Tuesday, September 3, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 62... साहित्य के मौन साधक डाॅ. अरविंद गोस्वामी - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार डॉ. अरविंद गोस्वामी पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

         साहित्य के मौन साधक डाॅ. अरविंद गोस्वामी
                     - डाॅ. वर्षा सिंह
                 
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परिचय - डॉ अरविंद गोस्वामी
जन्म -  11 मार्च 1953
जन्म स्थल - खुर्जा, बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश
माता - स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा देवी गोस्वामी
पिता - गोस्वामी मुकुंदाचार्य
शिक्षा - एमबीबीएस डीसीएच शिशु रोग विशेषज्ञ
प्रकाशन - विभिन्न समाचारपत्रों में
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         सागर नगर में साहित्य सेवा की भावना विभिन्न क्षेत्रों के व्यक्तियों में समान रूप से देखी जा सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि अध्यापन से जुड़ा व्यक्ति ही साहित्य के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखता हो। यहां चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े कई मनीषी ऐसे हैं जो अपना चिकित्सकीय कार्य करते हुए समाज की सेवा के साथ ही साहित्य की सेवा भी कर रहे हैं। उन्हीं में से एक नाम है डाॅ अरविंद गोस्वामी का। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के खुर्जा में जन्मे। इसके बाद बाल्यावस्था से ही वे सागर में ही निवासरत हैं। उन्होंने प्राथमिक शाला मोरारजी एवं चिंतामनराव मॉडल बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सागर से स्कूली शिक्षा प्राप्त किया। तदोपरांत उन्होंने हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर में अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने मेडिकल कॉलेज भोपाल एवं जबलपुर से एम.बी.बी.एस तथा शिशु रोग विशेषज्ञ की उपाधि प्राप्त की।
             शासकीय चिकित्सालयों में निष्ठावान डॉक्टर के रूप में अपनी सेवाएं विभिन्न स्थानों में देने के पश्चात् उनका शासकीय सेवा का अंतिम पड़ाव जिला चिकित्सालय सागर रहा, यहीं से मार्च 2018 को शिशु रोग विशेषज्ञ के पद से सेवानिवृत्त हुए । डॉ. अरविंद गोस्वामी ने अकादमिक अध्ययन के साथ हिंदी, अंग्रेजी एवं संस्कृत साहित्य का अध्ययन बचपन से ही किया। उनके मन में अगली कतार एवं शीर्ष पर होने की जिद, भीड़ से अलग दिखने की ललक रही। वे एक सफल शिशु रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत रहे। खेलों में रुचि रखने वाले डॉ. गोस्वामी की शतरंज में गहन अभिरुचि है। क्रीडा क्षेत्र में शतरंज के अलावा टेबल टेनिस, हॉकी, फुटबॉल में भी अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज कराई है ।
डॉ. अरविंद गोस्वामी

         साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में विभिन्न समाचार पत्रों में स्वास्थ्य संबंधी एवं सामाजिक सरोकार वाले लेखों का प्रकाशन हुआ है तथा आकाशवाणी से वार्ताएं प्रसारित होती रही है। साहित्यिक गोष्ठियों में भी उनकी महत्वपूर्ण उपस्थिति रहती है।
             डॉ. गोस्वामी  का मानना है कि ‘‘साहित्य क्षेत्र में व्यक्ति विशेष की उम्र का आकलन उसके पठन-पाठन एवं लेखन से ही तय करना चाहिए। मात्र वयोवृद्ध होना ही सम्मान का पात्र नहीं होना चाहिए।’’ वे कहते हैं कि ‘‘जिंदगी के हर पल को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है । मेरी काव्य सर्जना में यथार्थ का कटु सत्य अहम् होता है यथा- हर वर्ष आता है बसंत, अब तो बस अंत आया है या कितना अजीब होता है कि लोग स्वस्थ रहने के लिए योगासन लगाते हैं मनुष्य होते हुए भी पशु पक्षियों के मुद्राएं अपनाते हैं आदमी ने आदमी के सदृश्य नहीं सीखा है चलना धरा पर ।’’
            डाॅ. अरविंद गोस्वामी की कविताओं में कथ्य की कोमलता और अभिव्यक्ति की आत्मीयता है। वे अपनी भावाभिव्यक्ति को लयात्मक ढंग से शब्दों में उतारते हैं। मसलन, सरल शब्दों में सहज अभिव्यक्ति उनके काव्य की विशेषता है। उदाहरण के लिए ये पंक्तियों देखें-
मुझको खफा न कीजिए पछताइएगा आप ।
मैं वो नहीं कि जिस को मना पाइएगा आप ।
यह दिल है इसको तोड़कर पछतायेगा आप ।
आईना देखने को तरस जाइएगा आप ।
हैं आप अभी गुम किसी रंगीं खयाल में
आऊंगा याद होश में जब आइएगा आप ।
पहले की तरह मुझको पड़ा रहने दीजिए
उठ जाऊंगा तो साफ नजर आइएगा आप।

