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Tuesday, September 24, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 64.... गजल के प्रति प्रतिबद्ध कवि अरुण दुबे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

                  स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि अरुण दुबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

 सागर : साहित्य एवं चिंतन

     गजल के प्रति प्रतिबद्ध कवि अरुण दुबे
                          - डॉ. वर्षा सिंह
                             
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नाम : अरुण दुबे
जन्म : 20 मार्च 1955
जन्म स्थान : ग्राम ढाना, सागर, मध्य प्रदेश
माता-पिता : स्व. श्रीमती नत्थीबाई, स्व. पं. केशव प्रसाद दुबे
शिक्षा  : एमएससी - प्राणिशास्त्र
लेखन विधा : पद्य
प्रकाशित पुस्तक : ‘‘तुम्हारे लिए’’ ग़ज़ल संग्रह
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            काव्य मन की भावनाओं को मुखर करने का सशक्त माध्यम होता है। प्राचीन ग्रंथों में काव्य को एक कला माना गया है। जिस प्रकार प्रत्येक कला सतत साधना की मांग करती है उसी प्रकार काव्य भी कवि से साधना की अपेक्षा रखता है। जो रचनाकार साहित्य की अपनी मनचाही विधा में सतत् प्रयत्नशील रहते हैं तथा रचनाकर्म में संलग्न रहते हैं, वे श्रेष्ठ रचनाओं की सर्जना करते हैं। सर्जना भाषा को जोड़ने और उसे नया रूप देने का भी कार्य करती है जिसका सुन्दर उदाहरण है हिन्दी अथवा खड़ी बोली में लिखी जाने वाली गजल। यूं तो सागर नगर में अनेक गजलकार हैं किन्तु उनमें गजल के प्रति निष्ठा रखने वाले अथवा दूसरे शब्दों में कहा जाए तो गजल को साधने वाले कम ही हैं। गजल के क्षेत्र में सतत् सृजनशील एक नाम लिया जा सकता है - गजलकार अरुण दुबे का।
             20 मार्च 1955 को ग्राम ढाना, सागर में पं. केशव प्रसाद दुबे एवं श्रीमती नत्थीबाई के पुत्र के रूप में जन्में अरुण दुबे को पठन- पाठन एवं अध्यात्म में रुचि अपने माता-पिता से संस्कारों के रूप में मिली। प्राणिशास्त्र में एम.एससी. करने वाले अरुण दुबे का वर्ष 1976-77 में मध्य प्रदेश पुलिस में उप निरीक्षक के पद पर चयन हो गया। उप निरीक्षक के रूप में गुना, भिंड, मुरैना आदि स्थानों में कार्य करते हुए वर्ष 1988 में निरीक्षक के रूप में पदोन्नत होकर धार, दमोह, बालाघाट, छतरपुर, रीवा, विदिशा, सीधी में तैनात रहे। वर्ष 2008 में उप पुलिस अधीक्षक के पद पर पदोन्नत हो कर 2015 में सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान में वे सिविल लाइन, सागर में निज निवास में रहते हुए काव्य साधना कर रहे हैं। अनेक साहित्यिक गतिविधियों में भी उनकी उल्लेखनीय उपस्थिति रहती है।
            उनका प्रथम ग़ज़ल संग्रह वर्ष 2013 में प्रकाशित हुआ था जिसका नाम है -‘‘तुम्हारे लिए’’। इस गजल संग्रह का विमोचन विख्यात शायर अखलाक सागरी के कर कमलों से हुआ था। उनका  दूसरा ग़ज़ल संग्रह ‘‘चले आइए’’ शीघ्र ही प्रकाशित होने वाला है। विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा उन्हें अनेक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका  है।
अरुण दुबे की गजलों में कथ्य और सौंदर्य का मिला-जुला भाव मिलता है। उनकी गजलें गजल की शैलीगत शर्तों को पूरा करती हैं। अच्छी गजल कहने के लिए जो निष्ठा ओर समर्पण विधा के प्रति होना चाहिए वह अरुण दुबे की गजलों को पढ़ कर महसूस किया जा सकता है। वे यथार्थ और कल्पना को अपनी गजलों में संतुलित रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी स्मानी गजलों में भी यह संतुलन देखा जा सकता है। उदाहरण देखें -
हादसों ने खराब कर डाला
मुझको बिगड़ा नवाब कर डाला
जोश सारा खराब कर डाला
रुख पर अपने नकाब कर डाला
नूर जब अपना भर दिया उसने
दीप को आफताब कर डाला
बुत परस्ती नहीं कभी की थी
प्यार ने यह अजाब कर डाला
आज वो शेर कह दिया तुमने
वज्म को लाजवाब कर डाला
हुस्न पर यों  शबाब आया है
छू के पानी शराब कर डाला
ऐ ‘अरुण’ इश्क क्या हुआ तुझको
हाल अपना खराब कर डाला

Arun Dubey

         सलाह यदि उपदेश की जरह दी जाए तो उसमें शुष्कता का भाव रहता है। किन्तु वही सलाह यदि कोमलता से आगाह करते हुए दी जाए तो वह गहराई तक असर करती है और उसमें सरसता भी मौजूद रहती है। जैसे अरुण दुबे ने अपनी इस गजल में खतरों से आगाह करने के लिए कोमलता से काम लिया है -
पत्थरों का शहर है संभल जाइए
दिल न टूटे बचाकर निकल जाइए
रोज लड़ना झगड़ना बुरी बात है
इनको समझाइए के संभल जाइए
आप शम्मा को इल्जाम देते हैं क्यों
प्यार है तो मोहब्बत में जल जाइए
उंगलियां दूसरों पर उठाते हैं क्यों
पहले सच के प्याले में ढल जाइए
दूसरों की निगाहों पे तोहमत न दें
यूं ना हो आप खुद ही फिसल जाइए
सब्र से काम लेना बड़ी बात है
जोश में आकर यूं  न उबल जाइए
ऐ ‘अरुण’ रूठने की अदा छोड़िए
सामने वह है अब तो बहल जाइए

           समाज का एक बड़ा तबका गरीबी और लाचारी से ग्रस्त है। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इस तबके की पीड़ा को अनदेखा नहीं कर सकता है। गरीबी कई बार मनुष्य को इस हद तक विवश कर देती है कि महिलाओं को अपनी देह बेचने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति सुखद तो कदापि नहीं कही जा सकती है। यही भाव अरुण दुबे की इस गजल में बारीकी से उभर कर आया है -
इन गरीबों का कोई ठिकाना नहीं
इनका कोई कहीं आशियाना नहीं
ये तो खुद अपने दुख से परेशान हैं
देखना इनको कोई सताना नहीं
पेट की आग से यह तो चलते ही हैं
इनके झुलसे दिलों को जलाना नहीं
जान तो पहले ही आपको दे दिए
इससे ज्यादा हमें आजमाना नहीं
जिस जगह जिस्म की बोलियां हो रहीं
भूलकर ऐसी बस्ती में जाना नहीं
शाम बर्फीली है रात शर्मीली है
आज घर से निकल दूर जाना नहीं
उसकी खुशबू से खाली हवा चल रही
आज मौसम ‘अरुण’ यह सुहाना नहीं

Sagar Sahitya Avam Chintan- Dr. Varsha Singh

          कहा जाता है कि व्यक्ति ठोकरें खा कर ही सीखता है। जीवन का अनुभव वह पाठशाला है जो सबक देती है उत्तर सुझाती है और परिणाम भी हाथों में रख देती है, जिससे जिन्दगी को जानने- समझने का सलीका आता है। कुछ यही भाव हैं अरुण दुबे की इस गजल में -
जिंदगी को देखने का नजरिया हमको मिला
गर्दिशों की ठोकरों से फलसफा हमको मिला
देर से मिलने का मुझको अब गिला कोई नहीं
शुक्र है यारा कि तुझसा आशना हमको मिला
हार जाता तुम अगर मिलते न मुश्किल दौर में
आपके इस प्यार से ही हौसला हमको मिला
बिक रहा क्या क्या नहीं बस दाम होना चाहिए
पक्ष में था साक्ष्य उल्टा फैसला हमको मिला
फेंक आया आज मैं ईमान रोटी छीन कर
दो दिनों के बाद बेटा खेलता हमको मिला
हो गई है जांच पूरी हो गए नेता बरी
सच जो था कुछ और वो नीचे दबा हमको मिला
ऐ ‘अरुण’ ऐसे खुदा को पा के क्या कर पायेगा
आदमी से दूर जाकर जो खुदा हमको मिला

        इंसान अपने किसी भी दुनियावी रिश्ते को भूल सकता है लेकिन अपनी मां को कभी भूल नहीं पाता है। मां उसके जीवन में वह शख्सियत होती है जो अपनों के लिए पीड़ा सह कर खुश रहना सिखाती है, वह भी शब्दों के माध्यम से नहीं वरन् अपनी जीवन शैली के माध्यम से। मां पर अरुण दुबे की यह गजल देखिए -
कहीं से कुछ भी करके घर के चूल्हे को जलाती है
मगर बच्चों को मां खाना खिला कर ही सुलाती है
हमेशा मुफ़लिसी तकलीफ जिल्लत खुद उठाती है
मगर बच्चों को मां इखलास की चादर बिछाती है
नहीं करता कोई भी त्याग जितना करती है इक मां
लहू छाती का केवल मां ही बच्चों को पिलाती है
बचाती ही नहीं मां अपने बच्चों को बुराई से
बसद तहजीब के रस्ते पे भी चलना सिखाती है
‘अरुण’ मां का बड़ा एहसान है जो अपने बच्चों को
जमीं से आसमां के तख्त पर लाकर बिठाती है

          अरुण दुबे की गजलें इंसानियत के जज्बे से भरी हैं। उनमें जीवन की धूप- छांव भी दिखाई देती है। वे अव्यवस्थाओं पर कटाक्ष करते हैं तो प्रेम और अनुराग की पैरवी भी करते हैं। अरुण दुबे का रचनाकर्म सागर साहित्य जगत के लिए महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।

