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Tuesday, October 23, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 31- विपुल संभावनाओं के युवा कवि अक्षय अनुग्रह - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के युवा कवि अक्षय अनुग्रह पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

विपुल संभावनाओं के युवा कवि अक्षय अनुग्रह
             - डॉ. वर्षा सिंह
                                 
परिचय :- अक्षय अनुग्रह
जन्म :- 27 अप्रैल 1990
जन्म स्थान :- सागर
शिक्षा :- एम.ए.(पॉलिटिकल साइंस)
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन :- पत्र-पत्रिकाओं में ।
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             हिन्दी साहित्य जगत में इस समय सबसे बड़ी चिन्ता जिस बात को ले कर है वह है युवाओं में साहित्य के पठन- पाठन और लेखन के प्रति रुझान में कमी। किन्तु सागर नगर के युवा कवि अक्षय अनुग्रह के साहित्यिक सरोकारों को देखते हुए यह चिन्ता धुंधली पड़ती दिखाई देती है। अपनी मां विमला जैन एवं पिता शीलचंद जैन से प्राप्त संस्कारों ने अक्षय अनुग्रह (जैन) को शिक्षा के प्रति समर्पण की भावना प्रदान की। हमेशा पढ़ाई में अव्वल रहने वाले अक्षय अनुग्रह ने बारहवीं कक्षा में प्रदेश की मेरिट लिस्ट में प्रथम स्थान प्राप्त किया। अपनी शिक्षा के प्रति ध्यान केन्द्रित रखते हुए राजनीति विज्ञान में एम.ए. करने के बाद यूनीवर्सिटी ग्रांट कमीशन की जूनियर रिसर्च फोलोशिप प्राप्त की। अक्षय को राजनीतिक विषयों के साथ ही साहित्य और मनोवि़ज्ञान से भी लगाव है। उन्होंने सन् 2016 में योकोहामा, जापान में आयोजित 31वें इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑफ साइकालॉजी ऑन डायवर्सिटी इन हार्मानी- इनसाइट फ्रॉम साइकालॉजी में ‘‘ट्रांसजेंडर इन इंडिया : सीकिंग पॉलिटिकल इनक्लूजन एण्ड एट्टीट्यूड ऑफ प्यूपिल टूवर्डस् इट’’ विषय का अपना पेपर पढ़ा था। अक्षय राष्ट्रीय सेमीनारों में भी अपने पेपरस् प्रस्तुत कर चुके हैं। श्यामलम् संस्था, सागर द्वारा श्रेष्ठ युवा सम्मान तथा सर्वांगीण विकास संस्थान, सागर द्वारा स्व. सुमि अनामिका स्मृति बहुमुखी प्रतिभा सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।
            अक्षय अनुग्रह की कविताओं में उत्तर आधुनिकता और वैयक्तिकता एक ऐसा समुच्चय दिखाई देता है जो जन और व्यक्ति को एक साथ सम्बोधित करता है। इन कविताओं में गहरी रूमानी भाव ऊर्जा जीवन के अनुभवों एवं अवस्थाओं के विभिन्न स्तरों को रेखांकित करती चलती हैं। अक्षय की कम शब्दों की छोटी कविताओं में भी विचारों और भावनाओं का विस्तार देखा जा सकता है, जैसे एक कविता है ‘अस्तित्व’ -
अपनी अंतिम बूंदों से
एक झिर ने पूछा
क्या तुम अब भी संजोये हो
मेरे नदी होने की स्मृति।
         परम्पराओं का बोध और सृजनशीलता परस्पर मिल कर साहित्य की नवीन अभिव्यक्तियां गढ़ते हैं। अक्षय अनुग्रह ने अपनी कविता ‘ऋणमुक्ति’ लिखते हुए ऐसी ही एक नई इकाई गढ़ने का सुन्दर प्रयास किया है-
फल तोड़ने के लिए फेंका गया पत्थर
जब बुद्ध को लगा था
तब बच्चों को उसके बदले
कुछ न दे पाने के अपराधबोध से
बुद्ध भर गए थे।
मेरे घर के बगीचे में
मिट्टी का एक पहाड़ है
जिस पर अमरूद का एक पेड़ लगा है
और उसके नीचे
ध्यानमग्न बुद्ध की मूर्ति बैठी है
मेरी बेटी अपने दोस्तों के साथ
बुद्ध के कंधों पर चढ़ कर अमरूद तोड़ती है।

