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Friday, March 27, 2020

बारह दोहे और एक ग़ज़ल कोरोना से जंग पर - "लॉकडाउन" - डॉ. वर्षा सिंह

   
डॉ. वर्षा सिंह
 
       सावधानी में ही सुरक्षा है। कोरोना वायरस के संक्रमण जन्य महामारी को रोकने के लिए माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने देश में 21 दिनों का लॉकडाउन दिनांक 24 मार्च 2020 से 14 अप्रैल2020 तक के लिए घोषित किया है।

आइए जानते हैं कि लॉक़डाउन में होता क्या है।

1. घर में रहना पड़ेगा
इस दौरान सबको घर में ही रहने होता है। जनता को घर से बाहर निकलने पर रोक है। हालांकि आप अपने जरूरी काम के लिए बाहर निकल सकते हैं। लेकिन दूसरे लोगों से मिलना जुलना, सामाजिक व्यवहार, सैर सपाटा, खाना पीना, दफ्तर इत्यादि सब पर रोक है।

2. क्या क्या बंद रहेगा
इस दौरान सभी प्राइवेट और कॉन्ट्रेक्ट वाले दफ्तर बंद रहते हैं। सरकारी दफ्तर जो जरूरी श्रेणी में नहीं आते, वो भी बंद रहते हैं।

3. क्या नहीं कर सकते
इस दौरान सड़क पर नहीं निकल सकते। पांच या पांच से ज्यादा लोगों के एक साथ एकत्र होने पर रोक है। यदि आप घर से बाहर निकलते हैं तो आपको सड़क पर गश्त कर रहे पुलिस कर्मचारी को बताना होगा कि आप किस काम से जा रहे है।

4.दफ्तर वाले क्या करेंगे
हालांकि लॉकडाउन के दौरान दफ्तर बंद कर दिए गए हैं लेकिन आप दफ्तर का काम घर से कर सकते हैं। सभी दफ्तरों को चाहें वो निजी हों या ठेके पर,  उन्हें घर से ही अपने दफ्तर के काम सुचारू करने होंगे। इसके लिए कंपनी व्यक्ति को सैलरी देने के लिए बाध्य है।


5. क्या क्या बंद होगा
स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, मॉल, दुकानें, सिनेमाहाल, धार्मिक स्थल, स्विमिंल पूल व अन्य संस्थान बंद रहते हैं। यहां जाना मना है। अगर ये खुलते हैं तो कार्रवाई होगा।

6. क्या क्या खुला रहेगा
लॉक डाउन के दौरान सबसे अच्छी बात ये है कि इस दौरान राशन, दूध, फल-सब्जी, दवाई की दुकानें खुली रहेंगी। पेट्रोल पंप, सीएनजी पंप, गैस सिलेंडर की आपूर्ति, बिजली पानी की सेवा, डॉक्टर, अस्पताल. फायर सर्विस, म्यूनिसिपल दफ्त, प्रिंट और इलेक्ट्रानिक माडिया के दफ्तर, बैंक के एटीएम, टेलीकॉम सेवाएं पूरी तरह खुली रहेंगी। यानी कि आपको सामान्य जीवन जीने के लिए तमाम तरह की जरूरी चीजों की आपूर्ति होती रहेगी। बस आप घर से बाहर नहीं निकल सकते।

    यहां प्रस्तुत हैं मेरे द्वारा लिखे बारह दोहे कोरोना से जंग पर ....

"लॉकडाउन" में है निहित...
                    - डॉ. वर्षा सिंह

कोरोना समझे नहीं, रंग, धरम ना जात।
मिल कर लें संकल्प हम, देनी होगी मात।।1।।

कोरोना की आपदा, मनुज रहा है झेल ।
रहें एकजुट हम अगर, यह भी होगा फेल।।2।।

सार्स, इबोला से नहीं ,घबराया इंसान।
कोरोना के घात का, हमको है संज्ञान।।3।।

शहर, देश, दुनिया सभी पर संकट की छांव।
बच कर स्वयं, बचाइए, अपनी बस्ती-गांव।।4।।

बहुत बुरा यह संक्रमण, इतना लीजे जान।
टीका इसका है नहीं, जा सकती है जान ।।5।।

मानव हैं हम, ये सदा हमें रहेगा भान।
करना हमें सदैव है नए-नए संधान।।6।।

कोरोना का भी कभी निकलेगा कुछ तोड़।
वर्तमान में दीजिए सभी बुराई छोड़।।7।।

"लॉकडाउन" में है निहित, सबके हित की बात।
इसी तरह दे पायेंगे, कोरोना को मात ।।8।।

वहां सुरक्षित हैं सभी, जहां सतर्क इंसान।
दूर भ्रमों से रह करें सच्चाई का भान ।।9।।

दूरी रखिए आपसी, नहीं घूमने जाएं ।
पालन वह सब कीजिए, जो पी.एम. समझाएं।।10।।

भय मन में मत पालिए, किन्तु न निर्भय होंए ।
सैनेटाइजर से सदा हाथों को मल धोंए ।।11।।

"वर्षा" भारत भूमि पर यह अप्रैल औ मार्च।
जग को पथ दिखला रहा, बन कर जलती टार्च ।।12।।
            ----------------


       कोरोनावायरस को फैलने से रोकने के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी के द्वारा खींची गई एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा को महसूस करते हुए मैं, आप, हम सभी भारतवासी 21 दिन के लॉकडाउन का पालन करते हुए अपने घर से बाहर नहीं निकल रहे हैं ... तो पढ़िए मेरी यह ग़ज़ल ....