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( दैनिक, आचरण  दि. 23.09.2019)
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Friday, July 26, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 59 ... प्रतिभा सम्पन्न युवा लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

     प्रतिभा सम्पन्न युवा लेखिका डॉ. सुजाता मिश्र
                     - डॉ. वर्षा सिंह               
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परिचय :
नाम  :- डॉ. सुजाता मिश्र
जन्म :- 30 जून 1985
जन्म स्थान :- दिल्ली
माता-पिता :- डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र एवं प्रो. रामेश्वर मिश्र “पंकज“
शिक्षा  :- बी.ए. (ऑनर्स), एम.ए., पी.एच. डी.
लेखन विधा :- लेख, समीक्षा एवं आलोचना।
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       सागर नगर की साहित्य-उर्वरा भूमि प्रत्येक उस व्यक्ति को विशेष लेखकीय परिवेश प्रदान करती है जो साहित्य सृजन से जुड़ा हुआ हो, फिर चाहे उसका जन्म सागर में हुआ हो अथवा न हुआ हो, साहित्यिक कर्मभूमि के रूप में सागर की साहित्यिकता उस व्यक्ति के जीवन में समाहित होने की क्षमता रखती है। यह तथ्य दिल्ली में जन्मीं डॉ. सुजाता मिश्र पर भी अक्षरशः खरा उतरता है। दिल्ली में निवासरत् प्रो. रामेश्वर मिश्र “पंकज“ एवं डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र की पुत्री के रूप में 30 जून 1985 को जन्मीं सुजाता मिश्र ने अपने परिवार में एक वैचारिक एवं दार्शनिक परिवेश पाया। उनके पिता रामेश्वर मिश्र “पंकज“ गांधीवादी ,राष्ट्रवादी चिंतक तथा दार्शनिक हैं जिनके विचारों का प्रभाव सुजाता के चिंतन पर पड़ा। वहीं उनकी मां डॉ. अन्नपूर्णा मिश्र राजनीति एवे समाजसेवा में रुचि रखने वाली महिला हैं। वे वर्ष 2007 - 2014 तक सोनिया विहार दिल्ली की निगम पार्षद रही, साथ ही वर्ष 2012 में पूर्वी नगर निगम दिल्ली की प्रथम मेयर भी रही। सुजाता ने अपनी मां से राजनीतिक समझ एवं समाज की विडम्बनाओं को देखने, परखने की क्षमता प्राप्त की। शैक्षिक एवं राजनीति के मिश्रित वातावरण में पली-बढ़ीं सुजाता मिश्र  के भाई कपिल मिश्र दिल्ली से विधायक तथा लोकप्रिय नेता हैं। जबकि सुजाता के श्वसुर प्रोफ़. डॉ. नंदकिशोर प्रसाद सिंह, बिहार विश्वविद्यालय से वनस्पति शास्त्र के व्याख्याता पद से सेवानिवृत्त हुए। परिवार में साहित्यसृजन के प्रति रुचि भी रही जिसने सुजाता मिश्र की भावनाओं में साहित्यिकता के बीज बोए।
       सुजाता मिश्र ने विद्यालयीन शिक्षा के पश्चात् दिल्ली के ही हंसराज कॉलेज से बी.ए. हिंदी (आनर्स) में स्नातक किया और इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 2008 में स्थान परिवर्तन हुआ और वे दिल्ली से भोपाल आ गईं। भोपाल में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय से प्रसिद्ध आलोचक आचार्य विनय मोहन शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध कार्य किया। जैसा कि डॉ. सुजाता मिश्र ने जानकारी दी कि  आचार्य विनय मोहन शर्मा के साहित्यिक और निजी जीवन पर आधारित अभी तक का एकमात्र शोध कार्य है।
         यायावरी जीवन एक रचनाकार को अनुभवों के संसार से जोड़ता है। डॉ. सुजाता मिश्र को भी विभिन्न स्थानों में रहने और जीवन के नित नए अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिला। उन्होंने वर्ष 2012-13 में ग्वालियर स्थित सिंधिया कन्या विद्यालय में बतौर हिंदी शिक्षिका कार्य किया। इसके बाद वे  दिल्ली लौट गईं। दिल्ली में रहते हुए कुछ समय तक वहां एक प्रकाशन संस्थान में बतौर एडिटर और कंटेट राईटर काम किया। इस दौरान उन्होंने स्कूली विद्यार्थियों के लिये एनसीआरटी पाठ्यक्रम पर आधारित हिंदी, इतिहास तथा विज्ञान विषय में हिंदी माध्यम की सहायक पुस्तकें तैयार की। वैसे इस दौरान सन् 2008 से लगातार विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में शामिल होते हुए मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में भ्रमण किया।
           सन् 2016 में डॉ. सुजाता का विवाह डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर के ई.एम.एम.आर.सी विभाग जो सी.इ.सी-यू जी सी -मानव संसाधन विकास मंत्रालय-मल्टी मीडिया केंद्र है, में प्रोड्यूसर ग्रेड ए अधिकारी कार्यरत् माधव चंद्र चंदेल से हुआ। स्वयं डॉ. सुजाता मिश्र वर्तमान में डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से मान्यता प्राप्त बीटी इंस्टीट्यूट ऑफ एक्सीलेंस में हिन्दी विषय की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। उनकी प्रतिभा को देखते हुए इंस्टीट्यूट ने उन्हें सेवा आरम्भ करते ही इंस्टीट्यूट की वार्षिक पत्रिका “स्पंदन“ के प्रथम अंक का सम्पादन कार्य सौंप दिया। पैन्थेर हाउस पब्लिकेशन प्राइवेट लिमिटेड, लखनऊ के लिए संपादन कार्य करते हुए डॉ सुजाता मिश्र ने “दादा साहब फाल्के अकादमी“ पुरस्कार विजेता तथा ,  “नगीना “ तथा “निगाहें“ फिल्मों के लेखक - निर्माता श्री जगमोहन कपूर के उपन्यास “मलंगी“ का सम्पादन किया। लखनऊ से ही प्रकाशित मासिक पत्रिका “लीटो इंडिया“ में बतौर सम्पादक कार्य किया। मध्यप्रदेश से प्रकाशित देशबन्धु , आचरण आदि समाचार पत्रों सहित राजस्थान से प्रकाशित नव दुनिया, बिहार से प्रकाशित “बिहार टुडे तथा दिल्ली से प्रकाशित न्यूज़ ग्राउंड मासिक पत्रिका के साथ ही साहित्यिक वेबसाईट “शब्दांकन डॉट कॉम“ , “प्रवक्ता डॉट कॉम“ तथा “मेकिंग इंडिया डॉट कॉम“ के लिये शोधपरक लेखन करती हैं। डॉ सुजाता मिश्र का शोध प्रबंध उनकी प्रथम पुस्तक के रूप में “आचार्य विनय मोहन शर्मा एवं उनका साहित्यिक अवदान’’ प्रकाशित हो चुका है।           
           उल्लेखनीय है कि डॉ सुजाता को अध्ययन ,आध्यापन और लेखन के अतिरिक्त संगीत में विशेष रुचि है। वे सिंथेसाइज़र (की बोर्ड) बजा लेती हैं तथा खना बनाने और बागवानी करने में भी उनकी विशेष रुचि है।
वसंत काव्योत्सव में बाएं से : कवयित्री डॉ. वर्षा सिंह, शायर डॉ. गजाधर सागर एवं मंच संचालक डॉ. सुजाता मिश्र

