत हैं। वे अपनी रचनाओं को कवियों के मध्य प्रस्तुत कर के साहित्यसेवा में संलग्न रहते हैं। वस्तुतः साहित्यसेवा कोई सशर्त कर्म नहीं है। यह तो आरम्भ ही स्वांतःसुखाय से होता है। जो कवि काव्यगोष्ठियों में से जुड़ कर अपनी प्रतिभा का परिचय देते हैं, सागर निवासी कवि प्रभात कटारे भी उनमें से एक हैं। ग्राम रजौआ, जिला सागर में 13 अगस्त 1982 को श्री रघुवर प्रसाद कटारे एवं श्रीमती बसंतीदेवी कटारे के पुत्ररत्न के रूप में जन्में प्रभात कटारे को काव्य संस्कार अपने शिक्षक बाबूलाल राजौरिया से मिले।
           कवि प्रभात ने उच्चशिक्षा प्राप्त करते हुए हिन्दी, अंग्रेजी एवं समाजशास्त्र में एम.ए. की उपाधि अर्जित की। तकनीकी दृष्टि से वे समय के साथ चलने में विश्वास रखते हैं, इसीलिए तीन विषयों में स्नातकोत्तर एवं बीएड होने के बावजूद उन्होंने कम्प्यूटर विज्ञान में पीजी डी सीए तथा पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। प्रभात कटारे का यूं तो आज कृषि एवं बिल्डिंग मटेरियल सप्लायर के रूप में एक जाना-माना नाम है, वहीं सागर के साहित्य जगत में भी उनकी एक विशेष पहचान स्थापित होती जा रही है।
            प्रभात कटारे काव्यगोष्ठियों से अपने जुड़ने का श्रेय देवकीनंदन रावत को देते हैं और उन्हें काव्यसृजन करते हुए लगभग दस वर्ष हो चले हैं। सन् 2010 में पत्रकारिता प्रशिक्षण के दौरान उनकी एक कविता दैनिक जागरण (भोपाल) में प्रकाशित हुई थी किन्तु उसके बाद उन्होंने प्रकाशन की दिशा में कोई विशेष रुचि नहीं रखी।
           कवि प्रभात हिन्दी और बुंदेली दोनों में कविताएं लिखते हैं। उनकी कविताओं में समसामयिक परिस्थितियां मुखररूप में दिखाई देती हैं। बेरोजगारी से परेशान युवाओं के पक्ष में वे कविता लिखते हुए कहते हैं-
सुन ले, सुन ले, री सरकार, दे दे हमको रोजगार
बिना  नौकरी  देखो  हमको, हैं  कितने  लाचार
सुन ले, सुन ले, री सरकार...
लगी नौकरी जिनकी, वे सब हो गए बच्चों वारे
बिना नौकरी  देखो, अब  लौं  घूम  रये कुंवारे
कर दे सपने सब साकार,
सुन ले, सुन ले, री सरकार...
घरवारो ने  पालो-पोसो,  हमखां  खूब पढ़ाओ
अपने सबरे  नखरे झेले,  सबरो  खर्च उठाओ
अब हम हो गए उनपे भार,
सुन ले, सुन ले, री सरकार...

Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh

                युवावर्ग की भावनाओं को आत्मसात करते हुए कवि प्रभाव भावुक हो उठते हैं और उनकी रचना में श्रृंगाररस का एक अलग ही रूप निखर कर सामने आता है-
हर आंख में आंसू है, हर आंख में पानी है।
ये कैसी जवानी है,  ये कैसी  जवानी है ।
जो  यहां  नज़रों के  तीर  से  घायल हैं
मेले में भी  ये दुनिया,  लगती वीरानी है।
ये हवा  मोहब्बत  की, जाने  चली  कैसी
हर लड़का दीवाना है, हर लड़की दीवानी है।
दिल मेरा हुआ चोरी, नज़रों से हुआ घायल
जिसको भी यहां देखों, बस, एक कहानी है।

            प्रेम, श्रृंगार आदि वह भावनाएं हैं जो कवियों को अपनी ओर सहज ही आकर्षित करती हैं तथा उन्हें अपने काव्य का विषय बनाने के लिए प्रेरित करती हैं किन्तु कवि प्रभात कटारे जहां प्रेम और श्रृंगार को तो अपने सृजन में स्थान देते हैं, वहीं एक सजग कवि की भांति युवाओं को उनके कर्त्तव्य का भी स्मरण कराते हैं-
तुम कहते हो प्रेम करो, अरे प्रेम की क्या परिभाषा है।
सभी ओर  मायूसी  है  बस,  चारो ओर  निराशा है।।
क्या लैला, मजनूं बन कर ही, कहो प्रेम हो सकता है
और भी रूपों में ईश्वर ने,  इंसा को  यहां तराशा है।।
क्या नहीं कोई कर्त्तव्य तुम्हारा, जिनने तुमको पाला है
उनसे पूछो, उनके मन में,  तुमसे कितनी आशा है।।