           
Akshay Anugrah
  परिवेश में होने वाले परिवर्तनों से साहित्यकारों का सीधा सरोकार रहता है। वे प्रत्येक परिवर्तन के प्रस्थानबिन्दु से ले कर उसके प्रतिफलन तक अपनी दृष्टि जमाए रहते हैं, क्योंकि वे जानना चाहते हैंसमाज पर पड़ने वाले उसके प्रभावों के बारे में। समय का बदलना परिवेश का बदलना ही तो है। बिम्ब बदलते हैं, मानक बदलते है, उपमा और रूपक भी बदल जाते हैं। इस परिवर्तन को अपनी कविता में पिरोते हुए अक्षय अनुग्रह ने लिखा है-
अब कभी नहीं लिखी जा सकेंगी वे कविताएं
जिनमें निर्मल नदी को छूते हुए
संदेश ले जाते मेघों की कल्पना हो
न ही बुना जाएगा नायिकाओं का सौंदर्य
झरनों से बनते इंद्रधनुष के रंगों से
अब नहीं महकेंगी कविताएं
बेला, रातरानी और रजनीगंधा सी
न ही बरसेंगे शब्द
बरसते हुए हरसिंगार से अब नहीं पैदा होंगे
कालिदास, टौगोर, निराला, पंत
अब प्रकृति को देख कलम
सौंदर्य की कविताएं नहीं लिखती
तनाव की रेखाएं गूद देती हैं,
हमने अपने बच्चों को
प्रकृति से ही वंचित नहीं किया
बल्कि कितनी ही सुन्दर कविताएं
जो वे लिख पाते
उनके गर्भ में ही मार दीं
उस खून से वे लिखते रहेंगे
अदालतों में याचिकाएं
सरकार, बाजार और विकास से
पर्यावरण की रक्षा की गुहार की।
Sagar Sahitya avam Chintan  - Dr. Varsha Singh
               अक्षय अनुग्रह की कविताओं में एक सकारात्मक विद्रोह झलकता है। यह विद्रोह वंचितों को उनके अधिकार दिलाने, सोए हुओं को जगाने तथा आंतरिक अग्नि को प्रज्वलित करने का आह्वान है। अनुग्रह का यह विद्रोह उस बिम्ब को रचता है जिसमें लड़कियां अपने प्रकृतिदत्त स्वरूप में आत्मविश्वास के साथ विकसित होती दिखाई देती हैं। कविता का यह अंश देखिए-
मुझे नहीं सुहाती
तुम्हारी अच्छी और सीधी-सादी लड़कियां
वो जो केवल उन्हीं रास्तों पर चलती रहीं
जिन्हें तुमने तय किया था,
मुझे तो पसन्द हैं वो लड़कियां
जिनके चलने से बनती चली जाती हैं
संकरी और घुमावदार पगडण्डियां
जैसे शास्त्रीय अनुशासनों को तोड़ कर
कोई कलाकार अपने कैनवास पर
एक नए ढंग का चित्र उकेरता है
वो जिनका बचपन मटमैले रंग का होता है
जिनकी फ्राक पर चारकोल के दाग लगे रहते हैं
लड़कियों पर केन्द्रित इस लम्बी कविता की अंतिम पंक्तियों में अनुग्रह स्पष्ट कहते हैं कि- ‘‘ऐसी अनगढ़ और खुद को खुद से/तराशने वाली लड़कियां पसन्द हैं मुझे’’।
             अक्षय अनुग्रह की एक और लम्बी कविता है- ‘रिफ्यूजी परिन्दे’। इस कविता का यह मार्मिक अंश देखिए जिसमें कवि ने वाल्मीकि का रूपक रचते हुए उन व्यक्तियों को धिक्कारा है जो पर्यावरण को चोट पहुंचा कर पक्षियों को भी बेघर कर रहे हैं-
कितना सन्नाटा था
आज इस आसमानी कोलाहल में
जो जमीन खो चुकी थी
मांएं चोंच से दाना झटक कर
चींख भी नहीं पायीं
उम्मीद थी चूंजों के मिलने पर
दाना खिलाने की,
अगर स्तन होते
तो बहने लगता दूध बिना चूसे ही
इनके दर्द पर तुम कहां थे वाल्मीकि!
अपना काव्यमय श्राप क्यों नहीं दिया तुमने
एक क्रोंच जब रोयी तो रामायण लिख दिए
इन बेघरों पर क्यों खामोश रहे तुम।
आज के रोबोटिक युग में सम्वेदनाओं पर यांत्रिकता इस तरह प्रभावी हो चली है कि प्रेम अपने दीर्घकालिक अनुभूति होने का स्थान खाने लगा है। प्रेम में कोमलता का स्तर घटता जा रहा है। ऐसे शुष्क समय में युवा कवि अक्षय अनुग्रह की यह छोटी सी कविता प्रेम के सरस भविष्य के प्रति एक आश्वस्ति प्रदान करती है-
यदि तुम नदी होती तो
बारिश की हर बूंद को
चख कर बरसने देता तुम पर
आंसुओं से जब भी तुम्हें भिगाया
पहले उन्हें उबाला है।
             अक्षय अनुग्रह की साहित्य के प्रति प्रतिबद्धता को देखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि वे सागर नगर के युवा साहित्यकारों में विपुल सम्भावनाओं के कवि हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 23.10.2018)
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Wednesday, October 3, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 30 - विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी : कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों,
       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के वरिष्ठ कवि मणिकांत चौबे 'बेलिहाज' पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....
 