डॉ सुजाता मिश्र के लेखों में उनकी एक मौलिक दृष्टि दिखाई पड़ती है। अपनी लेखनी में एक ओर जहां उन्हें समाज में पड़ रहे पाश्चात्य प्रभाव के दुष्परिणामों से चिंता होती है वहीं दूसरी ओर वे भारतीय संस्कृति की ऐतिहासिक महत्ता पर गर्व झलकता हैं। लेकिन अंधानुकरण नहीं, वे अतीत की त्रुटियों पर भी उंगली उठाने से नहीं हिचकती हैं। इस तारतम्य में अपने लेखों में अद्यतन स्थितियों का आकलन करने के लिए ऐतिहासित एवं पौराणिक आख्यानों का भी संदर्भ लेती हैं। डॉ. सुजाता का एक लेख है ‘हंगामा है क्यों बरपा?’ यह लेख 27 सितम्बर 2018 को धारा 497 को रद्द किए जाने के संदर्भ में है। इस लेख के आरम्भ में ही वे लिखती हैं कि -‘‘ गत 27 सितम्बर 2018 को धारा 497 को रद्द करने वाले अपने ऐतिहासिक फैसला सुनाते जस्टिस आर एफ नरीमन ने तीक्ष्ण टिप्प्णी करते हुए कहा कि - “पत्नी पति की सम्पत्ति नही ंहै”, तब मुझे एकाएक स्मरण हो आया “द्रौपदी” का ! जब  स्वयंवर में अपनी धनुष कला के प्रदर्शन से अर्जुन ने द्रौपदी के मन को जीता तब राजा द्रुपद को कहां मालूम रहा होगा कि पुत्री की मनोइच्छा अनुकूल वर तलाशने  के लिए किया गया यह आयोजन अतंतः उनकी बेटी को आजीवन ‘बहुपतित्व’ के धर्म निर्वाह की ओर धकेल देगा! माता कुंती के आदेश मात्र पर स्वयंवर की कठिन प्रक्रिया से चुनी गयी अपनी पत्नी द्रौपदी को जब पांचो पांडवो ने आपस में बांट लेने का फैसला लिया तो कैसा लगा होगा द्रौपदी को ? मनोनुकूल वर की चाहत में द्रौपदी को जमीन के एक टुकडे की तरह पांचो ंभाईयो ंके में बांट दिया गया!  क्या पित और सास के आदेश पर एक स्त्री का पति के अन्य भाईयो ंको अपना पति मान उनके साथ संबंध बनाना नैतिक, समाजिक और मानवीय दृष्टि से सही था? यदि हां तो  सिर्फ अर्जुन की पति होते हुए द्रौपदी अपनी मर्ज़ी से अर्जुन के अन्य भाईयो ंके साथ संबंध बनाती तो क्या इसे भी सही कहा जाता? यह पांडू पुत्रो ंकी “स्वयंवर में जीती द्रौपदी” को अपनी “सम्पत्ति” समझने का ही नतीजा था, जिसके चलते “धर्मराज” माने जाने वाले युधिष्ठिर ने भी  द्रौपदी का दांव जुंए में लगा दिया, जिसकी परिणति भरी सभा में द्रौपदी के चीरहरण के रूप में हुई! चीरहरण के इस पाप का दोषी माना गया कौरवों को , जबकि अपनी पत्नी को एक वस्तु समझकर जुएं में हार जाने वाले युधिष्ठिर तो आज भी “धर्मराज” ही कहे जाते हैं!’’
          विगत कुछ वर्षों में स्त्रियों ने स्वयं के साथ हुई यौन-प्रताड़ना के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस दिखाते हुउ ‘‘हैशटैग मी टू’’ कैम्पेन आरम्भ कियां देखते ही देखते इसने दुनिया की अनेक महिलाओं में नवऊर्जा का संचार किया और वे अपने यौनशोषण की घटनाओं के बारे में खुल कर सामने आ खड़ी हुईं। इसी कैम्पेन के संबंध में डॉ. सुजाता मिश्र का एक लेख है ‘‘ मी टू : क्योंकि सब नहीं चलता’’। इस लेख में डॉ सुजाता ने इस कैम्पेन का अपने ढंग से आकलन किया है। वे अपने इस लेख में लिखती हैं कि -‘‘ खुलापान और मर्यादा एक साथ नही ंचल सकते। स्त्री हो या पुरुष सबको ंअपने दायरे समझने होगें। आज के इस दौर में दोस्त, प्रेमी और सहकर्मियों के साथ अपने रिश्तों के मापदंड हमें खुद निर्धारित करने होगें। और फिर भी यदि कोई उन दायरो ंको तोडने की कोशिश करे तो उसी वक्त अपना विरोध दर्ज करवाना होगा, स्त्री-पुरुष दोनों ही को “सब चलता है” वाला नज़रिया छोडना होगा, क्योंकि सब नहीं चलता। याद रखिए परिस्थितयोंवश भी गलत इंसान की गलत मंशाओं आगे समझौता करने वाला व्यक्ति फिर चाहे वो स्त्री हो या पुरुष सबसे बडा दोषी है। क्योंकि उसकी यही “समझौता प्रवृत्ति” उसको ंभले ही काम और नाम दिला गई हो पर इसके चलते ऐसे तमाम लोग मारे जाते है जो समझौता नहीं करते और कहीं गुमनामी में खो जाते हैं, जबकि शोषक दिन पर दिन ताकतवर बनता जाता है, और शोषित बनकर ही सही ऐसे लोग अपना एक मुकाम बना लेते है। इन्हें तो शायद हिसाब ही नहीं होगा कि इनकी “समझौता प्रवृत्ति” ने कितने मेहनती, ईमानदार, आदर्श लोगो ंको अंधेरो में धकेल दिया।’’
 
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

     अपने इसी लेख में सुजाता मिश्र भारत में स्त्रियों के साथ होने वाले यौनअपराधों के कारणों की पड़ताल करते हुए निष्कर्ष पर भी विचार करती हैं। वे लिखती हैं कि -‘‘ज्यादातर भारतीय अपना पूरा वक्त दूसरे धर्म-पंथो ंकी कमियां गिनाने में निकाल देते हैं। लेकिन खुद अपने ही धर्म ग्रंथों में आचरण की शुचिता और मर्यादाओ ंपर क्या दिशा-निर्देश दिये गये हें, यह अधिकांश लोग नहीं जानते। कोई भी कानून या सोशल मीडिया मुहिम इन हालातों को तब तक नही ंबदल सकते जब तक बदलाव की बयार हमारे अंदर से न उठे। आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर तो गुज़र जायेगा रह जायेगा बाकी तो कुछ सबक केवल। यदि अभी भी न चेते तो कब चेतेंगे? आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित माहौल देना हमारी जिम्मेवारी है। हांलाकि आमतौर पर प्राचीन मर्यादाओ को सदा स्त्री की आज़ादी का विरोधी समझा जाता है, तो बेहतर है समाज के वर्तमान स्वरूप को ध्यान में रखते हुए, लैंगिक समानता के आधार पर नवीन समाजिक-नैतिक दिशा-निर्देश तय हो। जब तक आप संबंधों में उन्मुक्तता का समर्थन करते रहेंगे तब तक इस तरह के अपराध बढ़ते ही रहेंगे।’’
         ‘‘देश चलाने का टेंडर बनाम लोकतंत्र’’ यह एक अन्य लेख है डॉ सुजाता मिश्र का जिसमें वे भारत में लोकतंत्र के दूषित होते स्वरूप पर कटाक्ष करती हुईं उन खतरे से भी आगाह करती हैं जो सोशल मीडिया अथवा इंटरनेट की ओर से पैदा हो चुका है। अपने इस लेख में उन्होंने वर्तमान दशा-दिशा की बारीकी से व्याख्या की है। इस लेख कर एक अंश देखिए- ‘‘भारत “चुनावों” का देश है ,यहां साल भर ,कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में चुनाव होता ही रहता है। आज़ादी के बाद जो सबसे बडा परिवर्तन देश के राजनीतिक स्वरूप में आया वह था “लोकतंत्र”। लोकतंत्र यानि “जनता पर, जनता द्वारा चुना गया, जनता का शासन”! ऐसी ही अनेक क्रांतिकारी परिभाषाओं से सुसज्जित लोकतंत्र ने कहीं न कहीं आम आदमी को उसकी छुपी हुई ताकत का एहसास कराया, उस आम आदमी को जो बरसों की गुलामी से आज़ाद हुआ था। किंतु वैश्वीकरण के इस दौर में विश्व के अनेक देशों में जहां ‘’राजनीति’’ की परिभाषा बदली वही ं“लोकतंत्र” ने भी अपना स्वरूप बदल लिया, फिर भला हिंदुस्तान इस बदलाव से कैसे दूर रहता? ऐसे में सोचना पडता है कि आज विश्व भर में जिसे हम “लोकतंत्र” कहते हैं वह आखिर “सत्ता का टेंडर” हासिल करने से कुछ ज्यादा है क्या? “लोक” तो जैसे इस “तंत्र” को साधने का एक माध्यम मात्र है।’’
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि डॉ सुजाता मिश्र एक प्रतिभासम्पन्न युवा लेखिका हैं। उनके लेखन में अपार संभावनाएं निहित हैं। वे एक समालोचक की दृष्टि से तथ्यों को तौलते हुए अपने विचारों को बेलाग सामने रखती हैं। उनका यही लेखकीय गुण एक दिन उन्हें यशस्वी बनाएगा।   
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( दैनिक, आचरण  दि. 25.07.2019)
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मेरा यह आलेख तेज़समाचार पोर्टल पर भी उपलब्ध है।
डॉ. सुजाता मिश्र की मेरे आलेख पर Facebook पर प्रतिक्रिया का screenshot प्रस्तुत है....

# साहित्य वर्षा

Wednesday, July 10, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 57 ... बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, नाटककार एवं लेखक डॉ. आलोक चौबे - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि डॉ. आलोक चौबे पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि, नाटककार एवं लेखक डॉ. आलोक चौबे
                                                        -       
                   - डॉ. वर्षा सिंह
                               
