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Wednesday, April 7, 2021

ब्रह्मवादिनी | काव्य संग्रह | समीक्षा | गहोई दर्पण | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh


प्रिय ब्लॉग पाठकों,

    विगत दिनांक 05.04.2021 को ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र 'गहोई दर्पण' में मेरी लिखी "ब्रह्म वादिनी' पुस्तक की समीक्षा प्रकाशित हुई है।

हार्दिक आभार 'गहोई दर्पण' 🙏


मैं बताना चाहूंगी कि श्री गहोई वैश्य प्रगतिशील समाज द्वारा ग्वालियर| से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र की यह विशेषता है कि इसमें गहोई समाज के व्यक्तियों के कार्य कलापों , उनकी उपलब्धियों आदि के बारे में विस्तृत जानकारी प्रकाशित की जाती है। चूंकि "ब्रह्मवादिनी" काव्य संग्रह की लेखिका डॉ सरोज गुप्ता गहोई समाज की हैं अतः उनकी पुस्तक पर मेरे द्वारा लिखी समीक्षा को "गहोई दर्पण" ने भी मेरी अनुमति से प्रकाशित किया है।



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Saturday, January 2, 2021

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 15 | जगत मेला चलाचल का | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरे कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " में पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत पंद्रहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के वयोवृद्ध साहित्यकार निर्मलचंद "निर्मल" की पुस्तक "जगत मेला चलाचल का" का पुनर्पाठ।
हार्दिक आभार आचरण 🙏
     

सागर: साहित्य एवं चिंतन

       पुनर्पाठ: जगत मेला चलाचल का

                 - डॉ. वर्षा सिंह

                              

इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को यूं तो जिसका प्रकाशन वर्ष 2020 में ही हुआ है किन्तु इसे मैं कई बार पढ़ चुकी हूं और मुझे लगता है कि जो भी पाठक इस पुस्तक को पढ़ेगा वह पुस्तक के मूल मर्म की गहराई में उतरने और चिन्तन करने के लिए इसे बार-बार पढ़ेगा। ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ सागर नगर के कवि निर्मलचंद ‘‘निर्मल’’ का काव्य संग्रह हैं जिसमें रोजमर्रा के जीवन से जुड़े तथ्यों के साथ ही जगत की संरचना एवं उपादेयता की काव्यात्मक व्याख्या की गई है। इस संग्रह में संग्रहीत कुल 64 काव्य रचनाएं जीवन दर्शन और आध्यात्मिकता का सम्वेत स्वर प्रवाहित करती हैं। जैसा कि पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट है कि कवि इस बात का स्मरण कराना चाहता हैं कि संसार नश्वर है। इस संदर्भ में मुझे याद आता है प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पण्डित कुमार गंधर्व का गाया यह भजन -

जइसे पात गिरे तरुवर के, मिलना बहुत दुहेला

ना जानूं किधर गिरेगा, लग्या पवन का रेला

उड़ जाएगा हंस अकेला, जग दर्शन का मेला

    अर्थात पेड़ से गिरे पत्ते को हवा कहां ले जाएगी किसी को पता नहीं होता। ठीक उसी तरह मृत्यु के बाद प्राण कहां जाएंगे यह भी कोई नहीं जानता। जन्म और मृत्यु के बीच जीवन के जो अनुभव मिलते हैं वे सुख-दख दोनों का अनुभव कराते हैं। ये अनुभव उस मेले के समान हैं जो जब तक लगा रहता है तब तक कोलाहल से भरपूर रहता है और मेला उठते ही गहन नीरवता छा जाती है। फिर भी प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवनपर्यन्त किसी न किसी कर्म से जुड़े रहना पड़ता है। कर्म से अनुभव उपजता है और अनुभव मनुष्य को जीवन की दशाएं समझाता है। कवि निर्मल के इस संग्रह के नाम वाली रचना ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ की ये पंक्तियां जगत के प्रति कवि के चिन्तन को सामने रखती हैं-

