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Friday, August 28, 2020

सागर : साहित्य एवं चिंतन 71| डॉ. राजेश दुबे : कविता और व्यंग्य के साहित्यकार | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार डॉ.राजेश दुबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

            डॉ. राजेश दुबे : कविता और व्यंग्य के साहित्यकार
                        - डॉ. वर्षा सिंह
                                         
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परिचय :- डॉ. राजेश दुबे
जन्म :-  01 जुलाई 1953
जन्म स्थान :- सागर
माता-पिता :- श्रीमती राजेश्वरी दुबे एवं श्री चन्द्र कुमार दुबे
शिक्षा :- एम.ए., पीएच.डी.
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन :-  तीन पुस्तकें प्रकाशित
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     सागर शहर का हिन्दी साहित्य न केवल समृद्ध है, बल्कि निरंतर ऊर्जावान है। कवियों और लेखकों की लेखनी से सागर की साहित्यिक भूमि किसी उपवन की तरह शब्दों के नैनाभिराम दृश्य और भावनाओं की सुगंध से सुसज्जित रहती है। अनेक नवोदित साहित्यकारों ने अपनी पहचान स्थापित करने के लिए यहां श्रमसाघ्य लेखन किया है। इसी संदर्भ में कवि एवं लेखक डॉ. राजेश दुबे का नाम लिया जा सकता है जिन्होंने अपनी तीन पुस्तकों के प्रकाशित होते-होते सागर के साहित्य जगत में अपनी एक विशेष पहचान बना ली। श्री चन्द्र कुमार दुबे एवं श्रीमती राजेश्वरी दुबे के पुत्र के रूप में 01 जुलाई 1953 को सागर में जन्में राजेश दुबे का एक परम्परावादी एवं धार्मिक विचारों से परिपूर्ण परिवार में लालन-पालन हुआ। आगे चल कर उन्होंने हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। इसके बाद ‘प्रेमचंद परम्परा और वर्तमानकालीन हिन्दी उपन्यास-1960 के उपरांत’ विषय में सागर विश्वविद्यालय से पी. एचडी. की उपाधि प्राप्त की। आजीविका के क्षेत्र में उन्होंने राज्य प्रशासनिक सेवा करते हुए डिप्टी कलेक्टर पद से सेवानिवृत्त हुए।
       डॉ. राजेश दुबे को साहित्य, धर्म दर्शन एवं समाजविज्ञान में सदैव रुचि रही है। जिसकी झलक उनकी कविताओं और लेखों में देखी जा सकती है। व्यंग्य विधा में भी उन्होंने लेखन किया है। डॉ. दुबे की तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें हैं - अमृतराय के उपन्यासों पर समीक्षात्मक पुस्तक ‘हंसते-बोलते दस्तावेज’ व्यंग्य पुस्तक ‘नागफनी’ तथा कविता संग्रह ‘गांव से लौटते हुए’। ‘नागफनी’ में संग्रहीत व्यंग्यों के संबंध में डॉ. राजेश दुबे ने पुस्तक के आमुख में लिखा है कि ‘‘प्रशासनिक सेवा में रहते हुए मैंने आम आदमी के दुखों तकलीफों, उनकी चिन्ताओं को बहुत नज़दीक से देखा, जाना, परखा है। आज भी हमारा किसान और मजदूर वर्ग वैसा ही जीवन जी रहा है जैसे प्रेमचंद के पात्र भोग रहे थे। आज भी घीसू, माधव, होरी, धनिया, गोबर, झुनिया मिलते हैं, बोलते हें, बतियाते हैं। वे आज भी वैसे ही दुखी हैं। वे आज भी वैसे ही सुखी हैं। समयानुसार अंतर आया है तो सिर्फ़ इतना कि झोपड़ियों में कुछ थूनियां लगा दी गई हैं जो झोपड़ी को ज़मींदोज़ होने से बचा रही हैं। देहातों में इमारतों के जंगल उग आए हैं आज भी शोषण की परिस्थितियां और शोषण की कुटिल मनोवृत्तियां पूर्ववत क़ायम हैं।’’
  
     
       समाज में व्याप्त आर्थिक, सामाजिक, वर्गीय विद्रूपताओं को देख कर मन का द्रवित होना स्वाभाविक है। जब मन द्रवित होता है तो लेखनी से शब्द फूट पड़ते हैं और ये शब्द स्वतः अपनी शैली चुनते हुए कभी कविता, कभी कहानी, कभी निबंध तो कभी व्यंग्य लेखों में ढल जाते हैं। डॉ. राजेश दुबे ने भी जो विद्रूपताएं अपनी आंखों से देखी और महसूस कीं उन्हें वे व्यंग्य लेखों में ढलने से नहीं रोक सके। इसीलिए उनके‘‘नागफनी’’ व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य चुटीले और धारदार हैं। इसी संग्रह में एक व्यंग्य लेख है ‘‘चश्मा’’ शीर्षक से। चश्मे को एक क्षेपक की तरह प्रयोग करते हुए डॉ दुबे ने व्यंग्य किया है कि -‘‘आदमी के शरीर पर जो महत्व कपड़ों का है, वही महत्व आंखों पर चश्मे का है। बग़ैर चश्में के आदमी की आंखें सूनी लगती हैं। चश्मा पहने आदमी आदमी-सा दिखता है, बग़ैर ख्श्मा पहना आदमी चौपाए-सा दिखता है। जब आदमी कोरी आंखों से देखता है तब वह ज़्यादा बारीक़ी में नहीं जा पाता है और ज़्यादा नुक़्ताचीनी नहीं कर पाता है, और जो है उसी में प्रसन्न रहता है। यह प्रसन्नता उसके स्वस्थ और दीर्घ जीवन का राज़ है। ऐसे समय वह संतोषी और सुखी रहता है। यही नहीं, वह झगड़े-टंटे से अपनी टांग बचाए रखने का हिमायती होता है। पर जब से उसने चश्मा पहनना शुरू कर दिया है, उसका क़द बढ़ गया है। उसमें सोचने-समझने की क्षमता का विकास हुआ है। अब वह बुद्धू से बुद्धिमान हो गया है। उसकी दृष्टि विकसित हो गई है। परिणामतः उसकी चिन्ताएं बढ़ गई हैं।’’
जहां तक व्यंग्य विधा में पैनेपन और कटाक्ष की क्षमता का प्रश्न है तो यह दोनों अनुभवों की ग्राह्यता से आती है। इस संबंध में हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित व्यंग्यकार डॉ सुरेश आचार्य ने अपने एक अन्य ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में लिखा है कि ‘‘ईमानदार व्यंग्य रचना सदैव सामाजिक यथार्थ से संबंधित होती है। यह कहीं भी अमूर्त नहीं होती बल्कि सदैव सत्य से साक्षात करती चलती है।  दैनंदिन जीवन के कष्ट आडंबर मिथ्याचार और अनीतियों का तिरस्कार, उद्घाटन और उपहास ही उसका लक्ष्य होता है।’’

       डॉ. राजेश दुबे ने व्यंग्य के साथ ही कविताएं भी लिखी हैं। उनका काव्य संग्रह ‘‘गांव से लौटते हुए’’ अतुकांत शैली की कविताओं का संग्रह है। इस संग्रह की भूमिका में समीक्षक एवं साहित्यकार प्रो. आनन्द प्रकाश त्रिपाठी ने लिखा है -‘‘इस संग्रह की कविताओं में अभिव्यक्ति का टटकापन, भाषा का बांकपन, देशज़ अंदाज़, जीवन की सच्ची अनुभूति, संप्रेषणीयता, कहन की सहजता, बिम्बों और प्रतीकों की नवता, जीवन और प्रकृति की बहुत गहरी जुगलबंदी, मानवता के कल्याण की भावना, विचारशीलता, जीवन का सौंदर्य आदि अनेक बातें डॉ. राजेश दुबे को समर्थ कवि कहे जाने का हक़ देती हैं। निःसंदेह ‘गांव से लौटते हुए’ संग्रह की कविताएं अपनी संरचना, कथन वैविध्य, वैचारिकता, भाषाशिल्प की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।’’
      जीवन के अनुभव और वैचारिक सामंजस्य से भरपूर कविताओं में डॉ. राजेश दुबे ने अनुभवजनित अनेक दृश्यों को अपने शब्दों में पिरोया है। संग्रह की पहली कविता ‘‘विश्वास की सोन चिरैया’’ की ये पंक्तियां देखें-
जब से मेरे हाथ
होम करते जले हैं
विश्वास की सोच चिरैया
घायल है
तब से मन में
एक चोर बसने लगा है
लगता है सब लोग
मुझे ठग लेना चाहते हैं।

     बेशक़ वर्तमान परिदृश्य में धोखा, छल, कपट इतना अधिक व्याप्त है कि अविश्वास का प्रतिशत बढ़ चला है। डॉ. राजेश दुबे की एक और कविता है ‘‘हर सुबह अख़बार’’। इस कविता में उन्होंने मानवीय मूल्यों के ह्रास का मार्मिक चित्रण किया है-
हर सुबह
अख़बार के पृष्ठ दर पृष्ठ पर
अंकित
दुष्कर्म, हत्या, ठगी, हिंसा
जाति-सम्प्रदायगत
षडयंत्रों की
कुत्सित उपलब्धियां
बटोर लेती हैं
सारी की सारी सुर्खियां।

       अपने सागर शहर की दशा को बिम्ब के रूप में लेते हुए उन तमाम शहरों पर कटाक्ष करती है उनकी कविता ‘‘आवारा मवेशियों की भीड़’’, जो ऐसी दुरावस्थाओं से गुज़र रहे हैं। कविता की पंक्तियां इस प्रकार हैं-
मेरे नगर में सड़कों पर
आवारा मवेशियों की भीड़ है
आड़े-तिरछे बैठे
मौज मनाते
जुगाली करते
यातायात व्यवस्था को
रौंदते हुए खड़े हैं
इस अव्यवस्था पर
जब कोई
झुंझलाता हुआ
सूचना देता है
तब मवेशियों के समर्थन में
कुछ संगठन आ कर
हमारे ज्ञान में
इज़ाफ़ा करते हैं
मवेशियों की
आज़ादी के प्रश्न पर हमें
नीचा दिखाते हैं।

        डॉ. राजेश दुबे शिद्दत के साथ अपने रचनाकर्म से जुड़े हैं। वे अपने अनुभवों को अपनी गद्य एवं पद्य रचनाओं में उतार देते हैं। यही उनकी लेखनी की विशेषता है। उनका शिल्प एवं भाषा आडम्बरविहीन सरल और सहज होती है। जो उनके लेखन को पठनीय बनाती है। 
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( दैनिक, आचरण  दि.28.08.2020)
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आगडं पर प्र

Tuesday, January 21, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन 70... साहित्य और समाज के प्रति समर्पित लेखिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर की साहित्यकार डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, जो मेरी छोटी बहन भी हैं, पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन 

साहित्य और समाज के प्रति समर्पित लेखिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह 
                                                        