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परिचय :- डॉ आलोक चौबे
जन्म :-  20 मई 1979
जन्म स्थान :- ललितपुर ,उत्तर प्रदेश
पिता एवं माताः- श्री प्रताप नारायण चौबे एवं श्रीमती अंजू चौबे
शिक्षा :- मनोविज्ञान तथा पत्रकारिता और जनसंचार में परास्नातक, संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विषय में पीएचडी, उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से स्क्रिप्ट लेखन शिक्षा, भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कोझिकोड से एग्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम अध्ययनरत।
लेखन विधा :- गीत, लेख, नाटक, कहानी, पुस्तक समीक्षा, शोधपत्र।
प्रकाशन :- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
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          सागर नगर की माटी में वह ममता है कि जो भी यहां आता है, वह यहीं का हो कर रह जाता है। अनेक साहित्यकार जो प्रदेश के दूसरे जिलों अथवा देश के दूसरे प्रदेशों से सागर आए, शीघ्र ही सागर उनकी कर्मभूमि अर्थात् सृजनभूमि बन गई। 20 मई 1979 को उत्तरप्रदेश के ललितपुर में जन्मे डॉ आलोक चौबे विगत सन् 2002 से सागर में निवासरत हैं। यह कहा जा सकता है कि सागर उनकी वास्तविक कर्मभूमि है। अपने पिता श्री प्रताप नारायण चौबे एवं माताश्री अंजू चौबे से मिले संस्कारों ने उन्हें अध्ययनशीलता का गुण प्रदान किया। उन्होंने मनोविज्ञान तथा पत्रकारिता और जनसंचार में डबल एम. ए. किया। इसके बाद मनोविज्ञान में ही विशेष अध्ययन एवं शोधकार्य करते हुए संज्ञानात्मक मनोविज्ञान विषय में पीएचडी उपाधि प्राप्त की। लेखन की रुचि ने डॉ आलोक चौबे को उत्तर प्रदेश फिल्म डेवलपमेंट कारपोरेशन से स्क्रिप्ट लेखन शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा दी। आज भी वे भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) कोझिकोड से एग्जीक्यूटिव मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम अध्ययनरत हैं।
             बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ आलोक चौबे आकाशवाणी सागर से कैजुअल अनाउंसर के रूप में जुड़े। सागर नगर की चर्चित नाट्य संस्था अन्वेषण थिएटर ग्रुप के सचिव रहे। चाइल्ड राइट्स ऑब्जर्वेटरी मध्य प्रदेश, भोपाल के जनरल बॉडी मेंबर, पब्लिक रिलेशन सोसाइटी ऑफ इंडिया के सदस्य तथा सोसाइटी फॉर आइडियल ग्लोबल नीड्स के अध्यक्ष हैं। यूनिसेफ, उत्तर प्रदेश में राज्य संचार सलाहकार के तौर पर भी काम कर चुके हैं। अपने लेखन एवं सृजन की विविधता के अंतर्गत डॉ आलोक चौबे ने कई राज्यों और संस्थाओं की योजनाओं की संचार सामग्री का निर्माण किया। उन्होंने बीबीसी मीडिया के उपक्रम बीबीसी मीडिया एक्शन के साथ भी स्वास्थ्य संचार परियोजना में कार्य किया। वे सागर के शहीदों पर केन्द्रित ‘‘हम भूल न जाएं उनको’’ स्मारिका का संपादन कर चुके हैं जिसके अब तक दो संस्करण सन् 2004, 2014 में  प्रकाशित हो चुके हैं। डॉ. आलोक चौबे लेख भी लिखते हैं। सन् 1999 से मनो-सामाजिक-राजनीतिक और संचार विषयों पर देश के 15 से अधिक राज्यों के अखबारों में सम्पादकीय पृष्ठों पर उनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं।
            भ्रमण मनुष्य की चिंतन क्षमता को नए आयाम प्रदान करता है। उसे नवीन अनुभवों से जोड़ता है। डॉ. चौबे के लेखन में अनुभवजन्य विविधता मिलती है। इसका कारण है कि वे अब तक बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, हिमाचल, उत्तरांचल, महाराष्ट्र ,हरियाणा, दिल्ली, पंजाब आदि राज्यों के शासकीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ कार्य करते हुए सैकड़ों गांवों की सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक विविधताओं से साक्षात्कार कर चुके हैं। इसके साथ ही वे मंचों पर काव्यपाठ करते हैं। इसी तारतम्य में वे विभिन्न प्रदेशों के कवि सम्मेलनों, मुशायरों में काव्यपाठ कर चुके हैं। जहां तक प्रसारण की बात है तो डॉ. चौबे की रचनाओं का आकाशवाणी छतरपुर, सागर और झांसी से प्रसारण हो चुका है।
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              डॉ. आलोक चौबे की पत्नी प्रिया जैन भी लेखन में रुचि रखती हैं। उल्लेखनीय है कि डॉ चौबे एवं उनकी पत्नी प्रिया जैन ने ‘‘टर्निंग पॉइंट’’ नाटक मिल कर लिखा था जिसका मंचन थर्ड बेल थिएटर ग्रुप द्वारा किया गया था। डॉ चौबे ने कई नुक्कड़ नाटक भी लिखे जिनका प्रदर्शन मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विभिन्न संस्थाओं द्वारा समय-समय पर किया जाता रहा है। वे नाटकों में अभिनय भी कर चुके हैं। उन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का लेखन, निर्माण एवं निर्देशन भी किया जिनमें प्रमुख हैं- लाइफ ऑन लाइन, संभावनाओं का सागर, हंगरमार्च आदि।
          कविता में जब यथार्थ एवं कल्पना का सुंदर समन्वय हो तो उसकी भाव संपदा द्विगुणित हो जाती है। ऋतुओं का अनुभव तो सभी करते हैं किन्तु एक कवि जब ऋतुओं का अनुभव करता है तो उसके ऋतुवर्णन में जीवन का दर्शन और सौंदर्य निखर आता है। जैसे डॉ आलोक चौबे जब वर्षा ऋतु को अपनी कविताओं में उतारते हैं तो उसमें बारिश की एक अलग ही छटा दिखाई देती है जो ऋतु की सरसता अनुभव कराते हुए एक पल ठहर कर सोचने को भी विवश करती है। उदाहरण के लिए उनकी यह कविता देखिए -
गीले बादल आसमान में नज़र आने लगे ..
अब बारिश होगी...मिट्टी में सोंधी-सोंधी खुशबू आएगी...
नयी कोंपलें निकलेंगी ....नए पत्ते निकलेंगे ...
चारों तरफ फैलेगी हरियाली चादर .....
और मन भावन होगा सब कुछ....
धरती की प्यास बुझेगी..../किसानांं की आस जगेगी.. ..
बच्चे कागज़ की नाव चलाएंगे...
नवयुगल भीगकर बारिश में.../प्रेममय हो जायेंगे...
घर के आंगन में पानी की बूंदे अठखेलियां करेंगी...
चलो इन खूबसूरत लम्हों को सहेज ले....
इन पानी की बूंदों को समेट ले....
ताकि प्यास बुझी रहे../आस जगी रहे .......

           अतुकांत कविताओं के साथ ही मुक्तक के रूप में तुकांत काव्य में भी मौसम की सुंदर व्याख्या करते हैं डॉ आलोक चौबे। यह मुक्तक उल्लेखनीय है-
वारिस सपनों का बनाता है कोई
वसीयत गमले में उगाता है कोई
सांसों से सींच दूं अगर नींदों को
बादलों से प्यास बुझाता है कोई
डॉ. आलोक चौबे

           कवि डॉ. आलोक चौबे की रेलवे स्टेशन पर एक लम्बी कविता है जिसमें उन्होंने स्टेशन की आपाधापी भरी गतिविधियों का सजीव चित्रण किया है। रेलवे स्टेशन यूं भी मनोभावों का एक ऐसा जमावड़ा अपने आप में समेटे होता है जिसमें मिलन का सुख तो विदाई का दुख, परिचितों की भीड़ तो अपरिचितों का हुजूम, मन के एकाकीपन से भीड़ के कोलाहल तक सभी कुछ निबद्ध रहता है। डॉ चौबे की कविता में रेलवे स्टेशन की ये सारी खूबियां दृश्य की तरह उभरती हैं। इस कविता को उनकी प्रतिनिधि कविताओं में गिना जा सकता है-
रंगमंच सा ये स्टेशन
1, 2 3 ए सी , स्लीपर और
जनरल में भी बंटा स्टेशन
करता है पर भेद भाव भी
आदमी आदमी में स्टेशन
पैसे की माया है सबकुछ
जान गया है अब स्टेशन
जाने कितने एकाकों का
घर परिवार है ये स्टेशन
जाने कितने घर परिवारों
को मिलवाता है स्टेशन
जाने कितने मजदूरों को
काम दिलाता है स्टेशन
मैं भी अक्सर रहता हूं साथी
इस स्टेशन , उस स्टेशन।

              समाज में घटित होने वाली जघन्य घटनाएं कवि के मन को खुरचती हैं और इससे उत्पन्न पीड़ा प्रश्न करती है कि अपराध का मूल कारण क्या है? समाज में बढ़ते जा रहे लैंगिक अपराधों का स्मरण कराते हुए कवि आलोक चौबे ने एक लम्बी कविता लिखी है ‘‘दुष्कर्मी कौन?’’। इस कविता का एक अंश देखिए-
दुष्कर्मी कौन?
वो जिसने बुरा कर्म किया
उनका क्या जो व्यवसाय करते हैं
मसालेदार ख़बरों का ...
और परोसते है नारी देह को
उपभोग की वस्तु की तरह .....
इस अपाहिज समाज में ...
नपुंसकता हावी है अब ....
तमाम विकृतियों के तंत्र साथ
राजनीति में, प्रशासन में, न्याय में
और आदमी में भी ...
कहीं नारीत्व लजा रहा है स्वयं को
और पुरुषत्व वो तो जैसे बचा ही नहीं
वीरो की इस धरा पर ..... दुष्कर्मी कौन?
सिर्फ वो जिसने बुरा कर्म किया
वो क्यूं नहीं जो इन कर्मो को
प्रेरित करता है ...
उकसाता है कुत्सित विचार
और नहीं रहता सजग ...
कि कहीं कोई विकृत मानसिकता का पुरुष
मासूम मुस्कान न छीन ले किसी गुडिया की .....
अब नहीं कोई निर्भया सब भय में है?
क्यूंकि हम कोई सुकर्म भी
नहीं करते ,मतलबपरस्ती हावी है
व्यक्ति पर, समाज पर और तंत्र पर
हम सब पर .......
तो दुष्कर्मी कौन? तो दुष्कर्मी कौन?? तो दुष्कर्मी कौन???

