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Monday, May 20, 2019

औरत तीन तस्वीरें : स्त्री विमर्श पर एक ज़रूरी किताब - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

सागर नगर की प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध  साहित्यकार, कथालेखिका एवं उपन्यासकार (सुश्री) शरद सिंह की स्त्री विमर्श पर केन्द्रित पुस्तक “ औरत : तीन तस्वीरें “ पर विदुषी समीक्षक आरती लम्ब द्वारा लिखी गई समीक्षा (सौजन्य दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़) यहां प्रस्तुत कर रही हूं। 
डॉ.(सुश्री) शरद सिंह
यह उन सबके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी जो स्त्री विमर्श को नारी की दुर्दशा का विवरण मात्र समझते हैं, जबकि स्त्रियों के उत्थान का पक्ष, स्त्रियों की उपलब्धियों का आख्यान भी स्त्री विमर्श के इस प्रखर स्वर में निहित है।


औरत तीन तस्वीरें : डॉ (सुश्री) शरद सिंह

औरत तीन तस्वीरें : लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह - समीक्षा आरती लम्ब

Tuesday, September 25, 2018

स्त्रियों की उपलब्धियों का आख्यान - औरत तीन तस्वीरें


Dr. Varsha Singh
राष्ट्रीय स्तर पर ख्यातिलब्ध सागर नगर की प्रतिष्ठित साहित्यकार, कथालेखिका एवं उपन्यासकार डॉ (सुश्री) शरद सिंह की स्त्री विमर्श पर केन्द्रित पुस्तक “ औरत : तीन तस्वीरें “ पर विदुषी समीक्षक दीपिका शर्मा द्वारा लिखी गई समीक्षा (सौजन्य आज तक) यहां प्रस्तुत कर रही हूं। यह उन सबके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी जो स्त्री विमर्श को नारी की दुर्दशा का विवरण मात्र समझते हैं, जबकि स्त्रियों के उत्थान का पक्ष, स्त्रियों की उपलब्धियों का आख्यान भी स्त्री विमर्श में ही निहित है।

Book review: ये हैं औरत की तीन तस्‍वीरें…दीपिका शर्मा नई दिल्‍ली, 12 September 2014    
 ( साभार “ आज तक “ )

आंधी - तूफान के बाद खिलने वाली सुनहरी धूप जैसा चित्रण करती हैं शरद सिंह अपनी पुस्तकों में महिलाओं का. 'औरत तीन तस्वीरें' पुस्तक विश्व भर में स्त्रियों की स्थिति या सिर्फ उनके संघर्ष पर ही आधारित नहीं है. यह पुस्तक शरद सिंह की सोच को सार्थक करती है कि लड़की ऋग्वेद की पहली ऋचा है.
Aurat : Teen Tasveeren Author Dr. Sharad Singh
किताब: औरत: तीन तस्वीरें लेखिका: शरद सिंह प्रकाशक: सामयिक प्रकाशन मूल्य: 460 रुपये आंधी-तूफान के बाद खिलने वाली सुनहरी धूप जैसा चित्रण करती हैं शरद सिंह अपनी पुस्तकों में महिलाओं का. 'औरत : तीन तस्वीरें' पुस्तक विश्व भर में स्त्रियों की स्थिति या सिर्फ उनके संघर्ष पर ही आधारित नहीं है. यह पुस्तक शरद सिंह की सोच को सार्थक करती है कि लड़की ऋग्वेद की पहली ऋचा है.
'इस पुरुष प्रधान समाज में औरत की सुबह केतली में उबलती है, ओवन में पकती है, टोस्टर में सिंकती है. पल दो पल के लिए हांफती, फिर रोटियों की तरह तपती और सब्‍जी के साथ भुनती है. दाल के साथ भाप बनने और लंच बॉक्स में पैक हो जाने पर टाटा बाय बाय के बाद टंगी रह जाती है बाथरूम में छूटे गीले तौलिये की तरह.' - ऐसी तमाम अवधारणाओं का प्रतिकार करती है यह पुस्तक.
Dr. (Miss) Sharad Singh, Author