एक पल जो दूसरे से प्राप्त कर अनुभव बढ़ा है

एक पल अवरुद्ध हो कर ही अचेतन सा पड़ा है

एक पल जो सृष्टि का निर्माण करता आ रहा है

एक पल विध्वंस के ही गीत अब तक गा रहा है

एक पल हम, एक पल तुम, एक पल पूरा जगत है

एक पल की ही धरोहर सृष्टि का जीवन सतत है


इसी कविता की अंतिम पंक्तियों में कवि ने कहा है-

कट गए वो था भरोसा अब भरोसा नहीं पल का

रोज लगता रोज उठता जगत मेला चलाचल का


संसार और जीवन को ले कर दार्शनिकों ने सदा विचार मंथन किया है। विशेष बात यह है कि बात जब धर्म-दर्शन की आती है तो संसार को ले कर सभी धर्मों में लगभग एक सा निष्कर्ष दिखाई देता है। जैन दर्शन में संसार जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म के अनवरत क्रम को कहते हैं। इसमें संसार को दुखों से भरा हुआ और त्याज्य माना गया है। हिन्दू धर्म में भागवत पुराण के स्कंध 10 पूर्वाद्ध, अध्याय 2 में संसार की व्याख्या वृक्ष से तुलना करते हुए की गई है। इसमें कहा गया है कि संसार एक सनातन वृक्ष है। जिसके दो फल हैं - सुख और दुख। तीन जड़ें हैं - सत्व, रज और तम। चार रस हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसके छः स्वभाव हैं - पैदा होना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना और नष्ट होना। इस प्रकार भागवत पुराण में संसार की विस्तृत व्याख्या की गई है। किन्तु मनुष्य इस सत्य को अर्थात् संसार की नश्वरता को भूल कर स्वार्थ में डूबा रहता है। यह स्वार्थ कभी परिवारों में दरार डालता है तो कभी समाज को आहत करता है ओर जब यही स्वार्थ विकराल रूप धारण कर लेता है तो देशों के बीच शत्रुता के भाव जगा देता है। जबकि इस प्रकार की सारी शत्रुताओं का अस्तित्व उसके लिए उसी समय तक रहता है जब तक वह जीवित है। इस तथ्य को कवि निर्मल ने अपनी इन पंक्तियों में बड़े ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया है -

संास की दीवार जिस दिन हट गई

दूरियां मुल्क-ए-अदम की पट गई

दिल समझने को नहीं राजी हुआ

जो इबारत मिट गई सो मिट गई


इसी रचना में कवि आगे लिखते हैं-

प्रश्न ‘‘निर्मल‘‘ आज तक सुलझा पहीं

मृत्यु अनगिन दर्शनों में बंट गई


वस्तुतः इस संसार और जीवन को समझना बहुत कठिन है। अनेक दार्शनिक और अनेक महापुरुष इसे समझने का प्रयास कर चुके हैं किन्तु आज भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित हैं। इसीलिए कवि निर्मल अपनी कविता ‘‘ऐसा गीत लिखा है तूने’’ में इस सृष्टि के रचेता को संबांधित करके लिखते हैं -

ऐसा गीत लिखा है तूने

बांचन बारे थके समझ भी हारी

भाषाएं हैं भिन्न, धरातल भिन्न

नए-नए आयाम, नई पहचान

आते-जाते छंद सभी मेहमान

वर्तमान के और विगत के

अर्थ अलग हैं

खुलती जितनी पर्तें

उनकी शर्त अलग है

कबिरा ने बांचा इसको

तुलसी ने बांचा

नव लय पर ले तम्बूरा

मीरा ने नाचा

महाप्रभु चैतन्य खो गए इसकी धुन में

बाल्मीकि ने बांचा इसको गुन-अवगुन में

कुछ ने अर्थ लगाए गहरे

कुछ ने समझी मायाचारी

ऐसा गीत लिखा है तूने

बांचन बारे थके समझ भी हारी


जब सांसारिकता उलझन भरी और भ्रमित करने वाली हो तो यह तय करना कठिन हो जाता है कि कौन सा मार्ग चलने लायक है। इस संग्रह की कविता ‘‘सीधा मार्ग’’ में कवि निर्मल लिखते हैं -