          श्रृंगार रस जीवन में अहम् स्थान रखता है, यह श्रृंगारिक भावना चाहे इंसान के प्रति हो अथवा ईश्वर के प्रति। श्रृंगार में संयोग भी होता है और वियोग भी। कभी-कभी बेरुखी की स्थिति भी आ जाती है जिसे अपनी इन पंक्तियों में डाॅ. गोस्वामी ने बड़ी सुंदरता से व्यक्त किया है-
मिलते हैं आप मुझसे मगर बेरुखी के साथ ।
यह हादसा है खूब मेरी जिंदगी के साथ।
गम आपके दिए हुए ताजा हैं इसलिए
हमने गले लगा लिया उनको खुशी के साथ ।
नजरें चुरा के मिलते हो क्यों मुझसे इस तरह
क्या दिल लगा लिया है किसी अजनबी के साथ ।
दी हमको काटने को उल्फत की ये सजा
मिलते भी हो अगर तो बड़ी बेरुखी के साथ।
Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

         ऐसा नहीं है कि डाॅ. गोस्वामी के काव्य में मात्र श्रृंगार रस ही हो, उनकी अनेक रचनाओं में दर्शन की भावना भी प्रबल रूप से दिखाई देती है। एक उदाहरण देखें -
मेरे जीवन की पुस्तक का इक अध्याय बाकी है
अभी तक  हाशिए पर था  अध्यवसाय बाकी है
यहां सब लोग देते हैं दुआएं स्वस्थ जीवन की
मगर मैं जानता हूं कि प्रकृति का न्याय बाकी है

           डाॅ. गोस्वामी के मित्र कवि कपिल बैसाखिया कहते हैं कि -‘‘डाॅ. गोस्वामी जितने अच्छे कवि हैं उतने ही अच्छे इंसान भी। अपने मित्रों के बीच लोकप्रिय होने के साथ ही सदा सभी के सहयोगी रहते हैं।’’ जीवन को उद्देश्य एवं आकार देने वाले व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता का भाव होना, व्यक्ति के भीतर उपस्थित सदाशयता का परिचायक होता है। डाॅ. अरविंद गोस्वामी ने भी अपने मुक्तक में अपने माता-पिता, अपने गुरुवृंद एवं मित्रों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है-
प्रथम आभार उनका है जो मुझको जग में लाए हैं
तत्पश्चात गुरुवर है जो पथ मुझको दिखलाए हैं
मेरे मित्रों की तो कुछ बात है अद्भुत और अव्यक्त
बन कर लहू के कण मेरी रग-रग में समाए हैं

          डॉक्टर गोस्वामी ठीक सफर चिकित्सक, शिशु रोग विशेषज्ञ होने के साथ ही कवि भी है और वे अपनी इस सफल जीवन यात्रा का रहस्य अपनी स्वयं के जीवनानुभव के आधार पर बताते हुए इन पंक्तियों में कहते हैं कि -
 निष्कर्ष अनुभव का बतला रहा हूं मैं
मिलती लगन से जीत जतला रहा हूं मैं
महत्ता मेहनत की समझी जो मैंने अपने बचपन से
इसलिए गीत सफलता का अब तक गा रहा हूं मैं

        अपनी परिवार के प्रति कवि के मन में अगाध स्नेह और अपनत्व की भावना है। वे अपनी जीवन संगिनी और पुत्र-पुत्री तथा पुत्र वधू के प्रति इन पंक्तियों में अपने हृदय के उद्गार व्यक्त करते हैं -
मेरी परिवार का आधार है मेरी जीवन संगिनी
हर खुशियों का भंडार है मेरी जीवन संगिनी
पूनम की ज्योत्सना मानिंद छाई है जो जीवन में
हमारे गौरव का विस्तार है मेरी जीवन संगिनी
बहू अंकिता बिल्कुल बिटिया समान है
बेटा निमेष मेरा सारा जहान है
नजर न लग जाए इनको यही ईश्वर से बिनती है
नेहा जो बिटिया है अपने कुल की शान है

         डॉ. गोस्वामी जीवन के यथार्थ को अपनी कविता में जिस गहराई से प्रस्तुत करते हैं, वे अपनी कोमल मनोभावनाओं को भी उतनी ही गहराई से प्रकट करने में सक्षम है। उनकी यह कविता देखें-
मुद्दत हुई जैसे किसी को देखे हुए
एक तपते से रेगिस्तान के मानिंद
लंबी सी उदासी का आलम
न जाने क्यों दिल तड़पता है
एक अनजान के लिए
समय उड़ता है पंख लगा कर/पर स्मृतियां
लगता है जैसे किसी जोंक की तरह
चिपट गई है मेरे जेहन से में