इस पुस्तक में कई कहानियों के संग्रह से शरद सिंह ने औरतों की ऐतिहासिक और समकालीन छवियां प्रस्तुत की हैं. तीन तस्वीरों का अर्थ है 3 तरह से औरतों के संघर्ष को समझने की कोशिश. पहले खंड में औरतों ने अपने साहस और योग्यता के दम पर पुरुषों से बराबरी की है. दूसरे खंड में उन औरतों की कहानियां हैं जिनका समर्थ स्वरुप साहित्य और विचारों में गढ़ा गया है और तीसरे खंड में उन औरतों की कहानियां हैं जो प्रताड़ित हैं और अभी भी संघर्ष कर रही हैं.लेखिका ने जोर दिया है महिलाओं के आत्म-मूल्यांकन पर. समकालीन स्त्री प्रश्‍नों को समझने में शरद सिंह की यह पुस्तक समर्थ है.
क्यों पढ़ें?
-इरोम शर्मीला, गुलसीरीन ओनांक, नवककुल कारमान, फातिमा मुर्तज़ा भुट्टो, जेसिका फोनी, सारा, दारा और सरकोजी जैसी हस्तियों के संघर्ष की कहानियों का अनूठा संग्रह.
- देश, भाषा, जाति, नस्ल आदि का कोई विभाजन नहीं.
- राजनीति में ब्यूटी विद ब्रेन का भी उत्तम उदाहरण.
- 'टैगोर, स्त्री और प्रेम', 'पंडित मदन मोहन मालवीय का स्त्री विमर्श', 'बाबा नागार्जुन की नायिकाएं' आदि संवदेनशील विषय.
- प्रवासी महिला कथाकारों की भी कहानियां
- स्त्री के उत्पीड़न और तमाम कारणों पर विचार
- देवी से लेकर डर्टी पिक्चर तक का सफर
- भरपूर तथ्यात्मकता
क्यों न पढ़ें?
- यदि आप नारी सशक्‍त‍िकरण के विरोध में हों.
- यदि आपको लगता हो कि औरतों के बारे में बहुत पढ़ चुके हैं और आपको इसमें रुचि नहीं.
- यदि आपको शक हो कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन में औरतों की क्या भूमिका हो सकती है.         