कौन से पथ पर चलूं कि मार्ग सीधा पा सकूं

भ्रमित हैं सारी दिशाएं वाकपटुता दिशाहीन

लालची शाखाओं को कैसे कहेंगे हम प्रवीण

शांति की दूकान में भी लोभ की पट्टी चढ़ी

क्या है पावन, क्या अपावन, समझ में दुविधा बढ़ी

शुद्धता के सूत्र कैसे किस तरह समझा सकूं

कौन से पथ पर चलें कि मार्ग सीधा पा सकूं



जब जीवन के उचित मार्ग का प्रश्न कवि ने उठाया तो उसका उत्तर भी उसने स्वयं ही दे दिया। ‘‘विश्व एक गांव’’ शीर्षक कविता में कवि निर्मल कहते हैं कि  -

कल्याण करने विश्व का आया मनुष्य है

शक्ति है कोई जिसने पठाया मनुष्य है

इस विश्व को तो एकता के सूत्र में बांधो

यह मानवीय दृष्टि भी लाया मनुष्य है

सम्हलो, सम्हल के अपने कदम आप बढ़ायें

निःस्वार्थ बने, नाति का उद्यान लगायें

कितने दिनों को आयें हैं रखना है इसका ध्यान

मानव समाज को यही संदेश पठायें


जब बात समाज और जीवन मार्ग की आती है तो साधना का मार्ग दो भागों में बंट जाता है - व्यष्टि साधना और समष्टि साधना। व्यष्टि साधना का तात्पर्य है व्यक्तिगत आध्यात्मिक उन्नति के लिए किए जाने वाले कर्म, जैसे- देवता का नाम जपना, आध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ना आदि। व्यष्टि साधना निज उत्थान के लिए होती है जबकि समष्टि साधना सम्पूर्ण समाज के आध्यात्मिक उत्थान के लिए की जाती है। जिसका एक बहु प्रचलित उदाहरण है सत्संग का आयोजन। एक साधक को व्यष्टि साधना और समष्टि साधना के मध्य सामंजस्य बनाए रखना चाहिए। ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जैसे यदि दीपक में रखा तेल व्यष्टि साधना है तो उसकी लौ समष्टि साधना है। यदि दीपक में तेल कम होगा तो प्रकाश भी कम समय के लिए मिलेगा। कहने का आशय यह है कि निज उत्थान से ही समाज उत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है। निजता की बात करते हुए कवि निर्मल ने अपनी निजत्व शीर्षक कविता में लिखा है -

आप स्वयं स्वामी हैं खुद के

इतना ध्यान रहे

खोजो विश्व स्वयं में ही तुम

प्रज्ञा सबला होगी

निर्मोही स्वभाव के भीतर

मन बन जाता जोगी

विचलित न होना पथ में

इसका भान रहे

जो जाग्रत है नाम उसी का

रहता है जग में

भटकन वाले भटक रहे हैं

अनगिनती मग में

ज्ञानपुंज तलवार दुधारी

समता म्यान रहे


कवि निर्मल चंद निर्मल के इस काव्य संग्रह ‘‘जगत मेला चलाचल का’’ में जीवन दर्शन से रची बसी काव्य रचनाएं हैं जिनमें संसार के अस्तित्व, मनुष्य के कर्म, निजता और कर्तव्य जैसे बिन्दुओं की व्याख्या की गई है। इन रचनाओं की विशेषता यह है कि ये उपदेशात्मक नहीं हैं वरन् परस्पर विचार विमर्श की भांति हैं। इसीलिए ये बोझिल नहीं हैं अपितु इन्हें बारम्बार पढ़ने और चिंतन करने की इच्छा जागृत होती है। इस दृष्टि से पुनर्पाठ योग्य यह काव्य संग्रह अपने महत्व को स्वयं स्थापित करता है। और, अंत में प्रस्तुत हैं कवि निर्मल की ये चार पंक्तियां जो चिंतन का आह्वान करती हैं -