सागर : साहित्य एवं चिंतन

विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी : कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज
                  - डॉ. वर्षा सिंह
                           
परिचय :- मणिकांत चौबे
जन्म   :- 02 अक्टूबर 1946
जन्म स्थान :- सागर (म.प्र.)
शिक्षा :- मैट्रिक एवं हिन्दी साहित्य सम्मेलन की परीक्षाएं उत्तीर्ण
लेखन विधा :- गद्य एवं पद्य

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सागर नगर में स्व.श्री जे.पी. चौबे एवं श्रीमती भगवती चौबे के पुत्र मणिकांत चौबे स्पष्टवादी व्यक्ति के रूप में जाने जाते हैं। संभवतः अपने इसी स्वाभाव के कारण उन्होंने अपना उपनाम रखा ‘बेलिहाज बुन्देलखंडी’। मित्रों और परिचितों के बीच वे ‘बेलिहाज’ उपनाम से ही पुकारे जाते हैं। एक कहावत है कि जो स्पष्टवक्ता होता है, वह दिल का भी साफ होता है। यह कहावत मणिकांत बेलिहाज पर खरी उतरती है। उनके बारे में यह प्रचलित है कि वे राजनीति में भी रुचि रखते हैं किन्तु किसी सं झूठे वादे नहीं करते हैं। जो काम उनके वश में होता है उसी के लिए वे हामी भरते हैं, अन्यथा तत्काल साफ मना कर देते हैं। उनके इस तरह काम करने से मना करने पर सामने वाले व्यक्ति को भले ही दो पल के लिए बुरा लगे किन्तु बाद में वह इस बात के लिए उन्हें धन्यवाद देता है कि उन्होंने उसे भुलावे में नहीं रखा। उनका यह स्वभाव कवि मणिकांत चौबे को एक विशिष्ट व्यक्ति बनाता है। जिंदादिल, हंसमुंख और कर्मठता - ये तीनों गुण भी उनमें मौजूद हैं।
मणिकांत चौबे ‘बेलिहाज’ नगर की विभिन्न साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन की सागर जिला इकाई के महामंत्री हैं। बुंदेलखंड हिन्दी साहित्य संस्कृति विकास मंच के संयोजक महामंत्री हैं तथा हिन्दी उर्दू साहित्यकार मंच के भी संयोजक हैं। तरुण साहित्य एवं सांस्कृतिक मिलन संस्था जबलपुर की सागर इकाई के महासचिव हैं। इन संस्थाओं के अतिरिक्त बज़्में दाग़, नगर साहित्यकार समिति, कलमकार परिषद् भोपाल की सागर इकाई, सरस्वती नाट्यमंच, विद्यापुरम साहित्यकार समिति के भी सक्रिय पदाधिकारी हैं। मणिकांत चौबे वरिष्ठ नागरिक मंडल, सागर के सचिव तथा संस्कृत महाविद्यालय, धर्मश्री सागर के उपाध्यक्ष हैं।
बायें से :- डॉ. वर्षा सिंह, भावुक जी, पूरन सिंह राजपूत एवं मणिकांत चौबे 'बेलिहाज'
गद्य एवं पद्य दोनों विधाओं में अपनी कलम चलाने वाले कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज एक बेहतरीन कार्यक्रम एवं मंच संचालक के रूप में भी जाने जाते हैं। उललेखनीय है कि लगभग पांच हजार आयोजनों का वे सफल मंच संचालन कर चुके हैं। साहित्य के क्षेत्र में विगत 32 वर्ष से सक्रिय रहते हुए उन्होंने हिन्दी साहित्य एवं हिन्दी भाषा के लिए कार्यशालाएं आयोजित की हैं। एकता, सद्भावना एवं सहभागिता के उद्देश्य को ले कर विगत 25 वर्ष से गोष्ठियों का निरंतर आयोजन कर रहे हैं। सन् 1993 से राष्ट्रीय एकता को आधार बना कर कविता पोस्टर प्रदर्शिनी का आयोजन भी उनकी साहित्य सेवा का उल्लेखनीय अवदान है। वैसे अब तक वे आठ नगर स्तरीय, तीन जिला स्तरीय, आठ संभाग स्तरीय एवं एक प्रांतीय स्तर की कार्यशालाएं करा चुके हैं। इसी क्रम में उनकी भावी योजना है कि प्रतिभावान