Sunday, August 19, 2018

सागर : साहित्य एवं चिंतन 2... कवि महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्रीविमर्श - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh
स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्री विमर्श । पढ़िए और मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को जानिए ....
सागर : साहित्य एवं चिंतन
कवि महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्रीविमर्श
- डाॅ. वर्षा सिंह
हर दौर में मानवीय सरोकारों में स्त्री की पीड़ा प्रत्येक साहित्यकार संवेदनशीलता एवं सृजन का केन्द्र रही है। सन् 1934 को जन्में, सकल मानवता के प्रति चिंतनशील साहित्यकार एवं उपन्यासकार महेन्द्र फुसकेले ने जब कविताओं का सृजन किया तो उन कविताओं में अपनी संपूर्णता के साथ स्त्री की उपस्थिति स्वाभाविक थी। ‘तेंदू के पत्ता में देवता’, ‘मैं तो ऊंसई अतर में भींजी’, ‘कच्ची ईंट बाबुल देरी न दइओ’ नामक अपने उपन्यासों में स्त्री पक्ष को जिस गम्भीरता से प्रस्तुत किया है, वही गम्भीरता उनकी कविताओं में भी दृष्टिगत होती है। कविता संग्रह ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ उनके काव्यात्मक स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर करता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उपन्यासकार फुसकेले स्त्री की पीड़ा, संघर्ष और महत्ता को भावात्मक रूप से व्यक्त करने के लिए कविता का मार्ग चुनते हैं। वे अपने काव्य संग्रह की शीर्षक कविता ‘स्त्री तेरे हजार नाम ठहरे’ में एक बदचलन स्त्री की व्यथा कथा संवाद के रूप में कुछ इस प्रकार सामने रखते हैं -
बदचलन ठहराई गई एक स्त्री से/जो पूछा मैंने/
तो उसने बताया/पति की मौत के बाद
सरपंच को अपनी देह/ नहीं सौंपने के अपराध में/नौ कोस तक/
चरित्रहीन विख्यात कर दी गई मैं।
यह कटु सत्य है कि स्त्री पर किसी भी तरह का लांछन लगाना सबसे आसान काम होता है, और दुर्भाग्यवश बिना सच्चाई को परखे पूरा समाज भी उस लांछन को सही मान बैठता है। फिर चाहे अग्नि परीक्षा में खरी उतरी सीता ही क्यों न हो। इस मानसिकता पर प्रहार करते हुए कवि ने इसी कविता में आगे लिखा है -
जा कर कोई क्यों नहीं/उस चरित्र-शिरोमणि
सरपंच से पूछता/
वह अब तक कितनी स्त्रियों की /देह मसल चुका है।
Sagar Sahitya Awm Chintan Mahendra Fuskele Ki Kvitaon Me Stri Vimarsh - Dr Varsha Singh
स्त्री को अपने जीवन में कदम-कदम पर विभिन्न प्रकार की कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है। एक कठिनाई जो जीवनपर्यंत उससे जुड़ी रहती है वह है उसकी सुंदरता या असुंदरता। आज का बाज़ार जो गोरेपन की क्रीमों से भरा रहता है, वह भी इसी मानसिकता को बढ़ावा देता रहता है कि औरतों की चमड़ी का रंग गोरा ही होना चाहिए। जब समाज में स्त्री को उसकी योग्यता से नहीं बल्कि चमड़ी के रंग से आंका जाने लगता है तो तमाम प्रकार की वैचारिक विकृतियां पनपने लगती हैं, जिसका शिकार बनना पड़ता है स्त्रियों को। महेन्द्र फुसकेले की एक कविता है ‘दृष्टि सौंदर्य की’। कविता की कुछ पंक्तियां देखिए-
अदालत में एक स्त्री पर/ तलाक़ का मुक़द्दमा चला
स्त्री ने बताया/ पति का आरोप है कि मैं सुंदर नहीं हूं
............ कि वह असुंदर है
उसका रंग साफ़ नहीं, बदसूरत है।
‘‘भार्या: गले का नौलखा हार’’ कविता में कवि ने एक सुघड़ गृहणी के रूप में पत्नी के दायित्वों और उसके समर्पण को रेखांकित करते हुए इस पीड़ा को प्रकट किया है कि एक पत्नी को समाज में वह सम्मान नहीं दिया जाता है जो उसे मिलना चाहिए। अपनी इसी बात को कवि ने इन शब्दों में कहा है कि -
गृहकार्य की चिंता में डूबी पत्नी/समाज में असम्मानित
क्यों नहीं पत्नी दिवस/मनाता परिवार और समाज ?
पत्नी ही संवारती घर-कुटुम्ब को
पत्नी दिवस की तैयारी/हो शुभारंभ।
पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में सम्मानित होते महेन्द्र फुसकेले

भारतीय समाज में एक विडम्बना आज भी व्याप्त है कि अनेक परिवारों में बेटी को जन्म देना मां का अपराध माना जाता है। बेटी को जन्म देते ही मां तानों और उलाहनों के कटघरे में खड़ी कर दी जाती है। सभी वैज्ञानिक तथ्यों को भुला कर यह मान लिया जाता है कि बेटी के जन्म के लिए सिर्फ मां ही जिम्मेदार होती है और ऐसी मां को जीवन भर परिवार की प्रताड़ना सहनी पड़ती है। ‘कभी तो हंसो मां’ कविता में एक बेटे के शब्दों में अपनी मां की उस पीड़ा को व्यक्त किया गया है जो उसने लगातार दो बेटियां पैदा करने के कारण भुगती थी। महेन्द्र फुसकेले की इन पंक्तियों पर गौर करें -
खेत के अधगिरे खड़ेरा में/मुझे अपने कंधे पर बैठाले हुए/खूब रोई मां छुप कर।
मां का कसूर था/उसने मेरी दो छोटी बहनों को एक के बाद एक जना।
स्त्री के अस्तित्व का विवरण उसके लावण्य के वर्णन के बिना अधूरा है। शायद इसीलिए जीवन के यथार्थ की कठोरता के बीच कवि स्त्री में वसंत को देखता है-
जो वसंत / दिलों की मखमली सेज पर
उबासी ले रहा है/वह जल्दी अंगड़ाई ले लेगा/ स्त्री के गेसुओं से
स्त्री की वेणी से खुलक आवेगा।
महेन्द्र फुसकेले की कविताओं में स्त्री पर विमर्श नारा बन कर नहीं अपितु सहज प्रवाह बन कर बहता है। उनकी कविताओं में स्त्री चिंतन बहुत ही व्यावहारिक और सुंदर ढ़ंग से प्रकट हुआ है।
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( दैनिक, आचरण दि. 14.03.2018)