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Monday, January 25, 2021

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 17 | चिन्तन की गलियों से | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत सत्रहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के प्रतिष्ठित विचारक, चिन्तक, लेखक एवं उद्योगपति स्व. मोतीलाल जैन की पुस्तक " चिन्तन की गलियों से" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
   
सागर: साहित्य एवं चिंतन

     पुनर्पाठ: मोतीलाल जैन कृत ‘चिंतन की गलियों से’
                        -डॉ. वर्षा सिंह                                                                                    
         इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो जीवन में चिंतन के महत्व को स्थापित करती है। यह पुस्तक है चिंतक एवं विचारक मोतीलाल जैन की पुस्तक ‘चिंतन की गलियों से’।
         प्रत्येक व्यक्ति संवेदनशील होता है जिसके कारण उसे सुख और दुख की अनुभूति होती है। सुख प्राप्त होने पर व्यक्ति सुख के कारणों पर चिंतन नहीं करता है। लेकिन जब दुख प्राप्त होता है तो वह दुख के कारणों का न केवल पता लगाता है बल्कि उन कारणों से छुटकारा पाने के लिए उपाय सोचना शुरू कर देता है, और वहीं से शुरू हो जाती है चिंतन प्रक्रिया। जो व्यक्ति हर स्थिति में चिंतनशील होता है वह दुख और सुख का विभाजन किए बिना जीवन के प्रत्येक तत्व के प्रति चिंतन करता है। लेखक मोतीलाल जैन सर्वकालिक चिंतक थे। वे धर्म, राजनीति, समाज, अर्थ, परमार्थ, स्वार्थ आदि प्रत्येक तत्व के प्रति सजग रहते हुए सतत चिंतनशील बने रहते थे। उन्होंने अपने विचारों को सरल शब्दों में छोटे-छोटे लेखों में निबद्ध किया जो कि वर्ष 1997 में ‘‘चिंतन की गलियों से’’ नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए। इस पुस्तक के आरम्भ में अपना मंतव्य देते हुए डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के तत्कालीन कुलपति शिवकुमार श्रीवास्तव ने लिखा है - ‘‘चित्त है, चैतन्य है तो चिंता होगी - चिंतन होगा। चिंता से चिंतन तक की यात्रा प्रतिकूल वेदना से अनुकूल वेदना तक की यात्रा है। जब चिंतन का स्तर प्राप्त होता है तो चिंता पीछे छूट जाती है।’’ वे आगे लिखते हैं कि - ‘‘मोतीलाल जी हर प्रश्न से चिंतन के स्तर पर जूझते हैं और निष्कर्षों तक पहुंचते हैं। ये निष्कर्ष मानव मात्र की कल्याण कामना के मधुर फल हैं। मोतीलाल जी ने सोच की सुस्पष्ट प्रणाली विकसित की है।’’
        ‘‘चिंतन की गलियों से’’ नामक पुस्तक को पढ़ते हुए लेखक मोतीलाल जी की मौलिक चिंतन प्रणाली का स्पष्ट बोध होता है। मोतीलाल जी ने अपनी बात के अंतर्गत लिखा है की ‘‘कहने में लिखने में और स्वयं पालन करने में बहुत अंतर होता है। मन में एक विचार आया तो कह दिया और लिख भी दिया। इस कहने और लिखने में हमारी कषाय ही मूल कारण है। कषाय है प्रशंसा पाने की, मान पाने की, बुद्धिजीवी कहलाने की। सो अंतरंग में जब यह कषाय जोर मारती है सो मुझे लिखने बैठना पड़ता है और फिर लिखे हुए पढ़ाने में भी उसी कषाय और अधिक पोषण होता है। इसे सोच कहे विचारना कहें, विवेक कहें, वृत्ति कहें या आसक्ति कहें। कह कुछ भी लें, परंतु पोषण तो प्रशंसा पाने की कषाय का ही होगा।’’
         जैन दर्शन के सिद्धांत कोश में कषाय की सरल व्याख्या की गई है जिसके अनुसार आत्मा के भीतरी कलुष परिणाम को कषाय कहते हैं। यद्यपि क्रोध मान माया लोभ ये चार ही कषाय प्रसिद्ध हैं पर इनके अतिरिक्त भी अनेकों प्रकार की कषायों का निर्देश आगम में मिलता है। हास्य रति अरति शोक भय ग्लानि व मैथुन भाव ये नोकषाय कही जाती हैं, क्योंकि कषायवत् व्यक्त नहीं होती। इन सबको ही राग व द्वेष में गर्भित किया जा सकता है। आत्मा के स्वरूप का घात करने के कारण कषाय ही हिंसा है। मिथ्यात्व सबसे बड़ी कषाय है। एक दूसरी दृष्टि से भी कषायों को निर्देश मिलता है। वह चार प्रकार है-अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान व संज्जवलन-ये भेद विषयों के प्रति आसक्ति की अपेक्षा किये गये हैं और क्योंकि वह आसक्ति भी क्रोधादि द्वारा ही व्यक्त होती है इसलिए इन चारों के क्रोधादिक के भेद से चार-चार भेद करके कुल 16 भेद कर दिये हैं। तहाँ क्रोधादि की तीव्रता मंदता से इनका संबंध नहीं है बल्कि आसक्ति की तीव्रता मंदता से है। हो सकता है कि किसी व्यक्ति में क्रोधादि की तो मंदता हो और आसक्ति की तीव्रता। या क्रोधादि की तीव्रता हो और आसक्ति की मंदता। अतरू क्रोधादि की तीव्रता मंदता को लेश्या द्वारा निर्दिष्ट किया जाता है और आसक्ति की तीव्रता मंदता को अनंतानुबंधी आदि द्वारा। कषायों की शक्ति अचिंत्य है। कभी-कभी तीव्र कषायवश आत्मा के प्रदेश शरीर से निकलकर अपने बैरी का घात तक कर आते हैं, इसे कषाय समुद्घात कहते हैं।
        कषाय के बारे में जिज्ञासा को जगाने वाले लेख लिखने वाले लेखक मोतीलाल जी अपने ‘‘मिथ्या’’ शीर्षक लेख में मिथ्या के बारे में लिखते हैं कि -’’ असत्य, झूठ, धोखा, फरेब, भ्रम आदि शब्दों से जो भाव प्रकट होता है, वह मिथ्या भाव है। मिथ्या का अर्थ है जो मिट जावे, यानी जो हमेशा रहता नहीं। साथ न देने वाला अभी है फिर ना रहे, चंचल चलाएमान। अभी हम सुखी होना मान रहे हैं, थोड़ी देर बाद हमारा यह भाव मिट जाए और हम दुखी होने लगें तो हमारा सुखी होने का भाव मिट गया, ऐसा माना जाएगा। फिर कुछ समय बाद हमारा वह दुख घट जाए या बढ़ जाए, तो यह घटना बढ़ना भी असत्य यानी मिथ्या  कहा जाएगा। इससे यही तात्पर्य निकलता है कि हमारे चित्त में मन के द्वारा जो भी परिणमन होता है वह मिटता रहता है। एक विकल्प होता है, कुछ देर टिकता है, फिर उसको अन्य दूसरा विकल्प मिटा देता है। दूसरा विकल्प भी तीसरे के द्वारा मिट जाता है और इस प्रकार विकल्प होते हैं और मिट जाते हैं। परंतु जिस चित्त में, चेतन में, आत्मा में यानी जीव में विकल्प होते हैं वह जीव नहीं मिटता है। जीव तो वेदना सहता रहता है इसीलिए जीव सत्य है और उसका वेदना सहना भी सत्य है। वेदना अच्छी भी हो सकती है और बुरी भी हो सकती है। जो वेदन सुहावे, रुचिकर लगे, उसे पुण्य रूप यानी शुभ कहा गया है और जो वेदन अरुचिकर लगे उसे पाप रूप यानी अशुभ कहा गया है। परंतु जीवन की वेदना सहना यह सत्य है क्योंकि वेदना मिटती नहीं। वेदना का साता असाता रूप परिवर्तन ही होता रहता हैं।’’
वर्तमान जीवन परिवेश में मिथ्या का बोलबाला है। बाज़ार और विज्ञापन की दुनिया सच के चमकीले आवरण में झूठ का विक्रय करने पर उतारू रहती है। लेकिन मिथ्या केवल बाज़ार में ही नहीं है, वह हमारे जीवन का अभिन्न हिससा बनतर जा रही है। मोतीलाल जी के ‘‘मिथ्या’’ शीर्षक लेख को पढ़ते समय ही मेरे मन में जिज्ञासा ने जन्म लिया कि आखिर जैन दर्शन ‘‘मिथ्या’’ के बारे में क्या कहता है? और मैने पाया कि जैनदर्शन के अभिमत से जहां भी एकान्तिकता होती है, वहां वह विचार मिथ्या बन जाता है। अनादिकाल से यह जीव अज्ञान के वश में आकर विषयों और कषायों में प्रवृत्ति करता हुआ इस संसार में भटक रहा है। इस भ्रमण में इस जीव ने अनन्तों बार चैरासी लाख योनियों में जन्म लिया, कभी अच्छे कर्मों के उदय से देवों के दिव्य-सुखों को भोग खुश, तो कभी त्रियंच-नरक और मनुष्य गति के दुखों को भोग कर विचलित होता रहा। अपने सच्चे आत्म-स्वरुप का दर्शन न हो सकने के कारण अनादि-काल से इस जीव की दृष्टि विपरीत ही रही है ! जीव की इस विपरीत दृष्टि के कारण ही उसे ‘‘मिथ्यादृष्टि’’ कहा जाता है। मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्या को छोड़कर किस प्रकार से यथार्थ दृष्टि (सम्यग्दृष्टि) वाला बनता है, और किस प्रकार अपने गुणों का विकास करते हुए परमात्मा बनता है, उसके इस क्रमिक विकास में आत्मा के गुणों के जिन-जिन स्थानो पर वो रुकता है, उन्हें गुण-स्थान कहते हैं अर्थात् बहिरात्मा (मिथ्यादृष्टि) से अंतरात्मा (सम्यग्दृष्टि) और फिर परमात्मा बनने के लिए इस जीव को आत्मिक गुणों की आगे-आगे प्राप्ति करते हुए, जिन-जिन स्थानो से गुजरना पड़ता है, उन्हें गुण-स्थान कहते हैं।

चिन्तन की गलियों से - मोतीलाल जैन

         सभी धर्मों में लगभग एक सी बातें कही गईं हैं। फिर सभी धर्म अलग-अलग क्यों हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि धार्मिक भिन्नताओं के पीछे असली कारण उनसे जुड़ी मान्यताओं की विविधता तो नहीं हैं? इस गूढ़ विषय पर चिंतन करते हुए लेखक मोतीलाल जी ने ‘‘भिन्न-भिन्न मान्यताएं क्यों?’’ शीर्षक लेख में लिखा है कि -‘‘संसार में मनुष्य विचारशील एवं चिन्तन -मनन की विशेष योग्यता रखने वाला जीव हैं। मनुष्य के सिवाय अन्य किसी और प्राणी में इतनी और योग्यता इस पृथ्वी पर किसी अन्य को नहीं है। मनुष्य अपने अनुभव की बात अन्य दूसरों को जताने की इच्छा करता है। यह इच्छाशक्ति भी मनुष्य की विशेष योग्यता है। ...... अनुभूति हो जाने पर ही वस्तु पदार्थ आदि के गुण-अवगुण पर श्रद्धा व विश्वास होता है। जो अनुभूति हो पाती है उतनी बात पर ही उसे विश्वास होता है और विश्वास होजाने का ही दूसरा नाम मान्यता है। इसी मान्यता के आधार पर सिद्धांत बना दिए जाते हैं। जितना जो जानता है उतना ही उसका सिद्धांत रहता है क्योंकि उतना ही उसे सिद्ध है, ज्ञात है।’’ लेखक के कहने का आशय यही है कि अनुभवजनित ज्ञान ही मान्यता निर्धारित करता है और मान्यताओं की विविधता विविध धार्मिक स्वरूप गढ़ती है।
        मनुष्य जीवन में जब पारस्परिक संबंधो की बात हो तो मोह एक बड़े घटक के रूप में सामने आता है। कई बार मोह के साथ राग शब्द भी प्रयुक्त होता है। तो प्रश्न उठता है कि मोह और राग में क्या संबंध अथवा क्या अंतर है? इस बारे में मोतीलाल जी ने अपने लेख ‘‘मोह और राग’’ में लिखा है कि - ‘‘मोह जहां है वहीं राग-द्वेष होता है। मोह की आराधना राग से होती है। मोह के अभाव में राग-द्वेष नहीं होता है। राग की विराधना द्वेष से होती है। जितनी तीव्र मोह दशा होती है उतना ही तीव्र राग उत्पन्न होता है। जिस पदार्थ एवं वस्तु अथवा जीव से जीव को जितना गहरा प्रेम व राग होता है, उतना ही गहरा उससे द्वेष उत्पन्न हो जाता है।’’
मोतीलाल जैन जी की पुस्तक ‘‘चिंतन की गलियों से ’’ उनके विविध विषयों पर लिखे गए लेखों का रोचक संग्रह है। जैसा कि पुस्तक के आरंभ में डाॅ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के तत्कालीन प्रोफेसर तथा अध्यक्ष हिन्दी विभाग एवं बुंदेलीपीठ डाॅ. सुरेश आचार्य, डी.लिट. ने लिखा है कि -‘‘संस्कृति, धर्म, साहित्य और समाज पर केन्द्रित उनके विषय संबंधी ये लेख अपने गम्भीर चिंतन से हमें सोचने को प्रेरित करते हैं। वे ज्ञान भक्ति के दरवाजे सभी को खोलने के पक्षधर हैं।’’ वस्तुतः मोतीलाल जैन जी की यह पुस्तक उन सभी पाठकों के लिए महत्वपूर्ण है जो जीवन से जुड़े धर्म और दर्शन के पक्षों को समझना चाहते हैं। यह पुस्तक ऐसी पठनीय सामग्री को समेटे हुए है जो इसके पुनर्पाठ को प्रेरित करती है।
 