               - डाॅ. वर्षा सिंह
                  Email: drvarshasingh1@gmail.com

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जन्म:-  29 नवम्बर 1963
जन्म स्थान:- पन्ना, मध्यप्रदेश
माता-पिता:- डाॅ (श्रीमती) विद्यावती सिंह ‘‘मालविका’’ एवं स्व. रामधारी सिंह
शिक्षा:- डबल एम.ए., पीएच.डी., बीएड।
लेखन विधा:- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन:- विभिन्न विधाओं में पचास से अधिक पुस्तकें प्रकाशित।
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समग्र हिन्दी साहित्य में स्त्रीविमर्श एवं आधुनिक हिन्दी कथा लेखन के क्षेत्र में सागर नगर की डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह का योगदान अतिमहत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने पहले उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ से हिन्दी साहित्य जगत में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई। परमाननद श्रीवास्तव जैसे समीक्षकों ने उनके इस उपन्यास को हिन्दी उपन्यास शैली का ‘‘टर्निंग प्वाइंट’’ कहा है। यह हिन्दी में रिपोर्ताजिक शैली का ऐसा पहला मौलिक उपन्यास है जिसमें आंकड़ों और इतिहास के संतुलित समावेश के माध्यम से कल्पना की अपेक्षा यथार्थ को अधिक स्थान दिया गया है। यही कारण है कि यह उपन्यास हिन्दी के ‘‘फिक्शन उपन्यासों’’ के बीच न केवल अपनी अलग पहचान बनाता है अपितु शैलीगत एक नया मार्ग भी प्रशस्त करता है। शरद सिंह जहां एक ओर नए कथानकों को अपने उपन्यासों एवं कहानियों का विषय बनाती हैं वहीं उनके कथा साहित्य में धारदार स्त्रीविमर्श दिखाई देता है। शरद सिंह के चारो उपन्यासों ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’, ‘‘पचकौड़ी’’ ‘‘कस्बाई सिमोन’’ और ‘‘शिखण्डी’’ के कथानकों में परस्पर भिन्नता के साथ ही इनमें शैलीगत् भिन्नता भी है। ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ में वे जहां बेड़िया समाज की स्त्रियों के जीवन पर विस्तार से प्रकाश डालती हैं, वहीं पचकौड़ी में बुन्देलखण्ड के सामंतवादी परिवेश में स्त्रीजीवन की दशा का चित्रण करते हुए वर्तमान सामाज, राजनीति एवं पत्रकारिता पर भी गहरा विमर्श करती हैं। ‘‘कस्बाई सिमोन’’ में वे एक अलग ही विषय उठाती हुई ‘‘लिव इन रिलेशन’’ को अपने उपन्यास का आधार बनाती हैं। इस विषय पर यह हिन्दी में पहला उपन्यास माना जाता है। हाल ही में उनका चैथा उपन्यास ‘‘शिखण्डी’’ प्रकाशित हुआ है जो ‘महाभारत’ के एक प्रमुख पात्र शिखण्डी के जीवन पर नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। 
लेखिका शरद सिंह का जन्म मध्यप्रदेश के एक छोटे से जिले पन्ना में 29 नवम्बर 1963 को हुआ था। जब वे साल भर की थीं तभी उनके सिर से उनके पिता श्री रामधारी सिंह का साया उठ गया। उनका तथा उनकी बड़ी बहन वर्षा सिंह का पालन-पोषण उनकी मां विद्यावती सिंह ने किया। शरद सिंह जी के नाना संत श्यामचरण सिंह शिक्षक होने के साथ ही गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। जबकि नानी सुमित्रा देवी "अमोला" गृहणी होने के साथ ही भक्ति रचनाएं लिखती थीं। उदारमना संत श्यामचरण सिंह ने उज्जैन स्थित अपना घर बेच कर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सहायता की। इससे उन्हें समाज में तो सम्मान मिला किन्तु आर्थिक स्थिति डावांडोल हो गई। तब पुत्री विद्यावती सिंह ने नौकरी करने का निर्णय किया और शीघ्र ही वे शिक्षका बन गईं। उन्होंने अपने छोटे भाई कमल सिंह की पढ़ाई का जिम्मा भी अपने ऊपर ले लिया। घर की आर्थिक स्थिति सम्हल गई। किन्तु नियति ने कुछ और ही विधान रच रखा था। विद्यावती सिंह का देवरिया (उत्तर प्रदेश) निवासी रामधारी सिंह से विवाह हुआ। जब वे अपने पिता के घर पर थीं तभी एक दिन अचानक अपने पति रामधारी सिंह की मृत्यु की सूचना मिली। इसके बाद मानो उनका जीवन ही बदल गया। ससुराल पक्ष के मुंहमोड़ लेने के बाद उन्होंने तय किया कि वे किसी भी परिवारजन से एक पैसा भी लिए बिना अपनी दोनों पुत्रियों का लालन-पालन करेंगी। 
शरद सिंह की मां विद्यावती सिंह अपने समय की ख्यातिलब्ध लेखिका एवं कवयित्री रही हैं। वे विद्यावती ‘‘मालविका’’ के नाम से साहित्य सृजन करती रही हैं। ‘‘मध्ययुगीन हिन्दी संत साहित्य पर बौद्ध धर्म का प्रभाव’’ विषय पर लिखे गए शोधात्मक गं्रथ पर विद्यावती जी को जहां आगरा विश्वविद्यालय ने पीएच. डी. की उपाधि प्रदान की वहीं इस ग्रंथ ने उन्हें हिन्दी साहित्य में उल्लेखनीय प्रतिष्ठा दिलाई। यह कहा जा सकता है कि साहित्य सृजन का गुण शरद सिंह को अपनी मां एवं बहन डॉ. वर्षा सिंह से विरासत में मिला। डॉ. वर्षा सिंह हिन्दी गजल के क्षेत्र में प्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। उनके छः गजल संग्रह एवं गजल विधा पर एक शोधात्मक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है।

Dr. (Miss) Sharad Singh

डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह ने अपने जन्म से मई 1988 तक पन्ना मध्यप्रदेश में रहते हुए शिक्षा ग्रहण की तथा उसी दौरान पत्रकारिता भी की। तदोपरांत जून 1988 से वे अपनी माताजी एवं बड़ी बहन के साथ सागर मध्यप्रदेश की विगत लगभग 32 वर्ष से निवासी हो चुकी हैं। यूं तो शरद सिंह ने बाॅयोलाॅजी विषयों के साथ हायर सेंकेंड्री परीक्षा उत्तीर्ण की किन्तु उनका अहिंसा प्रेमी मन एक मेंढ़क का डिसेक्शन करने के बाद ही द्रवित हो उठा और उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए कला संकाय को चुना। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा से मध्यकालीन भारतीय इतिहास विषय में प्रथम एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद डाॅ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में प्रथम श्रेणी एवं विवि मेरिट में प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए अपना द्वितीय एम. ए. किया जिसमें उन्हें विश्वविद्यालय द्वारा स्वर्णपदक प्रदान किया गया। इसके बाद प्रख्यात पुराविद् डाॅ. कृष्णदत्त वाजपेयी एवं डाॅ. विवेकदत्त झा की प्रेरणा से डाॅ. एस.के. वाजपेयी के निदेशन में शोधकार्य पूर्ण कर ‘खजुराहो की मूर्तिकला का सौंदर्यात्मक अध्ययन’ विषय में डाॅ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से ही पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। शिक्षणकार्य के प्रति रूचि के कारण उन्होंने प्रथम श्रेणी में बी.एड. किया तथा स्थानीय इम्मानुएल ब्वायज़ हा.से. स्कूल एवं जैन उ.मा.विद्यालय में क्रमशः तीन-तीन वर्ष अध्यापन कार्य किया। इसके साथ ही अल्पकालिक तौर पर बाल भारती स्कूल, अंकुर विद्यालय एवं आर्य कन्या विद्यालय सागर में भी अध्यापन कार्य किया। 
डाॅ. शरद सिंह ने डाॅ.हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के एवीआरसी विभाग में फिल्म निर्माण सहायक के रूप में काम करते हुए उन्होंने अनेक शैक्षणिक फिल्मों के लिए पटकथालेखन, संपादन सहित फिल्म निर्माण का कार्य किया। किन्तु शीघ्र ही उन्हें अहसास हुआ कि वे एक कर्मचारी के रूप में बंधकर कार्य नहीं कर सकती हैं। तब उन्होंने स्वतंत्र लेखिका के रूप में लेखन कार्य करने एवं समाज सेवा से जुड़ने निर्णय लिया और उन्होंने विश्वविद्यालय की अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद डाॅ. शरद सिंह ने कभी मुड़ कर नौकरियों की ओर नहीं देखा। इस तरह की खुद्दारी विरले लोगो में ही मिलती है। डाॅ. शरद सिंह अपने इस निर्णय के संबंध में बताती हैं कि -‘‘मेरे इस निर्णय ने मुझे अपने और परायों के भेद को अच्छी तरह समझा दिया। अरे लगी-लगाई नौकरी छोड़ दी कहते हुए कुछ लोगों ने मुंह मोड़ लिया लेकिन वहीं कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्होंने मेरे इस निर्णय का स्वागत किया। मेरे इस निर्णय में मेरा हर तरह से साथ दिया मेरी दीदी वर्षा सिंह ने।’’
पारिवारिक साहित्यिक वातावरण में शरद सिंह ने बाल्यावस्था से ही लेखनकार्य शुरू कर दिया था। 24 जुलाई 1977 को शरद सिंह जी की पहली कहानी दैनिक जागरण के रीवा (म.प्र.) संस्करण में प्रकाशित हुई जिसका शीर्षक था ‘भिखारिन’। स्त्री विमर्श संबंधी उनकी पहली प्रकाशित कहानी - ‘काला चांद’ थी जो जबलपुर (म.प्र.) से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र दैनिक नवीन दुनिया, के ‘नारीनिकुंज’ परिशिष्ट में 28 अप्रैल 1983 को प्रकाशित हुई थी। इस परिशिष्ट का संपादन वरिष्ठ साहित्यकार राजकुमार ‘सुमित्र’ किया करते थे। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी प्रथम चर्चित कहानी ‘गीला अंधेरा’ थी। जो मई 1996 में भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘‘वागर्थ’’ में प्रकाशित हुई थी। उस समय ‘वागर्थ’ के संपादक प्रभाकर श्रोत्रिय थे। 
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह

समीक्षक जगत ने शरद के लेखन को विविधता पूर्ण लेखन करार देते हुए रेखांकित किया है। इसी क्रम में स्त्री विमर्श पर उसने विशेष लेखन कार्य किया। जैसे बीड़ी बनाने वाली महिलाओं तथा तेंदूपत्ता संग्रहण करने वाली महिलाओं पर पुस्तक “पत्तों में कैद औरतें” तथा विश्व के विभिन्न देशों की स्त्रियों की स्थिति पर केंद्रित किताब ‘‘औरत तीन तस्वीरें’’। बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों के स्त्री पक्ष को सामने लाने के लिए उन्होंने विशेष अध्ययन के उपरांत “डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श” पुस्तक लिखी। उपन्यास, कहानी संग्रह, नाटक, जीवनियां, आदिवासी जीवन पर केंद्रित पुस्तकें, गजलों, कविताओं सहित विज्ञान पर केंद्रित पुस्तकें तथा इतिहास विशेष रुप से प्राचीन भारतीय इतिहास और खजुराहो पर उसने महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं। अब तक शरद की लगभग 50 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी कहानियों का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है तथा उनके उपन्यासों एवं कहानियों पर देश के अनेक विश्वविद्यालयों में शोधकार्य हुआ है। जहां तक लेखन और प्रकाशन का प्रश्न है तो डाॅ.शरद सिंह के अब तक चार उपन्यास- पिछले पन्ने की औरतें, पचकौड़ी, कस्बाई सिमोन तथा शिखण्डी प्रकाशित हो चुका हैं। उनकी प्रकाशित अन्य पुस्तकों में कहानी संग्रह - ‘बाबा फ़रीद अब नहीं आते’, ‘तीली-तीली आग’, ‘छिपी हुई औरत और अन्य कहानियां’, ‘गिल्ला हनेरा’  (पंजाबी में अनूदित कहानी संग्रह), ‘राख तरे के अंगरा’ (बुन्देली में कहानी संग्रह ), ‘श्रेष्ठ जैन कथाएं’ तथा ‘श्रेष्ठ सिख कथाएं’। स्त्री-विमर्श एवं महिला सशक्तिकरण पुस्तकें-‘पत्तों में क़ैद औरतें’, ‘औरत तीन तस्वीरें’, ‘डाॅ. अम्बेडकर का स्त्रीविमर्श’, ‘आधी दुनिया पूरी धूप’। जीवनी की छः पुस्तकें-‘दीन दयाल उपाध्याय’, ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी’, ‘वल्लभ भाई पटेल’, ‘महात्मा गांधी’, ‘महामना मदनमोहन मालवीय’, ‘अटल बिहारी वाजपेयी’। इतिहास पर पुस्तकें-‘खजुराहो की मूर्तिकला के सौंदर्यात्मक तत्व’, ‘प्राचीन भारत का सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास’। विज्ञान एवं पर्यावरण पर पुस्तकें -‘न्यायालयिक विज्ञान की नई चुनौतियां’, ‘सस्ता एवं सुरक्षित ऊर्जा स्रोत: सौर तापीय ऊर्जा’। नाटक संग्रह-‘आधी दुनिया-पूरी धूप, ‘गदर की चिनगारियां’। धर्म एवं दर्शन संबंधी सह लेखन पुस्तक-‘महामती प्राणनाथ: एक युगान्तकारी व्यक्तित्व’। भारत के आदिवासी जीवन पर पुस्तक-‘भारत के आदिवासी क्षेत्रों की लोककथाएं’। मध्यप्रदेश के आदिवासी जीवन पर दस पुस्तकें- ‘आदिवासियों का संसार’,‘आदिवासी परम्परा’,‘आदिवासी लोक कथाएं, ‘आदिवासी लोक नृत्य-गीत’, ‘आदिवासियों के देवी-देवता’, ‘आदिवासी गहने और वेशभूषा’, ‘कोंदा मारो सींगा मारो’,‘शहीद देभोबाई’,‘मणजी भील और बुद्धिमान वेत्स्या’,‘शहीद उदय किरार’। बुंदेलखण्ड की लोककथाओं पर पुस्तक-‘बुंदेली लोक कथाएं’। नवसाक्षरों के लिए कथा पुस्तकें- ‘बधाई की चिट्ठी’, ‘बधाई दी चिट्ठी’ (पंजाबी में अनुवाद), ‘बेटी-बेटा एक समान’,‘महिलाओं को तीन ज़रूरी सलाह’,‘औरत के कानूनी अधिकार’, ‘मुझे जीने दो, मां!’,’फूल खिलने से पहले’,‘मंा का दूध’, ‘दयाबाई’, ‘जुम्मन मियां की घोड़ी’। तीन काव्य संग्रह -‘आंसू बूंद चुए’(नवगीत संग्रह),‘कर्णप्रिया की आत्मकथा’(खण्डकाव्य), ‘पतझड़ में भीग रही लड़की’(ग़ज़ल संग्रह)। डाॅ. शरद सिंह की कहानियों का पंजाबी, उर्दू, उड़िया, मराठी एवं मलयालम में अनुवाद हो चुका है। साथ ही दो कहानी संग्रह पंजाबी में अनूदित एवं प्रकाशित हो चुके हैं।