               डॉ. आलोक चौबे सागर नगर के वे साहित्यकार हैं जो अपनी विविधतापूर्ण लेखनी, संवेदनाओं की धनी कविताओं एवं कटाक्ष करते नाटकों से हिन्दी साहित्य संपदा में निरंतर श्रीवृद्धि कर रहे हैं। उनका लेखन उन्हें एक अलग पहचान देने में पूर्ण सक्षम है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 10.07.2019)
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Friday, July 5, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 56 .... एक उदीयमान कवि प्रदीप पाण्डेय - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि प्रदीप पाण्डेय पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

       एक उदीयमान कवि प्रदीप पाण्डेय
                                 - डॉ. वर्षा सिंह         
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परिचय :
नाम  :- प्रदीप पाण्डेय
जन्म :-  18 फरवरी 1975
जन्म स्थान :- सागर
माता-पिता :- श्रीमती सरस्वती देवी पाण्डेय एवं स्व. हरिनारायण पाण्डेय
शिक्षा  :- समाजशास्त्र एवं इतिहास में एम.ए., मास्टर डिप्लोमा इन सोशल वर्क ,एम.बी.ए. (एच.आर.),डाक्टरेट इन एन्त्रप्रान्यौरशिप।
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य।
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          सागर नगर में साहित्य के प्रति रुझान मानो यहां की हवा और पानी में घुले हुए हैं। इसीलिए विविध क्षेत्रों में प्रवृत्त व्यक्ति भी साहित्य सृजन की ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह पाते हैं। महाकवि पद्माकर की इस पुण्य भूमि में ऐसा होना स्वाभाविक है। राजीव नगर वार्ड के प्रसिद्ध कर्मकाण्डी विद्वान पं. हरिनारायण पाण्डेय एवं श्रीमती सरस्वती देवी पाण्डेय के यहां 18 फरवरी 1975 को जन्मे प्रदीप पाण्डेय यूं तो एक ‘मोटिवेशनल गुरु’ के रूप में युवाओं का मार्गदर्शन करते हैं किंतु स्वयं वे साहित्यसृजन के प्रति पूर्णनिष्ठा से अभ्यासरत हैं। उनकी बाल्यावस्था परमधार्मिक वातावरण में व्यतीत हुई जिससे धर्म एवं दर्शन को उन्हें समझने का अवसर मिला। वस्तुतः उनके घर में पांडित्य कार्य पीढ़ियों से चला आ रहा है। किंतु प्रदीप पाण्डेय ने धार्मिक संकीर्णता के बजाय धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया जिसकी प्रेरणा उन्हें अपने माता-पिता से मिली थी। प्रदीप पाण्डेय ने समाज शास्त्र ,इतिहास से एम.ए. किया। इसके साथ ही सोशल वर्क में डिप्लोमा किया। इसके बाद एम.बी.ए. (एच.आर.), डाक्टरेट इन एन्त्रप्रान्यौरशिप भी किया। प्रदीप पाण्डेय ने हमेशा इस बात की आकांक्षा रखी है कि युवावर्ग को उचित मार्गदर्शन मिल सके ताकि वे अपने जीवन में निराशा को दूर हटा कर सफलताएं प्राप्त कर सकें। इसी दिशा में पहले स्वयं को तैयार करने के उद्देश्य से उन्होंने अपने ज्ञान एवं अनुभव के भंडार को बढ़ाते हुए जवाहरलाल नेहरू लीडरशिप इंस्टीट्यूट मे लीडरशिप मैनेजमेंट पर प्रशिक्षण कार्य ,आई आई एम-इंदौर “मैनेजरियल स्किलस“ पर प्रशिक्षण कार्य , लीड बैंक द्वारा संचालित ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण केन्द्र का संचालन व प्रशिक्षण कार्य किया। आज वे युवाओं के लिए मोटीवेशनल स्पीकर एवं फ्रीलांस प्रशिक्षक है। उल्लेखनीय है कि सागर मे 2003 से 2008 प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु निःशुल्क कोचिंग ‘‘दी वे’’ संस्था द्वारा युवाओं की तैयारी कराई जिसके परिणामस्वरूप लगभग 3200 युवाओं का सरकारी सेवाओं मे चयन हुआ।
              सांस्कृतिक अभिरुचि से प्रेरित हो कर प्रदीप पाण्डेय नगर में लगभग 122 सांस्कृतिक आयोजन करा चुके हैं। “सिटी गाईड-2000’’, ‘‘शताब्दी परीक्षा विशेष’’ के प्रकाशन के अतिरिक्त सागर के सामाजिक मुद्दों पर चार डाक्युमेंट्री बना चुके हैं जिनमें सन् 2011 में बनाई गई डाक्युमेंट्री “तिल तिल मरती झील“ विशेष रूप से चर्चित रही। इन तमाम उपलब्धियों के साथ ही प्रदीप पाण्डेय काव्य के क्षेत्र में पूर्ण गंभीरता से अभ्यासरत हैं। साथ ही वे बताते हैं कि पत्र-पत्रिकाओं में अब तक उनके 42 लेखों का प्रकाशन हो चुका है तथा वे 100 से उपर कविताएं लिख चुके हैं। साहित्य के क्षेत्र में अपनी अब तक की उपलब्धियों का श्रेय वे अपने ‘मेंंटोर’ को देते हुए कहते हैं कि-‘‘ श्यामलम् संस्था के श्री उमाकांत मिश्र जी ने मुझे साहित्य के क्षेत्र में पहचान दिलवाई।’’

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              प्रदीप पाण्डेय अपने साहित्य सृजन के प्रति झुकाव के बारे में बताते हुए कहते हैं कि- ‘‘एक वक्ता को श्रोता होने के साथ अध्ययनशील होना, मै समझता हूँ प्रथम एवं अनिवार्य है। अतः मोटीवेशनल स्पीकर यदि लेखक हो तो लेखन बोलने की कला भी विकसित करता है यही सोचकर लिखने का प्रयास करता रहा। ये बात अलग है जो मन मे आता है वह लिख देता हूं किन्तु साहित्य की सीमाओं और साहित्य का ज्ञान  आज भी न्यून है। पत्रिकाओं और अखबारों मे प्रकाशन स्थानीय स्तर मतलब सागर में ही हुआ। लिखने का शौक बचपन से है कैसा जुड़ा ये कहना कठिन है। सन 2000 मे जब मेरी पत्रिका “सिटी गाईड “ का प्रकाशन हुआ तब उसमे मैंने एक लेख लिखा था “इश्क“। फिर एक कार्यक्रम हुआ 2003 रविन्द्र भवन में संगीत कार्यक्रम का नाम “ये लम्हे“ जिसका ब्रोशर मुझे लिखना था। जिसमें में मैने “ये लम्हे’’ कविता लिखी। कविता की प्रशंसा ने मुझे लिखने के लिये प्रेरणा दी और मेरी लिखने की गति बढ गई। फिर तो मैने युवाओं की सोच के अनुसार इश्क-मोहब्बत, देश, समाज और हास्य कविताओं के साथ आर्टिकल लिखना शुरु किए। मेरे आर्टीकल युवाओं को उत्साहवर्धन एवं वर्तमान परिप्रेक्ष्य  को लेकर ही लिखे गये। देशबंधु में 2016 से 2017 तक लगातार प्रकाशित हुए।’’
            अपने लेखन के प्रति साफगोई रखने वाले नवोदित कवि के रूप में सागर के साहित्याकाश में तेजी से प्रकाशित होने वाले कवि प्रदीप पाण्डेय की कविताओं में जीवन के विविध पक्ष उभर कर आते हैं। उनकी कविताओं में एक ऊर्जास्विता है। उदाहरण के लिए ‘‘वक़्त की ही तू तलाश है’ शीर्षक यह कविता की कुछ पंक्तियां देखिए -
कर इरादे ,नभ से ऊँचे
और ऊँची ,भर उडान ।
साध ले ,फिर लक्ष्य अपना
नये लक्ष्य को,कर संधान ।।
है बराबर; कौन तेरे ?
है कौन तुझसा ;साहसी ?
तू सजग है ,तू अमिट है
है कहाँ ,तुझसी शुचि ?
आजकर ,इसी वक्त कर
एक प्रण! कर ठान ले ।
है तू  ही सर्वज्ञ जग में
आज इतना जान ले ।।
उठ जिगर मे,भरकर आंधी
बैठा क्यों ,होकर उदास है
वक्त ने बोया है ,तुझको
वक्त की ही ,तू तलाश है ।।

वृक्षारोपण करते हुए मध्य में डॉ (सुश्री) शरद सिंह एवं दायें से प्रथम प्रदीप पाण्डेय


              ‘‘हुनर अपना भी आजमाऊंगा’’ शीर्षक कविता में आशावाद का एक सकारात्मक रूप दिखाई देता है जो कवि प्रदीप पाण्डेय द्वारा युवाओं को दिए जाने वाले संदेश की भांति है। इस कविता की कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं-
तीर है तुणीर में
समझूँ सबकी पीर मै
एक लक्ष्य, एक ध्येय
एक प्रण और प्राण है
एक शर मे
बिहंगम सी
खाई पाट जाऊंगा
आया हूँ तो ये तय
हुनर अपना भी आजमाऊंगा

            समाज और राजनीति की तत्कालीन दशाओं से हर युग में कवि प्रभावित हुए हैं। अव्यवस्थाओं के विरोध में जन्मे कटाक्ष का कविता में ढल कर सामने आना स्वाभाविक है। प्रदीप पाण्डेय ने भी अपनी कविता ‘‘बस मौन ही रहना’’ में भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्थाओं पर कटाक्ष किया है। बानगी देखिए-
फिर सजेगी सेज मुहब्बत की
फिर चिताओं पे रुदन होगा ।
फिर चलेगी चर्चा हिंद के धर्म की
फिर अरमानों का हरण होगा ।
टपकेगा खून किसानों के माथे से
फिर सत्ता की, गली में जश्न होगा ।
फिर लुटेगी अस्मिता मासूम की
फिर न्याय ;अन्याय में दफ़न होगा ।
फिर जमी़र बिकेगा,ईमान बिकेंगें
चहुँओर नैतिकता का पतन होगा ।
हुआ - हुआ चिल्लायेंगे भेड़िये
फिर कहेंगे अमन ही अमन होगा ।
फिर चलेगी बात होंगी तकरीरें
मरेगा गाँधी और वेवा वतन होगा ।
रागों में ही चलेगी सियासत
सिपाही की मौत और निंदा का कफन होगा ।
बात मुहब्बत की होगी वार पीठ पे होगा
मंत्र में तुम मरो, गाली का भजन होगा ।
तुम मौन हो,बस मौन ही रहना
फिर उसी वेदी में तुम्हारा ही हवन होगा ।।

          प्रेम के प्रति समाज के दृष्टिकोण को बड़े ही सहजभाव से रखते हुए ‘‘मुहब्बत पूजा है’’ शीर्षक कविता में प्रदीप पाण्डेय प्रेम की श्रेष्ठता को इस प्रकार स्थापित करते हैं-
इबादत है/ प्रार्थना है
उपवास है/स्पंदन है
अद्भुत रहस्य है/सुन्दर अहसास है
बस लोग है!
करने नहीं देते ।

           यह सच है कि काव्यशिल्प के मर्मज्ञों को प्रदीप पाण्डेय के काव्यसृजन में अभी एक कच्चापन दिखाई देगा किंतु उनके सृजन की निरंतरता एवं उनके द्वारा गंभीरतापूर्वक किया जा रहा सृजन-अभ्यास इस बात की आश्वस्ति कराता है कि वर्तमान में उदीयमान कवि के रूप में दिखने वाले प्रदीप पाण्डेय एक दिन भावों के साथ-साथ शिल्प में भी अपनी मजबूत पकड़ बना लेंगे, क्यों कि उनमें काव्य की समझ और सृजन के प्रति लगन दोनों ही खूबियां मौजूद हैं। 
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( दैनिक, आचरण  दि. 05.07.2019)
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कवि प्रदीप पाण्डेय द्वारा मेरे लेख पर whatsapp पर दी गई प्रतिक्रिया.... मोबाइल स्क्रीन शॉट प्रस्तुत है....