युवाओं के लिए लेखन शिविरों का आयोजन एवं रंगमंच की स्थापना की जाए। मणिकांत चौबे ‘बेलिहाज’ साम्प्रदायिकता एवं धार्मिक संकीर्णता के कट्टर विरोधी हैं। उनके उद्बोधन एवं लेखन में संकीर्णतावादियों के प्रति फटकार स्पष्टरूप से सुनी-देखी जा सकती है। सागर साहित्यकार मंच के संयोजक पद पर रहते हुए उन्होने सन् 1984 के दंगों के दौरान अपने साहित्यकार साथियों को साथ ले कर धार्मिक वैमनस्य को दूर करने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों का दौरा कर के सौहार्द्य का संदेश देने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। समाज की सुख-शांति के लिए वे कौमी एकता एवं अखण्डता को वे आवश्यक मानते हैं।
साहित्य एवं चिंतन - डॉ. वर्षा सिंह
स्वाध्याय एवं जीवनानुभवों से विपुल व्यावहारिक ज्ञान अर्जित करने वाले कवि बेलिहाज को प्रदेश एवं देश की विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मान एवं मानद उपाधियां प्रदान की जा चुकी हैं। जिनमें प्रमुख हैं- राजस्थान के भवानीगंज, कोटा तथा रामगंज में सम्मानित, गोंदिया महाराष्ट्र में सम्मानए जबलपुर साहित्यकार मंच द्वारा यश सम्मान, ग्रामश्री साहित्य परिषद ढाना द्वारा साहित्य मार्तंड की मानद उपाधि, युवा प्रगति मंच द्वारा बुंदेलखंड रत्न उपाधि, अखिल भारतीय हास्य हंगामा द्वारा हिंदी उन नायक उपाधि, सर्व ब्राम्हण सभा द्वारा उत्कृष्ट साहित्य सेवा सम्मान, दिनकरराव स्मृति समिति द्वारा दिनकर सम्मान, सागर हरीश स्मृति समिति खुरई द्वारा हरीश सम्मान, विगत 35 वर्षों से कौमी एकता के लिए सक्रिय संस्था ईद दिवाली मिलन एकता समिति सागर द्वारा सम्मानित, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा साहित्य सेवा के लिए सम्मान, हिंदी साहित्य सम्मेलन इकाई पन्ना द्वारा बुंदेली रत्न सम्मान, विधायक सागर द्वारा साहित्यिक सम्मान, सागर की साहित्य एवं सामाजिक सम्मान समिति द्वारा सम्मानित, पूर्व सांसद उद्योगपति श्री डालचंद जैन द्वारा दाजी सम्मान, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति सागर द्वारा सम्मानित, श्रमण साहित्यकार परिषद सागर द्वारा सम्मानित, सरस्वती पुस्तकालय एवं वाचनालय समिति द्वारा प्रशस्ति पत्र एवं सम्मान कलमकार परिषद भोपाल की सागर इकाई द्वारा सम्मानित। पीली कोठी ट्रस्ट प्रियदर्शनी कला संगम समिति गौर स्मृति संगठन दिगंबर जैन युवा उत्सव समिति राहतगढ़ खुरई द्वारा प्रशस्ति पत्र एवं सम्मानित खादी ग्राम उद्योग के प्रदेश प्रदर्शनी में सम्मानित रेड क्रॉस सोसायटी द्वारा वरिष्ठ नागरिक सम्मान तुलसी साहित्य सम्मान टीकमगढ़ सामूहिक क्षमा वाणी पर्व पर विधायक शैलेंद्र जैन द्वारा सम्मान अनेक संस्थाओं द्वारा सामाजिक सरोकारों के लिए तथा साहित्य क्षेत्र में प्रदेश के बाहर सम्मानित एवं पुरस्कृत।
कवि बेलिहाज की रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी केंद्र सागर एवं छतरपुर से होता रहता है तथा दूरदर्शन भोपाल से भी उनकी कविताओं का प्रसारण हुआ है। सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत उनकी यह कविता देखिए -
सुबह की कोमल सी /भुर-भूरी धूप आती है
कर्म का, संघर्ष का /संदेश लाती है
हमें काम से लगाती है /फिर चढ़े हुए दिन की
तपी हुई धूप याद कराती है


