Friday, February 1, 2019

पुस्तक समीक्षा.... युवाओं के लिए एक उपयोगी पुस्तक - डॉ. वर्षा सिंह


Dr. Varsha Singh

     दिनांक 31.01.2019 को स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में  पिछले दिनों लोकार्पित एक पुस्तक पर मेरी समीक्षा प्रकाशित हुई है, कृपया आप भी पढ़ें....

पुस्तक समीक्षा

     युवाओं के लिए एक उपयोगी पुस्तक
                                                           
                      समीक्षक  - डॉ. वर्षा सिंह
                                         
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पुस्तक  : आर. ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में सफल सेल्समैन कैसे बनें?
लेखिका : कु. सुमि अनामिका साक्षी
प्रकाशक : सर्वांगीण विकास संस्थान, रजाखेड़ी, मकरोनिया, सागर (म.प्र.)
मूल्य    : रुपए 200/-
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          ‘शुद्ध जलाग्रह डायरी के पन्ने.....आर. ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में सफल सेल्समैन कैसे बनें?’ लेखिका कु. सुमि अनामिका साक्षी की वह पुस्तक है जिसमें आर. ओ. मार्केटिंग के बारे में महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए हैं कि आर. ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में सफल सेल्समैन कैसे बनें? सुमि अनामिका साक्षी ने अपने अल्पकालीन जीवन को बहुत ही सार्थकता से जिया। साहित्य और मार्केटिंग की दुनिया में समान रूप से रुचि रखने वाली सुमि अनामिका साक्षी की यह पुस्तक जो उनकी डायरी के पन्नों में लिपिबद्ध थी, उनके जीवनकाल के बाद पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो सकी। यह पुस्तक विशेष रूप से उन युवाओं के लिए लाभप्रद है जो आर.ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में अपनी योग्यता को आजमाना चाहते हैं।
               बात चाहे उत्पाद की हो, सेवा की हो या फिर किसी आइडिया की, बाज़ार एक मंत्र है और बिक्री एक कला है। इस कला में महारत हासिल करना पहले की तुलना में कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गया है। क्योंकि आज के ग्राहक जागरूक हैं और उनके सामने  विकल्पों की भरमार है। अब ‘बायर बी अवेयर’ जैसे वाक्य की जगह ‘सेलर बी अवेयर’ ने ली है। इसलिए ग्राहक को अपने उत्पाद के प्रति विश्वास दिलाना सबसे महत्वपूर्ण पक्ष होता है। यदि ग्राहक को विश्वास हो गया तो वह न केवल स्वयं उस उत्पाद को खरीदेगा बल्कि अपने परिचितों में भी उस उत्पाद की सिफारिश करेगा। सुमि अनामिका साक्षी ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि किसी भी उत्पाद को बेचते समय 90 प्रतिशत दृढ़ निश्चय और 10 प्रतिशत उसे प्रकट करने का तरीका महत्व रखता है। एक अच्छा सेल्स प्रोफेशनल बनने के लिए सकारात्मक नजरिया विकसित करना बेहद जरूरी है। जैसे आर.ओ. मशीन बेचते समय सेल्समैन को यह बात विस्तार से पता होनी चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के लिए आर.ओ. का पानी क्यों जरूरी है ओर उससे क्या लाभ हैं। उसके वैज्ञानिक पक्ष की भी विस्तृत जानकारी सेल्समैन को होनी चाहिए। यह वैज्ञानिक जानकारी भी इस पुस्तक में दी गई है।
              मार्केटिंग के क्षेत्र में नौकरी की ढ़ेरों संभावनाएं हैं, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि युवा सही दिशा में आगे नहीं बढ़ पाते हैं जिससे उन्हें काम मिलने में परेशानी आती है। जीवन में, कैरियर में भी स्थिति किसी प्रोफेशनल सेल्समैन की ही तरह है, जहां किसी उत्पाद की तरह खुद को हर मोर्चे पर सामने रखना पड़ता है, ताकि नियोक्ता एम्मींदावार की योग्यता को भांप सके और उसे अपने विश्वनीय साथी की भांति काम सौंप सके। मार्केटिंग में प्रत्येक उत्पादक के लिए उसका सेल्समैन उस सेनानायक की भांति होता है जिसके द्वारा वह बाज़ार को जीत सकता है। इसके लिए जरूरी है कि सेल्समैन अपनी पर्सनैलिटी, नॉलेज, कॉन्फिडेंस, बिहैवियर, कम्युनिकेशन स्किल, आइडिया जैसे टूल्स को हर स्थिति के लिए तैयार रखे। मार्केटिंग मैनेजमेंट की बेस्टसेलर पुस्तक -‘‘ए साउथ एशियन पर्सपेक्टिव’’ के लेखकद्वय अब्राहम कोशी और फिलिप कोटलर मानते हैं कि एम बी ए की मान्यता बढ़ाने से स्टूडेंट्स को प्रोफेशनल योग्यता के साथ फील्ड वर्क यानी व्यावहारिक ज्ञान भी जरूरी है। बात चाहे सेल्स के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की हो या फिर किसी प्रोडक्ट या सेवाओं को बेच रहे बिजनेसमैन की, कामयाबी के लिए बिक्री के सामान्य नियमों का ध्यान रखना सबके लिए जरूरी है। सही एप्रोच से काम करते हुए ही सेल्समैन ग्राहक का विश्वास जीतकर बार-बार आकर्षित करने में कामयाब हो सकता है। सुमि अनामिका साक्षी की इस पुस्तक में ये सारी बारीकियां विस्तार से समझाई गई हैं।