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साहित्य वर्षा

( दैनिक, आचरण  दि.25.01.2021)
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Thursday, July 16, 2020

सागर : साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 3 | जनसंख्या पर रोक लगाएं | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत तीसरी कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के लोकप्रिय कवि डॉ. श्याम मनोहर सीरोठिया के काव्य संग्रह  "जनसंख्या पर रोक" का पुनर्पाठ।

सागर : साहित्य एवं चिंतन

पुनर्पाठ : ‘जनसंख्या पर रोक लगाएं’ काव्य संग्रह
                      - डॉ. वर्षा सिंह
                     
            आज हम सोचते हैं कि मंहगाई तेजी से बढ़ रही है। वस्तुतः मंहगाई बढ़ रही है तो इसलिए कि उपभोक्ता की तुलना में उत्पादन की उपलब्धता कम होती जा रही है। बेरोजगारी बढ़ रही है तो इसलिए कि रोजगार के अवसरों की अपेक्षा बेरोजगारों की संख्या बहुत अधिक है। अब समय है कि जब हम प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले कारणों को हाशिए पर रख कर उस कारण की ओर अपना ध्यान केन्द्रित करें जो इन सभी समस्याओं के मूल में मौजूद है। यह मूल कारण है हमारे देश में विस्फोटक होती जनसंख्या। डाॅ. सीरोठिया ने इसी मूल कारण को अपने काव्यात्मक पदों का आधार बनाया है, जो काव्य संग्रह में संग्रहीत हैं। डाॅ. सीरोठिया ने पाया कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में तथा कम पढ़े-लिखे या अशिक्षित तबके में जनसंख्या नियंत्रण के प्रति जागरूकता का सर्वथा अभाव है। वे अपनी आर्थिक स्थिति, अपने संसाधन और अपने स्वास्थ्य को अनदेखा करते हुए संतानों को जन्म देते रहते हैं।  भले ही उन संतानों का लालन-पालन कर पाना उनके लिए संभव नही हो पाता है। यही संतानें अभावों के बीच भी जब किसी तरह पल-बढ़ जाती हैं तो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अपराध की दुनिया से जुड़ जाती है। यदि आज देश में अपराध की दर बढ़ रही है तो उसके मूल में भी असीमित जनसंख्या ही है। इसीलिए डाॅ. सीरोठिया अपनी कविता के माध्यम से आग्रह करते हैं कि -
अनचाही सब विपदाओं की, इन सामाजिक विषमताओं की ।
जड़ में बढ़ती आबादी है, गला घोंटती ममताओं की ।।
वातावरण बदलना होगा, फिसला कदम सम्हलना होगा।
जनसंख्या के भस्मासुर से, आप बचें, यह देश बचाएं।।
आओ मिल कर कदम बढ़ाएं, जनसंख्या पर रोक लगाएं।।

           पढ़ा- लिखा तबका तो जनसंख्या नियंत्रण के महत्व को समझने लगा है। लेकिन अशिक्षित वर्ग संतान के पैदा होने को ईश्वर की इच्छा मान कर स्वीकार करता चला जाता है। अशिक्षा के कारण उसका इस ओर ध्यान ही नहीं जात कि जिस ईश्वर ने प्रजनन क्षमता दी है उसी ईश्वर ने प्रजनन क्षमता को नियंत्रित करने की बुद्धि भी प्रदान की है। धर्म ग्रंथ भी यही कहते हैं कि कार्य वही किए जाएं जिनसे सबका भला हो। इस तथ्य को डाॅ. सीरोठिया ने अपनी इस कविता में बड़े सुंदर ढ़ंग से सामने रखा है -
सब धर्माें का धर्म यही है, सब ग्रंथों का मर्म यही है।
भला हो जिसमें मानवता का , जीवन में सद्कर्म वही है।।
बिना विचारे काम जो करते, धर्मों को बदनाम जो करते
जीवन में सच को स्वीकारें, झूठी मान्यताएं ठुकराएं।।
आओ मिल कर कदम बढ़ाएं, जनसंख्या पर रोक लगाएं।।
डाॅ. सीरोठिया बाल विवाह के विरुद्ध भी आवाज उठाते हैं और कहते हैं -
रुक सकती है हर बरबादी, कम कर लें बढ़ती आबादी।
लड़की की हो उमर अठारह, लड़के की इक्कीस में शादी।।
समीक्ष्य कृति

                एक चिकित्सक होने के नाते डाॅ. सीरोठिया ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए अपनाए जाने वाले साधनों को भी अपने काव्य में प्रमुखता से स्थान दिया है। जैस -
जब चाहें तब बच्चा पाएं, अनहोनी पर ना झल्लाएं।।
खाने की गोली लें या फिर, काॅपर टी, कंडोम लगाएं।।
आओ मिल कर कदम बढ़ाएं, जनसंख्या पर रोक लगाएं।।

          वस्तुतः जनसंख्या नियंत्रण एक ऐसा मुद्दा है जिस पर समय रहते विचार करना और कदम उठाना अति आवश्यक है। इसके लिए जनसंख्या नियंत्रण अभियान को एक बार फिर जमीनी स्तर तक ले जाने की जरूरत है। डाॅ. सीरोठिया अपनी कविताओं के माध्यम से आमजनता से आग्रह करते हैं कि अब ‘‘हम दो हमारे दो’’ से काम नहीं चलने वाला है। अब समय आ गया है कि हम दो हमारा एक होना चाहिए। उनकी ये पंक्तियां देखें -
हम दो हों पर एक हमारा! नई सदी का हो यह नारा !
इसी मंत्र की शक्ति में ही -मुस्काता कल छिपा हमारा।।

              अपने मधुर गीतों एवं दोहों के लिए सुविख्यात डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया अपने इस नवीन संग्रह ‘ जनसंख्या पर रोक लगाएं’’ के द्वारा भी जनमानस में अपना विशेष स्थान बनाएं यही कामना है। साथ ही यह अपेक्षा है कि यह अत्यंत जरूरी काव्य संग्रह जन-जन तक पहुंचे, क्योंकि इतिहास गवाह है कि वैदिक काल से आज तक ज्ञान एवं नीति की बातें जनामानस ने पद्य के रूप में ही आत्मसात की हैं। वेद- महाकाव्य और रामचरित मानस जैसे ग्रंथ इसके उत्तम उदाहरण हैं। इसीलिए पुनर्पाठ करते हुए मुझे डाॅ. श्याम मनोहर सीरोठिया की यह पुस्तक महत्वपूर्ण लगी।
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पुनर्पाठ @ साहित्य वर्षा

( दैनिक, आचरण  दि. 16.07.2020)
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Friday, July 10, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 2 | तमाई | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत दूसरी कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के लोकप्रिय कवि टीकाराम त्रिपाठी 'रुद्र' के काव्य संग्रह  "तमाई" का पुनर्पाठ।

सागर: साहित्य एवं चिंतन

      पुनर्पाठ- ‘तमाई’ काव्य संग्रह

                   -डॉ. वर्षा सिंह
                     
हमें अच्छी तरह पता है कि
यह समाजवादी अर्थव्यवस्था है
यदि यह सच नहीं है तो इस व्यवस्था को बदलने की जरूरत है
और इसके लिए हमें करनी होगी समाज की तमाई
तब ही हमारे जीवन के जोड़ में शायद शून्य से बड़ी होगी हासिलाई

        ये पंक्तियां हैं सागर नगर के वरिष्ठ कवि टीकाराम त्रिपाठी ‘रूद्र’ की तमाई शीर्षक कविता की। यही नाम है उनके काव्य संग्रह का जिसका पुनर्पाठ ज़रूरी है। दरअसल तमाई मात्र एक शब्द नहीं, वरन् एक पूरा उद्यम है अनुपयोगी और अवांछित को हटा कर नवीन की स्थापना करने का। इस शब्द से वे लोग भली-भांति परिचित हैं जो बुंदेलखण्ड के हैं और खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। खेती-किसानी कर्मशील क्रिया है जिसमें अनेक शब्द विशेषण बन कर समाए हुए हैं जैसे बुआई, जुताई, रोपाई, निंदाई, गुड़ाई आदि..इसी तरह का एक शब्द और भी है तमाई। एक पूर्ण कार्मिक शब्द। एक ऐसा शब्द जो सृजन की नई कड़ी के लिए भूमिका बांधता है। यानी खेत जोतने से पहले खेत में से घास आदि निकालने की क्रिया है तमाई,  ताकि खरपतवार ज़मीन से दूर हो जाएं और खेत की तैयार ज़मीन को जोत कर उसमें बीजारोपण किया जा सके। खरपतवार के रहते खेत में दोबारा फसल नहीं उगाई जा सकती है। दोबारा नई फसल उगाना है तो पहले खरपतवार हटाने होंगे, ज़मीन की फिर से जोताई करनी होगी और ज़मीन तैयार करनी होगी नए सिरे से। बिलकुल किसी नए-नकोर खेत की तरह।
           जीवन में भी अनके ऐसी स्थितियां आती हैं जब हम खरपतवार जैसी भावनाओं से घिर जाते हैं। बुद्धि कुंद होने लगती है और हम कुछ नया सोचने में कठिनाई महसूस करने लगते हैं। ऐसे में आता है हताशा और निराशा का दौर। नई सुबह की भांति नयापन हमेशा नवीन विचारों का संचार करता है। यह चिंतन, मनन और आकलन का आग्रह करता है। जब हम कुछ नया सोचते हैं तो कुछ नया कर पाते हैं। पुरानी सड़ी-गली सोच और सड़ी-गली व्यवस्थाओं पर नवीनता के भवन खड़े नहीं किए जा सकते हैं। इसीलिए समय-समय पर पहले से चले आ रहे विचारों, व्यवस्थाओं और मान्यताओं की तमाई जरूरी है। कवि टीकाराम त्रिपाठी जब तमाई शब्द का प्रयोग करते हैं तो ठीक इसी संदर्भ में। वे बदल देना चाहते हैं उन सारी व्यवस्थाओं को जो समाज, विचार और व्यवहार के लिए अनुकूल नहीं हैं।
           तमाई के लिए भी जरूरी है पड़ताल। यह जांचे-समझे बिना कि तमाई की स्थिति आ गई है या नहीं, तमाई नहीं की जा सकती है। ‘पड़ताल’ शीर्षक अपनी कविता में कवि रुद्र लिखते हैं-
पड़ताल जरूरी है
जीवन से सभी पक्षों की
उन्नति और अवनति के
ऊबड़-खाबड़, तिकड़मी शिखरों की/कक्षों की
उन्नत है या नत है
विनयावनत है या उन्नतिविगत है?