तेरा नहीं होता कभी मेरा नहीं होता

संसार में स्थाई बसेरा नहीं होता

तेरी हवस की दौड़ तुझे क्या निभाएगी

उड़ने के बाद डाल पै डेरा नहीं होता


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( दैनिक, आचरण  दि.02.01.2021)
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Monday, August 10, 2020

सागर : साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 6 | गीतगीता | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

 

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 

               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत छठवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के कवि डॉ. मनीष झा के काव्य संग्रह  "गीतगीता" का पुनर्पाठ।

सागर : साहित्य एवं चिंतन

       पुनर्पाठ : ‘गीतगीता’ काव्य संग्रह

                                 -डॉ. वर्षा सिंह

        इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर के कवि डॉ. मनीष चंद्र झा की पुस्तक ‘गीतगीता’ को। श्रीमद्भगवद्गीता वर्तमान में धर्म से ज्यादा जीवन के प्रति अपने दार्शनिक दृष्टिकोण को लेकर भारत में ही नहीं विदेशों में भी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ है ही ऐसी कृति जिसने जीवन के बदलते मूल्यों में भी अपनी उपादेयता बनाए रखी है। इस कृति का दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। गद्य अनुवाद भी और पद्यानुवाद भी। अनुवादकार्य एक कठिन और चुनौती भरा कार्य है। अनुवादक के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वह मूल पुस्तक के मर्म को भली-भांति समझे और फिर उसे उस भाषालालित्य के साथ प्रस्तुत अनूदित करे कि मूल पुस्तक का मर्म जस का तस रहे। अनुवादक के लिए यह भी जरूरी हो जाता है कि वह चयनित पुस्तक के कलेवर के साथ आत्मसंबंध स्थापित करे ताकि उसे भली-भांति समझ सके। अनुवादक के लिए अनुवाद करते समय आत्मसंयम बनाए रखना भी जरूरी होता है। वह अनुवाद में अपनी ओर से कोई भी कथ्य नहीं मिला सकता है, अन्यथा मूलकृति की अनूदित सामग्री की मौलिकता पर असर पड़ता है। किसी भी पुस्तक का गद्यात्मक अनुवाद तो कठिन होता ही है, उस पर पद्यानुवाद का कार्य तो और अधिक धैर्य, ज्ञान, सतर्कता और समर्पण की मांग करता है। पद्यानुवाद करने वाले के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि अनुवादक को इतना प्रचुर शब्द ज्ञान हो कि वह मूल के मर्म को काव्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करने के लिए सही शब्द का चयन कर सके। जिससे मूल सामग्री अपने पूरे प्रभाव के साथ पद्यानुवाद में ढल सके। ‘गीतगीता’ ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ का पद्यानुवाद है। डॉ. मनीष चंद्र झा ने ‘गीता’ के श्लोकों को मुक्तछंद में नहीं बल्कि छंदबद्ध करते हुए दोहे और चैपाइयों में उतारा है। छंद अपने आप में विशेष श्रम मांगते हैं और यह श्रम डॉ. झा ने किया है। 

 

      महाभारत के 18 अध्यायों में से 1 भीष्म पर्व का हिस्सा है श्रीमद्भगवद्गीता । इसमें भी कुल 18 अध्याय हैं। 18 अध्यायों की कुल श्लोक संख्या 700 है। महाभारत का युद्ध आरम्भ होने के समय कुरुक्षेत्र में अर्जुन के नन्दिघोष नामक रथ पर सारथी के स्थान पर बैठ कर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ‘गीता’ का उपदेश किया था। इसी ‘गीता’ को संजय ने सुना और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया। गीता में श्रीकृष्ण ने 574, अर्जुन ने 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने 1 श्लोक कहा है। कुरुक्षेत्र में जब यह ज्ञान दिया गया तब तिथि एकादशी थी। श्रीमद्भगवद्गीता का पहला श्लोक है-  