पुस्तक समीक्षा - डॉ. वर्षा सिंह
           
‘‘आर. ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में सफल सेल्समैन कैसे बनें?’’ पुसतक की सामग्री स्वास्थ्य कर आधार पानी, प्रशिक्षण, आर.ओ. उत्पादक निरुपण कैसे करें, व्यक्तिगत अभ्यास, आत्म प्रोन्नति एवं विज्ञापन सूत्र, स्वास्थ्य परामर्शदाता, संस्थान में सहकार एवं संकेत विस्तार जैसे शीर्षकों में बांटा गया है। अंत में व्यक्तित्व विकास ओर ज्ञान विस्तार के लिए पुस्तकों की सूची भी परिशिष्ट के अंतर्गत दी गई है। पुस्तक का आमुख डॉ. शैलेन्द्र शेखर ओशो शैलेन्द्र ने लिखा है और संपादन किया है डॉ. गोपीरंजन साक्षी ने। लेखिका स्व. सुमि अनामिका साक्षी की डायरी के पन्नों से सामग्री को क्रमबद्ध ढंग से पुस्तक तक लाने का कार्य किया है अमीश साक्षी ने। उल्लेखनीय है कि लेखिका सुमि अनामिका साक्षी अपने जीवनकाल में मार्केटिंग क्षेत्र में कार्यरत रहीं। अतः अनुभवों ओर ज्ञान के मिश्रण से तैयार की गई यह पुस्तक आर.ओ. मार्केटिंग के क्षेत्र में जाने वाले युवाओं के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
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- डॉ. वर्षा सिंह

#दैनिक_आचरण दिनांक 31.01.2019, #समीक्षा #सागर

Sunday, January 27, 2019

Window Shopping on Happy Republic Day 2019

Dr. Varsha Singh

प्रिय मित्रों,
        Window Shopping के मज़े ही कुछ और होते हैं.... एक तो Weakened , दूसरे  Happy Republic Day ! ... और उस पर  Extreme Cold Wave.... तो Window Shopping में शाम कब गुज़र गई पता ही नहीं चला। कभी किसी शाम फ़ालतू समय महसूस होने पर आप भी ये नुस्खा आजमायें।






'निर्मल' दादा का आशीर्वाद

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प्रिय मित्रों,
          आज गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर मैंने एवं बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने सागर नगर के वरिष्ठ कवि दादा निर्मलचंद 'निर्मल' के निवास पर उनसे आशीर्वाद लिया।
तस्वीरों में 'निर्मल' दादा एवं उनके परिवारजनों के साथ हम दोनों बहनें।


Happy Republic Day 2019

Dr. Varsha Singh

          प्रिय मित्रों, 🇮🇳 गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ! 🇮🇳 आज 70 वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में मेरी बहन प्रख्यात लेखिका एवं समाजसेवी डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मोतीनगर, सागर में ध्वजारोहण किया।         
          🇮🇳  राष्ट्रगान के उपरांत विद्यालय प्रांगण में आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह में डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य की शक्ति ने स्वतंत्रता प्राप्ति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साहित्य ही देश व राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत कर सकता है। इस भव्य समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में मुझे यानी आपकी इस मित्र डॉ. वर्षा सिंह को भी काव्यपाठ करने का अवसर मिला।
        🇮🇳 कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि श्री संजीव जड़िया एवं सरस्वती शिशु मंदिर समिति के सहसचिव श्री आशीष द्विवेदी (डायरेक्टर इंक मीडिया), सेवानिवृत्त अध्यापिका सुलोचना मैडम एवं नगर के युवा कर्मठ पत्रकार अतुल तिवारी की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही।  विद्यालय के छात्र-छात्राओं ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अपनी मनमोहक प्रस्तुतियां दे कर वातावरण में उल्लास का इंद्रधनुष बिखेर दिया।
          🇮🇳  इस गरिमामय समारोह के आयोजन के लिए विद्यालय के प्राचार्य राजकुमार ठाकुर एवं उनकी उत्साही टीम को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं 🌺 🙏 🌺

Friday, January 25, 2019

गीत ..... माटी मेरे सागर की - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh


मां के आंचल जैसी प्यारी ,  माटी मेरे सागर की ।।
सारे जग से अद्भुत न्यारी,  माटी मेरे सागर की ।।

🔹भूमि यही वो जहां ‘’गौर’’ ने, दान दिया था शिक्षा का
पाठ पढ़ाया  था हम सबको,  संस्कार की कक्षा का
विद्या की यह है फुलवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी..................