       अपनी अतुकांत कविताओं में भी डाॅ. गोस्वामी उतने ही सहज नज़र आते हैं जितनी कि अपनी तुकांत रचनाओं में। उनकी इस प्रकार की कविताओं में एक अलग गंभीरता की अनुभूति होती है। जैसे यह कविता-
तुम्हारा खत मिला
धारणा ना टूटी लंबे अंतराल बाद
कि निर्जीव शब्द भी बोलते हैं
विगत से जुड़ी ग्रंथियां खोलते हैं
किंचित शब्दों में उभरता व्यतीत आह्लाद
और लहराता तुम्हारा प्यार
सच उमड़ पड़ता है/शब्दों से जुड़ी तुम
अतीव तृप्ति दे जाती हो
एक बात कहूं तुम खत न लिखा करो
क्योंकि यह सिखा देगा
तुम्हारे बिना रहना और सहना
अनगिनत त्रासों को।

      डाॅ. अरविंद गोस्वामी मंच और प्रकाशन की ललक से दूर रहते हुए एक मौन साधक की भांति सतत साहित्य साधना से आज भी सागर के साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।
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( दैनिक, आचरण  दि. 29.08.2019)
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Monday, September 2, 2019

सागर: साहित्य एवं चिंतन 61... साहित्यकार रघु ठाकुर: साहित्य सृजन जिनके लिए है संवेदनाओं से साक्षात्कार - डाॅ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

       स्थानीय दैनिक समाचार पत्र "आचरण" में प्रकाशित मेरा कॉलम "सागर साहित्य एवं चिंतन " । जिसमें इस बार मैंने लिखा है मेरे शहर सागर के साहित्यकार रघु ठाकुर पर आलेख। पढ़िए और जानिए मेरे शहर के साहित्यिक परिवेश को ....

सागर: साहित्य एवं चिंतन

साहित्यकार रघु ठाकुर: साहित्य सृजन जिनके लिए है संवेदनाओं से साक्षात्कार
                         - डाॅ. वर्षा सिंह
                                     
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परिचय:- रघु ठाकुर
जन्म:-  10 जून 1946
जन्म स्थान:- सागर
माता-पिता:- स्व श्रीमती तुलसी बाई एवं स्व. भवानी सिंह
शिक्षा:- स्नातकोत्तर (राजनीति विज्ञान), विधि स्नातक
लेखन विधा:- गद्य एवं पद्य
प्रकाशन:- विभिन्न विधाओं में नौ पुस्तकें प्रकाशित
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             सागर नगर में ही नहीं वरन् देश में गांधीवादी-समाजवादी चिंतक के रूप में ख्याति प्राप्त समाजसेवी एवं राजनीतिज्ञ रघु ठाकुर एक अच्छे साहित्यकार भी हैं। जनहित के हर मोर्चे पर खड़े दिखाई देने वाले रघु ठाकुर ने साहित्य सृजन का मार्ग क्यों चुना इस संबंध में वे स्वयं कहते हैं कि -‘‘साहित्य सृजन मेरे लिये अपनी सम्वेदनाओं से साक्षात्कार है। इसके माध्यम से मैं खुद को मांजता हूं तथा पाठकों के माध्यम से आमजन से संवाद करने का प्रयास करता हूं। मुझे साहित्य शौक नहीं बल्कि परिवर्तन के लिए काम का ही एक हिस्सा है तथा बौद्धिक जगत से जुड़कर आत्मचिंतन व अपनी कमियों को दूर करने का माध्यम है। साहित्य स्वतः से सवाल करने का भी मेरा माध्यम है जो आमतौर पर दूसरे मित्र या नहीं करते या नहीं कर पाते। मानवीय संवेदनाओं व पीड़ा को व्यापकता देना भी एक उद्देश्य है।’’
            10 जून 1946 को माता श्रीमती तुलसी बाई एवं पिता भवानी सिंह के पुत्र के रूप में सागर में जन्में रघु ठाकुर बाल्यावस्था से ही चिंतनशील रहे। पीड़ित मानवता के प्रति संवेदनाएं उन्हें समाजसेवा के लिए प्रेरित करती रहीं। आरम्भिक शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत शैक्षिक सीढ़ियां चढ़ते हुए उच्चशिक्षा की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद विधि में स्नातक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने महात्मा गांधी के राजनीतिक एवं दार्शनिक विचारों का गहन अध्ययन किया। उनके मन पर महात्मा गांधी की समाजवादी विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने राममनोहर लोहिया के विचारों को अपने मनोनुकूल पाया और उसे अपने जीवन में आत्मसात कर लिया। भारत में समाजवाद को ले कर हमेशा एक अस्पष्टता सी रही है। रघु ठाकुर इस अस्पष्टता को दूर कर के देश में एक समतामूलक समाज की संरचना करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। अपने अध्ययन काल से आज तक वे दलित, दमित एवं वंचितों के पक्ष में आवाज़ उठाते रहे हैं।
रघु ठाकुर ने डाॅ. लोहिया द्वारा प्रकाशित ‘जन’ तथा ‘मैनकाइंड’’ में लेखनकार्य किया। उन्होंने जार्ज फर्नान्डीज़ द्वारा प्रकाशित ‘प्रतिपक्ष’ तथा ‘दी अदर साईड’ में संपादन कार्य भी किया। वे सुल्तानपुर , उत्तरप्रदेश से प्रकाशित ‘‘लोकतांत्रिक समाजवाद’’ मासिक के संस्थापक सदस्य रहे तथा भोपाल, मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाले ‘‘दुखियावाणी’’ का संपादनकार्य सम्हाल रहे हैं। वैसे वर्तमान में वे दक्षेस महासंघ के अध्यक्ष एवं लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