डाॅ. शरद सिंह को उनके साहित्य सृजन एवं पत्रिका संपादन के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्रदान किया जा चुके जिनमें कुछ प्रमुख हैं- गृह मंत्रालय, भारत सरकार का ‘गोविन्द वल्लभ पंत पुरस्कार -2000’ ‘न्यायालयिक विज्ञान की नई चुनौतियां’, पुस्तक के लिए, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, म.प्र. शासन का ‘‘पं. बालकृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार’’, म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का ‘‘वागीश्वरी सम्मान’’, श्रेष्ठ संपादन हेतु राज्यस्तरीय ‘‘पं. रामेश्वर गुरू पुरस्कार 2017’’ भोपाल, म.प्र., ‘नई धारा’ सम्मान, पटना, बिहार, ‘विजय वर्मा कथा सम्मान’, मुंबई, ‘पं. रामानन्द तिवारी स्मृति प्रतिष्ठा सम्मान’, इन्दौर म.प्र., ‘जौहरी सम्मान’, भोपाल म.प्र., ‘गुरदी देवी सम्मान’, लखनऊ, उत्तरप्रदेश, ‘अंबिकाप्रसाद ‘दिव्य रजत अलंकरण-2004’, भोपाल, मध्यप्रदेश, ‘श्रीमंत सेठ भगवानदास जैन स्मृति सम्मान’, सागर, म.प्र., ‘कस्तूरी देवी चतुर्वेदी लोकभाषा लेखिका सम्मान -2004’, भोपाल, म.प्र., ‘मंा प्रभादेवी सम्मान’, भोपाल, म.प्र., ‘शक्ति सम्मान 2016’, सागर, म.प्र., ‘एक्सीलेंस अवार्ड फाॅर क्रिएटर्स 2018, सागर टी.वी. न्यूज’ सागर, म.प्र., ‘शिवकुमार श्रीवास्तव सम्मान’, सागर, म.प्र., ‘निर्मल सम्मान’’ सागर, म.प्र., ‘विट्ठलभाई पटेल सम्मान’, सागर म.प्र., क्षत्रिय समाज साहित्य सम्मान, सागर, म.प्र., ‘दादा डालचंद जैन स्मृति प्रतिभा सम्मान’, सागर, म.प्र., ‘सुधा सावित्री तिवारी स्मृति कवयित्री सम्मान’, सागर, म.प्र.  - आदि अनेक राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के सम्मान।
Sagar Sahitya Avam Chintan Dr. Sharad Singh - Dr. Varsha Singh

आज उन्हें देश के प्रतिष्ठित लिटरेचर फेस्टिवल में तथा महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में व्याख्यान हेतु  ससम्मान आमंत्रित किया जाता है। वे अब तक जिन उल्लेखनीय आयोजनों में शामिल हो चुकी हैं उनमें से कुछ प्रमुख हैं - राष्ट्रीय इतिहास संगोष्ठी, ललितपुर 2002 में इतिहासकार के रूप में व्याख्यान, भारत भवन, भोपाल 2005 एवं 2014 में कहानी पाठ, लखनऊ में ‘कथाक्रम’ साहित्यिक समारोह में व्याख्यान, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘स्त्रीविमर्श लेखन‘, 2014 पर व्याख्यान, बेंगलुरु लिट् फेस्ट 2014 में स्त्री लेखन पर व्याख्यान, स्वराज भवन, भोपाल 2014 में कहानी पाठ, विश्व हिन्दी सम्मेलन, भोपाल 2015 में हिन्दी के विकास पर विचार-विमर्श, चंडीगढ़ लिट्रेचर फेस्टिवल 2015 में उपन्यास ‘कस्बाई सिमोन’ का अंशपाठ एवं चर्चा, सिंहस्थ 2016 (उज्जैन) में महिला सशक्तिकरण पर व्याख्यान, अजमेर लिट्रेचर फेस्टिवल 2016 दो सत्रों में स्त्री-लेखन पर चर्चा, विश्व पुस्तकमेला 2017 में कहानीपाठ, स्पंदन संस्था, भोपाल द्वारा ‘स्त्री सर्जनात्मकता: एक यात्रा’, 2018 में कहानी पाठ, मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, भोपाल द्वारा आयोजित पावस व्याख्यानमाला में सतत् तीन वर्ष से व्याख्यान, ‘‘वैश्विक जीवन मूल्य और रामकथा’’ पर अंतर्राष्ट्रीय शोध सेमिनार 2018, शासकीय महाविद्यालय, गढ़ाकोटा में रामकथा की विश्वव्यापकता पर व्याख्यान, भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित ‘‘अतुल्य भारत: संस्कृति और राष्ट्र’’ अंतर्राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी 2018, में व्याख्यान, लखनऊ विश्वविद्यालय, गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, जयपुर विश्वविद्यालय, डाॅ हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय सागर आदि देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान, ‘आजतक’ न्यूजचैनल के इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल ‘‘साहित्य आजतक-2019’’ में साहित्य पर चर्चा-विमर्श, इन्दौर लिटरेचर फेस्टिवल 2020 साहित्य पर चर्चा-विमर्श। इनके सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में उल्लेखनीय सहभागिता।  

डाॅ. शरद सिंह के कथा साहित्य पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य किए जा चुके हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख एवं कहानियों का नियमित प्रकाशन होता रहता है। उनकी रचनाएं रेडियो एवं टेलीविजन से भी नियमित प्रसारित होती रहती हैं। डाॅ शरद सिंह विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्तम्भ लेखन कर चुकी हैं जिनमें प्रमुख हैं-‘नई दुनिया’ समाचारपत्र में स्त्री मुद्दों पर स्तंभ लेखन, ‘नेशनल दुनिया’ (दिल्ली) में महिला संबंधी स्तंभ लेखन, ‘आचरण’ समाचारपत्र में ‘वामा’ स्तंभ लेखन, ‘आचरण’ समाचारपत्र में ‘बतकाव’ व्यंग-स्तंभ लेखन, ‘इंडिया इन साईड’ (लखनऊ) मासिक पत्रिका में ‘वामा’ महिला काॅलम। इन दिनों वे ‘नवभारत’ के संपादकीय पृष्ठ पर स्तम्भ लेखन, ‘सागर दिनकर’ (सागर) दैनिक समाचारपत्र में ‘चर्चा प्लस’ सामयिक विषयों पर काॅलम तथा ‘दैनिक बुंदेली मंच (छतरपुर) दैनिक समाचारपत्र में ‘शून्यकाल’ सामयिक विषयों पर काॅलम लिख रही हैं। वे दिल्ली से प्रकाशित होने वाले साहित्यिक पत्रिका ‘‘सामयिक सरस्वती’’ की कार्यकारी संपादक हैं।
समाज की शोषित एवं पीड़ित महिलाओं के पक्ष में लगातार कार्यरत शरद सिंह नवदुनिया प्रजामण्डल सहित सागर नगर की अनेक सामाजिक संस्थाओं से संबद्ध रहते हुए नगर स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण, जलसेवा आदि समाजसेवा के कार्यों से जुड़ी हुई हैं। डाॅ शरद सिंह का साहित्यसृजन हिन्दी साहित्य जगत के लिए एक अमूल्य निधि है। वे अपनी सफलताओं पर रूकी नहीं हैं अपितु निरन्तर साहित्य साधना में संलग्न हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 21.01.2020) #आचरण #सागर_साहित्य_एवं_चिंतन #वर्षासिंह #मेरा_कॉलम #MyColumn #Varsha_Singh #Sagar_Sahitya_Evam_Chintan #Sagar #Aacharan #Daily


Tuesday, September 24, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 64.... गजल के प्रति प्रतिबद्ध कवि अरुण दुबे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि अरुण दुबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

 सागर : साहित्य एवं चिंतन

     गजल के प्रति प्रतिबद्ध कवि अरुण दुबे
                          - डॉ. वर्षा सिंह
                             
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नाम : अरुण दुबे
जन्म : 20 मार्च 1955
जन्म स्थान : ग्राम ढाना, सागर, मध्य प्रदेश
माता-पिता : स्व. श्रीमती नत्थीबाई, स्व. पं. केशव प्रसाद दुबे
शिक्षा  : एमएससी - प्राणिशास्त्र
लेखन विधा : पद्य
प्रकाशित पुस्तक : ‘‘तुम्हारे लिए’’ ग़ज़ल संग्रह
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            काव्य मन की भावनाओं को मुखर करने का सशक्त माध्यम होता है। प्राचीन ग्रंथों में काव्य को एक कला माना गया है। जिस प्रकार प्रत्येक कला सतत साधना की मांग करती है उसी प्रकार काव्य भी कवि से साधना की अपेक्षा रखता है। जो रचनाकार साहित्य की अपनी मनचाही विधा में सतत् प्रयत्नशील रहते हैं तथा रचनाकर्म में संलग्न रहते हैं, वे श्रेष्ठ रचनाओं की सर्जना करते हैं। सर्जना भाषा को जोड़ने और उसे नया रूप देने का भी कार्य करती है जिसका सुन्दर उदाहरण है हिन्दी अथवा खड़ी बोली में लिखी जाने वाली गजल। यूं तो सागर नगर में अनेक गजलकार हैं किन्तु उनमें गजल के प्रति निष्ठा रखने वाले अथवा दूसरे शब्दों में कहा जाए तो गजल को साधने वाले कम ही हैं। गजल के क्षेत्र में सतत् सृजनशील एक नाम लिया जा सकता है - गजलकार अरुण दुबे का।
             20 मार्च 1955 को ग्राम ढाना, सागर में पं. केशव प्रसाद दुबे एवं श्रीमती नत्थीबाई के पुत्र के रूप में जन्में अरुण दुबे को पठन- पाठन एवं अध्यात्म में रुचि अपने माता-पिता से संस्कारों के रूप में मिली। प्राणिशास्त्र में एम.एससी. करने वाले अरुण दुबे का वर्ष 1976-77 में मध्य प्रदेश पुलिस में उप निरीक्षक के पद पर चयन हो गया। उप निरीक्षक के रूप में गुना, भिंड, मुरैना आदि स्थानों में कार्य करते हुए वर्ष 1988 में निरीक्षक के रूप में पदोन्नत होकर धार, दमोह, बालाघाट, छतरपुर, रीवा, विदिशा, सीधी में तैनात रहे। वर्ष 2008 में उप पुलिस अधीक्षक के पद पर पदोन्नत हो कर 2015 में सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान में वे सिविल लाइन, सागर में निज निवास में रहते हुए काव्य साधना कर रहे हैं। अनेक साहित्यिक गतिविधियों में भी उनकी उल्लेखनीय उपस्थिति रहती है।
            उनका प्रथम ग़ज़ल संग्रह वर्ष 2013 में प्रकाशित हुआ था जिसका नाम है -‘‘तुम्हारे लिए’’। इस गजल संग्रह का विमोचन विख्यात शायर अखलाक सागरी के कर कमलों से हुआ था। उनका  दूसरा ग़ज़ल संग्रह ‘‘चले आइए’’ शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा उन्हें अनेक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका  है।
अरुण दुबे की गजलों में कथ्य और सौंदर्य का मिला-जुला भाव मिलता है। उनकी गजलें गजल की शैलीगत शर्तों को पूरा करती हैं। अच्छी गजल कहने के लिए जो निष्ठा ओर समर्पण विधा के प्रति होना चाहिए वह अरुण दुबे की गजलों को पढ़ कर महसूस किया जा सकता है। वे यथार्थ और कल्पना को अपनी गजलों में संतुलित रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी स्मानी गजलों में भी यह संतुलन देखा जा सकता है। उदाहरण देखें -
हादसों ने खराब कर डाला
मुझको बिगड़ा नवाब कर डाला
जोश सारा खराब कर डाला
रुख पर अपने नकाब कर डाला
नूर जब अपना भर दिया उसने
दीप को आफताब कर डाला
बुत परस्ती नहीं कभी की थी
प्यार ने यह अजाब कर डाला
आज वो शेर कह दिया तुमने
वज्म को लाजवाब कर डाला
हुस्न पर यों  शबाब आया है
छू के पानी शराब कर डाला
ऐ ‘अरुण’ इश्क क्या हुआ तुझको
हाल अपना खराब कर डाला

Arun Dubey

         सलाह यदि उपदेश की जरह दी जाए तो उसमें शुष्कता का भाव रहता है। किन्तु वही सलाह यदि कोमलता से आगाह करते हुए दी जाए तो वह गहराई तक असर करती है और उसमें सरसता भी मौजूद रहती है। जैसे अरुण दुबे ने अपनी इस गजल में खतरों से आगाह करने के लिए कोमलता से काम लिया है -
पत्थरों का शहर है संभल जाइए
दिल न टूटे बचाकर निकल जाइए
रोज लड़ना झगड़ना बुरी बात है
इनको समझाइए के संभल जाइए
आप शम्मा को इल्जाम देते हैं क्यों
प्यार है तो मोहब्बत में जल जाइए
उंगलियां दूसरों पर उठाते हैं क्यों
पहले सच के प्याले में ढल जाइए
दूसरों की निगाहों पे तोहमत न दें
यूं ना हो आप खुद ही फिसल जाइए
सब्र से काम लेना बड़ी बात है
जोश में आकर यूं  न उबल जाइए
ऐ ‘अरुण’ रूठने की अदा छोड़िए
सामने वह है अब तो बहल जाइए