🔹विद्यासागर जैसे  ऋषि-मुनि की पावनता  पाती है
धर्म, ज्ञान की, स्वाभिमान की अनुपम उज्जवल थाती है
श्रद्धा, क्षमा, त्याग की क्यारी,  माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.............

🔹‘वर्णी जी’  की तपो भूमि यह, यही भूमि ‘पद्माकर’ की
‘कालीचरण’ शहीद यशस्वी, महिमा  अद्भुत सागर की
सारा जग इस पर बलिहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी.................

🔹नौरादेही   में संरक्षित   वन जीवों का डेरा है
मैया  हरसिद्धी  का मंदिर, रानगिरी  का फेरा है
आबचंद की गुफा दुलारी,  माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........

🔹राहतगढ़  की छटा अनूठी ,झर-झर झरती जलधारा
गढ़पहरा,  धामौनी बिखरा ,  बुंदेली वैभव सारा
राजघाट, रमना चितहारी, माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी................

🔹एरण पुराधाम विष्णु का , सूर्यदेव हैं रहली में
देव बिहारी जी के हाथों सारा जग है मुरली में
पीली कोठी अजब सवारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी....................

🔹मेरा सागर मुझको प्यारा, यहीं हुए लाखा बंजारा
श्रम से अपने झील बना कर, संचित कर दी जल की धारा
‘वर्षा’-बूंदों की किलकारी , माटी मेरे सागर की ।।
मां के आंचल जैसी प्यारी...........
                    -डॉ. वर्षा सिंह
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माटी मेरे सागर की - डॉ. वर्षा सिंह

प्रगतिशील लेखक संघ की पाक्षिक कवि गोष्ठी - डॉ. वर्षा सिंह


       
Dr. Varsha Singh
प्रगति शब्द का अर्थ है आगे बढ़ना और उन्नति करना। प्रगतिवाद को हम समाज, साहित्य आदि की निरन्तर उन्नति करते रहने का सिद्धांत कह सकते हैं। साहित्य के संदर्भ में यदि कहें तो यह साहित्य का एक आधुनिक सिद्धांत है जिसका लक्ष्य जनवादी विचारों को संपादित कर भौतिक यथार्थवादी ध्येय की संपूर्ति करना है। हिन्दी सहित्य कोश, भाग 1 में प्रगतिवाद के संबंध में लिखा गया है- ''प्रगतिवाद सामाजिक यथार्थवाद के नाम पर चलाया गया वह साहित्यिक आंदोलन है, जिसमें जीवन और यथार्थ के वस्तु सत्य को उत्तर छायावाद काल में प्रश्रय मिला और जिसने सर्वप्रथम यथार्थवाद की ओर समस्त साहितियक चेतना को अग्रसर होने की प्रेरणा दी। प्रगतिवाद का उद्देश्य था साहित्य में उस सामाजिक यथार्थवाद को प्रतिष्ठित करना, जो छायावाद के पतनोन्मुख काल की विसंगतियों को नष्ट करके एक नये साहित्य और नये मानव की स्थापना करे और उस सामाजिक सत्य को, उसके विभिन्न स्तरों को साहित्य में प्रतिपादित होने का अवसर प्रदान करे। वर्ग-संघर्ष की साम्यवादी विचारधारा और उस संदर्भ में नये मानव, नये हीरो की कल्पना इस साहित्य का उद्देश्य था। इसकी मूल प्रेरणा मार्क्सवाद से विकसित हुई थी।