ग़ज़ल
दौर है ये आज़माइश का
         - डॉ. वर्षा सिंह

दौर है ये आज़माइश का, ज़रा धीरज धरो
कुछ दिनों की बात है फिर ख़ूब मनचाहा करो

स्याह पन्ने फाड़ कर उजली कथाएं कुछ लिखो
पृष्ठ जो हैं रिक्त, उनमें रंग जीवन का भरो

ख़ुद के दुख की दास्तानों का न कोई अंत है
भूल अपने ग़म सभी तुम पीर ग़ैरों की हरो

वक़्त है एकांत का, रहना स्वयं की क़ैद में
अब मनुजता को स्वयं के धैर्य से तारो- तरो

याद रखना वक़्त रुकता है न अच्छा ना बुरा
खेल सारा कुछ पलों का है तो आखिर क्यों डरो

मृत्यु की तय है घड़ी और ज़िन्दगी के दिन भी तय
सोच कर अंतिम क्षणों को किसलिए प्रतिपल मरो

शुष्कता ने बोरियत से भर दिया वातावरण
बन के "वर्षा"- बूंद, सूखी इस धरा पर तुम झरो
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#ग़ज़लवर्षा
#StayHome
#कोरोनावायरस


Sunday, December 22, 2019

नागरिकता संशोधन कानून के परिप्रेक्ष्य में : आपस में तक़रार ग़लत - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

आपस में तक़रार  ग़लत
       - डॉ. वर्षा सिंह

हर मुद्दे पर झंझट - झगड़ा  ठीक  नहीं
शांति भंग कर बेजा लफड़ा ठीक नहीं

बात-बात में आपस में तक़रार  ग़लत
हिंसा  के  रस्ते  का  पचड़ा ठीक नहीं

फूल खिले हों, तरह-तरह की ख़ुशबू हो
 देश बाग़ है, गर  यह उजड़ा ठीक नहीं

"वर्षा" अपना है जग सारा, सब अपने
यूं  ही  रहना उखड़ा-उखड़ा ठीक नहीं

नवदुनिया समाचारपत्र सागर संस्करण में आज दिनांक 22.12.2019 को प्रकाशित

        

Tuesday, April 23, 2019

विश्व पुस्तक दिवस .....


Dr. Varsha Singh

विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल 2019) पर विशेष ग़ज़ल
किताबें
                     - डॉ. वर्षा सिंह

दुख- सुख की हैं सखी किताबें।
लगती कितनी  सगी  किताबें।   

जब-जब उभरे घाव हृदय के,
मरहम जैसी लगी किताबें।

असमंजस की स्थितियों में
सदा रहनुमा बनी किताबें।

जीवन की दुर्गम राहों में,
फूलों वाली गली किताबें।

मैं, तुम, सारी दुनिया सोये,
हरदम रहती जगी किताबें।

फ़ुरसत हो तो तुम पढ़ लेना
मैंने भी कुछ लिखी किताबें ।

"वर्षा" की हमसफ़र हमेशा
ख़्वाबों में भी बसी किताबें।

Sunday, August 19, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन -20 वृन्दावन राय सरल : बुंदेली-हिन्दी में समान-धर्मा कवि - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. वर्षा सिंह
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के चर्चित कवि वृन्दावन राय 'सरल' पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....
सागर : साहित्य एवं चिंतन
वृन्दावन राय सरल : बुंदेली-हिन्दी में समान-धर्मा कवि
- डॉ. वर्षा सिंह
उम्र भर पीटे गए हैं ढोल की मानिन्द
आज कोई जश्न में तो कल किसी की मौत पर
ये पंक्तियां हैं सागर नगर के चर्चित कवि वृन्दावन राय सरल की। आम आदमी की पीड़ा को व्यक्त करने वाली इन पंक्तियों के रचयिता वृन्दावन राय सरल बुंदेली और हिन्दी में समान रूप से काव्य सृजन कर रहे हैं। वे देश के मंचों पर भी एक चर्चित नाम हैं। सिविल इंजीनियर रह चुके सरल ने आयुर्वेदरत्न और साहित्य रत्न की उपाधि भी अर्जित की है। पिता स्व. बालचन्द्र राय एवं माता स्व. श्रीमती फूलबाई राय के घर 3 जून 1951 को सागर जिले की खुरई तहसील में जन्मे वृन्दावन राय सरल ने अपनी आजीविका की व्यस्तताओं के बीच साहित्य साधना का मार्ग चुना। लगभग 33 वर्ष से साहित्य सृजन में संलग्न कवि सरल बुंदेली और हिन्दी के अतिरिक्त उर्दू में भी ग़जलें कहते हैं। उनका एक ग़ज़ल संग्रह ‘धूप ही धूप’ सन् 2001 में प्रकाशित हुआ। बुंदेली काव्य संग्रह ‘को का कैरओ’ तथा बाल कविताओं का संग्रह ‘मैं भी कभी बच्चा था’ भी प्रकाशित हो चुके हैं। उनके दोहों का संग्रह ‘दोहावली’ अभी प्रकाशनाधीन है। कवि सरल की कई रचनाएं विभिन्न सम्वेत संकलनों में भी संकलित की गई हैं। जैसे- ‘अर्द्धशती’, ‘सरस्वती सुमन’, ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’, ‘मंदाकिनी’, ‘आदबे सुखन’ आदि। प्रदेश एवं देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी रचनाओं का प्रकाशन हुआ है। आकाशवाणी के केन्द्रों से रचनाओं के प्रसारण के साथ ही दूरदर्शन, ई टीवी, सहारा टीवी आदि से भी काव्यपाठ कर चुके हैं।
बायें से :- डॉ. वर्षा सिंह, उमाकांत मिश्र एवं वृन्दावन राय सरल

