Thursday, October 22, 2020

रंग और विचार में सौंदर्य और संदेश दोनों होते हैं | तीन दिनी चित्रकला कार्यशाला का समापन | 15 कलाकार हुए शामिल | रिपोर्ट | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, ये है आज "दैनिक भास्कर" में प्रकाशित मेरी यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह की  रिपोर्ट .... अवसर था... कल दि. 21.10.2020 को सागर मुख्यालय के सिविल लाइंस क्षेत्र में स्थित चंद्रा पार्क में नगरनिगम सागर एवं स्मार्ट सिटी सागर द्वारा आयोजित की गई तीन दिवसीय चित्रकला कार्यशाला के समापन का। सागर के प्रसिद्ध चित्रकार असरार अहमद के 'रंग के साथी' ग्रुप ने इस पेंटिंग वर्कशॉप में ऑन स्पॉट चित्र बनाए, जो दर्शकों द्वारा सराहे गए।
हार्दिक धन्यवाद दैनिक भास्कर 🙏

सुधी ब्लॉग पाठकों की पठन सुविधा हेतु मेरी यह रिपोर्ट जस की तस यहां प्रस्तुत है -

रंग और विचार में सौंदर्य और संदेश दोनों होते हैं |
तीन दिनी चित्रकला कार्यशाला का समापन | 15 कलाकार हुए शामिल |

- डाॅ. वर्षा सिंह 

कला समीक्षक एवं साहित्यकार 

       स्वच्छता से हो कर ही पर्यटन के विकास के रास्ते खुलते हैं। इसी मूल संदेश के साथ स्थानीय चंद्रा पार्क में तीन दिवसीय चित्रकला कार्यशाला का आयोजन किया गया। यूं तो 18 से 20 अक्टूबर तक तीन दिन का ही आयोजन तय किया गया था किन्तु कोरोना आपदा के कारण आठ माह बाद खुले, नगर के सिविल लाइंस् स्थित चंद्रा पार्क और चित्रकला कार्यशाला ने लोगों को इस तरह लुभाया कि यह कार्यशाला एक दिन के लिए और बढ़ा दी गई। जब रंग और विचार एकाकार हो कर कैनवास पर उतरते हैं तो उसकी छटा देखते ही बनती है, क्योंकि उसमें कला-सौंदर्य और संदेश दोनों निहित होते हैं। सागर में पुरासम्पदाओं एवं पर्यटन स्थलों की कमी नहीं है, यह शहर भी अपने आप में एक ऐतिहासिक शहर है। बस कमी महसूस की जा रही थी तो स्वच्छता के प्रति जागरूकता की। शहर के ख्यात चित्रकार असरार अहमद ने अपने ग्रुप 'रंग के साथी' के चित्रकारों के साथ स्वच्छता संदेश देने का बीड़ा उठाया और चित्रकारों ने कैनवास पर सागर के महत्वपूर्ण स्थलों को साकार कर दिया। 

दृश्य चित्रण का अर्थ है हमारी आँखें जो भी जीवित-अजीवित रूपों को देखती हैं उसका कलात्मक चित्रण, जो भूमि और असीमित आकाश के मध्य विद्यमान है। इसी बात को चरितार्थ करते हुए कार्यशाला में एक्रेलिक रंगों से 3×2 के कैनवास पर बनाए गए चित्र मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालने में सक्षम रहे। चित्रकार असरार अहमद ने तीन मढ़िया, अंशिता बजाज वर्मा ने गढ़पहरा का शीशमहल, शालू सोनी ने कटरा मस्जिद, सृष्टि जैन ने मकरोनिया के बड़े शंकरजी, अनुषा जैन ने वृंदावनबाग मंदिर, सेजल जैन ने चकराघाट, रश्मि पवार ने एरण, मोनिका जैन ने सर्किट हाउस, प्रिया साहू ने कैंट चौराहा, लक्ष्मी पटेल ने शनीचरी, रेशू जैन ने तीन मढ़िया, साधना रैकवार ने राहतगढ़ वाटरफॅाल, अंजू मिश्रा ने भट्टों घाट एवं चकराघाट तथा काजोल गुप्ता ने आई.जी. बंगला चौराहा को अपनी तूलिका से कैनवास पर जीवंत कर दिया। भवन, घाट एवं चौराहे के चित्रों में ज्यामितिक रेखाओं को बड़े ही संतुलित ढ़ंग से चित्रित किया गया। गहरे और धूसर रंगों के सुंदर संयोजन से निखरी आकृतियों की सुघड़ता इन चित्रों में सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती रही। भारतीय चित्रकला में देवता, मनुष्य एवं पशु के चित्रण में शारीरिक अनुपात एवं शेड्स का विशेष ध्यान रखा जाता है। एरण के वाराह तथा मकरोनिया के बड़े शंकरजी के चित्रों में आनुपातिक सौष्ठव बड़े सुंदर ढ़ंग से प्रदर्शित हुआ। कार्यशाला में असरार अहमद ने तीन मड़िया मंदिर, सागर झील का किनारा और उनके बीच से गुजरती सड़क को नीले, पीले, लाल, हरे एवं स्लेटी रंग से इस प्रकार चित्रित किया कि वह स्थल कैनवास पर जीवंत हो उठा। वहीं कैंट चौराहा की पेंटिंग में हरे, नीले, भूरे ओर स्लेटी रंगों से प्रकृति, कृत्रिम मानव आकृतियों और सड़क के संगम का नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करने में चित्रकार प्रिया सफल रहीं। पुरातन भवनों को उनकी दशा एवं गरिमा के अनुरूप चित्रित करना हमेशा चुनौती भरा होता है। चित्रकार अंशिता ने गढ़पहरा के शीशमहल और उसके सामने मौजूद अवशेषों के बीच भूरे रंगों के विभिन्न शेड्स से जिस प्रकार गहराई को उकेरा वह चाक्षुष आकर्षण के साथ देखने वालों को सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। कार्यशाला में बनाई गई सुंदर पेंटिंग्स बिक्री के लिए भी उपलब्ध थीं। कुछ पेंटिंग्स कला प्रेमियों द्वारा इस अवसर पर खरीदी भी गईं।

      पूरी तरह सफल रहे इस आयोजन में रंग के साथी ग्रुप के माध्यम से सागर नगर में चित्रकारी की अलख जगाए रखने वाले नगर के सुप्रसिद्ध चित्रकार असरार अहमद ने बताया कि ‘‘इस कार्यशाला के द्वारा हमने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि हमारे सागर के वृंदावनबाग मंदिर, जामा मस्जिद, चकराघाट, एरण, राहतगढ़ वाटरफाॅल आदि स्थल जैसे सुंदर कैनवास पर दिखाई दे रहे हैं, स्वच्छता बनाए रखने पर वास्तविक रूप में ऐसे ही सुंदर दिखाई देंगे। जिससे पर्यटन के नक्शे पर सागर भी चमकेगा। हमें जब भी इस प्रकार के वर्कशाप करने के अवसर मिलेंगे तो हम आगे बढ़ कर अपना कलात्मक योगदान देंगे।’’ नेचर वेलफेयर के आलोक चौबे ने बताया कि ‘‘प्रकृति और धरोहरों को बचाने की दिशा में स्वच्छता एक जरूरी मुद्दा है और चित्रकला के द्वारा इसे बेहतर ढ़ंग से सामने रखा जा सकता था।’’  

      उल्लेखनीय है कि इस कार्यशाला द्वारा स्वच्छता सर्वेक्षण 2021 के अंतर्गत ‘सागर के रंग स्वच्छता के संग’ के रूप में स्वच्छता के लिए नागरिक सहभागिता का आह्वान किया गया। इसके आयोजक नगरपालिक निगम सागर तथा सह आयोजक स्मार्ट सिटी सागर थे। सहयोगी संस्थाओं के रूप में रंग के साथी और नेचर वेलफेयर ने शहर एवं पर्यटन स्थलों को स्वच्छ एवं सुंदर बनाए रखने की नगर निगम आयुक्त आरपी अहिरवार, स्मार्ट सिटी सीईओ राहुल सिंह की इस बहुआयामी संकल्पना को साकार करने में अपना भरपूर योगदान दिया। 

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Saturday, October 17, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 12 | सुरेश आचार्य, शनीचरी का पण्डित | पुस्तक | डॉ. वर्षा सिंह


प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत बारहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के सुपरिचित व्यंग्यकार प्रो. सुरेश आचार्य पर केन्द्रित पुस्तक "सुरेश आचार्य, शनीचरी का पंडित" का पुनर्पाठ।
   
सागर: साहित्य एवं चिंतन

पुनर्पाठ: ‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’
                               -डॉ. वर्षा सिंह
                             
         इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है एक ऐसी पुस्तक को जो एक व्यक्ति विशेष पर केंद्रित है अर्थात उस विशेष व्यक्ति के बारे में समग्र जानकारी प्रदान करने में सक्षम है, जो जनप्रिय है, लोकप्रिय है और साहित्य में ही नहीं वरन समाज में भी विशेष स्थान रखता है। जी हां, वे विशेष व्यक्ति हैं प्रो. सुरेश आचार्य। वे व्यंग विधा के पुरोधा हैं, वे सामाजिक सरोकार रखते हैं तथा वे जनप्रिय हैं। इसलिए इस किताब की अर्थवत्ता अपने आप द्विगुणित हो जाती है कि जो भी व्यक्ति डॉ सुरेश आचार्य के बारे में जानना चाहता है, उनके बचपन के बारे में, उनकी जीवनचर्या के बारे में, उनके लेखन के संबंध में, उनके राजनीतिक विचारों के बारे में, तो उसे यह सभी जानकारी इस पुस्तक में मिल सकती है। डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित यह पुस्तक कुल चारखंड में विभक्त है इसे अभिनंदन ग्रंथ भी कहा जा सकता है।