Sagar Sahitya Avam Chintan - Dr. Varsha Singh # Sahitya Varsha

                  साहित्य के क्षेत्र में समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर का महत्वपूर्ण योगदान है। उनकी अब तक लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये पुस्तकें हैं- ‘‘रोजगार का अधिकार एवं गांधीवादी अर्थ व्यवस्थ‘‘, ‘‘आर्थिक उदारीकरण और भारत‘‘, ‘‘दक्षेस महासंघ एक परिकल्पना, विज्ञान और समाजवाद‘‘, ‘‘आरक्षण‘‘, ‘‘विकल्प की खोज‘‘, ’’विचारार्थ’’, ‘‘विमर्श’’, ’’मैं अभिमन्यु हूं’’, ’’मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’ तथा ’’स्याह उजाले’’।
              इन पुस्तकों में ‘‘मैं अभिमन्यु हूं’’, ‘‘मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’ तथा ‘‘स्याह उजाले’’ काव्य संग्रह हैं।
              स्पष्टवादी अभिव्यक्ति के लिए ख्यातिनाम रघु ठाकुर अपने साहित्य सृजन के साथ ही साहित्य जगत की अंतर्कथा पर कटाक्ष करने से भी नहीं चुके हैं। अपने काव्य संग्रह ‘‘मैं अभिमन्यु हूं’’ के आत्मकथन में ‘‘अपनमुखी-जो कहना भी जरूरी है’’ शीर्षक से लिखते हुए कहते हैं कि- ‘‘मेरी कविताएं लय या तुक में बंधी हुई नहीं हैं, बस ये तो कुछ अचानक मन में उपजे विचार हैं। कभी -कभी इनमें कुछ स्पष्टबयानी भी है या एक प्रकार की बेबाक गवाही भी। मैं जानता हूं कि ये कविताएं न तो कविसम्मेलनों के मंचों के लिए उपयुक्त हैं, क्योंकि इनमें न लय है न तरन्नुम, न झूठ है न नकलीपन, न हास्य है न विनोद। और ये कविताएं साहित्यकारों की बौद्धिक संगोष्ठियों की वाह-वाही की पात्र भी नहीं होंगीं क्योंकि मेरा कोई वास्ता देश की लेखक-साहित्यिक गिरोहबंदी से नहीं है, बल्कि मुझे ऐसा लगता है कि अपवाद छोड़ दें तो आमतौर पर देश व दुनिया में साहित्य के पुरस्कार वर्गीय, खेमाबंदी की गिरोहनिष्ठा के पुरस्कार हैं। ’’ इसी संग्रह की प्रथम कविता ‘‘21वीं सदी के लोहियावादियो’’ में कवि रघु ठाकुर की स्पष्टबयानी को देखा जा सकता है-
21वीं सदी के लोहियावादियों !
तुम्हारा लोहियावाद अब कुछ आधुनिक सा
हो गया है।
अपने अंतर्मन से पूछो
शायद लोहिया तुम्हें पुरातन सा हो गया है।
कहते थे लोहिया-
समता और सम्पन्नता है समाजवाद
पर अब नया जमाना है
अब तो सम्पन्नता ही है समाजवाद।

साहित्यकार रघु ठाकुर

            दूसरे काव्य संग्रह ‘‘मर रहा है किसान, फिर भी भारत महान’’ का प्रथम संस्करण सन् 2012 में प्रकाशित हुआ था। यह संग्रह इतना लोकप्रिय हुआ कि सारी प्रतियां साल भर में ही बिक गईं और अगले साल यानी सन् 2013 में ही प्रकाशक को इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा। स्पेनिश कवि लोर्का को समर्पित इस काव्य संग्रह की भूमिका लिखते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार रमेश दवे ने लिखा कि -‘‘ये कविताएं पढ़ कर ऐसा लगता है, भाई रघु ठाकुर जैसे निर्भीक एवं प्रखर वक्ता के पास कविता स्वयं आई हो और उसने मनुष्य की तरह, समाज की तरह, पीड़ितों की तरह खड़े हो कर कहा हो कि मुझे लिखो, मैं भी आज पाखंड, क्षोभ, जड़ता, अहंकार, साम्प्रदायिकता जैसे तरह-तरह के वैचारिक अभावों से ग्रस्त हूं। कविता का समाज मिट रहा है। इसीलिए रघु भाई ने कविता की आवाज़ सुन कर ये कविताएं रच दीं- अपने संवेदनशील मन की घबराहट को बाहर लाने के लिए।’’ रमेश दवे आगे लिखते हैं कि ‘‘इन कविताओं में कोई यथार्थवाद, कलावाद, प्रकृतिवाद न खोजा जाए और न शिल्प की कसौटियों पर इन्हें कसा जाए। ये वक्तव्य की कविताएं हैं, इसलिए इनकी वाग्मिता में सत्य और ईमान को देखा जाए।’’
‘‘मर रहा है किसान फिर भी भारत महान’’  काव्य संग्रह में एक कविता है ‘‘चाहिए है बस एक संडास’’। इस कविता का एक अंश देखिए-
सारा दिन घूम-घूम कर बेचते हैं खिलौने
नन्हा-सा बच्चा गोद में, कभी आदमी के कभी औरत के
एक अदद चादर, फटी-सी दरी और रजाई
कुल जमा यही हैं उनके बिछौने
दिन तो काट लिया,
पर रात कहां बिताएं, कहां सोने जाएं ?