      सच है, पड़ताल के बिना कुछ भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। जैसे-फर्श पर चिकनी-चमकदार टाईल्स लगवाने, दीवारों की रंगाई-पुताई करवाने, फर्नीचर बदलवाने से यह तय नहीं किया जा सकता है कि उस घर में रहने वाले व्यक्ति का स्वभाव भी निश्चछल, निष्कपट और निरापद हो गया है। वह तो उससे चर्चा-परिचर्चा करने पर ही पता चलता है कि वह व्यक्ति दिखावे मात्र में बदला है अथवा सचमुच उसमें परिवर्तन आ गया है। मल्टीनेशनल कंपनियों के चमचमाते दफ़्तरों के वातानुकूलित कक्षों में श्रम का जिस तरह शोषण होता है, वह उन कक्षों में पहुंच कर ही अनुभव किया जा सकता है। अनुभव पड़ताल के मार्ग से चल कर लक्ष्य तक पहुंचने की प्रक्रिया ही तो है। भौतिक वस्तुओं में किए गए परिवर्तन तब अर्थहीन हो जाते हैं जब व्यक्ति की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं होता, वह जस की तस बनी रहती है।

तमाई, काव्य संग्रह @ साहित्य वर्षा

          तमाई के साथ ही एक और प्रक्रिया जुड़ी होती है, मानों दो प्रक्रियासूचक शब्द एक ही कोष्ठक में लिख दिए गए हों। तो दूसरा शब्द है नरवाई यानी खरपतवार। नरवाई जलाकर नष्ट करना आमबात है। भले ही हर आम बात अच्छी नहीं होती। जैसे नरवाई का जलाया जाना भीषण प्रदूषण का कारण बनता है। नरवाई का जलाया जाना देश की राजधानी का भी दम घोंटने का माद्दा रखता है लेकिन बुराई यह कि दम घुटता है आम आदमी का जिसमें बहुसंख्यक निम्नवर्ग और मध्यमवर्ग होता है। एक अनुभव, एक पड़ताल और फिर निष्कर्ष कि हर आग की जलनशील प्रकृति न तो जलने वाले की पीड़ा समझ सकती है और न उसके धुंए से घुटने वाले दम की कसमसाहट महसूस कर सकती है। ‘तमाई’ काव्य संग्रह में एक कविता है ‘आग’।
आग सुलगाना बहुत आसान साथी
बुझाना लेकिन नहीं आसान होता
खुद बा खुद लगती नहीं वह अब कहीं भी
मित्र, लगवाई सदा जाती रही है
शत्रुओं का नाम ले कर सगों पर ही
घटा युद्धों की सदा छाती रही है

       सन् 2010 में ‘तमाई’ का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था। लगभग एक दशक बीतने पर भी यह काव्य संग्रह प्रासंगिक है। यूं भी समाज से सरोकारित साहित्य कभी अप्रासंगिक नहीं होता है अपितु बार-बार पढ़ने और समझने योग्य होता है।

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तमाई, पुनर्पाठ @ साहित्य वर्षा


( दैनिक, आचरण  दि. 10.07.2020)
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Friday, July 3, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 1 | पूंछ हिलने की संस्कृति | व्यंग्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय मित्रों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने नई श्रंखला शुरू की है पुस्तकों के पुनर्पाठ की...पहली कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. सुरेश आचार्य का व्यंग संग्रह "पूंछ हिलाने की संस्कृति" का पुनर्पाठ।

 सागर: साहित्य एवं चिंतन

 पुनर्पाठ : पूंछ हिलने की संस्कृति

               -डॉ. वर्षा सिंह
                         
               पुस्तकों का महत्व जीवन में बहुत अधिक होता है और इस बात को हर पढ़ा लिखा व्यक्ति बखूबी समझ सकता है। पुस्तकें अनेक विधाओं की होती हैं। अनेक विषयों की होती हैं। कुछ किताबें जीवन के सिद्धांतों से परिचित कराती हैं, तो कुछ जीना सिखाती हैं और कुछ समाज को आइना दिखाती हैं। इसी तरह कुछ किताबें अपनी वैचारिक गुणवत्ता के कारण कहावत बनकर स्मृतियों से जुड़ जाती हैं। ऐसी ही एक पुस्तक है डाॅ सुरेश आचार्य का व्यंग्य संग्रह ‘‘पूंछ हिलाने की संस्कृति’’। इस व्यंग्य संग्रह का प्रथम संस्करण सन 1984 में प्रकाशित हुआ किन्तु इसकी प्रासंगिकता यथावत है। मैं इसे दसियों बार पढ़ चुकी हूं। मैं जितनी बार इस संग्रह को पढ़ती हूं उतनी ही बार इस के व्यंग्यों के विविध आयाम मेरे सामने आते हैं। यूं भी डॉ सुरेश आचार्य ने अपने एक अन्य ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में व्यंग्य रचनाओं के बारे में लिखा है कि ‘‘ईमानदार व्यंग्य रचना सदैव सामाजिक यथार्थ से संबंधित होती है। यह कहीं भी अमूर्त नहीं होती बल्कि सदैव सत्य से साक्षात करती चलती है।  दैनंदिन जीवन के कष्ट आडंबर मिथ्याचार और अनीतियों का तिरस्कार, उद्घाटन और उपहास ही उसका लक्ष्य होता है।’’
            जब भी समाज में विद्रूपता आने लगती है तो व्यंग्य स्वतः जन्म लेने लगता है। इसीलिए व्यंग्य साहित्य का इतिहास बहुत पुराना है। हिंदी साहित्य में व्यंग्यय लेखन का आगमन बहुत पहले हो गया था स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व से ही व्यंग्य लेखन हिंदी साहित्य में चलन में आ गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसमें एक अलग तरह की प्रखरता आ गई। तीखापन आ गया। भारतेंदु युग में अंग्रेजी शासन को लेकर अनेक व्यंग्य रचनाएं लिखी गईं। उस समय व्यंग्य का मूल उद्देश्य था स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए एक उद्दीपक वातावरण तैयार करना। भारतेंदु युग में बालकृष्ण भट्ट, राधाचरण गोस्वामी, प्रताप नारायण मिश्र, बद्रीनारायण चैधरी, बालमुकुंद गुप्त आदि ने राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक विषयों पर व्यंग्य लिखते हुए इन सभी क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियों पर जमकर प्रहार किया। भारतेंदु युग में व्यंग्य नाटक भी लिखे गए। जिनमें भारतेंदु हरिश्चंद्र का ‘‘अंधेर नगरी’’ सबसे प्रसिद्ध नाटक है। भारतेंदु युग के बाद द्विवेदी युग में व्यंग्य रचनाओं में वह धार नहीं रही जो भारतेंदु युग में थी। लेकिन परसाईं युग आते-आते यह विधा और अधिक मंज कर, तीखी होकर सामने आई। परसाई के बाद के क्रम में डॉ सुरेश आचार्य के व्यंग्यों में वह पैनी धार देखी जा सकती है।
पूंछ हिलाने की संस्कृति @ साहित्य वर्षा


           ‘‘पूंछ हिलाने की संस्कृति’’ व्यंग्य संग्रह का पहला व्यंग्य लेख इसी शीर्षक से है जिसमें डॉ सुरेश आचार्य ने समाज में व्याप्त चाटुकारिता को लक्षित करके करारा कटाक्ष किया है। वे लिखते हैं-  ‘‘सारे देश में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक पूंछ हिलाने की संस्कृति जोर पकड़ रही है। समझदार पिता अपने नन्हों का कैरियर बनाने में लगे हैं। पूंछ हिलाऊ संघ बना रहे हैं। प्रशिक्षण चालू है - हां बेटा उछलो। अब आंखों में भक्तिभाव भरो। शाबाश! एक, दो, तीन। पूंछ  हिलाना शुरू करो। अपनी छोटी-छोटी दुमें लहराते हुए उछलते हैं।’’
          मनुष्य में स्वार्थ की भावना जब बलवती हो जाती है तो वह येन केन प्रकारेण लाभान्वित होना चाहता है। भले ही उसे इसके लिए किसी की चाटुकारिता ही क्यों ना करनी पड़े। राजनीतिक क्षेत्र में प्रायः यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। समाज के अन्य क्षेत्रों में भी चाटुकारों की कमी नहीं रहती है। अकसर देखा गया है कि जो चाटुकार होते हैं वे अपना स्वार्थ सिद्ध करने में कामयाब हो जाते हैं। चाहे अफसर की चाटुकारिता करके प्रमोशन पाने का मामला हो या परिवार में संपत्ति पाने के लिए अपने से बड़ों की चाटुकारिता करने का मामला हो, चाटुकार हमेशा फायदे में ही रहते हैं। वे किसी गुलाम की तरह लगातार ‘जी हां’ ‘जी हां’ करते हुए मानो किसी श्वान की भांति अपनी पूंछ हिलाते रहते हैं। वस्तुतः यही तो पूंछ हिलाने की संस्कृति है, विशुद्ध चाटुकारिता संस्कृति।
         डॉ सुरेश आचार्य के इस व्यंग्य संग्रह में और भी व्यंग्य हैं जैसे- जादू वाले वो जो हैं, किराए का मकान उर्फ बसना बलम का मन में, एक आदम की करुण-गाथा, छोटे गुरु की कथा, बिगड़ना बलम का और न खाना सुपारी, दो पैरों वाला कुत्ता, लौटना वापस जादुई चिराग का, फूल सिंग की लाज बचाई श्री भगवान ने, फूड ऑफिस में कविता कक्ष, खाना और रोना भारत मां के लाल का, जब मंत्री जी आए तो चले गए हनुमान, मूत्रपान करना: पिस्ते के स्वाद वाला, जाना और न जाना अस्पताल का, विश्रामगृहों की वेताल कथा, पुल का शिलान्यास उर्फ अध्यक्षता का धर्मयुद्ध, हथझोले में ईसीजी, पोजीशन सॉलिड है, द फटूरे आफ इंडिया, गढ़ाकोटा बारे कक्का और कैफ़ियत। ये सभी व्यंग्य अपने आप में विषयगत विविधता लिए हुए और कटाक्ष की दुधारी तलवार से सुसज्जित हैं। विशेष रुप से ‘‘पोजीशन सॉलिड है’’ एक और तीखा व्यंग्य है। जिसमें लेखक ने चुनाव के दौरान झूठे वादे और नेताओं के द्वारा फैलाए जाने वाले भ्रमजाल पर कटाक्ष किया है। यह अंश देखें - ‘‘सारे देश में नोच खाने की होड़ लगी है। संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव भोजन का माध्यम हो गए हैं। मैं मुग्ध हूं। वाह रे मेरे देश के प्रजातंत्र... तूने कैसे कैसे कारीगर पैदा किए हैं। उप चुनाव सिर पर है। पानी इस साल गिरा नहीं। तालाब के कमल सूख रहे हैं। ज्वालामुखी, कांस और सेंवार पनप रही है। कीचड़ है। कचरा बढ़ रहा है और पोजीशन सॉलिड है।’’
        पूंछ हिलाने की संस्कृति व्यंग्य संग्रह एक ऐसी कृति है जिसकी प्रत्येक काल में प्रासंगिकता यथावत बनी रहेगी। जब तक समाज में चाटुकारिता भ्रष्टाचार और विसंगतियां है तब तक यह व्यंग्य संग्रह समसामयिक बना रहेगा। इसका जितनी बार पुनर्पाठ किया जाएगा यह अपने आस-पास की स्थितियों का आकलन करने की व्यक्ति की क्षमता को और अधिक बढ़ाएगा।
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साहित्य वर्षा


( दैनिक, आचरण  दि. 03.07.2020)
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Thursday, November 21, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 67 : सामाजिक सरोकारों के कवि राधाकृष्ण व्यास ‘‘अनुज’’ - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि राधाकृष्ण व्यास 'अनुज' पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश को ....