 धृतराष्ट्र उवाच:-

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।। 

इसे डाॅ. मनीष चंद्र झा ने इन शब्दों में अनूदित किया है-

कहि राजा धृतराष्ट्र हे संजय कहो यथार्थ।

धर्म धरा कुरुक्षेत्र में, जिन ठाड़े समरार्थ।।

मेरे सुत औ पांडु के, सैन्य सहित सब वीर।

कौन जतन करि भांति के, देखि बताओ धीर।।

इस पर संजय अपनी दिव्यदृष्टि से कुरुक्षेत्र का विवरण देना आरम्भ करते हैं-

संजय कहि देखि भरि नैना, व्यूह खड़े पांडव की सेना।

द्रोण निकट दुर्योंधन जाई, राजा कहे वचन ऐहि नाई।।

         ऐसा सरल पद्यानुवाद किसी भी पाठक के मन-मस्तिष्क को प्रभावित कर के ही रहेगा। वस्तुतः कुरुक्षेत्र में जब कौरवों और पांडवों की सेना पहुंच गई तब महाराज धृतराष्ट्र ने संजय से पूछा, संजय मुझे अपनी दिव्य दृष्टि से ये बताओ कि कुरुक्षेत्र में क्या हो रहा है? संजय को भगवान कृष्ण ने दिव्य दृष्टि प्रदान की थी। यह दिव्य दृष्टि संजय को इसलिए दी थी कि वह धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र में हुई घटनाओ का पूरा वर्णन बता सके।

       ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का महत्व आज भी प्रसंगिक है। आज के उपभोक्तावादी युग में व्यक्ति कोई भी काम करने से पहले उसका अच्छा परिणाम पाने की कामना करने लगता है और इस चक्कर में वह अपना संयम गवां बैठता है। किन्तु जब अच्छा परिणाम नहीं मिलता है तब वह हताश हो कर गलत कदम उठाने लगता है। अतः आज के वातावरण में ‘गीता’ का यह सुप्रसिद्ध श्लोक मार्गदर्शक का काम करता है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि ।।

       इस श्लोक का सुंदर पद्यानुवाद डॉ. मनीष चंद्र झा ने इन शब्दों में किया है-

कहि प्रभु फल तजि कामना, कर्म करे निष्काम।

संयासी योगी वही, नहिं अक्रिय विश्राम।।

       इसी तरह वर्तमान जीवन में दिखावा इतना अधिक बढ़ गया है कि मन की शांति ही चली गई है। यह भी मिल जाए, वह भी मिल जाए की लालसा व्यक्ति को निरन्तर भटकाती रहती है। आज युवा पीढ़ी कर्मशील मनुष्य नहीं बल्कि ‘पैकेज’ में कैद दास बनती जा रही है। दुख की बात यह है कि उन्हें इस दासत्व के मार्ग में माता-पिता और अभिभावक ही धकेलते हैं। जबकि ऐसा करके वे अपने बुढ़ापे का सहारा भी खो बैठते हैं। इस संबंध में ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ में कहा गया है -

विहाय कामान्यः कर्वान्पुमांश्चरति निस्पृहः।

निर्ममो निरहंकार स शांति मधि गच्छति।।

       अर्थात् मन में किसी भी प्रकार की इच्छा व कामना को रखकर मनुष्य को शांति प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए शांति प्राप्त करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने मन से इच्छाओं को मिटाना होगा। तभी मनुष्य को शांति प्राप्त होगी। डॉ. मनीष चंद्र झा के शब्दों में इसी भाव को देखिए -

