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Tuesday, March 16, 2021

समृद्ध सोच की गवाही देती हैं ऐतिहासिक धरोहर - डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | पुस्तक लोकार्पण समारोह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों,  दिनांक 14.03.2021 को मुझे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह को विशिष्ट अतिथि के रूप में एक पुस्तक का  लोकार्पण करते हुए इस बात की प्रसन्नता हुई कि यह पुस्तक जिसका नाम है "ब्रह्मवादिनी", भारतीय संस्कृति और उसके मूल्य पर आधारित विचारों से युक्त उन स्त्रियों के बारे में है जिन्होंने भारतीय संस्कृति को आकार देने में अपनी महती भूमिका निभाई है। इस पुस्तक की विदुषी लेखिका हैं डॉ सरोज गुप्ता।
इस लोकार्पण कार्यक्रम की अध्यक्षता की मेरी छोटी बहन डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने, मुख्य अतिथि थीं 'आचरण' समाचार पत्र की प्रबंध संपादक श्रीमती निधि जैन, तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में मेरे साथ थीं नगर की प्रतिष्ठित गायनोलॉजिस्ट डॉ (श्रीमती) ज्योति चौहान। कांची रेस्टोरेंट में आयोजित इस आयोजन में भारतीय शिक्षण मंडल सागर की सभी बहनें उपस्थित थीं।
     वैदिक काल स्त्रियों का मान-सम्मान पुरुषों से कम नहीं था। अनसूया, अहल्या, अरुन्धती, मदालसा आदि अगणित स्त्रियाँ वेदशास्त्रों में पारंगत थीं। अनसूया, अहल्या, अरुन्धती, मदालसा आदि अगणित स्त्रियाँ वेदशास्त्रों में पारंगत थीं। स्त्रियां भी पुरुषों की तरह वेदाध्ययन व यज्ञ करती और कराती थीं। वे यज्ञ- विद्या और ब्रह्म- विद्या में पारंगत थीं।
"तैत्तिरीय ब्राह्मण’’ में सोम द्वारा ‘सीता- सावित्री’ ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तारपूर्वक आता है—

तं त्रयो वेदा अन्वसृज्यन्त। 
अथ ह सीता सावित्री। 
सोमँ राजानं चकमे। 
तस्या उ ह त्रीन् वेदान् प्रददौ। 
इस मन्त्र में बताया गया है कि किस प्रकार सोम ने सीता- सावित्री को तीन वेद दिये।
ऋग्वेद 10/ 85 में सम्पूर्ण मन्त्रों की ऋषिका ‘सूर्या- सावित्री’ है। ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है—

ऋषिर्दर्शनात्। स्तोमान् ददर्शेति। ऋषयो मन्त्रद्रष्टर:।
अर्थात् मन्त्रों का द्रष्टा उनके रहस्यों को समझकर प्रचार करने वाला ऋषि होता है। 
ऋषियों के समतुल्य ऋषिकाओं को भी विद्याअध्ययन, वेदों पर शास्त्रार्थ आदि का अधिकार था। इनमें ऋषिका लोपामुद्रा, ऋषिका विश्ववारा, ऋषिका अपाला, ऋषिका शाश्वती, ऋषिका रोमशा, ऋषिका श्री, ऋषिका लाक्षा, ऋषिका सार्पराज्ञी प्रमुख हैं। वागाम्भृणी, यमी वैवश्वती, सरमा, सूर्यासावित्री, श्रृद्धा, मेधा, दक्षिणा आदि ने आरण्यक कुटियों में गृहस्थ जीवन जीते हुए ब्रह्म से साक्षात्कार किया। हमारा अतीत बहुत समृद्ध है और आज वह हमारा ज्ञान पश्चिम में पुष्पित- पल्लवित हो रहा है जबकि हम पश्चिम का अंधानुकरण कर रहे हैं।    


    इस समारोह में मैंने यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ वर्षा सिंह ने महिलाओं की सहृदयता एवं सशक्तिकरण को अपना सृजनात्मक स्वर दे कर ग़ज़ल प्रस्तुत की - 