        सन् 1933 में आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी को काशी नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से एक अभिनंदन ग्रन्थ भेंट किया गया था जिसमें उनके अवदान पर देश-विदेश के साहित्यकारों, मनीषियों के लेख संकलित थे। उसकी भूमिका श्याम सुन्दर दास और कृष्ण दास के नाम से प्रकाशित थी। पर कहा जाता है कि यह वास्तव में नंददुलारे वाजपेयी ने लिखी थी। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी पर प्रकाशित अभिनंदनग्रंथ में समालोचक मैनेजर पाण्डेय ने ‘‘आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी और उनका अभिनंदन’’ शीर्षक से एक लेख लिखा था। अपने इस लेख में मैनेजर पांडेय ने अभिनंदनग्रंथ के बारे में लिखा कि ‘‘इस अभिनंदन ग्रन्थ में भूमिका और प्रस्तावना के बाद मुख्य भाग में निबंध, कविताएं, श्रद्धांजलियां, विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश के साथ एक चित्रावली भी है। निबंधों के विषयों और श्रद्धांजलियों  की विविधता चकित करने वाली है। इसमें अंग्रेजी में रेव. एडविन ग्रीब्स, पी. शेषाद्रि, प्रो. ए. बेरिन्निकोव और संत निहाल सिंह के लेख हैं। श्रद्धांजलि के अंतर्गत एक ओर महात्मा गांधी के साथ भाई परमानन्द हैं, तो दूसरी ओर अनेक विदेशी विद्वानों और लेखकों के संदेश हैं। उस युग के अधिकांश कवियों की कविताएं इस अभिनंदन ग्रंथ में हैं। इस ग्रंथ में जो चित्रावली है उसका एक विशेष महत्व यह है कि अभिनंदन ग्रंथ के आज के पाठक आधुनिक हिंदी साहित्य के ऐसे लेखकों-कवियों का रूप-दर्शन कर सकेंगे, जिनका वे केवल नाम जानते हैं।’’
अपने लेख की अंतिम पंक्ति में मैनेजर पांडेय ने लिखा है कि ‘‘इस ग्रंथ का केवल ऐतिहासिक महत्व नहीं है. इसके निबंध ‘ज्ञानराशि के संचित कोश’ होने के कारण आज भी पठनीय और मननीय हैं।’’ ठीक यही बात लागू होती है ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पर।
         ‘‘सुरेश आचार्य: शनीचरी का पंडित’’ पुस्तक के चार खंडों में प्रथम खंड है- ‘‘जल बिच कुंभ: न था मैं खुदा था’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य का आत्मकथ्य है। जिसमें उन्होंने सागर के बारे में अपने अनुभव को व्यक्त किया है। इसी खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य से तीन लोगों ने बातचीत की है - लक्ष्मी पांडे, प्रो. अरुण कुमार मिश्रा और प्रो. रूपा गुप्ता ने।

      खंड 2- ‘‘सर्वे सुखम् गृह माययौ: दिल के बहलाने को गालिब ये ख़्याल अच्छा है’’ के अंतर्गत प्रोफेसर आचार्य का जीवन परिचय, वंशावली तथा परिजनों की दृष्टि में आचार्य जी के व्यक्तित्व का विवरण है जिसमें शांभवी आचार्य, शुभ्रांशु आचार्य, कृति आचार्य, श्वेतांशु आचार्य, शारदवद आचार्य, प्रतिभा आचार्य, शांतनु आचार्य, डॉ संजय आचार्य, पदमा आचार्य, शाश्वत आचार्य, डॉ शैलेश आचार्य तथा आरती तिवारी के विचार शामिल किए गए हैं।

         खंड 3- ‘‘ते तुलसी तब राम बिन जे अब राम सहाय: कमी जो पाई तो अपने खुलूस में पाई’’ - इस खंड में प्रोफेसर आचार्य को लिखे गए पत्र, अभिनंदन पत्र एवं सम्मान पत्र शामिल हैं। इसी खंड में प्रोफेसर आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखी गई श्याम मनोहर सिरोठिया, मायूस सागरी, कालिका प्रसाद शुक्ल ‘विजयी’ एवं हरिहर प्रसाद खड्डर द्वारा लिखी गई कविताएं संकलित है। साथ ही संकलित है प्रोफेसर सुरेश आचार्य की विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्ति के अवसर पर की गई टिप्पणियां।

         खंड 4- ‘‘हम चाकर रघुवीर के: हम भी क्या याद करेंगे कि खुदा रखते थे’’। इस खंड में प्रोफेसर सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित कुल 50 लेख हैं। इस महत्वपूर्ण खंड में हरिशंकर परसाई, कांति कुमार जैन, उदय जैन,  रामेश्वर नीखरा, सत्य मोहन वर्मा, सुरेंद्र सिंह नेगी, कृष्णचंद्र लाल, सुरेंद्र दुबे, सुधाकर सिंह, कालीचरण स्नेही, हरिशंकर मिश्र, निर्मल चंद निर्मल, लक्ष्मी नारायण चैरसिया, चंदा बैन, राजेंद्र यादव, जीवनलाल जैन, बैजनाथ प्रसाद, रूपा गुप्ता, मनोहर देवलिया, टीकाराम त्रिपाठी, आशुतोष राणा, सरोज गुप्ता, अशोक मिजाज, अरुण कुमार मिश्र, नरेंद्र सिंह, स्मृति शुक्ला, मणिकांत चैबे, वेद प्रकाश दुबे, भोलाराम भारतीय, राजेश दुबे, शरद सिंह, नरेंद्र दुबे, राजेंद्र नागर, महेश तिवारी, निरंजना जैन, गजाधर सागर, सुखदेव प्रसाद तिवारी, छाया चौकसे, उमाकांत मिश्र, स्वर्णा वाजपेई, चंचला दवे, निधि जैन, सुखदेव मिश्र, हेमचंद्र चैधरी, किशन पंत, आशीष ज्योतिषी, ममता यादव, नेमीचंद जैन विनम्र तथा लक्ष्मी पांडे के लेख शामिल हैं।

       इस पुस्तक में प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने अपने जीवन के कुछ ऐसे प्रसंग रखे हैं जिनसे तत्कालीन सामाजिक जीवन का भी पता चलता है जैसे अपने आत्मकथ्य में ‘‘क्या सुनाएं दास्तां’’ के अंतर्गत वे लिखते हैं- ‘‘मैं खुद छोटे पंडित की भूमिका में पूजा पाठ कथा वार्ता घर-घर कराने घूमने लगा। साल में दो हाफ कमीज़ो की संख्या घटकर एक रह गई। खाकी हाफ पेंट थिगड़े लगाकर पहने जाने लगे। मेरी उद्दंडता और सीनाजोरी में इज़ाफ़ा हुआ। सागर तालाब उन दिनों शहर का एकमात्र जल स्रोत था। गर्मियों में भी पानी से लबालब भरा रहता। कमल खिलते, सिंघाड़े लगते, चक्रतीर्थ यानी चकरा घाट से बस स्टैंड का ज्यादातर यातायात नावों के जरिए होता था। चार आने सवारी। सामान फ्री। तालाब के किनारों पर बने पत्थर की सीढ़ियों पर लोग कपड़े धोते, पानी में छलांग मार कर निकलते और सीढ़ियों पर बैठकर साबुन लगाते। आमतौर पर कपड़े धोने और नहाने का एक ही साबुन होता था। लोकल मेड। बड़े लोग लाइफबाय से नहाते और सनलाइट साबुन से कपड़े धोते।’’

 

  

      यह विवरण सहज सरल सामाजिक व्यवस्था एवं वातावरण का दृश्य आंखों के सामने चलचित्र के समान चला देता है। इस ग्रंथ में अनेक रोचक प्रसंग पढ़ने को मिलते हैं जैसी अपने वक्तव्य के अंतर्गत प्रोफेसर सुरेश आचार्य ने हरिशंकर परसाई के साथ जुड़े अपने अनुभवों को साझा करते हुए यह घटना लिखी है जो बड़ी ही दिलचस्प है - ‘‘मैं उनके घर ठहरा और लघु शोध प्रबंध को प्रमाणिक बनाने रोज शाम 7 बजते-बजते परसाई जी के घर पहुंच जाता। उनसे चर्चा में एक-दो घंटे गुजार कर लौटता। फिर नोट्स लेता। मैजारिटी की भाषा में परसाई जी बड़े भक्त आदमी थे। शाम होते ही भक्ति-भजन में लग जाते थे। एक शाम उन्होंने मुझसे सीधे पूछ लिया- ‘यार आचार्य, तुम पीते हो या नहीं?’ अल्लाह! क्या कहूं!! मैंने उत्तर दिया- ‘जी, मैं परहेजगार तो नहीं हूं पर रोज पीने की मेरी हैसियत नहीं है।’ उन दिनों व्हाइट हार्स नामक अंग्रेजी शराब उनका प्रिय ब्रांड थी। उन्होंने कहा- ‘प्रियवर, तब तुम सुबह 9 बजे आया करो। शाम को अपनी बात ठीक से नहीं हो पाती। उस वक्त मैं सफेद घोड़े पर सवार होता हूं और तुम पैदल चलते हो।’ मैंने समय बदल लिया। यह लघु शोध प्रबंध परसाई जी पर पहला शोध कार्य था। एम. ए. उत्तरार्द्ध की परीक्षा का यह आठवां वैकल्पिक प्रश्न पत्र था। निर्धारित 100 अंकों में से मुझे 60 अंक मिले। विभाग में कार्यरत एक अध्यापक महोदय के भतीजे को छियान्वे। पूर्वाद्ध में वे बहुत पीछे थे। उत्तरार्ध में संबंधित गुरुजनों के इस जादू के बावजूद मेरी पोजीशन बची रही।’’

        इस तरह के प्रसंग इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि आमतौर पर अभिनंदन ग्रंथों में संबंधित व्यक्ति को महिमामंडित ही किया जाता है। उसकी महिमाओं के बखान के अतिरिक्त अन्य जानकारियां नहीं होती हैं। किंतु इस ग्रंथ में अभिनंदन के साथ-साथ समय अनुसार परिस्थितियां, वातावरण, प्रशासनिक स्थितियां, शैक्षिक स्थितियां इन सभी के बारे में पता चलता है कि शिक्षा क्षेत्र में किस तरह से नंबरों के उतार-चढ़ाव का भ्रष्टाचार व्याप्त था। योग्यता को संबंधों के आधार पर तौला जाता था। इस प्रकार के तथ्य इस ग्रंथ को अन्य अभिनंदन ग्रंथों से इसको अलग ठहराते हैं। इस प्रकार की घटनाओं के उल्लेख से यह भी पता चलता है कि हरिशंकर परसाई जी जैसे ख्यातिनाम व्यंगकार झूठ और दिखावे में लिप्त नहीं थे बल्कि वे जैसे थे वैसे ही जीना पसंद करते थे। उन्होंने अपने शिष्य के सामने झूठा दिखावा न करते हुए इस बात को उजागर कर दिया कि वे मदिरापान करते हैं। यह तथ्य सुरेश आचार्य के बहाने परसाई जी के एक सरल, सहज व्यक्तित्व की झलक सामने रखता है।