वृन्दावन राय सरल देश के प्रतिष्ठित मंचों पर काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किए जाते हैं। उन्हें साहित्य सेवा के लिए डेढ़ दर्जन से अधिक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है जिनमें प्रमुख हैं-साहित्यश्री (इलाहाबाद), नज़ीर बनारसी सम्मान (बनारस), रवीन्द्रनाथ सम्मान (कोलकता), हिमाक्षरा साहित्य सम्मान (दमन), डॉ रामकुमार वर्मा साहित्य सम्मान (कन्नौज), श्रेष्ठ मंचकवि सम्मान, मध्यप्रदेश लेखक संघ (भोपाल), ‘निर्मल सम्मान’ आर्ष परिषद् (सागर), कवि भूषण सम्मान (दमोह), ‘दादा डालचंद सम्मान’ (सागर) आदि। मध्यप्रदेश लेखक संघ की सागर इकाई के अध्यक्ष वृन्दावन राय सरल कवि सम्मेलनों के सफल संचालक एवं आयोजक भी हैं। कवि सरल की कविताओं में आम जनजीवन की पीड़ा बड़ी बारीकी से मुखर होती है। जब रचना अपनी मातृबोली में लिखी जाए तो उसकी मधुरता एक अलग ही अंदाज़ में सामने आती है क्योंकि उस बोली की विशेषता के साथ ही क्षेत्र के जीवन की विषमताओं का भी बखूबी बयान होता है। ‘को का कैरओ’ बुंदेली काव्य संग्रह में सरल ने अपनी जिन बुंदेली कविताओं को सहेजा है उनमें आंचलिक लालित्यबोध के साथ ही जीवन की कठोरता से सीधा सरोकार दिखाई देता है। कहते हैं न कि अच्छाई धीरे-धीरे आती है लेकिन बुरी आदतें जल्दी जगह बना लेती हैं। संस्कारी बुंदेलखण्ड भी आज तेजी से फैलती जा रही बुरी आदतों से अछूता नहीं रह गया है। इस तथ्य को बड़े ही सुन्दर ढंग से सरल ने अपनी रचनाओं में कुछ इस प्रकार व्यक्त किया है-
सुनो कुरैशी, सुनो तिवारी, समय जो कैसा पलटा खा रओ।
रोज कलारी दारू पीबे, बाप के संगे बेटा जा रओ।।
राम लखन को मजलों मोड़ा, देखो कैसो नाक कटा रओ।
मैतारी खों ठूंसा मारै, घरवारी के पांव दबा रओ।।
बायें से : - भगवान दास रैकवार, डॉ. वर्षा सिंह, वृन्दावन राय सरल एवं डॉ. गजाधर सागर
क्षेत्र के विकास के वादों के प्रति भी कवि सरल कटाक्ष करने से नहीं चूके हैं। वे जनता के भोलेपन को आधार बना कर कथित नेताओं पर तंज करते हुए कहते हैं-
पानी दैहें, बिजली दैहें, ऐसी तो बे रोजई कै रये।
उनकी कही झूठ पै हम तो, खुशी-खुशी भौंरा से भै रये।।
यही कटाक्ष, यही ललकार उनकी बुंदेली ग़ज़ल में भी देखी जा सकती है-
पांच साल तक कहां गड़े रए, उनसे पूछो।
दुख में हमसे काए कटे रए, उनसे पूछो।
तीन साल से पुलस पूछ रई मुन्नी गायब
सांड से पीछे जोन पड़े रए, उनसे पूछो।
उनकी हमसे काए पूछ रए, हमें पता का
रात दिना जो उतई परे रए, उनसे पूछो।
वृन्दावन राय सरल के बुंदेली काव्य में एक चुटीलापन भी है जो उनकी रचनाओं की रोचकता में वृद्धि करता है। यह खूबी उनकी छोटी बहर की बुंदेली ग़ज़लों में भी देखी जा सकती है जिनमें पर्यावरण के प्रति चिन्ता से ले कर भ्रष्टाचारी वातावरण के चित्रण तक को देखा जा सकता है। उदाहरण देखें-
ढूंढो कहां हिरा गओ पानी।
हमसे आज रिसा गओ पानी।
अत्त देख के ई दुनिया के
जाने कहां ससा गओ पानी।
अपसर, नेता, ठेकेदारों
इनखों खूब बना गओ पानी।
जो काव्याभिव्यक्ति बुंदेली में मुखर हुई है, वही संवेदना वृन्दावन राय सरल की हिन्दी रचनाओं में भी व्यक्त हुई है। विशेषता यह कि वे अपनी कठोर से कठोर बात कहते समय भी सरल से सरल शब्दों का चयन करते हैं। ऐसे शब्द जो आम बोलचाल की भाषा से उठाए गए हैं, जिनमें सहजता है और संप्रेषण की ग्राह्यता है। वृन्दावन राय सरल के हिन्दी दोहों में व्यंजनात्मकता का तीखापन देखते ही बनता है। जैसे ये दोहे देखें -
आंधी से अनुबंध कर, चुप हैं पीपल आम।
पौधों को सहने पड़े, इस छल के परिणाम।।
गेंहूं रुपया बीस का, उस पर सौ की दाल।
मंत्री कहें विदेश में, भारत है खुशहाल।।

Sagar Sahitya Chintan-20 Vrindavan Rai Saral - Bundeli -Hindi Me Samaan Dharma Kavi - Dr Varsha Singh

छद्म और आडम्बर से भरा वर्तमान वातावरण किसी भी संवेदनशील मन को विचलित कर सकता है। धर्म और आस्था के नाम पर छल करने वाले बाबाओं ने आम जनता को जिस तरह ठग रखा है वह भी कम पीड़ादायक नहीं है। विश्वास के प्रश्न पर भ्रमित कर देने वाले समय में मनुष्य अपने मनुष्यत्व को बचाए रखे, यही बहुत है। इस मुद्दे पर कवि सरल के ये शेर ध्यान देने योग्य हैं-
हम प्यार के रिश्तों को निभा लें तो बहुत है।
दंगों से वतन अपना बचा लें तो बहुत है।
इस दौर के भगवान, फरिश्तों की भीड़ में
हम खुद को आदमी ही बना लें तो बहुत है।
प्रत्येक रचनाकार सदा सुखद वातावरण की आकांक्षा रखता है। उसकी अभिलाषा होती है कि सभी मनुष्य परस्पर मेलजोल से रहें। लोगों के बीच वैमनस्य न रहे तथा जो आम जनता को जाति, धर्म, समुदाय के खानों में बांटने का प्रयास करते हैं वे अपने मंसूबों में कभी सफल नहीं हों। इसीलिए कई बार कवि अलगाववादियों से सीधा संवाद करने से नहीं चूकता है। यही भाव सरल के इस मुक्तक में देखे जा सकते हैं-
दूरियां दिल में बढ़ाने की सियासत छोड़ो।
जख्म तलवार से सिलने की रिवायत छोड़ो।
आग नफरत की न नफरत से बुझा पाओगे
आग से आग बुझाने की ये आदत छोड़ो।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि कवि वृन्दावन राय सरल ने अपनी बुंदेली और हिन्दी दोनों कविताओं से देश के मंचों पर सागर नगर का नाम रौशन करने के साथ ही अपनी सृजनात्मकता की निरन्तरता को भी साधे रखा है।
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( दैनिक, आचरण दि. 11.07.2018)
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सागर : साहित्य एवं चिंतन -13 हिन्दी ग़ज़लों में खरे उतरते अशोक मिजाज़ - डॉ. वर्षा सिंह