           समाज का एक बड़ा तबका गरीबी और लाचारी से ग्रस्त है। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इस तबके की पीड़ा को अनदेखा नहीं कर सकता है। गरीबी कई बार मनुष्य को इस हद तक विवश कर देती है कि महिलाओं को अपनी देह बेचने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति सुखद तो कदापि नहीं कही जा सकती है। यही भाव अरुण दुबे की इस गजल में बारीकी से उभर कर आया है -
इन गरीबों का कोई ठिकाना नहीं
इनका कोई कहीं आशियाना नहीं
ये तो खुद अपने दुख से परेशान हैं
देखना इनको कोई सताना नहीं
पेट की आग से यह तो चलते ही हैं
इनके झुलसे दिलों को जलाना नहीं
जान तो पहले ही आपको दे दिए
इससे ज्यादा हमें आजमाना नहीं
जिस जगह जिस्म की बोलियां हो रहीं
भूलकर ऐसी बस्ती में जाना नहीं
शाम बर्फीली है रात शर्मीली है
आज घर से निकल दूर जाना नहीं
उसकी खुशबू से खाली हवा चल रही
आज मौसम ‘अरुण’ यह सुहाना नहीं

Sagar Sahitya Avam Chintan- Dr. Varsha Singh

          कहा जाता है कि व्यक्ति ठोकरें खा कर ही सीखता है। जीवन का अनुभव वह पाठशाला है जो सबक देती है उत्तर सुझाती है और परिणाम भी हाथों में रख देती है, जिससे जिन्दगी को जानने- समझने का सलीका आता है। कुछ यही भाव हैं अरुण दुबे की इस गजल में -
जिंदगी को देखने का नजरिया हमको मिला
गर्दिशों की ठोकरों से फलसफा हमको मिला
देर से मिलने का मुझको अब गिला कोई नहीं
शुक्र है यारा कि तुझसा आशना हमको मिला
हार जाता तुम अगर मिलते न मुश्किल दौर में
आपके इस प्यार से ही हौसला हमको मिला
बिक रहा क्या क्या नहीं बस दाम होना चाहिए
पक्ष में था साक्ष्य उल्टा फैसला हमको मिला
फेंक आया आज मैं ईमान रोटी छीन कर
दो दिनों के बाद बेटा खेलता हमको मिला
हो गई है जांच पूरी हो गए नेता बरी
सच जो था कुछ और वो नीचे दबा हमको मिला
ऐ ‘अरुण’ ऐसे खुदा को पा के क्या कर पायेगा
आदमी से दूर जाकर जो खुदा हमको मिला

        इंसान अपने किसी भी दुनियावी रिश्ते को भूल सकता है लेकिन अपनी मां को कभी भूल नहीं पाता है। मां उसके जीवन में वह शख्सियत होती है जो अपनों के लिए पीड़ा सह कर खुश रहना सिखाती है, वह भी शब्दों के माध्यम से नहीं वरन् अपनी जीवन शैली के माध्यम से। मां पर अरुण दुबे की यह गजल देखिए -
कहीं से कुछ भी करके घर के चूल्हे को जलाती है
मगर बच्चों को मां खाना खिला कर ही सुलाती है
हमेशा मुफ़लिसी तकलीफ जिल्लत खुद उठाती है
मगर बच्चों को मां इखलास की चादर बिछाती है
नहीं करता कोई भी त्याग जितना करती है इक मां
लहू छाती का केवल मां ही बच्चों को पिलाती है
बचाती ही नहीं मां अपने बच्चों को बुराई से
बसद तहजीब के रस्ते पे भी चलना सिखाती है
‘अरुण’ मां का बड़ा एहसान है जो अपने बच्चों को
जमीं से आसमां के तख्त पर लाकर बिठाती है

          अरुण दुबे की गजलें इंसानियत के जज्बे से भरी हैं। उनमें जीवन की धूप- छांव भी दिखाई देती है। वे अव्यवस्थाओं पर कटाक्ष करते हैं तो प्रेम और अनुराग की पैरवी भी करते हैं। अरुण दुबे का रचनाकर्म सागर साहित्य जगत के लिए महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।

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( दैनिक, आचरण  दि. 23.09.2019)
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Saturday, September 14, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 63 .... शैलीगत बन्धनों से मुक्त कवि अम्बिका यादव - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि अम्बिका यादव पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

     शैलीगत बन्धनों से मुक्त कवि अम्बिका यादव
                           - डॉ. वर्षा सिंह
                                 
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परिचय      : अम्बिका यादव
जन्म स्थान :  सागर
जन्म         : 1 फरवरी 1950
शिक्षा        : बी.ए.
माता-पिता : श्रीमती बेनी बाई यादव,  श्री भागीरथ यादव
लेखन विधा : पद्य
प्रकाशन।     :    आसमानों से आगे (काव्य संग्रह)
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              कविता को व्याख्यायित करते हुए कवि धूमिल ने बड़ी सुन्दर पंक्तियां लिखी हैं- ‘‘ कविता क्या है/ कोई पहनावा है/ कुर्ता-पाजामा है/ ना भाई ना/ कविता शब्दों की अदालत में मुजरिम के कटघरे में खड़े/ बेकसूर आदमी का हलफनामा है। ’’ अर्थात कविता जब अंतर्मन और बाहरी दुनिया को विश्लेषित कर रसात्मक ढंग से प्रस्तुत करने लगती है तो उसकी सार्थकता के सम्मुख उसका शिल्प गौण हो जाता है। किन्तु कविता के कलेवर को साधना भी अपनेआप में चुनौती भरा एक काम होता है। ऐसी चुनौतियों को स्वीकार करते हुए सागर नगर के अनेक कवियों ने कविताएं लिखी हैं। कुछ अधिक साध पाए हैं तो कुछ कम। किन्तु इससे उनके कवि कर्म के महत्व को कम करके नहीं अांंका जा सकता है।
            सागर नगर में ‘ताओ’ के उपनाम से कविता लिखने वाले कवि अम्बिका यादव काव्य सृजन के रूप में साहित्य सेवा कर रहे हैं। श्री भागीरथ यादव एवं श्रीमती बेनी बाई यादव के पुत्र के रूप में 1 फरवरी 1950 को सागर में जन्में अम्बिका यादव की आरम्भिक शिक्षा सागर में ही हुई। अपनी विद्यालयीन शिक्षा पूरी करने के बाद अम्बिका यादव ने सागर विश्वविद्यालय से बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। तदोपरांत वे कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक में सेवाकार्य करने लगे। शाखा प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त होने के उपरांत वे इंकमीडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन एंड आई टी सागर में अध्यापन कार्य कर रहे हैं।
           अम्बिका यादव शिल्पगत बंधनों से मुक्त हो कर कविता लिखते हैं। उनकी कविताओं में गजल और गीत विधा का पुट देखा जा सकता है। वे अपनी कविताओं में प्रेम, मित्रता और दुनियादारी को अभिव्यक्ति देते हैं। प्रेम पर लिखी उनकी यह कविता देखिए-
जितनी बार पढ़ा उतनी बार नई ।
प्यार की इबारत हर बार नई ।
समंदर को मुट्ठी में भरने की ख्वाहिश
इस कोशिश में हाथ से छूटे मोती कई ।
जितना हम समझ सके वह नाकाफी है
आसमानों के पार हैं आसमान कई ।
दुनिया की कोई भी किताब पढ़ लो ‘ताओ’
प्यार के सिवा कोई बात नहीं नई।

           अम्बिका यादव की कई कविताओं में सुन्दर बिम्ब प्रयुक्त हुए हैं जिनसे उनकी भाव-भूमि को और अधिक सरसता मिली है। उदाहरणार्थ -
काश घनघोर अंधेरा होता।
और साथ तुम्हारा होता ।
रात काली में मिलती तुम
और दूब का कालीन होता ।
तारे भले ताकते रहते
नदी किनारे मिलना होता ।
लोग सारे देखते रहते
नाव में सिर्फ तुम और मैं होता ।
सिर्फ मोहब्बत रह जाती ‘ताओ’
काश दुनिया में और कुछ न होता।

            समसामयिक वातावरण प्रत्येक संवेदनशील मन को झकझोरता है। आतंकवाद, बमविस्फोट आदि के प्रति चिन्ता अम्बिका यादव की कविताओं में भी देखी जा सकती है। दहशतगर्दी पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं-
बम फट रहे हैं पटाखों की तरह ।
आज मेरा, कल तेरा शहर पुर्जा पुर्जा पटाखों की तरह ।
इस बरस गरीबी हटाने का बिल आया है
शायद चुनावी तैयारी है हर बार की तरह ।
दहशतगर्दी का आलम ऐसा दुनिया में
अच्छा था नासमझ रहते हम बंदरों की तरह।
तरक्की का दौर, दानिश मंदी का दौर
अणु परमाणु बम जुटती दुनिया भस्मासुर की तरह।
दुनिया सिकुड़ कर मुट्ठी भर रह गई ‘ताओ’
इंसानियत फिसल रही उससे रेत की तरह।

            दूषित राजनीति का प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव को परिवर्तित कर देता है। पुराने मित्र मित्रता का अर्थ भुला देते हैं और वे एक कुशल व्यवसायी की तरह मित्रता में भी नफा-नुक्सान देखने लगते हैं तब इसी तरह की कविता बनती है जैसी कि कवि अम्बिका यादव ने यह कविता लिखी है -
वो सोचते हैं अब सियासतदारों की तरह ।
दोस्त नहीं रहे अब पुराने यारों की तरह ।
या तो हमें कुछ चाहिए  या उन्हें चाहिए हमसे
दोस्त हैं अब दुकानदारों की तरह ।
दावत में उसने उनको पास बैठाया है
वजन है तोहफों का जिसके हाथियों की तरह ।
प्यारी बातें तो है उनकी बच्चों की तरह
काश पढ़ लिख कर हम रहते उनकी तरह ।
‘ताओ’ नासमझ ही रहते हम परिंदों की तरह
काश समझदार न होते इंसानों की तरह।

             अम्बिका यादव का एक काव्य संग्रह ‘‘आसमानों से आगे’’ प्रकाशित हो चुका है। अपनी पुस्तक एवं अपनी रचनाओं के बारे में वे कहते हैं कि ‘‘बहरहाल मेरी कविताओं की यह कोशिश आपको जरूर पसंद आएगी इसी विश्वास के साथ यह पुस्तक जिसे आप गजल, गीत, कविता की तरह स्वीकार कर सकते हैं एवं इसका आनंद ले सकते हैं।’’ वे अपनी पुस्तक ‘‘आसमानों से आगे’’ की भूमिका में लिखते हैं कि ‘‘कविता अभिव्यक्ति है मन की फिर लिखने का मन सो लिखी गई यह किताब कुछ-कुछ गजल नुमा कुछ कविता और फिर जमाने की सच्चाई कहने की कोशिश है कुछ हम लोगों को पसंद थी हमारी बातें सो जस की तस उनको लिखा है।’’
 
कवि अम्बिका यादव

             शैलीगत बंधनों से मुक्त हो कर खूबसूरत ढंग से कविता कही जा सकती है। यदि कवि के हृदय में सौहार्द का आग्रह है और प्रेम की भावनाएं हैं तो वह मानता है कि जाति, धर्म कोई बाधा नहीं बन सकती है। यही भावना कवि यादव की इस कविता में निहित है-
दिल मिले न मिले आंख तो मिलाइए
फिर मिले न मिले पता तो बताइए
मील के पत्थर की तरह खड़ा हूं राह में
रुके न रुके एक नजर तो डालिए
वह गुलाबी फूल तुम्हें ताक रहा है
भर देगा खुशबू से प्यारी सी नजर तो डालिए
कब तलक बैठे रहोगे सहमें किनारे पे
एक बार प्यार के समंदर में कूद तो जाइए
आदमी में बहुत बुरा सही ‘ताओ’
दुआ सलाम, राम- राम के रिश्ते तो निभाइए

Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh 

           ‘‘ताओ’’ के उपनाम से कविताएं लिखने वाले अम्बिका यादव की ‘रोटी और हुस्न की गजल’ पर लिखी गई ये पंक्तियां भी काबिले गौर हैं-
रोटी और हुस्न की गजल आज भी नई ।
अंदाज ए बयां बदल गए वो बेवफा फिर भी नई ।
कोई क्या कहेगा, क्या नया लिखेगा
दास्तानें वही, सिर्फ उंगलियां नई ।
फूल खिलने बिखरने का सिलसिला जारी है ‘ताओ’
बगीचे वही, सुगंध वही, सिर्फ ये पौध नई।

             जीवन को अनिश्चितताओं से घिरा हुआ माना जाता है। वर्तमान समय में भौतिकतावाद इतना अधिक बढ़ गया है कि व्यक्ति आत्मिक सुख को भूल कर भौतिक सुखसुविधाओं के लिए बाजार की चकाचौंध में डूबा रहता है। ऐसे वातावरण में यदि जीवन की अनिश्चितता और बढ़ जाए तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। अम्बिका यादव अपनी रचना में इसी अनिश्चितता को रेखांकित करते दिखाई पड़तें है-
जिंदगी का सफर कहां ले जाएगा पता नहीं चलता।
साथ दोस्त चल रहा है या दुश्मन पता नहीं चलता ।
अब तो दोनों आंखें भी अलग-अलग सपने देखने लगी
हमसफर साथ तो है, दिल कहां उसका पता नहीं चलता ।
मायूस को हमदर्दी हौसले के दो जुमले
उसे दे देंगे जिंदगी नई पता नहीं चलता ।
यूं तो जमाने में अपने बहुत है दोस्त ‘ताओ’
बुरे वक्त के बिना कुछ पता नहीं चलता।