             इसी संग्रह में एक और कविता है जिसका शीर्षक है-‘‘घर की तलाश’’। इस कविता में समाज में सिकुड़ती असंवेदनशीलता और परस्पर दूरियांे का बड़ी बारीकी से चित्रण किया गया हैं। कविता का एक अंश देखें-
मुझे है एक घर की तलाश
जो तालाब का पड़ोसी हो
बस अड्डा हो या रेलवे स्टेशन
स्कूल व कालेज हो और मैदान भी हो पास
पर अब कैसे मिलेगा ऐसा घर ?
शहर तो फैल गया है
हो गया है मीलों का सफ़र।
मुझे चाहिए ऐसा घर
जहां पीने को साफ पानी हो
जहां हत्यारा धुंआ न हो और हवा साफ हो
वायुमंडल रहे धुंए से बेअसर।

             सन् 2019 में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘‘स्याह उजाले’’ में समाज में व्याप्त विसंगतियों पर तीखा प्रहार करते हुए ‘‘सभ्य समाज के नवाचार’’ शीर्षक कविता में रघु ठाकुर लिखते हैं-
डाॅगी को दैनिक क्रिया के लिए
साहब ले जाते हैं
पर बाबा को पोटी कराने को/ नौकर लगाते हैं
डाॅगी की गर्मी की बात अलग है
डाॅगी को वातानुकूलित कमरे में रहने की आदत है
जब मजदूर तपती दोपहर में
पत्थर तोड़ते हैं
मिट्टी खोदते और गिट्टी फोड़ते हैं
तब डाॅगी ड्राइंगरूम में अलसाते हैं

              वर्तमान सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं धार्मिक परिदृश्य का आंकलन एवं चिंतन करते हुए अपने जिन विचारों को रघु ठाकुर ने लेखबद्ध किया है वे लेख ‘‘विमर्श’’ नामक पुस्तक में संग्रहीत हैं। इन लेखों में ‘‘ऊर्जा तो बहाना है, अमेरिका के साथ जाना है’’, ‘‘प्रजातांत्रिक पूंजीवाद बनाम साम्यवादी पूंजीवाद’’, ‘‘जरूरत है पांचाली जैसी तेजस्विता की’’, ‘‘भस्मासुर बनाओगे तो खुद कहां बच पाओगे’’, ‘‘वैचारिक अतिवाद के महल’’, ‘‘औद्योगिक आतंकवाद’’, ‘‘ गांधी राष्ट्रपिता क्यों है, गांधी तो विश्वपिता हैं’’, ‘‘कविता-लोक से बाजार तक’’, नक्सलवाद- प्रचार और तथ्य’’ जैसे लेख वर्तमान समाज में व्याप्त वैचारिक संकीर्णता को बेनकाब करते हुए वह आक्रोश व्यक्त करते हैं जिसके केन्द्र में सकारात्मक परिवर्तन का आह्वान है। इस पुस्तक में स्त्री विमर्श की एक कविता भी मौजूद है जो कवि रघु ठाकुर ने विंध्याचल एक्सप्रेस की सामान्य बोगी में यात्रा करने वाली तेंदू पत्ते वालियों की पीड़ा के रूप में व्यक्त किया है कविता का शीर्षक है ‘‘ तेंदू पत्ते वालियों का दर्द’’। इसका ये अंश देखिए -
तेंदू के पत्ते घने जंगलों से तोड़ कर
सैकड़ों किलोमीटर दूर वनों में घूम कर
ये गरीब तेंदू पत्ते वालियां देर रात्रि घर पहुंचेंगी
तब जा कर इनके घरों की अंगीठियां सुलगेंगी
इनकी यात्रा दुर्दांत कथानक है
इंसान की यह जिन्दगी नरक से भी भयानक है
भोर में तीन बजे जाग कर
दुधपीते बच्चों को सोता छोड़ कर
हाथ में एक थैला, साथ में चादर मैंला
निकलती हैं ये अपनी संघर्ष-यात्रा पर

          बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रघु ठाकुर जो कि देश में समतामूलक समाज संरचना हेतु समर्पित हैं, प्रकृति से एक कवि एवं साहित्यकार हैं, इसीलिए उनके साहित्य में समाज और संवेदनाओं का घनीभूत सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है। वस्तुतः साहित्य सृजन रघु ठाकुर के लिए संवेदनाओं से साक्षात्कार है और वे यही साक्षात्कार अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाने के लिए सतत् सृजनरत रहते हैं ।
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( दैनिक, आचरण  दि. 23.08.2019)
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सागर शहर में गणेशोत्सव - डॉ. वर्षा सिंह



        गणेशोत्सव लगभग पूरे भारत में बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह से मनाया जाता है। बुंदेलखंड के सागर शहर में भी इस अवसर पर लोग गणेश जी की मिट्टी की मूर्ति लाकर अपने घरों में स्थापित करते हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी तक चलने वाले इस श्री गणेशोत्सव समारोह में श्रद्धालु लोग कम से कम तीन दिन या अधिकतम दस दिन तक गणेश जी की पूजन, सेवा, भोग, आरती, कीर्तन आदि से अनुष्ठान पूर्ण करके गणेश प्रतिमा को जल में सम्मानपूर्वक विसर्जित कर देते हैं। कहा जाता है कि गणेश जी के घर मे पधारने से धन-धान्य, ऋद्धि-सिद्धि आती है।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्र दर्शन करना निषेध है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन रात्रि को चांद देखने से एक वर्ष के अन्दर कोई न कोई कलंक अवश्य लगता है। पुराणों में वर्णित है कि भगवान श्रीकृष्ण को भी इस दिन चन्द्र दर्शन करने से कलंक का सामना करना पड़ा था। इसलिए इस चतुर्थी को कलंक चतुर्थी या पत्थर चतुर्थी भी कहते हैं। यदि जाने अनजाने में चंद्र दर्शन हो जाए तो वही खडे होकर एक पत्थर उठाकर चांद की ओर फेंक देना चाहिए। गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करना चाहिए।



इस वर्ष गणेश उत्सव के दौरान एक अमृत सिद्धि, दो सर्वार्थ सिद्धि और छह रवि योग रहेंगे। श्रीगणेश की स्थापना शिव-पार्वती योग में होगी। सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन है और शुक्ल योग माता पार्वती को प्रिय है। इस दिन कन्या राशि का चंद्रमा भी है। ये सभी शुभ योग आज सोमवार को है। आज ही महिलाएं जहां शिवपार्वती कार्तिकेय, नंदी, शृंगी आदि गणों को पूजेंगी वहीं घरों में और नगर में जगह- जगह गणेश स्थापना होगी। गणेश चतुर्थी पर लंबे समय बाद कई शुभ संयोग बनेंगे। एक ओर जहां ग्रह-नक्षत्रों की शुभ स्थिति से शुक्ल और रवियोग बनेगा, वहीं सिंह राशि में चतुग्रही योग भी बन रहा है। अर्थात सिंह राशि में सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र एक साथ विद्यमान रहेंगे।


सागर शहर में 100 से अधिक स्थानों पर गणेशजी की झांकी लगाई जाती है, जिसकी तैयारियां पूर्ण हो गई है। गजानन को विराजित करने के लिए स्वर्ण मंदिर बनाया गया है। झांकी लगाने के लिए पंडाल सजना शुरू हो गए है। गणेश भगवान की स्थापना करने के लिए शहर की विभिन्न कमेटियां जुटी हुई हैं। विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, प्रथम पूज्य गणपति बाप्पा बुद्धि एवं समृद्धि के आराध्य देव भगवान श्री गणेश की प्रतिमा को विराजित करने के लिए वाटरप्रूभ पंडाल बनाए जा रहे हैं। बारिश का मौसम रहने के कारण पंडाल को बनने में विशेष ध्यान कमेटियों ने दिया है। गणेश भगवान के प्रतिमाओं की बुकिंग पहले ही हो गई है। पर्यावरण का ध्यान रखते हुए कमेटियों ने मिट्टी की गणेश प्रतिमाओं को ही प्राथमिकता दी है।