प्रगतिवाद में व्यक्ति और समाज के आगे बढ़ने, उसकी उन्नति पर बल है। जैसे ठहरा हुआ पानी कुछ समय बाद दुर्गंधयुक्त हो जाता है और प्रयोग करने योग्य नहीं रहता, किन्तु नदी का बहता पानी जहाँ-जहाँ से बहता है वहाँ की भौगोलिक सिथति के अनुसार अपनी जगह बनाता हुआ, आस-पास के लोगों को आनंद देता हुआ आगे बढ़ता जाता है। बहते पानी में गंदगी रुकती नहीं अत: उसका पानी प्रयोग में आने योग्य रहता है। ठीक वैसे ही, जो समाज अपने समय की आवश्यकताओं को नहीं समझता और वर्षों पूर्व बनाये गये सिद्धांतों, नियमों, मान्यताओं और विश्वासों में जकड़ा रहता है वह भी कभी आगे नहीं बढ़ता और रुके हुए पानी की भाँति बदबूदार हो जाता है। प्रगतिवाद उन रूढ़ियों, नियमों, मान्यताओं, पद्धतियों का विरोध करता है जो समाज की प्रगति में बाधक हैं, और उन नियमों-मान्यताओं को अपनाने पर बल देता है जो वर्तमान के अनुकूल हैं। दूसरी बात है सामाजिक यथार्थ और जीवन- यथार्थ के वस्तु सत्य की, अभिव्यक्ति की। हम जिस समाज में रहते हैं, उसकी अच्छाइयों और बुराइयों से प्रभावित होते हैं। गुणदोषोें से भरपूर इस समाज में ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता है और अपने व्यक्तित्व, इच्छाओं, आकांक्षाओं के सहारे इस समाज को भी हम बनाते-बिगाड़ते हैं। फिर सामाजिक यथार्थ क्या है? क्या समाज में व्याप्त अच्छाइयाँ, या बुराइयाँ? सामाजिक यथार्थ की बात जब हम करते हैं तो उसके अंतर्गत अच्छाइयाँ और बुराइयाँ दोनों ही आते हैं। साहित्य में यदि केवल अच्छाइयों का ही चित्रण हो तो वह आदर्शवादी साहित्य कहलाता है ओर यदि केवल बुराइयों का ही चित्रण हो, तो नग्न यथार्थवादी । प्रसिद्ध कथाकार प्रेमचंद ने कहा था कि यथार्थ केवल प्रकाश या केवल अंधकार नहीं है, बल्कि अंधकार के पीछे छिपा प्रकाश और प्रकाश के पीछे छिपा अंधकार है। प्रगतिवाद उन स्थितियों को पहचानने पर बल देता है जिनके कारण हमारा समाज अंधकारग्रस्त है और उन स्थितियों को पहचानने पर भी बल देता है जिनके बलबूते पर इस अंधकार को हराया जा सकता है। तीसरी बात प्रगतिवाद का प्रेरक कारण मार्क्सवाद का सिद्धांत हैं। यह सिद्धांत शोषक परिस्थितियों का विरोध करता है और शोषित समाज में चेतना जगाने, उन्हें अपने अधिकारों और समवेत परिस्थितियों के प्रति भरोसा करने पर बल देता है। यह उस सामंतवादी और पूंजीवादी मानसिकता और संस्कृति का विरोध करता है जो शक्ति और धन को कुछ मुट्टीभर लोगों के हाथों में केन्द्रित कर देती है, जिससे वे स्वार्थी और दंभी हो जाते हैं और अपनी शक्ति और धन का दुरुपयोग कर उन लोगों का शोषण करते हैं जिनके परिश्रम के बल पर वे सुख भोगते हैं। प्रगतिवाद भी सामंतवाद और पूँजीवाद का विरोध करता है जो समाज में व्याप्त अंधकार का कारण है और उन गरीबों मजदूरों-किसानों को प्रकाश-पुंज मानता है जिनके बल पर यह अंधकार नष्ट हो सकेगा। प्रगतिवाद की दृष्टि में यही श्रमशील मानव नयामानव और नया हीरो है। चौथी बात, इस उद्देश्य में छायावाद के पतनोन्मुख काल की विपत्तियों को नष्ट कर नये समाज के निर्माण की बात कही है। छायावादी कविता में इतिहास, कल्पना, आदर्श, प्रेम, विरह, प्रकृति की सुंदरता और सुकुमारता पर विशेष बल था। प्रगतिवाद में इतिहास को नकारा नहीं गया, इतिहास अतीत के मोह से मुक्ति की बात की गयी है। इसके लिए व्यक्ति का उन्नयन समाज के सभी वर्गों की समान रूप से उन्नति, रूढ़ियों, अंधविश्वासों से मुक्ति आदि वस्तु सत्य प्रधान हैं इसलिए र्इश्वर, रहस्य, प्रकृति की सुंदरता, वैयक्तिक प्रेम, विरह के लिए वहाँ कोर्इ स्थान नहीं।




हिन्दी कविता में प्रगतिवाद का आरंभ 1936 के आसपास माना जाता है। परंतु कविता के प्रगतिवादी तत्त्वों का समावेश कोई आकसिमक घटना नहीं थी। इसके अंकुर आधुनिक काल के आरंभ में ही भारतेंदु युग से फूटने लगे थे। ब्रिटिश राज्य की जनविरोधी नीतियों, उनके अत्याचारों के परिणामस्वरूप लोगों का ध्यान देश की दुर्दशा, और उसके मूल कारणों की ओर आकृष्ट हुआ। नवजागरण के प्रभाव से भी इस दुर्दशा के मूल कारणों की पड़ताल की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी। अशिक्षा, अंधविश्वासों, रूढि़यों, संप्रदायवाद को प्रगति विरोधी माना जाने लगा। विदेशी दासता से मुक्ति पाने की छटपटाहट जोर पकड़ने लगी।