          उल्लेखनीय है कि भावों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति के साथ ही अम्बिका यादव कार्टूनों के माध्यम से भी अपने भावों को व्यक्त करते हैं। विभिन्न समाचार पत्रों में उनके कार्टूनों का प्रकाशन हो चुका है। अभिव्यक्ति की विविधता को अपनाने वाले कवि अम्बिका यादव सागर साहित्य जगत में देखे जा सकते हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 14.09.2019)
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Tuesday, September 3, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 62... साहित्य के मौन साधक डाॅ. अरविंद गोस्वामी - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार डॉ. अरविंद गोस्वामी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

         साहित्य के मौन साधक डाॅ. अरविंद गोस्वामी
                     - डाॅ. वर्षा सिंह
                 
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परिचय - डॉ अरविंद गोस्वामी
जन्म -  11 मार्च 1953
जन्म स्थल - खुर्जा, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश
माता - स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा देवी गोस्वामी
पिता - गोस्वामी मुकुंदाचार्य
शिक्षा - एमबीबीएस डीसीएच शिशु रोग विशेषज्ञ
प्रकाशन - विभिन्न समाचारपत्रों में
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         सागर नगर में साहित्य सेवा की भावना विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों में समान रूप से देखी जा सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि अध्यापन से जुड़ा व्यक्ति ही साहित्य के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखता हो। यहां चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कई मनीषी ऐसे हैं जो अपना चिकित्सकीय कार्य करते हुए समाज की सेवा के साथ ही साहित्य की सेवा भी कर रहे हैं। उन्हीं में से एक नाम है डाॅ अरविंद गोस्वामी का। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के खुर्जा में जन्मे। इसके बाद बाल्यावस्था से ही वे सागर में ही निवासरत हैं। उन्होंने प्राथमिक शाला मोरारजी एवं चिंतामनराव मॉडल बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सागर से स्कूली शिक्षा प्राप्त किया। तदोपरांत उन्होंने हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने मेडिकल कॉलेज भोपाल एवं जबलपुर से एम.बी.बी.एस तथा शिशु रोग विशेषज्ञ की उपाधि प्राप्त की।
             शासकीय चिकित्सालयों में निष्ठावान डॉक्टर के रूप में अपनी सेवाएं विभिन्न स्थानों में देने के पश्चात् उनका शासकीय सेवा का अंतिम पड़ाव जिला चिकित्सालय सागर रहा, यहीं से मार्च 2018 को शिशु रोग विशेषज्ञ के पद से सेवानिवृत्त हुए । डॉ. अरविंद गोस्वामी ने अकादमिक अध्ययन के साथ हिंदी, अंग्रेजी एवं संस्कृत साहित्य का अध्ययन बचपन से ही किया। उनके मन में अगली कतार एवं शीर्ष पर होने की जिद, भीड़ से अलग दिखने की ललक रही। वे एक सफल शिशु रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत रहे। खेलों में रुचि रखने वाले डॉ. गोस्वामी की शतरंज में गहन अभिरुचि है। क्रीडा क्षेत्र में शतरंज के अलावा टेबल टेनिस, हॉकी, फुटबॉल में भी अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई है ।
डॉ. अरविंद गोस्वामी

         साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में विभिन्न समाचार पत्रों में स्वास्थ्य संबंधी एवं सामाजिक सरोकार वाले लेखों का प्रकाशन हुआ है तथा आकाशवाणी से वार्ताएं प्रसारित होती रही है। साहित्यिक गोष्ठियों में भी उनकी महत्वपूर्ण उपस्थिति रहती है।
             डॉ. गोस्वामी  का मानना है कि ‘‘साहित्य क्षेत्र में व्यक्ति विशेष की उम्र का आकलन उसके पठन-पाठन एवं लेखन से ही तय करना चाहिए। मात्र वयोवृद्ध होना ही सम्मान का पात्र नहीं होना चाहिए।’’ वे कहते हैं कि ‘‘जिंदगी के हर पल को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । मेरी काव्य सर्जना में यथार्थ का कटु सत्य अहम् होता है यथा- हर वर्ष आता है बसंत, अब तो बस अंत आया है या कितना अजीब होता है कि लोग स्वस्थ रहने के लिए योगासन लगाते हैं मनुष्य होते हुए भी पशु पक्षियों के मुद्राएं अपनाते हैं आदमी ने आदमी के सदृश्य नहीं सीखा है चलना धरा पर ।’’
            डाॅ. अरविंद गोस्वामी की कविताओं में कथ्य की कोमलता और अभिव्यक्ति की आत्मीयता है। वे अपनी भावाभिव्यक्ति को लयात्मक ढंग से शब्दों में उतारते हैं। मसलन, सरल शब्दों में सहज अभिव्यक्ति उनके काव्य की विशेषता है। उदाहरण के लिए ये पंक्तियों देखें-
मुझको खफा न कीजिए पछताइएगा आप ।
मैं वो नहीं कि जिस को मना पाइएगा आप ।
यह दिल है इसको तोड़कर पछतायेगा आप ।
आईना देखने को तरस जाइएगा आप ।
हैं आप अभी गुम किसी रंगीं खयाल में
आऊंगा याद होश में जब आइएगा आप ।
पहले की तरह मुझको पड़ा रहने दीजिए
उठ जाऊंगा तो साफ नजर आइएगा आप।

          श्रृंगार रस जीवन में अहम् स्थान रखता है, यह श्रृंगारिक भावना चाहे इंसान के प्रति हो अथवा ईश्वर के प्रति। श्रृंगार में संयोग भी होता है और वियोग भी। कभी-कभी बेरुखी की स्थिति भी आ जाती है जिसे अपनी इन पंक्तियों में डाॅ. गोस्वामी ने बड़ी सुंदरता से व्यक्त किया है-
मिलते हैं आप मुझसे मगर बेरुखी के साथ ।
यह हादसा है खूब मेरी जिंदगी के साथ।
गम आपके दिए हुए ताजा हैं इसलिए
हमने गले लगा लिया उनको खुशी के साथ ।
नजरें चुरा के मिलते हो क्यों मुझसे इस तरह
क्या दिल लगा लिया है किसी अजनबी के साथ ।
दी हमको काटने को उल्फत की ये सजा
मिलते भी हो अगर तो बड़ी बेरुखी के साथ।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

         ऐसा नहीं है कि डाॅ. गोस्वामी के काव्य में मात्र श्रृंगार रस ही हो, उनकी अनेक रचनाओं में दर्शन की भावना भी प्रबल रूप से दिखाई देती है। एक उदाहरण देखें -
मेरे जीवन की पुस्तक का इक अध्याय बाकी है
अभी तक  हाशिए पर था  अध्यवसाय बाकी है
यहां सब लोग देते हैं दुआएं स्वस्थ जीवन की
मगर मैं जानता हूं कि प्रकृति का न्याय बाकी है

           डाॅ. गोस्वामी के मित्र कवि कपिल बैसाखिया कहते हैं कि -‘‘डाॅ. गोस्वामी जितने अच्छे कवि हैं उतने ही अच्छे इंसान भी। अपने मित्रों के बीच लोकप्रिय होने के साथ ही सदा सभी के सहयोगी रहते हैं।’’ जीवन को उद्देश्य एवं आकार देने वाले व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता का भाव होना, व्यक्ति के भीतर उपस्थित सदाशयता का परिचायक होता है। डाॅ. अरविंद गोस्वामी ने भी अपने मुक्तक में अपने माता-पिता, अपने गुरुवृंद एवं मित्रों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है-
प्रथम आभार उनका है जो मुझको जग में लाए हैं
तत्पश्चात गुरुवर है जो पथ मुझको दिखलाए हैं
मेरे मित्रों की तो कुछ बात है अद्भुत और अव्यक्त
बन कर लहू के कण मेरी रग-रग में समाए हैं

          डॉक्टर गोस्वामी ठीक सफर चिकित्सक, शिशु रोग विशेषज्ञ होने के साथ ही कवि भी है और वे अपनी इस सफल जीवन यात्रा का रहस्य अपनी स्वयं के जीवनानुभव के आधार पर बताते हुए इन पंक्तियों में कहते हैं कि -
 निष्कर्ष अनुभव का बतला रहा हूं मैं
मिलती लगन से जीत जतला रहा हूं मैं
महत्ता मेहनत की समझी जो मैंने अपने बचपन से
इसलिए गीत सफलता का अब तक गा रहा हूं मैं

        अपनी परिवार के प्रति कवि के मन में अगाध स्नेह और अपनत्व की भावना है। वे अपनी जीवन संगिनी और पुत्र-पुत्री तथा पुत्र वधू के प्रति इन पंक्तियों में अपने हृदय के उद्गार व्यक्त करते हैं -
मेरी परिवार का आधार है मेरी जीवन संगिनी
हर खुशियों का भंडार है मेरी जीवन संगिनी
पूनम की ज्योत्सना मानिंद छाई है जो जीवन में
हमारे गौरव का विस्तार है मेरी जीवन संगिनी
बहू अंकिता बिल्कुल बिटिया समान है
बेटा निमेष मेरा सारा जहान है
नजर न लग जाए इनको यही ईश्वर से बिनती है
नेहा जो बिटिया है अपने कुल की शान है

         डॉ. गोस्वामी जीवन के यथार्थ को अपनी कविता में जिस गहराई से प्रस्तुत करते हैं, वे अपनी कोमल मनोभावनाओं को भी उतनी ही गहराई से प्रकट करने में सक्षम है। उनकी यह कविता देखें-
मुद्दत हुई जैसे किसी को देखे हुए
एक तपते से रेगिस्तान के मानिंद
लंबी सी उदासी का आलम
न जाने क्यों दिल तड़पता है
एक अनजान के लिए
समय उड़ता है पंख लगा कर/पर स्मृतियां
लगता है जैसे किसी जोंक की तरह
चिपट गई है मेरे जेहन से में

       अपनी अतुकांत कविताओं में भी डाॅ. गोस्वामी उतने ही सहज नज़र आते हैं जितनी कि अपनी तुकांत रचनाओं में। उनकी इस प्रकार की कविताओं में एक अलग गंभीरता की अनुभूति होती है। जैसे यह कविता-
तुम्हारा खत मिला
धारणा ना टूटी लंबे अंतराल बाद
कि निर्जीव शब्द भी बोलते हैं
विगत से जुड़ी ग्रंथियां खोलते हैं
किंचित शब्दों में उभरता व्यतीत आह्लाद
और लहराता तुम्हारा प्यार
सच उमड़ पड़ता है/शब्दों से जुड़ी तुम
अतीव तृप्ति दे जाती हो
एक बात कहूं तुम खत न लिखा करो
क्योंकि यह सिखा देगा
तुम्हारे बिना रहना और सहना
अनगिनत त्रासों को।

      डाॅ. अरविंद गोस्वामी मंच और प्रकाशन की ललक से दूर रहते हुए एक मौन साधक की भांति सतत साहित्य साधना से आज भी सागर के साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 29.08.2019)
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Monday, September 2, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 61... साहित्यकार रघु ठाकुर: साहित्य सृजन जिनके लिए है संवेदनाओं से साक्षात्कार - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार रघु ठाकुर पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

साहित्यकार रघु ठाकुर: साहित्य सृजन जिनके लिए है संवेदनाओं से साक्षात्कार
                         - डाॅ. वर्षा सिंह
                                     