इसमें दुर्गा, इसी में मीरा भी
आधी दुनिया का आब है औरत

इसको पढ़ना ज़रा आहिस्ता से
प्यार की इक किताब है औरत

डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने अध्यक्षीय उद्बोधन में अनेक उदाहरणों के साथ कहा कि प्राचीन भारत में भारतीय जनमानस की सोच संकुचित नहीं थी। प्रागैतिहासिक काल के भित्तिचित्र इस बात के साक्ष्य हैं कि उस समय भी स्त्रियां पुरुषों की तरह आखेट में, आयुध संचालन में बढ़चढ़कर हिस्सा लेती थीं। डॉ (सुश्री) शरद सिंह ने ऋषि याज्ञवल्क्य और गार्गी के मध्य हुए शास्त्रार्थ की कथा सुनाई। साथ ही कहा कि वैदिक काल में धर्म, ज्योतिष, ज्यामिति, पाककला, नृत्य, संगीत आदि चौंसठ कलाओं में वे निपुण हुआ करती थीं। वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी स्त्रियों का योगदान रहा है। वैदिक काल से लेकर मुगलकाल के पहले तक वैचारिक रूप से महिलाओं को पूर्ण स्वतंत्रता थी। ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के समय के देश की समृद्धि, उत्कृष्ट सोच व खुले विचारों की गवाही देश की ऐतिहासिक धरोहरें, मूर्तिकला, चित्रकला, स्थापत्य कला के केन्द्र खजुराहो, कोणार्क जैसे मंदिर देते हैं। जहां जिस मंदिर के गर्भगृह में शिव, विष्णु, सूर्य आदि देवप्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं, वहीं उसी मंदिर की भित्तियों पर मिथुन मूर्तियों से ले कर जीवन के प्रत्येक सोपान को, रोजाना के कार्यकलाप को, उस समय के देशकाल को प्रदर्शित करती सुंदर मूर्तियां स्थापित हैं। यह तत्कालीन भारतीय जनमानस की उदात्तता अर्थात् ब्रॉडमाइंड का साक्ष्य है। आक्रांताओं के कारण आई पर्दा प्रथा , सती प्रथा, बालविवाह जैसी कुरीतियों का
का अनेक समाज उद्धारकों ने विरोध कर स्त्री को इनसे मुक्त कराया। वर्तमान समय की नारी हर क्षेत्र में आपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज़ करा  रही है। वह ब्रह्मवादिनी की ही तरह सम्मान पा रही है। ब्रह्मवादिनी काव्यसंग्रह का उद्देश्य वैदिक संस्कृति के ज्ञान का प्रसारण करना है। 
यहां प्रस्तुत तस्वीरें और समाचार उसी लोकार्पण समारोह की हैं -

 

Tuesday, December 1, 2020

जन्मदिवसस्य अभिनन्दनानि | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों,
    विगत 29 नवम्बर को मेरी अनुजा डॉ. (सुश्री) शरद सिंह का जन्मदिन था।
    उन्हें जन्मदिवसस्य अभिनन्दनानि अर्थात् जन्मदिन की बधाईयां ❤️🌹❤️