           वहीं सुरेश आचार्य के बारे में हरिशंकर परसाई के विचार और भी महत्वपूर्ण हैं। वे लिखते हैं कि- ‘‘सुरेश आचार्य बुंदेलखंडी है। बुंदेली भाषा बहुत मीठी और लयात्मक होती है। जब बुंदेलखंडी लोग आपस में बात करते हैं तो ध्वनि की लचक बहुत मीठी होती है। मगर बुंदेली वीर भी इतिहास प्रसिद्ध हैं, तो इस मीठी भाषा में क्रोध कैसे व्यक्त किया जाता होगा? कठोर गाली कैसे दी जाती होगी? गुस्से में बुंदेलखंडी सामने वाले से बड़ी मीठी भाषा में कहेगा- ए तुम भौतई बढ़ रये हो इते। अब मौं चलाओ तो हम उठा के मैंक दैहें। कितनी मिठास है शब्दों में। लय है। मगर वह क्या कह रहा है? वह कह रहा है- तुम बहुत बढ़ रहे हो। अब मुंह चलाया तो उठा कर फेंक दूंगा। सुरेश आचार्य की बुंदेली में एकाध ही रचना है। बाकी खड़ी बोली हिंदी में है। मगर उनके व्यक्तित्व में और व्यंग में यह मूल बुंदेलीपन है। उनका वक्तव्य सहज, रोचक और निर्वैर लगता है। मगर उसमें भीतर वही मैंक देने का अर्थ होता है। उनकी भाषा में कठोरता नहीं है। व्यंग में ऊपर से घन मारने जैसा प्रहार नहीं दिखता। मगर वे सहज ही चलते-चलते ऐसे रिमार्क कर जाते हैं जिनसे हमारी समकालीन व्यवस्था की कलई खुल जाती है। झूठ, फरेब, पाखंड, भ्रष्टाचार, विसंगति आदि पर एकाध रिमार्क कर के वे आगे बढ़ जाते हैं।’’

        प्रो. सुरेश आचार्य के व्यंग्य ही नहीं अपितु व्यंग्य और समाज के परस्पर संबंधों पर किया गया शोधग्रंथ भी बहुत प्रसिद्ध है। प्रो. आचार्य पर एकाग्र इस ग्रंथ में उनकी पुस्तक ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर लेख लिखते हुए देश की प्रतिष्ठित लेखिका डाॅ शरद सिंह ने टिप्पणी की है कि -‘‘व्यंग्य समाज से ही क्यों उत्पन्न होता है? इस प्रश्न का उत्तर डाॅ. सुरेश आचार्य ने अपने शोधपूर्ण ग्रंथ ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ में विस्तारपूर्वक दिया है। डाॅ. सुरेश आचार्य हिन्दी साहित्य जगत के एक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हैं। ‘‘व्यंग्य का समाज दर्शन’’ पर ही डाॅ. आचार्य को डी. लिट. की उपाधि दी गई।’’

       प्रो. आचार्य की लेखकीय एवं व्यक्तित्व की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए पत्रकार एवं ‘आचरण’ समाचार पत्र की प्रबंध संपादक निधि जैन ने लिखा है कि- ‘‘शब्दों का, मुहावरों का, लोकोक्तियों का इतना भण्डार आचार्य जी के पास है जितना अन्यत्र ही किसी के पास होगा। आचार्य जी अच्छे शिक्षक होने के साथ-साथ प्रसिद्ध साहित्यकार, आलोचक, व्यंग्यकार, ज्योतिषी और कथावाचक भी हैं।’’ 

         साहित्यसेवी उमाकांत मिश्र ने प्रो. सुरेश आचार्य के व्यक्तित्व पर बहुत ही सटीक लेख लिखा है जिसकी कुछ पंक्तियां देखिए- ‘‘आखिर उन्हें हम किस रूप में देखना ज्यादा पसंद करेंगे? एक विद्वान वक्ता, एक प्रोफेसर, एक अति गंभीरता के साथ साथ सादगी लिए हुए व्यक्तित्व, एक समीक्षक, साहित्यकार जिसकी कोई मिसाल ही नहीं, एक व्यंगकार जो आपको अवसाद से मुक्त कराता हो, गमगीन माहौल को अपनी वाकपटुता और ज्ञानपूर्ण उद्बोधनों के माध्यम से आपके हृदय में हलचल मचा देता हो, आपको ठहाके लगाने पर मजबूर कर देता हो या फिर एक ऐसे यारबाज के रूप में जो बगैर आपकी उम्र की परवाह किए बुजुर्गों को बल्कि छोटे-छोटे बच्चों के बीच भी अपनी उपस्थिति एक यार, एक मित्र, एक दोस्त और महत्वपूर्ण व्यक्ति के रूप में दर्ज़ करता हो।’’

         अनेक रोचक प्रसंग और आत्मीयता की अनेक लहरों से भीगे हुए, प्रो. आचार्य की खूबियों की सीपियां समेटे हुए महासागर की समग्रता लिए हुए डाॅ. लक्ष्मी पांडेय द्वारा संपादित इस ग्रंथ की सबसे बड़ी उपादेयता यह है कि यह अपने प्रिय व्यक्ति, अपने प्रिय साहित्यकार, अपने प्रिय समाजसेवी, अपने प्रिय राजनीतिज्ञ (राजनेता नहीं), अपने प्रिय मार्गदर्शक के बारे में जानने का भरपूर अवसर प्रदान करता है और बार-बार पढ़े जाने की ललक पैदा करता है।
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( दैनिक, आचरण  दि.17.10.2020)
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Saturday, October 10, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 11 | हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान | आलोचनाग्रंथ | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत ग्यारहवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के साहित्यकार डॉ. महेश तिवारी द्वारा लिखित आलोचना ग्रंथ  "हिन्दी काव्य समीक्षा के प्रतिमान" का पुनर्पाठ।

 सागर : साहित्य एवं चिंतन

     पुनर्पाठ : ‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’ आलोचनाग्रंथ
                        -डॉ. वर्षा सिंह
                                                          
      इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर के कवि एवं साहित्यकार डाॅ. महेश तिवारी की पुस्तक ‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’। यह पुस्तक एक आलोचनाग्रंथ है। किसी भी आलोचनाग्रंथ के समूचे दृष्टिकोण को एकबार के पठन-पाठन में समझा नहीं जा सकता है। क्योंकि प्रत्येक आलोचनाग्रंथ प्रथम पाठ के बाद चिंतन, पुनर्चिंतन और फिर पुनर्पाठ का आग्रह करता है। डाॅ. महेश तिवारी की इस पुस्तक में भारतेंदु युग से लेकर छायावादोत्तर युग की कविता की आलोचना के विकास, उसके मूल्य- परिवर्तन, मूल्य-चिंतन आदि को समझते हुए कविता के मूल्यांकन के बदलते प्रतिमानों का आकलन किया गया है। इस आकलन प्रक्रिया में भारतीययुगीन एवं द्विवेदीयुगीन काव्य समीक्षा का विश्व अवलोकन एवं आकलन करते हुए मुख्य रूप से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा कविता के मूल्यांकन के उन मापदंडों को रेखांकित किया गया है, जहां साहित्य के भावतत्व युग के नए आदर्शों, साहित्य की सामाजिक पृष्ठभूमि, कवि के साथ समीक्षक के तादात्म्य में ही महत्व दिया गया है। यह पुस्तक अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठती है जब इसमें चर्चा की जाती है पाश्चात्य काव्य प्रवृत्तियों से हिंदी काव्य प्रविधि का तुलनात्मक अध्ययन की। छायावादी काव्य चिंतन को समझने के लिए इंग्लैंड के स्वच्छतावादी कवियों की काव्य चिंतन की प्रवृत्तियों को समझने का प्रयास किया गया है। यदि बात की जाए पाश्चात्य काव्य प्रविधियों के हिन्दी काव्य पर प्रभाव की, तो प्रसाद की तुलना में निराला पश्चिमी साहित्य से अधिक स्पष्ट रूप से परिचित दिखाई देते हैं। निराला के काव्य में साहित्य की सार्वजनिकता स्पष्टरूप से देखी जा सकती है। मुक्तछंद को प्रभावी ढंग से हिन्दी काव्य में प्रस्तुत करने वाले ‘निराला’ की ‘‘कुकुरमुत्ता’’ कविता अद्वितीय है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए याद आ जाती हैं ‘‘कुकुरमुत्ता’’ कविता की ये पंक्तियां-

अबे, सुन बे, गुलाब,
भूल मत जो पायी ख़ुशबू, रंग-ओ-आब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!
कितनों को तूने बनाया है गुलाम।