             प्रभात कटारे मां के प्रति अपने भाव व्यक्त करते हुए मां के महत्व को निरुपित करते हुए कहते हैं कि मनुष्य के जीवन में मां से बढ़ कर और कोई हो ही नहीं सकता है। मां जिस प्रकार अपनी संतान के प्रति समर्पित रहती है, उतना समर्पणभाव और किसी में नहीं हो सकता है। अतः प्रत्येक संतान को अपने मातृऋण को ध्यान में रखना चाहिए। ये पंक्तियां देखिए-
तेरे ऋण  से  सदी  ऋणी है, तेरी  ये संतान
कोई नहीं ले सकता जग में,  मां  तेरा स्थान।
खुद सोई  गीले  में  तू, सूखे में  मुझे सुलाया
रात-रात भर सेवा की और अपना दूध पिलाया
फिर भी  तेरे होंठों पर,  वो बनी रही मुस्कान।
बिन बोले ही समझ ली तूने,  मेरे मन की बात
लेकिन मैं ही  समझ न पाया,  वो तेरे जज़्बात
मैंने समझा मूरख तुझको, और खुद को विद्वान।
घूंघट में  मुस्काती मां  तू , याद मुझे है आती
झम-झम करती पायल तेरी, कैसा संगीत सुनाती
गूंज रहा है  अंतरमन में, वो  लोरी का गान।

            कवि प्रभात की अभिव्यक्ति में विषय की विविधता है। वे सागर के महान दानवीर डॉ. हरीसिंह गौर के प्रति अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। इस बात को भला कौन विस्मृत कर सकता है कि वे डॉ गौर ही थे जिन्होंने अपनी संपत्ति दान कर के सागर को एक अनुपम विश्वविद्यालय प्रदान किया और इस शैक्षिकरूप से पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा का मंदिर स्थापित किया। कवि प्रभात सागर के पितृपुरुष डॉ. हरीसिंह गौर का अभिनंदन करते हुए लिखते हैं कि-
हे गौर तुम्हारे चरणों में, नित वंदन है, अभिनंदन है
हे दानवीर,  हे शूरवीर,  महक  गया  तू चंदन है
सागर में हो तुम पुष्प कमल, हे कर्मवीर, हे बुद्धि विमल
मैं आभरी हूं प्रतिपल, सागर आभारी है प्रतिपल
तुम ज्ञानी हो, तुम ध्यानी हो, सागर का अभिमान हो तुम
हर घर शिक्षा दीप जलाया, ऐसा पावन अभियान हो तुम
सागर का श्रृंगार कर गए, इसकी छटा न्यारी है
तेरी इस कृपा करुणा के सागरवासी आभारी हैं

          कवि यदि कविताकर्म करता है तो उसके कुछ सामाजिक सरोकार भी रहते हैं। इन्हीं सरोकारों को ध्यान में रख कर वह जीवन से जुड़े उन प्रसंगों को भी अपनी कविता में समाहित करता है जो देश की प्रगति एवं स्वतंत्रता के लिए जरूरी हैं। इसीलिए प्रभात कटारे ने मतदान के महत्व को भी अपनी रचना में पर्याप्त स्थान दिया है। वे लिखते हैं-
चुनाव  एक  कुंभ है, स्नान  कीजिए
गुप्तदान  दीजिए,  मतदान  कीजिए।
मां भारती का यश बढ़े, समृद्ध देश हो
मिल कर सभी ऐसा कोई विधान कीजिए।
फैली है बहुत गंदगी, विकराल रूप है
निर्मल हो राजनीति, कुछ निदान कीजिए।

       प्रत्येक साहित्यिक विधा मनुष्य को संस्कारित करती है और उसमें भी काव्य की यह खूबी है कि वह कोमलता के साथ अनुशासित करती है। यदि कवि प्रभात कटारे काव्य के अनुशासन का इसी प्रकार निर्वहन करते रहे तो उनकी रचनाएं और अधिक प्रभावी होती जाएंगी। काव्य भी अभ्यास की मांग करता है। अभ्यास के प्रति लगन बनाए रखने की क्षमता प्रभात कटारे की रचनाओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है जो उनके काव्यात्मक भविष्य के प्रति विपुल संभावनाएं प्रकट करती है।

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( दैनिक, आचरण  दि. 07.06.2019)
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