       29 नवम्बर 1963 को पन्ना, मध्यप्रदेश में जन्मीं "खजुराहो की मूर्तिकला" विषय में पीएचडी , राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित साहित्यकार, कथालेखिका, उपन्यासकार, स्तम्भकार एवं  कवयित्री और मेरी अनुजा डॉ शरद सिंह वर्तमान में मध्यप्रदेश के सागर नगर में निवास करते हुए स्वतंत्र लेखन के कार्य के साथ नई दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका "सामयिक सरस्वती" में कार्यकारी सम्पादक का दायित्व निभा रहीं हैं एवं पत्र-पत्रिकाओं सहित सोशल मीडिया पर वे लगातार अपनी सक्रियता बनाए हुए हैं। वे मानती हैं कि अधिकारों का ज्ञान और साहस ही स्त्रियों को शोषण-मुक्त जीवन दे सकता है।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के पं. बालकृष्ण शर्मा "नवीन" पुरस्कार सहित राज्य स्तरीय रामेश्वर गुरू पत्रकारिता सम्मान पुरस्कार,  प्रादेशिक वागीश्वरी सम्मान, नई धारा कथा सम्मान, कस्तूरी देवी चतुर्वेदी लोकभाषा सम्मान, रामानंद तिवारी स्मृति प्रतिष्ठा सम्मान, विजय वर्मा कथा सम्मान आदि अनेक सम्मानों से सम्मानित वरिष्ठ लेखिका डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह द्वारा  लिखित विभिन्न विषयों पर लगभग पचास से अधिक पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने शोषित, पीड़ित स्त्रियों के पक्ष में अपने लेखन के द्वारा हमेशा आवाज़ उठाई है।  बुन्देलखण्ड की महिला बीड़ी श्रमिकों पर केन्द्रित ‘पत्तों में कैद औरतें’ तथा स्त्री विमर्श पुस्तक ‘औरत तीन तस्वीरें’ मनोरमा ईयर बुक में शामिल की जा चुकी हैं। बेड़िया स्त्रियों पर केन्द्रित ‘पिछले पन्ने की औरतें’ तथा लिव इन रिलेशन पर 'कस्बाई सिमोन' नामक उनके उपन्यासों को राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तर के अनेक सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनका एक और उपन्यास "पचकौड़ी" राजनैतिक और पत्रकारिता जगत की पर्तों का बारीकी से विश्लेषण करने वाला पठनीय एवं लोकप्रिय उपन्यास है। हाल ही में डॉ. शरद सिंह का नया उपन्यास "शिखण्डी… स्त्री देह से परे" प्रकाशित हुआ है जो महाभारत के एक प्रमुख पात्र शिखण्डी के जीवन को नए नज़रिए से व्याख्यायित करता है। 
इसके साथ ही "डॉ. अम्बेडकर का स्त्री विमर्श", "ग़दर की चिंगारियां" एवं "आधी दुनिया, पूरी धूप" उनकी महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं। उनका बहुचर्चित बुंदेली कथासंग्रह "राख तरे के अंगरा" अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत हो चुका है। शरद के 8 कहानी संग्रह, आदिवासी जीवन पर 10 पुस्तकें, साक्षरता विषयक 10 पुस्तकें, 2 नाटक संग्रह, विज्ञान पर 2 पुस्तकें, धर्म दर्शन पर 3 पुस्तकें, जीवनी श्रृंखला की 6 पुस्तकें, 3 काव्य संग्रह, 4 संपादित पुस्तकें जिनमें "थर्ड जेंडर विमर्श" बहुचर्चित है, प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी कहानियों का पंजाबी, उर्दू, उड़िया, मराठी एवं मलयालम में अनुवाद हो चुका है। साथ ही शरद सिंह के कथासाहित्य पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध हो चुके हैं।
सुश्री शरद ने मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के सागर ज़िले में रह कर स्वतंत्र महिला लेखक, समीक्षक, संपादक, स्तम्भकार, समाजसेवी, एक्टिविस्ट, व्हिसिल ब्लोवर, ब्लागर, शार्ट फिल्मनिर्माता, फोटोग्राफर, आर्टिस्ट के रूप में अपनी पहचान बनाई है। पिछले 10 वर्षों से वे नियमित रूप से ब्लॉग लेखन कर रही हैं। उनके ब्लॉग हैं -

1-    शरदाक्षरा                          http://sharadakshara.blogspot.com
2-    समकालीन कथायात्रा             http://samkalinkathayatra.blogspot.com
3-    ए मिरर ऑफ इंडियन हिस्ट्री  http://amirrorofindianhistory.blogspot.com
4-    शरद सिंह                         http://misssharadsingh.blogspot.com
5-    शरद सिंह पेंटिंग ब्लॉग   http://sharadsinghpaintingsblog.blogspot.in/
6-    बुक्स ऑफ डॉ मिस शरद सिंह http://drsharadsingh.blogspot.com/
7-    सागर प्लस        https://sagarplus.blogspot.com/
8-     क्लिक ज़िक   https://clickzick.blogspot.com/

  इसके साथ ही सोशलमीडिया के अन्य माध्यम फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम आदि पर भी वे सक्रिय हैं।
उनके फेसबुक की लिंक निम्नलिखित है - 