‘‘कुकुरमुत्ता’’ कविता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ कोई अलग ही जमीन पर खड़ा करती है जहां वे पूंजीवाद को ललकारते हुए दिखाई देते हैं। ‘निराला’ ने पूंजीवादी सभ्यता पर कुकुरमुत्ता के बहाने करारा कटाक्ष किया है। कुकुरमुत्ता गुलाब को सीधा भदेश अंदाज में संबोधित करता हुआ उसके सभ्यता की कलई खोलता चला जाता है और सीधे, सपाट शब्दों में हुंकार भरता है कि  ‘‘अबे सुन बे गुलाब, डाल पर इतराता है कैपिटलिस्ट!’’
जहां सुमित्रानंदन पंत की काव्य चिंतन में स्वच्छतावादी चेतना से अनुप्राणित नए संकेत तथा प्रतिमान दिखाई देते हैं, वहीं महादेवी वर्मा की काव्यगत मान्यताएं छायावादी अथवा स्वच्छंदतावाद काव्य की पृष्ठभूमि के समीप मिलती हैं। इस पुस्तक में लेखक डॉ महेश तिवारी ने स्वच्छंदतावादी समीक्षा पद्धति द्वारा काव्य के मूल्यांकन के आधार पर उन बिंदुओं को देखा-परखा है, जिनसे प्रेरणा लेकर आचार्य नंददुलारे वाजपेई ने अपनी आलोचना दृष्टि का विकास किया। आचार्य नंददुलारे वाजपेई, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और डॉ नगेंद्र ने नई काव्य रचना की प्रवृत्ति और नए युग संदर्भों को दृष्टि में रखकर ही काव्य मूल्यांकन के नए प्रतिमान निश्चित किए किंतु पारंपरिक काव्य प्रतिमान भी उनके दृष्टि से बाहर नहीं हुए हैं। डॉ महेश तिवारी ने लिखा है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने उदार मानवतावादी चिंतन के परिपेक्ष में काव्य और अस्तित्व की व्याख्या की है और काव्य सत्ता को उसी के भीतर से पहचानने और परखने का प्रयास हिंदी काव्य चिंतन के क्षेत्र में पहली बार स्वच्छंदतावादी समीक्षा के अंतर्गत हुआ है।
 ‘‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’’ को पढ़ते हुए जब ‘‘छायावादी काव्य चिंतन’’ के अंतर्गत जयशंकर प्रसाद की काव्य प्रवृत्तियों पर चिंतन का संदर्भ आता है तो स्वतः याद आ जाती है उनकी यह कविता-
ले चल वहां भुलावा देकर
मेरे नाविक! धीरे-धीरे ...
जिस निर्जन में सागर लहरी
अम्बर के कानों में गहरी
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो-
तज कोलाहल की अवनी रे ।

प्रश्न उठता है कि क्या जयशंकर प्रसाद पलायनवादी थे तो इसका उत्तर उनके अन्य काव्य में मौजूद है कि वे पलायनवादी नहीं थे बल्कि दृढ़तावादी थे। प्रसाद के काव्य को समझने में यह पुस्तक बहुत सहायक सिद्ध होती है जब महेश तिवारी लिखते हैं कि प्रसाद ने पश्चिमी विचारकों की भांति काव्य और कला को एक नहीं माना है। भारतीय मान्यता के अनुसार उन्होंने कला को उपविद्या माना है जो बुद्धिवाद की प्रधानता सूचित करती है और जिसका संबंध विज्ञान से अधिक घनिष्ठ होता है। डॉ. तिवारी उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि ‘‘स्कंदगुप्त’’ नाटक में मातृगुप्त कहता है- ‘‘कवित्व-वर्णमय चित्र है, जो स्वर्गीय भावपूर्ण संगीत गाया करता है। अंधकार का आलोक से, असत का सत से, जड़ का चेतन से और बाह्य जगत का अंतर्जगत से संबंध कौन कराती है, कविता ही न?’’ स्पष्ट है कि यहां प्रसाद जी ने कविता को सृष्टि के परस्पर विरोधी तत्वों में संबंध स्थापित कराने वाली सत्ता के रूप में मान्यता दी है। प्रसाद की यह परिभाषा साहित्यिक कम, आध्यात्मिक और दार्शनिक अधिक है। फिर भी इस परिभाषा में काव्य रचना के अंतर्गत अनुभूति की केंद्रीयता को तो स्वीकार किया ही गया है। काव्य की जो परिभाषा प्रसाद ने ‘‘काव्य कला तथा अन्य निबंध’’ नामक कृति में प्रस्तुत की है वह बहुचर्चित भी है और अधिक मान्य भी। इसके अंतर्गत प्रसाद जी ने कहा है कि ‘‘काव्य आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति है, जिसका संबंध विश्लेषण विकल्प या विज्ञान से नहीं है। वह एक श्रेयमयी प्रेय रचनात्मक ज्ञानधारा है। आत्मा की मनन शक्ति की असाधारण अवस्था, जो श्रेय सत्य को उसके मूल चारुत्व में सहसा ग्रहण कर लेती है, काव्य में संकल्पात्मक अनुभूति कही जा सकती है।’’ जयशंकर प्रसाद की इस परिभाषा पर टिप्पणी करते हुए आचार्य भगीरथ मिश्र ने कहा है कि प्रसाद जी की वह परिभाषा केवल व्यक्तिगत दृष्टिकोण ही स्पष्ट करती है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि ‘‘काव्य केवल अनुभूति मात्र ही नहीं होता, दूसरी बात अनुभूति केवल संकल्पात्मक ही होती है। अतः इस परिभाषा में संकल्पात्मक शब्द एक अतिरिक्त शब्द है।’’ 


 डॉ. महेश तिवारी कहते हैं कि काव्य की आत्मा का प्रश्न प्रसाद ने बहुत सीधे ढंग से विचार नहीं किया है किंतु काव्य रचना में उन्होंने आत्मानुभूति की केंद्रित ही स्वीकार की है। हिंदी में नई छायावादी काव्य रचना के उद्भव के समय पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा उसका जो विरोध हुआ उसके संदर्भ में महादेवी वर्मा ने भी छायावाद के पक्ष को स्पष्ट करते हुए अपनी मान्यताएं प्रस्तुत कीं। महादेवी वर्मा के अनुसार स्वच्छंदतावाद की भांति हिन्दी का छायावाद भी पूर्ववर्ती शास्त्रीयता विजड़ित विषय-प्रधान कविता के विरुद्ध वैयक्तिक अभिव्यक्ति को प्रमुखता देते हुए सामने आने वाला एक आंदोलन था। ‘‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’’ पुस्तक पढ़ते समय महादेवी वर्मा द्वारा हिंदी काव्य की परिभाषा के संदर्भ में याद आ जाती है उनकी ‘‘निश्चय’’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियां -
कितनी रातों की मैंने
नहलाई है अंधियारी,
धो ड़ाली है संध्या के
पीले सेंदुर से लाली,
नभ के धुंधले कर ड़ाले
अपलक चमकीले तारे,
इन आहों पर तैरा कर
रजनीकर पार उतारे।

ऐसा निबंधात्मक गद्य जिसमें काव्य प्रवृत्तियों की समालोचना हो यदि उसे पढ़ते समय संदर्भित कवियों की काव्य पंक्तियां याद आने लगे तो वह लेखन अपनी उपादेयता स्वयं सिद्ध करने लगता है। शोधप्रबंध के रूप में तैयार की गई इस पुस्तक की सामग्री मूल रूप से सात अध्यायों में संजोई गई है - पहला अध्याय है भारतेंदुयुगीन एवं द्विवेदीयुगीन काव्य समीक्षा का विहंगावलोकन, दूसरा अध्याय आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समीक्षादर्श, तीसरा छायावादी काव्य-चिंतन, चौथा अध्याय प्रगतिवादी काव्य चिंतन: सामाजिक यथार्थ तथा साहित्य की सामाजिक संदर्भता, पांचवा अध्याय प्रयोगवादी काव्य-चिंतन: प्रयोगवादी समीक्षा, छठा अध्याय नया काव्य-चिंतन: प्रयोगवादोत्तर काव्य प्रतिमान और सातवां अध्याय छायावादोत्तर समीक्षा में कविता के नए प्रतिमान।

‘‘प्रयोगवादी काव्य-चिंतन: प्रयोगवादी समीक्षा’’ - इस अध्याय में  डॉ. तिवारी  ने काव्य की आत्मा  की विवेचना की है। वे लिखते हैं कि जहां तक काव्य की समीक्षा का प्रश्न है काव्य की आत्मा जैसे मुद्दे को उसके अंतर्गत नए रूप में उठाया गया है। प्रयोगवादी समीक्षा के प्रतिनिधि चिंतक अज्ञेय ने चमत्कार को ही काव्य के आंतरिक गुण अथवा आत्मा के रूप में मान्यता दी है। यहीं इस पुस्तक के लेखक डॉ. तिवारी काव्य के तत्व की भी चर्चा करते हैं। उनके अनुसार प्रयोगवादी काव्य समीक्षा में अनुभूति को काव्य के प्राथमिक तथा अनिवार्य तत्व के रूप में मान्यता दी गई है। प्रयोगवादी काव्य समीक्षा में काव्यगत अनुभूति को व्यक्तिगत अनुभूति से भिन्न माना गया है। प्रयोगवादी काव्य समीक्षा के अंतर्गत कविता को अनुभूति की अभिव्यक्ति नहीं अनुभूति से मुक्ति माना गया है। प्रयोगवादी समीक्षा में अनुभूति के खरेपन तथा अनुभूति की दिव्यता को महत्व दिया गया है। अब प्रश्न उठता है कि काव्य के विषय क्या होने चाहिए? तो इस संबंध में लेखक ने अज्ञेय के विचार को  उद्धृत किया है कि विषय के संदर्भ में साहित्य की समीक्षा को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह भी कि किसी साहित्यकार में किसी वस्तु, घटना अथवा स्थिति के प्रति स्वभाव होता है। यदि प्रेरणा उत्पन्न नहीं होती तो उसे बलात् पैदा करने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए किंतु काव्य के विषय में परिसीमन की छूट है।

‘‘हिंदी काव्य-समीक्षा के प्रतिमान’’ डाॅ महेश तिवारी का एक ऐसा आलोचनाग्रंथ है जिसके द्वारा काव्य-समीक्षा की बारीकियों को भली-भांति समझा जा सकता है। चूंकि यह ग्रंथ सैद्धांतिक मीमांसा पर आधारित है इसलिए इसे समझने और इसके द्वारा काव्य के समग्र को समझने के लिए इस ग्रंथ का साहित्यप्रेमियों, साहित्य मर्मज्ञों एवं शोधार्थियों द्वारा पुनर्पाठ जरूरी है।
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( दैनिक, आचरण  दि.10.10.2020)
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Saturday, October 3, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 10 | तिल के फूल- तिली के दाने | गीत संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत दसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के कवि स्व. रमेशदत्त दुबे के गीत संग्रह  "तिल के फूल - तिली के दाने" का पुनर्पाठ।

सागर : साहित्य एवं चिंतन

पुनर्पाठ : ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ गीत संग्रह
            - डॉ. वर्षा सिंह