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Saturday, March 9, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 46.... आर.के. तिवारी : एक उत्साही रचनाकार - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के उत्साही रचनाकार आर. के. तिवारी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

आर.के. तिवारी : एक उत्साही रचनाकार
                 - डॉ. वर्षा सिंह
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परिचय    :- आर. के. तिवारी
जन्म      :- 08 फरवरी 1952
जन्म स्थान :- सागर (म.प्र.)
लेखन विधा :- पद्य एवं गद्य
प्रकाशन  :- एक भजन संग्रह एवं एक लघु उपन्यास प्रकाशित
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सागर का साहित्यिक वातावरण प्रत्येक संवेदी-हृदय को साहित्यसृजन की ओर उन्मुख करने की विशेषता रखता है। आर. के. तिवारी उर्फ़ राजकुमार तिवारी भी एक ऐसे ही उत्साही रचनाकार हैं। वे अपने लेखन में भावनाओं को प्रधानता से पिरोते हैं। सागर नगर में 8 फरवरी 1952 को जन्मे आर. के. तिवारी  को संवेदनात्मक संस्कार अपने पिता स्व. वृंदावन तिवारी एवं माता स्व. रामकली देवी तिवारी से मिले। वे स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद ही जीवकोपार्जन से जुड़ गए। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया शाखा गोपालगंज से हेड कैशियर के पद से 29 फरवरी 2012 को सेवानिवृत्त होने के बाद वे अपनी साहित्यिक अभिरुचि के विकास में संलग्न हो गए। यद्यपि वे सेंट्रल बैंक के कर्मचारी संगठन में उप महासचिव पद पर जुड़े रह कर अपने विभागीय कर्मियों का सतत् सहयोग करते रहते हैं। सेवानिवृत्ति के उपरांत उनकी अब तक दो कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। उनमें से एक है ‘‘हल्ला कन्हैया का’’, जो कि भजन संग्रह है तथा दूसरी कृति है ‘‘करमजली’’ जिसे लम्बी कहानी अथवा लघु उपन्यास कहा जा सकता है।
अपने भजन संग्रह के प्रकाशन के संबंध में बड़े ही सहज भाव से कवि आर. के. तिवारी ने स्वीकार किया है कि -‘‘वैसे भजन लिखने का शौक मुझे करीब 15 से 20 वर्ष पहले हुआ था। लिखने का अंदाज़ ऐसे जैसे वह एक गीत है ‘नाम न जानू, तेरा देश न जानू’ ठीक वैसे ही ‘राग न जानू मैं, तर्ज़ न जानू’। वास्तव में मेरे लिखे कौन से गीत की क्या राग है, क्या तर्ज़ है, बस लिख दिए और दोस्तों के साथ भजन मंडली या रामायण मंडली के साथियों के सहयोग से गा दिए। पुस्तक की सोच थी ही नहीं, न ख्याल ही आया। इस ओर, इसकी प्रेरणा हमारे पं. श्री उमाकांत मिश्रा (श्यामलम्) ने की है। इन्होंने ही मुझे इसके लिए प्रेरित किया। साथ ही इस पुस्तक को आकार, प्रकाशन योग्य बनाने एवं मुझे प्रोत्साहित करने, समय-समय पर याद दिलाने का पूरा श्रेय मेरी पुत्रवधू श्रीमती अंजना चतुर्वेदी को जाता है जिसने अपने स्वयं के सभी दायित्वों का निर्वहन करते हुए भी इस पुस्तक को आकार दिलाया। इसके साथ हमारे बच्चों का, हमारी पत्नी श्रीमती कमला का योगदान भी बहुत है। मैं गीत लिखता फिर मैं उन्हें सुना था, यदि कुछ बदलाव करना होता या उचित नहीं लगता तो वे सही मार्गदर्शन करतीं। इसके साथ में अपने 15-20 वर्ष पूर्व के उन साथियों का भी आभारी हूं जिन्होंने मुझे सार्वजनिक स्तर पर गाने में पूर्ण सहयोग दिया। मेरी झिझक उन्हीं के द्वारा दूर हुई अन्यथा मैं लिखता तो, पर शायद गा नहीं पाता।’’
‘‘हल्ला कन्हैया का’’ भजन संग्रह त्रिदेव सीरीज का प्रथम संस्करण है। जिसमें भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं को थोड़े चुलबुले ढंग से हंसी खुशी और आनंद योग्य बनाने का प्रयास किया गया है। इन गीतों में बुंदेली बोली का विशेष प्रयोग है, जो इन्हें ना केवल बुंदेली संस्कृति से जोड़ता है, बल्कि मधुरता प्रदान करता है।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh

  अपनी मित्रमंडली में रज्जन तिवारी के नाम से सुपरिचित आरके तिवारी के भक्तिपरक गीतों में जो लालित्य दिखाई देता है, वह कई बार ईसुरी की फागों का स्मरण करा देता है। जैसे यह उदाहरण देखें जिस में राधा जी श्रृंगार कर दही बेचने बाजार जा रही हैं। उन्होंने किस तरह का श्रृंगार किया है इसका विवरण इस गीत में बड़े सुंदर ढंग से दिया गया है -
सज धज देखो राधा रानी
चली है दई ले बजरिया
सर पर धरे है गगरिया
दो दो चुटिया करे गुजरिया
दहिया बेचन जात गुजरिया
बनी ठनी है गुजरिया
सर पर धरे है गगरिया ......

पीली पीली सरसों फूली
जा रही राधा खूबई फूली
छम छम छम छम चलन है उनको
बाजत जा रही पैजनिया
सर पर धरे है गगरिया ......

सब तरफ जलवा है
बूंदा बिंदिया लाख-लाख के
कान के बाला पांच लाख के
नौ लाख की है पूंगरिया
सर पर धरे है गगरिया ......

पांच लाख का गहना उनको
दस गज को है घंघरा उनको
आठ गज की लगे सारी उनको
दस हाथों की चुनरिया
सर पर धरे है गगरिया ......

कवि तिवारी के गीतों में वात्सल्य रस का भी सुंदर वर्णन देखा जा सकता है। जैसे उनका एक गीत है जिसमें मां यशोदा के यहां श्याम सुंदर के जन्मोत्सव का वर्णन है। माता यशोदा के घर बधाइयां गाई जा रही हैं और लोग तरह-तरह के उपहार ले कर आ रहे हैं। चहुं ओर उत्सव का वातावरण है-
अंगना में बाजे पैजनिया
श्यामा की बाजे पैजनिया
यशुदा के दोरे बज रयै बधाये
श्यामा की बाजे पैजनिया ......

कोउ-कोउ लाए टोपी और झंगला
टोपी और झंगला, हां, टोपी और झंगला
कोउ-कोउ लाओ झगुलियां
श्यामा की बाजे पैजनिया ......

कोउ-कोउ लाए हाय और चंदा
हाय और चंदा, हां, हाय और चंदा
कोउ-कोउ लाओ करधनियां
श्यामा की बाजे पैजनिया ......

कोउ-कोउ लाए बारी और झुमकी
कोउ-कोउ लाए पुतरा-पुतरियां
श्यामा की बाजे पैजनिया ......

कोउ-कोउ लाए घुनघुनियां
कोउ-कोउ लाए कंगन और माला
श्यामा की बाजे पैजनिया ......
 
पुत्रवधू डॉ. अंजना तिवारी चतुर्वेदी, पुत्र अमित तिवारी और पौत्री राजे के साथ कवि आर.के.तिवारी