इंस्टाग्राम की लिंक इस प्रकार है -

शरद सागर से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "सागर दिनकर" में अपने नियमित कॉलम "चर्चा प्लस" में अनेक समसामयिक मुद्दों पर विश्लेषणात्मक लेखन - प्रकाशन के माध्यम से प्रबुद्ध पाठकों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए हैं। इससे पूर्व डॉ. शरद सिंह सागर से ही प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में अनेक वर्षों तक "बतकाव" शीर्षक का नियमित कॉलम तथा छतरपुर, म.प्र. से प्रकाशित होने वाले दैनिक समाचार पत्र "दैनिक बुंदेली मंच" में "शून्यकाल" शीर्षक स्तम्भ का लेखन कर चुकी हैं। 
डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को उनके जन्मदिन के अवसर पर सागर नगर के समस्त प्रतिष्ठित नागरिकों सहित देश - विदेश के अनेक साहित्यकारों, प्रबुद्धजन एवं शुभचिंतकों ने उनके उज्जवल भविष्य हेतु अपनी शुभकामनाएं दीं। उन सभी के प्रति कृतज्ञतापूर्वक मैं आभार ज्ञापित करती हूं।

प्रिय बहन शरद को मेरी भी अनंत हार्दिक शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद 🌹🙏🌹
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Thursday, August 6, 2020

शिखण्डी : स्त्री देह से परे | उपन्यास | डॉ. (सुश्री) शरद सिंह | चर्चा | डॉ. वर्षा सिंह

उसका अस्तित्व कैसा था ?
वह स्त्री था, पुरुष था अथवा तृतीय लिंगी ?
एक व्यक्ति से जुड़े अनेक प्रश्न  क्योंकि उसका अस्तित्व सामान्य नहीं था । वह शक्तिपुंज पात्र ‘महाभारत’ महाकाव्य का सबसे दृढ़ निश्चयी चरित्र है, जो अपने जीवन की प्रत्येक परत के साथ न केवल चैंकाता है वरन् अपनी ओर चुम्बकीय ढंग से आकर्षित भी करता है । वह पात्र है शिखण्डी, जिसका अस्तित्व भ्रान्तियों के संजाल में उलझा हुआ है । वहीं यह इतना प्रभावशाली पात्र है कि महर्षि वेदव्यास ने ‘महाभारत’ के सबसे इस्पाती पात्र भीष्म से ‘अम्बोपाख्यान’ कहलाया है, जो शिखण्डी की ही कथा है, जबकि भीष्म और शिखण्डी के मध्य वैमनस्यता का नाता रहा ।
इस अत्यन्त रोचक पात्र की जीवनगाथा अंतस को झकझोरने में सक्षम है । अत: शिखण्डी के सम्पूर्ण जीवन को नवीन दृष्टिकोण से जांचने, परखने और प्रस्तुत करने की आवश्यकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता । जब शिखण्डी के जीवन की परतें खुलती हैं तो हमारे प्राचीन भारत में सुविकसित ज्ञान के उस पक्ष की भी परतेंं खुलकर सामने आने लगती हैं जहां शल्य चिकित्सा द्वारा लिंग परिवर्तन किए जाने के तथ्य उजागर होते हैं । इन तथ्यों का ही प्रतिफलन है यह उपन्यास ‘शिखण्डी : स्त्री देह से परे’ ।
       सागर मध्यप्रदेश में निवासरत डॉ. (सुश्री) शरद सिंह राष्ट्रीय स्तर की एक प्रतिष्ठित उपन्यासकार होने के साथ ही भारतीय इतिहास एवं परम्पराओं की अध्येता भी हैं । उनका ताज़ा उपन्यास "शिखण्डी : स्त्री देह से परे" इन दिनों चर्चा में है। अपने इस उपन्यास में उन्होंने ‘महाभारत’ के इस विशिष्ट पात्र शिखण्डी को, उसके जीवन की व्यापकता को, चमत्कृत कर देने वाले तथ्यों के साथ जिस रोचक ढंग से उजागर किया है, वह इस उपन्यास को अति विशिष्ट बना देता है ।
        "खजुराहो की मूर्तिकला” विषय में पीएचडी, सागर की प्रतिष्ठित साहित्यकार, कथा लेखिका, उपन्यासकार, स्तम्भकार एवं कवियत्री डाॅ. शरदसिंह वर्तमान में  स्वतंत्र लेखन कर रही है। इसके अलावा नई दिल्ली से प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका ‘सामयिक सरस्वती’ में कार्यकारी सम्पादक का दायित्व भी निर्वाह कर रही है।सुुश्री शरद सिंह द्वारा लिखित विभिन्न विषयों पर करीब 50 से अधिक पुस्तकें छप चुकी है। इन्होंने शोषित, पीड़ित स्त्रियों के पक्ष में अपने लेखन के द्वारा आवाज उठाई है।