वर्तमान में जिस प्रकार संवादहीनता का फैलाव होता जा रहा है कवि बेलिहाज उसका विरोध करते हुए परस्पर संवाद का अह्वान करते हैं-

आओ साथ साथ बैठे /मन की कहे सुने
जिंदगी के मैदान में /सांसो को चलने दो
उहापोह भागम भाग /निरंतर चलने का क्रम
मिलने बिछड़ने का ढंग /नित्य का उपक्रम
निर्बाध गति से चलने दो /आशा निराशा उपलब्धियां
मन को बांधते तोड़ते /क्रमबद्ध सुख दुख से
काल गति चक्र को चलने दो

उपभोक्तावाद ने स्वार्थपरता का स्तर इतना अधिक बढ़ा दिया है कि मनुष्य अपने वास्तविक चरित्र और गुणों को भूलता जा रहा है। बनावटीपन के मुखौटे ने उसके चेहरे को ढांक लिया हैं। इस दुरावस्था की ओर संकेत करते हुए कवि मणिकांत बेलिहाज कहते हैं-‘अंधेरा बहुत गहरा है‘ -

चिंतन का विषय/कौन करे रखवाली
निःशब्द शून्य का बसेरा है /चरित्र व्यवहार अब
चकित करता परिवर्तन /घटनाओं की निरंतरता
रोज रोज का परिवर्द्धन /हृदय व्यथित करता
अदृश्य पर क्रंदन /किसका नाम ले
धमाके दे दना दन /हर पल डरा सहमा है
’बेलिहाज’ हर कान बहरा है
अंधेरा बहुत गहरा है।

जब अंधेरा गहरा हो तो चिंता के कारण नींद नहीं आना स्वाभाविक है। कवि बेलिहाज की ‘जाग जाता हूं’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां देखिए-