Tuesday, August 27, 2019

बुन्देलखण्ड की काव्यधारा - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

बुन्देलखण्ड की काव्यधारा
           - डॉ. वर्षा सिंह
           
बुन्देलखण्ड उस समय से साहित्यिक सम्पदा का धनी रहा है जब यह भू-भाग जैजाकभुक्ति कहलाता था। बुन्देलखण्ड  में एक से बढ़ कर एक कवि एवं साहित्यकार हुए। जिनकी रचनाओं से यहां की जातीय गरिमा, संस्कृति, धार्मिकता, राजनीति, आर्थिक स्थिति एवं वीर भावना की समुचित जानकारी मिलती है। बुन्देलखण्ड के शिल्पकार वीर योद्धा महाराज छत्रसाल स्वयं कवि एवं साहित्यप्रेमी थे। इनके लिए कवि भूषण कह उठे थे -‘‘ शिवा को सराहौं कि सराहौं छत्रसाल को ’’। जब मोहम्मद बंगश ने बुन्देलखण्ड पर आक्रमण किया और 80 वर्षीय महाराज छत्रसाल को बाजीराव पेशवा की सहायता की आवश्यकता महसूस हुई तो उन्होंने इस कविता के रूप में अपना संदेश भेजा था-
     जो गति ग्राह्य गजेन्द्र की, सो गति जानहुं आज।
     बाजी  जात  बुंदेल  की,  राखो  बाजी  लाज ।।
"पत्रिका" समाचार पत्र (राजस्थान पत्रिका) के सागर संस्करण के चार वर्ष पूर्ण होने पर दिनांक 27.08.2019 को प्रकाशित  डॉ. वर्षा सिंह के आलेख का संक्षेप अंश

बुन्देलखण्ड में जो सुप्रसिद्ध कवि हुए उनमें से कुछ प्रमुख कवि हैं -
*कवि जगनिक* :- चंदेलकाल में सन् 1165 से 1203 में राजा परमाल के दरबार में रहते हुए कवि जगनिक ने आल्हखण्ड नामक वीर रस की सुप्रसिद्ध रचना लिखी, जिसमें महोबा के वीर नायक आल्हा और ऊदल की वीरता का इतना सजीव वर्णन किया गया है कि इसे पढ़ने या सुनने वाले की भुजाएं फड़कने लगती हैं। समूचे बुन्देलखण्ड में इस रचना को आल्हा गायन के रूप में गाया जाता है।

*कवि केशवदास* :- केशवदास रीति-काव्य के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। केशव का जन्म ओरछा में हुआ था। बुन्देलखण्ड की संस्कृति रीति रिवाज भाषागत प्रयोगों से केशव बुन्देली के ही प्रमुख कवि हैं। इन्हें हिंदी तथा संस्कृत का बहुत अच्छा ज्ञान था। ये संगीत, धर्मशास्त्र, ज्योतिष एवं राजनीति के भी ज्ञाता थे। अपने जीवनकाल में इनको बहुत प्रसिध्दि मिली थी। इनके प्रमुख ग्रंथ हैं- ’रसिक प्रिया, ’कवि प्रिया, ’विज्ञान-गीता तथा ’राम चंद्रिका आदि। रीतिकालीन कवि केशव ने कविप्रिया, रसिकप्रिया में रीति तत्व तथा विज्ञान गीता एवं रामचन्द्रिका में भक्ति तत्व को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रुप में प्रस्तुत किया है। आचार्य कवि केशवदास ने बुन्देली गारी (लोकगीत) को प्रमुखता से अपने काव्य में स्थान दिया और सवैया में इसी गारी गीत को परिष्कृत रुप में रखा है। रामचन्द्रिका के सारे सम्वाद सवैयों में है ऐसी सम्वाद योजना दुर्लभ है। उनकी कविता में अनुप्रास अलंकार की सुन्दर प्रस्तुति मिलती है-
अरुन गात अतिप्रात पद्मिनी-प्राननाथ मय।
मानहु “केसवदास’ कोकनद कोक प्रेममय।


*कवि लाल कवि* :- लाल कवि मऊ, बुंदेलखंड के निवासी थे तथा महाराज छत्रसाल के दरबारी कवि थे। उन्होंने ’छत्रप्रकाश’ की रचना की, जिसे वीर रस के प्रमुख काव्य ग्रंथों में गिना जाता है। इस हस्तलिखित कृति को अंग्रेज मेजर प्राइस ने फोर्ट विलियम कॉलेज कलकत्ता से इसे पहली बार मुद्रित कराया था। इसमें छत्रसाल का जीवनवृतांत है। उनकी यह कविता देखें :-
’लाल’ लखौ पावस प्रताप जगती तल पैं,
शीतल समीर बीर बैरी बहने लगे।
दाबे, दबे, दबकीले, दमक, दिखाए, दीह,
दिशि, देश, बादर, निसासी रहने लगे ।।

*कवि ईसुरी* :- बुन्देलखण्ड के यशस्वी कवि ईसुरी का जन्म उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड अंतर्गत झांसी जिले के मऊरानीपुर के गांव मेंढ़की में हुआ था। ईसुरी की फागें कालजयी हैं। उनकी फागों में प्रेम, श्रृंगार, करुणा, सहानुभूति, हृदय की कसक एवं मार्मिक अनुभूतियों का सजीव चित्रण है। ईसुरी की फागों में दिल को छूने और गुदगुदाने की अद्भुत क्षमता है। उन्होंने अपनी फागें अपनी प्रेयसी रजऊ को संबोधित करके लिखी हैं जिसमें श्रृंगार रस की अद्भुत छटा देखने को मिलती है।
जो तुम छैल छला बन जाते, परे अँगुरियन राते।
मों पोंछत गालन के ऊपर, कजरा देत दिखाते।
घरी घरी घूघट खोलत में, नजर सामने आते।
ईसुर दूर दरस के लाने, ऐसे काए ललाते ।