इस बार पुनर्पाठ के लिए मैंने चुना है सागर के कवि स्व. रमेशदत्त दुबे की पुस्तक ‘तिल के फूल-तिली के दाने’। यह एक ऐसा गीत संग्रह है जिसके गीत बच्चों के लिए हैं। 

कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं होगा जिसने अपने बचपन में राजा-रानी, हाथी-घोड़े, शेर-भालू, राक्षस-परी आदि की कहानियां और कविताएं न सुनी हों। हमारी दादी, नानी और मां ने हमें बचपन में ढेर सारी कहानियां सुनाई हैं और बाल कविताएं याद करवाई हैं। अगर मैं अपनी व्यक्तिगत बात करूं तो मुझे मेरे नानाजी हमें संत ठाकुर श्यामचरण सिंह पंचतंत्र, हातिमताई, चहार दरवेश, चन्द्रकांता, रामायण, महाभारत से ले कर महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ी कहानियां सुनाया करते थे। यदि बात की जाए पंडित विष्णु शर्मा के पंचतंत्र की, तो उसमें निहित कथाएं उन राजकुमारों को रोचक ढंग से शिक्षा देने के लिए पशु-पक्षियों को आधार बना कर तैयार की गई थीं जो राजकुमार पढ़ने में घोर अरुचि रखते थे। पंडित विष्णु शर्मा का यह प्रयास सफल रहा। एक उदाहरण हम अपने जीवन से भी उठा सकते हैं। हम सभी ने अपने बचपन में वह कविता तो अवश्य पढ़ी होगी जो चार पंक्तियों में मछली के जीवन से अवगत करा देती है -
मछली जल की रानी है
जीवन जिसका पानी है
हाथ लगाओ डर जाएगी
बाहर निकालो मर जाएगी

कहने का आशय यह है कि बच्चों के लिए जो साहित्य रचा जाए उसमें सरल शब्द और रोचक शैली के माध्यम से जीवन से जुड़ा ज्ञान दिया जाए। ऐसा ज्ञान जो बच्चों की कल्पना शक्ति और व्यक्तित्व का एक साथ विकास करे। बच्चों के लिए मुद्रित साहित्य की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए नेशनल बुक ट्रस्ट के अंतर्गत सन् 1957 में “चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट” की स्थापना में की गई, ताकि बच्चों के लिए ज्ञानवर्द्धक, रोचक एवं स्तरीय साहित्य प्रकाशित उपलब्ध कराया जा सके। अन्य प्रकाशकों ने भी बाल साहित्य की ओर ध्यान दिया। चम्पक, नंदन, चंदामामा, पराग आदि पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती रही हैं। फिर भी बाल साहित्य कहीं पीछे छूटता गया। लेकिन कुछ साहित्यकार जितनी गम्भीरता से बड़ों के लिए साहित्य रच रहे थे उतनी ही गम्भीरता से बच्चों के लिए भी गीत रच रहे थे। कवि रमेश दत्त दुबे ने बच्चों के लिए कई गीत लिखे। जिनमें से अट्ठाइस गीत ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ नामक गीत संग्रह के रूप में संग्रहीत हैं। इस गीत संग्रह को मैंने कई बार पढ़ा है। जब भी मैं इसके गीतों को पढ़ती हूं तो अपने बचपन के दिनों में जा पहुंचती हूं। सीधे-सरल शब्दों में लयात्मकता से भरे ये गीत मुझे उन दिनों की याद दिलाते हैं जब मैंने स्कूल की प्रतियोगिता के लिए एक गीत लिखा था। मुझे याद है कि जब मैं कक्षा 06 में पढ़ती थी तब विद्यालय में एक कविता लेखन प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। इसमें प्रतियोगियों के लिए कक्षावार तीन वर्ग निर्धारित किए गए थे- प्रायमरी, माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक। मैंने माध्यमिक वर्ग में अपना नाम लिखा दिया। अब समस्या थी कविता लिखने की। मैंने इस संबंध में नानाजी से मदद मांगी, तो उन्होंने कहा - तुम प्रतिभागी हो इसलिए स्वयं कविता लिखो। तब मैंने पूछा कि मैं कैसे लिखूं। नानाजी ने कहा अपनी छोटी बहन पर कविता लिख डालो। और फिर क्या था, मैंने फटाफट अपनी छोटी बहन शरद पर कविता लिख डाली। मुझे उस कविता पर प्रथम पुरस्कार भी मिला। मेरी वह कविता थी -
मेरी बहना, मेरी बहना
सदा मानती मेरा कहना
खेल कूद से अधिक सुहाता
हरदम उसको लिखना-पढ़ना

यह कविता मुझे आज तक याद है जबकि आयु की परिपक्वता के साथ बाल कविताएं पीछे छूटती चली गईं। प्रायः सभी के साथ यही होता है। सरल सी प्रतीत होने वाली बाल कविताएं पीछे छूट जाती हैं और छंद, अलंकार तथा जीवन के गूढ़ विषयों से रची-बसी कविताएं सृजित होने लगती हैं। जो बाल कविताएं पढ़ने, सुनने में सहज और सरल लगती हैं उनको लिखना बड़ों के लिए लिखे जाने वाले साहित्य से कहीं अधिक कठिन होता है। यह बड़ा ही चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके लिए पहली शर्त है बाल मनोविज्ञान की समझ होना। जैसे रमेशदत्त दुबे ने लोक भावना और बच्चों के खेल गीतों का सम्मिश्रण करते हुए ऐसे रोचक गीत लिखे जो वर्तमान परिवेश से भी बच्चों को जोड़नो में सक्षम हैं और पहेलियां सी भी बुझाते हैं। उदाहरण के लिए ‘‘हाथी, घोड़ा, पालकी’’ शीर्षक उनका यह गीत देखें-
हाथी, घोड़ा, पालकी
बातें हैं उस काल की
मोटर, साइकिल, प्लेन की
बातें हैं इस काल की।
बातों-बातों से बनती हैं
बातें बिलकुल हाल की
सभी हाल की बातों से 
छपते हैं अखबार
नौ नकद के सौदे में
तेरह हुए उधार

  समीक्ष्य कृति -  तिल के फूल तिली के दाने 

इस संग्रह में एक गीत है - ‘‘नानाजी’’ जिसमें नानाजी का वर्णन बड़े ही रोचक ढंग से किया गया है, उसका यह अंश देखें - 
कैसे तो हैं नानाजी
कैसा इनका बानाजी
चश्मा उनका मोटा है
दांत लगाए हैं नकली
छड़ी सहारे चलते हैं
झुकी कमर उनकी पतली
कैसे तो हैं नानाजी
कुछ बोलो कुछ सुनते हैं
मन ही मन कुछ गुनते हैं
गुनी हुई हर बात को
धुनिया जैसा धुनते हैं
कैसे तो हैं नानाजी

‘‘पो संपा’’ शीर्षक गीत में कवि ने बुंदेलखंड के खेलगीत को बड़ी खूबसूरती से पिरोया है। इस गीत की पंक्तियां देखें -
पो संपा भई पो संपा
पो संपा ने क्या किया
पो संपा ने रेल बनाई
रेल बना कर खूब चलाई
अब तो रेल में जाना पड़ेगा
लटके-बैठे, खड़े-खड़े
साथ चलेंगे पेड़ खड़े
छुक-छुक करती चलती रेल
डिब्बों में है रेलम्पेल
कहीं बोगदा आ जाएगा
अंधकार तब छा जाएगा

इस गीत में ‘‘पो संपा’’ खेल गीत के बहाने कवि ने रेल यात्रा का परिचय दे दिया गया है। जो उन बच्चों के मन में भी रेल यात्रा के बारे में रुचि पैदा कर सकता है जिन्होंने कभी रेल देखी भी न हो। बच्चों को बंदर, भालू, बिल्ली आदि पशुओं से भी बड़ा लगाव रहता है। ‘‘एक से तीन’’ शीर्षक गीत में बड़े चुलबुले ढंग से बंदर, भालू, बिल्ली के बारे में लिखा गया है -
एक है बिल्ली, एक चिबिल्ली
एक है मुंबई, एक है दिल्ली
एक छमाछम नाच रही
एक उछलती, एक कूदती
बैठी-बैठी एक खांसती
एक फटाफट दौड़ रही
एक को ले गया भालू, बंदर
एक छुप गई घर के अंदर
एक सभी को ढ़ूंढ रही
एक मिल गया इस कोने में
एक मिल गया उस कोने में
एक एक से तीन हुई

इन गीतों को उन सभी के लिए पढ़ना जरूरी है जो अपने मन के भीतर मौजूद बचपन से दूर होते जा रहे हैं, और इसी बिन्दु पर बात आती है ऐसे गीतों को लिखे जाने की। आज हिन्दी में बड़ों के लिए लिखे जा रहे साहित्य की अपेक्षा बाल साहित्य कम लिखा जा रहा है। हिन्दी के प्रतिष्ठित साहित्यकार स्वयं प्रकाश ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘‘हिन्दी में बच्चों के लिए लिखने को दूसरे दर्जे का काम समझा जाता है।  जबकि हर लेखक को बच्चों के लिए कुछ न कुछ जरूर लिखना चाहिए। समर्थ लोग हैं, लिख क्यों नहीं रहे हैं। साथ ही ऐसे लेखन को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए। यह कोई दूसरे दर्जे का काम नहीं है।’’ आज जब बच्चे मोबाइल और कम्प्यूटर पर तरह-तरह के गेम्स में रमें रहते हैं तब उनके लिए बाल साहित्य और भी जरूरी हो जाता है। ऐसे समय में कवि स्व. रमेशदत्त दुबे की पुस्तक ‘तिल के फूल-तिली के दाने’ का पाठ एवं पुनर्पाठ दोनों महत्व रखते हैं। 
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साहित्य वर्षा
 
( दैनिक, आचरण  दि.03.10.2020)
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Friday, September 25, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 9 | हल्ला कन्हैया का | भजन संग्रह | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत  नौवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर के कवि आर.के. तिवारी के भजन संग्रह  "हल्ला कन्हैया का" का पुनर्पाठ।