डॉ. वर्षा सिंह
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के वरिष्ठ ग़़ज़लकार अशोक मिज़ाज की ग़ज़लों पर। पढ़िए और मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को जानिए ....,
सागर : साहित्य एवं चिंतन
हिन्दी ग़ज़लों में खरे उतरते अशोक मिजाज़
- डॉ. वर्षा सिंह
23 जनवरी 1957 को सागर में जन्मे, उर्दू ग़ज़ल में अच्छी-खासी दखल रखने वाले शायर अशोक मिज़ाज ने जब हिन्दी ग़ज़ल के क्षेत्र में क़दम रखा तो ग़ज़ल के छांदासिक निभाव की कोई कठिनाई उनके सामने नहीं थी। अशोक मिज़ाज ने हिन्दी ग़ज़ल के यथार्थवाद को बड़ी खूबसूरती से साधा है। अशोक मिज़ाज की ग़ज़लों का सरोकार आज की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और यहां तक कि पारिवारिक दशाओं से भी है। मिज़ाज कहते हैं कि -
मेरे लफ़्जों के परदे में मेरा संसार देखोगे
कभी तनहाइयों में जब मेरे अश्आर देखोगे
दिखाई कुछ नहीं देगा, समझ में कुछ न आएगा
गुज़रती रेल की जब पास से रफ़्तार देखोगे
अशोक मिज़ाज एक ग़ज़लकार ही नहीं अपितु ग़ज़ल के शिल्प और कथ्य के प्रति सजग और अध्ययनशील चिंतक भी हैं। शिल्पगत रूप में ग़ज़ल को ठीक उसी रूप में स्वीकार करने में कोई कोताही नहीं बरतते हैं जिस रूप में ग़ज़ल अरबी, फ़ारसी कर बहरों की रचना-ध्वनि के निश्चित क्रम में अपनी पैदाईश के समय सामने आई थी। शिल्प के मामले में अशोक मिज़ाज जहां एक ओर चौकन्ने रह कर अरबी की प्रचीन बहरों में अपनी प्रतिबद्धता प्रकट करते हैं, वहीं कथ्य और भाषा के मामले में अर्वाचीन प्रयोगवादिता को स्वीकार करते हुए समकालीन सोच की दस्तावेज़ी ग़ज़लें कहने में अपनी पूरी क्षमता का प्रदर्शन करते हैं। उनकी ग़ज़लों में वैयक्तिक प्रबुद्धता साफ़ दिखाई देती है। जैसे यह शेर -
बदल रहे हैं यहां सब रिवाज़ क्या होगा
मुझे ये फ़िक्र है, कल का समाज क्या होगा
दिलो-दिमाग़ के बीमार हैं जहां देखो
मैं सोचता हूं यहां रामराज क्या होगा
Sagar Sahitya Chintan -13  Hindi Ghazalon me khare utarate Ashok Mizaj  - Dr Varsha Singh
सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संदर्भों के बिम्ब भी इन ग़ज़लों में बखूबी उभर कर आए हैं। तेजी से बदलते परिवेश को ले कर अशोक मिज़ाज की चिन्ता इन शब्दों में मुखर होती है, यह उदाहरण देखें -
फैला हुआ है ज़हरे-सियासत कहां-कहां
करते फिरेंगे आप हिफ़ाज़त कहां-कहां
मज़हब धरम के नाम पे हमने ये क्या किया
शरमा रही है आज रफ़ाक़त कहां-कहां
बायें से : - डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह एवं अशोक 'मिज़ाज'

समसामयिक मूल्यों के पतन पर गहरी चोट करते इन मिसरों की व्यंजना प्रत्येक व्यक्ति को आत्म मंथन करने को विवश कर सकती है। आज हम जिस परिवेश और यथार्थ में सांसें ले रहे हैं,वह पूरी तरह से कष्टदायी है। एक प्रबुद्ध गजलकार के नाते अशोक मिज़ाज इस पीड़ा को अच्छी तरह समझते हैं और अपनी गजलों में व्यक्त करते हैं। इसीलिए उनके शेर वर्तमान राजनीति के गिरते स्तर पर तीखा कटाक्ष करते हैं। एक बानगी देखिए -
सियासत में हमारा भी कुछ ऐसा हाल है जैसे
किसी बदनाम औरत से शराफ़त हार जाती है
बड़े लोगों के कपड़ों तक कहां कीचड़ पहुंचता है
अगर दौलत हो, ओहदा हो, ज़िल्लत हार जाती है
भूमंडलीकरण और उपभोक्तावाद की भागमभाग में जीवन की सरसता कहीं खोती जा रही है। औद्योगिक नगरों के रूप में असंवेदनशीलता का विस्तृत मरुथल सामने दिखाई देता है। जो शहर अभी आत्मीयता का अर्थ जानते हैं, वे भी तेजी से अपरिचय का लबादा ओढ़ते जा रहे हैं। इस तथ्य को अत्यंत बारीकी से शायर ने कुछ इस तरह बयान किया है -
ये नगर भी कारखानों का नगर हो जाएगा
इन दरख़्तों की जगह कुछ चिमनियां रह जाएंगी
इस प्रकार की ग़ज़लों में मात्र गहन मानवीय सरोकार है। अशोक मिज़ाज के सरोकार समाज और राजनीति पर आ कर ही नहीं ठहर जाते हैं वरन् काव्य की समकालीन दशा के प्रति भी चिन्ता प्रकट करते हैं। उनकी चिन्ता ग़ज़ल जैसी कोमल विधा से खिलवाड़ करने वालों को ले कर भी है। ग़ज़ल जैसी विधा को गंभीरता से न लेने वालों के लिए वे कहते हैं-
कल क्या थी और आज ये क्या हो गई ग़ज़ल
ग़ज़लों की भीड़-भाड़ में ही खो गई ग़ज़ल
अशोक मिज़ाज के संदर्भ में यह बेझिझक कहा जा सकता है कि ग़ज़लकार को समकालीन ग़ज़ल कहने का शऊर हासिल है, उनकी ग़ज़लों में ग़ज़ल का मिज़ाज मौज़ूद है तो अश्आर अपने फ़ॉर्म और तक़नीकी पहलुओं पर खरे उतरते हैं।
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( दैनिक, आचरण दि. 03.05.2018)
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सागर : साहित्य एवं चिंतन -12 ग़ज़ल लेखन के क्षेत्र में सक्रिय सुबोध श्रीवास्तव ‘सागर’ - डॉ. वर्षा सिंह



डॉ. वर्षा सिंह
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के युवा कवि सुबोध श्रीवास्तव 'सागर' पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