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परिचय:- रघु ठाकुर
जन्म:-  10 जून 1946
जन्म स्थान:- सागर
माता-पिता:- स्व श्रीमती तुलसी बाई एवं स्व. भवानी सिंह
शिक्षा:- स्नातकोत्तर (राजनीति विज्ञान), विधि स्नातक
लेखन विधा:- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन:- विभिन्न विधाओं में नौ पुस्तकें प्रकाशित
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             सागर नगर में ही नहीं वरन् देश में गांधीवादी-समाजवादी चिंतक के रूप में ख्याति प्राप्त समाजसेवी एवं राजनीतिज्ञ रघु ठाकुर एक अच्छे साहित्यकार भी हैं। जनहित के हर मोर्चे पर खड़े दिखाई देने वाले रघु ठाकुर ने साहित्य सृजन का मार्ग क्यों चुना इस संबंध में वे स्वयं कहते हैं कि -‘‘साहित्य सृजन मेरे लिये अपनी सम्वेदनाओं से साक्षात्कार है। इसके माध्यम से मैं खुद को मांजता हूं तथा पाठकों के माध्यम से आमजन से संवाद करने का प्रयास करता हूं। मुझे साहित्य शौक नहीं बल्कि परिवर्तन के लिए काम का ही एक हिस्सा है तथा बौद्धिक जगत से जुड़कर आत्मचिंतन व अपनी कमियों को दूर करने का माध्यम है। साहित्य स्वतः से सवाल करने का भी मेरा माध्यम है जो आमतौर पर दूसरे मित्र या नहीं करते या नहीं कर पाते। मानवीय संवेदनाओं व पीड़ा को व्यापकता देना भी एक उद्देश्य है।’’
            10 जून 1946 को माता श्रीमती तुलसी बाई एवं पिता भवानी सिंह के पुत्र के रूप में सागर में जन्में रघु ठाकुर बाल्यावस्था से ही चिंतनशील रहे। पीड़ित मानवता के प्रति संवेदनाएं उन्हें समाजसेवा के लिए प्रेरित करती रहीं। आरम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत शैक्षिक सीढ़ियां चढ़ते हुए उच्चशिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद विधि में स्नातक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने महात्मा गांधी के राजनीतिक एवं दार्शनिक विचारों का गहन अध्ययन किया। उनके मन पर महात्मा गांधी की समाजवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने राममनोहर लोहिया के विचारों को अपने मनोनुकूल पाया और उसे अपने जीवन में आत्मसात कर लिया। भारत में समाजवाद को ले कर हमेशा एक अस्पष्टता सी रही है। रघु ठाकुर इस अस्पष्टता को दूर कर के देश में एक समतामूलक समाज की संरचना करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। अपने अध्ययन काल से आज तक वे दलित, दमित एवं वंचितों के पक्ष में आवाज़ उठाते रहे हैं।
रघु ठाकुर ने डाॅ. लोहिया द्वारा प्रकाशित ‘जन’ तथा ‘मैनकाइंड’’ में लेखनकार्य किया। उन्होंने जार्ज फर्नान्डीज़ द्वारा प्रकाशित ‘प्रतिपक्ष’ तथा ‘दी अदर साईड’ में संपादन कार्य भी किया। वे सुल्तानपुर , उत्तरप्रदेश से प्रकाशित ‘‘लोकतांत्रिक समाजवाद’’ मासिक के संस्थापक सदस्य रहे तथा भोपाल, मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले ‘‘दुखियावाणी’’ का संपादनकार्य सम्हाल रहे हैं। वैसे वर्तमान में वे दक्षेस महासंघ के अध्यक्ष एवं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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                  साहित्य के क्षेत्र में समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर का महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी अब तक लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये पुस्तकें हैं- ‘‘रोजगार का अधिकार एवं गांधीवादी अर्थ व्यवस्थ‘‘, ‘‘आर्थिक उदारीकरण और भारत‘‘, ‘‘दक्षेस महासंघ एक परिकल्पना, विज्ञान और समाजवाद‘‘, ‘‘आरक्षण‘‘, ‘‘विकल्प की खोज‘‘, ’’विचारार्थ’’, ‘‘विमर्श’’, ’’मैं अभिमन्यु हूं’’, ’’मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’ तथा ’’स्याह उजाले’’।
              इन पुस्तकों में ‘‘मैं अभिमन्यु हूं’’, ‘‘मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’ तथा ‘‘स्याह उजाले’’ काव्य संग्रह हैं।
              स्पष्टवादी अभिव्यक्ति के लिए ख्यातिनाम रघु ठाकुर अपने साहित्य सृजन के साथ ही साहित्य जगत की अंतर्कथा पर कटाक्ष करने से भी नहीं चुके हैं। अपने काव्य संग्रह ‘‘मैं अभिमन्यु हूं’’ के आत्मकथन में ‘‘अपनमुखी-जो कहना भी जरूरी है’’ शीर्षक से लिखते हुए कहते हैं कि- ‘‘मेरी कविताएं लय या तुक में बंधी हुई नहीं हैं, बस ये तो कुछ अचानक मन में उपजे विचार हैं। कभी -कभी इनमें कुछ स्पष्टबयानी भी है या एक प्रकार की बेबाक गवाही भी। मैं जानता हूं कि ये कविताएं न तो कविसम्मेलनों के मंचों के लिए उपयुक्त हैं, क्योंकि इनमें न लय है न तरन्नुम, न झूठ है न नकलीपन, न हास्य है न विनोद। और ये कविताएं साहित्यकारों की बौद्धिक संगोष्ठियों की वाह-वाही की पात्र भी नहीं होंगीं क्योंकि मेरा कोई वास्ता देश की लेखक-साहित्यिक गिरोहबंदी से नहीं है, बल्कि मुझे ऐसा लगता है कि अपवाद छोड़ दें तो आमतौर पर देश व दुनिया में साहित्य के पुरस्कार वर्गीय, खेमाबंदी की गिरोहनिष्ठा के पुरस्कार हैं। ’’ इसी संग्रह की प्रथम कविता ‘‘21वीं सदी के लोहियावादियो’’ में कवि रघु ठाकुर की स्पष्टबयानी को देखा जा सकता है-
21वीं सदी के लोहियावादियों !
तुम्हारा लोहियावाद अब कुछ आधुनिक सा
हो गया है।
अपने अंतर्मन से पूछो
शायद लोहिया तुम्हें पुरातन सा हो गया है।
कहते थे लोहिया-
समता और सम्पन्नता है समाजवाद
पर अब नया जमाना है
अब तो सम्पन्नता ही है समाजवाद।

साहित्यकार रघु ठाकुर

            दूसरे काव्य संग्रह ‘‘मर रहा है किसान, फिर भी भारत महान’’ का प्रथम संस्करण सन् 2012 में प्रकाशित हुआ था। यह संग्रह इतना लोकप्रिय हुआ कि सारी प्रतियां साल भर में ही बिक गईं और अगले साल यानी सन् 2013 में ही प्रकाशक को इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा। स्पेनिश कवि लोर्का को समर्पित इस काव्य संग्रह की भूमिका लिखते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार रमेश दवे ने लिखा कि -‘‘ये कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है, भाई रघु ठाकुर जैसे निर्भीक एवं प्रखर वक्ता के पास कविता स्वयं आई हो और उसने मनुष्य की तरह, समाज की तरह, पीड़ितों की तरह खड़े हो कर कहा हो कि मुझे लिखो, मैं भी आज पाखंड, क्षोभ, जड़ता, अहंकार, साम्प्रदायिकता जैसे तरह-तरह के वैचारिक अभावों से ग्रस्त हूं। कविता का समाज मिट रहा है। इसीलिए रघु भाई ने कविता की आवाज़ सुन कर ये कविताएं रच दीं- अपने संवेदनशील मन की घबराहट को बाहर लाने के लिए।’’ रमेश दवे आगे लिखते हैं कि ‘‘इन कविताओं में कोई यथार्थवाद, कलावाद, प्रकृतिवाद न खोजा जाए और न शिल्प की कसौटियों पर इन्हें कसा जाए। ये वक्तव्य की कविताएं हैं, इसलिए इनकी वाग्मिता में सत्य और ईमान को देखा जाए।’’
‘‘मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’  काव्य संग्रह में एक कविता है ‘‘चाहिए है बस एक संडास’’। इस कविता का एक अंश देखिए-
सारा दिन घूम-घूम कर बेचते हैं खिलौने
नन्हा-सा बच्चा गोद में, कभी आदमी के कभी औरत के
एक अदद चादर, फटी-सी दरी और रजाई
कुल जमा यही हैं उनके बिछौने
दिन तो काट लिया,
पर रात कहां बिताएं, कहां सोने जाएं ?

             इसी संग्रह में एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘‘घर की तलाश’’। इस कविता में समाज में सिकुड़ती असंवेदनशीलता और परस्पर दूरियांे का बड़ी बारीकी से चित्रण किया गया हैं। कविता का एक अंश देखें-
मुझे है एक घर की तलाश
जो तालाब का पड़ोसी हो
बस अड्डा हो या रेलवे स्टेशन
स्कूल व कालेज हो और मैदान भी हो पास
पर अब कैसे मिलेगा ऐसा घर ?
शहर तो फैल गया है
हो गया है मीलों का सफ़र।
मुझे चाहिए ऐसा घर
जहां पीने को साफ पानी हो
जहां हत्यारा धुंआ न हो और हवा साफ हो
वायुमंडल रहे धुंए से बेअसर।

             सन् 2019 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘‘स्याह उजाले’’ में समाज में व्याप्त विसंगतियों पर तीखा प्रहार करते हुए ‘‘सभ्य समाज के नवाचार’’ शीर्षक कविता में रघु ठाकुर लिखते हैं-
डाॅगी को दैनिक क्रिया के लिए
साहब ले जाते हैं
पर बाबा को पोटी कराने को/ नौकर लगाते हैं
डाॅगी की गर्मी की बात अलग है
डाॅगी को वातानुकूलित कमरे में रहने की आदत है
जब मजदूर तपती दोपहर में
पत्थर तोड़ते हैं
मिट्टी खोदते और गिट्टी फोड़ते हैं
तब डाॅगी ड्राइंगरूम में अलसाते हैं

              वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक परिदृश्य का आंकलन एवं चिंतन करते हुए अपने जिन विचारों को रघु ठाकुर ने लेखबद्ध किया है वे लेख ‘‘विमर्श’’ नामक पुस्तक में संग्रहीत हैं। इन लेखों में ‘‘ऊर्जा तो बहाना है, अमेरिका के साथ जाना है’’, ‘‘प्रजातांत्रिक पूंजीवाद बनाम साम्यवादी पूंजीवाद’’, ‘‘जरूरत है पांचाली जैसी तेजस्विता की’’, ‘‘भस्मासुर बनाओगे तो खुद कहां बच पाओगे’’, ‘‘वैचारिक अतिवाद के महल’’, ‘‘औद्योगिक आतंकवाद’’, ‘‘ गांधी राष्ट्रपिता क्यों है, गांधी तो विश्वपिता हैं’’, ‘‘कविता-लोक से बाजार तक’’, नक्सलवाद- प्रचार और तथ्य’’ जैसे लेख वर्तमान समाज में व्याप्त वैचारिक संकीर्णता को बेनकाब करते हुए वह आक्रोश व्यक्त करते हैं जिसके केन्द्र में सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान है। इस पुस्तक में स्त्री विमर्श की एक कविता भी मौजूद है जो कवि रघु ठाकुर ने विंध्याचल एक्सप्रेस की सामान्य बोगी में यात्रा करने वाली तेंदू पत्ते वालियों की पीड़ा के रूप में व्यक्त किया है कविता का शीर्षक है ‘‘ तेंदू पत्ते वालियों का दर्द’’। इसका ये अंश देखिए -
तेंदू के पत्ते घने जंगलों से तोड़ कर
सैकड़ों किलोमीटर दूर वनों में घूम कर
ये गरीब तेंदू पत्ते वालियां देर रात्रि घर पहुंचेंगी
तब जा कर इनके घरों की अंगीठियां सुलगेंगी
इनकी यात्रा दुर्दांत कथानक है
इंसान की यह जिन्दगी नरक से भी भयानक है
भोर में तीन बजे जाग कर
दुधपीते बच्चों को सोता छोड़ कर
हाथ में एक थैला, साथ में चादर मैंला
निकलती हैं ये अपनी संघर्ष-यात्रा पर

          बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रघु ठाकुर जो कि देश में समतामूलक समाज संरचना हेतु समर्पित हैं, प्रकृति से एक कवि एवं साहित्यकार हैं, इसीलिए उनके साहित्य में समाज और संवेदनाओं का घनीभूत सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः साहित्य सृजन रघु ठाकुर के लिए संवेदनाओं से साक्षात्कार है और वे यही साक्षात्कार अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाने के लिए सतत् सृजनरत रहते हैं ।
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( दैनिक, आचरण  दि. 23.08.2019)
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Tuesday, July 30, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 60 .... सहज अभिव्यक्ति के उल्लेखनीय कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार लोकनाथ मिश्र "मीत" पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

सहज अभिव्यक्ति के उल्लेखनीय कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’
                          - डॉ. वर्षा सिंह
                                                                   