सागर : साहित्य एवं चिंतन

 पुनर्पाठ : ‘हल्ला कन्हैया का’ भजन संग्रह
                          - डॉ. वर्षा सिंह
                           
       इस बार पुनर्पाठ में मैंने जिस कृति को चुना है वह भक्तिरस से परिपूर्ण है। कृति का नाम है ’’हल्ला कन्हैया का‘‘। यह भजन संग्रह है आर. के. तिवारी का। भक्ति हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। हम एक परमशक्ति को किसी न किसी रूप में स्वीकार करते हैं और उसकी आराधना करते हैं। हमें लगता है कि जब हम पर कोई संकट आएगा तो यह परमशक्ति हमें उस संकट से बचा लेगी। यह विश्वास ही तो है भक्ति का मूल आधार। चाहे राम कहें, कृष्ण कहें, अल्लाह या ईसा मसीह कहें, किसी भी रूप या स्वरूप में हम उसकी सत्ता को स्वीकार करें किन्तु उसकी कल्पना हमारे भीतर आत्मविश्वास और धैर्य का संचार करती है। अपनी भक्ति को प्रकट करने तथा उस परमशक्ति से तादात्म्य स्थापित करने के लिए कोई नाचता है तो कोई गाता है, कोई चित्र बनाता है तो कोई साहित्य की रचना करता है।
         विपरीत राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों में जनमानस में आत्मविश्वास जगाने के लिए समय-समय पर संतों ने भक्तिकाव्य की रचनाएं कीं। हिन्दी साहित्य में एक पूरा काल ही भक्तिकाल के नाम से जाना जाता है क्यों कि इस अवधि में सर्वाधिक भक्ति रचनाओं की सर्जना हुई। ये सभी लिखित नहीं थीं, इनमें कुछ वाचिक भी थीं जिन्हें दूसरे लोगों के द्वारा लिपिबद्ध किया गया। रामचंद्र शुक्ल ने ‘‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’’ में कालखंड निर्धारित करते हुए भक्तिकाल को 1375 से 1700 तक माना है। इस कालखण्ड को हिंदी साहित्य का श्रेष्ठ युग माना गया है। जिसको जॉर्ज ग्रियर्सन ने स्वर्णकाल, श्यामसुन्दर दास ने स्वर्णयुग, आचार्य राम चंद्र शुक्ल ने भक्ति काल एवं हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लोक जागरण कहा। भक्ति काव्य की अलख जागी दक्षिण भारत से। दक्षिण में आलवार हुए जो अधिक  पढे-लिखे नहीं थे, किन्तु सत्य के ज्ञानी थे। उन्होंने अपने काव्य द्वारा जनमानस को ईश्वर की परमसत्ता के प्रति मोड़ा। आलवारों के पश्चात दक्षिण में आचार्यों की एक परंपरा चली जिसमें रामानुजाचार्य प्रमुख थे।         
        रामानुजाचार्य की परंपरा में रामानंद हुए। उन्होंने भक्ति के क्षेत्र में ऊंच-नीच का भेद का खुल कर विरोध किया। सभी जातियों के अधिकारी व्यक्तियों को आपने शिष्य बनाया। महाप्रभु वल्लभाचार्य ने पुष्टि-मार्ग की स्थापना की और विष्णु के कृष्णावतार की उपासना करने का प्रचार किया। उनके द्वारा जिस लीला-गान का उपदेश हुआ उसने देशभर को प्रभावित किया। अष्टछाप के सुप्रसिद्ध कवियों ने उनके उपदेशों को मधुर कविता में प्रतिबिंबित किया। इसके उपरांत माधव तथा निंबार्क संप्रदायों का भी जनसमाज पर प्रभाव पड़ा है। साधना-क्षेत्र में दो अन्य संप्रदाय भी उस समय विद्यमान थे। नाथों के योग-मार्ग से प्रभावित संत संप्रदाय चला जिसमें प्रमुख व्यक्तित्व संत कबीरदास का है। संक्षेप में भक्ति-युग की चार प्रमुख काव्य-धाराएं मिलती हैं- ज्ञानाश्रयी शाखा, प्रेमाश्रयी शाखा, कृष्णाश्रयी शाखा और रामाश्रयी शाखा, प्रथम दोनों धाराएं निर्गुण मत के अंतर्गत आती हैं, शेष दोनों सगुण मत के।
         कुछ ने ईश्वर को साकार माना तो कुछ ने निराकार। संत साहित्य में सूरदास, नामदेव, ज्ञानेश्वर, तुलसीदास, मीराबाई, कबीर, दादूदयाल, रहीम, रसखान, रैदास आदि महत्वपूर्ण संत कवि हुए। आज भी हम उन्हीं के भजनों को गा कर, सुन कर आत्मिक सुख की तलाश करते हैं। वर्तमान बाज़ारवाद एवं भौतिकतावाद के दौर में भक्तिकाव्य का नवसृजन कहीं पीछे छूट चला है। हिन्दी साहित्य में अनेक काव्य विधाओं के होते हुए भी भक्तिकाव्य का सृजन कम हो गया है। जो सृजन हो रहा है उसमें भजन प्रमुख हैं। इनकी विशेषता इनकी गेयता में होती है। इन भजनों में धर्म, दर्शन, जीव, जगत, ब्रह्म आदि संबंधी विचार काव्यात्मक रूप में पिरोए जाते हैं। साहित्य के अंतर्गत एक विरोधाभासी स्थिति यह है कि भजनों को धर्म की वस्तु मान कर उतनी गंभीरता से आज नहीं लिया जाता है जितनी गंभीरता से भक्तिकाल के काव्य को लिया गया। धार्मिक उत्सवों के समय भजन डिज़िटल रूप में बजाए जाते हैं और सुने जाते हैं किन्तु शेष समय इन्हें साहित्य की श्रेणी में गंभीरता से नहीं लिया जाता है। जबकि भजन भी साहित्य की वह प्रस्तुति है जिसमें भावना, छंद, लय, ताल, आदि सभी कुछ होता है। ‘‘हल्ला कन्हैया का’’ भजन संग्रह पहली बार पढ़ते हुए मुझे उसमें संग्रहीत कवि आर. के. तिवारी के भजनों में भक्तिरस के जिस भावप्रभाव का अनुभव हुआ, वही अनुभव उसका पुनर्पाठ करते समय भी हुआ। जैसा कि संग्रह के नाम से ज्ञात हो जाता है कि इस संग्रह में संग्रहीत भजन श्रीकृष्ण की लीलाओं को समर्पित हैं। जब कृष्णभक्ति काव्य की बात चलती है तो स्वतः स्मरण हो आता है भक्तकवि सूरदास का। सूरदास ने सखाभाव से कृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया है। इसीलिए वे कृष्ण को उलाहना देने से भी नहीं चूके हैं। जबकि तुलसीदास जब श्रीराम के जीवन का वर्णन करते हैं तो वे स्वयं को उनका दास या सेवक मानते हैं। अतः उनके काव्य में उस प्रकार उलाहने का स्वर सुनाई नहीं देता है जैसा कि सूरदास के काव्य में। इसका एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम है और श्रीकृष्ण लीलाधारी। इसीलिए श्रीकृष्ण के भजन लिखते समय सखाभाव स्वतः आ जाता है और कृष्ण के नटखटपन का बिम्ब काव्य में समाने लगता है।

         भक्तिकाल के मध्यकालीन परिवेश से आज का परिवेश पूरी तरह भिन्न है। आज के समाज में धार्मिक कट्टरता का कोई स्थान नहीं है। आज सामाजिक एवं धार्मिक सौहाद्र्य के वातावरण में जो कृष्ण काव्य रचा जाएगा उसमें नटखट माखनचोर एवं बांसुरी वाले कृष्ण की शरारतों और रास के वर्णन को अधिक स्थान मिलेगा। यही विशेषता मिलती है ‘‘हल्ला कन्हैया का’’ भजन संग्रह के भजनों में। इन भजनों में निश्चिंत मन की उन्मुक्त भक्ति को अनुभव किया जा सकता है। भक्ति काव्य की एक विशेषता यह भी है कि उनमें आंचलिक बोली-भाषा का प्रयोग किया जाता है। बृज और अवधी की तरह बुंदेली में भी कृष्ण काव्य लिखे गए हैं। कवि आर. के. तिवारी ने भी अपने भजन में बुंदेली में लिखे हैं इसीलिए इन भजनों में माटी के सोंधेपन जैसा एक आकर्षण और सहजता है। उदाहरण देखें -
कान पकर के कै रई यशोदा
जो का मोहन कर डारो
पूरो गावों बाहर ठारों
भारी भीड़ लगी है दुआरे
गांव के सबरे बाहर ठाड़े
कोउ की टुकड़ा-टुकड़ा गगरी
रो-रो कै रई हमसे सबरी
न्याय हमारो करवाओ

       कृष्णकथा का बखान हो और उसमें यमुना में नहाती हुई गोपियों के वस्त्रहरण की शरारत का स्मरण न किया जाए यह सम्भव नहीं है। इस भजन संग्रह में भी एक भजन इसी संदर्भ का है जिसमें गोपियां कृष्ण के द्वारा वस्त्र उठा ले जाने की शिकायत कर रही हैं -
ले गओ, ले गओ, ले गओ री
चीर मुरारी ले गओ री
हम गए कल री जमुना नहावे
छोड़ चुनरिया अपने किनारे
घुस गए जल में हम तो सारे
श्याम कहूं से आ गओ री
चुपके-चुपके आओ कन्हैया
चोरी-चोरी आओ कन्हैया
झपट चुनरिया ले गओ री

        श्री कृष्ण के बांसुरी वादन से जो स्वर लहरियां निकलती थीं वे गोप, गोपियां और राधा, सभी को सम्मोहित कर लेती थीं। आकर्षण इतना कि जेठ की तपती दोपहर में राधा जब कृष्ण की बांसुरी का स्वर सुनती है तो वह स्वयं को रोक नहीं पाती है और पानी भरने का बहाना करके कृष्ण से मिलने निकल पड़ती है। कवि ने इस दृश्य का बहुत सुन्दर वर्णन किया है -
तपती दुफर में निकरी है राधा
सुन मोहन की बांसुरिया
सर पै धरे चली गगरियां
सोला गज को घंघरा पैने
सात गजी की सारी पैने
पांच गजी की चुनरिया
सर पै धरे चली गगरियां

       कृष्ण और होली के त्यौहार का गहरा संबंध है। जिस प्रकार कृष्ण का स्मरण मन को प्रफुल्लित कर देता है ठीक उसी प्रकार होली का त्यौहार मन को रंगों के उत्साह से भर देता है। श्री कृष्ण और राधा के बीच की होली जीवन में उमंग, उत्साह और आह्लाद की पर्याय है। इस दृश्य की कल्पना कीजिए कि बृज में बनवारी अर्थात् कृष्ण होली खेल रहे हैं और गोपिकाएं उनसे बचने का प्रयास करती हुई राधा को सचेत कर रही हैं -
भगो, भगो राधा! भगो, भगो री
रंगवा लयै है बनवारी
रंगवा लयै है बनवारी
भगो, भगो री ...
बृज की ग्वालन दौड़त फिर रईं
श्याम से सबरी लुकाछिपी कर रईं
कै रई राधा - भगो, भगो री
रंगवा लयै है बनवारी
भगो, भगो री ...