हां, मैं कभी कभी
सोते-सोते जाग जाता हूं
अनगिनत अनसुलझे प्रश्न /अपने सामने पाता हूं
कई बार सोने का यत्न करता /पर हर बार हारा हूं

मणिकांत बेलिहाज ने दोहों के रूप में छंदबद्ध काव्य सृजन भी किया है। ऋतुओं पर केंद्रित उनकी कविताएं मात्र ऋतु वर्णन न होकर पर्यावरण से भी संबंध रखती है। उनकी इस प्रकार की कविताएं पर्यावरण असंतुलन की ओर संकेत करते हुए चिंता प्रकट करती है -

निष्ठुर गर्मी ले गई हरी-भरी सब छांव।
हर प्राणी को चाहिए बरगद जैसी ठांव ।।
बरखा ने आकर किया जीवन का संचार ।
धरती ने भी दे दिया अपना खूब दुलार ।।
डॉ. वर्षा सिंह एवं डॉ. (सुश्री) शरद सिंह के साथ अपने जन्मदिन के अवसर पर कवि मणिकांंत चौबे 'बेलिहाज'

मणिकांत चौबे की रचनाओं में जो सामाजिक सरोकार उभर कर सामने आते हैं वे सभी समाज और आमजन के जीवन के उन्नयन की आकांक्षा से भरे पूरे हैं। कवि बेलिहाज चाहते हैं की समाज का हर वर्ग, हर तत्व सुख समृद्धि और परस्पर मेलजोल से रहे। यही अभिलाषा उनकी कविताओं में दिखाई देती है। मणिकांत बेलिहाज वर्तमान उपभोक्तावाद का समाज पर जो प्रभाव पड़ रहा है उससे भी चिंतित दिखाई देते हैं उनके अनुसार समाज तभी बहुमुखी विकास कर सकता है जब एक स्वस्थ वातावरण निर्मित हो आतंकवाद व्यभिचार अपराध आदि समाप्त हो जाए तभी एक सुंदर समाज की रचना हो सकती है कवि मणिकांत पर लिहाज ना केवल एक कवि है वरन एक जागरूक नागरिक की भांति समाज और देश का भला चाहते हैं,उनका यही विचार उनकी कविताओं को श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम बनाता हैं कवि मणिकांत चौबे ‘बेलिहाज’ ने अपने श्रम से साहित्यिक गतिविधियों को जिस प्रकार संचालित और संगठित किया है वह युवाओं के लिए अनुकरणीय है।         
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( दैनिक, आचरण  दि. 03.10.2018)
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Wednesday, September 12, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन -28 पुष्पदंत हितकर : सहज अभिव्यक्ति ही जिनकी खूबी है - डॉ. वर्षा सिंह

  
Dr Varsha Singh
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के कवि पुष्पदंत हितकर पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन
पुष्पदंत हितकर : सहज अभिव्यक्ति ही जिनकी खूबी है
                       -
डॉ. वर्षा सिंह
                           