ग़ज़ल लेखन के क्षेत्र में सक्रिय सुबोध श्रीवास्तव ‘सागर’
- डॉ. वर्षा सिंह
         सागर के युवा रचनाकारों में ग़ज़ल लेखन के प्रति समर्पित भाव का रुझान और उत्साह दिखाई देता है। यूं भी ग़ज़ल काव्य की वह विधा है जिसने भले ही अरबी और फारसी में जन्म लिया किन्तु हिन्दुस्तान की जमीन पर आने के बाद उर्दू से होती हुई हिन्दी में अपनी जगह बनाती चली गई। अब तो ब्रज, बुंदेली, अवधी, भोजपुरी आदि आंचलिक बोलियों में भी बेहतरीन ग़ज़लें लिखी जा रही हैं। जहां तक सागर नगर का प्रश्न है तो यहां एक से एक ग़ज़ल लिखी गई हैं। जैसा कि कहा जाता है कि किसी भी कविमना को ग़ज़ल स्वतः अपनी ओर आकर्षित करती है और ग़ज़लकार से वह लिखवा लेती है जो वह चाहती है। सागर नगर के सुबोध श्रीवास्तव ‘सागर’ एक ऐसे ही युवा ग़ज़लकार हैं जिन्हें लेखन के क्षेत्र में अभी कम ही समय हुआ है लेकिन अपनी ग़ज़लों के माध्यम से एक अलग पहचान बनाते जा रहे हैं।
सुबोध श्रीवास्तव

25 जून 1971 को सागर में जन्मे सुबोध श्रीवास्तव ‘सागर’ ने डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से गणित में एम.एससी. किया। इस दौरान उन्हें ग़ज़ल सुनने का शौक लगा। धीरे-धीरे वे ग़ज़ल के उतार-चढ़ाव में इतने रम गए कि स्वयं भी ग़ज़लें लिखने लगे। उनका कहना है कि ‘‘पहले यूं ही एकाध शेर लिख कर खुश हो लेता था लेकिन लगभग सन् 2014 से मैंने ग़ज़ल लेखन को गंभीरता से लिया। लोगो ने मुझे प्रोत्साहित किया, मेरी ग़ज़लों को सराहा जिसका परिणाम है कि आज मेरा पहला ग़ज़ल संग्रह ‘सिरे से ख़ारिज़’ प्रकाशन प्रक्रिया में है।’’
सुबोध श्रीवास्तव ‘सागर’ स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय, सागर में फाईनेंस ऑफीसर के पद पर कार्यरत हैं। वे अपने इस गणतीय कार्य के साथ ही स्वयं को ग़ज़ल लेखन से सतत जोड़े हुए हैं। सुबोध की ग़ज़लों में वर्तमान वातावरण की शुष्कता पर कटाक्ष के साथ ही नवीन बिम्ब देखने को मिलते हैं। उनकी यह ग़ज़ल देखें -
आदमी अब आदमी को बस गारा है
इस माहौल में डूबा चमन सारा है
जीस्त का सच मैं तुमको बतलाता हूं
दो बिंदुओं के बीच सफ़र सारा है
देख के कब्र को बताना मुमकिन नहीं
इनमें से कौन जीता, कौन हारा है
Sagar Sahitya Chintan -12 Ghazal Lekhan Ke Kshetra Me Sakriya Subodh Shrivastav Sagar  - Dr Varsha Singh
एक तीखी स्पष्टवादिता भी सुबोध की ग़ज़लों में उभर कर आती है। राजनीति और समाज में व्याप्त अव्यवस्थाओं से मिली कड़वाहट को वे उतनी ही कठोरता से अपनी ग़ज़लों में उतारते हैं जितनी कठोरता उस कड़वाहट को झेलने के बाद किसी भी संवेदनशील व्यक्ति में उत्पन्न हो सकती है। बिना लाग-लपेट के कही कई बात कितनी भी चुभे या खटके लेकिन उसकी सच्चाई को नकारना कठिन होता है। यह तथ्य सुबोध की इस ग़ज़ल में कुछ इस अंदाज़ में आया है कि -
ऐसी कि तैसी ऐसे निजाम की
तेरी हलाल की, मेरे हराम की
जम्हूरियत की बात सुनते नहीं वो
सुनते हैं तो पंडित की, इमाम की

यह तल्ख़ अंदाज़ उनकी कुछ और ग़ज़लों में भी देखा जा सकता है जिसमें वे आज के इंसान की प्रवृत्तियों पर प्रहार करते हुए कहते हैं कि -
इंकलाब की बातों पर खूब ताली बजाएंगे
ये शरीफ़ लोग हैं फिर चुपचाप घर जाएंगे
पहले ये देखेंगे तमाशा बुज़दिली के साथ
फिर शाम को चौराहे पर मोमबत्ती जलाएंगे

आज जिस प्रकार पर्यावरण में प्रदूषण का जहर घुलता जा रहा है और देश की राजधानी दिल्ली हर साल जाड़ों में स्मॉग की चपेट में आ जाती है, वह हमारी पर्यावर को बचाने के प्रयासों पर प्रश्नचिन्ह लगाती है। दिल्ली सरकार भी इस बात को स्वीकार कर चुकी है कि दिल्ली की हवा में प्रदूषण का स्तर खतरे के निशान को छूने लगा है। इस हालात पर तेज करते हुए सुबोध ‘सागर’ ने लिखा है कि -
अपनी जेब में अपना ही पता रखिए
आप दिल्ली में अपनों को बता रखिए
ज़हर फैल चुका है यहां की फिजाओं में
हो सके तो साथ अपने लिए हवा रखिए
बायें तरफ से प्रथम डॉ. वर्षा सिंह सुबोध श्रीवास्तव का कविता पाठ सुनते हुए


रोजी-रोटी के लिए गांव छोड़ कर शहर की ओर पलायन की विवशता सदियों से चली आ रही है। अपना गांव, घर और अपनों को छोड़ कर अनजान शहर में दर-दर भटकना कितना पीड़ादायक होता है यह कोई भुक्तभोगी ही भली-भांति बता सकता है या फिर वह कवि जिसने इस पीड़ा की तह तक पहुंच कर उसे अपनी संवेदनाओं से महसूस किया हो। सुबोध श्रीवास्तव ‘सागर’ ने अपनी एक ग़ज़ल में इस पीड़ा को बखूबी उतारा है। बानगी देखिए -
आ तो गए गांव छोड़ कर इधर, बाबा
मकानों में ढूंढ रहे हैं कोई घर, बाबा
लोगो जैसा ही मिजाज नगर का है
सर्दी में भी पसीने से तरबातर, बाबा
मिलना न मिलना, ये अलग बात है
रखता नहीं मैं कोशिशों में कसर, बाबा
दुआ ‘सागर’ अब भी काम करती है
दवाओं में नहीं रहा अब असर, बाबा