       ‘‘हल्ला कन्हैया का’’ भजन संग्रह के भजनों की सबसे बड़ी खूबी उनकी गेयता है। जो पढ़ने के साथ ही गुनगुनाने को विवश कर देती है। और यही विशेषता भजन-शैली को एक जनकाव्य-शैली बना देती है। कवि आर.के. तिवारी द्वारा रचित ये भजन स्वयं पुनर्पाठ करने के लिए प्रेरित करते है।

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( दैनिक, आचरण  दि.25.09.2020)
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Saturday, September 19, 2020

सागर: साहित्य एवं चिंतन | पुनर्पाठ 8 | पिछले पन्ने की औरतें | उपन्यास | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय मित्रों, 
               स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर : साहित्य एवं चिंतन " जिसमें पुस्तकों के पुनर्पाठ की श्रृंखला के अंतर्गत आठवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - सागर नगर निवासी, राष्ट्रीय स्तर पर ख्यात लेखिका डॉ. (सुश्री) शरद सिंह, जो मेरी अनुजा भी हैं, के उपन्यास  "पिछले पन्ने की औरतें" का पुनर्पाठ।

सागर: साहित्य एवं चिंतन

       पुनर्पाठ: ‘पिछले पन्ने की औरतें’ उपन्यास

                          -डॉ. वर्षा सिंह
                           
         इस बार पुनर्पाठ में मैं जिस उपन्यास की चर्चा करने जा रही हूं उसका नाम है ’’पिछले पन्ने की औरतें‘‘। इस उपन्यास की लेखिका है डॉ. शरद सिंह। यह उपन्यास मुझे हर बार प्रभावित करता है इसलिए नहीं कि यह मेरी छोटी बहन शरद के द्वारा लिखा गया है बल्कि इसलिए कि इसे हिंदी साहित्य का बेस्ट सेलर उपन्यास और हिंदी साहित्य का टर्निंग प्वाइंट माना गया है। इसे बार-बार पढ़ने की ललक इसलिए भी जागती है कि इसमें एक अछूते विषय को बहुत ही प्रभावी ढंग से उठाया गया है। जी हां, इस उपन्यास में हाशिए में जी रही उन महिलाओं के जीवन की गाथा उनकी सभी विडंबनाओं के साथ सामने रखी गई है, जिन्हें हम बेड़नी के नाम से जानते हैं। समग्र हिन्दी साहित्य में स्त्रीविमर्श एवं आधुनिक हिन्दी कथा लेखन के क्षेत्र में सागर नगर की डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह का योगदान अतिमहत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने पहले उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ से हिन्दी साहित्य जगत में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई। ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ उपन्यास का प्रथम संस्करण सन् 2005 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद अब तक इस उपन्यास के हार्ड बाऊंड और पेपर बैक सहित अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। यह न केवल पाठकों में बल्कि शोधार्थियों में भी बहुत लोकप्रिय है। देश के अनेक विश्वविद्यालयों में इस उपन्यास पर शोध कार्य किया जा चुका है और वर्तमान में भी अनेक विद्यार्थी इस उपन्यास पर शोध कार्य कर रहे हैं।
हिन्दी साहित्य में ’’पिछले पन्ने की औरतें‘‘ ऐसा प्रथम उपन्यास है जिसका कथानक बेड़नियों के जीवन को आाधार बना कर प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास की शैली भी हिन्दी साहित्य के लिए नई है। यह उपन्यास अतीत और वर्तमान की कड़ियों को बड़ी ही कलात्मकता से जोड़ते हुए इसे पढ़ने वाले को वहां पहुंचा देता है जहां बेड़नियों के रूप में औरतें आज भी अपने पैरों में घंघरू बांधने के लिए विवश हैं। यह उपन्यास ‘‘रहस्यमयी श्यामा’’ से लेखिका की मुलाकात से आरम्भ होता है। कहने को तो यह मामूली सी घटना है कि लेखिका को सागर से भोपाल की बस-यात्रा के दौरान एक महिला सहयात्री मिलती है। लेकिन कथानक का श्रीगणेश ठीक वहीं से हो जाता है जब लेखिका को बातचीत में पता चलता है उस स्त्री का नाम श्यामा है और वह एक बेड़नी है। श्यामा राई नृत्य करती है और नृत्य करके अपने परिजन का पेट पालती है। यहीं से आरम्भ होती है एक जिज्ञासु यात्रा। इसके बाद लेखिका बेड़िया समाज के इतिहास और पारिवारिक संरचना पर अपनी शोधात्मक दृष्टि डालती है। वह स्वयं उन गांवों में जाती है जहां बेड़नियां रहती हैं। उनसे बात करती है, उनके जीवन को टटोलती है और उनके साथ, उनके घर पर रह कर उनके जीवन की बारीकियों को समझने का प्रयास करती है। यह एक बहुत बड़ा क़दम था। वाचिक और लिखित स्रोतों और ज़मीनी कार्यों के बीच तालमेल बिठाती हुई लेखिका शरद सिंह उपन्यास की अंतर्कथा के रूप में लिखती हैं गोदई की नचनारी बालाबाई की मर्मांतक कथा। जब एक गर्भवती बेड़नी को भी देह-पिपासु पुरुषों ने भावी मंा नहीं अपितु मात्र स्त्रीदेह के रूप में ही देखा। यह कथा मन को विचलित कर देती है। उपन्यास आगे बढ़ता है चंदाबाई, फुलवा के जीवन से होता हुआ रसूबाई के जीवन तक जा पहुंचता है। स्त्री को मात्र देह मानने वालों के द्वारा स्त्री के सम्मान और स्वाभिमान पर चोट पहुंचाने, उन पर अत्याचार करने वालों की दुर्दांत कुचेष्टाएं झेलती ये स्त्रियां। जिनके बारे में शरद सिंह कहती हैं कि ये वे औरतें हैं जिन्हें समाज अपनी खुशियों को बढ़ाने के लिए अपने पारिवारिक उत्सवों में नाचने के लिए तो बुलाता है लेकिन इन्हें अपने परिवार में शामिल करने से हिचकता है। वह इनकी खुशियों से कतई सरोकार नहीं रखना चाहता है।