   
सागर: साहित्य एवं चिंतन

सामाजिक सरोकारों के कवि राधाकृष्ण व्यास ‘‘अनुज’’
        - डाॅ. वर्षा सिंह
   
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नाम: राधाकृष्ण व्यास ‘‘अनुज’’
जन्म: 01 अप्रेल 1956
जन्म स्थान: मौलवी चिरागउद्दीन का फर्श, परकोटा सागर (म. प्र.)
माता-पिता:स्व. श्रीमती रमाकांति व्यास एवं स्व. नन्हूराम व्यास
शिक्षा : बी. काम,  एल. एल. बी
लेखन विधा: गद्य एवं पद्य
प्रकाशित पुस्तक: पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं
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          सागर नगर के परकोटा क्षेत्र में मौलवी चिरागउद्दीन के फर्श में निवासरत श्री नन्हूराम व्यास एंव श्रीमती रमाकांति व्यास के पुत्र के रूप में 01 अप्रेल 1956 को जन्मे राण्धाकृष्ण व्यास को जन्म से ही देशभक्ति एवं देशप्रेम का वातावरण मिला। उनके पिता श्री नन्हूराम व्यास स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे गरम दल विचारधारा के थे। उनके पास अन्य सेनानियों का भी आना-जाना लगा रहता था। घर में वैचारिक चर्चाएं होती रहती थीं जिनका बाल्यावस्था से ही राधाकृष्ण व्यास के मानस पर प्रभाव पड़ा। स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने बी काॅम किया तथा इसके बाद कानून की पढ़ाई में रूचि जाग्रत होने से एल.एल.बी. किया। अपने पिता से मिला नेतृत्व का गुण उनके छात्र जीवन में उभर कर सामने आया और सर हरीसिंह गौर महाविद्यालय (नाईट कालेज) सागर म. प्र. में सन् 1979 में छात्रसंघ के सचिव बने। इसके बाद छात्रों के बीच लोकप्रियता के चलते सन् 1980 में छात्रसंघ के अध्यक्ष बने। एल.एल बी. करने के उपरांत अधिवक्ता संघ सागर म. प्र. के सन् 1997 से 1999 तक सह सचिव रहे।
           राधाकृष्ण व्यास रंगकर्म एवं पत्रकारिता के क्षेत्र रुचि रखने के साथ ही सामाजिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। वे हिन्दू मुस्लिम समन्वय समिति के संयोजक भी हैं। वे ‘‘दैनिक गोलदुनिया’’ में लेखन करते रहे हैं। ‘‘साप्ताहिक सागर सत्ता’’ का संपादन किया तथा ‘‘साप्ताहिक बेलिहाज’’ के प्रकाशक एवं प्रधान सम्पादक रहे हैं। वर्तमान में कम्पनी बाग के पास गोपालगंज में निवास करते हुए वे अधिवक्ता का कार्य करने के साथ ही साहित्य सृजन में संलग्न हैं। सन् 1974 से लेखन कार्य में संलग्न रहते हुए सम-सामयिक समस्याओं पर लेख, कविता, नाटक व व्यंग आदि लिखते रहते हैं। अपने लेखन के संबंध में राधाकृष्ण व्यास बताते हैं कि- ‘‘पहली कविता कक्षा पांचवी में पूर्व प्रधान मंत्री श्रद्धेय लाल बहादुर शास्त्री जी की शोक सभा के लिये स्लेट पर लिख कर पढ़ी थी जिसे सुरक्षित रखने का ज्ञान नही था। सन 1975 में मेरी प्रथम कविता ने दिमाग पर दस्तक दी ‘‘घिसा अधन्ना’’। उस समय मैं ढोलक बीड़ी में छोटे से पद पर सेवारत् था। उस कविता को स्व. सेठ श्री मोतीलाल जी, जो स्वयं बहुत बड़े साहित्यकार रहे है, ने बहुत सराहा और लिखने  को प्रोत्साहित किया।ं फिर क्या था कलम ने रुकने का नाम नहीं लिया।’’
अपने उपनाम ‘‘अनुज’’ के संबंध में राधाकृष्ण व्यास बताते हैं कि-‘‘सन 1978 में देश के ख्यातिप्राप्त साहित्यकार एवं हमारे शहर के सभी के प्यारे भाई शिवकुमार श्रीवास्तव जी ने मुझे उपनाम ‘‘अनुज’’ दिया।’’
सागर : साहित्य एवं चिंतन - डॉ.

         राधाकृष्ण व्यास मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य संम्मेलन एवं बज़्मे दाग के सदस्य हैं तथा वे बुन्देलखण्ड हिंदी साहित्य संस्कृति विकास मंच की काव्य गोष्ठी का नियमित संचालन करते हैं। वे नगर की अग्रणी साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था श्यामलम से भी संम्बद्ध हैं। राधाकृष्ण व्यास ‘अनुज’ की कविताओं में सामाजिक सरोकार अपने अनूठे अंदाज़़ में मुखर होते हैं। उनकी चर्चित कविता ‘‘मैं घिसा अधन्ना हूं’’ देखिए -
कल के इतिहास का -
फटा हुआ पन्ना हूं........!
भूत रहा गर्दिश में मेरा,
है वर्तमान संघर्षशील
सुख की अनुभूति पाने को
मैं हूं प्रयत्नशील,
मैं भविष्य के प्रति चैकन्ना हूं...!
जीवन के जंगल से-
अरमानों के हरे दरख्त
लोगो ने -
मेरी इच्छा के विरुद्ध
काटे वक्त बेवक्त
मैं आहांे की किताब का
अनफटा  रमन्ना  हूं
जो चाहा मिला नहीं
हृदय कमल खिला नहीं
दर्द बने यार मेरे
संघर्ष से हमें गिला नहीं
एक अधूरी अनबूझी
अतृप्त तमन्ना हूं...!
मेरी शिराओं में हैं मधुरस
किस्मत में लिखा नही जस
चोकर फेंका गया गन्ना हूं...!
मैं घिसा अधन्ना हूं
कल के इतिहास का
फटा हुआ पन्ना हूं.....!

         जब जीवन के प्रति चिंतन हो और सामाजिक दायित्वों से जुड़ाव हो तो काव्य में दार्शनिक तत्व शामिल होना स्वाभाविक है। इंसान उन्नति के कोई भी आयाम छू ले किन्तु उसे यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उसने जो कुछ पाया है उसके बदले कुछ खोया भी है। इसी तरह जो जमीन को छोड़ कर ऊंचाइयों की ओर बढ़ता है उसे एक न एक दिन ज़मीन पर वापस आना पड़ता हैं। कुछ यही दार्शनिक भाव है राधाकृष्ण व्यास ‘अनुज’ की इस कविता में -
उड़ान कितनी भी ऊची हो
नीचे तो आना होगा।
कुछ पाने की चाह हैं-मन में
कुछ तो खोना होगा।।
प्रीत की रीत बड़ी निराली
कहीं मुर्हरम कही दिवाली
होठों पर जब लगते ताले
फिर कैसा हंसना कैसा रोना।
अरमानों की लुटती डोली
अपने खेले खून की होली
तू क्या है तेरी हस्ती क्या
तू तो है सिर्फ एक खिलौेना।
मधुमास सी बीती जवानी
शेष नही अब कोई कहानी
पतझर सा जब आया बुढ़ापा
बचा नही कोई देने को पानी
उम्र के अन्तिम पड़ाव पर-सोचो
हमने क्या पाया क्या खोया
उड़ान कितनी भी ऊंची हो
नीचे तो आना होगा
कुछ पाने की चाह है मन मे
कुछ तो खोना होगा।
कवि राधाकृष्ण व्यास

         आज एकल परिवार का चलन इस कदर बढ़ गया है कि संयुक्त परिवार की संकल्पना टूटती दिखाई देती है। जब भाई-भाई परस्पर अलग होते हैं तो ज़मीन-जायदाद को ले कर विवाद भी खड़े हो जाते है। परस्पर कटुताएं बढ़ने लगती हैं। यह घर-घर का किस्सा हो चला है। संयुक्त परिवार की परम्परा रखने वाली भारतीय संस्कृति में पारिवारिक विखंडन का दृश्य देख कर ‘‘अनुज’’ जैसे कवि का विचलित होना स्वाभाविक है। इस विषय केन्द्रित उनकी यह कविता ध्यान दिए जाने योग्य है-
दिल रोता, लब हंसते हैं
अपने अपने घर के
अपने अपने
अलग अलग किस्से हैं।
नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे
खुले घूम रहे हत्यारे
सुरक्षित कोई नहीं यहां पर
पूछो तो कहते- अच्छे हैं
घर घर में है नागों का डेरा
ये मेरा है, और ये है तेरा
घर में ही शेर बने हैं
औरों को समझते भुने चने हैं
झूठा है संसार सारा
एक यही सच्चे हैं
दिल रोता, लब हंसते हैं
अपने अपने घर के
अलग अलग
अपने अपने किस्से हैं।

     राधाकृष्ण व्यास ‘अनुज’ की कविताएं उनके समाज के प्रति चिंतन को दर्शाने के साथ ही उनकी काव्य प्रतिभा को भी रेखांकित करती है। वे निश्चितरूप से सामाजिक सरोकारों के कवि कहे जा सकते हैं।

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( दैनिक, आचरण  दि. 15.11.2019)
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Monday, September 30, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 65 ... एक संजीदा शायर सिराज़ सागरी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के शायर सिराज सागरी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

       एक संजीदा शायर सिराज सागरी
                                 - डॉ. वर्षा सिंह
                       
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परिचय :
नाम  :- सिराज़उद्दीन अंसारी उर्फ़ सिराज़ सागरी
जन्म :-  25 फरवरी 1965
जन्म स्थान :- सागर, म.प्र,
माता-पिता :- श्रीमती अख़्तर बेगम एवं श्री बाहाजु़द्दीन अंसारी
शिक्षा  :- बी काम.
लेखन विधा :- काव्य
प्रकाशन     :- पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन
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                  सागर नगर की शायरी के क्षेत्र में शायर सिराज़ सागरी का नाम महत्वपूर्ण शायरों में गिना जाता है। सिराज़ सागरी को शायरी का हुनर अपने पिता से विरासत में मिला। उनके पिता बाहाजुद्दीन अंसारी एक नामचीन शायर थे और ‘वाहिद सागरी के नाम से शायरी करते थे। सिराज़ सागरी बताते हैं कि उनके पिता के पास अनके मशहूर शायरों का आना-जाना होता रहता था। घर में शायरी का माहौल था। बात सन् 1983 की है जब सिराज़ सागरी बी.ए. में पढ़ रहे थे। एक शाम उनके घर में शायरों का जमावड़ा लगा हुआ था और शायरी की तत्कालीन दशा-दिशा पर चिंतन किया जा रहा था। बात निकली तो वहां मौजूद शायर मायूस सागरी ने चिंतित होते हुए कहा कि-‘‘आजकल जो माहौल है उसे देख कर लगता है कि शायरी के प्रति गंभीरता ख़त्म होती जा रही है। न कोई बहर पर ध्यान देता है और न क़ाफ़िए पर। हमारे बाद कोई हम जैसी शायरी भी करेगा या नहीं, सोच कर चिंता होती है।’’
वहीं कुछ दूर बैठे सिराज़ सागरी ने यह बात सुनी तो उन्होंने उसी समय ठान लिया कि वे शायरी की परम्परा को गंभीरता से निभाते हुए पूरी लगन और समझ के साथ शायरी करेंगे ताकि उनके बुजुर्गों को शायरी की दशा को ले कर चिंतित न होना पड़े। सिराज़ सागरी जिनका मूल नाम सिराज़उद्दीन अंसारी है, उन्होंने ‘सिराज़ सागरी’ का तख़ल्लुस रखते हुए शायरी की दुनिया में पूरी गंभीरता से क़दम रखा। इस घटना के कुछ माह बाद ‘गौर जयंती’ पर डॉ. हरीसिंह गौर के जन्मस्थल बंगला स्कूल में आयोजित कवि सम्मेलन-मुशायरे में उन्होंने अपने वे चार मिसरे पढ़े जो उन्होंने बतौर ‘शायर सिराज़ सागरी’ सबसे पहले लिखे थे। वे मिसरे थे-
सर गौर हरीसिंह ने वो बात बनाई
तारीक़ी ज़ेहालत की है सागर से मिटाई
बनवा के यूनीवर्सिटी सागर से नगर में
इक शम्मा इल्म की है अंधेरे में जलाई

Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Sagar

             सिराज़ सागरी मानते हैं कि उनके इस मिसरे में ख़ामियां थीं लेकिन उन्होंने इन्हें कभी सुधारा नहीं और एक यादगार के रूप में यथावत रहने दिया। जिससे उन्हें उनके शायरी के सफ़र की शुरुआत एक कच्ची ज़मीन की तरह हमेशा याददाश्त में बनी रहे।
श्रीमती अख़्तर बेगम और श्री बाहाजुद्दीन अंसारी के पुत्र के रूप में 25 फरवरी 1965 को सागर में जन्मे सिराज़ सागरी ने स्नातक तक शिक्षा पाने के उपरांत अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को अपना लिया। आज वे ट्रांसपोर्ट के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। उन्हें जहां शायरी का गुण अपने पिता से मिला वहीं सामाजिक एवं धार्मिक संस्कार अपनी मां से प्राप्त हुए। पारिवारिक दायित्वों के चलते उनकी शायरी का सृजन तनिक धीमा अवश्य हुआ किन्तु उससे नाता नहीं टूटा। इस दौरान उन्हें प्रतिष्ठित शायरों से इस्लाह लेने का अवसर मिला। जिनमें आज़र छतरपुरी, निश्तर दमोही और हक़ छतरपुरी को वे अपना उस्ताद शायर मानते हैं। सिराज़ सागरी ग़ज़ल के साथ ही नज़्म, गीत, छंद रचनाएं भी लिखते हैं।  उनके सृजन का दायरा किसी एक भाषा तक सीमित नहीं है, वे उर्दू के साथ ही हिंदी और बुंदेली में भी ग़ज़लें लिखते हैं। वे आकाशवाणी के सागर, छतरपुर केन्द्र तथा दूरदर्शन के भोपाल केन्द्र से काव्यपाठ कर चुके हैं। पत्र पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं का प्रकाशन होता रहता है। उन्हें अनेक साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। शायरी के लिए उन्हें देश के प्रतिष्ठित मंचों पर आमंत्रित किया जाता है।
               ग़ज़ल काव्य की वह विधा है जो एक उन्दबद्ध रचना की भांति अनुशासन मांगती है। रदीफ, काफिया, बहर और वजन गजल के शिल्प को आकार देते हैं। वहीं किसी भी बात को दिल की गहराईयों से कहने की अदायगी गजल की रूह को आकार देती है। सिराज़ सागरी ने गजल के शिल्प ओर कथ्य दोनों को खूबसूरती से सम्हाला है। उनकी ग़ज़लों में प्रेम की कोमल भावना और दुनियावी समस्याओं पर चिंता एक साथ देखी जा सकती है। जैसे यह ग़ज़ल देखें -
तड़पा न कर इस दर्जा, न बैचेन हुआ कर
जब अपनी हथेली पे मेरा नाम लिखा कर
बच्चों के लिए अपने रहे -हक़ पे चला कर
असलाफ़ की अरवाह को तसकीन अता कर
इक मैं कि वफ़ा करके लुटा बैठा हूँ सब कुछ
इक वो है जो कहता है अभी और वफ़ा कर
गुम रहता है दुनियाँ की सदाओं में ब हर वक़्त
फुरसत में कभी अपनी भी आवाज़ सुना कर
कश्ती के सवारों ने उसे ही किया गर्क़ाब
तूफ़ान से कश्ती को जो लाया था बचाकर
रख लाज अताओं की तू अपनी मिरे मौला
दस्तार जिन्हें दी है उन्हें सर भी अता कर
हो जाये “सिराज़“ अम्न का हर आन बसेरा
करता हूँ दुआ दामने दिल अपना बिछाकर