विषयन इन्द्रिन के संयोगा, जे आरम्भ सुधा सम भोगा।

अंत परंतु गरल सम जेकी, वह सुख राजस कहहि विवेकी।।

         आज ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ के महत्व को सभी स्वीकार रहे हैं। जीवन को सही दिशा देने वाली ‘‘श्रीमद्भगवद्गीता’’ का सरल भाषा में पद्यानुवाद कर डॉ. मनीष चंद्र झा ने अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने ‘गीता’ को सामान्य बोलचाल की भाषा में अनूदित कर सामान्य जन के लिए ‘गीता’ के मर्म को गेयता के साथ आसानी से समझने योग्य बना दिया है। इसीलिए ‘गीतगीता’ महत्वपूर्ण पुस्तक है और बार-बार पढ़े जाने योग्य है।

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( दैनिक, आचरण  दि.10.08.2020)

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Friday, July 10, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 2 | तमाई | काव्य संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
प्रिय ब्लॉग पाठकों,  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत दूसरी कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के लोकप्रिय कवि टीकाराम त्रिपाठी 'रुद्र' के काव्य संग्रह  "तमाई" का पुनर्पाठ।

सागर: साहित्य एवं चिंतन

      पुनर्पाठ- ‘तमाई’ काव्य संग्रह

                   -डॉ. वर्षा सिंह
                     
हमें अच्छी तरह पता है कि
यह समाजवादी अर्थव्यवस्था है
यदि यह सच नहीं है तो इस व्यवस्था को बदलने की जरूरत है
और इसके लिए हमें करनी होगी समाज की तमाई
तब ही हमारे जीवन के जोड़ में शायद शून्य से बड़ी होगी हासिलाई

        ये पंक्तियां हैं सागर नगर के वरिष्ठ कवि टीकाराम त्रिपाठी ‘रूद्र’ की तमाई शीर्षक कविता की। यही नाम है उनके काव्य संग्रह का जिसका पुनर्पाठ ज़रूरी है। दरअसल तमाई मात्र एक शब्द नहीं, वरन् एक पूरा उद्यम है अनुपयोगी और अवांछित को हटा कर नवीन की स्थापना करने का। इस शब्द से वे लोग भली-भांति परिचित हैं जो बुंदेलखण्ड के हैं और खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं। खेती-किसानी कर्मशील क्रिया है जिसमें अनेक शब्द विशेषण बन कर समाए हुए हैं जैसे बुआई, जुताई, रोपाई, निंदाई, गुड़ाई आदि..इसी तरह का एक शब्द और भी है तमाई। एक पूर्ण कार्मिक शब्द। एक ऐसा शब्द जो सृजन की नई कड़ी के लिए भूमिका बांधता है। यानी खेत जोतने से पहले खेत में से घास आदि निकालने की क्रिया है तमाई,  ताकि खरपतवार ज़मीन से दूर हो जाएं और खेत की तैयार ज़मीन को जोत कर उसमें बीजारोपण किया जा सके। खरपतवार के रहते खेत में दोबारा फसल नहीं उगाई जा सकती है। दोबारा नई फसल उगाना है तो पहले खरपतवार हटाने होंगे, ज़मीन की फिर से जोताई करनी होगी और ज़मीन तैयार करनी होगी नए सिरे से। बिलकुल किसी नए-नकोर खेत की तरह।
           जीवन में भी अनके ऐसी स्थितियां आती हैं जब हम खरपतवार जैसी भावनाओं से घिर जाते हैं। बुद्धि कुंद होने लगती है और हम कुछ नया सोचने में कठिनाई महसूस करने लगते हैं। ऐसे में आता है हताशा और निराशा का दौर। नई सुबह की भांति नयापन हमेशा नवीन विचारों का संचार करता है। यह चिंतन, मनन और आकलन का आग्रह करता है। जब हम कुछ नया सोचते हैं तो कुछ नया कर पाते हैं। पुरानी सड़ी-गली सोच और सड़ी-गली व्यवस्थाओं पर नवीनता के भवन खड़े नहीं किए जा सकते हैं। इसीलिए समय-समय पर पहले से चले आ रहे विचारों, व्यवस्थाओं और मान्यताओं की तमाई जरूरी है। कवि टीकाराम त्रिपाठी जब तमाई शब्द का प्रयोग करते हैं तो ठीक इसी संदर्भ में। वे बदल देना चाहते हैं उन सारी व्यवस्थाओं को जो समाज, विचार और व्यवहार के लिए अनुकूल नहीं हैं।
           तमाई के लिए भी जरूरी है पड़ताल। यह जांचे-समझे बिना कि तमाई की स्थिति आ गई है या नहीं, तमाई नहीं की जा सकती है। ‘पड़ताल’ शीर्षक अपनी कविता में कवि रुद्र लिखते हैं-
पड़ताल जरूरी है
जीवन से सभी पक्षों की
उन्नति और अवनति के
ऊबड़-खाबड़, तिकड़मी शिखरों की/कक्षों की
उन्नत है या नत है
विनयावनत है या उन्नतिविगत है?