भारतेंदु और द्विवेदी युग की रचनाओं में जाति और धर्म के बंधनों के प्रति प्रश्नचिहन लगने लगे थे क्योंकि इन्हीं के कारण देश अनेक वर्गों में बंट गया था, कमजोर हो गया था, और समाज का एक बड़ा वर्ग उपेक्षा और अत्याचार सहने को विवश था। हिन्दी में छायावाद युग में साहित्य में प्रेम-विरह की निजी अनुभूतियों, स्वप्नों, रहस्यों को प्रधानता दी गयी। लगभग इसी समय में यूरोप में रह रहे भारतीय साहित्यकारों ने लंदन में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की। उन्होंने अपने परिपत्रा में रुढ़िवादी, जड़तावादी, परंपरावादी विचारों से समाज को मुक्त कराने पर बल दिया। उन्होंने देश की सामाजिक-आर्थिक अवनति के मूल कारणों को पहचानने पर बल दिया और कहा कि साहित्यकारों को कल्पना-लोक से बाहर निकल कर यथार्थ की भूमि पर खड़े होना होगा। इस संघ पर मार्क्सवाद का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है, जो वंचितों शोषितों और किसान-मजदूरों का पक्षधर था। भारत में सन् 1936 में लखनऊ में इस संघ की बैठक हुर्इ जिसकी अध्यक्षता प्रेमचंद ने की थी। इस नवीन चेतना और प्रगतिशील लेखक-संघ की इस बैठक का प्रभाव हिंदी लेखकों-कवियों पर व्यापक रूप से हुआ। छायावाद के प्रमुख स्तंभ माने जाने वाले सुमित्रानंद पंत और सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की रचनाओं में यह परिवर्तन स्पष्ट देखा जा सकता हैं। सुमित्रानंदन पंत जी सन् 1938 में कालाकांकर से प्रकाशित ' रूपाभ ' नामक पत्र के संस्थापक भी रहे । प्रकृति के सुकुमार कवि पंत 'रूपाभ' के संपादकीय में लिखते हैं- ''इस युग में जीवन की वास्तविकता ने जैसा उग्र आकार धारण कर लिया है उससे प्राचीन विश्वासों में प्रतिषिठत हमारे भाव और कल्पना के मूल हिल गये हैं। अतएवं इस युग की कविता स्वप्नों में नहीं पल सकती, उसकी जड़ों को पोषण सामग्री ग्रहण करने के लिए कठोर आश्रय लेना पड़ रहा है। 'जुही की कली और संèया सुंदरी के रचयिता निराला जी 'विधवा, 'वह तोड़ती पत्थर, 'कुकुरमुत्ता और 'गुलाब जैसी कविताएँ लिखने लगते हैं। सन 1936 से आंरभ हुआ प्रगतिवाद का यह दौर सन् 1950 के लगभग तक माना जाता है। उसके बाद प्रगतिवाद आंदोलन के रूप में भले ही न रहा हो, किंतु उसके द्वारा स्थापित मूल्य परवर्ती कविता में भी किसी न किसी रूप में विधमान हैं। मुक्तिबोध, नागार्जुन, धूमिल, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल आदि अनेक कवियों की रचनाओं में यह प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।





सागर में प्रगतिशील लेखक संघ अनेक वर्षों से सक्रिय है। विगत वर्ष इसकी मकरोनिया इकाई की भी शुरूआत की गई है। जो पाक्षिक गोष्ठियों के जरिये लेखकों, कवियों को प्रगतिशील विचारधारा से जुड़ने के लिए प्लेटफार्म देने का कार्य गम्भीरतापूर्वक कर रही है।




       दिनांक 20.01.2019, रविवार की शीत भरी दोपहरी बड़ी सार्थक बीती। शिक्षा के मंदिर यानी विद्यालय प्रांगण में खुले आसमान के नीचे कुनकुनी धूप में काव्य गोष्ठी का हम सबने भरपूर आनंद उठाया ... जी हां, प्रगतिशील लेखक संघ, सागर की मकरोनिया शाखा द्वारा आयोजित इस काव्य गोष्ठी में ख़ूब कविताएं पढ़ी गयीं, ग़ज़लें गायी गयीं और खुल कर विचार विमर्श किये गये।

Thursday, January 24, 2019

सागर : साहित्य एवं चिंतन 41.... इतिहासबद्धता के साहित्यकार : डॉ. श्याम मनोहर पचौरी - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार डॉ. श्याम मनोहर पचौरी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर : साहित्य एवं चिंतन