              सिराज़ सागरी की शायरी में जिन्दगी की तहजीब और अहसास की तर्जुमानी में आज के माहौल की विसंगतियां देखी जा सकती हैं। कदम-कदम पर व्याप्त भ्रष्टाचार ज़िन्दगी की कठिनाई को और बढ़ा देता है। इस तथ्य को बड़ी ही खूबसूरती से सिराज़ सागरी ने अपनी इस गजल में बयान किया है -
अद्ल काइल था बेगुनाही का
मसअला था मगर गवाही का
बादशाह पर है बेहिसी तारी
क्या करे हौसला सिपाही का
ताज़ काँटों भरा है फिर तुझको
शौक़ क्यों इतना बादशाही का
है इताअत का क़र्ज़ सर पे मेरे
वज़्न काँधों पे सर बराही का
सोच ये क्या निबाह मुमकिन है
फ़िक़्र का और कम निगाही का
दुश्मनों का ख़ुदा पे है ईमान
आसरा मुझको भी ख़ुदा ही का
बादलों के हिसार से जागा
चाँदनी पर गुमाँ सियाही का
मुझको पहचानते “सिराज़“ हैं लोग
है करम ये बड़ा इलाही का

Shayar Siraj Sagari # Sahitya Varsha

         आज इंसान आत्मकेंंद्रित हो चला है। बाजारवाद की अंधी दौड़ ने परिवारों के बीच दरारें डाल रखी हैं। जहां अपनों की पीड़ा चेतना पर दस्तक न दे पाती हो वहां परायों का दर्द भला कैसे ध्यानाकर्षित कर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है जैसे लोगों को अव्यवस्थाओं में जीने की आदत पड़ गई है। माहौल के इस रूखेपन को सिराज़ सागरी पूरी तल्खी के साथ, लेकिन अपने ही अंदाज में कुछ इस तरह कहते हैं-
कुछ भी हो जाये चीखती ही नहीं
ज़िन्दगी जैसे ज़िन्दगी ही नहीं
उस तरफ मुन्तज़र मिरी खुशियाँ
गम की दीवार टूटती ही नहीं
ख़्वाब क्या खाक देखता कोई
रात भर आँख तो लगी ही नहीं
दोस्तों का हुजूम चारों तरफ
दोस्ती मुझको जानती ही नहीं
आदमीयत की बात क्या मानी
हम में जब कोई आदमी ही नहीं
मुझ से आबाद है मगर दुनिया
मेरा अहसान मानती ही नहीं
फिर रही है मुझे उठाये हयात
बोझ सर से उतारती ही नहीं
नस्ले-नौ जल्दबाज़ियों का शिकार
ये तो तहज़ीब जानती ही नहीं
आसुओं ने बयान की है सिराज
दर्द की दास्ताँ लिखी ही नहीं

              सिराज़ सागरी की ग़ज़लें अपने कहन के तरीके से लुत्फअंदोज करती है। उनकी ग़ज़लें दिल और दिमाग पर दस्तक देती हैं। संवेदनाओं और भावनाओं का अहसास शेर-दर-शेर साथ-साथ चलता है। यही एक संजीदा शायर की पहचान भी है। जो सिराज़ सागरी की गजलों में बखूबी उभर कर सामने आती है।
तारीख़ कह रही है-‘थे तुम हम नबा- ऐ-गुल’
पहचानते नहीं हो तुम्हीं क्यूं सदा-ए- गुल
इज़हारे इश्क़ से हो गुरेजां तो ये बताओ
जूड़े में किसके वास्ते तुमने सजाये गुल
खारों से मेरी राह सजाई है उसने आज
मैंने हमेशा राह में जिसकी सजाये गुल
यक बारगी सज़ा-ऐ-चमन खुश गबार है
कौन आ गया चमन में ये क्यों मुस्कराए गुल
आया न नाजुकी में कोई फर्क आन को
पैरों तले दबाए कि सर पे सजाये गुल
यह और बात है कि मैं हँसता रहा “सिराज़“
अपनों ने मेरे साथ हमेशा खिलाये गुल

              यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि सागर नगर की गजलगोई की दुनिया में सिराज़ सागरी वह हीरा है जिन्होंने अपनी मेहनत से अपने हुनर को तराशा है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 30.09.2019)
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Monday, September 2, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 61... साहित्यकार रघु ठाकुर: साहित्य सृजन जिनके लिए है संवेदनाओं से साक्षात्कार - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार रघु ठाकुर पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

साहित्यकार रघु ठाकुर: साहित्य सृजन जिनके लिए है संवेदनाओं से साक्षात्कार
                         - डाॅ. वर्षा सिंह
                                     
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परिचय:- रघु ठाकुर
जन्म:-  10 जून 1946
जन्म स्थान:- सागर
माता-पिता:- स्व श्रीमती तुलसी बाई एवं स्व. भवानी सिंह
शिक्षा:- स्नातकोत्तर (राजनीति विज्ञान), विधि स्नातक
लेखन विधा:- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन:- विभिन्न विधाओं में नौ पुस्तकें प्रकाशित
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             सागर नगर में ही नहीं वरन् देश में गांधीवादी-समाजवादी चिंतक के रूप में ख्याति प्राप्त समाजसेवी एवं राजनीतिज्ञ रघु ठाकुर एक अच्छे साहित्यकार भी हैं। जनहित के हर मोर्चे पर खड़े दिखाई देने वाले रघु ठाकुर ने साहित्य सृजन का मार्ग क्यों चुना इस संबंध में वे स्वयं कहते हैं कि -‘‘साहित्य सृजन मेरे लिये अपनी सम्वेदनाओं से साक्षात्कार है। इसके माध्यम से मैं खुद को मांजता हूं तथा पाठकों के माध्यम से आमजन से संवाद करने का प्रयास करता हूं। मुझे साहित्य शौक नहीं बल्कि परिवर्तन के लिए काम का ही एक हिस्सा है तथा बौद्धिक जगत से जुड़कर आत्मचिंतन व अपनी कमियों को दूर करने का माध्यम है। साहित्य स्वतः से सवाल करने का भी मेरा माध्यम है जो आमतौर पर दूसरे मित्र या नहीं करते या नहीं कर पाते। मानवीय संवेदनाओं व पीड़ा को व्यापकता देना भी एक उद्देश्य है।’’
            10 जून 1946 को माता श्रीमती तुलसी बाई एवं पिता भवानी सिंह के पुत्र के रूप में सागर में जन्में रघु ठाकुर बाल्यावस्था से ही चिंतनशील रहे। पीड़ित मानवता के प्रति संवेदनाएं उन्हें समाजसेवा के लिए प्रेरित करती रहीं। आरम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत शैक्षिक सीढ़ियां चढ़ते हुए उच्चशिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद विधि में स्नातक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने महात्मा गांधी के राजनीतिक एवं दार्शनिक विचारों का गहन अध्ययन किया। उनके मन पर महात्मा गांधी की समाजवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने राममनोहर लोहिया के विचारों को अपने मनोनुकूल पाया और उसे अपने जीवन में आत्मसात कर लिया। भारत में समाजवाद को ले कर हमेशा एक अस्पष्टता सी रही है। रघु ठाकुर इस अस्पष्टता को दूर कर के देश में एक समतामूलक समाज की संरचना करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। अपने अध्ययन काल से आज तक वे दलित, दमित एवं वंचितों के पक्ष में आवाज़ उठाते रहे हैं।
रघु ठाकुर ने डाॅ. लोहिया द्वारा प्रकाशित ‘जन’ तथा ‘मैनकाइंड’’ में लेखनकार्य किया। उन्होंने जार्ज फर्नान्डीज़ द्वारा प्रकाशित ‘प्रतिपक्ष’ तथा ‘दी अदर साईड’ में संपादन कार्य भी किया। वे सुल्तानपुर , उत्तरप्रदेश से प्रकाशित ‘‘लोकतांत्रिक समाजवाद’’ मासिक के संस्थापक सदस्य रहे तथा भोपाल, मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले ‘‘दुखियावाणी’’ का संपादनकार्य सम्हाल रहे हैं। वैसे वर्तमान में वे दक्षेस महासंघ के अध्यक्ष एवं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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                  साहित्य के क्षेत्र में समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर का महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी अब तक लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये पुस्तकें हैं- ‘‘रोजगार का अधिकार एवं गांधीवादी अर्थ व्यवस्थ‘‘, ‘‘आर्थिक उदारीकरण और भारत‘‘, ‘‘दक्षेस महासंघ एक परिकल्पना, विज्ञान और समाजवाद‘‘, ‘‘आरक्षण‘‘, ‘‘विकल्प की खोज‘‘, ’’विचारार्थ’’, ‘‘विमर्श’’, ’’मैं अभिमन्यु हूं’’, ’’मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’ तथा ’’स्याह उजाले’’।
              इन पुस्तकों में ‘‘मैं अभिमन्यु हूं’’, ‘‘मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’ तथा ‘‘स्याह उजाले’’ काव्य संग्रह हैं।
              स्पष्टवादी अभिव्यक्ति के लिए ख्यातिनाम रघु ठाकुर अपने साहित्य सृजन के साथ ही साहित्य जगत की अंतर्कथा पर कटाक्ष करने से भी नहीं चुके हैं। अपने काव्य संग्रह ‘‘मैं अभिमन्यु हूं’’ के आत्मकथन में ‘‘अपनमुखी-जो कहना भी जरूरी है’’ शीर्षक से लिखते हुए कहते हैं कि- ‘‘मेरी कविताएं लय या तुक में बंधी हुई नहीं हैं, बस ये तो कुछ अचानक मन में उपजे विचार हैं। कभी -कभी इनमें कुछ स्पष्टबयानी भी है या एक प्रकार की बेबाक गवाही भी। मैं जानता हूं कि ये कविताएं न तो कविसम्मेलनों के मंचों के लिए उपयुक्त हैं, क्योंकि इनमें न लय है न तरन्नुम, न झूठ है न नकलीपन, न हास्य है न विनोद। और ये कविताएं साहित्यकारों की बौद्धिक संगोष्ठियों की वाह-वाही की पात्र भी नहीं होंगीं क्योंकि मेरा कोई वास्ता देश की लेखक-साहित्यिक गिरोहबंदी से नहीं है, बल्कि मुझे ऐसा लगता है कि अपवाद छोड़ दें तो आमतौर पर देश व दुनिया में साहित्य के पुरस्कार वर्गीय, खेमाबंदी की गिरोहनिष्ठा के पुरस्कार हैं। ’’ इसी संग्रह की प्रथम कविता ‘‘21वीं सदी के लोहियावादियो’’ में कवि रघु ठाकुर की स्पष्टबयानी को देखा जा सकता है-
21वीं सदी के लोहियावादियों !
तुम्हारा लोहियावाद अब कुछ आधुनिक सा
हो गया है।
अपने अंतर्मन से पूछो
शायद लोहिया तुम्हें पुरातन सा हो गया है।
कहते थे लोहिया-
समता और सम्पन्नता है समाजवाद
पर अब नया जमाना है
अब तो सम्पन्नता ही है समाजवाद।

साहित्यकार रघु ठाकुर

            दूसरे काव्य संग्रह ‘‘मर रहा है किसान, फिर भी भारत महान’’ का प्रथम संस्करण सन् 2012 में प्रकाशित हुआ था। यह संग्रह इतना लोकप्रिय हुआ कि सारी प्रतियां साल भर में ही बिक गईं और अगले साल यानी सन् 2013 में ही प्रकाशक को इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा। स्पेनिश कवि लोर्का को समर्पित इस काव्य संग्रह की भूमिका लिखते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार रमेश दवे ने लिखा कि -‘‘ये कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है, भाई रघु ठाकुर जैसे निर्भीक एवं प्रखर वक्ता के पास कविता स्वयं आई हो और उसने मनुष्य की तरह, समाज की तरह, पीड़ितों की तरह खड़े हो कर कहा हो कि मुझे लिखो, मैं भी आज पाखंड, क्षोभ, जड़ता, अहंकार, साम्प्रदायिकता जैसे तरह-तरह के वैचारिक अभावों से ग्रस्त हूं। कविता का समाज मिट रहा है। इसीलिए रघु भाई ने कविता की आवाज़ सुन कर ये कविताएं रच दीं- अपने संवेदनशील मन की घबराहट को बाहर लाने के लिए।’’ रमेश दवे आगे लिखते हैं कि ‘‘इन कविताओं में कोई यथार्थवाद, कलावाद, प्रकृतिवाद न खोजा जाए और न शिल्प की कसौटियों पर इन्हें कसा जाए। ये वक्तव्य की कविताएं हैं, इसलिए इनकी वाग्मिता में सत्य और ईमान को देखा जाए।’’
‘‘मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’  काव्य संग्रह में एक कविता है ‘‘चाहिए है बस एक संडास’’। इस कविता का एक अंश देखिए-
सारा दिन घूम-घूम कर बेचते हैं खिलौने
नन्हा-सा बच्चा गोद में, कभी आदमी के कभी औरत के
एक अदद चादर, फटी-सी दरी और रजाई
कुल जमा यही हैं उनके बिछौने
दिन तो काट लिया,
पर रात कहां बिताएं, कहां सोने जाएं ?