इस उपन्यास का एक और पहलू है कि यह उपन्यास परिचित कराता है उस औरत से जिसने अल्मोड़ा में जन्म लिया, लेकिन अपने जीवन का उद्देश्य बेड़िया समाज के लिए समर्पित करते हुए ‘बेड़नी पथरिया’ नामक गंाव में ‘सत्य शोधन आश्रम’ की स्थापना की। उसका नाम था चंदाबेन। इस उपन्यास की खांटी वास्तविक पात्र हैं चंदाबेन, जिन्होंने अपने जीवन के विवरण को इस उपन्यास का हिस्सा बनने दिया। वस्तुतः ’’पिछले पन्ने की औरतें‘‘ एक उपन्यास होने के साथ-साथ यथार्थ का औपन्यासिक दस्तावेज़ भी है। इसमें बेड़िया समाज का इतिहास है, बेड़नियों के त्रासद जीवन का रेशा-रेशा है, बेड़नियों के संघर्ष का विवरण है, उनकी आकांक्षाओं एवं आशाओं का लेखा-जोखा है। यही तो है सच्चा स्त्रीविमर्श कि जब किसी उपन्यास में जीवन की सच्चाई को पिरो कर उसे सच के क़रीब ही रखा जाए, इतना क़रीब कि इस उपन्यास को पढ़ने वाला पाठक बेड़नियों की त्रासदी से उद्वेलित हुए बिना नहीं रह पाए और उपन्यास के अंतिम पृष्ठ तक पहुंचते हुए बेड़नियों के उज्ज्वल भविष्य की दुआएं करने लगे।    
परमानंद श्रीवास्तव जैसे समीक्षकों ने उनके इस उपन्यास को हिन्दी उपन्यास शैली का ‘‘टर्निंग प्वाइंट’’ कहा है। यह हिन्दी में रिपोर्ताजिक शैली का ऐसा पहला मौलिक उपन्यास है जिसमें आंकड़ों और इतिहास के संतुलित समावेश के माध्यम से कल्पना की अपेक्षा यथार्थ को अधिक स्थान दिया गया है। यही कारण है कि यह उपन्यास हिन्दी के ‘‘फिक्शन उपन्यासों’’ के बीच न केवल अपनी अलग पहचान बनाता है अपितु शैलीगत एक नया मार्ग भी प्रशस्त करता है। शरद सिंह जहां एक ओर नए कथानकों को अपने उपन्यासों एवं कहानियों का विषय बनाती हैं वहीं उनके कथा साहित्य में धारदार स्त्रीविमर्श दिखाई देता है।
‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ शरद सिंह द्वारा लिखित उनका पहला शोधपरक उपन्यास है जिसमें सामाजिक स्तरों में दबी-कुचली और पिछले पन्नों में दर्ज कर भुला दी गईं औरतों को मुखपृष्ठ पर लाने का सफल प्रयास किया है। तीन भागों और सत्ताईस उपभागों में लिखे गए उपन्यास के स्त्री पात्र महत्वपूर्ण हैं। किसी स्त्री की वेदना एवं पीडा को रिर्पोताज शैली में लेखन करना लेखिका की कुशलता का परिचायक है। विभिन्न औरतों से होकर संपूर्ण भारतीय औरतों के अस्तित्व, अधिकार पर लेखिका ने प्रकाश डाला है। ’पिछले पन्ने की औरतें’ उपन्यास में शरदसिंह ने समाज की आन्तरिक और बाह्य परतों को खोलने का प्रयास किया वे समाज के कुरूप सत्य को बड़े ही बोल्ड ढंग से प्रस्तुत करती हैं उनकी लेखकीय क्षमता की विशेषता है कि वे जीवन और समाज के अनछुए विषयों को उठाती हैं।
जब भी मैं इस उपन्यास को पढ़ती हूं तो मुझे सुप्रसि़द्ध समीक्षक स्व. परमानंद श्रीवास्तव का वह समीक्षा-लेख याद आने लगता है जो उन्होंने ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ के बारे में लिखा था - “ रोमांस की मिथकीयता के लिए कोई भी कथा छलांग लगा सकती है। शरद सिंह का उपन्यास ‘‘पिछले पन्ने की औरतें’’ बेड़िया समाज की देह व्यापार करने वाली औरतों की यातना भरी दास्तान है। शरद सिंह की प्रतिभा ‘तीली-तीली आग’ कहानी संग्रह से खुली। स्त्री विमर्श में उनका हस्तक्षेप और प्रामाणिक अनुभव अनुसंधान के आधार पर है। शरद सिंह वर्जना मुक्त हो कर इस अंधेरी दुनिया में धंसती हैं। उन्हें पता है कि स्त्री देह के संपर्क में हर कोई फायदे में रहना चाहता है। शरद सिंह ने ईश्वरचंद विद्यासागर, ज्योतिबाफुले आदि के स्त्री जागरण को समझते हुए इस नरककुंड से सीधा साक्षात किया है। शरद सिंह को दुख है कि जब देश में स्त्री उद्धार के आंदोलन चल रहे थे तब बेड़िया जाति की नचनारी, पतुरिया-जैसी स्त्रियों की मुक्ति का सवाल क्यों नहीं उठा? नैतिकता के दावेदार कहां थे? विडम्बना यह कि जो पुरुष इन बेड़िया औरतों को रखैल बना कर रखते, उन्हीं के घर के उत्सवों में इन्हें नाचने जाना पड़ता था।......शरद सिंह का बीहड़ क्षेत्रों में प्रवेश ही इतना महत्वपूर्ण है कि एक बार ही नहीं, कई-कई बार इस कृति को पढ़ना जरूरी जान पड़ेगा। अंत में शरद सिंह के शब्द हैं- ‘लेकिन गुड्डी के निश्चय को देख कर मुझे लगा कि नचनारी, रसूबाई, चम्पा, फुलवा और श्यामा जैसी स्त्रियों ने जिस आशा की लौ को अपने मन में संजोया था, वह अभी बुझी नहीं है.....।’ शरद सिंह ने जैसे एक.सर्वेक्षण के आधार पर बेड़नियों के देहव्यापार का कच्चा चिट्ठा लिख दिया है। तथ्य कल्पना पर हावी है। शरद सिंह की बोल्डनेस राही मासूम रजा जैसी है। या मृदुला गर्ग जैसी। या लवलीन जैसी। पर शरद सिंह एक और अकेली हैं। फिलहाल उनका कोई प्रतिद्वन्द्वी कथाक्षेत्र में नहीं है। ‘पिछले पन्ने की औरतें’’ उपन्यास लिखित से अधिक वाचिक (ओरल) इतिहास पर आधारित है। इस बेलाग कथा पर शील-अश्लील का आरोप संभव नहीं है। अश्लील दिखता हुआ ज्यादा नैतिक दिख सकता है। भद्रलोक की कुरूपताएं छिपी नहीं रह गई हैं। शरद सिंह के उपन्यास को एक लम्बे समय-प्रबंध की तरह पढ़ना होगा जिसके साथ संदर्भ और टिप्पणियों की जानकारी जरूरी होगी। पर कथा-रस से वंचित नहीं है यह कृति ‘पिछले पन्ने की औरतें’’। जब दलित विमर्श और स्त्री विमर्श केन्द्र में हैं, संसद में स्त्री सीटों के आरक्षण पर जोर दिया जा रहा हो पर पुरुष वर्चस्व के पास टालने के हजार बहाने हों- यह उपन्यास एक नए तरह की प्रासंगिकता अर्जित करेगा।”
निःसंदेह यह उपन्यास तब तक प्रासंगिक रहेगा जब तक औरतें समाज के पिछले पन्नों में क़ैद रखी जाएंगी। और अंत में मैं दे रही हूं बार-बार पढ़े जाने योग्य इस उपन्यास के आरम्भिक पन्ने में लिखी शरद सिंह की ही वे काव्य पंक्तियां जो एक नए स्त्रीविमर्श के पक्ष में आवाज़ उठाती हैं-
छिपी रहती है
हर औरत के भीतर
एक और औरत
लेकिन
लोग अक्सर
देखते हैं
सिर्फ बाहर की औरत।

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( दैनिक, आचरण  दि.19.09.2020)
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Friday, September 18, 2020

अंगना में ठाड़े बड्डे | बुंदेली व्यंग्य | डॉ. वर्षा सिंह

प्रिय ब्लॉग पाठकों, आज मेरा बुंदेली व्यंग्य लेख "पत्रिका" समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ है।
हार्दिक आभार "पत्रिका" 🙏
बुंदेली व्यंग्य
              अंगना में ठाड़े बड्डे
                              - डॉ. वर्षा सिंह

       हमाए एक बड़े भैया जी आंए, जोन से हम बड्डे कहत हैं। भौतई नोनो सुभाव है उनखों। जोन चाए की मदद खों तैयार रैत हैं, मनो ना कहबो तो उन्ने सीखोई नईंया। बरहमेस, दूसरन के लाने अपनो पूरो टेम दे देत हैं। उनकी जेई आदत पे भौजी सो भारी खिजात हैं उन पे। मनो तनक सी डांट- डपट कर के बे सोई बड्डे खों संग देन लगत हैं। अब करें भी का। कोनऊ की मदद करे बिना उनखों जी सोई नईं मानत है। 
      हमाए बड्डे आयोजन करवाबे में भौतई एक्सपर्ट आएं। बे जोन आयोजन कराबे के लाने ‘‘हऔ’’ बोल देत हैं, तो मनो ऊ आयोजन कभऊं फेल तो होई नईं सकत आए। जा कोरोनाकाल के पैलें आयोजन कराबे के लाने उनके ऐंगर भीड़ लगी रैत्ती। काय से के उन्ने ऐसे-ऐसे आयोजन कराए के लोग देखतई रै गए। कोरोनाकाल में उन्ने भीड़-भाड़ बारो आयोजन खों काम बंद कर दौ है। काय से के बे कोरोना गाइडलाइन खों पालन कर रए हैं। बाकी कल बड्डे के संगे भौतई गजब भऔ। भओ जे के कल जब बे दुपैरी खों अपने अंगना में ठाड़े हते, उनके ऐंगर हरीरो सो सलूखा पैरे एक आदमी आओ, औ कहन लगो के हमाए लाने एक आयोजन करा देओ। 

    ‘‘काय को आयोजन?’’- बड्डे ने पूछी।

   ‘‘मोय सम्मान कार्यक्रम कराने है।’’ ऊने बड्डे से कही। फेर बोलो -‘‘अच्छो बड़ो सो आयोजन, जीमें हजार-खांड़ लुगवा-लुगाई जुड़ जाएं सो मनो मजो आ जाए।’’
‘‘अब न जुड़हें हजार-खांड, तुमें ओनलाईन कराने हो सो बोलो’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘जे ओन-फोनलाईन हमें नईं करानें। हमाए लाने तो तीनबत्ती से पूरो कटरा बजारे लों भर दइयो। बो भी रात नौ के बाद, काय से के दिन में तो उते हमाए भक्तन की भीड़ जुड़ई रैत आय। सम्मान करबे खों मजा तो मनो रातई में आहै।’’ हरीरो सलूखा बारे ने कही।

    ‘‘कोन को सम्मान, कैसो सम्मान, हमाई कछ्छू समझ में ने आ रओ। काय से के ई टेम पे भीड़-भाड़़ जोड़बे वारो कौनऊ आयोजन हम नईं करवा रए। औ रात की तो सोचियो भी नई।’’ बड्डे ने कही।

   ‘‘ऐसो न बोलो भैय्या, तुमाओ बड़ो नाम सुनो है, तुमाए ऐंगर बड़ी आसा ले के आएं हैं।’’ बा गिड़गिड़ात भओ बोलो।

   ‘‘मनो तुम हो कौन? औ कौन को सम्मान करो चात हो?’’ बड्डे खिझात भए बोले।

   ‘‘हओ, सो तुम काए चीनहो हमाए लाने। काय से के तुम तो घरई में पिड़े रैत हो। चलो, हमाई बता देत हैं के हम को आएं। तो सुनो, हम कोरोना आएं। औ हमें उन औरन खों सम्मान करने है जो बिना मास्क लगाए, बिना डिस्टेंसिंग बनाए बजार-हाट में नांए-मांए घूमत रैत हैं। कोनऊ की नईं सुनत हैं। बे हमाए से मिलबे खों उधारे से फिरत हैं। सो हमें भी लग रओ है के हमें अपने ऐसे भक्तन खों सम्मान कारो चइए। काय, ठीक सोची ने हमने?’’ ऊने कही।

   अंगना में ठाड़े बड्डे ने इत्ती सुनी, औ लगा दई दौड़ कमरा के भीतरे। कोरोना हतो सो, अपनो सो मों ले के लौट गओ, बाकी हमाए बड्डे तभई, ओई टेम से उन औरन खों पानी पी-पी के कोस रए हैं जो गाइड- माइड लाईन भुला के कोरोना खों मूड़ पे बिठाए गली-गैल, बजार-हाट में खुल्ला मों लेके नांय-मांय सटत फिरत हैं। सो बड्डे कभऊं कोरोना खों गरियात हैं, सो कभऊं कोरोना भक्तन खों।
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