ऐसा नहीं है कि सुबोध ‘सागर’ की ग़ज़लों में सिर्फ तंज और तल्खियां ही हों, वे रूमानीयत की ग़ज़लें भी लिखते हैं। ये शेर देखें-
मुझको इश्क़ का कोई तजुर्बा न था
वो शख़्स वैसे ठीकठाक, पर भला न था
रकीबों ने अपना काम बाखूबी किया है
तुमको वो सुनाया मैंने जो कहा न था

सुबोध के किसी-किसी शेर में एक अनूठा चुटीलापन भी दिखाई देता है जो उसे पढ़ने या सुनने वाले को हंसाता और गुदगुदाता भी है। ये उदाहरण देखें-
वो कहता है, इस दौलत में धरा क्या है
यारो पता करो, आखिर माज़रा क्या है
हूरें तो सब की सब बंट चुकी होंगी
मेरे वास्ते जन्नत में अब रखा क्या है

सुबोध श्रीवास्तव ‘सागर’ की ग़ज़लों में विचार और संवेदना का क्षेत्र विस्तृत है और अभिव्यक्ति में सहजता है जो ग़ज़ल के क्षेत्र में उनकी संभावनाओं को आश्वस्ति प्रदान करता है।
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( दैनिक, आचरण दि. 27.06.2018)
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सागर : साहित्य एवं चिंतन -7 डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ की ग़ज़लों के सरोकार - डॉ. वर्षा सिंह



Dr Varsha Singh
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के वरिष्ठ समीक्षक एवं साहित्यकार डॉ. अनिल जैन 'अनिल' की ग़ज़लों के सरोकार पर। पढ़िए और मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को जानिए ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ की ग़ज़लों के सरोकार
- डॉ. वर्षा सिंह

सागर नगर में साहित्य की उर्वरा भूमि ने सभी विधाओं को समान रूप से अवसर दिया है। यहां कवि भी हैं, शायर भी हैं, नाटककार भी हैं, निबंधकार, कहानीकार भी हैं। जहां तक ग़ज़लों का सवाल है तो यह सार्वभौमिक रूप से सागर में भी बेहद लोकप्रिय विधा है। सागर में ग़ज़लगोई करने वालों में एक उल्लेखनीय नाम है अनिल जैन ‘अनिल’ का जिन्हें डॉ. अनिल जैन और डॉ. अनिल कुमार जैन के भी नाम से लोग जानते हैं। 27 जून 1956 को सागर में जन्में डॉ. अनिल जैन बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। वे बी.फर्मा हैं, वैद्य विशारद और आयुर्वेद रत्न उपाधि प्राप्त होने के साथ ही पंजीकृत आयुर्वेद चिकित्सक भी हैं। विशेषता यह कि उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से मास्टर ऑफ म्यूजिक की उपाधि भी प्राप्त की है, जो उनके संगीत प्रेम का भी द्योतक है। डॉ. अनिल की अभिनय और फोटोग्राफी में भी बेहद दिलचस्पी है। साहित्य सृजन के क्षेत्र में उन्होंने ग़ज़लों के साथ ही गीत, दोहे, रुबाईयां, लघुकथायें, व्यंग्य लेख और नाटक भी लिखे हैं। ‘जज़्बा’ के नाम से उनका एक ग़ज़ल संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। डॉ. अनिल जैन हिन्दी-उर्दू मजलिस नामक साहित्यिक संस्था के संस्थापक हैं तथा विगत 16 वर्षां से साहित्यिक वार्षिक पत्रिका ‘परिधि’ का संपादन कर रहे हैं।
डॉ. अनिल जैन की ग़ज़लों में आघ्यात्म और भावना का सुन्दर समन्वय मिलता है। उनकी ग़ज़लों में अव्यवस्थाओं के प्रति प्रतिकार की भावना है और एक साफगोईपन है, जैसे ये शेर देखें -
हमको मत समझाओ हम सब जानते हैं।
हम वही करते हैं जो हम ठानते हैं।
तुम कहो, कुछ भी कहो, कहते रहो तुम
हम तो बस अपनी अक़ीदत मानते हैं।
बायें से :- डॉ. अनिल जैन, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह एवं डॉ. वर्षा सिंह


अनुभवों के अनेकों पड़ावों से गुज़रते हुए डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ हर लम्हे की वास्तविकता को अपनी दृष्टि से परखते हैं और फिर उन्हें अपनी ग़ज़लों में पिरोते हैं। डॉ. अनिल की ग़ज़लों में अदायगी की खूबी है तो कहन की वज़नदारी भी। समय की गंभीरता है तो श्रृंगार का कोमलपन भी। वे बड़ी संज़ीदगी से इश्क़ की बात करते हैं-
इश्क़ में वो मुक़ाम आया है।
दिल को खोया है दर्द पाया है।
आह, आंसू, उदास शामो-सहर
इश्क़ तोहफ़े में साथ लाया है।
Sagar Sahitya Chintan -7 Dr Anil Jain Anil Ki Ghazalon Ke Sarokar sarokar - Dr Varsha Singh


किसी शांत स्वच्छ झील में एक कंकर उछाला जाता है तो पानी में तरंगें उठने लगती हैं। वैसे ही जब कोई बात मन को छू जाती है तो मन में भावनाओं की तरंगे हिलोरे लेने लगती हैं और तभी सृजित होती है इस प्रकार की ग़ज़ल -
इसी उम्मींद में हम तो इधर निकल आए।
नदी नहीं न सही, इक नहर निकल आए।
यूं हाथ, हाथ पे रख बैठने से क्या होगा
करें कुछ आप कोई रहगुज़र निकल आए।