             इसी संग्रह में एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘‘घर की तलाश’’। इस कविता में समाज में सिकुड़ती असंवेदनशीलता और परस्पर दूरियांे का बड़ी बारीकी से चित्रण किया गया हैं। कविता का एक अंश देखें-
मुझे है एक घर की तलाश
जो तालाब का पड़ोसी हो
बस अड्डा हो या रेलवे स्टेशन
स्कूल व कालेज हो और मैदान भी हो पास
पर अब कैसे मिलेगा ऐसा घर ?
शहर तो फैल गया है
हो गया है मीलों का सफ़र।
मुझे चाहिए ऐसा घर
जहां पीने को साफ पानी हो
जहां हत्यारा धुंआ न हो और हवा साफ हो
वायुमंडल रहे धुंए से बेअसर।

             सन् 2019 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘‘स्याह उजाले’’ में समाज में व्याप्त विसंगतियों पर तीखा प्रहार करते हुए ‘‘सभ्य समाज के नवाचार’’ शीर्षक कविता में रघु ठाकुर लिखते हैं-
डाॅगी को दैनिक क्रिया के लिए
साहब ले जाते हैं
पर बाबा को पोटी कराने को/ नौकर लगाते हैं
डाॅगी की गर्मी की बात अलग है
डाॅगी को वातानुकूलित कमरे में रहने की आदत है
जब मजदूर तपती दोपहर में
पत्थर तोड़ते हैं
मिट्टी खोदते और गिट्टी फोड़ते हैं
तब डाॅगी ड्राइंगरूम में अलसाते हैं

              वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक परिदृश्य का आंकलन एवं चिंतन करते हुए अपने जिन विचारों को रघु ठाकुर ने लेखबद्ध किया है वे लेख ‘‘विमर्श’’ नामक पुस्तक में संग्रहीत हैं। इन लेखों में ‘‘ऊर्जा तो बहाना है, अमेरिका के साथ जाना है’’, ‘‘प्रजातांत्रिक पूंजीवाद बनाम साम्यवादी पूंजीवाद’’, ‘‘जरूरत है पांचाली जैसी तेजस्विता की’’, ‘‘भस्मासुर बनाओगे तो खुद कहां बच पाओगे’’, ‘‘वैचारिक अतिवाद के महल’’, ‘‘औद्योगिक आतंकवाद’’, ‘‘ गांधी राष्ट्रपिता क्यों है, गांधी तो विश्वपिता हैं’’, ‘‘कविता-लोक से बाजार तक’’, नक्सलवाद- प्रचार और तथ्य’’ जैसे लेख वर्तमान समाज में व्याप्त वैचारिक संकीर्णता को बेनकाब करते हुए वह आक्रोश व्यक्त करते हैं जिसके केन्द्र में सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान है। इस पुस्तक में स्त्री विमर्श की एक कविता भी मौजूद है जो कवि रघु ठाकुर ने विंध्याचल एक्सप्रेस की सामान्य बोगी में यात्रा करने वाली तेंदू पत्ते वालियों की पीड़ा के रूप में व्यक्त किया है कविता का शीर्षक है ‘‘ तेंदू पत्ते वालियों का दर्द’’। इसका ये अंश देखिए -
तेंदू के पत्ते घने जंगलों से तोड़ कर
सैकड़ों किलोमीटर दूर वनों में घूम कर
ये गरीब तेंदू पत्ते वालियां देर रात्रि घर पहुंचेंगी
तब जा कर इनके घरों की अंगीठियां सुलगेंगी
इनकी यात्रा दुर्दांत कथानक है
इंसान की यह जिन्दगी नरक से भी भयानक है
भोर में तीन बजे जाग कर
दुधपीते बच्चों को सोता छोड़ कर
हाथ में एक थैला, साथ में चादर मैंला
निकलती हैं ये अपनी संघर्ष-यात्रा पर

          बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रघु ठाकुर जो कि देश में समतामूलक समाज संरचना हेतु समर्पित हैं, प्रकृति से एक कवि एवं साहित्यकार हैं, इसीलिए उनके साहित्य में समाज और संवेदनाओं का घनीभूत सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः साहित्य सृजन रघु ठाकुर के लिए संवेदनाओं से साक्षात्कार है और वे यही साक्षात्कार अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाने के लिए सतत् सृजनरत रहते हैं ।
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( दैनिक, आचरण  दि. 23.08.2019)
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Tuesday, July 30, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 60 .... सहज अभिव्यक्ति के उल्लेखनीय कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार लोकनाथ मिश्र "मीत" पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

सहज अभिव्यक्ति के उल्लेखनीय कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’
                          - डॉ. वर्षा सिंह
                                                                   
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परिचय :- लोकनाथ मिश्र ‘मीत’
जन्म :-  03 दिसम्बर 1949
जन्म स्थान :- सागर, मध्यप्रदेश
माता-पिता :- श्रीमती भागवती मिश्र एवं स्व. बाबूलाल मिश्र
शिक्षा :- एम.ए. (गणित), बी.एड., संगीत प्रभाकर
लेखन विधा :- पद्य
प्रकाशन :- दो काव्य संग्रह प्रकाशित
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                बहुमुखी प्रतिभाएं अपने नगर का गौरव होती हैं। सागर नगर में भी बहुमुखी प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है। एक ऐसे ही प्रतिभाशाली कवि जो नृत्य, संगीत, नाट्य जैसी साहित्यिक विधाओं के साथ ही जादू की कला में भी निपुण हैं, उनका नाम है लोकनाथ मिश्र। ये ‘मीत’ के उपनाम से कविताएं लिखते हैं। सागर नगर के मोहन नगर वार्ड में श्री बाबूलाल मिश्र एवं श्रीमती भागवती मिश्र की संतान के रूप में 03 दिसम्बर 1949 को लोकनाथ मिश्र का जन्म हुआ। माता-पिता की संगीत और साहित्य में गहन अभिरुचि थी। यह अभिरुचि लोकनाथ मिश्र में भी बाल्यावस्था से ही पुष्पित-पल्लवित होने लगी। पिताश्री धर्म-प्रवचन करते थे अतः धार्मिक ग्रंथों के प्रति लोकनाथ मिश्र की आरम्भ से ही जिज्ञासा रही। वे रुचि ले कर धार्मिक प्रसंगों को सुनते तथा उन पर चिंतन करते।
              लोकनाथ मिश्र अपनी प्रारम्भिक शिक्षा के बारे में बताते हैं कि -‘‘जब प्राथमिक शाला चमेली चौक, सागर में प्रारम्भिक शिक्षा हेतु दाखिला हुआ तो कक्षा पहली में मेरे प्रथम गुरु पं. गौरी शंकर पंडा ने स्लेट पर ‘ग’ गणेश का लिखवा कर मेरी शिक्षा की नींव डाली।’’ वे अपने प्रथम गुरु की विशेषताओं के बारे में गर्व से चर्चा करते हुए कहते हैं कि -‘‘मेरे प्रथम गुरु पं. गौरी शंकर पंडा शहर के प्रसिद्ध कवि थे। जिन्होंने ‘‘शिव-शतक’’ नामक पुस्तक में शिव वंदना के सौ कवित्त बड़े ही अलंकारिक भाषा में लिखे। इस प्रकार मेरी प्राथमिक शिक्षा का सूत्रपात एक महान कवि गुरु के द्वारा हुआ। इसी परिणामस्वरूप आठवीं कक्षा में मैंने अपनी प्रथम कविता का सृजन किया।’’
                बचपन में मिले साहित्य संस्कार के प्रभाव से लोकनाथ मिश्र सोलह-सत्रह वर्ष की आयु में कविताएं लिखने लगे जो समाचारपत्रों में प्रकाशित होने लगीं। सन् 1970 में कवि सम्मेलनों में जाना आरम्भ किया और शीघ्र ही लोकप्रियता भी मिलने लगी। इसके बाद उनकी भेंट सागर नगर के विद्वान समीक्षक एवं साहित्यकार डॉ. संतोष कुमार तिवारी से हुई। डॉ. तिवारी ने लोकनाथ मिश्र को अपनी कविताएं संकलित कर संग्रह के रूप में प्रकाशित कराने की प्रेरणा दी। इस प्रेरणा के परिणामस्वरूप सन् 1999 में उनका प्रथम कविता संग्रह ‘‘सभ्यता का फ़र्क़’’ प्रकाशित हुआ। इसके बाद साहित्यसृजन में उत्साहजनक गति आई और सन् 2005 में दूसरा संग्रह ‘अक्षर देवता’’ प्रकाशित हुआ। इस बीच धर्म मीमांसा की अपनी अभिरुचि के अनुरुप भगवान श्रीराम के जीवन पर आधारित शोधात्मक पुस्तक ‘‘मानस के सात भक्त’’ लिखी। इस पुस्तक के लेखन की प्रेरणा के संबंध में लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ बताते हैं कि जब वे वृंदावन के प्रवास पर थे, तब उन दिनों अचानक उन्हें इस विषय पर शोधात्मक पुस्तक लिखने का विचार आया।
           लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ ने एकांकी लेखन भी किया है। वे अपनी एकांकियों के लेखन एवं मंचन के संबंध में बताते हैं कि -‘‘मेरे द्वारा रचित अनेक एकांकियों में ‘अनोखा चुनाव’ एकांकी बहुचर्चित रही। जिसका मंचन 07 दिसम्बर 1980 को सागर के एक छविगृह पारस टॉकीज़ में टिकट शो से हुआ। सन् 1990 के जनवरी माह में पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के शासनकाल के दौरान यही एकांकी एक नुक्कड़ नाटक के रूप में सागर शहर के छः स्थानों पर अलग-अलग खेली गयी।’’
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चूंकि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ के पिताश्री प्रवचनकार होने के साथ ही संगीत मर्मज्ञ थे अतः उनका सितारवादक रामजी हर्षे, तबला वादक करोड़ी लाल भट्ट, जलतरंग वादक जवाहर लाल भट्ट आदि संगीत क्षेत्र के स्वनामधन्य कलाकारों के साथ उठना-बैठना हुआ करता था। ये कलाकार उनके घर पर भी आया करते थे तथा आए दिन संगीतसभा का आयोजन होता रहता था। इनमें जवाहर लाल भट्ट लोकनाथ मिश्र के बचपन के मित्र थे। ऐसे संगीतमय पारिवारिक वातावरण ने लोकनाथ में संगीत के प्रति रुचि जगाई। वे अपने मित्र जवाहरलाल भट्ट की भांति संगीत में निपुण होना चाहते थे किन्तु संगीत उनके शौक तक सीमित हो कर रह गया और उन्होंने तबला एवं बांसुरी वादन तथा गायन का समुचित अभ्यास किया। तबले की शिक्षा उन्हें दिल्ली बाज घराने की परम्परा के तबलावादक करोड़ीलाल भट्ट से प्राप्त की। इसके बाद विधिवत् संगीत शिक्षा लेते हुए तबला वादन में प्रभाकर तथा संगीत में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। संगीत के मंचों पर सुविख्यात शास्त्रीय गायक गंगाप्रसाद पाठक, सितार वादक रामजी हर्षे एवं शरद गांगाधर सप्रे, जलतरंग वादक जवाहरलाल भट्ट के साथ संगत के रूप में तबला बजाने का अवसर मिला।
            संगीत और साहित्य में समान रुचि के फलस्वरूप लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ ने एक शोधात्मकग्रंथ लिखा जिसका नाम था-‘‘सम-संगीत एवं काव्य का मूल आधार’’। यह ग्रंथ सन् 2006 में प्रकाशित हुआ। संगीत शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से सन् 2009 में प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद (उ.प्र.) से मान्यता प्राप्त कर सागर नगर में श्री सरस्वती संगीत महाविद्यालय आरम्भ किया।
          एक विशेष गुण जो लोकनाथ मिश्र को सागर के अन्य साहित्यकारों से अलग पहचान दिलाता है, वह है उनकी जादू की कला। उन्होंने न केवल मंचों पर अपनी जादू की कला का प्रदर्शन किया है अपितु वे बिहार राज्य के गया में आयोजित जादूकला पर आधारित कांफ्रेस में देश भर से एकत्र हुए बासठ जादूगरों के समक्ष अपने जादू का प्रदर्शन कर के वाहवाही प्राप्त कर चुके हैं। उल्लेखनीय है कि उन्होंने सन् 2013 में दिल्ली पब्लिक स्कूल सागर में एक निश्चित पाठ्यक्रम बना कर छः माह तक विद्यार्थियों को जादू कला का प्रशिक्षण दिया जिससे 565 छात्रों ने जादू कला सीखी। लेकिन वे जादूकला को अंधश्रद्धा एवं छल-कपट से दूर रखने में विश्वास रखते हैं। इस तारतम्य में उन्होंने सन् 1996 में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सानिध्य में बैंगलुरु में ‘‘अंधश्रद्धा के विरुद्ध तथा वैज्ञानिक सोच जागृत करने के लिए’’ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में नेहरु युवक केन्द्र संगठन के लगभग सौ अधिकारियों को चमत्कारों की वैज्ञानिक व्याख्या संबंधी प्रशिक्षण दिया। कवि लोकनाथ मिश्र को चिकित्सा संबंधी ज्ञान भी है। वे एक्यूप्रेशर, चुंबक चिकित्सा, पिरामिड चिकित्सा, रंग चिकित्सा, न्यूरो थेरेपी, म्यूजिक थेरेपी एवं विद्युत चिकित्सा के द्वारा रोगियों का इलाज भी करते हैं।
             बहुआयामी प्रतिभा से युक्त लोकनाथ मिश्र का साहित्य सर्जक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। उनकी कविताओं में जहां एक ओर गंभीर चिंतन रहता है वहीं दूसरी ओर हास्य-व्यंग का पुट भी पाया जाता है।  समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं स्वार्थपरता की राजनीति पर कटाक्ष करते हुए वे लिखते हैं
प्रश्न अनसुलझे बहुत हैं, और तुमसे क्या कहें।
आप भी उलझे बहुत हैं, और तुमसे कया कहें।
भूख कब से  द्वार पर  बैठी  हुई है  गांव के
हाथ में  छाले बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
अब उजाले में मुखौटे, पहन कर निकला न कर
आईने  बाहर  बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
जब से तुम सत्ता में आए, दूर दिल्ली हो गई
काम भी काले बहुत हैं,  और तुमसे क्या कहें।
क्या करोगे एक रावण को जला कर, रामजी
देश में रावण बहुत हैं, और तुमसे क्या कहें।