परिचय :- कवि पुष्पदंत हितकर
जन्म :- 25 मार्च 1954
जन्म स्थान :- सागर नगर
पिता एवं माताः- स्व. गुलाबचंद एवं स्व. शांतिबाई
शिक्षा :- बी.एस-सी. फाइनल (सागर विश्वविद्यालय)
लेखन विधा :- कविताएं
प्रकाशन :- विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में
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सागर नगर में 25 मार्च 1954 श्री गुलाबचंद जी के घर जन्में कवि पुष्पदंत हितकर की माता जी श्रीमती शांतिबाई अत्यंत सहृदय एवं धार्मिक विचारों की महिला थीं तथा पिताश्री नगर की एक प्रतिष्ठित फर्म में मैनेजर के पद पर कार्य करते रहे। कवि हितकर के जीवन पर अपने माता-पिता के धार्मिक विचारों एवं सहृदयता का गहरा प्रभाव पड़ा। सागर विश्वविद्यालय से बी.एस-सी. फाइनल तक शिक्षा ग्रहण करने वाले पुष्पदंत हितकर ने सन् 1975 से लेखन कार्य आरम्भ किया। साहित्य में रुचि रखने वाले कवि हितकर की कविताएं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। झांसी से प्रकाशित साप्ताहिक भारती, तीर्थंकर पत्रिका (इंदौर), अहिंसावाणी (अलीगढ़) त्रैमासिक पत्रिकाव्यंग्यम’ (जबलपुर) आग और अंगार (दमोह), सिंधुधारा तथा विंध्यकेसरी (सागर) आदि में कवि हितकर की रचनाएं प्रकाशित हुईं हैं।
साहित्य सेवा के साथ ही पुष्पदंत हितकर समाज सेवा से जुड़ गए। इसी तारतम्य में जैन छात्र समिति के द्वारा प्रकाशित वार्षिक पत्रिका रश्मिका संपादन किया। इसी दौरान उन्हें जैन संतो ंके समागम में काव्यपाठ का सुअवसर प्राप्त हुआ। सन् 1993 में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में आचार्य श्री विद्यासागर महराज का सानिध्य प्राप्त होने के साथ ही कवि हितकर को गजरथ स्मारिका का संपादन करने का अवसर भी प्राप्त हुआ। कवि हितकर का अभी तक कोई काव्य संकलन तो प्रकाशित नहीं हो सका है किन्तु नगर की साहित्यिक गोष्ठियों में उनकी सक्रियता निरंतर बनी रहती है।
Sagar Sahitya Chintan - 28  - Dr Varsha Singh


कवि हितकर को साहित्य सेवा में सक्रियता के लिए सागर की विभिन्न संस्थाओं जैसे रोटरी क्लब, नगर साहित्यकार समिति, श्रीराम सेवा समिति, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, भारतीय स्टैट बैंक शहर शाखा एवं चमेली चौक शाखा, 0प्र0 हस्त शिल्प कला, भारतीय ग्रामोद्योग, शिवसेना, जैन मिलन शाखा मकरोनिया एवं नेहानगर, देववाणी संस्था, प्रियदर्शिनी कला संगम, हिन्दी-उर्दू मजलिस के द्वारा समय-समय पर सम्मानित किया गया।

बायें से:- डॉ वर्षा सिंह, गजाधर सागर, विश्व जी, डॉ (सुश्री) शरद सिंह, पुष्पदंत हितकर एवं संतोष सरसैंया
भारतीय जीवन बीमा निगम के एक सफल अभिकर्ता के रूप में कार्य करते हुए भी पुष्पदंत हितकर ने अपनी साहित्यिक लगन को बनाए रखा और वे लगभग विगत 24 वर्षों से काव्य गोष्ठियों में अपनी रचनाओं का पाठ करते आ रहे हैं। वे मानते हैं कि नगर के हिन्दी उर्दू साहित्यकार मंच, नगर साहित्यकार परिषद, आर्ष परिषद, श्यामलम संस्था, पाठक मंच सागर इकाई ने काव्यपाठ का अवसर दे कर उनकी लेखनी को सदा प्रोत्साहित किया है। कवि हितकर के अनुसार जबलपुर के सुरेश सरल तथा सागर नगर के कवि निर्मलचंद निर्मल एवं कवि मणिकांत चौबे बेलिहाज ने साहित्यिक क्षेत्र में हमेशा मार्गदर्शन किया एवं सहयोग दिया। आकाशवाणी के सागर तथा छतरपुर केन्द्रों से भी उनकी कविताओं का प्रसारण हुआ है।

वर्तमान शिक्षा व्यवस्था ने बच्चों के कोमल कंधों पर भारी बस्तों का बोझ लाद रखा हैं इस व्यवस्था पर चोट करते हुए कवि हितकर ने जो गीत लिखा है उसका अंश देखें -
छोटे- छोटे कांधों पर हैं
भारी- भारी बस्ते
मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरें
सबको करें नमस्ते
सपनें हैं इनकी आंखों के
कैसे बने फरिश्ते
मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरें......
खुली हवा, छप्पर के नीचे
करना पड़े पढ़ाई
देश को ऊंचा यही उठायेंगे
पा कर तरुणाई
एक दिन फूलों से भर देंगे
कांटों वाले रस्ते
मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरें......
आज समस्या मात-पिता पर
ड्रेस कहां से लाएं
इन पर ही निर्भर रहती ये
कोमल सरल लताएं
फिर भी सब कुछ सहते हैं ये
देखो हंसते-हंसते
मन्द-मन्द मुस्कान बिखेरें......