      सच है, पड़ताल के बिना कुछ भी निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। जैसे-फर्श पर चिकनी-चमकदार टाईल्स लगवाने, दीवारों की रंगाई-पुताई करवाने, फर्नीचर बदलवाने से यह तय नहीं किया जा सकता है कि उस घर में रहने वाले व्यक्ति का स्वभाव भी निश्चछल, निष्कपट और निरापद हो गया है। वह तो उससे चर्चा-परिचर्चा करने पर ही पता चलता है कि वह व्यक्ति दिखावे मात्र में बदला है अथवा सचमुच उसमें परिवर्तन आ गया है। मल्टीनेशनल कंपनियों के चमचमाते दफ़्तरों के वातानुकूलित कक्षों में श्रम का जिस तरह शोषण होता है, वह उन कक्षों में पहुंच कर ही अनुभव किया जा सकता है। अनुभव पड़ताल के मार्ग से चल कर लक्ष्य तक पहुंचने की प्रक्रिया ही तो है। भौतिक वस्तुओं में किए गए परिवर्तन तब अर्थहीन हो जाते हैं जब व्यक्ति की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं होता, वह जस की तस बनी रहती है।

तमाई, काव्य संग्रह @ साहित्य वर्षा

          तमाई के साथ ही एक और प्रक्रिया जुड़ी होती है, मानों दो प्रक्रियासूचक शब्द एक ही कोष्ठक में लिख दिए गए हों। तो दूसरा शब्द है नरवाई यानी खरपतवार। नरवाई जलाकर नष्ट करना आमबात है। भले ही हर आम बात अच्छी नहीं होती। जैसे नरवाई का जलाया जाना भीषण प्रदूषण का कारण बनता है। नरवाई का जलाया जाना देश की राजधानी का भी दम घोंटने का माद्दा रखता है लेकिन बुराई यह कि दम घुटता है आम आदमी का जिसमें बहुसंख्यक निम्नवर्ग और मध्यमवर्ग होता है। एक अनुभव, एक पड़ताल और फिर निष्कर्ष कि हर आग की जलनशील प्रकृति न तो जलने वाले की पीड़ा समझ सकती है और न उसके धुंए से घुटने वाले दम की कसमसाहट महसूस कर सकती है। ‘तमाई’ काव्य संग्रह में एक कविता है ‘आग’।
आग सुलगाना बहुत आसान साथी
बुझाना लेकिन नहीं आसान होता
खुद बा खुद लगती नहीं वह अब कहीं भी
मित्र, लगवाई सदा जाती रही है
शत्रुओं का नाम ले कर सगों पर ही
घटा युद्धों की सदा छाती रही है

       सन् 2010 में ‘तमाई’ का प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था। लगभग एक दशक बीतने पर भी यह काव्य संग्रह प्रासंगिक है। यूं भी समाज से सरोकारित साहित्य कभी अप्रासंगिक नहीं होता है अपितु बार-बार पढ़ने और समझने योग्य होता है।

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तमाई, पुनर्पाठ @ साहित्य वर्षा


( दैनिक, आचरण  दि. 10.07.2020)
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