 *कवि पद्माकर* :- महाकवि पद्माकर का जन्म सागर में सन् 1753 में हुआ था। उन्होंने अपने जन्म और जीवन के बारे में जयपुर नरेश महाराज जगत सिंह को इस कवित्त के रूप में अपना परिचय दिया था।
भट्ट तिलंगाने को, बुंदेलखंड -वासी कवि, सुजस-प्रकासी ‘पद्माकर’ सुनामा हों।
जोरत कबित्त छंद-छप्पय अनेक भांति, संस्कृत-प्राकृत पढ़ी जु गुनग्रामा हों ।
पद्माकर की भाषा सरस, काव्यमय, सुव्यवस्थित और प्रवाहपूर्ण है। अनुप्रास के प्रयोग में वे सिद्धहस्त थे। काव्य-गुणों का पूरा निर्वाह उनके छंदों में हुआ है। शौर्य, श्रृंगार, प्रेम, भक्ति का सुन्दर चित्रण उनकी रचनाओं में देखा जा सकता है-
फागु की भीर, अभीरिन में
गहि गोंवदै लै गई भीतर गोरी।
भाई करी मन की पद्माकर,
ऊपर नाई अबीर की झोरी।
छीनि पितंबर कम्मर तें
सु बिदा दई मीड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाय कही मुसुकाय,
‘लला फिर आइयो खेलन होरी।
 बुंदेलखंड में कवि बोधा, कवि ठाकुर, मैथिलीशरण गुप्त, मुंशी अजमेरी से ले कर ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी, केदारनाथ अग्रवाल, घनश्यामदास बादल आदि अनेक कवि हुए, प्रवीण राय, गणेश कुंवरि जैसी कवयित्रियां हुईं और यह परम्परा आज भी सतत् प्रवाहमान है।
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Sunday, August 25, 2019

"बुन्देली लोक संस्कृति तथा उसके संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका" विषय पर परिचर्चा आयोजित - डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

     दिनांक 23.08.2019 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर सागर शहर के वृन्दावन वार्ड, गोपालगंज स्थित सत्यम कला एवं संस्कृति संग्रहालय में  "बुन्देली लोक संस्कृति तथा उसके संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका" विषय पर आयोजित परिचर्चा में मुझे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ वर्षा सिंह और बहन डॉ. (सुश्री) शरद सिंह को सम्मिलित होकर अपने विचार रखने का सुखद अवसर मिलाा। विशेष बात यह  है कि यह संग्रहालय, संग्रहालय के संस्थापक एवं अध्यक्ष श्री दामोदर अग्निहोत्री के निजी प्रयासों से स्थापित किया गया है, एवं इसके संरक्षक श्री उमाकांत मिश्र हैं।
           डॉ. (सुश्री) शरद सिंह ने कहा कि संग्रहालय भविष्य से अतीत को जोड़ने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आने वाली पीढ़ियों को अपने अतीत की विरासत से जोड़ने का महान कार्य यहां किया जा रहा है। ब्रिटिश-मुगल रियासतों के सिक्के, तेंदू और पलाश पर मुद्रण, 1899 के पोस्ट कार्ड व लिफाफे, आजादी पूर्व के समाचार पत्र और बुंदेलखण्ड संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं को सहजने काम दामोदर अग्रिहोत्री ने किया है। दामोदर अग्रिहोत्री ने घर पर ही सत्यम बुंदेली संग्रहालय बनाया है। यहां वे  प्राचीन विरासत से जुड़ी वस्तुओं को सहेज कर रखे हैं। अपने संबोधन में दामोदर अग्रिहोत्री ने बताया कि उन्हें बचपन से ही ऐसी वस्तुएं जोड़ने का शौक था।
तस्वीरें उसी अवसर की।
















   

















Thursday, August 22, 2019

काव्य संग्रह "कुछ कदम का फ़ासला" का लोकार्पण समारोह- डॉ. वर्षा सिंह

Dr. Varsha Singh

           पिछले रविवार यानी 18.08.219 को  मुझे यानी इस ब्लॉग की लेखिका डॉ. वर्षा सिंह को कवि वीरेन्द्र प्रधान के प्रथम काव्य संग्रह "कुछ कदम का फ़ासला" के लोकार्पण समारोह में उपस्थित होने और पुस्तक पर समीक्षात्मक आलेख का वाचन कर अपने विचार रखने का अवसर मिला। इस समारोह में  बतौर मुख्य अतिथि एवं प्रमुख वक्ता प्रख्यात साहित्यकार डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह ने भी समारोह में उपस्थित प्रबुद्धजनों के समक्ष पुस्तक पर अपने विचार रखे।

तस्वीरें उसी अवसर की....