इतिहासबद्धता के साहित्यकार : डॉ. श्याम मनोहर पचौरी
               - डॉ. वर्षा सिंह
                                     
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परिचय :- डॉ. श्याम मनोहर पचौरी
जन्म   :- 06 मार्च 1956
जन्म स्थान :- गढ़ाकोटा, सागर (म.प्र.)
शिक्षा :- एम.ए., पीएच. डी. (इतिहास)
लेखन विधा :- गद्य
प्रकाशन  :- एक पुस्तक तथा विभिन्न शोध पत्रिकाओं में आलेखों का प्रकाशन।
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                 सागर की यह विशेषता है कि यहां के साहित्यकारों के लेखन में पर्याप्त विविधता है। कोई काव्य की सर्जना करता है तो कोई कथा साहित्य की। कोई छंदबद्ध कविता लिखता है तो कोई ललित निबंध। कुछ रचनाकार ऐसे हैं जिन्होंने इतिहास को आधार के रूप में ग्रहण कर के पुस्तकलेखन का कार्य किया है। ऐसे कृतिकारों में एक नाम है डॉ. श्याम मनोहर पचौरी का।
            सागर के गढ़ाकोटा में 6 मार्च 1956 को जन्में डॉ. श्याम मनोहर पचौरी सागर नगर के निवासी हैं तथा वर्तमान में गढ़ाकोटा के शासकीय महाविद्यालय में प्राचार्य के पद पर पदस्थ हैं। धार्मिक प्रवृति एवं सरल स्वभाव के डॉ. पचौरी का साहित्यकर्म स्वांतःसुखाय है। जिसके संबंध में वे कहते हैं कि ‘‘साहित्य मुझे आनन्द प्रदान करता है। प्रशासनिक व्यस्तताओं के कारण मैं अपने लेखक के प्रति उतना समर्पित नहीं हो पाता हूं जितनी कि मुझे अभिलाषा है किन्तु मानता हूं कि साहित्यिक अभिव्यक्ति से बढ़ कर और कोई माध्यम नहीं होता है जो मन को शांति प्रदान कर सके।’’ गढ़ाकोटा महाविद्यालय में सन् 2018 के 23-24 अप्रैल को ‘रामकथा’ पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय शोधसंगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. पचौरी ने कहा था कि -‘‘श्रीराम जैसे आदर्श चरित्रों पर लिखा गया साहित्य सम्पूर्ण समाज को सही दिशा देने का कार्य करता है। इस संदर्भ में रामायण या रामचरित मानस की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। क्योंकि ऐसे ग्रंथ जीवन जीने का उचित ढंग सिखाते हैं। ’’
डॉ. श्याम मनोहर पचौरी को धार्मिक संस्कार अपनी माताश्री प्रेमाबाई पचौरी से मिले जो एक  गृहणी का दायित्व निभाने के साथ ही घर में धार्मिक वातावरण बनाए रखने का विशेष ध्यान रखती रहीं। डॉ. पचौरी को अपने बाल्यकाल से जहां एक ओर धार्मिक रुझान अपनी माताश्री से मिला वहीं दूसरी ओर राष्ट्रभक्ति की प्रेरणा अपने पिताश्री से मिली। वस्तुतः डॉ. पचौरी के पिताश्री शिवदयाल पचौरी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने गांधीजी के अहिंसावादी मूल्यों को न केवल अपनाया वरन् उन्हें जिया भी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। वे सन् 1930 के दांडी आंदोलन तथा 1942 भारत छोड़ो आंदोलन के समर्थन में बुंदेलखंड में अलख जगाते रहे। अंग्रेज सरकार के विरोध करने पर उन्हें जेल यात्राएं भी करनी पड़ीं। देश के स्वतंत्र हो जाने के बाद भी उन्होंने छुआछूत और नशा उन्मूलन का अपना अभियान जारी रखा। वे रहली ब्लॉक के कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी रहे। अपने पिता से विरासत में मिली राष्ट्रसेवा की भावनाएं डॉ. पचौरी को सदैव प्रेरणा देती रहती हैं।
                डॉ. पचौरी ने उच्चशिक्षा डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर से प्राप्त की। इतिहास विषय में एम.एम. करने के उपरान्त उन्होंने डॉ. बैजनाथ शर्मा के निर्देशन में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस कोलकाता, मदन मोहन मालवीय फाउंडेशन बनारस, बीएचयू तथा मध्य प्रदेश इतिहास परिषद भोपाल के आजीवन सदस्य हैं। इसके साथ ही उन्हें डॉ हरिसिंह गौर  विश्वविद्यालय सागर की शोध पत्रिका ‘मध्य भारती’ की आजीवन सदस्यता प्राप्त है। वैसे वे मध्य प्रदेश अध्यापक संघ भोपाल के भी सदस्य हैं। सन् 1983 में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति के उपरांत 13 वर्षों का प्रशासनिक अनुभव प्रभारी प्राचार्य के रूप में प्राप्त है।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh
       