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परिचय :- लोकनाथ मिश्र ‘मीत’
जन्म :-  03 दिसम्बर 1949
जन्म स्थान :- सागर, मध्यप्रदेश
माता-पिता :- श्रीमती भागवती मिश्र एवं स्व. बाबूलाल मिश्र
शिक्षा :- एम.ए. (गणित), बी.एड., संगीत प्रभाकर
लेखन विधा :- पद्य
प्रकाशन :- दो काव्य संग्रह प्रकाशित
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                बहुमुखी प्रतिभाएं अपने नगर का गौरव होती हैं। सागर नगर में भी बहुमुखी प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। एक ऐसे ही प्रतिभाशाली कवि जो नृत्य, संगीत, नाट्य जैसी साहित्यिक विधाओं के साथ ही जादू की कला में भी निपुण हैं, उनका नाम है लोकनाथ मिश्र। ये ‘मीत’ के उपनाम से कविताएं लिखते हैं। सागर नगर के मोहन नगर वार्ड में श्री बाबूलाल मिश्र एवं श्रीमती भागवती मिश्र की संतान के रूप में 03 दिसम्बर 1949 को लोकनाथ मिश्र का जन्म हुआ। माता-पिता की संगीत और साहित्य में गहन अभिरुचि थी। यह अभिरुचि लोकनाथ मिश्र में भी बाल्यावस्था से ही पुष्पित-पल्लवित होने लगी। पिताश्री धर्म-प्रवचन करते थे अतः धार्मिक ग्रंथों के प्रति लोकनाथ मिश्र की आरम्भ से ही जिज्ञासा रही। वे रुचि ले कर धार्मिक प्रसंगों को सुनते तथा उन पर चिंतन करते।
              लोकनाथ मिश्र अपनी प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में बताते हैं कि -‘‘जब प्राथमिक शाला चमेली चौक, सागर में प्रारम्भिक शिक्षा हेतु दाखिला हुआ तो कक्षा पहली में मेरे प्रथम गुरु पं. गौरी शंकर पंडा ने स्लेट पर ‘ग’ गणेश का लिखवा कर मेरी शिक्षा की नींव डाली।’’ वे अपने प्रथम गुरु की विशेषताओं के बारे में गर्व से चर्चा करते हुए कहते हैं कि -‘‘मेरे प्रथम गुरु पं. गौरी शंकर पंडा शहर के प्रसिद्ध कवि थे। जिन्होंने ‘‘शिव-शतक’’ नामक पुस्तक में शिव वंदना के सौ कवित्त बड़े ही अलंकारिक भाषा में लिखे। इस प्रकार मेरी प्राथमिक शिक्षा का सूत्रपात एक महान कवि गुरु के द्वारा हुआ। इसी परिणामस्वरूप आठवीं कक्षा में मैंने अपनी प्रथम कविता का सृजन किया।’’
                बचपन में मिले साहित्य संस्कार के प्रभाव से लोकनाथ मिश्र सोलह-सत्रह वर्ष की आयु में कविताएं लिखने लगे जो समाचारपत्रों में प्रकाशित होने लगीं। सन् 1970 में कवि सम्मेलनों में जाना आरम्भ किया और शीघ्र ही लोकप्रियता भी मिलने लगी। इसके बाद उनकी भेंट सागर नगर के विद्वान समीक्षक एवं साहित्यकार डॉ. संतोष कुमार तिवारी से हुई। डॉ. तिवारी ने लोकनाथ मिश्र को अपनी कविताएं संकलित कर संग्रह के रूप में प्रकाशित कराने की प्रेरणा दी। इस प्रेरणा के परिणामस्वरूप सन् 1999 में उनका प्रथम कविता संग्रह ‘‘सभ्यता का फ़र्क़’’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद साहित्यसृजन में उत्साहजनक गति आई और सन् 2005 में दूसरा संग्रह ‘अक्षर देवता’’ प्रकाशित हुआ। इस बीच धर्म मीमांसा की अपनी अभिरुचि के अनुरुप भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित शोधात्मक पुस्तक ‘‘मानस के सात भक्त’’ लिखी। इस पुस्तक के लेखन की प्रेरणा के संबंध में लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ बताते हैं कि जब वे वृंदावन के प्रवास पर थे, तब उन दिनों अचानक उन्हें इस विषय पर शोधात्मक पुस्तक लिखने का विचार आया।
           लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ ने एकांकी लेखन भी किया है। वे अपनी एकांकियों के लेखन एवं मंचन के संबंध में बताते हैं कि -‘‘मेरे द्वारा रचित अनेक एकांकियों में ‘अनोखा चुनाव’ एकांकी बहुचर्चित रही। जिसका मंचन 07 दिसम्बर 1980 को सागर के एक छविगृह पारस टॉकीज़ में टिकट शो से हुआ। सन् 1990 के जनवरी माह में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के शासनकाल के दौरान यही एकांकी एक नुक्कड़ नाटक के रूप में सागर शहर के छः स्थानों पर अलग-अलग खेली गयी।’’
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चूंकि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ के पिताश्री प्रवचनकार होने के साथ ही संगीत मर्मज्ञ थे अतः उनका सितारवादक रामजी हर्षे, तबला वादक करोड़ी लाल भट्ट, जलतरंग वादक जवाहर लाल भट्ट आदि संगीत क्षेत्र के स्वनामधन्य कलाकारों के साथ उठना-बैठना हुआ करता था। ये कलाकार उनके घर पर भी आया करते थे तथा आए दिन संगीतसभा का आयोजन होता रहता था। इनमें जवाहर लाल भट्ट लोकनाथ मिश्र के बचपन के मित्र थे। ऐसे संगीतमय पारिवारिक वातावरण ने लोकनाथ में संगीत के प्रति रुचि जगाई। वे अपने मित्र जवाहरलाल भट्ट की भांति संगीत में निपुण होना चाहते थे किन्तु संगीत उनके शौक तक सीमित हो कर रह गया और उन्होंने तबला एवं बांसुरी वादन तथा गायन का समुचित अभ्यास किया। तबले की शिक्षा उन्हें दिल्ली बाज घराने की परम्परा के तबलावादक करोड़ीलाल भट्ट से प्राप्त की। इसके बाद विधिवत् संगीत शिक्षा लेते हुए तबला वादन में प्रभाकर तथा संगीत में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। संगीत के मंचों पर सुविख्यात शास्त्रीय गायक गंगाप्रसाद पाठक, सितार वादक रामजी हर्षे एवं शरद गांगाधर सप्रे, जलतरंग वादक जवाहरलाल भट्ट के साथ संगत के रूप में तबला बजाने का अवसर मिला।
            संगीत और साहित्य में समान रुचि के फलस्वरूप लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ ने एक शोधात्मकग्रंथ लिखा जिसका नाम था-‘‘सम-संगीत एवं काव्य का मूल आधार’’। यह ग्रंथ सन् 2006 में प्रकाशित हुआ। संगीत शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से सन् 2009 में प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद (उ.प्र.) से मान्यता प्राप्त कर सागर नगर में श्री सरस्वती संगीत महाविद्यालय आरम्भ किया।
          एक विशेष गुण जो लोकनाथ मिश्र को सागर के अन्य साहित्यकारों से अलग पहचान दिलाता है, वह है उनकी जादू की कला। उन्होंने न केवल मंचों पर अपनी जादू की कला का प्रदर्शन किया है अपितु वे बिहार राज्य के गया में आयोजित जादूकला पर आधारित कांफ्रेस में देश भर से एकत्र हुए बासठ जादूगरों के समक्ष अपने जादू का प्रदर्शन कर के वाहवाही प्राप्त कर चुके हैं। उल्लेखनीय है कि उन्होंने सन् 2013 में दिल्ली पब्लिक स्कूल सागर में एक निश्चित पाठ्यक्रम बना कर छः माह तक विद्यार्थियों को जादू कला का प्रशिक्षण दिया जिससे 565 छात्रों ने जादू कला सीखी। लेकिन वे जादूकला को अंधश्रद्धा एवं छल-कपट से दूर रखने में विश्वास रखते हैं। इस तारतम्य में उन्होंने सन् 1996 में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सानिध्य में बैंगलुरु में ‘‘अंधश्रद्धा के विरुद्ध तथा वैज्ञानिक सोच जागृत करने के लिए’’ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में नेहरु युवक केन्द्र संगठन के लगभग सौ अधिकारियों को चमत्कारों की वैज्ञानिक व्याख्या संबंधी प्रशिक्षण दिया। कवि लोकनाथ मिश्र को चिकित्सा संबंधी ज्ञान भी है। वे एक्यूप्रेशर, चुंबक चिकित्सा, पिरामिड चिकित्सा, रंग चिकित्सा, न्यूरो थेरेपी, म्यूजिक थेरेपी एवं विद्युत चिकित्सा के द्वारा रोगियों का इलाज भी करते हैं।
             बहुआयामी प्रतिभा से युक्त लोकनाथ मिश्र का साहित्य सर्जक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओं में जहां एक ओर गंभीर चिंतन रहता है वहीं दूसरी ओर हास्य-व्यंग का पुट भी पाया जाता है।  समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं स्वार्थपरता की राजनीति पर कटाक्ष करते हुए वे लिखते हैं
प्रश्न अनसुलझे बहुत हैं, और तुमसे क्या कहें।
आप भी उलझे बहुत हैं, और तुमसे कया कहें।
भूख कब से  द्वार पर  बैठी  हुई है  गांव के
हाथ में  छाले बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
अब उजाले में मुखौटे, पहन कर निकला न कर
आईने  बाहर  बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
जब से तुम सत्ता में आए, दूर दिल्ली हो गई
काम भी काले बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
क्या करोगे एक रावण को जला कर, रामजी
देश में रावण बहुत हैं, और तुमसे क्या कहें।

साहित्यकार लोकनाथ मिश्र

              तंगहाल इंसानों और परेशान किसानों के प्रति संवेदना के भाव उमड़ना स्वाभाविक है। विपरीत परिस्थितियां और उनके कारणों को टटोलने पर परिस्थितियों की अनेक पर्त्तें खुलती दिखाई देती हैं। कुछ यही भाव लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ की इस काव्य रचना में परिलक्षित होते हैं-
रात को जुगनूं से चमके और दिन में खो गये।   
ऐसे  सूरज  इस  जहां  में  बेतहाशा हो गये।
फसल  सारी  बो रहे हैं  कल्पना के  खेत में
बागवां  ऐसे  जहां  में  ढेर  सारे  हो  गये।
पांव के छालों ने खींचा, अनुभवों का मानचित्र
रास्ते  अब  साफ़ सारे, मंज़िलों तक हो गये।
आज तक तो हाल न पूछा किसी ने मीत का
आखिरी जब  सांस  टूटी, यार सारे  रो गये।

             एक बहुत ही हृदयस्पर्शी एवं कोमल भावनाओं की कविता है -‘जन्म दिवस पर’, जिसमें कवि ‘मीत’ ने एक पुत्र की नींद के बहाने उस भावना को व्यक्त किया है जो अपनी संतान के सुख को ले कर माता-पिता के हृदय में मौजूद रहती है। यह कविता देखिए-
शी...ई... शोर मत करो/कुछ मत बोलो,
मेरे बेटे की पलकों पर
छाई गहरी नींद मत खोलो
क्योंकि! तमु नहीं जानते कि
आज मेरे बेटे का जन्मदिन है
उसके सुनहरे जीवन में /रस ही रस है
मैं नहीं चाहता कि कम से कम आज के दिन
उसकी आंखों से/एक भी आंसू बह जाए
या उसका कोई भी स्वप्न
अचानक नींद टूटने पर अधूरा रह जाए।

             कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ अपनी कविताओं में भावनाओं एवं विचारों को जिस सहज भाव से पिरोते हैं, उनकी यह शैली उन्हें सहज अभिव्यक्ति का उल्लेखनीय कवि बनाती है।                               
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( दैनिक, आचरण  दि. 30.07.2019)
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Friday, July 26, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 59 ... प्रतिभा सम्पन्न युवा लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