साहित्यकार लोकनाथ मिश्र

              तंगहाल इंसानों और परेशान किसानों के प्रति संवेदना के भाव उमड़ना स्वाभाविक है। विपरीत परिस्थितियां और उनके कारणों को टटोलने पर परिस्थितियों की अनेक पर्त्तें खुलती दिखाई देती हैं। कुछ यही भाव लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ की इस काव्य रचना में परिलक्षित होते हैं-
रात को जुगनूं से चमके और दिन में खो गये।   
ऐसे  सूरज  इस  जहां  में  बेतहाशा हो गये।
फसल  सारी  बो रहे हैं  कल्पना के  खेत में
बागवां  ऐसे  जहां  में  ढेर  सारे  हो  गये।
पांव के छालों ने खींचा, अनुभवों का मानचित्र
रास्ते  अब  साफ़ सारे, मंज़िलों तक हो गये।
आज तक तो हाल न पूछा किसी ने मीत का
आखिरी जब  सांस  टूटी, यार सारे  रो गये।

             एक बहुत ही हृदयस्पर्शी एवं कोमल भावनाओं की कविता है -‘जन्म दिवस पर’, जिसमें कवि ‘मीत’ ने एक पुत्र की नींद के बहाने उस भावना को व्यक्त किया है जो अपनी संतान के सुख को ले कर माता-पिता के हृदय में मौजूद रहती है। यह कविता देखिए-
शी...ई... शोर मत करो/कुछ मत बोलो,
मेरे बेटे की पलकों पर
छाई गहरी नींद मत खोलो
क्योंकि! तमु नहीं जानते कि
आज मेरे बेटे का जन्मदिन है
उसके सुनहरे जीवन में /रस ही रस है
मैं नहीं चाहता कि कम से कम आज के दिन
उसकी आंखों से/एक भी आंसू बह जाए
या उसका कोई भी स्वप्न
अचानक नींद टूटने पर अधूरा रह जाए।

             कवि लोकनाथ मिश्र ‘मीत’ अपनी कविताओं में भावनाओं एवं विचारों को जिस सहज भाव से पिरोते हैं, उनकी यह शैली उन्हें सहज अभिव्यक्ति का उल्लेखनीय कवि बनाती है।                               
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( दैनिक, आचरण  दि. 30.07.2019)
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Wednesday, July 17, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 58 .... एक विविध शिल्पी कवि सी.एल. कंवल - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि सी.एल.कंवल पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

एक विविध शिल्पी कवि सी.एल. कंवल

                   - डॉ. वर्षा सिंह

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परिचय :
नाम  :- सी. एल. कंवल
जन्म :-  01 फरवरी 1953
जन्म स्थान :- खुरई, जिला सागर, म.प्र,
माता-पिता :- श्रीमती सरजू एवं श्री कुंजीलाल
शिक्षा  :- बी.ए., बी.टी.
लेखन विधा :- काव्य।
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काव्य एक ऐसी विधा है जिसने संवेदनशील व्यक्तियों का हमेशा मनमोहा है। सागर नगर में कवियों की एक समृद्ध परम्परा चली आ रही है। उर्दू के साथ ही हिन्दी (खड़ी बोली) के कवियों ने सागर नगर की साहित्यधारा को सदैव ऊर्जावान बनाए रखा है। इसी क्रम में तेजी से उभरता हुआ नाम है कवि सी.एल. कंवल का । सागर जिले की खुरई तहसील में श्री कुंजीलाल एवं श्रीमती सरजू के घर 01 फरवरी 1953 को जन्मे सी.एल. कंवल को अपने माता-पिता से जो संस्कार मिले उन संस्कारों ने उनके भीतर साहित्य के प्रति रुझान को न केवल जन्म दिया अपितु सृजनधर्मिता में भी प्रवृत्त किया। अपनी औपचारिक शिक्षा के अंतर्गत स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने बी.टी. किया। भारतीय स्टेट बैंक से शाखा प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त सी.एल. कंवल ने औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त जैन धर्म एवं गांधी दर्शन का अध्ययन किया। उन्होंने अखिल भारतीय दिगम्बर जैन परिषद् परीक्षा बोर्ड दिल्ली से जैन धर्म परीक्षा उत्तीर्ण की।  सन् 1984 में डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर द्वारा दिल्ली में आयोजित दलित साहित्य अकादमी  द्वारा फैलोशिप प्राप्त की। सन् 1984 से सागर नगर में निवासरत सी.एल. कंवल बैंक की अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर काव्यसृजन करते रहे। सेवानिवृत्ति के उपरांत साहित्यक्षेत्र में उनकी सक्रियता बढ़ गई है।

कवि सी.एल. कंवल मानते हैं कि साहित्यसृजन विचार क्षमता बढ़ाता है तथा जीवन को समझने में और अधिक सहायता करता है। संभवतः इसीलिए उनकी ग़ज़लों में जीवन की सरसता और विडम्बनाओं के प्रति विचारों की समान भाव से  सहज अभिव्यक्ति मिलती है। उनकी ग़ज़लों में श्रृंगार रस की मधुरता भी है, आस्था एवं विश्वास भी और अव्यवस्थाओं के विरुद्ध ललकार भी। वे उन लोगों से भी मुख़ातिब होते हैं जो जरा-जरा सी बात पर हिम्मत हारने लगते हैं और यह मान बैठते हैं कि बातचीत अथवा सहजता से कोई मसला हल नहीं हो सकता है। ऐसे लोगों को सम्बोधित करते हुए वे कहते हैं-

विश्वास को बुनियाद बना कर तो देखिए
उन दुश्मनों से हाथ मिला कर तो देखिए
टूटेंगी अपने-आप ही नफरत की दीवारें
इंसानियत को दिल में जगाकर तो देखिए
हम और तुम का फासला मिट जाएगा खुद ही
ये मज़हबों की होड़ मिटा कर तो देखिए
आनन्द स्वर्ग का यदि लेना है आपको
रोते हुए बच्चे को उठाकर तो देखिए
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

धर्म के नाम पर वैमनस्य फैलाने वाले न तो कभी समाज का भला कर सकते हैं और न कभी अपनों की भला कर सकते हैं। कवि कंवल मानते हैं कि यदि गंभीरता से प्रयास किया जाए तो बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकाला जा सकता है और तमाम वैमनस्य को मिटाया जा सकता है। यह बानगी देखिए जिसमें वे फिरकापरस्तों से प्रश्न कर रहे हैं-

तुमने उठाए हाथ में हथियार किस लिए
अपनों पे कर रहे हो भला वार किस लिए
मंदिर कहीं बना है तो मस्जिद कहीं बनी
इन दोनों के दरमियान ये दीवार किस लिए
खुद की ख़बर नहीं है न औरों की ख़बर है
पढ़ रहे हो फिर यहां अखबार किस लिए
हद से गज़र रहे हो सरहदों के वास्ते
गैर की जमीन पर है अधिकार किस लिए
मुद्दा बड़ा है देश का मिट जाएगा ‘कंवल’
हल करने को बैठे हैं हम चार किस लिए

किसी भी व्यक्ति को उसकी अच्छाईयां ही बड़ा बनाती हैं। आर्थिक सम्पन्नता नहीं अपितु मिलनसारिता, नेकनीयत और एकता की भावना व्यक्ति में बुनियादी गुण होने चाहिए, तभी वह दूसरों की सहायता करने में सक्षम हो सकता है। सी.एल. कंवल की यह रचना इसी भावना को सामने रखती है-

रुतबा, गुरुर, हैसियत, ये शान किस लिए
नेकियां न  हों  जहां,  ईमान  किस लिए
बांटा नहीं किसी को कमाने के बाद भी
घटता ही जा रहा है ये ज्ञान किस लिए
सोने की थालियों में हों चांदी की रोटियां
भूखे ने मांगा रब से वरदान किस लिए

कवि कंवल ने ग़ज़लों के साथ ही अतुकांत कविताएं, दोहे और मुक्तक भी लिखे हैं। उनकी छंदमुक्त कविताएं सामाजिक सरोकार के और अधिक निकट हैं। इन कविताओं में बिम्ब योजना भी अधिक प्रभावी दिखाई देती है। उदाहरण के लिए ‘रोज देखता हूं’ शीर्षक कविता देखिए -

रोज देखता हूं
एक असहाय दीपक को
अंधेरा निगल रहा है
हम चारपाई पर पड़े
हाथों का सहारा देने में असमर्थ
पलकें मूंद लेते हैं
अत्याचार के नाम पर
अज्ञात भय से सहमें हम
गलियारे में झाड़ू की आवाज ले-ले कर
सुबह होने का अंदाजा भांपते हैं
फिर रह-रह कर आता है ख्याल
दीपक की असहाय अवस्था का
अंधेरे से जूझते रहने की व्यवस्था का
सो रहा हूं
और जाग रहा हूं
उठ-उठकर, कर रहा हूं प्रतीक्षा
नए भोर की
कवि सी.एल. कंवल # साहित्य वर्षा

छंदमुक्त कविताओं में सी.एल. कंवल की एक और कविता है, जिसका शीर्षक है- गंध। इस कविता में गंध को आधार बना कर छूटे हुए गांव की स्म्तियों का गहन आत्मीयतापूर्ण वर्णन किया गया है-

गंध मिट्टी की
पानी के साथ मिल कर
सोंधी हो जाती है।
तब मुझे मेरे गांव की खेती याद आती है।
गंध फूलों की
सुबह-शाम बाग में टहलती है
हौले-होले मेरे मस्तिष्क में
घुल जाती है
एक शंखनाद मन को
झकझोरता है
तब मुझे मदिर की याद आती है।
गंध जली रोटी की
मुझे बहुत भाती है
मेरी भूख और बढ़़ाती है
तब चौके में बैठी
रोटियां बेलती हुई
मुझे मेरी मां की याद आती है।