अभिव्यक्त का लहज़ा हरेक ग़ज़लकार की अलग पहचान बन जाता है. ग़ज़लगोई एक संवेदनशील क्रिया है। वस्तुतः यह एक अनुभूति है जो मन की भावनात्मक हलचल से उपजती है और काव्यात्मक अभिव्यक्ति के लिए विवश कर देती है। लेकिन यह अभिव्यक्ति तभी सार्थकता का चोला पहनती है जब उसे पढ़ने और सुनने वाला उसे अपनी अभिव्यक्ति महसूस कर गुनगुना उठता है। डॉ. अनिल की ग़ज़लों में यह खूबी है। एक बानगी देखिए -
हर मौसम का आना-जाना इन आंखों ने देखा है।
फूल का खिलना फिर मुरझाना इन आंखों ने देखा है।
कैसा प्यार, मुहब्बत कैसी, सभी क़िताबी बातें हैं
खेल के दिल से दिल बहलाना इन आंखों ने देखा है।

आज हम जिस परिवेश और यथार्थ में सांसें ले रहे हैं, वह पूरी तरह से चुनौतीभरा है। एक प्रवुद्ध ग़ज़लकार के नाते डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ इस पीड़ा को अच्छी तरह समझते हैं और अपनी ग़ज़लों में व्यक्त करते हैं। उनके शेर वर्तमान हालात पर कटाक्ष करते हैं -
खो गई सारी दुआएं, शहर में क्या गांव में।
अब नहीं मिलती वफ़ाएं, शहर में क्या गांव में।
क्या ग़लत है, क्या सही है, आदमी की जात को
सर नहीं इसमें खपाएं, शहर में क्या गांव में।
यथार्थ की विसंगतियों की खुरदरी ज़मीन तैयार करता है तो दूसरी ओर कल्पना और सौन्दर्य एक ऐसी दुनिया रचता है जिसमें सब कुछ मीठा और मधुर अहसास कराता है। जैसे डॉ़ अनिल के लम्बे बहर के इन शेरों में अनुभव कीजिए -
निखर गई कली-कली, चमन-चमन महक उठा, बहार ही बहार है।
ये कान में मेरे सनम, है भंवरा गुनगुना रहा, बहार ही बहार है।
ये दिल फ़रेब वादियां, ये शोख-शोख तितलियां, गिरा रही हैं बिजलियां
ये मौसमें बहार है, बहार राग तो सुना, बहार ही बहार है।



डॉ. अनिल जैन ‘अनिल’ की ग़ज़लों के सरोकार दुख से हैं तो सुख से भी हैं, विरह से हैं तो मिलन से भी हैं, जीवन के कठोर यथार्थ से हैं तो कोमल कल्पनाओं से भी हैं। कुलमिला कर एक ऐसी समग्रता डॉ. अनिल की ग़ज़लों में देखने को मिलती है जो उनके भीतर के शायर को अभिव्यक्ति की ऊंचाइयों तक ले जाती है।
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( दैनिक, आचरण दि. 25.04.2018)
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— in Sagar, Madhya Pradesh.



सागर : साहित्य एवं चिंतन - 6 डॉ. गजाधर सागर की ग़ज़लों के सरोकार - डॉ. वर्षा सिंह

Dr Varsha Singh

स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार डॉ. गजाधर सागर की ग़ज़लों के सरोकार पर। पढ़िए और मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को जानिए ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

डॉ. गजाधर सागर की ग़ज़लों के सरोकार
- डॉ. वर्षा सिंह

सागर नगर के काव्यात्मक पन्ने पर ग़ज़ल विधा के संदर्भ में यूं तो कई नाम हैं किन्तु अपने काव्यात्मक सरोकारों के कारण एक नाम अलग से रेखांकित किया जा सकता है और वह नाम है डॉ. गजाधर सागर का। एक लम्बे अरसे से डॉ. गजाधर सागर ग़ज़लें लिख रहे हैं। उनकी ग़ज़लों का समसामयिक परिवेश से सरोकार साफ़-साफ़ दिखाई देता है। चूंकि डॉ. सागर को उर्दू ग़ज़ल के शिल्प का भी बखूबी ज्ञान है इसलिऐ वे बड़ी सरलता से अपनी ग़ज़लों को उर्दू लहज़े में ढालते हैं।
कभी इस पार जाते हैं, कभी उस पार जाते हैं।
परिंदे सरहदों को तोड़ सौ-सौ बार जाते हैं।
मसाइब के पहाड़ों से, वो कैसे पार पाएंगे
इरादे जो कि पहले से, ही हिम्मत हार जाते हैं।

जब से हिन्दी ग़ज़ल के रूप में ग़ज़लों का एक और भाषाई रूप परवान चढ़ा तब से उर्दू और हिन्दी ग़ज़लों के शिल्प को ले कर चिन्तन भी जन्मने लगा। संदर्भगत् चर्चा आवश्यक है कि ग़ज़ल में शब्द के सही तौल, वज़न और उच्चारण की भांति काफ़िया और रदीफ़ का महत्व भी अत्यधिक है। काफ़िया के तुक (अन्त्यानुप्रास) और उसके बाद आने वाले शब्द या शब्दों को रदीफ़ कहते है। काफ़िया बदलता है किन्तु रदीफ़ नहीं बदलती है। उसका रूप जस का तस रहता है। मतला के दोनों मिसरों में तुक एक जैसी आती है और मकता में कवि का नाम या उपनाम रहता है। मतला का अर्थ है उदय और मकता का अर्थ है अस्त। उर्दू ग़ज़ल के नियमानुसार ग़ज़ल में मतला और मक़ता का होना अनिवार्य है वरना ग़ज़ल अधूरी मानी जाती है। लेकिन आज-कल ग़ज़लकार मकता के परम्परागत नियम को नहीं मानते है और इसके बिना ही ग़ज़ल कहते हैं। कुछेक कवि मतला के बगैर भी ग़ज़ल लिखते हैं लेकिन बात नहीं बनती है; क्योंकि गज़ल में मकता हो या न हो, मतला का होना लाज़मी है जैसे गीत में मुखड़ा। गायक को भी तो सुर बाँधने के लिए गीत के मुखड़े की भांति मतला की आवश्यकता पड़ती ही है। ग़ज़ल में दो मतले हों तो दूसरे मतले को ’हुस्नेमतला’ कहा जाता है। शेर का पहला मिसरा ’ऊला’ और दूसरा मिसरा ’सानी’ कहलाता है। दो काफ़िए वाले शेर को ’जू काफ़िया’ कहते हैं। डॉ.
गजाधर सागर ग़ज़ल के शिल्पगत नियमों का गंभीरता से पालन करते हैं। उदाहरण देखिए -
जो हो सके तो ज़ीस्त में इतना कमाल कर
अपनी ख़ुशी से और को भी कुछ निहाल कर।
अय दिल हज़ार बार सही देखभाल कर।
किरदार को ज़रूर ही रख ले संभाल कर
ये वक़्त कह रहा है कि इतना ख़्याल कर।
अपने लिए न और का जीना मुहाल कर
जिन को दिया था हमने कलेजा निकाल कर।
Sagar Sahitya Chintan -6  Dr Gajadhar Sagar Ki Ghazalon Ke Sarokar - Dr Varsha Singh