     
 बाज़ारवाद से प्रभावित खुरदुरे हो चले समय में भजनों की कोमलता मन-मस्तिष्क पर एक अलग ही प्रभाव छोड़ती है और इससे विचारों में भी स्निग्धता आती है। रचनाकार आर. के. तिवारी ने भजनों के अतिरिक्त विविध विषयों पर गीत और ग़ज़लें भी लिखी हैं जिनका वे साहित्यिक गोष्ठियों में सस्वर पाठ करते हैं। सामाजिक कार्यों से जुड़े रहना और मित्रता का विस्तार करना उनकी विशेष अभिरुचि है। उनकी कृति ‘‘करमजली’’ एक लंबी कहानी एवं लघु उपन्यास का मिलाजुला स्वरूप है।
‘श्यामलम’ संस्था की अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने ’करमजली’ की भूमिका में लिखा है कि -“दो वर्ष पूर्व श्री आर के तिवारी से जब परिचय हुआ तो उनके साहित्य, संस्कृति के प्रति रुझान और उनके द्वारा रचित कविताओं कहानियों और भजनों के बारे में जाना। मेरे परामर्श पर उन्होंने अपनी प्रथम पुस्तक “हल्ला कन्हैया का“ भजन संग्रह प्रकाशन कराया। जिसका विमोचन ’श्यामलम’ द्वारा आयोजित कार्यक्रम में संपन्न हुआ। विभिन्न कार्यक्रमों में मुलाकातों के सिलसिले के बीच तिवारी जी ने एक कहानी के प्रमुख अंशों के बारे में बताया। कहानी की विषयवस्तु से प्रभावित हो कर, उन्हें इसका लेखन जारी रखने तथा उसे एक लंबी कहानी का स्वरूप देकर प्रकाशित कराने की राय थी लघुकथा से प्रारंभ हुई ’करमजली’ अब लघु उपन्यास का आकार लेकर पाठक जगत में प्रस्तुत हो रही है जो स्वागत इसलिए भी है कि सागर में एक नए कहानीकार का जन्म भी इसके साथ होने जा रहा है।“
’करमजली’ के विषय में स्वयं आरके तिवारी ने आत्मकथन ‘मेरे शब्द’ के अंतर्गत स्वीकार किया है कि -“मैं कोई साहित्यकार नहीं हूं और ना ही कोई पहुंचा हुआ कहानीकार। मैं इस साहित्य जगत में एक जुगनूं की तरह हूं। यह पुस्तक ’करमजली’ मेरी प्रथम कहानी पुस्तक है जिसे आपके समक्ष सरल भाषा में ही प्रस्तुत करने की मेरी कोशिश रही है और मैंने प्रयास भी किया है कि यह कहानी आप सब को रुचिकर लगे।“   
ये दोनों कथन बोध कराते हैं कि आर. के. तिवारी अनगढ़ किंतु एक अत्यंत उत्साही रचनाकार हैं, जिन्हें अपनी कृति के उपन्यास या लंबी कहानी होने के बीच का अंतर स्पष्ट था, फिर भी उन्होंने अपनी कृति को पाठकों के समक्ष रखने का साहस किया। वस्तुतः यह साहस सीखने की ही प्रक्रिया का प्रथम चरण है। विशेषता यह कि सीखने के प्रति आर. के. तिवारी में तनिक भी झिझक नहीं है। उनका यही गुण भविष्य में उनहें साहित्य का गंभीर साधक भी बना सकता है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 09.03.2019)
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Saturday, February 9, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 42 .... भक्तिरस के कवि बिहारी सागर - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
 स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि बिहारी सागर पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

          भक्तिरस के कवि बिहारी सागर
                             - डॉ. वर्षा सिंह
                                         
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परिचय :- बिहारी सागर
जन्म :- 04 अप्रैल 1952
जन्म स्थान :- सागर नगर
पिता एवं माताः- स्व. रामप्रसाद सकवार एवं स्व. रामबाई सकवार
लेखन विधा :- पद्य
प्रकाशन :- पांच काव्य संग्रह प्रकाशित
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          सागर के काव्यजगत् में अनेक कवि ऐसे हैं जो हिन्दी और बुंदेली में भक्ति रचनाएं लिखते हैं। ये रचनाएं लोक के धर्मप्रवण मानस को न केवल प्रभावित करती हैं अपितु इनमें निहित शब्दों की सादगी इन्हें लोकरुचि में ढाल देता है। ऐसी पद्य रचनाओं की परम्परा में  कवि बिहारी सागर का नाम उललेखनीय है। सागर नगर के केशव गंज वार्ड में 04 अप्रैल 1952 को जन्मे बिहारी सागर को धार्मिक रुचि अपनी माता स्व.रमाबाई सकवार से मिली। अपने पिता स्व. रामप्रसाद सकवार से उन्होंने सादा जीवन जीने की शिक्षा पाई। अपने उसूलों पर चलते हुए जीवन व्यतीत करने की प्रतिबद्धता में उनकी पत्नी रामप्यारी सकवार का सदा सहयोग रहा है। बिहारी सागर की बड़े भाई स्व. बालमुकुंद ‘नक्श’ एक अच्छे संगीतकार थे। उनके गीत ग्रामोफोन रिकॉर्ड में भी रिकॉर्ड हुए थे। बालमुकुंद ‘नक्श’ लोकगीत गायन में भी विशेष दखल रखते थे तथा उन्हें शायरी का भी शौक था। बिहारी सागर मानते हैं कि अपने बड़े भाई की साहित्यिक अभिरुचि को देख कर ही साहित्य के प्रति उनका प्रेम  जागा। कवि डॉ सीताराम श्रीवास्तव ‘भावुक’ भी यह मानते हैं कि “कविवर बिहारी सागर को अपने बड़े भाई स्वर्गीय बालमुकुंद जो बुंदेलखंड के बहुत बड़े शायर थे, उनसे लिखने की प्रेरणा मिली है।“
बिहारी सागर के अब तक पांच काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। जिनके नाम हैं- ‘टेसू के फूल’, ‘फुलवारी’, ‘मधुसूदन’,‘बुंदेली बहार’ और ‘बुंदेली गूंज’। उनकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। साथ ही आकाशवाणी के सागर एवं छतरपुर केन्द्रों से वे अनेक बार काव्यपाठ कर चुके हैं। साहित्यिक मंचों तथा गोष्ठियों में सदैव भागीदार रहते हैं। इसके साथ ही वे साहित्य एवं सामाजिक संस्थाओं में सक्रिय योगदान देते रहते हैं।
           बिहारी सागर मूलतः गीतकार हैं। हिंदी और बुंदेली दोनों में ही गीत और भजन लिखते हैं। उनके लिखे हुए भजनों में गेयता के तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं। भक्ति पर आधारित काव्य संग्रह ‘‘बुंदेली गूंज’’ में लोक धुनों में बंधे हुए वे गीत हैं जो पाठकों के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ते हैं। जैसे, बुंदेलखंड अंचल में नर्मदा का विशेष महत्व है। नर्मदा को यहां माता के समान पूज्य माना जाता है तथा नर्मदा स्नान एक पुण्य कार्य की तरह किया जाता है नर्मदा पर आधारित उनका गीत जिस दर्शन और नदी के प्रति आत्मीयता को व्यक्त करता है, उसे उनकी इन पंक्तियों में देखा जा सकता है-
चलो नर्मदा धाम बावरे
चलो नर्मदा धाम....
अमर कंठ से निकरी नर्मदा
पग पग बने पुण्य धाम....बावरे चलो
लहंगा फरिया पान सुपारी
भक्त चढ़ाए सुबह शाम....बावरे चलो
आरती वंदना निशदिन गावे
जपत माई को नाम....बावरे चलो
माई के पर कम्मा कर लो
छोड़ो मोह तमाम....बावरे चलो
माई नर्मदा उल्टी बहत हैं
महिमा अजब तमाम....बावरे चलो
शरण तुम्हारी आए बिहारी
स्वर्ग के मिलहें धाम....बावरे चलो

Sahitya avam Chintan - Dr. Varsha Singh

           धार्मिक जीवन में राधा और कृष्ण का दार्शनिक महत्व भी है। राधा की कल्पना प्रेम, अपनत्व और कृष्ण की महत्ता को रेखांकित करने वाली स्त्री के रूप में की जाती है। ऐसी राधारानी के प्रति अपने भावों को व्यक्त करते हुए बिहारी सागर ने यह भजन लिखा है-
जगत महारानी राधा रानी
इनकी अमर कहानी.....
मधुबन में जे चले झकोरा
चुनर उड़त है धानी.....जगत महारानी
वंशी श्याम की जब-जब बाजी
हृदय में जा समानी.....जगत महारानी
भूल गई पनघट की डगरिया
भर ने पाई पानी.....जगत महारानी
देव तुम्हारी महिमा गावे
तुम जग की कल्याणी.....जगत महारानी
कहत बिहारी प्रीत न्यारी
मन में राधा समानी.....जगत महारानी

             बुंदेली समाज में हास्य-व्यंग का विशेष स्थान है। जीवनयापन के लिए कठोर रम करने वाले मजदूर, किसान और दिन-रात घर के कामों में जुटी रहने वाली गृहणियां हास्य-व्यंग्य के माध्यम से ही अपने मन की थकान दूर करती हैं। बुंदेल के परिवेश के इसी परिवेश को ध्यान में रखते हुए बिहारी सागर ने हास्य गीत भी लिखे हैं। उदाहरण के लिए यह गीत देखिए-
डार के कौसें बना दई कड़ी
मोसे ननदिया खूबई लड़ी।
पुरा परोस में दए जा हल्ला
सुन रई परोसन खड़ी खड़ी.....मोसे ननदिया
मोसे के रई खूबई निछोई
अपनी बात पे खूबई अड़ी.....मोसे ननदिया
दुफर की बेरा जा रोटी ने खावे
सुनियो मोरी जिठानी बड़ी.....मोसे ननदिया
सास नदिया मोसे भुखरी
बिछोना डारके वे तो पड़ी.....मोसे ननदिया
आए ‘बिहारी’ लुवावे उनखां
देख के धना अटा पे चढ़ी.....मोसे ननदिया

               बिहारी सागर ने ऋतु पर आधारित गीत भी लिखे हैं जिनमें बुंदेली बोली की छटा और भी सुंदर ढंग से उभर कर आई है क्योंकि इनमें ऋतुवर्णन के साथ भक्तिभावना को भी पिरोया गया है। यह गीत देखें-
भादों की छाई घटा काली
भगवन की महिमा निराली।
पहरेदार सबरे सो रहे
बरसे बदरिया काली....भगवन की
बादल तड़के बिजली चमके
झूमे हवा डाली डाली....भगवन की
बेड़ीं खुल गईं तारे खुल गए
खुल गई जाली जाली....भगवन की
ले कै वसुदेव उनखों चले हैं
जमुना की बाढ़ है निराली....भगवन की
देखत पूर वसुदेव घबराने
प्रभु के चरण संभाली....भगवन की
नंद बाबा कैं आए ‘बिहारी’
हो रही बात अब निराली....भगवन की