सी.एल. कंवल के दोहों में प्रकृति के बिम्बों में समाज ओर पारिवारिक संबंधों को संतुलित ढंग से पिरोया गया है। वे अपने दोहों में महुआ, कचनार, कोयल के साथ ही बेटी के महत्व, मां की ममता और महाजन की बदनियती की सहजता से चर्चा करते हैं। गजलों की अपेक्षा दोहों में उनकी पकड़ अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई देती है। ये दोहे इस तथ्य का साक्ष्य हैं -

महुआ महके मेढ़ पर, अंगना में कचनार।
गोरी महके सेज पर , कर सोलह सिंगार।।
कोयल कुहुके बाग में, आम रहे गदराय।
दूर देश के सूअना, चख-चख कर उड़ जाए।।
बेटों से बेटी भली , रखे सभी का ख्याल।
बेटों के मन डोलते, भली लगे ससुराल।।
नजर महाजन की गड़ी, खड़ी फसल पर यार।
पहले सूद वसूल के, राखे असल संवार।।
मां की ममता है बड़ी, बड़ा बाप का प्यार।
जीवन की इस नाव के दोनों खेवनहार।।

एक विविध शिल्पी कवि के रूप में सी.एल. कंवल अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए सागर नगर की साहित्य सम्पदा में अपना उल्लेखनीय योगदान दे रहे है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 17.07.2019)
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Saturday, June 29, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 55 ... विविधतापूर्ण कवि डॉ. अनिल सिंघई ‘‘नीर’’ - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि डॉ. अनिल सिंघई "नीर" पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

 विविधतापूर्ण कवि डॉ. अनिल सिंघई ‘‘नीर’’

                           - डॉ. वर्षा सिंह

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परिचय :- डॉ. अनिल सिंघई ‘‘नीर’’
जन्म :-  29 अगस्त 1956
जन्म स्थान :- सागर (म.प्र.)
पिता एवं माताः- स्व. कोमलचंद सिंघई एवं श्रीमती शांति बाई सिंघई
शिक्षा :- बी.ए.एम.एस. एम.डी. (आयुर्वेद), एफ.आई.एस.सी.ए., बी.टी.
लेखन विधा :- काव्य
प्रकाशन :- चार पुस्तकें प्रकाशित
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         सागर नगर में चिकित्सीय कार्य करते हुए साहित्य सेवा करने वाले साहित्यकारों में डॉ. अनिल सिंघई ‘‘नीर’’का नाम रेखांकित किया जा सकता है। नगर के सराफा एवं किराना (थोक) व्यवसायी श्री कोमलचंद सिंघई के पुत्र के रूप में 29 अगस्त 1956 को जन्में अनिल सिंघई को बाल्यावस्था से ही धार्मिक विचार एवं समाजसेवा की भावना अपने माता-पिता से मिली। उनके पिता प्रतिष्ठित व्यवसायी होने के साथ ही धार्मिक प्रवृत्ति के उत्कृष्ट समाजसेवी थे। वे चंद्रप्रभु समाज कल्याण समिति का संचालन करते थे। समिति के द्वारा गरीबों एवं निराश्रितों को शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार एवं शादी विवाह के लिए आर्थिक सहायता प्रदान की जाती थी। अनिल सिंघई की माताश्री शांति बाई सिंघई भी धर्मप्राण समाजसेवी महिला रही हैं, जिनसे उन्हें समाजसेवा की प्रेरणा मिलती रही।
                    अनिल सिंघई ने रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से बी.ए.एम.एस. करने के उपरांत आयुर्वेद में एम.डी. की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने एफ.आई.एस.सी.ए. करने के साथ ही बी.टी.भी किया। वे वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सा विशेषज्ञ के रूप में कार्य करते हुए समाजसेवा एवं साहित्य सृजन से भी जुड़े रहे। उनके परिवार में शिक्षा के प्रति पर्याप्त जागरूकता रही। उनकी पत्नी श्रीमती सुमन सिंघई ने बी.एस.सी,एम.ए., बी.एड. एम.एड करने के साथ ही आयुर्वेद का अध्ययन करते हुए आयुर्वेद रत्न की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने शिक्षण कार्य करने के साथ ही अपने पारिवारिक दायित्वों को भली- भांति निभाया।
                 ‘‘नीर’’ उपनाम से साहित्य सृजन करने वाले डॉ अनिल सिंघई ने जहां एक ओर परमपूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी के जीवन वृत्त पर आधारित काव्य ग्रंथ ‘‘महामुनि गाथा’’ का सुजन किया, वहीं उन्होंने असाध्य समझी जाने वाली व्याधियों की सफल चिकित्सा के क्षेत्र में ख्याति अजि्र्ात की। उनके पास चिकित्सा के लिए विदेशों से भी रोगी आते हैं। स्वास्थ्य शिविरों का निःशुल्क आयोजन करते रहते हैं। अनेक सामाजिक कार्यों से जुड़े रहे हैं जिनमें अब से लगभग 30 वर्ष पूर्व रायपुर में दहेज विरोधी आंदोलन का नेतृत्व किया। अनाथाश्रमों में जा कर आर्थिक सहायता की। पशुओं के लिए चारा एवं औषधियों की व्यवस्था के साथ ही पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करते रहते हैं।
                 अनिल सिंघई ‘नीर’ की पुस्तक ‘महामुनि गाथा’ आचार्यश्री विद्यासागर महाराज के जीवनवृत्त पर आधारित काव्यग्रंथ है जिसमें चौपाइयों के माध्यम से 250 पृष्ठ में आचार्यश्री के जीवनचरित को काव्यबद्ध किया गया है। इसमें आचार्यश्री के जरवन से जुड़ी रोचक घटनाओं का भी वर्णन है। दूसरी पुस्तक है ‘अर्द्धसत्य’। यह जीवन और आत्यात्मिक दर्शन पर आधारित खण्डकाव्य है। तीसरी पुस्तक है ‘मैं और मेरा अर्थ’। यह भी जीवन दर्शन एवं आत्यात्मिक विचारों पर केन्द्रित है। चौथी पुस्तक ‘अथक-पथिक’ भी आचार्य विद्यासागर जी के जीवन एवं दर्शन पर आधारित है। अनिल सिंघई ‘नीर’ को उनके साहित्यसृजन एवं सेवाकार्यों के लिए अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। बहुरुचि के धनी डॉ. ‘नीर’ शतरंज, वॉलीबाल, अभिनय एवं वाद-विवाद के क्षेत्र में भी पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। अनिल सिंघई ‘नीर’ की मूल विधा काव्य है। यद्यपि वे बताते हैं कि उनके कहानी संग्रह एवं उपन्यास भी हैं जो अभी अप्रकाशित हैं।

Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

               धर्म एवं जीवन दर्शन जब काव्य में उतरता है तो वह कवि से एक सम्यक दृष्टि की अभिलाषा रखता है, क्योंकि वही काव्य सार्थक एवं लोकोपयोगी होता है जो सम्पूर्ण समाज से संवाद कर सके। अनिल सिंघई ‘नीर’ के जीवनी आधारित काव्य में यह खूबी है कि आचार्य विद्यासागर जी पर केन्द्रित उनके दोहों को पढ़ कर आचार्यश्री के बारे में सरल शब्दों में सम्पूर्ण समाज जानकारी प्राप्त कर सकता है। बानगी देखिए -
विद्यागसार का हुआ, हर मन पर अधिकार।
देख-देख कर हो रहे, पुलकित नयन अपार।।
बड़े भाग मेरे भये, जनम मनुष का पाय।
‘विद्या’ जैसे संत के, दर्शन जो कर पाय।।
युग-युग की हमने सुनी, कथा अनेकों बार।
‘विद्या’ मुनिवर-सा नहीं, धर्म ज्ञान आधार।।
जन-जन का कल्याण हो, सोचें वो दिन-रात।
मानुष, पशु सब पर दया, देखो मुनि की बात।।
तप कर-कर के तप गए, कंचन से मुनिराज।
मोती-सी आभा लिए मुनियों के सरताज।।
धरम ज्ञान का कर रहे, गुरुवर बड़ा प्रचार।
मांस त्याग सब जन करो, मन में करो विचार।।

                अनिल सिंघई ‘नीर’ ने दर्शन एवं जीवनी आधारित काव्य के अतिरिक्त ग़ज़लें भी लिखते हैं, जिनमें प्रेम, मनुहार, उलाहना, विडम्बना आदि सभी प्रकार की सांसारिक भावनाएं परिलक्षित होती हैं। वर्तमान वातावरण अपराध और कदाचरण से कलुषित होता जा रहा है। ऐसे वातावरण को बदलने की इच्छा स्वतः जाग्रत होने लगती है। एक संवेदनशील कवि के अनुरुप वे अव्यवस्थाओं के विरुद्ध कलम चलाते हैं और लिखते हैं-
बात कुछ तो  यूं निकलना चाहिए
अब फ़िज़ा कुछ तो बदलना चाहिए
है घुटन सांसों में सबकी आजकल
कुछ हवा ताज़ा-सी चलना चाहिए
ये गगन  भी  तो  अंधेरों में छुपा
कोई  सूरज  तो  चमकना चाहिए
सामने मंज़िल दिखे  या न दिखे
इक कदम आगे निकलना चाहिए
ठान लो जो ‘नीर’ तो बदले जहां
दिल में जज़्बा तो उबलना चाहिए

               जो लोग अपनों के प्रति द्वेष भरी चेष्टाएं करते हैं, भ्रष्टाचार के द्वारा व्यवस्थाओं को खोला करने में जुटे रहते हैं, अपने देश से गद्दारी करते हैं और सभी के सुख-शांति को खतरे में डाल देते हैं, ऐसे लोगों को कवि ‘नीर’ ललकारते हुए कहते हैं कि -
क्या नाम लूं  मैं  तेरा  सितमगारों में
लोग तो और भी हैं मेरे  गुनहगारों में
मैं नहीं बिकता कुछ दाम लगाओ यारो
पर लोग मिल जाएंगे तुम्हें बाज़ारों में
आग दिल की न बुझी है न बुझेगी लोगो
मैं तो रोज ही जलता हूं अंगारों में
तू कभी लेना नहीं सब्र का इम्तहां मेरे
दिल में तूफां है, खेला हूं मंझधारों में
है मेरे दिल में बस इतनी सी ख़लिश लोगो
खुद्दारी कुछ तो हो अपने वतन के यारों में

Dr Anil Singhai "Neer"

           दुनियादारी के साथ ही अनिल सिंघई ‘नीर’ ग़ज़ल की उर्दू परंपरा के अनुरूप प्रेम आधारित ग़ज़लें भी कहते हैं। उनकी इन ग़ज़लों में भावों की कोमलता पढ़ने और सुनने वालों का ध्यान बरबस ही अपने ओर खींच लेती है। एक खूबसूरत मासूमियत उनकी प्रेम-ग़ज़लों देखी जा सकती है। एक उदाहरण देखिए-
वो बातें तुम्हारी सताती बहुत हैं
जो अक्सर मुझे याद आती बहुत हैं
उतर जाएं जो दिल के शीशे के अंदर
वो तस्वीर दिल को लुभाती बहुत है
न जीने ही देतीं, न मरने ही देतीं
ये उत्फ़त की बातें रुलाती बहुत हैं
कभी छेड़ देती हैं तारों को दिल के
ये तनहाईयां भी जलाती बहुत हैं
खयालों में आती हैं रुसवाइयां जो
वो रातों में हमको जगाती बहुत हैं

          जीवन में एक अवसर ऐसा भी आता है जब व्यष्टि और समष्टि एकाकार हो जाते हैं। पराए दुख और अपने दुख में अंतर नहीं रह जाता है। तब पराए दुख के बहाने अपने दुख को प्रकट करने की प्रवृत्ति जाग उठती है। अभिव्यक्ति की यह शैलीगत विशिष्टता ग़ज़ल विधा में बहुधा देखने को मिलती है। इसी शैली को अपनाते हुए कवि ‘नीर’ ने भी कुछ ग़ज़लें कही हैं। जैसे यह ग़ज़ल-
दरकार थी कि बस, हथेली को रंग सकें
जो पीसी  गई  हिना वो तो  बेकसूर थी
महकी जो कली वो तो माली ने तोड़ ली
मसली गई वही जो  गुलशन का नूर थी
दो घूंट भी न मिल सकी  मैखाने में मुझे
साकी तो खुद अपने  नशे में ही चूर थी
मेरी ग़ज़ल जो  उसने  मुझसे नहीं सुनी
मरने के बाद  वो  मेरे  मगर मशहूर थी
यूं सैंकड़ों थे ग़म  जो सीने में दफ़्न थे
चेहरे  पे  मेरे  छाई  लाली  जरूर थी

             साहित्य सृजन अपने सर्जक से निरंतरता, विविधता और समर्पण की मांग करता है। अनिल सिंघई ‘नीर’ अपने सृजन की निरंतरता एवं विविधता से सागर के साहित्य संपदा में जो वृद्धि कर रहे हैं, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 29.06.2019)
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