       डॉ. शरद की बुंदेलखंड की महिला बीड़ी श्रमिकों पर केंद्रित ‘पत्तों में कैद औरतें’, स्त्री विमर्श पुस्तक ‘औरत तीन तस्वीरें’, राष्ट्रवादी व्यक्तित्वों पर 6 महापुरुषों की जीवनियां एवं 'थर्ड जेंडर विमर्श' पुस्तकें मनोरमा ईयर बुक में शामिल की जा चुकी है। बेड़िया स्त्रियों पर केंद्रित ‘पिछले पन्ने की औरतें' तथा लिव इन रिलेशन पर ‘कस्बाई सिमोन’ नामक इनके उपन्यासों को अनेक सम्मान मिल चुके हैं। इनका एक और उपन्यास ‘पचकौड़ी’ राजनीतिक और पत्रकारिता जगत की परतों को बारिकी से विश्लेषित करता है।
 उपन्यास ‘शिखण्डी : स्त्री देह से परे’ पर प्रबुद्ध पाठकों की कुछ प्रतिक्रियाएं देखें -
सामयिक प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित यह उपन्यास "शिखण्डी..." अमेजन पर भी उपलब्ध है...


इसके साथ ही इस उपन्यास "शिखण्डी : स्त्री देह से परे" को निम्नलिखित लिंक्स पर जा कर उपलब्ध किया जा सकता है -

Saturday, March 28, 2020

लॉकडाउन में कलम और मुखर, क्या खूब लिख रहे हैं साहित्यकार - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     दैनिक भास्कर ने आज 28 मार्च 2020 के अंक में प्रकाशित किया है कि सागर शहर के साहित्यकारों द्वारा कोरोना संदर्भित कौन सी कविताएं लिखी जा रही हैं... भास्कर ने प्रश्न उठाया है कि.... "अपने शहर और देश के साथ कलम के सिपाही भी इन दिनों लॉकडाउन में हैं। लेकिन क्या उनकी कलम भी लॉक हो गई है? "

   भास्कर ने ही फिर उत्तर देते हुए लिखा है  .... "जी, नहीं।भास्कर ने जब अभिव्यक्ति के इन अधिष्ठाताओं से बात की तो पाया कि आयोजन थमे हैं, कलम तो और भी ज्यादा मुखर हो उठी है। हां , विषय जरूर बदले हुए हैं। साहित्यकार अपने समय को जीता है और उसे ही अभिव्यक्त भी करता है। यही इस समय देखने को मिल रहा है। कोरोना महामारी ने दुनिया को जिस तरह से हलाकान कर रखा है , कवि-साहित्यकारों ने उसे पूरी तीव्रता के साथ अनुभूत किया है और शब्द- शक्ति का लगातार प्रहार भी वे इसेक खिलाफ कर रहे हैं। अलग-अलग रचनाओं में कहीं साहस नजर आता है, कहीं समझाइश तो कहीं भरोसा कि इस संकट से हम जल्द ही उभर जाएंगे।
महिला लेखिकाओं और कवयित्रियों के तेवर भी भी तीखे हैं। चर्चित लेखिका शरद सिंह लिखती हैं-

हो वक़्त बुरा कितना, आख़िर तो बदलता है।
दीवार कोरोना की, जल्दी है इसे ढहना।


वरिष्ठ गजलकार डॉ. वर्षा सिंह इसे एकता के रंग से जोड़तीं हैं और उसी में इसका हल देखतीं हैं-

कोरोना समझे नहीं, रंग, धरम ना जात।
मिल कर लें संकल्प हम, देनी होगी मात।।"