     प्रतिभा सम्पन्न युवा लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र
                     - डॉ. वर्षा सिंह               
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परिचय :
नाम  :- डॉ. सुजाता मिश्र
जन्म :- 30 जून 1985
जन्म स्थान :- दिल्ली
माता-पिता :- डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र एवं प्रो. रामेश्वर मिश्र “पंकज“
शिक्षा  :- बी.ए. (ऑनर्स), एम.ए., पी.एच. डी.
लेखन विधा :- लेख, समीक्षा एवं आलोचना।
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       सागर नगर की साहित्य-उर्वरा भूमि प्रत्येक उस व्यक्ति को विशेष लेखकीय परिवेश प्रदान करती है जो साहित्य सृजन से जुड़ा हुआ हो, फिर चाहे उसका जन्म सागर में हुआ हो अथवा न हुआ हो, साहित्यिक कर्मभूमि के रूप में सागर की साहित्यिकता उस व्यक्ति के जीवन में समाहित होने की क्षमता रखती है। यह तथ्य दिल्ली में जन्मीं डॉ. सुजाता मिश्र पर भी अक्षरशः खरा उतरता है। दिल्ली में निवासरत् प्रो. रामेश्वर मिश्र “पंकज“ एवं डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र की पुत्री के रूप में 30 जून 1985 को जन्मीं सुजाता मिश्र ने अपने परिवार में एक वैचारिक एवं दार्शनिक परिवेश पाया। उनके पिता रामेश्वर मिश्र “पंकज“ गांधीवादी ,राष्ट्रवादी चिंतक तथा दार्शनिक हैं जिनके विचारों का प्रभाव सुजाता के चिंतन पर पड़ा। वहीं उनकी मां डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र राजनीति एवे समाजसेवा में रुचि रखने वाली महिला हैं। वे वर्ष 2007 - 2014 तक सोनिया विहार दिल्ली की निगम पार्षद रही, साथ ही वर्ष 2012 में पूर्वी नगर निगम दिल्ली की प्रथम मेयर भी रही। सुजाता ने अपनी मां से राजनीतिक समझ एवं समाज की विडम्बनाओं को देखने, परखने की क्षमता प्राप्त की। शैक्षिक एवं राजनीति के मिश्रित वातावरण में पली-बढ़ीं सुजाता मिश्र  के भाई कपिल मिश्र दिल्ली से विधायक तथा लोकप्रिय नेता हैं। जबकि सुजाता के श्वसुर प्रोफ़. डॉ. नंदकिशोर प्रसाद सिंह, बिहार विश्वविद्यालय से वनस्पति शास्त्र के व्याख्याता पद से सेवानिवृत्त हुए। परिवार में साहित्यसृजन के प्रति रुचि भी रही जिसने सुजाता मिश्र की भावनाओं में साहित्यिकता के बीज बोए।
       सुजाता मिश्र ने विद्यालयीन शिक्षा के पश्चात् दिल्ली के ही हंसराज कॉलेज से बी.ए. हिंदी (आनर्स) में स्नातक किया और इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2008 में स्थान परिवर्तन हुआ और वे दिल्ली से भोपाल आ गईं। भोपाल में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय से प्रसिद्ध आलोचक आचार्य विनय मोहन शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध कार्य किया। जैसा कि डॉ. सुजाता मिश्र ने जानकारी दी कि  आचार्य विनय मोहन शर्मा के साहित्यिक और निजी जीवन पर आधारित अभी तक का एकमात्र शोध कार्य है।
         यायावरी जीवन एक रचनाकार को अनुभवों के संसार से जोड़ता है। डॉ. सुजाता मिश्र को भी विभिन्न स्थानों में रहने और जीवन के नित नए अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिला। उन्होंने वर्ष 2012-13 में ग्वालियर स्थित सिंधिया कन्या विद्यालय में बतौर हिंदी शिक्षिका कार्य किया। इसके बाद वे  दिल्ली लौट गईं। दिल्ली में रहते हुए कुछ समय तक वहां एक प्रकाशन संस्थान में बतौर एडिटर और कंटेट राईटर काम किया। इस दौरान उन्होंने स्कूली विद्यार्थियों के लिये एनसीआरटी पाठ्यक्रम पर आधारित हिंदी, इतिहास तथा विज्ञान विषय में हिंदी माध्यम की सहायक पुस्तकें तैयार की। वैसे इस दौरान सन् 2008 से लगातार विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में शामिल होते हुए मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में भ्रमण किया।
           सन् 2016 में डॉ. सुजाता का विवाह डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के ई.एम.एम.आर.सी विभाग जो सी.इ.सी-यू जी सी -मानव संसाधन विकास मंत्रालय-मल्टी मीडिया केंद्र है, में प्रोड्यूसर ग्रेड ए अधिकारी कार्यरत् माधव चंद्र चंदेल से हुआ। स्वयं डॉ. सुजाता मिश्र वर्तमान में डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से मान्यता प्राप्त बीटी इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस में हिन्दी विषय की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उनकी प्रतिभा को देखते हुए इंस्टीट्यूट ने उन्हें सेवा आरम्भ करते ही इंस्टीट्यूट की वार्षिक पत्रिका “स्पंदन“ के प्रथम अंक का सम्पादन कार्य सौंप दिया। पैन्थेर हाउस पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ के लिए संपादन कार्य करते हुए डॉ सुजाता मिश्र ने “दादा साहब फाल्के अकादमी“ पुरस्कार विजेता तथा ,  “नगीना “ तथा “निगाहें“ फिल्मों के लेखक - निर्माता श्री जगमोहन कपूर के उपन्यास “मलंगी“ का सम्पादन किया। लखनऊ से ही प्रकाशित मासिक पत्रिका “लीटो इंडिया“ में बतौर सम्पादक कार्य किया। मध्यप्रदेश से प्रकाशित देशबन्धु , आचरण आदि समाचार पत्रों सहित राजस्थान से प्रकाशित नव दुनिया, बिहार से प्रकाशित “बिहार टुडे तथा दिल्ली से प्रकाशित न्यूज़ ग्राउंड मासिक पत्रिका के साथ ही साहित्यिक वेबसाईट “शब्दांकन डॉट कॉम“ , “प्रवक्ता डॉट कॉम“ तथा “मेकिंग इंडिया डॉट कॉम“ के लिये शोधपरक लेखन करती हैं। डॉ सुजाता मिश्र का शोध प्रबंध उनकी प्रथम पुस्तक के रूप में “आचार्य विनय मोहन शर्मा एवं उनका साहित्यिक अवदान’’ प्रकाशित हो चुका है।           
           उल्लेखनीय है कि डॉ सुजाता को अध्ययन ,आध्यापन और लेखन के अतिरिक्त संगीत में विशेष रुचि है। वे सिंथेसाइज़र (की बोर्ड) बजा लेती हैं तथा खना बनाने और बागवानी करने में भी उनकी विशेष रुचि है।
वसंत काव्योत्सव में बाएं से : कवयित्री डॉ. वर्षा सिंह, शायर डॉ. गजाधर सागर एवं मंच संचालक डॉ. सुजाता मिश्र

डॉ सुजाता मिश्र के लेखों में उनकी एक मौलिक दृष्टि दिखाई पड़ती है। अपनी लेखनी में एक ओर जहां उन्हें समाज में पड़ रहे पाश्चात्य प्रभाव के दुष्परिणामों से चिंता होती है वहीं दूसरी ओर वे भारतीय संस्कृति की ऐतिहासिक महत्ता पर गर्व झलकता हैं। लेकिन अंधानुकरण नहीं, वे अतीत की त्रुटियों पर भी उंगली उठाने से नहीं हिचकती हैं। इस तारतम्य में अपने लेखों में अद्यतन स्थितियों का आकलन करने के लिए ऐतिहासित एवं पौराणिक आख्यानों का भी संदर्भ लेती हैं। डॉ. सुजाता का एक लेख है ‘हंगामा है क्यों बरपा?’ यह लेख 27 सितम्बर 2018 को धारा 497 को रद्द किए जाने के संदर्भ में है। इस लेख के आरम्भ में ही वे लिखती हैं कि -‘‘ गत 27 सितम्बर 2018 को धारा 497 को रद्द करने वाले अपने ऐतिहासिक फैसला सुनाते जस्टिस आर एफ नरीमन ने तीक्ष्ण टिप्प्णी करते हुए कहा कि - “पत्नी पति की सम्पत्ति नही ंहै”, तब मुझे एकाएक स्मरण हो आया “द्रौपदी” का ! जब  स्वयंवर में अपनी धनुष कला के प्रदर्शन से अर्जुन ने द्रौपदी के मन को जीता तब राजा द्रुपद को कहां मालूम रहा होगा कि पुत्री की मनोइच्छा अनुकूल वर तलाशने  के लिए किया गया यह आयोजन अतंतः उनकी बेटी को आजीवन ‘बहुपतित्व’ के धर्म निर्वाह की ओर धकेल देगा! माता कुंती के आदेश मात्र पर स्वयंवर की कठिन प्रक्रिया से चुनी गयी अपनी पत्नी द्रौपदी को जब पांचो पांडवो ने आपस में बांट लेने का फैसला लिया तो कैसा लगा होगा द्रौपदी को ? मनोनुकूल वर की चाहत में द्रौपदी को जमीन के एक टुकडे की तरह पांचो ंभाईयो ंके में बांट दिया गया!  क्या पित और सास के आदेश पर एक स्त्री का पति के अन्य भाईयो ंको अपना पति मान उनके साथ संबंध बनाना नैतिक, समाजिक और मानवीय दृष्टि से सही था? यदि हां तो  सिर्फ अर्जुन की पति होते हुए द्रौपदी अपनी मर्ज़ी से अर्जुन के अन्य भाईयो ंके साथ संबंध बनाती तो क्या इसे भी सही कहा जाता? यह पांडू पुत्रो ंकी “स्वयंवर में जीती द्रौपदी” को अपनी “सम्पत्ति” समझने का ही नतीजा था, जिसके चलते “धर्मराज” माने जाने वाले युधिष्ठिर ने भी  द्रौपदी का दांव जुंए में लगा दिया, जिसकी परिणति भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण के रूप में हुई! चीरहरण के इस पाप का दोषी माना गया कौरवों को , जबकि अपनी पत्नी को एक वस्तु समझकर जुएं में हार जाने वाले युधिष्ठिर तो आज भी “धर्मराज” ही कहे जाते हैं!’’
          विगत कुछ वर्षों में स्त्रियों ने स्वयं के साथ हुई यौन-प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस दिखाते हुउ ‘‘हैशटैग मी टू’’ कैम्पेन आरम्भ कियां देखते ही देखते इसने दुनिया की अनेक महिलाओं में नवऊर्जा का संचार किया और वे अपने यौनशोषण की घटनाओं के बारे में खुल कर सामने आ खड़ी हुईं। इसी कैम्पेन के संबंध में डॉ. सुजाता मिश्र का एक लेख है ‘‘ मी टू : क्योंकि सब नहीं चलता’’। इस लेख में डॉ सुजाता ने इस कैम्पेन का अपने ढंग से आकलन किया है। वे अपने इस लेख में लिखती हैं कि -‘‘ खुलापान और मर्यादा एक साथ नही ंचल सकते। स्त्री हो या पुरुष सबको ंअपने दायरे समझने होगें। आज के इस दौर में दोस्त, प्रेमी और सहकर्मियों के साथ अपने रिश्तों के मापदंड हमें खुद निर्धारित करने होगें। और फिर भी यदि कोई उन दायरो ंको तोडने की कोशिश करे तो उसी वक्त अपना विरोध दर्ज करवाना होगा, स्त्री-पुरुष दोनों ही को “सब चलता है” वाला नज़रिया छोडना होगा, क्योंकि सब नहीं चलता। याद रखिए परिस्थितयोंवश भी गलत इंसान की गलत मंशाओं आगे समझौता करने वाला व्यक्ति फिर चाहे वो स्त्री हो या पुरुष सबसे बडा दोषी है। क्योंकि उसकी यही “समझौता प्रवृत्ति” उसको ंभले ही काम और नाम दिला गई हो पर इसके चलते ऐसे तमाम लोग मारे जाते है जो समझौता नहीं करते और कहीं गुमनामी में खो जाते हैं, जबकि शोषक दिन पर दिन ताकतवर बनता जाता है, और शोषित बनकर ही सही ऐसे लोग अपना एक मुकाम बना लेते है। इन्हें तो शायद हिसाब ही नहीं होगा कि इनकी “समझौता प्रवृत्ति” ने कितने मेहनती, ईमानदार, आदर्श लोगो ंको अंधेरो में धकेल दिया।’’
 
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

     अपने इसी लेख में सुजाता मिश्र भारत में स्त्रियों के साथ होने वाले यौनअपराधों के कारणों की पड़ताल करते हुए निष्कर्ष पर भी विचार करती हैं। वे लिखती हैं कि -‘‘ज्यादातर भारतीय अपना पूरा वक्त दूसरे धर्म-पंथो ंकी कमियां गिनाने में निकाल देते हैं। लेकिन खुद अपने ही धर्म ग्रंथों में आचरण की शुचिता और मर्यादाओ ंपर क्या दिशा-निर्देश दिये गये हें, यह अधिकांश लोग नहीं जानते। कोई भी कानून या सोशल मीडिया मुहिम इन हालातों को तब तक नही ंबदल सकते जब तक बदलाव की बयार हमारे अंदर से न उठे। आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर तो गुज़र जायेगा रह जायेगा बाकी तो कुछ सबक केवल। यदि अभी भी न चेते तो कब चेतेंगे? आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित माहौल देना हमारी जिम्मेवारी है। हांलाकि आमतौर पर प्राचीन मर्यादाओ को सदा स्त्री की आज़ादी का विरोधी समझा जाता है, तो बेहतर है समाज के वर्तमान स्वरूप को ध्यान में रखते हुए, लैंगिक समानता के आधार पर नवीन समाजिक-नैतिक दिशा-निर्देश तय हो। जब तक आप संबंधों में उन्मुक्तता का समर्थन करते रहेंगे तब तक इस तरह के अपराध बढ़ते ही रहेंगे।’’
         ‘‘देश चलाने का टेंडर बनाम लोकतंत्र’’ यह एक अन्य लेख है डॉ सुजाता मिश्र का जिसमें वे भारत में लोकतंत्र के दूषित होते स्वरूप पर कटाक्ष करती हुईं उन खतरे से भी आगाह करती हैं जो सोशल मीडिया अथवा इंटरनेट की ओर से पैदा हो चुका है। अपने इस लेख में उन्होंने वर्तमान दशा-दिशा की बारीकी से व्याख्या की है। इस लेख कर एक अंश देखिए- ‘‘भारत “चुनावों” का देश है ,यहां साल भर ,कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में चुनाव होता ही रहता है। आज़ादी के बाद जो सबसे बडा परिवर्तन देश के राजनीतिक स्वरूप में आया वह था “लोकतंत्र”। लोकतंत्र यानि “जनता पर, जनता द्वारा चुना गया, जनता का शासन”! ऐसी ही अनेक क्रांतिकारी परिभाषाओं से सुसज्जित लोकतंत्र ने कहीं न कहीं आम आदमी को उसकी छुपी हुई ताकत का एहसास कराया, उस आम आदमी को जो बरसों की गुलामी से आज़ाद हुआ था। किंतु वैश्वीकरण के इस दौर में विश्व के अनेक देशों में जहां ‘’राजनीति’’ की परिभाषा बदली वही ं“लोकतंत्र” ने भी अपना स्वरूप बदल लिया, फिर भला हिंदुस्तान इस बदलाव से कैसे दूर रहता? ऐसे में सोचना पडता है कि आज विश्व भर में जिसे हम “लोकतंत्र” कहते हैं वह आखिर “सत्ता का टेंडर” हासिल करने से कुछ ज्यादा है क्या? “लोक” तो जैसे इस “तंत्र” को साधने का एक माध्यम मात्र है।’’
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि डॉ सुजाता मिश्र एक प्रतिभासम्पन्न युवा लेखिका हैं। उनके लेखन में अपार संभावनाएं निहित हैं। वे एक समालोचक की दृष्टि से तथ्यों को तौलते हुए अपने विचारों को बेलाग सामने रखती हैं। उनका यही लेखकीय गुण एक दिन उन्हें यशस्वी बनाएगा।   
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( दैनिक, आचरण  दि. 25.07.2019)
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