            ‘‘रहली तहसील का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य :प्राचीन से अर्वाचीन’’ नामक पुस्तक के लेखक डॉ श्याम मनोहर पचौरी के अब तक राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में लगभग 25 शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। लगभग 10 पुस्तकों में आपके लिखे हुए अध्याय संकलित हैं। प्रशासनिक दायित्वों के अंतर्गत पाठ्यक्रम निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहते हैं। केंद्रीय पाठ्यक्रम निर्माण समिति उच्च शिक्षा विभाग भोपाल, महाराजा छत्रसाल विश्वविद्यालय छतरपुर के पाठ्यक्रम निर्माण समिति एवं परीक्षा समिति के सदस्य, शासकीय स्वशासी कन्या उत्कृष्टता महाविद्यालय सागर के पाठ्यक्रम निर्माण समिति में सदस्य के रूप में उन्हेंने विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्द्धक सामग्री का चयन करने में अपना योगदान दिया है।
           डॉ. श्याम मनोहर पचौरी के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में कई उल्लेखनीय  पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है। जैसे- ‘‘ग्रामीण विकास समस्याएं चुनौतियां एवं समाधान’’ (सं. एसके सिन्हा), ‘‘व्यक्तित्व भाषा मीडिया : एक अनुशीलन’’ (सं. डॉ. घनश्याम भारती), ‘‘लोकजीवन में राम कथा’’ (सं. डॉ. घनश्याम भारती), ‘‘वैश्विक जीवन मूल्य और राम कथा’’ (सं. डॉ. घनश्याम भारती),‘‘रामकथा का वैश्विक परिदृश्य’’ (सं. डॉ. घनश्याम भारती) आदि। डॉ. पचौरी लघु शोध योजना के अंतर्गत ‘‘मराठा कालीन सांस्कृतिक विरासत : एक सर्वेक्षण’’ जैसे विषय पर सर्वेक्षण कार्य कर चुके हैं।
              डॉ. पचौरी को कई सम्मानों से विभूषित किया जा चुका है। जिनमें प्रमुख हैं- इंडियन इंटरनेशनल फ्रेंडशिप सोसायटी नई दिल्ली द्वारा ‘राष्ट्रीय गौरव सम्मान’ , रायबरेली उत्तर प्रदेश द्वारा ‘राष्ट्रीय गौरव सम्मान’, महामाया प्रकाशन द्वारा ‘अहिंसा सम्मान’, राम कथा के व्यापक प्रसार प्रचार हेतु अमेरिका की विदुषी डॉक्टर नीलम जैन द्वारा भी उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।
                अकादमी स्तर पर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय गढ़ाकोटा के प्राचार्य के रूप में डॉ. पचौरी ने कई राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों के संरक्षक एवं आयोजक का दायित्व निभाया है। जिनमें ग्रामीण विकास पर आधारित राष्ट्रीय संगोष्ठी उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय शोध संगोष्ठी जिसका विषय था- ‘‘वैश्विक जीवन मूल्य ओर राम कथा’’। सन् 2018 में 23-24 अप्रैल को आयोजित की गई इस राष्ट्रीय कार्यशाला में भी संरक्षक का दायित्व निभाया था। डॉ. पचौरी ‘‘व्यक्तित्व, भाषा और मीडिया’’ पर राष्ट्रीय कार्यशाला करवा चुके हैं। उन्हें स्वयं राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय शोधसंगोष्ठियों में व्याख्यान देने का भी गहन अनुभव है। वह अब तक देश के अनेक शिक्षाकेन्द्रों में व्याख्यान दे चुके हैं। उनके लिखे शोध पत्र संगोष्ठियोंं में बड़े चाव से सुने जाते हैं।
                यूं तो डॉ. श्याम मनोहर पचौरी साहित्यिक अभिरुचि के स्वांतःसुखाय साहित्यकार हैं, फिर भी वे  इतिहास और साहित्य का सुंदर समन्वय करते हुए रचनाएं लिखते हैं। रहली तहसील के परिप्रेक्ष्य में प्रकाशित डॉ. पचौरी की पुस्तक ‘‘रहली तहसील का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य :प्राचीन से अर्वाचीन’’ सागर जिले तथा बुंदेलखंड के इतिहास को जानने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इस पुस्तक में डॉ. पचौरी ने रहली के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को