हिन्दी में गज़ल लिखने की परम्परा काफी पुरानी है। अमीर खुसरो को यदि हिन्दी का पहला रचनाकार माना जाता हैं तो हिन्दी के पहले गजलकार भी अमीर खुसरो ही हैं। अमीर खुसरो ने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी काव्य रचना की अंगभूत विधा के रूप में ग़ज़ल रचना का भी सूत्रपात कियाद्य ख़ुसरो ने अपने समय की प्रचलित खड़ी बोली अर्थात् हिन्दवी में काव्य रचना की प्रक्रिया में फारसी साहित्य की इस प्रमुख विधा के कलेवर को अपनाकर नए प्रयोग के साथ उसे नया मुकाम देने की कोशिश की। ग़ज़ल का रदीफ़ फ़ारसी में है और क़ाफ़िया हिन्दवी में है। खुसरो के बाद कबीर और मीरा ने भी अपनी भक्ति भावना को व्यक्त करने के लिए इस विधा को अपनाया। शेर में काफिया का सही निर्वाह करने के लिए उससे सम्बद्ध कुछ एक मोटे-मोटे नियम हैं जिनको जानना या समझना कवि के लिए अत्यावश्यक हैं। दो मिसरों से मतला बनता है जैसे दो पंक्तिओं से दोहा। मतला के दोनों मिसरों में एक जैसा काफिया यानि तुक का इस्तेमाल किया जाता है। इस तारतम्य में डॉ. गजाधर सागर का यह मतला देखें -
हर दिल में आ चली हैं तभी से ख़राबियां।
चेहरों पे जब से आ गई हैं बेहिजाबियां।
बायें से :- डॉ. वर्षा सिंह, डॉ. गजाधर सागर, विश्व जी, डॉ. (सुश्री) शरद सिंह


ग़ज़ल की अपनी पृष्ठभूमि और हिंदी साहित्य की सामंती एवं दरबारी मानसिकता विरोधी प्रकृति इसका प्रमुख कारण रहा है। फ़ारसी साहित्य में विलासी राजाओं के विलास और मनोरंजन के लिए गज़लकार आशिक और माशूका की रोमैंटिक कथाओं को अभिव्यक्त करते थे। इसमें आम जनता के दुःख दर्द या प्रगतिशील चेतना की अभिव्यक्ति की कोई संभावना नहीं थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर हजारी प्रसाद द्विवेदी और रामविलास शर्मा ने हिंदी की साहित्य परंपरा में इसे सामंती एवं दरबारी चेतना मानते हुए ऐसे विषयों को साहित्य के लिए वर्जित घोषित किया है । यही कारण है कि जब शमशेर ने पारंपरिक रूमानी संस्कार के दायरे से बाहर आकर ग़ज़ल को लोक जीवन की सच्चाई और समग्रता से जोड़ने का ‘दुस्साहस’ किया तो डॉ. राम विलास शर्मा ने यह कहकर खारिज कर दिया कि“ ग़ज़ल तो दरबारों से निकली हुई विधा है, जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है !“ लेकिन भारतीय कवियों ने उनके इस विचार को झुठलाते हुए ग़ज़ल को भारतीय मानको पर स्थापित ही नहीं किया बल्कि बेहद लोकप्रिय विधा बना दिया। शायरों ने आमज़िन्दगी की दुश्वारियों को अपनी ग़ज़लों का विषय बनाया और उसे पूरी संज़ीदगी से सामने रखा। यही खूबी डॉ. गजाधर सागर के इन शेरों में देखी जा सकती है-
उनसे कभी तो पूछिए होती है भूक क्या
देखे हैं जिनने वक़्त पे पत्थर उबालकर।
“सागर“ चले चले न चले दोस्ती मगर
हर्गिज़ न दोस्ती में कभी तू सवाल कर।

डॉ. गजाधर सागर आज मानवता के गिरते हुए स्तर से परेशान नज़र आते हैं। उनका मानना है कि जो व्यक्ति दूसरों के दुख-दर्द में शामिल हो और दूसरों के काम आए वही सच्चा इंसान है।
बुग़्ज़ कीना रखे है, आदमी आज दिल में
आदमीयत रखे जो, आदमी वो सही है।
तीरगी के मुक़ाबिल, हो चिराग़ां भले कुछ
जो मिटा दे अंधेरा, रौशनी वो सही है।

अपनी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. सागर कहते हैं कि सूरतें भले ही कितनी भी अच्छी क्यों न हों लेकिन जिनके मन में खोट है वे भलाई का काम कर ही नहीं सकते हैं -
सूरतें वो ,हैं भला किस ,काम की
ठीक ही जिन ,की नहीं हैं ,सीरतें

ऐसा नहीं है कि डॉ. सागर का सरोकार ज़िन्दगी के सिर्फ़ खुरदरेपन से हो, वे कोमल भावनाओं को भी उसकी शिद्दत से अपनी ग़ज़लों में रखते हैं-
रोज़ मिलने का बहाना हो गया
आपसे जब दोस्ताना हो गया
अब न भटकेगा ये दिल दर दर कभी
एक जब पुख़्ता ठिकाना हो गया
आपकी चाहत के सादे तीर का
ख़ुद-ब-ख़ुद ये दिल निशाना हो गया

सागर नगर के काव्य-संसार में डॉ. गजाधर सागर ने अपनी जो जगह बनाई है वह उनके सामाजिक सरोकारों के रूप में उनकी ग़ज़लों में तो दिखाई देती ही है, साथ ही उन्हें एक संज़ीदा शायर के रूप में स्थापित करती है।
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दैनिक, आचरण दि. 14.04.2018)
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— in Sagar, Madhya Pradesh.