Tuesday, February 11, 2020

एक मुलाकात शायर डॉ. मधुर नज़्मी से - डॉ. वर्षा सिंह


शे'र जब उभरते हैं सन्दली ख़यालों से
शाइरी महकती है तब नये सवालों से

अब अदब के गुलशन में फूल कम ही खिलते हैं
ज़ह्र फैलते हैं अब बे-अदब रिसालों में

छा रहा है सूरज पर अब्र का नया टुकड़ा
दूर कर न दे हमको तीरगी उजालों से

बेपरों की परवाज़ें बे-असर ही ठहरेंगी
पस्तियाँ ही आएँगी आपकी उछालों से

नफ़रतों का क़द शायद छोटा होने वाला है
लोग हो गए वाक़िफ़ रहबरों की चालों से

क्यों चला नहीं जाता, पाँव रुक गये हैं क्यों
हर जवाब मिल जाता पूछते जो छालों से

ऐ 'मधुर' अब उम्मीदें ख़ाक हो गयीं सारी
वक़्त का मछेरा ही घिर गया है जालों से

- मधुर नज़्मी

 विगत जनवरी 2020 में देश के प्रख्यात शायर मधुर नज़्मी जी का मोहम्मदाबाद गोहना, मऊ (उ.प्र.) से मेरे शहर सागर आए।  इस दौरान मैंने उन्हें अपने  पांचवें ग़ज़ल संग्रह "दिल बंजारा" की प्रति भेंट की तथा मैंने और मेरी बहन डॉ शरद सिंह ने उनसे साहित्यिक चर्चाएं कीं। उसी तारतम्य में मैंने उनका एक अनौपचारिक साक्षात्कार लिया जिसका मुख्य अंश यहां प्रस्तुत है -
*डॉ. वर्षा सिंह -* आप इतने बड़े ग़ज़लगो हैं, आप ग़ज़ल के वर्तमान परिदृश्य को कैसा पाते हैं?
*डॉ. मधुर नज़्मी-* ग़ज़ल का वर्तमान परिदृश्य चिन्ताजनक है क्योंकि सोशल मीडिया पर कथित शायरों की बाढ़ आ जाने से ग़ज़ल की गम्भीरता नष्ट हो रही है। आप लोगों जैसे शायरों की ग़ज़ल के प्रति प्रतिबद्धता यह भरोसा दिलाती है कि इस विधा को गम्भीरता से लेने वाले लोग अभी शेष हैं और ग़ज़ल की श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प हैं।

*डॉ. वर्षा सिंह -* अक्सर यह सुनने में आता है कि साहित्य के प्रति अब लोगों मैं पहले जैसी रुचि नहीं रही। खुले मंच चुटकुलेबाजी का अड्डा बनते जा रहे हैं, आपका इस बारे में क्या कहना है?
*डॉ. मधुर नज़्मी-* आपका कहना सच है कि मंचों का स्तर अब पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन मैं निराश नहीं हूं। साहित्य में बहुत ताकत होती है यदि  ईमानदारी से अपनाया जाए तो साहित्य सारी दुनिया से जोड़ने की ताकत रखता है। मैं मुफ़लिसी में पैदा हुआ लेकिन मेरी शायरी ने दस देशों में जा कर मुशायरे पढ़ने का मौका दिया।
*डॉ. वर्षा सिंह -* उर्दू ग़ज़ल और हिन्दी ग़ज़ल, इन दो भाषाई नामों पर भी अक्सर बहसें होती रहती हैं। क्या आप इस बंटवारे को उचित मानते हैं?
*डॉ. मधुर नज़्मी-* मैं ग़ज़ल विधा के संदर्भ में भाषाई विवाद को तरज़ीह नहीं देता हूं। ग़ज़ल तो वह है जो दिल से कही जाए और सुनने वाले के दिल को छू जाए।
*डॉ. वर्षा सिंह -* सागर आ कर आपको कैसा महसूस हो रहा है?
*डॉ. मधुर नज़्मी-* जी, सागर आ कर मुझे बहुत अच्छा लगा। सागर को मैं त्रिलोचन शास्त्री जी के सागर प्रवास के कारण जानता था, फिर आपके नाम से इसे जाना। यहां के लोग बहुत मिलनसार हैं।
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