                 आज जब व्यक्ति अपने जीवन में बहुत अधिक व्यस्त हो चला है और उसके पास इतना भी समय नहीं रहता है कि वह दो घड़ी के लिए दीन-दुनिया भुला कर भक्तिरस में डूब सके तब साहित्य में भक्ति की कविताओं का कम लिखा जाना स्वाभाविक है। यथार्थवादी युग में यथार्थ कलेवर वाली कविताओं के प्रति कवियों का रुझान अधिक रहता है। भक्तिकाव्य के लिए कठिन हो चले इस समय में बिहारी सागर जैसे कवियों का भजन और प्रभुवंदना लिखना इस बात की ओर संकेत करता है कि जीवन में लोकाचारी धार्मिक परम्पराओं की भांति साहित्य में भी भक्तिकाव्य अभी गतिमान है। यूं तो बिहारी सागर अन्य विषयों पर भी गीत रचते हैं किन्तु उनका भक्ति काव्य ही उन्हें स्थाई पहचान देगा।
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( दैनिक, आचरण  दि. 06.02.2019)
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Friday, November 9, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 33 - स्त्रीपक्ष के मुखर कवि डॉ. सतीश चंद्र पाण्डेय - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

      स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के युवा साहित्यकार सतीशचंद्र पाण्डेय पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

स्त्रीपक्ष के मुखर कवि डॉ. सतीश चंद्र पाण्डेय
                - डॉ. वर्षा सिंह
           
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परिचय : डॉ. सतीश चंद्र पाण्डेय
जन्म : 17 मार्च 1966
जन्म स्थान : मैनपुरी (उ.प्र.)
शिक्षाः अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर एवं बी.एड.
विधा : मुक्तक, नवगीत, ग़ज़ल एवं व्यंग
पुस्तकें : पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
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           यूं तो कवि सतीश चंद्र पाण्डेय का जन्म 17 मार्च 1966 को उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में हुआ था तथा उन्होंने उच्चशिक्षा भी आगरा विश्वविद्यालय से प्राप्त की किन्तु शिक्षा के बाद उनका अब तक का अधिकांश जीवन सागर में ही व्यतीत हुआ है। सागर के शासकीय गर्ल्स हाई स्कूल, मकरोनिया में प्राचार्य के पद कर कार्य करते हुए डॉ.पाण्डेय सतत् साहित्य सेवा में लगे हुए हैं। उनका कहना है कि विद्यालयीन दायित्वों से जब भी समय मिलता है, वे लेखन कार्य में जुट जाते हैं। अपनी मातृभाषा हिन्दी के प्रति प्रेम उन्हें अपने पिता स्व. कृष्णचंद्र पाण्डेय से मिला जबकि अंग्रेजी साहित्य के प्रति रुझान ने उन्हें अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण करने की प्रेरणा दी। उनके पिता शासकीय अधिकारी थे जो कर्मठता और ईमानदारी से अपना कर्त्तव्य निर्वाह करने में विश्वास रखते थे। अपने पिता के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर डॉ.पाण्डेय ने शिक्षा जगत को अपनी आजीविका के माध्यम के रूप में चुना। वे व्यक्ति के उत्थान के लिए शिक्षा को अनिवार्य तत्व मानते हैं। सागर के स्थाई निवासी और एक प्राचार्य के रूप में वे अपने विद्यालय और विद्यालय में पढ़ने वाली छात्राओं के बहुमुखी विकास के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहते हैं। उनकी कविताओं में बेटियों के प्रति चिन्ता को स्पष्ट रूप् से देखा जा सकता है। 
            डॉ.पाण्डेय मुक्तक, नवगीत के साथ ही छंदबद्ध कविताएं भी लिखते हैं। काव्य के अतिरिक्त व्यंग लेखन भी उन्हें पसंद है। उनकी रचनाएं देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी रचनाओं का आकाशवाणी से भी प्रसारण हुआ है।            डॉ.पाण्डेय की छंदबद्ध रचनाओं में जहां छायावादी प्रभाव देखने को मिलता है वहीं छंदमुक्त रचनाएं प्रगतिवाद का आह्वान करती प्रतीत होती हैं। वे स्त्री को सशक्त होते देखना चाहते हैं। डॉ.पाण्डेय का कहना है कि वे स्वयं एक बेटी के पिता हैं और इसीलिए वे बेटियों की पीड़ा, बेटियों के उन्नति की मार्ग की बाधाएं और परेशानियों को समझने का प्रयास करते रहते हैं। वे चाहते हैं कि प्रत्येक बेटी को समाज में सिर उठा कर जीने का अधिकार हो और प्रत्येक स्त्री सम्मान की दृष्टि से देखी जाए।
‘विडंबना’ शीर्षक कविता में सतीश चंद्र पाण्डेय ने बेटियों की समस्याओं और समाज का उनके प्रति दृष्टिकोण बखूबी सामने रखा है। इस लंबी कविता का एक अंश देखिए-
हां यह वही है
जिसे छूना चाहते हैं सब
अपनाना चाहते हैं सब
और लगाना चाहते हैं सब
और भी बहुत कुछ चाहते हैं सब
मगर फिर भी वह नहीं चाहते एक बेटी
हां, यह वही है
खड़ी हुई विद्यालय के पास
या किसी नुक्कड़ पर
घूरना चाहते हैं सब
और वह खड़ी मूक
नजरें झुकाए, किताबों को वक्ष से
और ताकत से चिपकाए
हट जाना चाहती है वहां से
असुरक्षित कल्पना से भयाक्रांत
थू करना चाहती है
मानो चारों तरफ सड़ांध हो।

अपने घर में ही स्त्री को मिलने वाली उपेक्षा के विरुद्ध आवाज़ उठाते हुए डॉ.पाण्डेय ने अपनी इस ग़ज़ल में तुलसी के पौधे के बिम्ब को चुनते हुए बड़े सुंदर ढंग से अपनी बात कही है-
घर में तुलसी है, हम इसे जल क्यों नहीं देते।
लोग  अच्छी  सोच  को  बल क्यों नहीं देते।
रोकती क्यों नहीं अब अमराईयां हमको
अब हमको आवाज पीपल क्यों नहीं देते
आग ही बरसा रहे हैं एक मुद्दत से
बारिशों को जन्म बादल क्यों नहीं देते
रोकने वाला है जब कोई नहीं तो हम
उनकी महफिल छोड़कर चल क्यों नहीं देते
रोज बढ़ती जा रही है जब समस्याएं
आप इनके सार्थक हल क्यों नहीं देते

स्त्री के प्रति सम्मान की भावना की नींव उसी समय पड़ जाती है जब हम अपनी मां के प्रति सम्मान भाव से झुकते हैं। जो व्यक्ति अपनी जन्मदात्री का सम्मान नहीं कर सकता है वह स्त्री के किसी भी रूप को सम्मान नहीं दे सकता है। इसीलिए कवि डॉ. पाण्डेय अपनी ‘मां’ पर लिखी गई कविता में आह्वान करते हैं कि -
झुको, नीचे झुको
जमीन तक झुको
और उसके पैर छू लो
वह मां है
बहुत संभव है ऐसा करने में
तुम्हारे पैंट की क्रीज़ खराब हो जाये
पर उसके चेहरे की झुर्रियां
और बिवाई फटे पैरों का
तुम्हारे पैंट की क्रीज़ से
बहुत गहरा संबंध है
बंधु, झुको !
नीचे झुको, ज़मीन तक झुको
और उसके पैर छू लो
वह मां है।

डॉ. पाण्डेय के कविमन को इस बात से पीड़ा का अनुभव होता है कि समाज में स्त्री को वह सम्मान नहीं मिल पाता है जो उसे मिलना चाहिए। वे अपनी एक रचना में स्त्री की तुलना पतंग से करते हुए लिखते हैं कि -
पतंग और नारी की पीड़ा एक सी है
क्योंकि वे एक दूसरे की र्प्याय
दोनों की जबरन छेदी गई है नाक
कान में बांधी गई डोरी
दिखाती है समाज का वीभत्स चेहरा
उसे उड़ाने, फंसाने, कहीं भी लटकाने
और अटकाने के लिए हर कोई स्वतंत्र है
फिर चाहे खजूर में लटकाए या कहीं और
तथाकथित ढील और स्वतंत्र होने की चाह में
संजो लेती है सुखद अहसास कल के भविष्य का
बढ़ती जाती है आगे
सब कुछ भूलकर
समुद्र की गहराई के साथ।
बायें से :- डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, सतीशचंद्र पाण्डेय एवं अन्य

ऐसा नहीं है कवि स्त्री की सामाजिक अवहेलना को देख कर निराशावादी हो गया हो, उसके भीतर मौजूद विश्वास उसे आशा बंधाता है कि एक दिन युवा और स्त्रीशक्ति के बल पर देश इस दुनिया का सच्चा सिरमौर बनेगा। यह रचना देखिए -
लिखे होंगे देश के ही नाम सारे कीर्तिमान
जिस दिन देश की जवानी जाग जाएगी
आन-बान-शान जो दिखाई नहीं दे रही है
प्राण प्रिय भारत की गूंज दूर जाएगी
नैतिक मूल्य राष्ट्र भाव यदि चिरंजीवी हो
धर्म की ध्वजा पूरे विश्व पर आएगी
भारत के वेद और भारत की गीता पढ़
बुद्ध महावीर की कहानी याद आएगी
एक दिन विश्व गुरु भारत बनेगा पक्का
जिस दिन फरेब की राजनीति हार जाएगी
जिस दिन इबादत से बड़ी होगी आबरू
उस दिन नही ‘पांडे’ नारी देवी कहलायेगी

डॉ. सतीश चंद्र पाण्डेय जिस गंभीरता से स्त्री के पक्ष में चिन्तन करते हुए अपनी रचनाओं में उस चिन्तन को काव्यात्मक रूप देते हैं वह निश्चित रूप से प्रत्येक संवेदनशील मन को आलोड़ित करने में सक्षम है। जैसी कि उनकी कविता है ‘कवि एक जुलाहा है’ उसी तरह प्रत्येक साहित्यकार एक जुलाहे की भांति समाज की चादर को सुंदर बुनावट देना चाहता है। इसी क्रम में डॉ. पाण्डेय की काव्यात्मक ऊर्जास्विता उनकी साहित्यिक प्रतिबद्धता के प्रति आश्वस्त करती है।
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( दैनिक, आचरण  दि. 09.11.2018)
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