उपभोक्ता दौर के प्रभाव में आज व्यक्ति आत्मप्रदर्शन पर अधिक ध्यान देने लगा है। जो जीवन की सुख सुविधाओं से संपन्न हैं वे दूसरे की गरीबी या लाचारी पर ध्यान दिए बिना अपने सुखों का बेजा प्रदर्शन करने लगते हैं। इस प्रवृत्ति पर कवि हितकर की कटाक्ष करने वाली यह व्यंग्य कविता ध्यान देने योग्य है-
शो रूम से निकली कार में
काली पट्टी लगाते हैं
धन के प्रदर्शन से
गरीब आदमी की
नज़र न लगे
दुनिया को दिखाते हैं।

पुष्पदंत हितकर यह मानते हैं कि यदि प्रत्येक मनुष्य मनुष्यता का पाठ पढ़ ले और स्वयं को बुराईयों से बचा ले तो व्यक्तिगत कठिनाईयों के साथ ही समाज में व्याप्त बुराईयां भी दूर हो सकती हैं। ‘‘हमें ऐसे इंसान चाहिए’’ शीर्षक कविता में उन्होंने अपनी इसी आकांक्षा को व्यक्त किया है -
क्या ज़रूरी है कि हम
गीता कुरान पर हाथ रख कर
झूठी कसमें खाएं
गुनाहों को छिपाने के लिए
और गुनाह करते जाएं।
हमें तोड़ने वाले धर्म नहीं
जोड़ने वाले मन चाहिए।
प्रार्थना, इबादत तो हम कभी भी
बैठ कर कर लेंगे
जो दूसरों के दुख-दर्द को समझें
हमें ऐसे इंसान चाहिए

जिस सुख की तलाश में व्यक्ति दुनिया भर में भटकता रहता है, वह सुख तो उसके भीतर ही मौजूद होता है। वस्तुतः यह सुख है संतोष सुख। यदि व्यक्ति सीमित साधनों में संतोष कर ले तो वह सुखी रह सकता है, जबकि असंतुष्ट प्रवृत्ति होने पर आकूत धन सम्पदा होने पर भी किसी काम की नहीं रहती है। जैसा कि कवि कबीर ने कहा है-
‘‘
गोधन, गजधन, बाजिधन और रतनधन खान।
 
जब आवे संतोषधन, सब धन धूरि समान।। ’’
कहने का आशय यह है कि कोई भी धन संतोषधन से बड़ा नहीं होता है और यह धन मनुष्य के भीतर रहता है तथा आत्मज्ञान का द्वार खोलता है। इसी भाव को कवि हितकर ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-
पलकों के अंदर ही सुख का वास है
खुली दृष्टि से मिलता मोह का द्वार है।
निर्मल भावों की बहती इस सरिता में
आत्मज्ञान से मिलता मोक्ष का द्वार है।
कवि हितकर ने बाल सहित्य की भी रचना की है, बानगी देखें-
फुदक- फुदक कर चिड़ि़या रानी
दानें भर कर मुंह में आती
चीं-चीं कर वह शोर मचाती
बच्चों को वह निकट बुलाती
सबको अपने दानें देती
बचा-खुचा वह खुद खा लेती
बच्चे फुर्र-फुर्र उड़ जाते
आसमान में शोर मचाते
चिड़िया का मन पुलकित होता
हंसी-खुशी में जीवन कटता

कवि पुष्पदंत हितकर सरल शब्दों में अपने भाव व्यक्त करने वाले लगनशील कवि हैं, जो सागर की साहित्यिकता में वृद्धि करते रहते हैं।
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(
दैनिक, आचरण  दि. 12.09.2018)
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