बखूबी प्रस्तुत किया है। पुस्तक के प्रमुख अध्यायों में से एक है रहली तहसील का संक्षिप्त विवरण। जिसमें उन्होंने यह बताया है कि रहली का नाम ‘‘रहली’’ क्यों पड़ा। रहली के नामकरण के संबंध में एकाधिक मत प्रचलित हैं। इस संबंध में उन्होंने अपनी इस पुस्तक में एक बहुत ही रोचक कथा दी है। कथा के अनुसार राहुल नामक ऋषि ने इस भू-भाग पर वर्षो तपस्या की, जिसके कारण इसका नाम रहली पड़ा। किन्तु वे इस कथा को मात्र कथा ही मानते हैं क्यों कि इस संबंध में कोई इोस प्रमाण प्राप्त नहीं होते हैं। इसी क्रम में वे एक और प्रचलित मत प्रस्तुत करते हैं जिसके अनुसार चंदेल नरेश राहिल के नाम पर इस नगर का नाम रहली रखा गया। फिर वे एक इतिहासवेत्ता होने के नाते इस बात को सामने रखते हैं कि राहिल के समय सागर जिला चंदेल के साम्राज्य के अधीन था इसलिए इस तथ्य पर विश्वास किया जा सकता है। वैसे वे एक किवदंती का भी उललेख करते हैं कि रहली का पूर्व नाम ‘‘रहस्थली’’ था। वे तर्क देते हैं कि गुणाकर जी ने भी ‘‘रहस्थली’’ शब्द का प्रयोग किया है और यह आरम्भ से धार्मिक रहस्यों से परिपूर्ण रहस्य स्थल रही, इसीलिए इसका नाम ‘‘रहस्थली’’ पड़ा और आगे चल कर इसका संक्षिप्त रूप में ‘‘रहली’’ बन गया। इसी पुस्तक में डॉ. पचौरी ने रहली तहसील की भौगोलिक स्थिति ऐतिहासिक रूपरेखा सामाजिक संरचना शिक्षा स्वास्थ्य खेल जगत आदि के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। सांस्कृतिक प्रभाव के अंतर्गत उन्होंने रहली क्षेत्र में किए जाने वाले नृत्यों की जानकारी दी है। जैसे- राई नृत्य, बरेदी नृत्य, जवारा नृत्य, बधाई नृत्य, मोनी नृत्य, ढिमरयाई नृत्य, आदि। रहली की साहित्यिक दृष्टि की व्याख्या करते हुए डॉ. पचौरी ने तहसील के महत्वपूर्ण साहित्यकारों की जानकारी दी है। जिसमें प्रमुख हैं- कवि कारे, पंडित सुखराम चौबे, गुणाकर कवि, पंडित पुरुषोत्तम लाल दुबे, डॉ. संतोष कुमार तिवारी, डॉ श्याम मनोहर सिरोठिया, ,जानकी प्रसाद मिश्र, सुखदेव प्रसाद तिवारी, पंडित लक्ष्मी प्रसाद तिवारी, हरीनारायण तिवारी तथा संजय टोनी आदि। रहली के सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में पचौरी ने उन स्थलों का विवरण दिया है जो धार्मिक एवं पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। जैसे- सूर्य मंदिर, अतिशय क्षेत्र पटना गंज, रानगिर का हरसिद्धि मंदिर, पंढरीनाथ मंदिर, टिकीटोरिया मंदिर, रामेश्वर मंदिर, जगदीश मंदिर, गणेश मंदिर, झाड़ी हनुमान मंदिर, बाबा बादल, ऐतिहासिक किला, छिरारी के मराठा कालीन तलाब, देवलिया मंदिर तथा कचहरी (सिविल कोर्ट) स्थित हनुमान मंदिर आदि। उन्होंने अपनी इस पुस्तक में बुंदेलखंड के क्रांतिवीर सदाशिव राव मलकापुरकर सहित स्वतंत्रता सेनानियों की सूची दी है। साथ ही रहली तहसील में पर्यटन विकास की संभावनाएं नौरादेही अभ्यारण मेला रहस्य आदि के संबंध में भी महत्वपूर्ण जानकारियां दी है। इतनी विविध जानकारी के कारण यह पुस्तक मात्र ऐतिहासिक न हो कर एक सारगर्भित साहित्यककृति बन गई है। डॉ. पचौरी स्वयं भी यह मानते हैं कि इतिहास व्यक्ति को संस्कृति से जोड़ता है और संस्कृति साहित्य का सृजन करने की प्रेरणा प्रदान करती है।
               डॉ. श्याम मनोहर पचौरी जिस तरह सागर के साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश में ज्ञानसंपादा का समावेश कर रहे हैं, उससे आशान्वित हुआ जा सकता है कि भविष्य में इंतिहास आधारित साहित्यिक कृतियां भी सृजित करेंगे, जिससे सागर का साहित्यजगत् और भी समृद्ध होगा।
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( दैनिक, आचरण  दि. 21.01.2019)
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